मैकियावेली का जीवन परिचय

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मैकियावली का जन्म 1469 ई0 में इटली के फलोरेन्स नगर में हुआ। उसके पिता एक वकील थे जो टस्कन वंश से सम्बन्धित थे। यद्यपि उसको पर्याप्त शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो सकी, फिर भी उसे लैटिन भाषा का अच्छा ज्ञान था। उसकी लेखनी में कला और शक्ति दोनों थीं। जीवन की व्यवहारकुशलता और धनार्जन की दौड़ में वह बहुत आगे थे। मैकियावली प्रारम्भ से ही फलोरेन्स की सत्ता में भाग लेना चाहते थे और उनका यह स्वप्न 1494 में 25 वर्ष की आयु में पूरा हुआ। इस समय उसने एक छोटा सा प्रशासनिक पद प्राप्त करके अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। तत्पचात् अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ के बल पर उसने ‘चान्सरी’ में सचिव पद प्राप्त हुआ। इस पद की बदौलत उसे राजनयिक कार्यों से सम्बन्धित मामलों में फलारेन्स का प्रतिनिधित्व करने के लिए यूरोप के कई देशों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ जहाँ बड़े राजनेताओं के सम्पर्क में आने पर उसने व्यावहारिक राजनीति का ज्ञान प्राप्त किया। लुई बारहवें, विशप सोडेशी, सीजर बोर्गिया के साथ सम्बन्धों नेउसे महत्त्वाकांक्षी बना दिया और वह अवसरवादी राजनीति का प्रणेता बन गया। 1498 से 1512 ई0 तक 14 वर्षों तक उसने 'Council of Ten for War' का सदस्य बनकर फलारेन्स के सुरक्षा विभाग की सेवा की लेकिन 1512 ई0 में स्पेन समर्थकों द्वारा फलोरेन्स पर अधिकरार कर लेने के बाद उसका पद छिन गया और उसे जेल भेद दिया गया। अब उसको सक्रिय राजनीतिक जीवन से छुटकारा मिल गया अर्थात् उसके राजनीतिक जीवन का अन्त हो गया। अब फलोरेन्स पर मेडिसी परिवार का आधिपत्य हो गया। जीवन के शेष 15 वर्ष उसने ‘सैन कैशिसनो’ नामक गाँव में समाज सेवा और लेखन कार्य करते हुए व्यतीत किए। उसने मेडिसी परिवार के तत्कालीन प्रशासक लोरेंजो अर्थात् ‘ड्यूक ऑफ बोर्जिया’ के कहने पर ही अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Prince' लिखकर भेंट की। लेकिन उसे “ाड्यन्त्रकारी मानकर निर्वासित कर दिया गया और उसने इस दौरान ‘इटली का इतिहास’ लिखा। 1527 ई0 में 58 वर्ष की अल्पायु में ही उसकी मृत्यु हो गई।

महत्त्वपूर्ण रचनाएँ

मैकियावली ने अपने जीवनकाल में दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की जिससे उसका नाम राजनीतिक दर्शन के इतिहास में अमर हो गया :-
  1. दॉ प्रिन्स (The Prince) : यह पुस्तक 1513 में लिखी गई। यह मैकियावली की प्रमुख रचना है। यह रचना राजतांत्रिक व्यवस्था पर प्रकाश डालती है। इसमें राज्य का निर्माण व विस्तार के बारे में बताया गया है। इस ग्रन्थ में 26 अध्याय हैं जिन्हें तीन भागों में बाँटा गया है। प्रथम अध्याय राजतन्त्र का, दूसरा किराय की सेनाओं व राष्ट्रीय सेनाओं का तथा अन्तिम अध्याय राजदर्शन की व्याख्याएँ प्रस्तुत करता है। इस ग्रन्थ में एक सफल शासक के लिए दिए गए उपदेश विस्तारपूर्वक समझाए गए हैं। इसलिए यह रचना मैकियावली की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है।
  2. डिस्कोर्सेज : यह रचना 1520 ई0 में लिखी गई। इसमें मैकियावली ने गणतन्त्रीय व्यवस्था का वर्णन किया है। यह रोमन राजतन्त्र और तत्कालीन शासकों के लिए कुछ नियमों की आदर्श रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में गणराज्य को राजतन्त्र की अपेक्षा अधिक कल्याणकारी, सबल और जन आकांक्षाओं के अनुकूल बताया गया है। इनके अतिरिक्त मैकियावली ने 'The Art of War' तथा 'History of Florence' नामक दो अन्य ग्रन्थ भी लिखे। इनके अतिरिक्त उसने अनेक उपन्यास, कहानिपयाँ तथा कविताएँ भी लिखीं।

