थॉमस एक्विनास का जीवन परिचय एवं राजनीतिक विचार

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अनुक्रम
13 वीं शताब्दी के महान् दार्शनिक सेण्ट थॉमस एक्विनास का जन्म 1225 ई0 में नेपल्स राज्य (इटली) के एक्वीनो नगर में हुआ।
उसका पिता एकवीनी का काऊण्ट था उसकी माता थियोडोरा थी। सेण्ट थॉमस एक्विनास का बचपन सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं
से परिपूर्ण था। उसकी जन्मजात प्रतिभा को देखकर उसके माता-पिता उसे एक उच्च राज्याधिकारी बनाना चाहते थे। इसलिए
उसे 5 वर्ष की आयु में मौंट कैसिनो की पाठशाला में भेजा गया। इसके बाद उसने नेपल्स में शिक्षा ग्रहण की। लेकिन उसके
धार्मिक रुझान ने उसके माता-पिता के स्वप्न को चकनाचूर कर दिया और उसने 1244 ई0 में ‘डोमिनिकन सम्प्रदाय’ की सदस्यता
स्वीकार कर ली। उसके माता-पिता ने उसे अनेक प्रलोभन देकर इसकी सदस्यता छोड़ने के लिए विवश किया लेकिन उसके
दृढ़ निश्चय ने उनकी बात नहीं मानी। इसलिए वह धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए पेरिस चला गया। वहाँ पर उसने आध्
यात्मिक नेता अल्बर्ट महान् के चरणों में बैठकर धार्मिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उसने 1252 ई0 में अध्ययन व अध्यापन
कार्य में रुचि ली और उसने इटली के अनेक शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया। इस दौरान उसने विलियम ऑफ मोरवेक के सम्पर्क
में आने पर अरस्तू व उसके तर्कशास्त्र पर अनेक टीकाएँ लिखीं। उस समय भिक्षुओं के लिए पेरिस विश्वविद्यालय में उपाधि
देने का प्रावधान नहीं था। इसलिए पोप के हस्तक्षेप पर ही उसे 1256 ई0 में ‘मास्टर ऑफ थियोलोजी’ (Master of Theology)
की उपाधि दी गई। इसके उपरान्त उसने ईसाई धर्म के बारे में अनेक ग्रन्थ लिखकर ईसाईयत की बहुत सेवा की। पोप तथा
अन्य राजा भी अनेक धार्मिक विषयों पर उसकी सलाह लेने लग गए। इस समय उसकी ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी। अपने
समय के महान् प्रकाण्ड विद्वान की अल्पायु में ही 1274 ई0 में मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद 16 वीं शताब्दी में उसे ‘डॉक्टर
ऑफ दि चर्च’ (Doctor of the Church) की उपाधि देकर सम्मानित किया गया।

महत्त्वपूर्ण रचनाएँ

सेण्ट थॉमस एक्विनास के राज-दर्शन का प्रतिबिम्ब उसकी दो रचनाएँ ‘डी रेजिमाइन प्रिन्सिपम’ (De Regimine Principum)
तथा ‘कमेण्ट्री ऑन अरिस्टॉटिल्स पॉलिटिक्स’ (Commentary on Aristotle’s Politics) है। इन रचनाओं में राज्य व चर्च के
सम्बन्धों के साथ-साथ अन्य समस्याओं पर भी चर्चा हुई है। ये रचनाएँ राज्य व चर्च के सम्बन्धों का सार मानी जाती हैं। ये
रचनाएँ राज्य व चर्च के सम्बन्धों का सार मानी जाती हैं। ‘सुम्मा थियोलॉजिका’ (Summa Theologica) भी एक्विनास का एक
ऐसा महान् ग्रन्थ माना जाता है, जिसमें प्लेटो तथा अरस्तू के दर्शनशास्त्र का रोमन कानून और ईसाई धर्म-दर्शन के साथ समन्वय
स्थापित किया गया है। इस ग्रन्थ में कानून की संकुचित रूप से व्याख्या व विश्लेषण किया गया है। ‘रूल ऑफ प्रिन्सेस’ (Rule
of Princess), ‘सुम्मा कण्ट्रा जेंटाइल्स’ (Summa Contra Gentiles) ‘टू दि किंग ऑफ साइप्रस’ (To the King of Cyprus) ‘ऑन
किंगशिप’ (On Kingship) भी एक्विनास की अन्य रचनाएँ हैं। ‘ऑन किंगशिप’ (On Kingship) में एक्विनास राजतन्त्र व
नागरिक शासन पर चर्चा की है। उसकी सभी रचनाएँ उसके महान् विद्वतावादी होने के दावे की पुष्टि करती हैं।

अध्ययन पद्धति : विद्वतावाद

सेण्ट थॉमस एक्विनास का युग बौद्धिक और धार्मिक दृष्टि से एक असाधारण युग था। यह युग पूर्ण संश्लेषण का युग था।
यह युग पूर्ण संश्लेषण का युग था जिसमें समन्यवादी दृष्टिकोण पर जोर दिया जा रहा था। यह विद्वतावाद का युग था जिसमें
जीवन दर्शन की नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व अन्य समस्याओं का सुन्दर समावेश था। विद्वतावाद के दो प्रमुख
लक्षण – युक्ति व विश्वास थे। इस युग में चर्च के सर्वोच्चता सिद्धान्त की तार्किक या युक्तिपरक व्याख्या करके यह स्पष्ट
किया गया कि चर्च सिद्धान्त तर्क के विपरीत नहीं है। विद्वतावाद विश्वास और युक्ति (तर्क) में तथा यूनानीवाद और चर्चवाद
में समन्वय स्थापित करने तथा सब प्रकार के ज्ञान का एकीकरण करने का प्रयास है। सेण्ट आगस्टाइन के विश्वास (Faith)
तथा अरस्तू के विवेक (Reason) या तर्क में समन्वय स्थापित करने का प्रयास एक्विनास ने किया। उसमे मतानुसार विद्वतावाद
(Scholasticism) तीन मंजिले भवन की तरह है। इसकी पहली मंजिल विज्ञान तथा दूसरी मंजिल दर्शनशास्त्र की प्रतीक है।
दर्शनशास्त्र विज्ञान के मूल तत्त्वों को एकत्रित कर उनमें सह-सम्बन्ध स्थापित करता है तथा उसके सार्वभौमिक प्रयोग तथा
मान्यता के सिद्धान्तों को निर्धारित करने का प्रयास करता है। यह विज्ञानों का सामान्यकृत व सुविवेचित सार (Essence) है।
ये दोनों मंजिल मानव तर्क का प्रतीक हैं जिनका समन्वय व नियन्त्रण धर्मदश्रन द्वारा होना चाहिए। धर्म-दर्शन ज्ञान इमारत की
सबसे महत्त्वपूर्ण मंजिल है। यह धर्म-दर्शन ईसाई प्रकाशना (Revelation) पर निर्भर है जो दर्शनशास्त्र तथा विज्ञान से सर्वश्रेष्ठ
है। धर्म-विज्ञान या धर्म-दर्शन उस प्रणाली को पूरा कर देता है जिसके आरम्भ बिन्दु विज्ञान और दर्शन हैं। जिस प्रकार विवेक
दर्शन का आधार है, उसी प्रकार धर्म-विज्ञान का आधार विश्वास है। इन दोनों में कोई विरोध नहीं है। वे एक-दूसरे के पूरक
हैं। अत: दोनों का मिश्रण ज्ञान की इमारत को मजबूत बनाता है। एक्विनास का मानना है कि धर्म-विज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान
है जो ज्ञान की अन्य शाखाओं – नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र को अपने अधीन रखता है। इस प्रकार एक्विनास
ने मध्ययुग की तीन महान् बौद्धिक विचारधाराओं – सार्वभौमिकतावाद, विद्वतावाद और अरस्तूवाद में समन्वय स्थापित किया
है। उसने समन्वयात्मक तथा सकारात्मक पद्धति का ही अनुसरण किया है।

