मानवेन्द्र नाथ राय के राजनीतिक विचार

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राय के चिन्तन का विकास

राय का राजनीतिक चिन्तन अनेक उतार-चढ़ावों से परिपूर्ण है। अपने जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में जब उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया तो वे एक क्रान्तिकारी स्वभाव के व्यक्ति थे। लेकिन अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में एक उदारवादी विचारक बन गए। लेकिन प्रारम्भ से अन्त तक वे स्वतन्त्रता के विचार के पोषक रहे। प्रारम्भ में वे राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के पक्षधर थे और बाद में मानवीय स्वतन्त्रता के कट्टर समर्थक बन गए। इस प्रकार उनके विचारों के प्रारम्भिक चरण व अन्तिम चरण के बीच एक गहरी व चौड़ी खाई है। इसलिए उनके चिन्तन के विकास क्रम को समझना आवश्यक है ताकि राय की विचारधारा की दुराग्रºता को दूर किया जा सके। राय के चिन्तन का विकास क्रम इन भागों में बांटा जा सकता है:-
  1. प्रथम चरण (1901 - 1915 तक): अराजकतावाद, व्यवहारवाद, रोमांचक क्रांति तथा आतंकवाद अर्थात् क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी के रूप में।
  2. दूसरा चरण (1916 - 1945 तक): मार्क्सवादी, क्रान्तिकारी मार्क्सवादी, क्रान्तिकारी कांग्रेसी व क्रान्तिकारी प्रजातन्त्रवादी के रूप में।
  3. तीसरा चरण (1946 - 1954 तक): नव मानवतावादी अथवा मौलिक मानवतावादी के रूप में।

प्रथम चरण (1901 - 1915 तक)

इस दौरान राय एक क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी रहा। उसने भारत को आजाद कराने के लिए क्रान्तिकारी तरीकों में विश्वास व्यक्त किया। उसने युवा वर्ग को उदारवाद के खिलाफ एकत्रित किया और सशस्त्र क्रान्ति का आºवान किया ताकि भारत को स्वतन्त्रता दिलाई जा सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने कई देशों का भ्रमण किया। उन्हें विदेशों से धन तो मिला लेकिन शस्त्र प्राप्त नहीं हुए। यद्यपि उनका क्रान्तिकारी कार्यक्रम तत्कालीन उग्रवादी विचारधारा वाले व्यक्तियों को तो प्रभावित कर सका, लेकिन बुद्धिजीवियों को प्रभावित करने में राय के विचार असफल रहे। इस काल में राय विदेशी भ्रमण पर रहे। उन्होंने अमेरिका प्रवास के दौरान न्यूयार्क पब्लिक पुस्तकालय में मार्क्स के विचारों का अध्ययन किया और यहीं पर उनकी भेंट ब्रिटेन के साम्यवादी नेताओं से हुई। यहीं पर उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रान्तिकारी भारतीय नेता लाला लाजपत राय से हुई इस समय के दौरान ही उन्होंने मैक्सिको में मैक्सिन साम्यवादी दल की भी स्थापना की। इस तरह राय ने 1901 से 1915 तक क्रान्तिकारी गतिविधियों को संगठित रूप में पेश किया।

द्वितीय चरण (1916 - 1945 तक)

  1. रूढ़िवादी मार्क्सवादी के रूप में - अमेरिका में रहकर मार्क्सवादी सिद्धान्तों का अध्ययन करके राय रुस चले गए। वहां पर रहकर उन्होंने लेनिन के साथ रहकर मार्क्सवाद के व्यावहारिक रूप को निकट से देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यहां पर वे मध्य एशिया में साम्यवादी दल की नीतियों का प्रसार करने के लिए बनाई गई ‘सेन्ट्रल एशियाटिक ब्यूरो’ सदस्य बन गए और साम्यवादी कार्यक्रम को प्रसारित करने में जुट गए। उन्होंने ताशकन्द में प्रथम ‘भारतीय साम्यवादी दल’ की स्थापना 1920 में की और उनकी आस्था मार्क्सवाद में बढ़ती गई। लेकिन लेनिन के साथ मतभेदों के कारण उसे 1928 में रुस से निकाल दिया गया। इस तरह 1916 से 1928 तक वह कट्टर मार्क्सवादी समर्थक रहा। उसने रूढ़िवादी मार्क्सवाद में अपनी आस्था जताई। उसने स्वयं को मार्क्स का परम शिष्य कहना शुरू कर दिया। लेकिन उनका यह भ्रम जल्दी ही टूट गया और उसने मार्क्सवाद के बारे में नए सिरे से सोचना प्रारम्भ कर दिया।
  2. मार्क्सवाद के आलोचक के रूप में - 1930 के बाद राय ने रूढ़िवादी मार्क्सवाद की आलोचना करनी शुरू कर दी और उसमें अपेक्षित सुधारों की बात कही, उसने 1930 से पहले मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचारों में जो अपनी आस्था व्यक्त की थी, भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को भी वर्ग-संघर्ष व्यक्त का ही एक रूप स्वीकार किया था, भारतीय इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्या भी की थी, उसके स्थान पर उसने मार्क्सवाद की कठोरता पर तरह-तरह के आपेक्ष लगाए। उन्होंने प्रचार किया कि मार्क्सवाद मानवीय स्वतन्त्रता का शोषक है। यह राज्य को साध्य मानकर व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात करता है। 1930 में भारत लौटक्र मार्क्सवाद के बारे में कहा कि मार्क्स का राज्य साध्य न होकर एक साधन है। मार्क्स के द्वन्द्वात्मक दर्शन को उन्होंने मानव-प्रगति में बाधक बताया। उसने वर्ग-संघर्ष तथा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को भी गलत बताया। इस तरह राय ने मार्क्सवाद की अनेक आलोचनाएं की।
  3. क्रान्तिकारी कांग्रेसी व क्रान्तिकारी प्रजातन्त्रवादी के रूप में - मार्क्सवाद की ही तरह राय ने 1930 से 1939 तक कांग्रेस के रचनात्मक योगदानों को पहले तो सराहा लेकिन धीरे-धीरे उसने गांधी व अन्य कांग्रेस के नेताओं की आलोचना शरू कर दी। उसने तिलक और गांधी की क्रान्तिकारी गतिविधियों को तो सराहा लेकिन गांधी के अहिंसात्मक कार्यक्रम की निन्दा की। राय ने कहा कि गांधी जी द्वारा राजनीति में धर्म का प्रवेश कराकर स्वतन्त्रता संग्राम को चोट पहुंचाई गई है। उनका मानना था कि भारत की स्वतन्त्रता शांतिपूर्ण साधनों से प्राप्त नहीं की जा सकती। उसने गांधी को ब्रिटिश सरकार का एजेन्ट तक कह दिया। इस तरह कांग्रेस की नीतियों से असन्तुष्ट होकर उन्होंने ‘Radical Democratic Party’ की स्थापना की। इस तरह राय के मन में मार्क्सवाद और कांग्रेस के प्रति जो लगाव था, वह धीरे-धीरे कम होता गया और अन्त में वे एक ‘Radical Democrat’ बन गए, इस युग में उनकी सहानुभूति सर्वहारा वर्ग के साथ रही। 

तीसरा चरण (1946 - 1954 तक)

ज्यों-ज्यों राय पर मार्क्सवाद का प्रभाव कम होता गया, वे स्वतन्त्र चिन्तन के क्षेत्र में आगे बढ़ते गए और मौलिक मानवतावादी बन गए। उसने रुस और चीन के साम्यवाद की अच्छी बातों से शिक्षा ग्रहण करके गांधी की उदारवादी विचारधारा जोड़कर एक नई विचारधारा को जन्म दिया जिसे मौलिक या नव मानवतावाद (Radical Humanism) के नाम से जाना जाता है। उसने मनुष्य को ही अपने अध्ययन का केन्द्र बिन्दु माना और मानवीय स्वतन्त्रता का प्रबल समर्थक बन गया। इस तरह वह क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी से एक मौलिक मानवतावादी बन गया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि राय की विचारधारा कभी स्थिर नहीं रही। तीनों चरणों में उसके चिन्तन का विकास चाहे अलग-अलग रूपों में हुआ हो, लेकिन प्रारम्भ से अन्त तक उनका चिन्तन स्वतन्त्रता का पोषक रहा है, चाहे व मानवीय स्वतन्त्रता के रूप में हो या राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के रूप में। इसलिए उनका चिन्तन नव-मानवतावादी चिन्तन के रूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा है।

राय और मार्क्सवाद

राय प्रारम्भ से ही क्रान्तिकारी विचारों के व्यक्ति थे। एक क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी के रूप में उन्होंने भारत में अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों को संचालित करने के लिए देश-विदेश के भ्रमण किए। इस दौरान विदेशों से उन्हें आर्थिक सहायता तो मिल गई, लेकिन शस्त्र सहायता कहीं से भी नहीं मिली। अपने क्रान्तिकारी कार्यक्रम में असफल रहने पर जब वे अमेरिका गए तो वहां पर उनकी भेंट ब्रिटेन के मार्क्सवादी नेता फिलिप स्पै्रट तथा रजनी पाम से हुई। इन नेताओं का राय के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसने अमेरिका की न्यूयार्क पब्लिक लाईब्रेरी में मार्क्सवाद का अध्ययन शुरू कर दिया। अमेरिका के बाद जब वे रुस गए तो वहां पर उन्होंने लेनिन के साथ साम्यवादी कार्यक्रमों का संचालन किया। लेकिन 1928 में लेनिन से मतभेद होने के कारण उसे रुस से निकाल दिया गया। इसके कारण उसने मार्क्सवाद के कठोर सिद्धान्तों को नए सिरे पुन:स्थापित करने का बेड़ा उठाया। उसने मार्क्सवाद में अनेक संशोधन किए।

इससे स्पष्ट होता है कि राय की मार्क्सवाद सम्बन्धी धारणा दो चरणों में बंटी हुई है। प्रथम चरण में वे एक मार्क्सवादी थे और दूसरे में वे मार्क्सवाद के विरोधी हो गए। लेकिन इसमें राय का कोई दोष नहीं था। राय मानवीय स्वतन्त्रता के प्रबल समर्थक थे। जब उन्होंने महसूस किया कि मार्क्सवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचलने वाला है तो उसने उसकी आलोचना करनी शुरू कर दी और मार्क्सवाद की कठोरता को समाप्त करने के लिए उसमें कई परिवर्तन किए। इस दृष्टि से राय के मार्क्सवाद सम्बन्धी विचारों का अध्ययन दो भागों में किया जा सकता है:-
  1. मार्क्सवाद के समर्थक के रूप में
  2. मार्क्सवाद के विरोधी के रूप में