अध्ययन की पद्धति

मैकियावली ने अपने पूर्ववर्ती विचारकों से भिन्न पद्धति को अपनाकर पूर्ववर्ती विचारकों की अध्ययन पद्धति की जटिलताओं को दूर करने का प्रयास किया है। उसे पोप और सम्राट से कोई लगाव नहीं था। उसने नीति, न्याय आदि के अमूर्त सिद्धान्तों पर आधारित निगमनात्मक पद्धति को त्यागकर वैज्ञानिक तटस्थता की नीति अपनाई। समकालीन परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए अपनी नई अध्ययन पद्धति विकसित की जिसकी विशेषताएँ हैं :-

ऐतिहासिक पद्धति 

मैकियावली ने आनुभाविक विधि को अपनाते हुए ऐतिहासिक विधि से उसकी पुष्टि की। उसने समकालीन राजनीति का अध्ययन किया, विश्लेषण किया, अपने निष्कर्ष निकाले और उसके बाद इतिहास की घटनाओं के आधार पर उनकी पुष्टि की। उसने प्राचीन रोम इतिहास से बहुत सी घटनाएँ और सत्यों के उदाहरण प्राप्त किए। वह इतिहास को ही आधार मानता था। उसका विश्वास था कि “जो व्यक्ति पहले से यह जानना चाहता है कि भविष्य में क्या होने वाला है, उसे इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या हो चुका है।” अपनी पुस्तक ‘डिसकोर्सज’ (Discourses) में उसने प्राचीन इतिहास के अनेक दृष्टान्त दिए हैं। ऐतिहासिक विधि एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ की हमेशा मदद करती है। हमें वर्तमान में समस्याओं का हल किस प्रकार करना चाहिए तथा भविष्य में क्या करना है ? इस तरह के प्रश्नों का उत्तर भूतकाल के अध्ययन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इतिहास का अवलोकन करने से ही हमें समस्याओं के कारण तथा उनका समाधान मालूम हो सकता है। मैकियावली के अनुसार हम इतिहास की सफलताओं व असफलताओं के कारणों को जानकर उन्हें वर्तमान में लागू कर सकते हैं। इस प्रकार पूर्वजों के गलत तथा सही कार्यों व उनके परिणामों का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। मैकियावली ने इतिहास का उपयोग पूर्वकल्पित निष्कर्षों की पुष्टि में किया है। इतिहास का अध्ययन वर्तमान राजनीतिक दर्शन की समस्याओं को हल करने में पूर्ण सहायक सिद्ध हुआ है।

प्रो0 डनिंग का विचार है कि मैकियावली की पद्धति देखने में जितनी ऐतिहासिक लगती है, यथार्थ में उतनी नहीं है। उसके सिद्धान्त पर्यवेक्षण पर आधारित थे। उनकी पुष्टि करने के लिए उसने ऐतिहासिक विधि अपनाई थी। उसने पूर्व-कल्पित सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए ही इतिहास के प्रमाणों की तलाश की थी। इसी प्रकार सेबाइन भी मैकियावली की पद्धति को ऐतिहासिक कहना भ्रमपूर्ण मानता है। उनका कहना है कि उनकी पद्धति पर्यवेक्षणात्मक थी। उसने अपने तर्कों को सत्य सिद्ध करने के लिए ही इतिहास का आश्रय लिया।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक समस्याओं के प्रति मैकियावली का दृष्टिकोण अनुभव प्रधान था एवं उसकी भावना ऐतिहासिक थी।

