माओ त्से तुंग के सिद्धांत

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माओ का शक्ति सिद्धान्त

माओ-त्से-तुंग शक्ति के महान उपासक थे, उन्होंने 1911 की यागंशा क्रान्ति में प्रयुक्त शक्ति का व्यावहारिक प्रयेाग अपनी आंखों से देखा था, उसने सामंतवादी व्यवस्था में जमींदारों का निर्धन किसानों पर प्रभुत्व शक्ति के सन्दर्भ में ही परखा और व किसान आन्दोलन को सफल बनाने के लिए शक्ति अर्जन करने में लग गया। उसने शक्ति के बल पर ही 1949 में चीनी गणराज्य की स्थाप्ना च्यांग काई शेक को परास्त करके की। 1966 की सास्कृतिक क्रान्ति को सफल बनाने के लिए उसने अपने लाल सेवकों को शक्ति प्रयोग की खुली छूट दी। अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक माओ शक्ति के ही पुजारी रहे।

माओ का मानना था कि मनुष्यों को शक्ति के प्रयोग से ही बदला जा सकता है और सामाजिक परिवर्तन का आधार शक्ति ही है। इसलिए उसने साम्यवादियों को अधिक से अधिक शक्ति अर्जित करने की सलाह दी ताकि चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना हो सके। उसने कहा है-’’राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से उत्पन्न होती है, इसलिए उसे सैनिक शक्ति से पृथक नहीं किया जा सकता।’’ अर्थात् सैनिक शक्ति व राजनीतिक शक्ति में गहरा संबंध होता है। माओ का मानना था कि विचारों से समाज का निर्माण होता है, न कि आर्थिक परिस्थितियों से। विचारों के बाद सैनिक शक्ति का महत्व है। सैनिक शक्ति से प्रत्येक वस्तु प्राप्त की जा सकती है। उसने लिखा है-‘Everything can be won by the gun’। इसलिए उसने साम्यवाद की स्थापना और सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के लिए सैनिक शक्ति को अति आवश्यक बताया है। उसने स्वयं चीनी साम्यवादी क्रान्ति का संचालन करने में क्रान्तिकारी सशस्त्र सेना का प्रयोग किया था और उन्हें गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षिण दिया था। क्रान्ति की सफलता के बाद उसने शक्ति के बल पर ही चीन का राजनीतिक नेतृत्व संभाला और एक विशाल सेना का निर्माण किया। उसने साम्यवाद विरोधी ताकतों को शक्ति के बल पर ही कुचला और अपनी सांस्कृतिक क्रान्ति को सफल बनाया। इसी शक्ति सिद्धान्त से प्रेरित होकर चीन निरन्तर अपनी सैनिक शक्ति बढ़ा रहा है।