मार्क्सवाद के समर्थक के रूप में - 

अपने जीवन के प्रारम्भ में राय मार्क्स के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उसने स्वयं को मार्क्स का परम शिष्य कहना शुरू कर दिया था। इसका कारण था उसके पास अमेरिका में मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन किया जाना। उसने मार्क्स को मानवतावादी तथा स्वतन्त्रता का सच्चा प्रेमी माना। वह लेनिन के भौतिकवाद के सिद्धान्त से बहुत प्रेरित हुआ। उसको मार्क्सवाद का समर्थक कहे जाने के पक्ष में तर्क हैं-
  1. भौतिकवाद का सिद्धान्त  - राय ने मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की तो आलोचना की है, लेकिन लेनिन के भौतिकवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया है। वह लेनिन के इस विचार से सहमत था कि आधुनिक भौतिकी की खोजों ने भौतिकवाद को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। भौतिकवाद ही समस्त ज्ञान का स्रोत है। अणु, इलैक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन का समस्त ज्ञान भौतिकवाद पर ही आधारित है। इन सबकी जड़ में कोई न कोई भौतिक तत्व अवश्य विद्यमान है। इस प्रकार राय मार्क्स व लेनिन के भौतिकवाद शब्द से अवश्य सहमत थे।
  2. मार्क्सवाद की वैज्ञानिक पद्धति का समर्थन  – राय ने मार्क्स के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समर्थन किया है और वैज्ञानिक पद्धति को देश के विकास के लिए आवश्यक माना हैं
  3. मार्क्स के दर्शन तथा व्यवहार की अनुरूपता में विश्वास – राय ने मार्क्स के सिद्धान्त के उस अंश को स्वीकार किया है जो चिन्तन और कर्म की एकता पर जोर देता है। इसके अनुसार कोई भी कार्य तभी सफल हो सकता है, जब एक निश्चित योजनानुसार उसे सोच-समझकर किया जाए। अर्थात् कार्य के सफल होने के लिए चिन्तन और कर्म में एकरूपता का पाया जाना जरूरी है। इसी तरह राय का भी मानना था कि यदि किसी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है।
  4. पूंजीवाद की आलोचना पर सहमति – मार्क्स ने पूंजीवाद की उसके दोषों के कारण की थी। लेकिन राय पूंजीवाद का कट्टर आलोचक होते हुए भी पूंजीवाद को राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य मानता है। उसका कहना है कि पूंजीवाद के बिना लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे और देश का विकास पिछड़ जाएगा। लेकिन राय मार्क्स की इस बात से पूरी तरह सहमत है कि पूंजीवाद अनेक सामाजिक व आर्थिक दोषों का जनक है। उसका कहना हे कि पूंजीवाद सर्वहारा वर्ग के शोषण व उत्पीड़न के लिए उत्तरदायी है। यही समाज में आर्थिक विषमता व शोषण तथा तनाव का कारण हैं राय मार्क्स के इस तर्क का भी समर्थक है कि एक दिन पूंजीवाद का अन्त अवश्य होगा। राय ने भी स्वीकार किया है कि पूंजीवाद के नाश के लिए श्रमिक वर्ग को संगठित होकर निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी ताकि अपना लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
  5. मार्क्सवाद के मानववादी विचारों का समर्थन – राय का मानना है कि मार्क्स का चिन्तन मानव कल्याण का चिन्तन है। मार्क्स ने अपना संघर्ष मानव की भलाई के लिए किया था। मार्क्स की रचनाएं श्रमिक वर्ग के उत्थान के लिए लिखी गई थी। इसी बात से प्रभावित होकर राय ने मार्क्स के चिन्तन को मानव की मुक्ति का वैचारिक आधार माना है। जिस प्रकार मार्क्स ने वर्ग विहीन समाज या समाजवादी समाज की कल्पना की थी, उसी तरह राय ने भी ऐसे समाज की कल्पना की है जो सब तरह के दमन, अन्याय व शोषण से मुक्त हो और उसमें मानव का सर्वांगीण विकास हो। राय ने भी मार्क्स की तरह सर्वहारा क्रान्ति द्वारा राज्य के निर्माण की बात को स्वीकार किया है।
  6. राष्ट्रवाद की आलोचना से सहमति – मार्क्स पूंजीपतियों द्वारा बनाए गए राष्ट्र का कट्टर विरोधी था। वह मजदूर वर्ग के द्वारा राष्ट्र के निर्माण का समर्थक था। वह एक विश्वव्यापी सच्चे समाजवाद का समर्थक था अर्थात् वह अन्तर्राष्ट्रीय समाजवाद का समर्थक था। इसी तरह राय ने भी संकीर्ण राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए कहा है कि पूंजीवाद शक्तियां देश के अन्दर राष्ट्रवाद की दीवार खड़ी करके श्रमिक वर्ग को संगठित होने से रोकती है। इसलिए इस दीवार को तोड़ने के लिए श्रमिक वर्ग को संगठित होकर पूंजीवाद के विरूद्ध यह लड़ाई लड़नी होगा। इस प्रकार राय ने मार्क्स व लेनिन के उन विचारों का ही समर्थन किया है जो उसे अच्छे लगे। बाकी को उसने छोड़ दिया या उनमें संशोधन कर डाले। इसलिए उसे मार्क्सवाद का विरोधी विचारक कहा जाने लगा।

