कानून के शासन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं विचार

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आधुनिक समय में लोकतन्त्रीय आस्थाओं, नागरिकों के अधिकारों व स्वतन्त्रओं की रक्षा करने के लिए कानून के शासन से बढ़कर
कोई अन्य विकल्प नहीं है। कानून का शासन इस मान्यता पर आधारित है कि कानून के सामने सब समान हैं। यह मान्यता राजनीतिक
शक्ति को निरंकुश बनने से रोकती है और समाज में सुव्यवस्था भी बनाए रखने में मदद करती है। कानून का शासन सुशासन का
आधार है। यह शासन सरकार की स्वेच्छाचारिता को रोककर जनकल्याण में वृद्धि करता है। यह शासन परम्पराओं पर भी आधारित हो सकता है और संविधानिक उपबन्धों पर भी। इंग्लैण्ड में बिना मौलिक अधिकारों और न्यायिक पुनर्निरीक्षण (Judicial Review)
के भी नागरिकों के अधिकार और स्वतन्त्रताएं कानून के शासन के कारण ही सुरक्षित हैं। कानून का शासन सभ्य राजनीतिक समाज
की पहचान है। आज भारत, ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य सभी सभ्य देशों में कानून के शासन का विशेष सम्मान किया जाता है। यद्यपि
एक सिद्धान्त के रूप में यह इंग्लैण्ड की देन है, क्योंकि वहां इस विचार का प्रतिपादन सर्वप्रथम डायसी ने किया था। कानून के शासन
का सिद्धान्त आज भी सभ्य देशों में प्रतिष्ठाजनक स्थान को प्राप्त है। इसका प्रमुख कारण इसका न्यायसंगत होना है। कानून का शासन
समानता के उस सिद्धान्त पर आधारित है जो सामाजिक न्याय की मांग है। इसी कारण आज भी शासन एक महत्वपूर्ण विचार है।

कानून के शासन का अर्थ

कानून का शासन कानून की अवधारणा पर आधारित है। कानून सम्प्रभु का आदेश होता है जो सभी को मान्य होता है, क्येांकि वह
सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित होता है। इसी कारण सभी लोग कानून की आज्ञा का पालन करते हैं। जिस राजनीतिक
समाज में कानून को उचित महत्व दिया जाता है। वहीं पर कानून के शासन की स्थापना हो जाती है। कानून के शासन का अर्थ
है – किसी देश में कानून ही सर्वोच्च है और कानून के ऊपर कोई नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि सरकार की समस्त शक्तियां
कानून द्वारा सीमित हैं और जनता पर कानून का शासन है न कि किसी स्वेच्छापूर्ण इच्छा का। कानून के साधन का अर्थ को स्पष्ट
करने के लिए कुछ विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया है :-

  1. वेड़ और फिलिप्स ने कानून के शासन को परिभाषित करते हुए कहा है-”सरकार की शक्तियों का प्रयोग कानून की मर्यादा
    के अनुसार होता है, न कि शासक की स्वेच्छाचारी इच्छा के कारण, कानून का शासन कहलाता है।” 
  2. लार्ड ह्यूवर्ट ऑफ बरी के अनुसार-”कानून के शासन का अर्थ है केवल निरंकुशता के स्थान पर कानून की श्रेष्ठता तथा
    सर्वोच्चता।”
    साधारण रूप में कानून के शासन का अर्थ होता है-संवैधानिक सरकार जो अपनी शक्ति का प्रयोग स्वेच्छाचारिता के स्थान पर कानून
    के अनुसार करती है। 