युद्ध का सिद्धान्त

माओ युद्ध का समर्थक है। वह युद्ध और शक्ति प्रयोग को अनिवार्य मानता है। उसका कहना है कि वर्गयुक्त समाज के जन्म से ही विकास की एक निश्चित दशा में वर्गों, राष्ट्रों, राज्यों अथवा राजनीतिक समूहों में विरोधों के समाधान के लिए युद्ध संघर्ष का सबसे उच्चतम रूप रहा है। उसका यह मानना है कि जिस प्रकार राष्ट्रीय क्षेत्र में समाजवाद की स्थापना के लिए हिंसात्मक क्रान्ति की निरन्तरता आवश्यक है, उसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी साम्यवाद के प्रसार के लिए युद्ध अनिवार्य है। माओ ने ऐतिहासिक आधार पर युद्ध को वैध ठहराया है। उसने कहा है कि ‘‘इतिहास में दो प्रकार के युद्धों-क्रान्तिकारी व क्रान्ति विरोधी युद्धों का वर्णन मिलता है। हम पहले के समर्थक व दूसरे के विरोधी हैं। केवल क्रान्तिकारी युद्ध ही पवित्र है। हम पवित्र राष्ट्रीय क्रान्तिकारी युद्धों के तथा पवित्र वर्ग-विनाशक युद्धों के समर्थक हैं।’’ माओ का मानना है कि युद्ध चीन के हित में है। युद्ध साम्राज्यवादी व पूंजीवादी ताकतों का विनाश करता है। प्रथम विश्व-युद्ध ने रुसी क्रान्ति की भूमिका निर्माण किया और द्वितीय विश्वयुद्ध ने चीन की क्रान्ति का आधार तैयार किया। तीसरा विश्वयुद्ध विश्व में साम्यवाद की स्थापना करेगा और पूंजीवाद को नष्ट कर देगा। प्रथम दो विश्व युद्धों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद को पंगु बना दिया है। पाश्चात्य देश कागजी शेर (Paper Tiger) मात्र रह गए हैं। विश्व में साम्यवाद का विकास हो रहा है। इसलिए चीन को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और तीसरे विश्व युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। साम्यवादियों को पूंजीवादी देशों में युद्ध भड़काने का प्रयास करना चाहिए ताकि तीसरे विश्व युद्ध के बाद पूरे विश्व में साम्यवाद की स्थापना हो सके। तीसरा विश्व युद्ध चीन के लिए एक वरदान होगा। माओ ने युद्ध के चीन पर प्रभाव के बारे में कहा है कि ‘‘चीन की विशाल जनसंख्या महान अणु शक्ति के प्रयोग के बाद भी कुछ न कुछ अवश्य बचेगी जो विश्व में साम्यवाद का प्रसार करेगी।’’ युद्ध तकनीक में माओ ने युद्ध की गुरिल्ला प्रणाली या छापामार युद्ध का समर्थन किया है। उसने कहा है-’’जब शत्रु आगे बढ़ता है, हम पीछे हटता है। जब शत्रु इधर-उधर घिरता है, हम लड़ते हैं। जब शत्रु थक जाता है, हम लड़ते हैं, और जब शत्रु पीछे हटता है, हम पीछा करते हैं।’’ माओ की यह तकनीक 1946 में चीन में गृहयुद्ध में च्यांग काई शेक की शक्तिशाली सेना का सामना करने में बहुत काम आई। माओ व उसके समर्थक साम्यवादियों ने च्यांग काई शेक की सेनाओं को बुरी तरह परास्त करके चीन के शासन पर कब्जा किया और शासन संचालन किया।

आज चीन विश्व की एक महान सैनिक शक्ति बन चुका है। 1962 के भारत पर चीनी आक्रमण से चीन को भारत का काफी बड़ा भू-भाग प्राप्त हुआ है। चीन को निरन्तर यह विश्वास है कि युद्ध उसके हित में ही रहेगा। चीन के पास अणु बम्ब है। वह नि:शस्त्रीकरण के किसी भी कार्यक्रम का विरोध करता है। माओ के बाद चीन में स्थापित प्रत्येक सरकार माओ के शक्ति सिद्धान्त व युद्ध को अनिवार्य मानती रही है। युद्ध-प्रेम प्रत्येक चीनी को स्वभाव का आवश्यक अंग बन चुका है, निरन्तर परमाणु अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण पर जोर देकर चीन अपना प्रभुत्व विश्व राजनीति में बढ़ा रहा है। आज चीन की युद्ध प्रेमी भावना को चुनौती देने का साहस कोई देश नहीं कर सकता। अत: युद्ध-प्रेम चीनी समाज का एक आवश्यक अंग बन चुका है। यह सब माओवाद का ही प्रभाव है।