मार्क्सवाद के विरोधी के रूप में - 

राय ने मार्क्स की प्रंशसा करने के साथ-साथ आलोचनाएं भी की हैं। उसने मार्क्स के कुछ विचारों को मानवीय स्वतन्त्रता का दमन करने वाला कहा है। उसने मार्क्स की इस बात के लिए आलोचना की है कि आर्थिक तत्व ही इतिहास का निर्माण करते हैं। उसने मार्क्स के इन सिद्धान्त को मानव स्वतन्त्रता का विरोधी करार दिया है। इस प्रकार उसने मार्क्सवाद के कुछ सिद्धान्तों की आलोचना की है और उनमें आवश्यक संशोधन पेश किए हैं। राय द्वारा मार्क्सवाद की प्रमुख आलोचनाएं हैं-
  1. मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद अवैज्ञानिक है – राय का कहना है कि मार्क्स ने हीगल से प्रभावित होकर 18वीं सदी के डिडरौट, हौलवैच, व हेलावीटियस के भौतिकवाद की अवहेलना की थी। उसने मानव-प्रकृति से सम्बन्धित लुडविंग फ्यूबरेच के भौतिकवाद की तरफ भी कोई ध्यान नहीं दिया था। राय ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तर्क, रोमांसवाद और क्रान्ति’ (Reason, Romanticism and Revolution) में मार्क्स के इस सिद्धान्त की आलोचना की और कहा मार्क्स ने मानवीय स्वतन्त्रता के विचार का त्याग किया है। राय ने मार्क्स की इस बात पर आपत्ति उठाई कि इतिहास उत्पादन के साधनों के विकास से उद्भूत घटनाओं की शृंखला है। राय ने विचार व्यक्त किया कि मार्क्स ने सामाजिक संघर्ष को अत्यधिक महत्व देकर मनुष्य की स्वतन्त्रता की इच्छा तथा स्वतन्त्रता प्राप्त करने में व्यक्ति की भूमिका जो इतिहास का निर्माण करती है, पर कोई ध्यान नहीं दिया, इस प्रकार राय ने कहा कि मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त मानव की प्रगति के मार्ग में एक रूकावट पैदा करता है।
  2. मार्क्सवाद की कट्टरता की आलोचना – राय का कहना है कि मार्क्सवाद अपने कठोर सिद्धान्तों के कारण उतनी प्रसिद्धि कभी प्राप्त नहीं कर सका जितनी उसे मिलनी चाहिए थी। उसने मार्क्स की वैज्ञानिक पद्धति की तो प्रशंसा की है, लेकिन उसने मार्क्सवाद के ईश्वरीय वाक्यों की निन्दा की है। राय ने प्रगतिशील विचारक होने के नाते मार्क्स के उन सभी अनुयायियों की भी आलोचना की है जो मार्क्सवाद को कट्टर बनाने के पक्ष में थे। राय का विश्वास था कि कोई भी वैज्ञानिक पद्धति कट्टरता से मुक्त होनी चाहिए, उसका विचार था कि मार्क्सवाद को बदलती परिस्थितियों के अनुसार कार्य करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसलिए राय ने मार्क्सवाद को गतिशील, सजीव तथा सक्रिय बनाने के लिए उसकी कठोरता का लचीलेपन में बदलने का प्रयास किया है ताकि मार्क्सवाद को रूढ़िवादिता के आपेक्षों से बचाया जा सके। यदि मार्क्सवाद को कट्टरता और संकीर्णता से बांधे रखा गया तो उसका जीवन शक्ति का नाश हो जाएगा और जल-कल्याण से इसका नाता टूट जाएगा। इसलिए राय ने मार्क्सवाद की कठोरता पर तीव्र प्रहार किए।
  3. मार्क्स के सर्वाधिकार की निन्दा – मार्क्स का कहना था कि पूंजीपति व श्रमिक वर्ग के बीच वर्ग संघर्ष में अन्त में श्रमिक वर्ग की ही विजय होगी और समस्त उत्पादन शक्तियों पर सर्वहारा वर्ग का ही कब्जा हो जाएगा। पूंजीपति वर्ग धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगा और समाज में सर्वहारा वर्ग ही शेष बचेगा। राय ने मार्क्स की इस बात की आलोचना की है। राय का कहना है कि पूंजीपति वर्ग समाज की प्रगति के लिए बहुत जरूरी है। यदि यह वर्ग ही समाप्त हो जाएगा तो श्रमिकों का कल्याण कभी नहीं होगा। यद्यपि राय ने पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिकों का शोषण करने की तो निन्दा की है, लेकिन वह मार्क्स के इस कथन से असहमत है कि पूंजीपति वर्ग की समाप्ति से ही श्रमिकों का भला हो सकता है। इसलिए राय ने विचार व्यक्त किया है कि वर्ग-संघर्ष से व्यक्ति की स्वतन्त्रता का नाश होता है और सर्वधिकारवाद की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तरह राय ने मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त की आलोचना की और उसके सर्वाधिकारवादी राज्य की भी निन्दा की। इसी कारण से राय को 1928 में न केवल साम्यवादी पार्टी से निकाला गया था बल्कि रुस से भी निकाल दिया गया था।
  4. मार्क्स की इतिहास की व्याख्या गलत है – राय ने मार्क्स की इस बात को गलत बताया है कि आर्थिक शक्तियां ही इतिहास का निर्माण करती है। राय का कहना है कि इनके अतिरिक्त अन्य तत्व भी इतिहास का निर्माण करते हैं। राय का कहना है कि मार्क्स ने बुद्धि तत्व को इतिहास के विकास में कोई महत्व नहीं दिया है। मार्क्स ने विचार तत्व की उपेक्षा करके मनुष्य के प्रयासों को इतिहास के निर्माण कार्य से दूर कर दिया है। राय ने कहा है-’’दार्शनिक रूप से, इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा को बुद्धि की रचनात्मक भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। भौतिकवाद विचारों की वस्तुपरक वास्तविकता से इंकार नहीं कर सकता।’’ राय की दृष्टि में बुद्धि तत्व इतिहास के विकास में सर्वाधिक योगदान देता है। राय का मानना है कि इतिहास में भौतिक तथा वैचारिक दोनों शक्तियों का योगदान होता है। राय का कहना है कि यदि इन दोनों शक्तियों में उचित सामंजस्य नहीं होगा तो इतिहास का निर्माण होना असम्भव है। इनका सामंजस्य ही विकास का मार्ग प्रशस्त करता है और इतिहास को नई दिशा देता है। राय ने आगे कहा है कि देश के विकास के लिए विचारों का सकारात्मक होना आवश्यक है। विचार एक बार जन्म लेने से अपनी स्वायत्तता प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार राय मनुष्य की स्वतन्त्रता प्राप्त करने की खोज की कहानी को इतिहास का नाम देते हैं। उच्च स्तर पर यह इच्छा सामूहिकता का रूप ग्रहण कर लेती है।
  5. मार्क्स का द्वन्द्ववाद का सिद्धान्त काल्पनिक है – राय बरडेव के इस विचार से सहमत है कि मार्क्स की द्वन्द्ववाद पद्धति मार्क्सवाद को काल्पनिक बना देती है। उसका कहना है कि द्वन्द्ववाद की क्रिया, प्रक्रिया तथा समन्वय सिद्धान्त तर्कशास्त्र पर आधारित होते हैं। इनका प्रयोग व्यावहारिक जीवन में न होकर तर्कशास्त्र तक ही सीमित रहता है। इसलिए मार्क्स ने इस सिद्धान्त का प्रयोग व्यावहारिक जीवन के लिए किया है तो यह निराधार है और काल्पनिक है। इसका व्यावहारिक जीवन की वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता।
  6. मार्क्स की मध्य वर्ग के समाप्त होने की भविष्यवाणी गलत सिद्ध हुई है – मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी एक दिन मध्य वर्ग का लोप हो जाएगा। यह कथन आगे चलकर काल्पनिक साबित हुआ। आज देश के आर्थिक विकास में इस मध्य वर्ग की भूमिका संतोषजनक है। मध्य वर्ग के लोगों की संख्या कम या समाप्त होने की बजाय तेजी से बढ़ रही है। आजकल सांस्कृतिक व राजनीतिक नेतृत्व मध्य वर्ग के लागों के हाथ में ही है। राय का कहना है-’’मध्यम वर्ग का लोप हो जाएगा, यह मार्क्स की भविष्याणी सर्वथा उल्ट है। आज मध्य वर्ग की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है और प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व इतिहास में मध्यम वर्ग का जो सांस्कृतिक और राजनीतिक नेतृत्व बढ़ रहा है, उसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते।’’
  7. मार्क्सवाद के नैतिक व मनोवैज्ञानिक दुर्बल हैं – राय का कहना है कि मार्क्सवाद के द्वारा व्यक्ति को पर्याप्त स्वतन्त्रता नहीं मिली है। मार्क्स ने मानव की अवहेलना करके स्वयं के सिद्धान्त को इतिहास के माध्यम से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। मार्क्स का दर्शन व्यक्ति को ऐतिहासिक आवश्यकता के सन्दर्भ में बलि चढ़ा देता हैं उसका यह दर्शन व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन करता है। राय ने इतिहास की तुलना में व्यक्ति को सर्वोपरि मानकर उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए उसकी स्वतन्त्रता की इच्छा का सम्मान किया और मार्क्स को मानव की स्वतन्त्रता का विरोधी बताया। मार्क्स ने मानव प्रकृति में कोई स्थाई वस्तु नहीं मानी है। उसका कहना है कि मानव परिस्थितियों के अनुसार अपने स्वभाव में स्वयं परिवर्तन कर लेता है। परन्तु राय ने मार्क्स की इस मनोवैज्ञानिक व्याख्या को गलत बताया है। उसका कहना है कि मानव प्रकृति में प्रत्येक वस्तु स्थायी है जो अधिकारों व कर्त्तव्यों की आधारशिला है। इस प्रकार राय ने मार्क्स की धारणा के विपरीत कहा है कि नैतिक मूल्यों में कुछ स्थायी तत्व भी हैं जो इतिहास का निर्माण करते हैं।
  8. मनुष्य का प्रत्येक कार्य आर्थिक तत्वों पर आधारित नहीं है – मार्क्स का कहना था कि मनुष्य का प्रत्येक कार्य आर्थिक क्रियाओं से प्रभावित होता है। लेकिन राय ने मार्क्स के इस विचार का खण्डन करते हुए कहा है कि मनुष्य आर्थिक मानव बनने से पहले अपने आचरण में शारीरिक आवश्यकताओं से नियन्त्रित और संचालित होता था। आदिम मानव के समाजशास्त्रीय अध्ययन से पता चलता है कि मानव जाति का आरम्भिक संघर्ष मनुष्य की जीवन निर्वाह की सामग्री प्राप्त करने के प्रयासों तक ही सीमित है। उसके इन प्रयासों को उत्प्रेरित करने वाली प्रेरणाएं स्वभाव से ही जैवित की। इसलिए उसके समस्त क्रिया-कलाप आर्थिक न होकर उसकी शरीर की आवश्यकताओं से अभिप्रेरित थे। मानव इतिहास में कुछ ऐसे क्रिया-कलाप हैं जो आर्थिक न होकर शारीरिक हैं और उनसे व्यक्ति को अत्यधिक आनन्द प्राप्त हुआ है। इसलिए कहा जा सकता है कि मार्क्स का यह कहना सर्वथा गलत है कि मनुष्य का प्रत्येक क्रिया-कलाप आर्थिक होता है।
  9. मार्क्स का वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त गलत है – राय का कहना है कि मार्क्स की यह बात तो ठीक है कि समाज में युगों विभिन्न वर्गों का अस्तित्व रहा है, लेकि उनकी वर्ग-संघर्ष की बात गलत है। राय का मानना है कि मार्क्स के द्वारा बताए गए शोषित व शोषक वर्गों के अतिरिक्त भी कई अन्य सामाजिक वर्गों का उल्लेख इतिहास में मिलता है। इन सामाजिक वर्गों ने सदैव संघर्ष के स्थान पर सामाजिक सहयोग में योगदान दिया। मार्क्स के दोनों वर्गों में भी तनाव के अतिरिक्त आपसी सहयोग के प्रयास होते रहे हैं। यदि वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त ठीक होता तो अब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व ही नष्ट हो गया होता। इसके अतिरिक्त वर्तमान समय में समाज में दो वर्ग न होकर अनेक वर्ग हैं और आज अनेक देशों में पूंजीपति व श्रमिक के बीच रिश्ते सुधरने के कगार पर हैं। अत: मार्क्स का वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त गलत है।
  10. मार्क्स का अतिरिक्त पूंजी का सिद्धान्त गलत है – राय का मानना है कि यदि मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाए तो समाज की प्रगति का मार्ग रूक जाए। आज पूंजी के बल पर अनेक उत्पादन इकाईयां कार्य कर रही हैं। प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था के विकास में इनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। यदि मार्क्स की बात स्वीकार कर ली जाए तो उद्योग ठप्प हो जाएंगे। कोई भी पूंजीपति नए उद्योग लगाने की नहीं सोचेगा पूंजीपति जिस लाभ (अतिरिक्त मूल्य) के लिए उत्पादन करता है, वह यदि श्रमिकों में बांट दिया जाएगा तो पूंजी लगाने वालों के साथ यह घोर अन्याय होगा और कोई भी इस अन्याय को सहकर उत्पादन जारी नहीं रखेगा। लाखों श्रमिक बेकार हो जाएंगे, देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, इससे श्रमिकों का भला होने की बजाय, बुरा ही होगा, अत: मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त मानवीय मूल्यों के खिलाफ है।
  11. मार्क्स ने व्यक्तिवादियों की उदारवादी कल्पना की उपेक्षा की है – राय का कहना है कि मार्क्स व्यक्तिवाद की उदारवादी कल्पना में विश्वास नहीं करते थे। राय के अनुसार उदारवादी और उपयोगितावादी भावनाओं की अवहेना करके मार्क्स ने अपने पुराने मानवतावाद को भूला दिया है। इसी कारण से अन्तर्राष्ट्रीय समाजवाद का नैतिक पतन हुआ है कि मार्क्स ने मानवीय नैतिकता के किसी भी तत्व को अस्वीकार किया है। मार्क्स ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता की घोर अपेक्षा की है। मार्क्स ने इतिहास को मांग व पूर्ति के नियम से बांधने की जो भारी भूल की है, उससे व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचला गया है। इसलिए मार्क्स की विचारधारा व्यक्तिवाद के उदारवादी स्वरूप को कुचलने वाली है। इसमें व्यक्ति को राज्य के अधीन कर दिया गया।
  12. इसी तरह राय ने मार्क्स के हिंसात्मक साधनों की भी घोर निन्दा की है। उसने नैतिकता के आधार पर राजनीतिक व सामाजिक सुधारों की वकालत की है। 
  13. राय ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग के अधिनायतन्त्र को भी देश के विकास में बाधक माना है। उसने कहा है कि सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति अपूर्ण क्रान्ति है। इसमें मध्यम वर्ग की उपेक्षा होने के कारण देश योग्य नेतृत्व से वंचित रह जाता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि राय एक सच्चा मानवतावादी था। वह मानवीय स्वतन्त्रता का प्रबल समर्थक था। उसकी इच्छा थी कि मानवीय स्वतन्त्रता की हर कीमत पर रक्षा की जाए। इसलिए उसने रूढ़िवादी मार्क्सवाद की बुराईयों के खिलाफ जनता का ध्यान आकृष्ट किया। उसने मार्क्स के सिद्धान्तों को अनेक आधारों पर अनुचित व मानवीय स्वतन्त्रता का दमन करने वाला मानकर, उनमें व्यापक स्तर पर संशोधन किए। उसने मार्क्सवाद के सर्वसत्ताधिकारवाद की घोर आलोचना करके साम्यवादियों के खोखले व अप्रासांगिक सिद्धान्तों की पोल खोली। यद्यपि वे मार्क्स की कुछ बातों से सहमत भी हुए। लेकिन अधिकतर बातों में उन्होंने मार्क्सवाद के व्यावहारिक दोषों से असंतुष्ट होकर उससे दूर होते चले गए। उन्होंनें या तो मार्क्सवाद के अनेक सिद्धान्तों को अस्वीकार कर दिया या उनके व्यापक परिवर्तन कर डाले। अत: राय एक सच्चे क्रान्तिकारी मार्क्सवादी या संशोधनवादी मार्क्सवादी थे और उनके द्वारा मार्क्सवाद में किए गए संशोधन बहुत महत्वपूर्ण हैं।

मौलिक मानवतावाद का सिद्धान्त

मौलिक मानवतावाद का सिद्धान्त राय की राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में सबसे बड़ी देन है। राय ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन काफी अनुभवों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर किया है। उनका यह सिद्धान्त परम्परागत मानवतावादी सिद्धान्तों से हटकर है, इसलिए इसे मौलिक मानवतावाद का नाम दिया गया है।

जब राय को रुसी साम्यवादी दल से निकाला गया तो वह भारत में आकर कांग्रेस की नीतियों की समीक्षा करने लग गए। उन्होंने कांग्रेसी की नतियों व नेताओं की आलोचना करनी शुरू कर दी और क्रांतिकारी कांग्रेसी कहलाए। साथ में ही उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धान्तों की कठोरता पर भी तीव्र प्रहार किए। मौलाना आजाद से कांग्रेस पार्टी का चुनाव हारने के बाद उन्होंने नए दल का गठन किया जिसका नाम रखा गया-‘Radical Democratic Party’। इस तरह वे Raical Congressman से Radical Democrat बन गए। उन्होंने अपने मार्क्सवादी व भारतीय कांग्रेस के राजनीतिक अनुभवों का पूरा लाभ उठाया और गांधी की भारतीयता तथा विदेश के उदारवाद को जोड़कर एक नई विचारधारा का प्रतिपादन किया जिसे आज नव मानतावाद का मौलिक मानवतावाद के नाम से जाना जाता है।

