मानवेन्द्र नाथ राय का जीवन परिचय

अनुक्रम
एम0एन0 राय का जन्म 6 फरवरी, 1886 को पश्चिमी बंगाल (भारत) के परगना जिले के अरबेलिया गांव में हुआ। उनका बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य था। उनके पिता पंडित दीन बन्धु भट्टाचार्य एक स्कूल अध्यापक थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा भिंगरीपोटा में हुई। वे प्रारम्भ से ही क्रान्तिकारी विचारों के थे और समकालीन क्रान्तिकारियों से प्रेरित थे। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान ही वे ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, बंकिम चन्द्र चटर्जी की ‘आनन्दमठ’, अरविन्द घोष की ‘भवानी मन्दिर’ पुस्तकों का अध्ययन कर चुके थे। उन्होंने वीर सावरकर के बलिदान और संघर्षमय जीवन से प्रेरित होकर यतीन्द्र मुखर्जी का बायां हाथ बनने का प्रयास किया। यतीन्द्र मुखर्जी सशस्त्र क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए कृत संकल्प थे। 1907 में वे प्रथम बार कलकत्ता में राजनैतिक डकैती के अपराध में पकड़े गए और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। यहीं से उनका संघर्षमय जीवन शुरू हुआ और यतीन्द्र के साथ देने के आरोप में वे 1910 . 1915 तक जेल में ही रहे। उनके जीवन पर स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, परमहंस और स्वामी दयानन्द सरस्वती का भी बहुत प्रभाव पड़ा। इन्हीं की प्रेरणा से वे क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी बने।

राय जी का व्यक्तित्व एक लौह पुरुष का व्यक्तित्व था। उन्होंने 1915 में जेल से छूटने के बाद एक भावी क्रान्तिकारी कार्यक्रम की योजना बनाई और एक संयुक्त क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। उन्होंने बाद में एक संगठन का नाम ‘युगान्तर पार्टी’ रखा। अपने क्रान्तिकारी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वे सर्वप्रथम 1915 में चाल्र्स ए0 मार्टिन के नाम से जावा पहुंचे। यहां पर अपने उद्देश्य में असफल रहने के बाद वे फादर मार्टिन के नाम से पेरिस रवाना हुए। इसी दौरान भारत में उसके परम मित्र क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई और अन्य क्रान्तिकारियों को जेल में डाल दिया गया। इससे उसने भारत आने का विचार त्याग दिया और वे सीधे 1916 में सेन फ्रांसिस्को पहुंचे। यहां पर वे अपने जीवन को नया मोड़ देना चाहते थे। इसलिए यहां पर अपनी सम्भावित गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने अपने मित्र के सुझाव पर अपना स्थायी नाम मानवेन्द्र नाथ राय रख लिया। अमेरिका में रहकर वे समाजवादी शक्तियों को संगठित करने लगे। इससे मैक्सिको के समाजवादी आन्दोलन में नया बदलाव आया। यहां पर उन्होंने समाजवादी दल को नेशनल काफ्रेंस के चेयरमैन का पदभार संभाला। अमेरिका में उनकी भेंट अमेरिकी लड़की मिस ऐपलिन हैन्ट से 1916 में हुई और उससे विवाह कर लिया। 1926 में दोनों में विवाह-विच्छेद होने पर उन्होंने दोबारा मिस ऐलेन गोड्सचाक से विवाह कर लिया और इससे उनका सम्पर्क लगभग 20 वर्ष तक रहा।