राज्य का सिद्धान्त

जिस प्रकार एक्विनास ने धर्म से पृथक् तर्क का अस्तित्व माना है, उसी प्रकार उसने चर्च से पृथक् राज्य का अपना औचित्य
भी स्वीकार किया है। आरम्भिक मध्ययुगीन ईसाई विचारकों का मानना था कि राज्य की उत्पत्ति मनुष्य के आरम्भिक पाप
(Original Sin) के कारण हुई है। एक्विनास ने मध्ययुगीन तथा उससे पहले से प्रचलित राज्य-उत्पत्ति के सभी सिद्धान्तों को
नकारते हुए अपने ग्रन्थ सुम्मा ‘थियोलोजिका’ में राज्य सम्बन्धी विचारों को प्रस्तुत किया, उसने राज्य की उत्पत्ति की पापमयी
धारणा को सरेआम अस्वीकार कर दिया। वह अरस्तू तथा प्लेटो जैसे यूनानी दार्शनिकों की तरह यह मानता था कि मनुष्य
राजनीतिक तथा सामाजिक प्राणी है और राज्य की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि वह मानसव बुराइयों को रोकता
है, बल्कि इसलिए भी है कि राज्य के बिना व्यक्ति अपना सम्पूर्ण विकास नहीं कर सकता। एक्विनास एक ऐसा प्रथम ईसाई
दार्शनिक था जिसने यह कहने का साहस किया कि राज्य मनुष्य के लिए स्वाभाविक है और जो नियन्त्रण राज्य अपने अपने
सदस्यों पर आरोपित करता है, वह उनके लिए बाधा न होकर उनके नैतिक विकास में सहायक होता है। उसका मानना था
कि समाज प्राकृतिक है, इसलिए राज्य भी प्राकृतिक है। इस प्रकार एक्विनास ने राज्य की उत्पत्ति के बारे में एक विशिष्ट
मध्ययुगीन धारणा अपनाकर राज्य की उत्पत्ति के आगस्टाइन के सिद्धान्त को अरस्तू के तर्क के अनुसार संशोधित करने का
प्रयास किया। उसने स्पष्ट किया कि निर्दोषता की अवस्था (State of Innocence) में (पापमयी जीवन से पहले) भी राज्य किसी
न किसी रूप में विद्यमान था। उसने आगस्टाइन तथा अन्य ईसाई विचारकों की इस अभिधारणा को अस्वीकार किया कि
निर्दोषता की अवस्ािा में राज्य नाम की कोई वस्तु नहीं थी। एक्विनास ने यह स्पष्ट करने के लिए कि राज्य एक कृत्रिम, पापमयी,
परम्परागत संस्था न होकर एक प्राकृतिक संस्था है, के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत किए। उसके प्रमुख तर्क इस प्रकार से हैं:-

  1. “मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है।” एक्विनास ने अरस्तू के इस तर्क का विस्तार करते हुए कहा कि एक
    प्रधान (Head) के बिना व्यक्ति एक व्यवस्थित समाज में नहीं रह सकता। प्रधान या मुखिया जनहित की देखभाल करके
    समाज के निर्देशक तथा दण्डनायकिक शक्ति का केन्द्र बना रहता है। यदि श्रेष्ठ का निम्नतर पर शासन स्वीकार कर
    लिया जाए तो मनुष्य का मनुष्य के ऊपर शासन की धारणा स्वाभाविक बन जाती है। अत: राज्य मनुष्य के लिए प्राकृतिक
    है।
  2. यदि अधिक सद्गुणी, श्रेष्ठ, प्रज्ञावान व्यक्तियों का निम्न पर शासन प्रकृति के अनुकूल है तो राज्य एक प्राकृतिक संस्था
    है। यह प्राकृतिक होने के साथ-साथ निम्न लोगों के लिए लाभदायक भी है। इससे उनको अपने व्यक्तित्व का विकास
    करने के अवसर प्राप्त होंगे।

एक्विनास का मानना है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर आश्रित होता है। इससे अच्छे जीवन
के लिए सेवाओं का स्वाभाविक आदान-प्रदान होता रहता है। इसलिए समाज और राज्य मानव-प्रकृति की पूर्ति पर
आधारित हैं। वह मनुष्य के पापमयी जीवन पर आधारित नहीं है। एक्विनास का यह विचार कि राज्य का लक्ष्य सद्गुणों
का विकास करना है, सरकार के कर्त्तव्यों के सम्बन्ध में एक रचनात्मक दृष्टिकोण प्रकट करता है। उसके मतानुसार शासक
का पद समस्त समाज के लिए होता है। सामाजिक हित में योगदान देने में ही उसकी सार्थकता है। उसका मानना है
कि समुदाय को सद्गुणयुक्त जीवन की प्राप्ति में सहयोग देना ही शासक का प्रमुख कर्त्तव्य है। इसमें समाज में शान्ति
व न्याय-व्यवस्था कायम रखना भी शामिल है। इसके अतिरिक्त समुदाय को जीवनयापन की वस्तुओं के बारे में
आत्मनिर्भर बनाना भी शासक का प्रमुख कर्त्तव्य है। इसके लिए जो भोज्य पदार्थों की पर्याप्त आपूर्ति की व्यवस्था करनी
चाहिए। उसे शिक्षालयों, चर्चों व बाजारों का अच्छा प्रबन्ध करना चाहिए। माप-तौल की समुचित प्रणाली का विकास
करना, गरीबों के भरण-पोषण की व्यवस्था करना, सड़कों को चोर-डाकुओं के भय से मुक्त रखना, जनसंख्या पर
नियन्त्रण रखना, पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था के माध्यम से प्रजा पर नियन्त्रण रखना, उसके प्रमुख कर्त्तव्य हैं। उसे
इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि राज्य की भौतिक अवस्थाएँ उच्चतर लक्ष्य अर्थात् मोक्ष-प्राप्ति में सहायक हों। इस
प्रकार सेण्ट थॉमस एक्विनास ने शिष्टाचार व रीति-रिवाजों की समानता को राज्य का आचार बताकर आधुनिक राष्ट्रीय
राज्य समर्थन किया है।