मौलिक मानवतावाद का अर्थ

मानवतावाद एक प्राचीन विचारधारा है। यूनान के स्टोइकसों से लेकर आधुनिक काल तक इसकी अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। प्राचीन काल से आज तक मानवतावादी विचारधारा के अध्यनन का केन्द्र बिन्दु मनुष्य ही रहा है। मानवतावादी विचारकों के अनुसार मनुष्य ही सबकार्यों का आधार है। मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है।

राय का कहना है कि ब्रिटिश कवेकर्स तथा फ्रांसीसी जेकवीस भी मानवतावादी थे, क्योंकि उन्होंने मनुष्य को बहुत अधिक महत्व दिया। लेकिन इनको सच्चा मानवतवादी नहीं कहा जा सकता। इन सभी ने मानव को किसी ने किसी रूप में किसी अतिप्राकृतिक या अतिमानव सत्ता के अधीन करने की भूल अवश्य की है। उनका विश्वास था कि मानव ईश्वर की सृष्टि है और उसके ही अधीन है। इसी तरह राजा रम मोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अरविन्द घोष, गांधी, जवाहर लाल नेहरू, विनोबा भावे आदि विचारक भी मानवतावादी थे। लेकिन इन्हें भी सच्चा मानवतावादी नहीं कहा जा सकता। इन सभी ने पूर्ववर्ती विचारकों की तरह ही मानव को अतिप्राकृतिक सत्ता (ईश्वर) के अधीन करने की भूल की।

राय ने कहा है कि यह बात तो सही है कि मनुष्य ही मानवतावादी विचारधारा का केन्द्र बिन्दू है। लेकिन उनका मानवतावाद प्राचीन मानवतावाद से बिल्कुल अलग है। इसी कारण उसका मानवतावाद मौलिक मानवतावाद है। क्योंकि राय ने मानव को किसी अतिप्राकृतिक सत्ता के अधीन करने की धारणा का खण्डन किया है। उनका कहना है कि मानव जीवन ही पूर्ण जीवन है। उसे किसी अन्य सत्ता के सहारे की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, भाग्य आदि का मानव जीवन में कोई महत्व नहीं है। आधुनिक विज्ञान की सभी खोजों ने सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य में कुछ भी अप्राकृतिक नहीं है। मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माण करता है। मनुष्य ही इस विश्व का निर्माण व पुर्ननिर्माण स्वयं कर सकता है। इस प्रकार राय का मानवतावाद इस अर्थ में मौलिक भी है और परम्परागत मानवतावाद से भिन्न भी है कि उसने मानव को किसी अतिप्राकृतिक सत्ता के अधीन नहीं किया है। इसी कारण उनके मानवतावाद को मौलिक मानवतावाद का नाम दिया जाता है।
मौलिक मानवतावाद को अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसे वैज्ञानिक मानवतावाद, नव-मानवतावाद, क्रान्तिकारी मानवतावाद आदि भी कहा जाता है। इन सभी का सम्बन्ध राय के मानवतावादी दर्शन से ही है। राय ने प्रोटेगोरस के कथन को स्वीकारते हुए कहा कि ‘‘मनुष्य ही प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड’’ है (Man is the measure of everything)। उसने इसमें एक बात और जोड़ी है-’’मनुष्य मानव जाति का मूल है (Man is the root of mankind)। इस आधार पर राय के मौलिक मानवतावाद की दो आधारभूत मान्यताएं हैं जिन पर उनका सम्पूर्ण मौलिक मानवतावाद का चिन्तन आधारित है।

मौलिक मानवतावाद की आधारभूत मान्यताएं

राय के मौलिक मानवतावाद की दो आधारभूत मान्यताएं हैं-
  1. मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड है – राय ने यह कथन प्रोटेगोरस से लिया है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति का सम्बन्ध केवल उन्हीं वस्तुओं से है जो सम्पूर्ण मानव जाति को प्रभावित करती है। राय ने कहा है कि एक मौलिक मानवतावादी को दैवीय इच्छा या आत्मा जैसी अतिप्राकृतिक वस्तुओं में कोई दिलचस्पी नहीं रखनी चाहिए। यद्यपि सूर्य, चांद, सितारों आदि में रुचि ली जा सकती है क्योंकि ये हमारे जीवन पर प्रभाव डालते हैं। लेकिन ये भी हमारे भाग्य का आधार नहीं है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। उसमें आज से कल को श्रेष्ठ बनाने की क्षमता है, राय का विश्वास है कि मनुष्य स्वभाव से विवेकशील और नैतिक होने के कारण एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर सकने में सक्षम है। इसलिए व्यक्ति ही प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड है।
  2. मनुष्य मानव जाति का मूल है – राय का कहना है कि मानव जीवन अपने आप में पूर्ण है। इसलिए मानव-इतिहास को समझने के लिए हमें किसी बाहरी या अतिप्राकृतिक सत्ता जैसे-वेदान्तियों का ब्रह्म, प्लेटो का शिव, आगस्टाइन की दैवी इच्छा, हीगल की निरपेक्ष आत्मा का सहारा लेन की आवश्यकता नहीं है। राय का कहना है कि जो लोग यह विश्वास करते हैं कि इस सृष्टि को ईश्वर ने बनाया है और वही व्यक्ति का भाग्य निर्धारक है, वे कभी भी सच्चे मानतवतावादी नहीं हो सकते। सच्चा मानवतावादी तो मनुष्य के क्रिया-कलापों में ही विश्वास करता है, जो इस संसार को सुन्दर बनाने के लिए किए जाते हैं। सच्चा मानवतावादी प्रत्येक बात को तर्क और विवेक की कसौटी पर अपने चिन्तन को कसता है। इसी से निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य ही मानव जाति का मूल है।

राय के मौलिक मानवतावाद की विशेषताएं

राय ने परम्परागत मानवतावाद में अनेक कमियां निकाली और अपने नए मानवतावादी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उसके नव मानवतावाद की प्रमुख विशेषताएं हैं-
  1. मनुष्य एक तर्कशील प्राणी है – राय का मानना है कि व्यक्ति एक विवेकशील प्राणी है। आज का युग वैज्ञानिक युग है। इसमें आध्यात्मवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। जिसे वस्तु को वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध न किया जा सके, वह विवकमय नहीं हो सकती। विवेक व तर्क के आगे आत्मा का कोई महत्व नहीं है। राय ने गीता के मुख्य सिद्धान्त-’’मनुष्य तत्वत: आत्मा है और शरीर और मन से ऊपर है तथा नित्य और अविनाशी है’’ का खण्डन किया है। राय का मानना है कि व्यक्ति अपनी विवेकशीलता के बल पर नैतिक सिद्धान्तों की स्थापना कर सकता है। यह विवेकशीलता उसका जन्मजात युग होता है। राय ने लिखा है-’’व्यक्ति के जीवन और उसके व्यक्तित्व में तर्क और विवेक सार्वभौमिक समन्वय की प्रतिध्वनि है।’’ आधुनिक विज्ञान की खोजों ने सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य में कोई अति-प्राकृतिक तत्व नहीं है। इसलिए आत्मा मानव प्रकृति का तत्व नहीं है। इस प्रकार मनुष्य इस भौतिक संसार का ही एक अंग है अर्थात् मानव स्वभाव विकासमान भौतिक प्रगति की पृष्ठभूमि का ही परिणाम है। इस प्रकार राय ने किसी भी अतिप्राकृतिक सत्ता के अधीन व्यक्ति को न करके उसे एक विवेशील प्राणी माना है, जो अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करता है। प्रत्येक अच्छा या बुरा कार्य उसके विवेक का ही प्रतिफल होता है। इसके पीछे किसी दैवीय सत्ता का कोई हाथ नहीं है।
  2. नैतिकता का आध्यात्मवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है – राय ने अपनी नव मानवतावादी विचारधारा के आधार पर धर्म और नैतिकता को अलग-अलग स्वीकार किया है। राय ने महात्मा गा्रधी व गोखले के आध्यात्मवाद की आलोचना करते हुए कहा है कि धर्म नैतिकता का आधार नहीं होता। राय ने गांधी की ईश्वरीय धारणा का भी खण्डन किया है। राय के अनुसार नैतिकता कोई अतिमानवीय या बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि एक आन्तरिक शक्ति है जिसका पालन व्यक्ति ईश्वर या प्राकृतिक भय से नहीं करना चाहिए बल्कि समाज कल्याण की भावना से करना चाहिए। नैतिकता के अभाव में मनुष्य मनुष्य नहीं कहला सकता। इसलिए नैतिकता और विवेक मनुष्य के लिए आवश्यक है। इस प्रकार राय ने गांधी के राजनीति के आध्यात्मिकरण का विरोध करके राजनीति को नैतिकता पर आधारित करने का समर्थन किया है। राय का कहना है कि आज हम जिस शक्ति राजनीति में फंसे हुए हैं, उसका मूल कारण हमारा नैतिकता से दूर होना है।
  3. मौलिक मानवतावाद विश्व-व्यापी है – राय का मानवतावादी राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिधि से बाहर है। राय ने प्रबुद्ध राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए राष्ट्रवाद के विकास के लिए विश्व बन्धुत्व की भावना पर जोर दिया है। राय का मानवतावाद सर्वदेशीय या सर्वकालिक है। उन्होंने राष्ट्रवाद की संकीर्णता से ऊपर उठकर विश्व-बन्धुत्व की शिक्षा दी है। उन्होंने गांधी, टैगोर, अरविन्द घोष की विश्व-बन्धुत्व की भावना का आदर किया है। उनका मानवतावाद विश्व-व्यापी कामनवैल्थ (Commonwealth) की धारणा है। उनका मानवतावाद अन्तर्राष्ट्रीय से अलग है। उसने अन्तर्राष्ट्रीय की मानवतावाद कसे अलग बताते हुए लिखा है-’’अन्तर्राष्ट्रीयवाद में पृथक राष्ट्रीय राज्यों के अस्तित्व का विचार है जबकि एक सच्ची विश्व सरकार की स्थापना राष्ट्रीय राज्यों को मिलाकर या उनका निराकरण करके ही की जा सकती है।’’
  4. मनुष्य का आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतन्त्र होना – राय का कहना है कि व्यक्ति का दृष्टिकोण धर्म निरपेक्ष होना चाहिए। मनुष्य धर्म के प्रभाव में आकर अन्धविश्वासी हो जाता है और सही व गलत में निर्णय कर पाने में असमर्थ होता है। धर्म ही व्यक्ति की स्वतन्त्रता में सबसे बड़ी बाधा है। आज धर्म ने मनुष्य को अपने पाश में जकड़ लिया है। आज धर्म का बुद्धिजीवी चरित्र समाप्त हो गया है। यदि मानव को धर्म के पाश से मुक्ति मिल जाए तो नवीन मानवतावाद की स्थापना हो सकती है। आध्यात्मिक स्वतन्त्रता ही व्यक्ति की राजनैतिक व सामाजिक स्वतन्त्रता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इसलिए मनुष्य का धार्मिक रूप से स्वतन्त्र होना जरूरी है। धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाकर ही व्यक्ति सर्वांगीण विकास कर सकता है। यही नव मानवतावाद का सार है।
  5. मनुष्य में स्वतन्त्रता की इच्छा स्वाभाविक है – राय का मानना है कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता प्राप्त करने व उसे बनाए रखने की इच्छा जन्मजात है। वह अपनी स्वतन्त्रता को पाने के लिए सदैव संघर्ष करता है। मनुष्य विवेकशील प्राणी होने के नाते स्वतन्त्रता के पीछे भागता है। वह किसी भी बंधन को तोड़ना चाहता है। उसमें अपनी प्राकृतिक योग्यताओं को विकसित करने की इच्छा लालायित रहती है। विवेकशीलता तथा स्वतन्त्रता के लिए उसकी लगन उसके स्वभाव के दो स्वाभाविक व जन्मजात गुण हैं। राय ने लिखा है-’’समस्त ज्ञान, उपलब्धियां, सांस्कृतिक प्रगति, वैज्ञानिक खोजें, कलात्मक सृजनशीलता आत्मा से अभिप्रेरित रही हैं। स्वतन्त्रता के लिए मानव की इच्छा अमर व नित्य है।’’ राय ने स्पष्ट किया है कि स्वतन्त्रता विश्व में कानून का विरोध करने में नहीं पाई जाती है, बल्कि उसके साथ सचेत रहकर तालमेल बैठाने में पाई जाती है। इस प्रकार राय के नवीन मानवतावाद का यही उद्देश्य है कि मनुष्य अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके और धर्म व अन्धविश्वासों के पाश से मुक्ति पा सके।
  6. मनुष्य को प्रधानता – समाज के सन्दर्भ में राय के अनुसार व्यक्ति समाज का मूल आदर्श है। सभी सामाजिक समस्याओं का उद्देश्य मनुष्य के हित में है और सम्पूर्ण सामाजिक तरक्की का मुख्य साधन मनुष्य ही है। समाज, राज्य तथा दूसरी सभी संस्थाओं का निर्माण मनुष्य स्वयं करता है और मनुष्य अपनी सुविधानुसार इनमें परिवर्तन भी कर सकता है। इन सभी संस्थाओं का लक्ष्य व्यक्ति का सामाजिक विकास करना ही होना चहिए और सभी सामाजिक निर्माण के कार्य व्यक्ति द्वारा ही किए जाने चाहिए। इसी प्रकार राय का राष्ट्रवाद राष्ट्रों से सम्बन्धित न होकर मानववाद के विकास से ही सम्बन्धित है। राय की विचारधारा हर दृष्टि से व्यक्ति को ही सर्वोपरि मानती है।
  7. समाज का पुनर्निर्माण वैज्ञानिक साधनों से सम्भव है – राय ने अपने नए मानवतावाद या मौलिक मानवतावाद में समाज के पुनर्निर्माण पर जोर दिया है। उनका मानना है कि जीवन का हर क्षेत्र, चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, आर्थिक हो या सामाजिक, उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ही प्रयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि भूमि का उत्पादन उर्वरकों व सिंचाई से बढ़ाया जा सकता है, न कि देवी-देवताओं को हवन व यज्ञों से खुश करके। व्यक्ति को अपने जीवन में तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। मानसिक क्रान्ति द्वारा ही समाज का पुनर्निर्माण सम्भव है।
  8. मौलिक लोकतन्त्र का समर्थन – राय का मानना था कि शक्तियों का केन्द्रीयकरण सच्चे लोकतन्त्र का हनन करता है। जब सारी शक्ति जनता के हाथों में होती है, तो वही सच्चा लोकतन्त्र होता हैं इसलिए उन्होंने अधिक से अधिक राजनीतिक शक्ति का विकेन्द्रीकरण करने पर बल दिया। राज्य का विश्वास था कि वर्तमान लोकतन्त्र जनता के हितों का सच्चा हितैषी नहीं है। इसलिए एक ऐसे लोकतन्त्र की जरूरत है जो राजनीतिक दलों से विहीन हो और जनता राजनीतिक सत्ता की वास्तविक स्वामी हो। इसके लिए उन्होंने नैतिक लोकतन्त्र (Radical Democracy) का सिद्धान्त दिया। इस तरह राय ने मौलिक लोकतन्त्र के माध्यम से अपने मौलिक मानवतावाद का ही पोषण किया है, क्योंकि मौलिक लोकतन्त्र में व्यक्ति को ही प्रधानता दी गई है।
  9. शक्ति रहित राजनीति का समर्थन – राय का मानना था कि शक्ति व्यक्ति को भ्रष्ट करती है। आज राजनीति शक्ति के लिए एक संघर्ष बन गई है। इस संघर्ष को बढ़ावा देने में राजनीतिक दलों का ही हाथ है। वे राजनीतिक भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं। इसलिए राजनीति में नैतिकता को अपनाकर इस संघर्ष को समाप्त किया जा सकता है। लेकिन राजनीति में नैतिकता को लागू करना एक कठिन कार्य है। इसलिए राजनीतिक दलों को समाप्त करके राजनीति को एक शक्तिहीन आदर्श या जन कल्याण का साधन बनाया जा सकता है। अपने इसी मत को व्यावहारिक रूप देने के लिए राय ने 1948 में अपनी ‘Radical Democratic Party’ को भंग कर दिया था।