राय प्रारम्भ से ही एक मार्क्सवादी थे, लेकिन धीरे-धीरे उनके जीवन में बदलाव आता गया और वे आगे जाकर एक कट्टर माक्र्सवादी बन गए। 1919 में वे रुस गए और वहां पर ‘कोमिन्टर्न’ के सम्पर्क में आए। इससे उन्हें भारत में जाकर साम्यवादी दल की स्थापना का विचार किया। 1922 में वे साम्यवादी दल के प्रचार प्रसार हेतु ‘एशियाई बोर्ड’ के सदस्य के रूप में जर्मनी भी गए और यहां पर उनहोंने ‘Vanguard of Indian Independence’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। 1927 में वे चीनी साम्यवादी दल को परामर्श देने हेतु चीन गए। यहां पर उन्होंने साम्यवादियों को सलाह दी कि वे अपनी सामाजिकता की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए कृषक क्रान्ति की योजना शुरू करें। इससे चीन के साम्यवादियों को नई दिशा प्राप्त हुई और चीन में राष्ट्रीय आन्दोलन में वहां के साम्यवादी दल ने माओ के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन राय एक महान राष्ट्रवादी विचारक बने। इसलिए उनकी माक्र्सवाद के प्रति आस्था में कमी आने लगी। माक्र्सवाद की कठोरता से दु:खी होकर राय ने महसूस किया कि माक्र्सवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को कुचलता है। आगे चलकर उसके लेनिन से भी मतभेद हो गए और वह अन्त में 14 वर्ष के लम्बे विदेशी प्रवास के बाद 1930 में डॉ0 महमूद के नाम से बम्बई में पहुंच गया। इस दौरान उनकी दूसरी पत्नी मिस ऐलेन गोड्सचाक भी उनके साथ भारत आ गई। ऐलेन ने जीवनपर्यन्त राय का साथ निभाया। वह समस्त राजनीतिक गतिविधियों में राय का पूरा साथ देने लगी। 1931 में पण्डित जवाहरलाल नेहरू के निमन्त्रण पर वे कराची अधिवेशन में गुप्त रूप से शामिल हुए तो पुलिस द्वारा पहचान लिए गए और उन्हें 6 वर्ष की कैद हो गई। जेल से रिहा होने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन गांधी जी के विचारों से उनके मन में विद्रोह की भावना भड़क उठी और उन्होंने सरेआम गांधी जी की निन्दा करनी शुरू कर दी, उसने महात्मा गांधी को राजनीतिक गतिविधियों को ढोंग कहना शुरू कर दिया। उन्होंने गांधी जी के धर्म के विचार की भी आलोचना की और कहा कि गांधी जी की नीति कभी भारत को स्वतन्त्र नहीं करा सकती। इसी दौरान उन्होंने बम्बई से ‘Independent India’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया और इसके माध्यम से भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। 1939 में गांधी जी की नीतियों से दु:खी होकर उन्होंने भारतीय कांग्रेस के भीतर ही एक ‘League of Radical Congressmen’ की स्थापना की। 1940 में राय ने अपने समर्थकों सहित कांग्रेस छोड़ दी और एक नए दल ‘Radical Democratic Party’ की स्थापना की। इसी दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने पर राय ने कांग्रेस की युद्ध में न शामिल होने सम्बन्धी घोषणा के परिणामस्वरूप घोषणा की कि भारतीयों को इस युद्ध में अंग्रेजों का साथ देना चाहिए ताकि विश्व में लोकतन्त्र विरोधी ताकतों को आगे बढ़ने से रोका जा सके। इसी कारण राय को भारत विरोधी कहा जाने लगा और राय जी उलझन में फंस गए।

1944 में राय ने ‘भारतीय मजदूर संघ’ की स्थापना की ताकि देश के मजदूरों को संगठित किया जा सके। 1946 में उनकी विचारधारा में महान व आधारभूत अन्तर आय और उन्होंने अपने दल ‘Radical Democratic Party’ (RDP) को भंग कर दिया। अब वे अपने नवीन दर्शन को अमली जामा पहनाने में जुट गए जो आगे चलकर नव-मानवतावाद ;त्ंकपबंस भ्नउंदपेउद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब उन्होंनें पूंजीवादी और समाजवादी दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं की आलोचना करनी शुरू कर दी। राय जी ने ऐसे समाजवाद की स्थापना में प्रयास शुरू कर दिए जो व्यक्ति की समानता व स्वतन्त्रता की रक्षा कर सके। उन्होंने दल विहीन प्रजातन्त्र की स्थापना के बारे में सोचना शुरू कर दिया और शेष जीवन ‘भारतीय नव-जागरण संस्था’ की सेवा में अर्पित कर दिया। अपनी लम्बी जीवन यात्रा समाप्त करके वे 25 जनवरी, 1954 को इस संसार से विदा हो गए। यद्यपि वे किसी सुस्पष्ट विचारधारा का प्रतिपादन नहीं कर सके, फिर भी उनका भारतीय राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में नाम अमर हो गया। अपने नव-मानवतावाद सम्बन्धी विचारों के कारण राय आज भी उदारवादी लेखकों के दिलों में जिन्दा है।