यद्यपि सेण्ट एक्विनास ने काफी हद तक अरस्तू का अनुसरण करके शासक के कर्त्तव्यों पर जोर दिया लेकिन वे भी ईसाइत
के प्रभाव से बच नहीं सके। उसने यह कहा कि राज्य मानव-प्रकृति पर आधारित है, परन्तु वह यह कहने को भी विवश हुआ
कि राज्य ईश्वर द्वारा स्थापित किया जाता है। राजनीतिक समाज की उत्पत्ति सहज सामाजिक प्रवृत्तियों का ही परिणाम है।
उसका विचार है कि सभी राजनीतिक अधिकारों का स्रोत ईश्वर है जो सभी वस्तुओं का सर्वोच्च शासक है। शासन करने का
वैध अधिकार समूचे समुदाय को ईश्वर से ही प्राप्त होता है। मनुष्य में राजनीतिक समुदाय के विकास की प्रवृत्ति ईश्वर ने ही
आरोपित की है। इस प्रकार सेण्ट थॉमस एक्विनास ने अरस्तू के राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त का ईसाइयत विचारधारा में
समनव्य करके अपने सिद्धान्त की आधारशिला रखी। आगे चलकर 18 वीं शताब्दी में रूसो, बर्क तथा अन्य विचारकों ने इस
सिद्धान्त की प्रशंसा की।

सरकार का सिद्धान्त

सेण्ट एक्विनास ने मनुष्य का मनुष्य के ऊपर शासन दो प्रकार का बताया है। पहला, पाप से उत्पन्न दासता का रूप होता
है। दूसरा सहज सामाजिक प्रवृत्ति से उत्पन्न नागरिक सत्कार के रूप में होता है। ऐसी नागरिक सरकार कई प्रकार की होती
है – (i) पुरोहितवादी (Sacerdotal) (ii) राजसी (Royal) (iii) राजनीतिक (Political) (iv) आर्थिक ;म्बवदवउपबद्ध। इनमें से
पहली पोपतन्त्र के रूप में सर्वोच्च किस्म होती है। सामान्य रूप से राज्य का शासन राजसी अथवा राजनीतिक सरकारों द्वारा
चलाया जाता है। राजसी सरकार में शासक के पास निरंकुश शक्तियाँ न होकर विशाल शक्तियाँ होती हैं। राजनीतिक सरकार
में शासक की शक्तियाँ कानूनों से सीमित होती हैं। एक्विनास का मानना है कि सरकारों का अच्छा या बुरा होना ‘सब की
भलाई’ के मापदण्ड पर ही निर्भर करता है। एक्विनास ने इस बात पर जोर दिया है कि राज्य या सरकार का प्रमुख लक्ष्य
मनुष्यों के बीच सद्गुणों का विकास करना है ताकि वे मोक्ष-प्राप्ति करने में सफल हो सकें। इस उद्देश्य या लक्ष्य की प्राप्ति
में सफल सरकार अच्छी तथा असफल सरकार निकृष्ट होती है। इस प्रकार सरकारों का वर्गीकरण करने में एक्विनास ने अरस्तू
का अनुसरण करते हुए राजतन्त्र, अभिजाततन्त्र, सर्वजनतन्त्र, निरंकुशतन्त्र, धनिकतन्त्र तथा जनतन्त्र में बाँटा है। इनमें से
राजतन्त्र सरकार का सर्वोत्तम तथा जनतन्त्र निकृष्ट रूप होता है।

राजतन्त्र पर विचार

एक्विनास ने राज्य के स्थायित्व, एकता व नियमितता के लिए राजतन्त्र का ही समर्थन किया है। उसने इसे सबसे सर्वश्रेष्ठ
सरकार मानकर इसकी प्रशंसा की है। उसके समर्थन के आधार हैं :-

  1. समाज में एकता तथा शान्ति राजतन्त्र में ही सम्भव है।
  2. अव्यवस्था तथा अराजकता की समाप्ति राजतन्त्र में ही सम्भव है।
  3. जिस तरह ईश्वर एक है और उसका पूरे ब्रह्माण्ड पर शासन है, उसी प्रकार समाज में एक राजा ही ठीक है। जिस प्रकार
    शरीर के विभिन्न अवयवों पर दिल, मधुमक्खियों के छत्ते पर रानी मधुमक्खी का शासन अच्छा रहता है, वैसे ही समाज
    में एक ही व्यक्ति का शासन सर्वोत्तम होता है।
  4. ऐतिहासिक अनुभव भी यह बताता है कि राजतन्त्रात्मक सरकारें ही अन्य सरकारों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ रही हैं। राजतन्त्र
    में ही शान्ति व समृद्धि का वातावरण रहा है। लोकतन्त्रात्मक सरकारारें फूट व अराजकता से भरपूर रही हैं।

इस प्रकार एक्विनास ने राजतन्त्र को सर्वोत्तम सरकार माना है।

निरंकुश सरकार

एक्विनास का मानना है कि राजतन्त्र पथभ्रष्ट होकर अत्याचारी शासन में बदल सकता है। यही राजतन्त्र का सबसे गम्भीर
दोष हैं यह सरकार की सबसे बुरी किस्म है। इसमें शासक प्रजा के हित में शासन न करके अपने हितार्थ शासन करता है।
उसने बताया है कि राजतन्त्र को निरंकुश बनने से रोकने के लिए राजतन्त्र को लचीला बनाना आवश्यक होता है। उसका मानना
है कि तानाशाही के अन्तिम काल अर्थात् स्वयं लोगों के अन्याय को दूर किया जाना चाहिए ताकि राजतन्त्र को तानाशाही में
परिवर्तित होने से रोका जा सके। लेकिन उसने यह नहीं बताया कि राजतन्त्र में लचीलापन कैसे लाया जाए। एक्विनास
अत्याचारी शासक के वध का विरोध करते हैं। उनका मानना है कि यह भी सम्भव है कि निरंकुशतन्त्र जनतन्त्र में बदलने पर
और अधिक अत्याचारी शासन कायम हो सकता है। एक्विनास स्वयं राजतन्त्र को निरंकुश नहीं बनाते क्योंकि वे स्पष्ट करते
हैं कि राजा को सदैव अपने उत्तरदायित्व निभाने चाहिएं। राजा का प्रमुख उत्तरदायित्व ईश्वर के प्रति होता है। पोप ईश्वर
का प्रतिनिधि होने के कारण उसको अपने अधीन रख सकता है। जनता को भी शान्तिपूर्वक तरीके से उसे हटाने की शक्ति
प्राप्त है। उसको हटाना तो उचित है लेकिन उसके पद का हनन करना अनुचित है। वह तानाशाही की हत्या के सिद्धान्त की
निन्दा करते हैं। इस प्रकार एक्विनास राजतन्त्र को सर्वोत्तम सरकार मानते हुए उसको बनाए रखने के पक्षधर हैं। उसके अनुसार
राजा को अत्याचारी बनने से रोकने के लिए राजा को संविधान-पालन की शपथ दिलाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि शपथ
का उल्लंघन करने पर राजा को न्यायोचित आधार पर गद्दी से उतारा जा सके।