मौलिक मानवतावाद के राजनीतिक व आर्थिक आधार

राय के मौलिक मानवतावाद के राजनीतिक व आर्थिक आधार हैं-

राजनीतिक आधार –

राय शक्तियों के केन्द्रीयकरण के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि राजनीतिक शक्ति एक व्यक्ति के हाथ में एकत्रित होने से व्यक्ति के अधिकारों व स्वतन्त्रता को हानि पहुंचती है। जब राजनीति सत्ता किसी एक दल या व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित हो जाती है तो तानाशाही की स्थापना हो जाती है। इसलिए राजनीतिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण करना आवश्यक हो जाता है ताकि व्यक्ति की स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखा जा सके। राय ने अपने मौलिक मानवतावाद के राजनीतिक आधारों के पक्ष में निम्न दो तर्क दिए हैं:-

  1. व्यक्ति की महत्ता पर जोर – राय का कहना है कि व्यक्ति के विकास के लिए उसका स्वतन्त्र होना आवश्यक है। समाज में व्यक्ति एक मूल आदर्श है। समाज के समस्त क्रिया-कलाप व्यक्ति के विवेक पर ही आधारित होते हैं। उनका कहना है कि समाज की रचना व्यक्ति ने अपने भले के लिए की है। राज्य जैसी समस्त संस्थाएं मानव विवेक की उपज हैं। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार इन सामाजिक व आर्थिक संस्थाओं में परिवर्तन कर सकता है। इस तरह राय व्यक्ति की स्वतन्त्रता का समर्थन करते हुए उन सभी सामाजिक व आर्थिक बन्धनों को समाप्त करना चाहते थे जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता में रूकावट डालने वाले हों।
  2. दल-विहीन प्रजातन्त्र का समर्थन – राय ने राजनीतिक दलों को समाज में भ्रष्टाचार फैलाने वाला माना है। उनका मानना है कि राजनीतिक दल सारी शक्ति अपने हाथों में संचित करके व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन करते हैं। इससे समाज का विकास रूक जाता है। यदि चाहें तो ये समाज को राजनीतिक शिक्षा दे सकते हैं, परन्तु संकीर्ण स्वार्थों पर टिके होने के कारण ये अपना सामाजिक कल्याण का लक्ष्य भूल जाते हैं और समाज में तरह-तरह का भ्रष्टाचार फैलाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि मानव के कल्याण के लिए इन दलों को ही समाप्त कर दिया जाए। इसके लिए राय ने स्थानीय समितियों की स्थापना का सुझाव दिया है जो स्वायत सत्ता के आधार पर केन्द्रीकरण को रोकेंगी। इससे दल-विहीन प्रजातन्त्र की स्थापना होगी और व्यक्ति की स्वतन्त्रता को बढ़ावा मिलेगा।

आर्थिक आधार –

राय का मानना था कि लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली में अधिक से अधिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इसमें आर्थिक व राजनीतिक शक्ति पर एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाती है। इसलिए अर्थव्यवस्था का विकेन्द्रीकरण आवश्यक हो जाता है। राय ने कहा है कि आर्थिक प्रजातन्त्र के बिना व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए उन्होंने नियोजित अर्थव्यवस्था (Planned Economy) का सुझाव दिया है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को कुछ काम अवश्य मिलेगा और लोगों की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताएं पूरी होंगी। इससे व्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास होगा।

इस तरह राय ने सामाजिक ढांचे का नव-निर्माण करने तथा मानव का जीवन सुखी बनाने के लिए मनुष्य को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने का मत प्रस्तुत किया है। राय ने विश्वास व्यक्त किया है कि मानव की स्वतन्त्रता की इच्छा ही सभ्य समाज का निर्माण कर सकती है। राय ने ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देते हुए मानव को अपने चिन्तन में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। इसलिए उसका मानवतावाद का सिद्धान्त राजनीतिक चिन्तन को एक महत्वपूर्ण देन है।