क्रान्ति का सिद्धान्त

माओ के क्रान्ति सिद्धान्त का आधार मार्क्सवाद-लेनिनवाद है। माओ ने सशस्त्र क्रान्ति को उतना ही महत्व दिया है, जो मार्क्स या लेनिन के समय में था, उसने क्रान्ति के सिद्धान्त को नया व व्यावहारिक रूप देकर एक महान कार्य किया है। उसने क्रान्ति के दो पक्षों-राष्ट्रवादी क्रान्ति जो साम्राज्यवादी शक्तियों के विरूद्ध थी तथा लोकतान्त्रिक क्रान्ति जो सामन्तादी जमींदारों के विरूद्ध थी, को मिलाकर एक किया है। माओ का मानना था कि ये दोनों क्रान्तियां एक-दूसरे पर निर्भर है। उसने लिखा है-’’साम्राज्यवाद को जब तक उखाड़कर फेंक नही दिया जाता, सामन्तवादी जमींदारों के अत्याचारों का अन्त भी संभव नहीं है। इसी तरह साम्राज्यवादी शासन का अन्त करने के लिए शक्तिशाली सैनिक टुकड़ियों का गठन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक किसानों को सामन्तवादी-जमींदार वर्ग से संघर्ष के लिए तैयार नहीं कर लिया जाता।’’ इस तरह माओ ने दोनों क्रान्तियों को मिलाकर अपना जनवादी क्रान्ति (People’s Revolution) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। माओ ने जनशक्ति को क्रान्ति का आधार माना और कहा-’’युद्ध में हथियारों का अपना महत्व है पर वे निर्णायक नहीं है। निर्णय मनुष्यों द्वारा किया जाता है, जड़ वस्तुओं द्वारा नहीं।’’ माओ ने कृषक वर्ग को अपनी क्रान्ति का सूत्रधार नहीं माना था। माओ ने किसानों को संगठित करके अपना क्रान्तिकारी राजनीतिक संगठन खड़ा किया। माओ ने क्रान्ति द्वारा गृहयुद्ध भड़का कर सत्ता पर कब्जा करने का मार्ग अपनाने पर जोर दिया और इसमें सर्वहारा वर्ग की भूमिका को महत्व दिया।

माओ का मानना था कि देहात ही क्रान्तिकारी संधर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उसका विश्वास था कि शहरों को देहात द्वारा ही घेरा जा सकता है, जहां पर साम्यवाद विरोधी ताकतों का कब्जा है। माओ ने कृषक क्रान्तिकारियों को छापामार युद्ध का प्रशिक्षण देने की योजना बनाई। उसने जमींदारों के अत्याचारों से किसानों को मुक्ति दिलाई और शहरों की तरफ प्रस्थान किया। इस तरह माओ ने क्रान्ति के दोहरे उद्देश्य एक साथ प्राप्त किए। ग्रामीण क्षेत्रों को सामन्तवाद से मुक्त कराकर साम्यवाद की स्थापना के लिए शहरों की तरफ बढ़ना माओ की क्रान्ति की विशिष्ट तकनीक थी। माओ ने चीनी परिस्थितियों के अनुसार क्रान्ति को एक शाश्वत् प्रक्रिया बनाया और सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति तक ही इसे सीमित न करके अन्य वर्गों का सहयोग प्राप्त किया। उसने क्रान्ति के लिए चार वर्गों-कृषक, श्रमिक, छोटे बुर्जुआ वर्ग तथा राष्ट्रीय पूंजीपति को चुना। राष्ट्रीय पूंजीपतियों से उसका अभिप्राय ऐसे पूंजीपति वर्ग से था जो समाजवादी क्रान्ति के प्रति सहानुभूति रखते थे। इन वर्गों में माओ ने सर्वाधिक महत्व किसान वर्ग को ही दिया। उसका कहना था कि-’’निर्धन कृषकों का नेतृत्व अत्यधिक आवश्यक है। बिना निर्धन किसानों के कोई क्रान्ति नहीं हो सकती है। उनका अपमान क्रान्ति का अपमान है। उन पर प्रहार क्रान्ति पर प्रहार है।’’ माओ की दृष्टि में सर्वहारा वर्ग में किसान वर्ग भी शामिल हैं। यह सर्वहारा वर्ग ही क्रान्ति की संचालक शक्ति है।

माओ ने जन साधारण को महत्व देकर जनवादी होने का परिचय दिया है। माओ ने जनवादी क्रान्ति के आधार पर ही आगे चलकर चीन की कृषि प्रणाली में कई सुधार किए और क्रान्ति विरोधियों के विरूद्ध एक व्यापक आन्दोलन चलाया। उसने 1949 में किसान वर्ग व अन्य सर्वहारा वर्गों को शामिल करके चीनी जनवादी सरकार की स्थापना की। यदि चीन के इतिहास का अध्ययन किया जाए तो आर्थिक पुनर्निर्माण का कार्य जनसाधारण द्वारा ही किया गया है।