सरकार के कार्य

एक्विनास के मतानुसार शासन का अधिकार एक न्यास (Ttrust) का पद है जो समूचे समाज के लिए अस्तित्व में लाया जाता
है। उसके लिए कुछ उत्तरदायित्व या कर्त्तव्य निश्चित किए गए हैं, जिनके पूरा होने पर ही शासक का पद कायम रह सकता
है। एक्विनास के अनुसार राज्य या सरकार के निम्न कार्य हैं :-

  1. सरकार को राज्य में एकता को बढ़ावा देना चाएि ताकि शान्ति कायम हो सके। फूट और दलबन्दी को समाप्त करना
    चाहिए।
  2. सरकार का यह भी कर्त्तव्य है कि वह अपनी प्रजा पर नाजायज कर न लगाए और न ही उसकी सम्पत्ति का हरण करे।
  3. सरकार को मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की वस्तुओं की पूर्ति बनाए रखनी चाहिए।
  4. बाहरी आक्रमणों से बाहरी शत्रुओं से अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करनी चाहिए।
  5. शासक का यह कर्त्तव्य है कि वह गरीबों के भरण-पोषण की व्यवस्था करे।
  6. सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह राज्य के लिए विशेष मुद्रा और नाप-तौल की प्रणाली लागू करे।
  7. चोर-डाकुओं के भय से सड़कों को मुक्त रखे।
  8. योग्य व्यक्तियों को पुरस्कृत तथा अपराधियों को दण्ड देने की व्यवस्था करे।
  9. अपने अधिकार क्षेत्र में शान्ति औरा व्यवस्था बनाए रखे। राज्य में अराजकता, अव्यवस्था तथा उपद्रवों से निपटने में सक्षम
    सरकार का होना जरूरी है।
  10. सरकार को अपने नागरिकों में धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। उसे प्रजा को सदाचारी बनाने पर जोर
    देना चाहिए।
  11. सरकार को व्यक्तिगत हितों की बजाय लोकहित को बढ़ावा देना चाहिए।

इस प्रकार एक्विनास ने सरकार के जो कर्त्तव्य या कार्य निर्धारित किए हैं, वे आधुनिक सरकारों के कार्यों से मिलते-जुलते
हैं। लेकिन एक्विनास का शासक आधुनिक राज्य की तरह सम्प्रभु नहीं है। उसके कार्य तो सकारात्मक हैं लेकिन उनको पूरा
करने के लिए उसके पास सर्वोच्च सत्ता नहीं है। उस पर पोप या चर्च का पूर्ण नियन्त्रण है। शासक को नियन्त्रण या मर्यादा
में रहकर ही अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है।

चर्च और राज्य का सम्बन्ध

सेण्ट थॉमस एक्विनास ने लौकिक सत्ता (राज्य) तथा पारलौकिक सत्ता (चर्च) में सम्बन्ध स्थापित करके राजसत्ता तथा धर्मसत्ता
के मध्य चल रहे लम्बे संघर्ष का समाधान करने का प्रयास किया। एक्विनास ने बताया कि मनुष्य सांसारिक सुख व आत्मिक
सुख की प्राप्ति चाहता है। सांसारिक सुख की प्राप्ति राज्य द्वारा तथा आत्मिक सुख की प्राप्ति चर्च द्वारा ही कराई जा सकती
है। थॉमस एक्विनास का मत है कि सद्गुणी व्यक्ति भी चर्च की सहायता के बिना अपने परम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त नहीं कर
सकता। यह परम सत्य (मोक्ष) श्रद्धा और विश्वास पर ही आधारित होता है। अत: यह चर्च का मामला होता है। राजा का कर्त्तव्य
बनताहै कि वह इस प्रकार शासन करे कि ईश्वर की इच्छा पूरी और धर्म की वृद्धि हो। एक्विनास के अनुसार व्यक्ति के जीवन
का उद्देश्य तो मोक्ष प्राप्त करना है। इसे प्राप्त कराने के लिए दोनों (चर्च व राज्य) को संगठित प्रयास करना चाहिए। राज्य
का कर्त्तव्य है कि वह नागरिकों को सद्गुणी बनाने के प्रयास करे और चर्च का कर्त्तव्य है कि वह मनुष्यों को मोक्ष प्राप्ति कराने
के लिए उनकी आत्मशुद्धि में वृद्धि करे। एक्विनास का कहना है कि राज्य चर्च के अधीन रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन
करे ताकि परम लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके। एक्विनास ने राज्य की तुलना समुद्री जहाज के बढ़ई से तथा चर्च
की तुलना जहाज के चालक से करके अपना मत प्रस्तुत किया है कि चालक ही जहाज का दिशा निर्देशन और दिनगमन करता
है। इसका अर्थ यह है कि सांसारिक शासक चर्च के सहयोग और उसके मार्गदर्शन के अन्तर्गत ही समुचित रूप से अपने कर्त्तव्यों
का निर्वहन कर सकता है। मोक्ष तर्क के द्वारा नहीं धर्म में विश्वास के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है और धर्म के सारे मामलों
में चर्च ही सर्वोच्च सत्ता है। चर्च राज्य का नियन्त्रक व मार्गदर्शक है, इसलिए पोप की सत्ता सांसारिक सत्ता (राज्य) से श्रेष्ठ
है। आत्मा पर नियन्त्रण रखना भौतिक वस्तुओं पर नियन्त्रण रखने से श्रेष्ठ है। इसलिए सभी व्यक्तियों को चर्च की सर्वोच्च
सत्ता को स्वीकार करना चाहिए। एक्विनास ने कहा कि शासक ईश्वर की छाया हो सकता है, लेकिन यदि वह चर्च की अवहेलना
करे, तो उसे धर्म बहिष्कृत किया जा सकता है। पोप के पास सांसारिक शासकों के कर्त्तव्यों का नियमन करने, उन्हें दण्ड देने
और प्रजा को उनके प्रति निष्ठा से मुक्त करने की शक्ति है। एक्विनास ने कहा है- “जिस प्रकार शरीर मस्तिष्क के अधीन
है वैसे ही सांसारिक सत्ता आध्यात्मिक सत्ता के अधीन है।” इसलिए यदि चर्च शासक के कार्यों में हस्तक्षेप करता है तो वह
अनुचित नहीं है। इसके बावजूद भी चर्च और राज्य एक-दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं जिसमें चर्च राज्य
से श्रेष्ठ है। थॉमस एक्विनास ने यह भी स्पष्ट किया है कि पोप की राज्य क्षेत्रीय प्रभुसत्ता न्यायोचित है। चर्च का प्रधान होने
के नाते उसकी अपनी भूमि हो सकती है, लेकिन वह उसका स्वामी नहीं हो सकात। उसने राज्य के दैवी उत्पत्ति के सिद्धान्त
को स्वीकार करते हुए, राज्य को सांसारिक मामलों में कुछ छूट प्रदान करके मध्यमार्गी होने का परिचय दिया है। एक
समन्वयवादी विचारक होने के नाते उसने पोप को राजा के ऊपर कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं सौंपा है। उसने सांसारिक मामलों
में राजा को ही सम्प्रभु माना है। कार्लाइल ने इस बारे में कहा है- “सेण्ट एक्विनास का यह सामान्य और परिपक्व निर्णय
था कि सांसारिक मामलों में पोप का प्रत्यक्ष अधिकार न होकर अप्रत्यक्ष अधिकार ही है।” वास्तव में सत्य तो यह है कि उसने
नम्र पोपवादी होने के नाते धर्मसत्ता व राजसत्ता के मध्य लम्बे समय से चल रहे संघर्ष को कुछ शान्त करने का प्रयास किया
है।