नव या मौलिक मानवतावाद की आलोचना

राय एक स्वतन्त्र चिन्तन व प्रगतिशील दृष्टिकोण रखने वाले विचारक थे। उन्होंने मार्क्सवाद की कठोरता पर प्रहार करके मनुष्य को साम्यवाद के जाल से बाहर निकाला और उसकी स्वतन्त्रता की जोरदार वकालत की। उसने अपनी मौलिक मानवतावाद की विचारधारा की स्थापना द्वारा मनुष्य को अपने चिन्तन में प्रमुख स्थान पर प्रतिष्ठित किया। लेकिन इसके बावजूद भी राय की मौलिक मानवतावाद की विचारधारा अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी और उसकी अनेक आधारों पर आलोचना की जाने लगी। उसकी आलोचना के प्रमुख आधार हैं:-
  1. धर्म सभ्यता व नैतिकता के विकास के लिए आवश्यक है – राय ने धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाकर भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास का मार्ग अवरुद्ध किया है। धर्म भारतीय सभ्यता व संस्कृति के विकास का आवश्यक तत्व रहा है। सभी वेद-शास्त्रों में धर्म का प्रभाव नि:संकोच स्वीकार किया गया है। राय ने एक भारतीय चिन्तक होकर भारतीय सभ्यता को विकसित करने वाले जरूरी तत्व की ही अवहेलना कर दी। राय ने अपने मानवतावादी चिन्तन की स्थापना धर्म के बिना ही करके भारतीय आध्यात्मवाद को गहरी चोट पहुंचाई है। धर्म का जीवन में बहुत महत्व होता है। धर्म के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन के चरम लक्ष्य (मोक्ष) तक पहुंचता है, इसलिए धर्म की निन्दा करना भारतीय चिन्तन का अपमान करना है।
  2. राय की स्वतन्त्रता नकारात्मक है – राय ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बहुत अधिक बल दिया है। उसने धर्म और राज्य को स्वतन्त्रता के रास्ते में रूकावट माना है। यद्यपि उनका यह विचार उचित है कि सच्ची स्वतन्त्रता राज्य के कानूनों का पालन करने में है, विरोध करने में नहीं। परन्तु उसने व्यक्ति की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित बनाने के लिए राज्य जैसी अनिवार्य संस्था को भी बलि देनी चाही है। वास्तव में जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता के मार्ग वास्तविक बाधाएं राज्य न होकर व्यक्ति की निम्नतर प्रवृत्तियां तथा इन्द्रियपरक इच्छाएं हैं, इन पर नियन्त्रण पाकर ही मनुष्य सच्ची स्वतन्त्रता का उपभोग कर सकता है।
  3. तार्किक दोष – राय को व्यक्ति की स्वतन्त्रता की इच्छा को जन्मजात बताया है। व्यक्ति स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर संधर्ष करता रहता है। लेकिन इस बात की क्या गारन्टी है कि यह संघर्ष लड़ाई-झगड़े का रूप नहीं लेगा। राय में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को स्थान देकर संयुक्त स्वतन्त्रता को चोट पहुंचाई है। वह स्वयं कहता है कि पहले किसी वस्तु को तर्क की कसौटी परखना चाहिए। लेकिन वह अपने स्वतन्त्रता के विचार को उचित तर्क पर नहीं कस सका, वह ज्ञान शक्ति व अज्ञान शक्ति में अन्तर करने में असफल रहा।
  4. भौतिकवाद के आधार पर आलोचना – राय ने भौतिकवाद को महत्व देते हुए कहा है कि प्रकृति और संसार अपने बल पर जीवित है, इसमें किसी दैवीय सत्ता का हाथ नहीं है। मनुष्य में बुद्धि और नैतिकता भौतिक प्रकृति से प्राप्त हुए हैं और इसी के अन्दर समाहित है। राय ने यह विचार देकर भारतीय आध्यात्मवाद व आत्मा का अस्तित्व नकार दिया है। उसने आत्मा को पदार्थ की ही देन मानकर भारतीय आध्यात्मवाद को गहरी ठेस पहुंचाई है।
  5. व्यक्ति व समाज के सम्बन्धों के आधार पर आलोचना – राय ने समाज में व्यक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया है। व्यक्ति राय के मानवतावादी चिन्तन व समाज का आधार है। व्यक्ति समाज से पहले है। समाज व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति समाज के लिए नहीं। परन्तु राय की यह दृष्टि गलत है। व्यक्ति का समाज के बिना कोई महत्व नहीं है। अरस्तु जैसे दार्शनिकों ने व्यक्ति को एक सामाजिक प्राणी माना है। इसलिए समाज के बिना उसकी कल्पना करना असम्भव है। उसका समाज में ही जन्म होता है, विकास होता है और अन्त होता है। सच तो यह है कि व्यक्ति और समाज परस्पर निर्भर हैं। वे एक सिक्के के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं।
  6. मनुष्य की विवेकशीलता पर अधिक जोर – राय ने व्यक्ति को एक विवेकशील प्राणी मानकर उस पर ही अपना मानवतावाद का सिद्धान्त खड़ा किया है। लेकिन वह यह बात भूल गया है कि मनुष्य में विवेक के साथ-साथ भावनाओं का भी काफी महत्व है। इतिहास साक्षी है कि मनुष्य ने अनेक कार्य विवेक की बजाय भावनात्मक किए हैं।
  7. राज्य एक अनिवार्य संस्था है – राय ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता के चक्कर में राज्य को गौण संस्था बना दिया है। उसके अनुसार राज्य व्यक्ति की स्वतन्त्रता में बाधा उत्पन्न करता है। समाज की समस्त संस्थाएं राज्य पर ही आधारित होती है। इसलिए राज्य एक अनिवार्य संस्था है। समाज में व्यक्ति का जीवन शांतिमय बनाने के लिए राज्य आवश्यक कानूनों का निर्माण करके उन्हें लागू करता है। इसलिए राज्य को गौण संस्था मानना राज्य की बड़ी भूल है।
  8. शक्तिहीन राजनीति असम्भव है – राय ने वर्तमान राजनीति को शक्ति प्राप्ति के लिए संघर्ष कहा है। इसको बढ़ावा देने में राजनीतिक दलों का हाथ होता है। इसलिए उसने लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाकर राजनीति को नैतिकता पर आधारित करने की बात कही है। परन्तु आधुनिक युग में शक्तिहीन राजनीति की कल्पना करना निरर्थक है। शक्ति सत्ता की प्रमुख विशेषता है। शक्ति के बिना राजनीति नहीं चल सकती। शासक को देश की विघटनकारी ताकतों से निपटने के लिए व शांति स्थापना के लिए बल प्रयोग अवश्य करना पड़ता है। इसलिए राय की शक्ति-विहीन राजनीति की कल्पना निराधार है।
  9. मौलिक लेाकतन्त्र अव्यावहारिक है – यद्यपि राय का मौलिक लोकतन्त्र उसके मानवतावाद का अटूट अंग है। लेकिन व्यवहार में इसे लागू करना असम्भव है। राय ने दलों को समाप्त करके प्रजातन्त्र को दल-विहीन करने की जो बात की है, वह किसी भी रूप में उचित नहीं है। आधुनिक लोकतन्त्र में दलों का बहुत महत्व है। दल लोगों को राजनैतिक शिक्षा देते हैं। लोगों की प्रभुसत्ता का सिद्धान्त दल ही लागू करते हैं। आज विश्व के सभी देशों में दलों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसलिए दल-विहीन प्रजातन्त्र की कल्पना असम्भव है।
  10. राष्ट्रवाद विरोधी भावना–राय का मानवतावाद राष्ट्रवाद विरोधी है। राय ने राष्ट्रीयता की अवहेलना करके विश्व समाज की कल्पना की है। उसने अपने मानवतावाद के चक्कर में राष्ट्रवाद की बलि दे दी है। जो व्यक्ति राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर अपने पड़ोसी को भाई न समझता हो, वह विश्व-बन्धुत्व के लक्ष्य को कैसे प्राप्त करेगा। राय की राष्ट्रीयता तथा मानवतावाद में अत्यधिक विरोधाभास होने के कारण इसे अस्वीकार किया जाने लगा है। राष्ट्रीयता की भावना की अवहेलना करना उन करोड़ों लोगों की भावना का मजाक उड़ाना है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया है। राष्ट्रीयता की भावना ही लोगों को एकता के शत्रु में बांधे रखती है। जिस देश में राष्ट्रीयता की भावना न हो, वह अवश्य ही पतन की राह पर चल रहा होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि राय के मौलिक मानवतावाद की अनेक आधारों पर आलोचना की गई है। कुछ आलोचनाएं सही भी हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राय का मौलिक मानवतावाद का सिद्धान्त अव्यावहारिक है। राय की विश्व- बन्धुत्व की कल्पना निराधार नहीं है। इसमें कोई झूठ नहीं है कि वर्तमान राजनीति में दल ही भ्रष्टाचार के जनक हैं। इसी तरह अन्य आधारों पर भी राय का चिन्तन भारतीय व पाश्चात्य समाज को एक महत्वपूर्ण देन है।

संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा

राय व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने महसूस किया कि पूंजीवादी लोकतन्त्र और साम्यवाद दोनों ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का हनन करने वाले हैं। उन्होंने प्रचलित प्रजातन्त्र के अन्दर कुछ दोषों को महसूस करके उनके खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया और अपना संगठित प्रजातन्त्र का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा मौलिक लोकतन्त्र को अपने नवीन मानवतावाद का प्रमुख राजनैतिक आधार बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा किए बिना मौलिक लोकतन्त्र या संगठित लोकतन्त्र की स्थापना नहीं की जा सकती। वर्तमान लोकतन्त्र में बदलाव किए बिना मौलिक लोकतन्त्र को साकार रूप नहीं दिया जा सकता। इसलिए उन्होंने अपनी संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा का विकास किया।

राय का कहना है कि आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। इसके अभाव में देश का पूर्ण विकास नहीं हो सकता। इसके द्वारा ही नैतिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उसे स्वतन्त्रता प्रदान करके ही किया जा सकता है। लेकिन आज लोकतन्त्र के नाम पर लोकतन्त्र की ही बलि चढ़ाई जा रही है। स्वतन्त्रता व अधिकारों का केन्द्रीकरण हो रहा है। सत्ता लोलुप गिने-चुने व्यक्तियों द्वारा ही लोकतन्त्र के लाभों को प्राप्त किया जा रहा है। आम आदमी के लिए स्वतन्त्रता एक स्वप्न बनकर रह गई है। इसलिए राय ने कहा है कि सम्पूर्ण जनता के लाभों के अभावों में लोकतन्त्र सच्चा लोकतन्त्र नहीं हो सकता, राय ने लिखा है-’’सभी लोकतन्त्र की बात करते हैं, फिर भी कहीं भी हमें जनता के द्वारा प्रत्यक्ष शासन के कहीं दर्शन नहीं होते।’’ वस्तुत: आज लोकतन्त्र का वास्तविक स्वरूप एक आदर्श और सिद्धान्त के रूप में राजनीतिक ग्रन्थों में कैद है। यह आम व्यक्ति के लिए एक मृगमरीचिका के समान है, जिसके लाभ उसे प्राप्त नहीं हो सकते। लोकतन्त्र के सिद्धान्तों का व्यवहार से दूर का भी रिश्ता नहीं है। जनता की सम्प्रभुता संवैधानिक घोषणाओं तक ही सीमित है और व्यवहार में व्यक्ति की राजनीतिक भागीदारी, अधिकारों तथा उसकी गरिमा का कोई महत्व नहीं है। इसलिए प्रजातन्त्र का वर्तमान स्वरूप कहने के नाम पर तो जनता के लिए है, व्यवहार में यह गिने-चुने व्यक्तियों के हितों का ही पोषण करने वाला है। इसलिए राय ने संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा का विकास किया। ताकि साधारण व्यक्ति भी लोकतन्त्र के फायदों को प्राप्त कर सकें।