मानवेन्द्र नाथ राय की महत्वपूर्ण रचनाएं

राय ने 1922 में लिखना शुरू किया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में जागृति लाने का बेड़ा उठाया। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-

इण्डिया इन ट्रान्जिशन

यह राय की प्रथम रचना है। इसमें राय ने समकालीन भारत की संक्रमणशील समस्याओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने इस पुस्तक में उदारवाद और उग्रवाद दोनों को ही भारतीय समस्याओं का समाधान करने के लिए अयोग्य पाया है। उनका विश्वास था कि देश की प्रगति प्रगतिशील शक्तियों के द्वारा ही हो सकती है। उन्होंने भारतीय श्रमिकों और किसानों के दु:खों का कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दोषों को बताया। उन्होंने कहा कि जब तक श्रमिक वर्ग व किसान वर्ग सुखी नहीं होगा, भारत विकास नहीं कर सकता। इसलिए सबसे प्रथम कार्य श्रमिकों व किसानों की दशा सुधारने का होना चाहिए। उन्होंने इस पुस्तक में तीन विषयों-भारतीय पूंजीपति वर्ग का उदय, कृषक जनता का दरिद्रीकरण तथा नगरीय सर्वहारा की दरिद्रता पर विचार करते हुए कहा कि वृहत उद्योग ही भारत का भविष्य निर्धारित करेंगे। उन्होंने बताया कि भारत में स्वतन्त्रता संग्राम और वर्ग-संघर्ष साथ-साथ चलने के कारण भारत का सामाजिक विकास भी नहीं हुआ है। उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलागए गए आन्दोलनों को भी इस पुस्तक में आलोचना करते हुए महात्मा गांधी को एक ढोंगी व्यक्ति की संज्ञा दी है। उन्होंने इस पुस्तक में निष्कर्ष तौर पर कहा है कि भारत की स्वतन्त्रता का कार्य अनिवार्यत: किसानों और मजदूरों को ही संगठित होकर करना पड़ेगा।

इण्डियाज प्रॉबलम्स एण्ड देयर सॉलूशन

 इस पुस्तक का प्रकाशन भी 1922 के अन्त में हुआ। इस पुस्तक में उन्होंने पूर्णत: माक्र्सवादी विचारक के रूप में गांधीवादी समाजवाद की आलोचना की है। उन्होंने गांधीवादी विचारधारा के विपरीत एक ऐसे क्रान्तिकारी दल का गठन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। जो विद्यमान राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष कर सके। उन्होंने इस पुस्तक में जनता को सामूहिक हड़ताल तथा प्रदर्शन करने का भी आह्वान किया है। उन्होंने सविनय अवज्ञा के स्थान पर ‘जुझारू सामूहिक कार्यवाही’ करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

वन इयर ऑफ नॉन-को-ऑप्रेशन

राय ने इस पुस्तक का प्रकाशन 1923 के किया। इस पुस्तक में उन्होंने गांधी जी को एक ऋषि समझकर उनकी सन्त थॉमस एकवीनास व सार्वारनोला से तुलना की। इस पुस्तक में उन्होंने गांधी जी के चार रचनात्मक कार्यक्रमों की सराहना की। ये कार्यक्रम थे-1. राजनीतिक लक्ष्यों के सामूहिक कार्यवाही का प्रयोग, 2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एकीकरण, 3. अहिंसा का प्रयोग, 4. असहयोग का करों को न चुकाने के लिए प्रयोग। इसके साथ ही साथ राय ने गांधी के दर्शन की कुछ कमियों को भी इस पुस्तक में उजागर किया। उन्होंने कहा कि गांधी जी का कार्यक्रम आर्थिक कार्यक्रम से दूर रहा, उन्होंने राजनीति में धर्म का प्रयोग किया, चरखे का प्रयोग गलत है तथा गांधीवाद दुर्बल और निस्तेज सुधारों का समर्थक है।