दासता सम्बन्धी विचार

सेण्ट थॉमस एक्विनास ने भी अपने पूर्ववर्ती विचारकों की तरह दासता को दैवी दण्ड मानकर उसका समर्थन किया है। वह
अरस्तू की तरह दास-प्रथा को लाभदायक तो मानता है लेकिन उसके विचार अरस्तू और आगस्टाइन से पूरी तरह मेल नहीं
खाते हैं। उसका मानना है कि दासता एक प्राकृतिक प्रथा है जो सैनिकों में साहस का संचार करती है। जब सैनिक युद्धक्षेत्र
में लड़ते हैं तो उन्हें दासता का भय सताता है। इस भय के कारण वे वीरता और साहस से लड़कर युद्ध में विजयी बनने के
प्रयास करते हैं। दासता का भय ही सैनिक विजयों का कारण होता है। एक्विनास ने अपने इस मत की पुष्टि के लिए इतिहास
और ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ (Olf Testament) की डिद्रानमी नामक पुस्तक से कुछ प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं।

सम्पत्ति पर विचार

एक्विनास ने भी अरस्तू की तरह ही व्यक्तिगत सम्पत्ति का समर्थन करते हुए उसे मानव जीवन के लिए आवश्यक माना है।
उसका कहना है किस सम्पत्ति का प्रयोग स्वार्थसिद्धि के लिए न करके जनहित में किया जाना चाहिए। सम्पत्ति का साव्रज्निक
उपयोग सार्वजनिक कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। उसके सम्पत्ति सम्बन्धी विचार धार्मिक परिस्थितियों के प्रभाव से
अछूते नहीं हैं। उसने मध्ययुगीन ईसाई पादरियों के विचारों से सहमत होते हुए कहा है कि सम्पत्ति पर चर्च और पोप का भी
अधिकार उपयुक्त है लेकिन वह किसी सांसारिक शासक के सामन्त के रूप में भूमि का स्वामी नहीं बन सकता। पोप अपनी
सम्पत्ति का प्रयोग निर्धनों की सहायता के लिए धार्मिक नियमों के अनुसार ही कर सकता है। उसका मानना है कि सम्पत्ति
की अधिकता ही सभी पापों का मूल कारण है। सम्पत्ति पर धर्म का लेबल लगाने पर ही सम्पत्ति के सारे दोष मिट जाते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक्विनास ने अरस्तू तथा आगस्टाइन के विचारों से अलग ही अपने सम्पत्ति सम्बन्धी विचार
प्रतिपादित किए हैं।

कानून का वर्गीकरण

राजनीतिक चिन्तन के लिए एक्विनास का कानून सम्बन्धी विवेचन उसकी सबसे महान् एवं मूल्यवान देन है। एक्विनास ने कानून
के वर्गीकरण का सबसे अधिक मौलिक विचार प्रस्तुत करके आधुनिक युग को ऋणी बना दिया है। कानून के बारे में किसी
भी पूर्ववर्ती विचारक ने इतना तर्कसंगत तथा व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत नहीं किया जितना एक्विनास ने। एक्विनास ने अरसतू,
सिसरो, चर्च के पादरियों, सेण्ट आगस्टाइन जैसे विचारकों के कानून पर विचारों को एकत्रित करके उन्हें एक नई दिशा दी।
उसने एक तर्क-क्रम के द्वारा कानूनों का वर्गीकरण करके कानूनों को चार भागों – शाश्वत, प्राकृतिक, मानवीय तथा दैवीय
में बाँटा है। एक्विनास के कानून सम्बन्धी विचारों को जानने के लिए कानून की आधुनिक व पूर्ववर्ती अवधारणाओं को समझना
आवश्यक है।

कानून की परिभाषा

आधुनिक विचारकों के अनुसार कानून सम्प्रभु का आदेश है। कानून एक ऐसा सकारात्मक विचार है जो उन कार्यों को बाध्
यकारी बना देता है, जो पहले बाध्यकारी नहीं थे। पूर्ववर्ती यूनानी विचारकों के अनुसार कानून विवेक या बुद्धि का परिणाम
है। एक्विनास ने कानून की यूनानी व रोमन विचारधाओं को समन्वित करके अपना कानून का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है।
एक्विनास ने कानून की मध्ययुगीन विचारधारा को और अधिक व्यापक बना दिया है। एक्विनास के अनुसार कानून पूरे विश्व
पर लागू होता है। यह एक ऐसी वस्तु होती है जो मानवीय सम्बन्धों का नियमन करने के साधन की अपेक्षा अपने कार्यक्षेत्र
में व्यापक है। एक्विनास ने अपनी धारणा को विश्वव्यापी रूप देने का प्रयास किया है। उसने मानवीय कानून को दैवीय कानून
से जोड़कर मानवीय विवेक को दैवी विवेक का अंग माना है। उसने मानवीय कानून और दैवीय कानून के बीच अनश्वर एकता
को स्वीकार किया है। उसने कानून को परिभाषित करते हुए कहा है- “कानून लोक-कल्याण के लिए विवेक का अध्यादेश
है जो उस व्यक्ति द्वारा बनाया, घोषित और लागू किया जाता है जिसे समाज की चिन्ता है।” अर्थात् कानून बनाने और उसे
लागू करने का अधिकार ऐसे व्यक्ति के हाथ में रहता है जिन्हें लोक कल्याण की चिन्ता है। एक्विनास के मतानुसार- “कानून
एक विशेष नियम अथवा कार्यों का मापदण्ड है जिसके आधार पर किसी को कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है अथवा
कार्य करने से रोक दिया जाता है।” इसका अर्थ यह है कि ऐसा कानून जो विवेकपूर्ण और सामान्य हित के उद्देश्य से प्रेरित
नहीं है तो वह सच्चा कानून नहीं है।