संसदीय लोकतन्त्र की आलोचना

राय ने अपनी संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा का विकास करने के लिए सबसे पहले वर्तमान समय में प्रचलित संसदीय लोकतन्त्र को अपनी आलोचना का शिकार बनाया है। उसका कहना है कि वर्तमान लोकतन्त्र में जनता के हितों व नैतिक सिद्धान्तों की बलि देकर समाज को पतन की तरफ धकेल दिया जाता है। आज लोकतन्त्र के सिद्धान्त और व्यवहार में दिन-रात का अन्तर है। इसलिए दलों के कठोर अनुशासन के कारण अधीन व्यक्तियों की स्थिति एक मशीनी पुर्जे के समान बनकर रह गई है। इसलिए राय ने संसदीय प्रजातन्त्र को अपनी आलोचना का शिकार बनाकर, उसके दोषों को बताकर, उन्हें दूर करने के लिए सगठित प्रजातन्त्र का सिद्धान्त पेश किया है। उसके द्वारा संसदीय लोकतन्त्र की आलोचनाएं की गई हैं:-
  1. शक्ति का केन्द्रीयकरण - राय का कहना है कि संसदीय प्रजातन्त्र में राजनीतिक सत्ता सारे लोगों के हाथों में न होकर थोड़े से प्रभावशाली व्यक्तियों के हाथों में आ गई है। लोकतन्त्र के नाम पर निरंकुशता का बोलबाला है। संसदीय लोकतन्त्र में प्रभावशाली लोग राजनीतिक सत्ता का प्रयोग स्वार्थपूर्ण कार्यों के लिए करते हैं। इससे सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है और आम व्यक्ति के हितों की बलि दी जाती है। इसलिए जनता स्वामी न होकर एक नौकर बनकर रह जाती है। इसलिए इसको समाप्त करके ही शक्ति के केन्द्रीयकरण पर अंकुश लगाया जा सकता है।
  2. सिद्धान्त और व्यवहार में अन्तर - राय का मानना है कि वर्तमान प्रजातन्त्र में शासक वर्ग जनता से लुभावने वायदे तो करता है, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए कोई प्रयास नहीं करता। आधुनिक राजनीतिज्ञों की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है। चुनावी वायदे जीत तक ही सिमटकर रह जाते हैं। ‘‘सिद्धान्त में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का आदर्श स्वीकार तो कर लिया जाता है, परन्तु मनुष्य को सामूहिक नियन्त्रण व सामूहिक कल्याण में जलमग्न कर दिया जाता है, जिससे व्यक्ति सच्ची स्वतन्त्रता का आनन्द नहीं उठा सकता।’’
  3. प्रतिनिधि शासन - राय का कहना है कि आधुनिक समय में शासन की बागडोर जनता के हाथों में न होकर प्रतिनिधियों के हाथों में होती है। प्रतिनिधि जनता द्वारा प्रदत्त शक्तियों का गलत प्रयोग करते हैं और जनता के हितों की अनदेखी करने लगते हैं। विधि-निर्माण और प्रशासन में जनता की कोई भागीदारी नहीं होती, जनता को वोट बैंक समझने के अतिरिक्त शासक वर्ग जनता के लिए कोई विशेष काम नहीं करता जिससे उसे फायदा हो। इसलिए लोकतन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि शासन की बागडोर वास्तविक रूप में जनता के पास ही हो।
  4. राजनीतिक दलों की भूमिका - राय का मानना है कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अनैतिक साधनों का प्रयोग करते हैं। वे राजनीतिक भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद तथा जातिवाद को बढ़ावा देते हैं। जनता के हित में उनका कोई सकारात्मक योगदान नहीं होता, दलीय व्यवस्था लोकतन्त्र को विकृत बनाने में अपना पूर्ण योगदान देती है। इसलिए दल-विहीन प्रजातन्त्र की स्थापना होना जरूरी है ताकि जनता को दल-प्रणाली के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।
  5. जनहित की उपेक्षा - संसदीय लोकतन्त्र में जन-भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है। लोकतन्त्र पूंजीपति के साथ खिलवाड़ किया जाता है। लोकतन्त्र पूंजीपति वर्ग के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाता है। पूंजीपति वर्ग जनता के हितों को अ पनी इच्छापूर्ति के लिए बलि चढ़ाने में संकोच नहीं करते। इससे सामाजिक और आर्थिक विषमताओं में वृद्धि होती है। संसदीय लोकतन्त्र पूंजीपति वर्ग का शासन है जो गरीबों का खून चूसता है और स्वयं मोटा ताजा हो जाता है। अर्थव्यवस्था के सारे लाभ पूंजीपतियों की जेब में जाते हैं। इसलिए राय ने विकेन्द्रित व नियोजित अर्थव्यवस्था का सुझाव दिया है ताकि वर्तमान आर्थिक असमानता को कम किया जा सके। इससे जनता के हितों की रक्षा होगी और अर्थव्यवस्था के लाभ पूंजीपतियों की जेबों में जाने पर अंकुश लगेगा।
इस प्रकार राय ने संसदीय प्रजातन्त्र को ऐसे लोगों का समूह माना है जो शक्तियों के केन्द्रीयकरण के द्वारा राजनीतिक दलों के माध्यम से स्वार्थ सिद्धि के कार्यों में लिप्त रहते हैं। राजनीतिक लोगों को राजनीतिक शिक्षा देने की बजाय उन्हें शब्द जाल में फंसाए रहते हैं ताकि वे उनकी निरंकुशता के खिलाफ आवाज न उइाए। संसदीय प्रजातन्त्र में नैतिकता और न्याय दोनों की ही बलि देकर पूंजीपति वर्ग अपने हितों की पूर्ति करते हैं। इसलिए राय ने सच्चे लोकतन्त्र की स्थापना के लिए दल-विहीन लोकतन्त्र की स्थापना का सुझाव दिया है और अपनी इस अवधारणा का नाम ‘संगठित लोकतन्त्र‘ की अवधारणा रखा है।

संगठित लोकतन्त्र की अवधारणा

राय का कहना है कि संसदीय लोकतन्त्र में जनता के अधिकारों का हनन होता है। इसलिए लोकतन्त्र को व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया है ताकि देश व समाज दोनों का ही कल्याण हो सके। उनका कहना है कि एक लोकतन्त्र के अन्दर स्थित सभी संस्थाएं-चाहे वे धार्मिक हों या राजनीतिक आधुनिक युग में धनी वर्ग के हितों का ही पोषण कर रही हैं। इसलिए व्यक्ति के लिए ऐसे राजनीतिक ढांचे का निर्माण जरूरी है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने वाला हो और विकेन्द्रीकरण पर आधारित हो। इसलिए उन्होंने संगठित या मौलिक लोकतन्त्र की धारणा का प्रतिपादन किया है।

संगठित लोकतन्त्र की विशेषताएं

  1. मौलिक लोकतन्त्र – राय ने अपने संगठित लोकतन्त्र के लिए मौलिक लोकतन्त्र का प्रयोग किया है। उनका कहना है कि ‘Radical’ शब्द लैटिन भाषा के ‘Radix’ शब्द से लिया गया है। इसका लैटिन भाषा में अर्थ है-जड़ों से (From the roots)। इससे राय का अर्थ है-नीचे से या स्थानीय शासन। इस प्रकार राय की ‘Radical Democracy’ का अर्थ है-’’मौलिक लोकतन्त्र वह लोकतन्त्र है जो समाज के निम्नतन स्तर के आधार पर संगठित हो।’’ अर्थात् राय ने स्थानीय स्वशासन को अपनी संगठित लोकतन्त्र की अवधारणा का आधार बनाया है।
  2. मौलिक मानवतावाद से सम्बन्धित – राय की संगठित लोकतन्त्र की अवधारणा उनके प्रमुख सिद्धान्त नव मानवतावाद या मौलिक मानवतावाद की पूरक है। उनके अनुसार-’’नव मानवतावाद तथा संगठित लोकतन्त्र एक-दूसरे में घनिष्ठ रूप में सम्बन्धित हैं। संगठित लोकतन्त्र के बिना मौलिक मानवतावाद को अमली जामा नहीं पहनाया जा सकता।’’ राय का मौलिक मानवतावाद (Radical Humanism) एक ऐसी विचारधारा है जिसे व्यवहारिक रूप देने के लिए मौलिक लोकतन्त्र की आवश्यकता है। राय ने अपने सिद्धान्त-मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड है तथा वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है, आधारभूत मान्यताओं को मौलिक लोकतन्त्र में भी स्थान दिया है। ये मान्यताएं ही मौलिक लोकतन्त्र की मेरुदण्ड है। इनके बिना सच्चे लोकतन्त्र की कल्पना करना भी असम्भव है अर्थात् मानवतावाद का व्यावहारिक रूप मौलिक लोकतन्त्र में ही सम्भव है।
  3. सत्ता का विकेन्द्रीकरण – राय का कहना है कि शक्तियों का केन्द्रीयकरण भ्रष्टाचार को जन्म देता है। इसलिए उन्होंने अपनी संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा में सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर जोर दिया है। राय का कहना है कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को शासन व सत्ता में भागीदार बनाए बिना सच्चे लोकतन्त्र की स्थापना नहीं हो सकती। जनता की भागीदारी ही दल-विहीन प्रजातन्त्र की स्थापना कर सकती है और दलीय प्रणाली के दोषों को समाप्त कर सकती है। इसलिए उन्होंने संगठित लोकतन्त्र में राजनीतिक शक्ति को संसदीय लोकतन्त्र की तरह राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर संगठित न करके व्यापक तौर पर स्थानीय स्तर पर संगठित करने का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि स्थानीय लोगो के सहयोग से ही जनसमितियों के गठन के माध्यम से दल-विहीन प्रजातन्त्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकता हैं इससे जनता की सम्प्रभुता भी सुनिश्चित रहेगी और प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्रता का सच्चा आनन्द उठा सकेगा।
  4. दल विहीन प्रजातन्त्र – राय का मानना है कि दल राजनीतिक भ्रष्टाचार के जनक हैं। ये जनता को राजनीतिक शिक्षा देने की बजाय उसे शब्द जाल में फंसाकर सत्ता पर अपना वर्चस्व बनाए रखते हैं। इससे जनता के हितों की लगातार अनदेखी होती रहती है। ये उचित अनुचित का कोई ध्यान नहीं रचाते। इसलिए उन्होंने अपनी संगठित लोकतन्त्र की अवधारणा में दलों को समाप्त करने का सुझाव दिया है। यद्यपि राय जानते थे कि दलों की समाप्ति लोकतन्त्र से असम्भव है, इसलिए उन्होंने दलों के स्थान पर जन-समितियों की स्थापना का विकल्प चुना। उसने अपने लोकतन्त्र में बुद्धिजीवियों को विशेष महत्व दिया है ताकि वे जन-समितियों के सदस्य बनकर अपनी योग्यता से जनता का कल्याण कर सकें।
  5. मौलिक लोकतन्त्र एक सर्वोच्च आदर्श के रूप में –राय का मानना है कि सभी तानाशाही शासन प्रणालियां (नाजीवाद, फासीवाद) जनता के हितों के शत्रु होते हैं। इनमें व्यक्ति की गरिता का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। प्रैस की स्वतन्त्रता व बोलने की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगा दिए जाते हैं। इससे व्यक्ति की स्वतन्त्रता का दमन होता है और व्यक्ति का सर्वांगीण विकास रूक जाता है। तानाशाही शासन मानव सभ्यता के लिए बहुत खतरनाक होता है। तानाशाही शासन प्रणालियां धर्म व नैतिकता की भी परिभाषाएं बदल देती हैं। इनमें शासन की बागडोर अल्पसंख्यकों के हाथ में होने के कारण बहुसंख्यकों की राय का दमन होता है, जो सच्चे लोकतन्त्र के आदर्श के विपरीत है। इसलिए सभी प्रकार की सैनिक व तानाशाही प्रणालितयों से लोकतन्त्र ही श्रेष्ठ है। यही वह सर्वोच्च आदर्श है जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता व सम्प्रभुता को नष्ट होने से बचा सकता है।
  6. मौलिक लोकतन्त्र में धार्मिक बन्धनों का अभाव है – राय का कहना है कि संसदीय लोकतन्त्र में धर्म की दीवार खड़ी करके लोगों को भाग्य के सहारे जीने के लिए मजबूर किया जाता है। धर्म के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं और साम्प्रदायिकता का जहर भी फैलाया जाता है। इसलिए उन्होंने प्रजातन्त्र में धर्म को कोई स्थान नहीं दिया है। उनका मौलिक लोकतन्त्र धार्मिक व आध्यात्मिक शक्तियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं करता। पूंजीवादी लोकतन्त्र में ही धर्म के आधार पर जनता को भाग्यवादी बनाया जाता है। राय का कहना है कि उनके मौलिक लोकतन्त्र में इस तरह की संस्थाओं का कोई स्थान नहीं हो सकता।
  7. विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था – राय का मानना है कि राजनीतिक सत्ता की तरह आर्थिक सत्ता का केन्द्रीयकरण भी आर्थिक व सामाजिक विषमताओं को जन्मदेता है। राय का कहना है कि आर्थिक स्वतन्त्रता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता का कोई महत्व नहीं है। इसलिए उन्होंने आर्थिक साधनों के रूपान्तरण के लिए विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का सुझाव दिया है। उनकी यह व्यवस्था-नियोजन व सहकारिता पर आधारित होगी। उनका कहना है कि आर्थिक ढांचे को मजबूत बनाने के लिए नियोजन (Planning) का होना बहुत जरूरी है। इसी तरह उत्पादन के साधनों पर थोड़े से व्यक्तियों के स्थान पर सार्वजनिक नियन्त्रण होना चाहिए ताकि पूंजी के केन्द्रीयकरण को रोका जा सके, परन्तु इस सारी प्रक्रिया में व्यक्ति की स्वतन्त्रता का पूरा ध्यान रखना जरूरी होगा ताकि नव मानवतावाद की विचारधारा को व्यावहारिक रूप दिया जा सके और मौलिक लोकतन्त्र की स्थापना हो सके। 