सांस्कृतिक क्रान्ति

1958 के ‘छलांग मारकर आगे बढ़ने’ के आन्दोलन की असफलता के बाद माओ ने ‘सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। माओ ने इस बात पर जोर दिया कि मार्क्सवाद की विजय या चीन में साम्यवाद को मजबूत बनाने के लिए वैचारिक और भावनात्मक क्रान्ति की आवश्यकता है। विश्व में माओवाद की सफलता के लिए सभी माओवादियों में सांस्कृतिक एकता का होना जरूरी है। माओ का विश्वास था कि साम्यवादी क्रान्ति एक लम्बा संघर्ष है, जिसमें आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ सांस्कृतिक परिवर्तन भी आवश्यक है। माओ ने कहा कि ‘‘इसमें कोई शक नहीं है कि आर्थिक परिणाम प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं, लेकिन साम्यवाद को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने के लिए क्रान्ति का स्वरूप बहुमुखी होना भी आवश्यक है।

1966 से 1976 तक का दशक आधुनिक चीन के इतिहास में सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का समय है। 1966 में चीनी समाजवादी समाज में मानसिक व शारीरिक श्रम में जो टकराव था, उसे दूर करने के लिए माओ ने सांस्कृतिक क्रान्ति का कार्यक्रम चलाया। माओ ने सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा दल के महत्व को कम करे जनता के महत्व को बढ़ाने का प्रयास किया। उसका विश्वास था कि जन सहयोग के बिना कोई भी सामाजिक कल्याण का कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता और न ही राजसत्ता में स्थायित्व कायम रह सकता है। माओ ने इस क्रान्ति द्वारा लाल-स्वयं-सेवकों को महत्व देकर दल का महत्व कम किया। उसने चीन की राष्ट्रीय सेना में नए क्रान्तिकारी नवयुवकों व राज्य के पुराने वफादार कार्यकर्त्ताओं को मिलाकर विभिन्न नगरों व जिलों में क्रान्तिकारी समितियां गठित की और दल की सारी शक्तियां इनके हाथों में सौंप दी। इस तरह माओ ने जनता के नेतृत्व के नाम पर अपनी शासकीय पकड़ मजबूत की।

माओ ने पढ़े-लिखे नवयुवकों को गांवों में भेजने का प्रबन्ध किया ताकि वे ग्रामीणों को नए ज्ञान की शिक्षा दे। इस तरह माओ ने शहरों और गांवों के अन्तर को मिटाने का प्रयास किया, इस तरह के प्रयास मार्क्सवाद-लेनिनवादियों ने कभी नहीं किए। इस तरह सांस्कृतिक क्रान्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि औद्योगिक क्रान्ति। क्योंकि उसने ज्ञान की नई प्रणाली का सृजन करके जनसाधारण को औद्योगिकरण की मूल्यवता का अनुभव कराया। समाजवादी आन्दोलन के इतिहास में ऐसा प्रयास पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए माओ का सांस्कृतिक आन्दोलन चीनी समाज को विकसित करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम था। इस क्रान्ति का लक्ष्य केवल सत्ता को मजबूत बनाना ही नहीं था, बल्कि समाज में मूल परिवर्तन लाना था ताकि सर्वहारा वर्ग में राजनीतिक चेतना उत्पन्न हो सके।

नवीन लोकतन्त्र की अवधारणा

माओ ने अपनी पुस्तक ‘New Democracy’ में नवीन लोकतन्त्र की अवधारणा का प्रतिपादन किया है। माओ ने कहा है कि साम्यवाद की स्थापना एकदम सम्भव नहीं है। उसकी समुचित तैयारी के लिए एक संक्रमणशील दशा का आना जरूरी है। यह संक्रमणशील दशा ही नवीन लोकतन्त्र है। माओ ने एक ऐसे राज्य की कल्पना की है जिसमें अनेक लोकतांत्रिक वर्ग मिल-जुल काम करेंगे। इसमें मजदूर वर्ग, किसान वर्ग, लघु-पूंजीपति व राष्ट्रीय पूंजीपति (जो समाजवाद में विश्वास रखते हों) शामिल होंगे। देश में एक संयुक्त सरकार का निर्माण किया जाएगा और समाज के आन्तरिक विरोधों को अपेक्षाकृत निर्विरोध ढंग से हल किया जाएगा। माओ का मत है कि यह दशा काफी देर तक चलने वाली होगी। इसमें पूंजीवाद व समाजवाद दोनों का सम्मिश्रण होगा। इसमें दोनों व्यवस्थाओं के अच्छे गुणों को स्थान देकर नया रूप दान किया जाएगा ताकि साम्यवाद का अन्तिम लक्ष्य आसानी से प्राप्त हो सके। नवीन लोकतन्त्र अर्थात् यह व्यवस्था पूंजीवाद को प्रोत्साहित करेगी, साम्यवाद के न्यूनतम कार्यक्रम संचालित करेगी और इसका लक्ष्य भविष्य में अधिक से अधिक साम्यवादी कार्यक्रम संचालित करना होगा। इसमें नए समाजवादी राज्य की स्थापना के लिए दूसरी अवस्था पूरी होने तक बुर्जुआ पूंजीवाद से समझौता करना पड़ेगा। इस दशा में साम्यवादी दल के नेतृत्व में सभी क्रान्तिकारी दलों की संयुक्त सरकार बनेगी और इसकी अर्थव्यवस्था में सरकारी एवं निजी दोनों उद्योगों वाली मिश्रत अर्थव्यवस्था का महत्व होगा।