कानून के शासन की उत्पत्ति और विकास 

कानून के शासन के बीच अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्लेटो और अरस्तु के समय से ही मिलते हैं। लॉक ने भी सरकार को प्रतिनिधि रूप
में सीमित करने की वकालत की थी। लेकिन एक व्यवस्थित विचार के रूप में इस सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रयोग डॉयसी ने ही किया
है। डॉयसी इंग्लैण्ड का निवासी था। वही इसका प्रमाणित व्याचखकार है। 1689 में इंग्लैण्ड की संसद ने ‘बिल ऑफ राइट्स’ (Bill of Rights) पास किया। इसके परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड में संसदीय सर्वोच्चता तथा कानून के शासन की सर्वोच्चता का जन्म हुआ।
इस प्रकार एक व्यवस्थित सिद्धान्त के रूप में यह इंग्लैण्ड की ही देन है। धीरे-धीरे वहां पर इस सिद्धान्त को महत्व प्राप्त होने लगा।
बिना संविधान के भी इंग्लैण्ड में कानून के शासन को अन्य देशों की तुलना में आज भी एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, जिसे ब्रिटिश
सरकार की आधारशिला माना जाता है। वेड और फिलिप्स का कहना है कि कानून का शासन मध्य युग में ही ब्रिटिश संविधान का
प्रमुख नियम रहा है, जो प्रशासन में कार्यपालिका की स्वेच्छाचारिता रोकता है। इंग्लैण्ड में कानून का राज्य है और कानून का पूरा
सम्मान किया जाता है। भारत और अमेरिका में भी इस सिद्धान्त को अपनाया गया है। भारत व अमेरिका में कानूनों का बहुत सम्मान
है। किसी भी व्यक्ति और सरकार को कानून की मर्यादा भंग करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। भारतीय संविधान में दी गई नागरिकों
की स्वतंत्रताओं व अधिकारों की रक्षा कानून के शासन के द्वारा ही की जाती है। भारत में कोई ऐसा कानून नहीं बनाया गया है
जो नागरिकों की स्वतंत्रताओं को सीमित करने वाला हो और सुव्यवस्था को हानि पहुंचाने वाला हो। स्वतन्त्रता के बाद भारत में

कानून द्वारा स्थापित पद्धति के द्वारा ही शासन चलाया जा रहा है। इसी तरह अमेरिका में भी कानूनों का बड़ा सम्मान है। आज
भारत, अमेरिका तथा अन्य देशों में कानून के शासन को विशेष महत्व दिया जाता है। कानून की दृष्टि में शासक व शासित दोनों
समान माने जाते हैं। समान अपराध के लिए समान दण्ड का प्रावधान कानून के शासन की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।

कानून के शासन की विशेषताएं

  1. कानून का शासन कानून की सर्वोच्चता के सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें कानून को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि
    कानून को सर्वोच्चता प्राप्त होती है।
  2. कानून का शासन सामाजिक न्याय की स्थापना करता है।
  3. कानून का शासन राजनीतिक समानता की स्थापना भी करता है।
  4. कानून का शासन नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
  5. कानून का शासन सरकार की निरंकुशता को रोकता है तथा संविधानिक सरकार की स्थापना करता है।
  6. कानून का शासन राजनीतिक व्यवस्था में सुव्यवस्था बनाए रखता है।
  7. कानून का शासन प्रशासन में नौकरशाही की स्वेच्छाचारिता रोकता है।
  8. कानून का शासन राजनीतिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
  9. कानून का शासन संविधानिक आदर्शों व मूल्यों की रक्षा करता है और इनकी प्राप्ति में सरकार की सहायता करता है। 
  10. कानून का शासन न्याय प्रणाली को चुस्त-दूरुस्त बनाता है व न्यायपालिका की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कानून का शासन सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाकर नागरिकों के अधिकारों व स्वतन्त्रता
की रक्षा करता है। कानून के शासन से बढ़कर सामाजिक न्याय की स्थापना का कोई अन्य विकल्प नहीं हो सकता। अत: सरकार
को संविधानिक बनाने में कानून का शासन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कानून के शासन पर डॉयसी के विचार

डॉयसी कानून के शासन का प्रमाणित व्याख्याकार है। उससे पहले कानून के शासन की स्पष्ट व्याख्या नहीं की थी। उन्होंने कानून
के शासन की व्याख्या तीन प्रकार से की है –