कानून के प्रकार

एक्विनास ने कानून को चार भागों में बाँटा है :-

  1. शाश्वत कानून (Eternal Law)
  2. प्राकृतिक कानून (Natural Law)
  3. दैवी कानूनी (Divine Law)
  4. मानवीय कानून (Human Law)

एक्विनास ने वर्गीकरण की इस श्रृंखला में शाश्वत कानून को शीर्ष स्थान पर रखा है। प्राकृतिक कानून तथा दैवीय कानून का
मानव के भौतिक जीवन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। मानवीय कानून ही मनुष्य के प्रत्यक्ष जीवन से जुड़ा हुआ है। इन चारों का
संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :-

शाश्वत कानून 

यह कानून ईश्वरीय विवेक पर आधारित होते हैं जिनके द्वारा ईश्वर एक पूर्व निश्चित
योजना के आधार पर विश्व पर शासन करता है। शाश्वत कानून ईश्वरीय विवेक से निकली हुई ईश्वरीय इच्छाएँ हैं।
इसी कानून के द्वारा सृष्टि का संचालन होता है तथा आकाश और पृथ्वी तथा चेतन और अचेतन सभी पदार्थ शाश्वत
कानून से नियन्त्रित व निर्देशित होते हैं। यह कानून बुद्धिगम्य तथा बुद्धिअगम्य दोनों प्रकार के जगत् में अलग-अलग तरीके
से कार्य करता है। शाश्वत कानून का स्वभाव विश्वव्यापी है। इस धरती पर विद्यमान सभी कानूनों का स्रोत शाश्वत कानून
ही है। विवेकशील प्राणी शाश्वत कानून के अनुसार ही आचरण करते हैं। एक्विनास के अनुसार शाश्वत कानून का निर्माण
उसी समय हुआ जिस समय ईश्वर के मनका निर्माण हुआ। ईश्वर की समस्त सृष्टि शाश्वत कानून के अधीन है। उस
सृष्टि के सभी भाग उसके प्रभाव को ग्रहण करने में समर्थ होने के कारण उसके हिस्सेदार हैं। यह कानून प्राप्ति कर सकने
योग्य कार्यों तथा उद्देश्यों को करने के लिए प्रेरणा प्रदान करता है। एक विवेकी व्यक्ति अविवेकी व्यक्ति की तुलना में
शाश्वत कानून को जल्दी समझ लेता है। सीमित बुद्धि के कारण शाश्वत कानूनका आभास करना कठिन होता है। इसका
आभास प्राकृतिक कानून के रूप में ईश्वर करा देता है। यह कानून ईश्वर में अनन्तकाल से दैवी विवेक के रूप में विद्यमान
रहा हैं यह एक सुनिश्चित कानून नहीं है क्योंकि उसका निर्माण विशिष्ट समय पर नहीं हुआ है। यह स्वयं निर्मित तथा
स्वयं प्रवर्तित है। यह ईश्वर का अमर कानून है। ईश्वरीय या दैवीय न्याय शाश्वत कानून पर ही टिका हुआ है। इसी
कानून के अनुसार ईश्वर सम्पूर्ण सृष्टि पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है।

प्राकृतिक कानून 

यह कानून मानवीय जीवनों में ईश्वरीय विवेक का प्रतिबिम्ब है। एक्विनास के
मतानुसार- “विवेकशील प्राणी का शाश्वत कानून के अनुसार आचरण करना ही प्राकृतिक कानून है।” इन कानूनों की
सहायता से व्यक्ति अच्छे-बुरे का भेद जान सकता है। “यह विवेकपूर्ण जीवधारियों की शाश्वत कानून में सहभागिता है।”
ये कानून शाश्वत कानूनों की तुलना में अधिक स्पष्ट व बोधगम्य होते हैं। ये मौलिक रूप से सबके लिए समान होते हैं,
परन्तु कुछ विशेष काल और स्थान के लिए अलग-अलग भी हो सकते हैं। ये संसार की सभी जड़ व चेतन वस्तुओं में
समान रूप से व्याप्त होते हैं। चेतन पदार्थों में इनकी अभिव्यक्ति स्पष्ट होती है, जबकि अचेतन पदार्थों में अस्पष्ट होती
है। चूँकि मनुष्य की तर्क-बुद्धि अपूर्ण होती है। इसलिए मनुष्य का मार्ग निर्देशन करने व विनियमन करने के लिए यह
कानून पर्याप्त नहीं है। इस कानून की भी शाश्वत कानून की तरह प्रमुख विशेषता यह है कि यह कानून सकारात्मक कानून
नहीं है तथा इसके नियम भी सर्वांगीण नहीं हैं। प्राकृतिक कानून सभी विवेकपूर्ण प्राणियों में समाज कल्याण की भावना
ही भरता है। इसकी अन्त:वस्तु का विस्तार उन वस्तुओं से किया जा सकता है जो केवल मानव-कल्याण में योगदान देती
है। यह मनुष्य की अनेक स्वाभाविक इच्छाओं – आत्मरक्षा, यौन-सन्तुष्टि, सन्तानोत्पादन, परोपकार आदि की सन्तुष्टि
करता है। यह मनुष्य में सामाजिकता का गुण पैदा करता है।यह मानव प्राणियों में सत्य की खोज करने और तर्कबुद्धि
से विकसित करने की इच्छा पैदा करता है। इस प्रकार एक्विनास का प्राकृतिक कानून व्यापक आयाम धारण कर लेता
है।