दि फ्यूचर ऑफ इण्डियन पॉलिटिक्स

1926 में राय ने अपनी इस पुस्तक की रचना की जिसमें उन्होंने पीपुल्स पार्टी (लोक दल) का महत्व प्रतिपादित किया। राय ने इस पुस्तक की रचना ऐसे समय में की जब स्वराज्य दल अपनी आन्तरिक फूट का शिकार था और गांधी जी राजनीति से लगभग सन्यास लेने ही वाले थे। राय ने इस पुस्तक में विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय राजनीति पर भविष्य में विद्यार्थी, निम्न बुद्धिजीवी, दस्तकार, छोटा व्यापारी, किसान आदि वर्गों के स्वार्थों का प्रभुत्व रहेगा। इसलिए उन्होंने जन समुदाय को राष्ट्रवाद का आधार बनाने पर जोर दिया। उन्होंने एक भारतीय मजदूर दल की स्थापना की आवश्यकता पर भी इस पुस्तक में लिखा, इस पुस्तक में उन्होंने एक ऐसे दल की स्थापना पर बल दिया जिसमें निम्न मध्य वर्ग, किसान तथा सर्वहारा सम्मिलित हों।

इनके अतिरिक्त राय ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं में भी अपने विचार प्रकाशित करवाए और अनेक रचनाएं लिखीं। 1937 में उन्होंने इन्डिपेन्डेंट इण्डिया (Independent India) नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया जिसका नाम 1949 में ‘Radical Humanist’ पड़ा। उनकी अन्य रचनाएं हैं-
  1. मैटीरियलिज्म (Materialism)
  2. रीजन, रोमांटिसिज्म एण्ड रिवोल्यूशन (Reason, Romanticism and Revolution)
  3. न्यू ओरिएंटेशन (New Orientation)
  4. आवर प्राब्लम्स (Our Problems)
  5. बियाण्ड कम्युनिज्म ह्यूमेनिज्म (Beyond Communism to Humanism)
  6. रैडिकल ह्यूमनिस्ट (Radical Humanist)
  7. दी वे टु डयूरेबल पीस (The way to Durable Peace)
  8. न्यू ºयूमनिज्म एण्ड पॉलिटिक्स (New Humanism and Politics)
  9. दि कॉन्सीट्यूशन ऑफ फ्री इण्डिया (The Constitution of Free India)
  10. दि प्रॉब्लम्स ऑफ फ्रीडम (The Problems of Freedom)
  11. नेशनलिज्म एण्ड डेमोक्रेसी (Nationalism and Democracy)
  12. प्लानिंग इन न्यू इण्डिया (Planning in New India)
  13. नेशनल गवर्नमेण्ट एण्ड पीपल्ज गवर्नमण्ट (National Government and People’s Government)
  14. दि हिस्टॉरिकल रोल ऑफ इस्लाम (The Historical role of Islam)
  15. माई एक्सपीरियन्सेज इन चायना (My Experiences in China)
  16. प्लेण्टी एण्ड पॉवर्टी (Plenty and Poverty)
  17. पॉलिक्सि पॉवर एण्ड पार्टीज (Politics, Power and Parties)
  18. रिवोल्यूशन एण्ड काउण्टर रिवोल्यूशन इन चाइना (Revolution and Counter Revolution in China)
इस प्रकार राय ने देश विदेश की राजनीतिक घटनाओं पर अनेक लेख व पुस्तकें लिखीं, जिनमें समकालीन राजनीति का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया गया है। एक भारतीय राजनीतिक विचारक होने के साथ-साथ उन्हें पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त है।

Comments