कानून ही सर्वोच्च है

डायसी के अनुसार-”साधारण कानून ही सर्वोच्च है और उस पर किसी
स्वेच्छाचारी शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ता। इंग्लैण्ड में किसी भी व्यक्ति को निरंकुश और स्वेच्छाचारी शक्ति प्राप्त नहीं है। अंग्रेज
कानून और केवल कानून द्वारा ही संचालित होते हैं। किसी भी व्यक्ति को कानून तोड़ने का ही दण्ड मिलता है और किसी
कारण से नहीं। इसका अर्थ यह है कि इंग्लैण्ड में कानून ही सर्वोच्च है। कानून द्वारा सीमित सरकार की परम्परा का निर्वहन
करना ही इंग्लैण्ड के कानून का लक्ष्य है। बिना कानून के उल्लंघन के किसी को कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता। कानून
की अवज्ञा करने पर दण्ड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका को ही है, कार्यपालिका को नहीं। अपराध साबित हुए बिना
किसी व्यक्ति को न तो सम्पत्ति से बेदखल किया जा सकता है और न हेी उसे दण्ड दिया जा सकता है। वहां पर मुकद्दमा
भी सार्वजनिक रूप से चलता है ताकि जनता सम्पूर्ण कार्यवाही को देख सके। अपराधी को अपने आप को निर्दोष साबित करने
का पूर्ण अधिकार होता है। मुकद्दमे की कार्यवाही के बाद दोष साबित होने पर सजा से बचने का कोई प्रावधान नहीं है। किसी
भी अन्य संस्था को अपराधी की सजा कम करने या माफ करने का अधिकार नहीं है। अपराधी को सजा कानून की परिधि
में अपराध की गम्भीरता को देखते हुए ही दी जाती है। इस प्रकार इंग्लैण्ड में कानून का शासन सरकार की बजाय कानून
की सर्वोच्चता स्थापित करता है ताकि सरकार की परम्परागत स्वविवेकी और तानाशाही शक्तियों का अन्त किया जा सके।
अत: कानून के शासन का प्रथम अर्थ है कि कानून ही सर्वोच्च है, उसके ऊपर कोई नहीं हो सकता।

कानून के सामने सब समान हैं 

कानून के शासन का दूसरा अर्थ है – कानून के
समक्ष समानता। डॉयसी का कहना है-”कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी पदवी या
स्थिति कितनी भी बड़ी या महान् हो इस देश के शासन के सामान्य कानून को मानने के लिए बाध्य है तथा देश के सामान्य
न्यायालय के अधिकार क्षेत्र की परिधि में आता है। जो कानून एक के लिए है वह सबके लिए है।” डॉयसी का कहना है कि
सरकारी कर्मचारी या अन्य शासकीय अधिकार और स्वयं राजा भी कानून के अधीन है। उस पर आम नागरिकों की तरह
मुकद्दमा चलाया जा सकता है। डॉयसी ने लिखा है-”हमारे प्रधानमन्त्री से लेकर साधारण सिपाही या कर संग्रहकर्ता तक सभी साधारण
नागरिकों की तरह ही अपने गैर-कानून कार्यों के लिए कानून के सामने समान रूप से उत्तरदायी है।” कानून सबको समान दृष्टि से देखता
है। इंग्लैण्ड में सभी नागरिकों पर मुकद्दमे साधारण न्यायालयों में ही चलाए जाते हैं अर्थात् इंग्लैण्ड में प्रशासकीय न्यायलय नहीं हैं। इंग्लैण्ड
में मुकद्दमा सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध फ्रांस की तरह प्रशासकीय न्यायालयों में नहीं चलाया जाता बल्कि साधारण न्यायालयों में चलाया
जाता है। एक प्रभावशाली व्यक्ति को भी समान अपराध के लिए वही सजा मिलती है जो साधारण व्यक्ति को उसी अपराध के लिए मिलती
है। अर्थात् इंग्लैण्ड में समान अपराध के लिए समान सजा का नियम सभी पर लागू होता है।