मौलिक लोकतन्त्र का राजनीतिक संगठन

राय के अनुसार उसके मौलिक लोकतन्त्र का संगठनात्मक ढांचा होगा:-
  1. जन समितियां - राय का मानना है कि जनता सभी शक्तियों का स्रोत होती है। जनता की सम्प्रभुता स्थानीय जनसमितियों के माध्यम से अभिव्यक्त की जाएगी। इन समितियों का निर्वाचन व्यस्क मताधिकार के आधार पर बिना लिंग-भेद के किया जाएगा। प्रत्येक 50 मतदाताओं पर एक प्रतिनिधि का निर्वाचन किया जाएगा। उपखण्डीय जन समितियों के, प्रत्येक स्थानीय समिति द्वारा निर्वाचित एक प्रतिनिधि होगा। जिला स्तरीय समिति में प्रत्येक उपखण्डीय समिति द्वारा 5 . 5 प्रतिनिधि भेजे जाएंगे। ये समितियां स्थानीय स्वशासन के कार्यों का निर्वहन करेंगी। ये लोकतन्त्रात्मक शक्ति को प्रभावशाली बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देंगी।
  2. प्रांतीय लोक-परिषद - राय ने अपने मौलिक लोकतन्त्र के संगठनात्मक ढांचे में प्रांतीय शासन के लिए प्रांतीय लोक-परिषद की स्थापना का सुझाव दिया है। इसके सदस्यों का चुनाव व्यस्क मताधिकार के आधार पर 4 वर्ष के लिए जनता द्वारा सीधा किया जाएगा। इसके गर्वनर का चुनाव भी व्यस्क मताधिकार के द्वारा 5 वर्ष के लिए किया जाएगा। इसके पास कार्यपालिका तथा विधायी दोनों प्रकार की शक्तियां होंगी। इसकी शक्तियों का पृथक्करण नहीं किया जाएगा। प्रांतीय परिषद की एक मन्त्रिपरिषद भी होगी और शक्तियों का केन्द्रीयकरण रोकने के लिए स्थायी समितियां भी होंगी। गर्वनर को पद से हटाने के लिए प्रांतीय परिषद के 40: सदस्यों का बहुमत आवश्यक होगा। उसे हटाने का अन्तिम निर्णय जनमत संग्रह द्वारा ही किया जाएगा।
  3. सर्वोच्च जन-परिषद - राय का कहना है कि सरकार के समस्त विधायी और कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य सर्वोच्च जन परिषद द्वारा ही किए जाएंगे। यह परिषद द्विसदनात्मक होगी, जिसके दो सदन-संघीय सभा तथा राज्य सभा होंगे। दोनों के संयुक्त अधिवेशन को ही सर्वोच्च जन-परिषद कहा जाएगा। गर्वनर जरनल सर्वोच्च जन परिषद की बैठकों की अध्यक्षता करेगी व सत्र बुलाएगा। संघीय सभा में संघ की व्यवस्थापन (Legislation) शक्तियां निहित होंगी। इसमें पूरे संघ की जनता के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसका गठन प्रांतों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक प्रान्त समान प्रतिनिधि निर्वाचित करेगा। इसी तरह राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव के लिए व्यावसायिक समूह अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करेंगे जिन्होंने समाज विज्ञान और दर्शन का ज्ञान होगा। इसके अतिरिक्त 3 सिविल सेवकों को भी राज्य सभा में मनोनीत किया जाएगा। गर्वनर जरनल नाममात्र का कार्यपालक अध्यक्ष होगा। इस प्रणाली का प्रमुख दोष यह है कि राय ने गर्वनर जरनल की शक्तियों का स्पष्टीकरण नहीं दिया है। इसी तरह का दोष प्रांतीय गवर्नर के लिए भी है।

संसदीय लोकतन्त्र से मौलिक लोकतन्त्र में परिवर्तन

राय इस बात को भली-भांति जानते थे कि दलीय व्यवस्था को दल-विहीन बनाना आसान काम नहीं है। इसलिए उन्होंने संसदीय लोकतन्त्र को मौलिक लोकतन्त्र में बदलने के लिए संक्रमण काल की व्यवस्था की है। इसके लिए उन्होंने दो व्यवस्थाएं दी हैं-
  1. जनता के लिए शिक्षा – राय का कहना है कि जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे, तब तक उनमें आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान का भाव विकसित नहीं हो सकता। शिक्षित जनता ही अपने अधिकारों के महत्व को समझ सकती है। उनके अनुसार शिक्षा ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करती है। शिक्षा देश व समाज की उन्नति का आधार है। उनके अनुसार शिक्षा का अर्थ है-व्यक्ति की क्षमताओं, विवेक और उत्तरदायित्वों को विकसित करने की क्षमता तथा इनका व्यावहारिक प्रशिक्षण। इस प्रकार राय शिक्षा के द्वारा एक वैचारिक क्रान्ति का सूत्रपात करना चाहते थे ताकि व्यक्ति की गरिमा में वृद्धि हो और प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना स्थान सुनिश्चित कर सके। इस प्रकार राय ने शिक्षा के द्वारा राजनीतिक सत्ता के रूपान्तर के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का भी मार्ग प्रशस्त किया है।
  2. आर्थिक विकेन्द्रीकरण – राय का कहना है कि संसदीय प्रणाली को मौलिक लोकतन्त्र में रूपान्तरित करने का स्वप्न तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आर्थिक शक्तियों या उत्पादन की शक्तियों का विकेन्द्रीकरण न किया जाएगा। इसलिए उन्होंने नियोजित अर्थव्यवस्था तथा सहकारी अर्थव्यवस्था की स्थापना पर बल दिया है। उनका कहना है कि बिना नियोजन के देश का आर्थिक विकास नहीं हो सकता। उत्पादन के विकेन्द्रीकरण के बिना पूंजीवाद को नष्ट नहीं किया जा सकता। इसी तरह सहकारिता की भावना भी आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में मदद करेगी, इसी से नए समाज की रचना होगी, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास होगा और सच्चे लोकतन्त्र की स्थापना होगी। इस प्रकार राय ने अपनी संगठित लोकतन्त्र की अवधारणा में लोकतन्त्र के सच्चे स्वरूप पर व्यापक प्रकाश डाला है। उसने व्यक्ति की स्वतन्त्रता को हर कीमत पर बचाने के लिए दलों को ही समाप्त करने का सुझाव दिया है। इसलिए उसके मौलिक लोकतन्त्र को दल-विहीन लोकतन्त्र भी कहा जाता है। इतना होने के बावजूद भी उनकी मौलिक लोकतन्त्र की अवधारणा की कुछ आलोचनाएं भी हुई हैं।

मौलिक लोकतन्त्र की आलोचना

राय की मौलिक लोकतन्त्र की अवधारणा की प्रमुख आलोचनाएं हैं-
  1. राय ने राजनीतिक स्वतन्त्रता की अपेक्षा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को अधिक महत्व दिया है।
  2. राय ने धर्म की आलोचना करके भारतीय आध्यात्मवाद को गहरी ठोस पहुंचाई है।
  3. राय ने दल-विहीन लोकतन्त्र की कल्पना की है। आधुनिक लोकतन्त्र में दल जनमत को अभिव्यक्त करने वाले महत्वपूर्ण साधन है। यद्यपि दल राजनीतिक भ्रष्टाखर के जनक हैं, फिर भी उनके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता।
  4. राय का सहकारिता का विचार अप्रासांगिक है। सहकारिता में विश्वास रखने वाले लोग बहुत ही कम होते हें। रुस में सहकारिता के होते हुए भी वहां की अर्थव्यवस्था बुरी तरह नष्ट हो गई।
  5. राय ने जन-समितियों को बहुत महत्व दिया है। भारत में गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि समस्याओं के होते हुए जन-समितियों के माध्यम से देश का शासन चलाना एक कठिन कार्य है।
इस प्रकार राय की संगठित प्रजातन्त्र की अवधारणा को अनेक आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है। उनकी दल-विहीन प्रजातन्त्र की धारणा को वास्तविक रूप देना एक असम्भव कार्य है। फिर भी राय ने नियोजित अर्थव्यवस्था का जो विचार दिया है, वह काफी महत्वपूर्ण है। आज विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था के विकास में नियोजन के महत्व से नकारा नहीं जा सकता। उनका व्यक्ति की स्वतन्त्रता का विचार आधुनिक उदारवादी राजनीतिक चिन्तन के लिए एक महत्वपूर्ण देन है।

राय का आलोचनात्मक मूल्यांकन

राय का चिन्तन एक ऐसी व्यवस्था की खोज के प्रति समर्पित आग्रह का परिणाम है, जिसमें व्यक्ति की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए, उसकी भौतिक, नैतिक और आर्थिक उन्नति को सुनिश्चित किया जाए। राय ने अपने लम्बे अनुभवों के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि वर्तमान राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था मानव के समग्र कल्याण का मार्ग निश्चित नहीं करती। उसने अपने राजनीतिक चिन्तन में मानव की स्वतन्त्रता को बनाए रखने व उसमें वृद्धि करने के उद्देश्य से कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की खोज करने का प्रयास किया है। उसने व्यक्ति की गरिमा को नई पहचान देने के लिए अपना नव-मानवतावाद का महत्वपूर्ण सिद्धान्त पेश किया है। इसी कारण वह पूर्ववर्ती तथा समकालीन विचारकों के श्रेष्ठ बन गया है। उनका विश्व-बन्धुत्व का विचार मानव अधिकारों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। उसने संसदीय लोकतन्त्र के दोषों को पहचानकर लोकतन्त्र को एक नया आयाम देने का प्रयास किया है। दल विहीन प्रजातन्त्र के विचार द्वारा उन्होंने राजनीति दलों की नकारात्मक भूमिका के प्रति गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। उसने रूढ़िवादी मार्क्सवाद के जाल से मानव स्वतन्त्रता को बाहर निकालने का प्रयास किया है।

इतना होने के बावजूद भी अनेक विद्वानों ने उनके विचारों की आलोचना की है। डॉ0 विश्वनाथ प्रसाद वर्मा ने उनके चिन्तन का मूल्यांकन करते हुए कहा है कि राय आधुनिक भारत में दर्शन व राजनीतिक लेखकों में सबसे महान थे। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि उसने धर्म के प्रति दुराग्रही होने का ही परिचय दिया है व उसने हिन्दू संस्कृति को ठीक से न समझने की भारी गलती की है। वास्तव में उनका चिन्तन न तो मौलिक है और न गम्भीर। फिर भी अन्य भारतीय चिन्तकों में सबसे अधिक विद्वान विचारक राय ही है। इस प्रकार वर्मा ने भी राय के विचारों के महत्व को स्वीकार किया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राय का स्थान भारतीय राजनीतिक चिन्तन में बहुत महत्वपूर्ण है।

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