निरीक्षणात्मक पद्धति 

सेबाइन के अनुसार मैकियावली की अध्ययन पद्धति निरीक्षणात्मक अथवा पर्यवेक्षणात्मक थी। उनकी पुस्तक ‘दा प्रिंस’ (The Prince) इस पद्धति पर ही आधारित है। उसका उद्देश्य अपने समय की समस्याओं का हल करना था जिसके लिए उसने घटनाओं को यथार्थवादी धरातल पर परखकर निष्कर्ष प्रस्तुत किए। इस प्रकार उनकी पद्धति वास्तविक घटनाओं पर आधारित निरीक्षणात्मक पद्धति थी। उसने निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए घटनाओं का ऐतिहासिक अवलोकन किया था।

तुलनात्मक पद्धति 

 मैकियावली ने अपनी इटली की तत्कालीन दुर्दशा को देखा था। उसने विभिन्न टुकड़ों मे बँटी इटली के राज्यों की समस्याओं का अलग-अलग पता लगाकर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया था। उसकी यह पद्धति अरस्तू की तरह व्यापक तुलनात्मक निष्कर्षों पर आधारित थी।

विश्लेषणात्मक पद्धति 

मैकियावली ने निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए सबसे पहले किसी घटना के मूल कारणों का पता लगाया था। उसके बाद कारणों को घटना के क्रम के आधार पर विश्लेषण करके अपना मत या निष्कर्ष प्रस्तुत किया था। इसलिए उनकी पद्धति विश्लेषणात्मक थी।

वैज्ञानिक पद्धति 

मैकियावली ने वैज्ञानिक तटस्थता की नीति को अपनाते हुए अपनी समकालीन परिस्थितियों का बड़े ध्यान से अध्ययन किया। उसने सबसे पहले समस्याओं को समझा और फिर परिणाम पर पहुँचा। मैकियावली ने मध्यकाल के विचारकों के विपरीत जिस पद्धति को अपनाया उसमें मध्ययुग की भ्रामक विचारधाराओं जैसे ‘दो तलवारों का सिद्धान्त’, प्राकृतिक कानून के सिद्धान्त के लिए कोई स्थान नहीं है। फिर भी उसने कहीं-कहीं अपनी कुछ धारणाएँ बना ली थीं जिनको सत्य मानकर वह चलता है। इस प्रकार मैकियावली वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर दार्शनिक तत्त्व भी ग्रहण कर लेता है।

इस प्रकार उसने केवल ऐतिहासिक पद्धति का ही प्रयोग नहीं किया बल्कि तुलनात्मक, निरीक्षणात्मक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण गुणों आदि पर आधारित पद्धति का प्रयोग किया। परन्तु आलोचकों का कहना है कि यह पद्धति ऐतिहासिक नहीं थी। उसने इतिहास के दृष्टांतों का प्रयोग केवल कल्पित निष्कर्षों को सिद्ध करने के लिए ही किया था। प्रो0 डनिंग के अनुसार- “मैकियावली की पद्धति ऊपर से जितनी ऐतिहासिक लगती है, यथार्थ में उतनी ऐतिहासिक नहीं है।” सेबाइन ने भी उसकी पद्धति को ऐतिहासिक कहना भ्रमपूर्ण माना है।

इन आलोचनाओं के बावजूद यह कहना पड़ेगा कि उसने धार्मिकता, अन्धविश्वास व गूढ़ताओं से मुक्त अध्ययन पद्धति राजनीतिक दर्शनशास्त्र को प्रदान की। उसने ऐतिहासिक, यथार्थवादी, पर्यवेक्षणात्मक व वैधानिक विशेषताओं से युक्त पद्धति अपनाकर इतिहास की सहायता से उसे वैज्ञानिक और यथार्थवादी बनाने का प्रयास किया। उसने अपने सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए धार्मिक दृष्टान्तों का सहारा न लेकर, इतिहास, तर्क और पर्यवेक्षण की ऐसी पद्धति ग्रहण की जिसमें चातुर्य और सहज बुद्धि की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। उसने अपनी राजनीतिक पद्धति से इतिहास और अनुभव का समन्वय करके आगमनात्मक पद्धति का प्रारम्भिक रूप पेश किया। अपनी हठवादिता और एकांगी दृष्टिकोण के अवगुण से युक्त यह पद्धति मैकियावली की राजनीति विज्ञान को एक महत्त्वपूर्ण देन है।

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