दैवीय कानून 

एक्विनास का मानना है कि मनुष्य का मार्ग-दर्शन करने के लिए अधिक व्यापक कानून
का होना जरूरी है। ऐसा कानून दैवीय कानून ही हो सकता है। यह एक ऐसा सकारात्मक कानून है जो प्राकृतिक कानून
की कमी को पूरा करता है। संतों अथवा बाइबल के माध्यम से प्रकट की गई ईश्वर की वाणी ही दैवीय कानून है। दैवी
कानून मानव तर्क-बुद्धि की खोज की बजाय ईश्वर के अनुग्रह का उपहार है। यह मनुष्य को परम-सुख (मोक्ष) की प्राप्ति
कराता है। प्राकृतिक कानूनतो सभी के लिए समान होता है लेकिन दैवीय-कानून का ज्ञान ईश्वर के कृपापात्रों को ही
प्राप्त होता है। एक्विनास के मतानुसार- “दैवी कानून ईश्वर की इच्छा के आदेशों की प्रणाली है जिसे प्रकाशन
(Revelation) द्वारा मनुष्यों तक पहुँचाया जाता है।” यह सहज विवेक की खोज होने के अतिरिक्त ईश्वरीय कृपा की देन
है। एक्विनास के अनुसार विवेक और प्रकाशना में कोई अन्तर नहीं है। प्रकाशना विवेक की वृद्धि ही करती है, विनाश
नहीं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कानून रूपी इमारत का आधार विवेक है तथा शिखर प्रकाशना है। दैवीय कानून
ईश्वरीय इच्छा के आदेशों का संसार के सामने प्रकटकरण है जिसका पालन चर्च द्वारा किया जाता है। इनके पालन का
आधार मानव की आस्था है, विवेक नहीं। ये बाध्यकारी शक्ति से युक्त नहीं है। ईश्वरीय रचना होने के कारण ये मानवीय
कानून से श्रेष्ठ है।

मानवीय कानून 

इसकी उत्पत्ति प्राकृतिक कानून से होती है। यह कानून उसी समय तक वैध है, जब
तक यह प्राकृतिक कानून के अनुसार रहे। एक्विनास के मतानुसार- “मानवीय कानून मनुष्यों के आचरण का नियमन करने
के लिए नियमों की वह प्रणाली है जिसको प्राकृतिक कानून के सिद्धान्तों से मानव-विवेक द्वारा क्रियान्वित किया जाता
है।” उसके अनुसार मानवीय कानून प्राकृतिक कानून का बुद्धिसंगत परिणाम है। यह प्राकृतिक कानून का उप-सिद्धान्त
है। “मानवीय कानून प्राकृतिक कानून ही है जिसके द्वारा मानवीय विवेक की युक्तिपरक व्यवस्था द्वारा इसे सांसारिक
मामलों में सक्रिय बनाया जाता है।” यह मानवीय इच्छा पर आधारित होता है। ये मनुष्य द्वारा समाज में शान्तिपूर्ण जीवन
बनाए रखने के लिए बनाई गई दण्ड व्यवस्थाएँ हैं जिनके भय से समाज में शान्ति बनी रहती है। ये प्राकृतिक कानून के
पूरक होते हैं। प्राकृतिक कानूनों की अस्पष्टता तथा अपरिभाषिता के कारण इसकी आवश्यकता पड़ती है। दण्डात्मक
शक्ति के कारण ये कानून प्राकृतिक कानूनों से अधिक प्रभावी रहते हैं। एक्विनास ने मानवीय कानून को दो भागों – राष्ट्रों
का कानून (Jus Gentium) और नागरिक कानून (Jus Civile) में बँटा है। एक्विनास ने नागरिक कानून को परिभाषित करते
हुए कहा है- “यह सबके हित के लिए मानव-तर्कबुद्धि का अध्यादेश है, जिसे ऐसे व्यक्ति ने जारी किया है जो समुदाय
की देखभाल करता है।” मानवीय कानून के कुछ प्रमुख कारण हैं जिनके आधार पर इसे अच्छी तरह से समझा जा सकता
है :-

  1. ये विवेक पर आधारित उद्घोषणाएँ हैं।
  2. ये सार्वजनिक कल्याण से सरोकार रखते हैं।
  3. ये सकारात्मक होते हैं।
  4. इनके पीछे सार्वजनिक मान्यता तथा सार्वजनिक सहमति होती है।
  5. इनमें दण्डात्मक शक्ति होती है।
  6. ये प्राकृतिक कानून के अनुकूल होते हैं।
  7. इनका सम्बन्ध लौकि संसार से होता है, पारलौकिक से नहीं।

एक्विनास का कहना है कि नागरिक कानून ही मानवीय कानून होता है। इसके ऊपर कुछ सीमाएँ भी हैं :-

  1. यह कानून प्राकृतिक कानून के अनुरूप होना चाहिए। नागरिक इसका पालन उसी समय तक करेंगे जब तक यह प्राकृतिक
    कानून के अनुसार रहेगा।
  2. इसे मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन से दूर रहना चाहिए। यह मनुष्य के समूचे जीवन से सम्बन्धित नहीं होता। इसलिए यह
    मनुष्य की पूर्ण निष्ठा का दावा नहीं कर सकता।

एक्विनास मध्ययुग के अरस्तु के रूप में

सेण्ट थॉमस एक्विनास ने अपना सम्पूर्ण राजनीतिक चिन्तन अपनी ईसाइयत विचारधारा को अरस्तूवाद के साथ मिलाकर ही
खड़ा किया है। इसलिए उसे ईसाई अरस्तू (Christianised Aristotle) भी कहा जाता है। अल्बर्ट महान् के चरणों में बैठकर
एक्विनास ने अरस्तू की जो शिक्षाएँ ग्रहण कीं, उनका स्पष्ट प्रभाव उसके चिन्तन पर पड़ा दिखाई देता है। अरस्तू की मृत्यु के
पश्चात् अरस्तूवाद की लम्बे समय तक एक्विनास से पहले किसी ने चर्चा नहीं की। एक्विनास ही एक ऐसे प्रथम ईसाई विचारक
थे जिन्होंने अरस्तू के दर्शन को पुनर्जीवित किया। उन्होंने अरस्तु के दर्शन को ग्रहण तो किया लेकिन एक नए रूप में। उसने
अरस्तू के दर्शन तथा ईसाई धर्म सिद्धान्त में समन्वय स्थापित किया। उसने अरस्तू के विचारों को उसी सीमा तक ग्रहण किया
जिस सीमा तक वे ईसाइयत धर्म-सिद्धान्तों के पक्ष में रहे। एक्विनास ने अरस्तू की गलत धारणाओं का सर्वथा त्याग किया।
उसने अरस्तू की विवेकवादी विचारधारा के साथ ईसाइयत विश्वास या धर्म को मिलाकर एक मध्यमार्ग निकाल लिया ताकि
धर्मसत्ता व राजसत्ता के मध्य चले आ रहे लम्बे संघर्ष को समाप्त किया जा सके। इसलिए उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण को
देखकर मैक्सी ने कहा है- “एक्निवास मध्ययुग का स्वर्गीय अरस्तू है।” फोस्टर ने भी कहा है कि- “ऐसा प्रतीत होता है कि
एक्विनास ने अपने राजनीतिक दर्शन को यूनानी आधार पर ईसाई मुंडेर पर खड़ा किया है।” इससे स्पष्ट हो जाता है कि
एक्विनास पर अरस्तू की विचारधारा का काफी प्रभाव पड़ा जिस कारण से वे मध्ययुग के अरस्तू कहलाए। इसके पक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं :-