संविधान सामान्य कानून की देन है 

कानून के शासन का तीसरा अर्थ
है-”संविधान के सामान्य सिद्धान्त उन न्यायिक निर्णयों का प्रतिफल है जिनके द्वारा न्यायालयों के सामने लाए गए मुकद्दमों
में सामान्य नागरिकों के अधिकार व स्वतन्त्रताएं निश्चित की गई हैं।” इसका अर्थ यह है कि इंग्लैण्ड का संविधान अतिरिक्त
होने के कारण नागरिकों के अधिकारों व स्वतन्त्रताओं की व्याख्या करने में असमर्थ है। इसलिए नागरिक स्वतंत्रताओं व
अधिकारों का वर्णन भारत के संविधान की तरह न होकर न्यायिक निर्णयों पर आधारित है। डॉयसी ने इंग्लैण्ड की
न्याय-प्रक्रिया को विश्व में सर्वोच्च माना है और उसे ही नागरिक अधिकारों का उद्गम स्रोत बताया है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि डॉयसी ने कानून के शासन की विस्तार से व्याख्या की है। उसकी दृष्टि में कानून ही सर्वोच्च
है। कानून से ऊपर कोई नहीं है। कानून के सामने छोटा-बड़ा प्रत्येक व्यक्ति समान है। कानून का शासन नागरिक अधिकारों का
स्रोत भी है। इंग्लैण्ड में लिखित संविधान का अभाव होने के कारण वहां पर सरकार की शक्तियों को मर्यादित करने और न्यायिक
निर्णयों के द्वारा नागरिक स्वतन्त्रताओं को विकसित करने में कानून के शासन का महत्व अधिक हो जाता है।

कानून के शासन की आलोचना

डॉयसी ने जिस समय 1885 में अपनी पुस्तक ‘The Law and the Constitution’ में कानून के शासन की व्याख्या की थी, उस समय
इंग्लैण्ड में व्यक्तिवाद का बहुत अधिक प्रभाव था। व्यक्तिवाद के अनुसार राज्य के प्राथमिक कार्य कानून को लागू करना, शांति की
स्थापना करना, प्रतिरक्षा तथा विदेशी सम्बन्ध स्थापित करना है। डॉयसी स्वयं व्यक्तिवादी था। उसका विचार था कि स्वेच्छाचारी
शक्तियां या निरंकुश शासन व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात कर सकता है। इसी कारण उसने कानून के शासन का सिद्धान्त
दिया ताकि व्यक्ति की स्वतन्त्र की रक्षा की जा सके। लेकिन आज कानून के शासन का अर्थ डॉयसी की व्याख्या से आगे निकल
चुका है। यद्यपि कानून का शासन इंग्लैण्ड में आज भी प्रचलित है, लेकिन वह अपना प्राचीन रूप खो चुका है। 19वीं सदी के बाद
इंग्लैण्ड की शासन व्यवस्था में जो परिवर्तन हुए उन्होंने कानून के शासन को सीमित कर दिया है। आज भारत व अमेरिका में कानून
के शासन का वह रूप नहीं रह गया है जो पहले था। उदारीकरण के इस युग में कानूनी निरंकुशता की आज्ञा नहीं दी जा सकती।
शासन व्यवस्था को चुस्त व दुरुस्त बनाने के लिए आज विश्व के अनेक देशों में त्वरित न्याय को महत्व दिया जाता है। न्याय में देरी करने
का अर्थ है – न्याय से वंचित करना। इसलिए आज देश को कानून के शासन के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। विदेशी सम्बन्धों का विस्तार
होने के कारण कानून के शासन का अर्थ बदल चुका है। आज इंग्लैण्ड में भी कानून के शासन पर अनेक सीमाएं लग चुकी हैं।

कानून के शासन की सीमाएं

आज बदलते विश्व परिवेश व राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप कानून के शासन का अर्थ भी बदल गया है। आज कानून के शासन
को चुनौती देने वाली व्यवस्थाएं जन्म ले चुकी हैं। डॉयसी ने कानून के शासन के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते समय इन सीमाओं
पर ध्यान ही नहीं दिया था। इसी कारण आज कानून के शासन का डॉयसी द्वारा बताया गया अर्थ कुछ अप्रासंगिक सा होने लगा
है। इसके कुछ अपवाद या सीमाएं हैं :-

प्रदत्त व्यवस्थापन

डॉयसी ने कानून का अर्थ साधारण रूप में लिया था। उसकी दृष्टि से कानून
से अभिप्राय संसदीय कानूनों से था। आज सरकार के इतने कार्य बढ़ गए हैं कि सभी के लिए पूर्ण कानून बनाना असम्भव
है। विधायिका के पास कार्यभार की अधिकता के कारण आज कुछ मामलों में कानून को विस्तृत व व्यापक रूप कार्यपालिका
ही देती है। जो कानून पहले संसद बनाती थी, आज कार्यपालिका बनाती है। यही व्यवस्था प्रदत्त व्यवस्थापन कहलाती है।
इस प्रकार कानून संसद के हाथों से निकलकर कार्यपालिका के पास आ चुका है।

प्रशासकीय न्याय व कानून 

प्रशासकीय न्याय कानून के शासन का विरोधी है, परन्तु
आज प्रत्येक देश में प्रशासकीय कानून किसी न किसी रूप में विद्यमान है। आज इंग्लैण्ड में भी सभी विभागों को अपने
कर्मचारियों के मामलों में निर्णय लेने का अधिकार है और न्याय करने का भी अधिकार प्राप्त है। इन निर्णयों के विरुद्ध किसी
न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती। आज किसी विभाग को अपने कर्मचारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने व सजा देने
की पूरी छूट है। इसके लिए उसे किसी के सामने पूरी जानकारी देने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरण के लिए गृह विभाग
को किसी व्यक्ति को पासपोर्ट जारी करने या न करने के मामले में किसी के सामने स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं है। इस
प्रकार प्रशासकीय कानून व न्याय की उत्पत्ति से कानून के शाासन का परम्परागत अर्थ अनुपयुक्त हो चुका है।

विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां 

 आज अनेक देशों में राजनीतिक प्रतिविधियों व कर्मचारियों
को विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। आज ब्रिटेन के राजा या रानी को कुछ विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। उस
पर कानून की सीमाएं नहीं लगाई जा सकती हैं। इंग्लैण्ड में 1893 और 1939 ‘Public Authorities Act’ के अनुसार किसी
कर्मचारी पर 6 महीने के बाद 6 महीने पहले किए गए अपराध के लिए कोई मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता। विदेशों में भेजे
जाने वाले राजदूतों व विदेश विभाग के कर्मचारियों को भी कुछ विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। अपने गलत कार्यों के
लिए विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों पर मुकद्दमा विशेष परिस्थितियों में ही चलाया जा सकता है। इंग्लैण्ड में न्यायधीशों को भी
अपने कार्यों के मामलों में उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। यदि राजदूत या विदेशी शासक विदेशी धरती पर कोई अपराध कर दें तो उसे
उसके देश वापिस भेजा जा सकता है, मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह इंग्लैण्ड में पासपोर्ट जारी करना या न
करना राजा का विशेषाधिकार है। भारत के राष्ट्रपति को न्यायालयों द्वारा दी गई सजा को कम करने या माफ करने का
अधिकार है। इस निर्णय के विरुद्ध किसी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि
विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां कानून के शासन का प्रमुख अपवाद हैं।

सैनिक कानून 

आज अनेक देशों में सैनिक व्यवस्था को पूर्णतया: स्वतन्त्र दर्जा दिया गया है। सेना के अपने
न्यायालय व बोर्ड होते हैं जो सैनिकों द्वारा किए गए अपराधों की जांच करते हैं व सजा देते हैं। सैनिक न्यायालयों के निर्णयों
के विरुद्ध किसी तरह की अपील साधारण न्यायालयों में या कहीं भी नहीं की जा सकती हैं। भारत में सैनिक न्यायालयों को
अलग व स्वतन्त्र दर्जा प्राप्त है। इस तरह के प्रावधान पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, अमेरिका आदि देशों में भी है। इस
व्यवस्था ने कानून के शासन के सिद्धान्त को अप्रासंगिक बना दिया है। सैनिकों पर सेवा के दौरान सैनिक कानून लागू होते
हैं, साधारण कानून नहीं। इन कानूनों को संविदा कानून कहा जाता है।
;5द्ध मौलिक अधिकार ;थ्नदकंउमदजंस त्पहीजेद्ध रू. डॉयसी का यह कहना गलत है कि इंग्लैण्ड में नागरिकों को अधिकार व
स्वतन्त्रताएं कानूनी निर्णयों से प्राप्त हुए हैं। वहां पर कई अधिकार तो मेगनाकार्टा तथा ‘बिल ऑफ राईटज’ द्वारा प्राप्त किए
हैं और इनकी रक्षा कानून के शासन की बजाय प्रत्यक्षीकरण कानून द्वारा की जाती है। इस प्रकार इंग्लैण्ड में तो यह सिद्धान्त
सीमित ही हुआ है, लेकिन लिखित संविधानों वाले देशों में बिल्कुल अमान्य है। भारत, अमेरिका आदि देशों में नागरिक अधिकारों
व स्वतन्त्रताओं का जन्म संविधानिक प्रावधानों की देन है, न कि न्यायिक निर्णयों की।