  1. अरस्तू के धर्मनिरपेक्ष विचार दर्शन ने एक्विनास को काफी प्रभावित किया है। इस आधार पर एक्विनास ने मध्यकालीन
    धर्मान्धता के गर्त से राजनीतिक चिन्तन को बाहर निकालने के लिए एक सेतु का निर्माण किया है। उसने अपने चिन्तन
    में वैज्ञानिकता को प्रवेश कराकर राजनीतिक चिन्तनकी महान् सेवा की है। उसके प्रयासों से अराजनीतिक चिन्तन पुन:
    उसी स्थिति में आ गया जो अरस्तू के समय में था।
  2. एक्विनास ने अरस्तू की ही तरह मनुष्य को स्वभावत: तथा अनिवार्यत: एक सामाजिक प्राणी माना है। समाज के बिना
    व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। इस सिद्धान्त के आधार पर एक्विनास ने राज्य को प्राकृतिक संस्था सिद्ध किया। उसने
    स्पष्ट किया कि राज्य मनुष्य प्रकृति पर ही आधारित है। उसने ईसाइयत विचारधारा को नया रूप दिया। उसने का कि
    राज्य की उत्पत्ति आदिम पाप का फल नहीं है। राज्य को व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है। साथ में राज्य ईश्वर द्वारा
    स्थापित संस्था भी है जिसका क्रमिक विकास हुआ है। अरस्तू के सिद्धान्तों के आधार पर ही एक्विनास ने कहा है कि
    राज्य मानव समाज का अनिवार्य संघटक है, फिर भी राजनीतिक सत्ता अन्य सभी की तरह ईश्वर से व्युत्पन्न है। चर्च
    राज्य का विरोधी न होकर पूरक ही है।
  3. एक्विनास ने भी अरस्तू की ही तरह श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति के लिए राज्य को अनिवार्य माना है। एक्विनास का कहना
    है कि राज्य व्यक्ति की पूर्ण प्राकृतिक आत्म-अभिव्यक्ति की प्राप्ति का साधन है। राज्य के आदेशों का पालन करके ही
    व्यक्ति श्रेष्ठ लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। दोनों दार्शनिक सरकार को नैतिक उद्देश्य को प्रमुखता देते हैं। अरस्तू और
    एक्विनास के अनुसार राज्य एक अच्छाई है, बुराई नहीं। एक्विनास ने राज्य के अतिरिक्त चर्च को भी सर्वोपरि संगठन
    स्वीकार किया है। दोनों विचारक राज्य का उद्देश्य व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति को स्वीकार करते हैं।
  4. एक्विनास ने अरस्तू से विवेक या तर्क का सिद्धान्त भी ग्रहण किया है। उसका मानना है कि मानवीय विवेक पर आधारित
    ज्ञान ईसाई धर्मशास्त्रें के विपरीत नहीं है। उसने लौकिक सत्ता का आधार विवेक को ही माना है।
  5. एक्विनास न राज्यों व सरकारों का वर्गीकरण भी अरस्तू की तरह ही किया है। उसने अरस्तू की तरह ही राजतन्त्र,
    कुलीनतन्त्र और सर्व लोकतन्त्र तथा उनके तीन ही विकृत रूपों का वर्णन किया है। उसने राजतन्त्र को उत्तम तथा
    लोकतन्त्र को निकृष्ट रूप बताया है।
  6. एक्विनास ने अरस्तू की ही तरह यह भी स्वीकार किया है कि कुछ ऐसे भी सत्य हैं जो विवेक से परे हैं। उनका ज्ञान
    श्रद्धा और विश्वास से ही प्राप्त हो सकता है।
  7. उसने अरस्तू की तरह यह भी स्वीकार किया है कि मानव समाज की रचना सभी के हित के लिए हुई है।
  8. उसने अरस्तू के कानून सम्बन्धी विचारों को भी ग्रहण किया है। वह कानून को विवेक का परिणाम मानता है। परन्तु
    एक्विनास ने कानून के विचार को व्यापक आधार प्रदान किया है।
  9. एक्विनास ने अरस्तू की सोद्देश्यता की धारणा (Concept of Teleology) को भी स्वीकार किया है। दोनों का मानना है
    कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तु एक निश्चित उद्देश्य, लक्ष्य, साक्ष्य या प्रयोजन की तरफ जा रही है। 
  10. एक्विनास ने अपनी न्याय सम्बन्धी विचारधारा को भी अरस्तू के विचारों पर ही आधारित किया है। एक्विनास का मत
    है कि न्याय का स्रोत राज्य के कानून हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक्विनास ने अपने राजनीतिक चिन्तन को अरस्तूवाद की नींव पर ही खड़ा किया है। लेकिन
एक्विनास का प्रयास यह रहा है कि अरस्तू के विचारों को ईसाइयत के आधार पर ढाला जाए। उसने मानव समाज की तुलना
में दैवी समाज को महत्त्व दिया है। उसने अरस्तू के विवेक के साथ विश्वास का भी समन्वय कर दिया है। अरस्तू ने तो केवल
मानव जीवन का लक्ष्य लौकिक सुख माना है जबकि एक्विनास ने इसके साथ-साथ पारलौकिक सुख को भी महत्त्व दिया है।
उसने मानवीय कानून को प्राकृतिक कानून के अधीन कर दिया है। इस प्रकार एक्विनास ने अरस्तू के विचारों को साधन के
रूप में ग्रहण करके उनको साध्यों के अनुकूल बनाया है। सत्य तो यह है कि एक्विनास ने अरस्तू के विचारों को ही अपने चिन्तन
का आधार बनाया है। एक महान विद्वतावादी दार्शनिक के रूप में एक्विनास ने अरस्तूवाद और ईसाईवाद का मिश्रण करके
मध्ययुग में लम्बे समय से चले आ रहे धर्मसत्ता और राजसत्ता के संघर्ष को शान्त करने का प्रयास किया है। उनको मध्ययुग
का अरस्तू कहना सर्वथा सही है।

3 Comments

Unknown

Mar 3, 2019, 8:35 am Reply

Nice….

Unknown

Mar 3, 2019, 6:20 am Reply

Very very nice information

Unknown

May 5, 2019, 1:25 pm Reply

Thank you for giving such a wonderful information

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