इंग्लैण्ड के कानून के शासन के अपवाद 

इंग्लैण्ड में कानून के शासन का
सिद्धान्त ट्रेड यूनियन तथा सामाजिक संस्थाओं के मामले में लागू नहीं होता। 1906 के ‘Trade Dispute Act’ के अनुसार यदि
कोई मजदूर संघ व अन्य सामाजिक संघ अपने सदस्यो ंको हानि पहुंचाता है तो उसके विरुद्ध न्यायालय में नहीं जाया जा
सकता। ये संस्थाएं कानून से ऊपर हैं। इंग्लैण्ड में ‘Trade Board Act’ तथा ‘Public Health Act’ के मामलों में भी न्यायिक
प्रक्रिया प्रशासकीय है। वहां न्यायधीशों व राजदूतों को भी सामान्य कानून से छूट है। राजा को कुछ विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां
प्राप्त हैं। राजा पर मुकद्दमा साधारण न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता है। 1936 के ‘Public Order Acजश् के तहत पुलिस
को देश में शांति बनाए रखने के लिए सार्वजनिक जलूस को रोकने का पूर्ण अधिकार है। लॉर्ड चैम्बरलेन को फिल्मों व नाटकों
को सैंसर करने का अधिकार है। उसके निर्णय के विरुद्ध किसी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती। इसी तरह आज
इंग्लैण्ड में अनेक परिवर्तनों ने कानून के शासन का अर्थ सीमित कर दिया है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि डॉयसी ने यह कभी अनुभव नहीं किया कि इंग्लैण्ड व अन्य देशों में एक ऐसा वर्ग भी होता है
जिसे विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां प्राप्त होती हैं। विदेशी मामलों में कानून का शासन कार्य नहीं कर सकता है। आज इंग्लैण्ड में
इतने प्रशासकीय व राजनीतिक परिवर्तन हो चुके हैं जिन्होंने कानून के शासन का परम्परागत अर्थ सीमित कर दिया है। आज
इंग्लैण्ड में प्रशासकीय न्याय व कानून का विकास हो चुका है। प्रदत्त व्यवस्थापन की व्यवस्था ने इस सिद्धान्त का कार्यक्षेत्र
सीमित कर दिया है। लेकिन यह कहना सर्वथा गलत है कि इंग्लैण्ड में कानून का शासन नहीं है। आज कानून के शासन
का सिद्धान्त कम या आंशिक रूप से विश्व के अन्य सभ्य देशों में कार्य कर रहा है। यद्यपि नवीन निरंकुशता ने इस सिद्धान्त
को सीमित अवश्य किया है, लेकिन समाप्त नहीं। आज भी अनेक सरकारी विभाग सामान्य कानूनों के ही अधीन हैं। भारत
में तो सैनिक मामलों को छोड़कर शेष सभी मामलों में कानूनी प्रक्रिया का प्रयोग वैध माना जाता है। आज आवश्यकता कानून
के शासन के अर्थ को नए सिरे से परिभाषित करने की है। आज भी कानून का शासन अनेक संविधानिक व्यवस्थाओं में
महत्वपूर्ण सिद्धान्त के रूप में कार्य करके नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं का रक्षक बना हुआ है। अत: कानून के शासन
का सिद्धान्त डॉयसी की राजनीति विज्ञान को एक महत्वपूर्ण व शाश्वत् देन है।

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