इस प्रकार माओ ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के विपरीत संयुक्त अधिनायकवाद पर जोर दिया है। उसका विश्वास था कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही और एकदलीय व्यवस्था से चीन की आवश्यकताएं कभी पूरी नहीं हो सकती। इसलिए उसने अपना नवीन लोकतन्त्र का सिद्धान्त प्रस्तुत उसमें सभी समाजवादी विचारधारा वाले वर्गों को उचित स्थान देकर नवीन लोकतन्त्र की स्थापना की बात कही है। माओ ने 1949 में बनने वाली जनवादी सरकार में सभी समाजवादी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया था। चीन में आज भी साम्यवादी विचारधारा वाले प्रत्येक वर्ग को उचित स्थान दिया जाता है।

लोकतन्त्रीय अधिनायकवाद

माओ ने अपने ‘नवीन लोकतन्त्र‘ में लोकतन्त्रात्मक अधिनायकवाद को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। माओ ने ‘कम्यूनिस्ट घोषणा पत्र‘ के इस वाक्य पर विश्वास किया है कि राज्य एक वर्ग विशेष द्वारा दूसरे वर्ग पर शासन करने का साधन है, इसएि राज्य का यह कर्त्तव्य है कि वह जनता के, विशेषत: मजदूर वर्ग के हितों के विरोधी तत्वों को कुचल दें। इस दृष्टि से माओ ने मार्क्सवाद का अनुसरण करते हुए अपने नवीन लोकतन्त्र में लोकतन्त्रीय अधिनायकवाद को उचित महत्व दिया है। माओ का मानना था कि जनता के हितों के विरोधी तत्वों को कुचलना कोई अन्याय नहीं है। इसलिए माओ ने 1966 में ‘सांस्कृतिक क्रान्ति’ द्वारा समस्त साम्यवाद विरोधी तत्वों को कुचल डाला था। माओ का नवीन लोकतन्त्र, लोकतन्त्रीय इसलिए है कि यह जनता के हितों के लिए शासन करता है। इसका उद्देश्य सर्वजन साधारण को शासन व नीतियों का लाभ पहुंचाना है। यह अधिनायकवादी इसलिए है कि यह जनहित के विरोधी व साम्यवाद विरोधी तत्वों को शक्ति से कुचलने का प्रयोग करता है। इस तरह माओ का नवीन लोकतन्त्र क्रान्तिकारी साम्यवादियों के लिए तो लोकतन्त्र है और क्रान्ति विरोधियों के लिए अधिनायवाद है।

माओ ने क्रान्ति विरोधियों का दमन करने के लिए शक्ति का प्रयोग करने पर बल दिया है। वह उदारवाद और सहअस्तित्व जैसे शब्दों से घृणा करता है। उसके दर्शन में गैर-साम्यवादियों के लिए कोई स्थान नहीं है। उसने कहा है-’’क्रान्ति विरोधी व प्रतिक्रियावादियों को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती, यह अभिव्यक्ति केवल जनता को ही दी जा सकती है।’’ इससे स्पष्ट है कि माओ का अधिनायकवाद एकदलीय अधिनायकवाद नहीं है। यह देश में गैर-साम्यवादी दलों जिनका माओवाद में विश्वास है, उनके साथ सरकार बनाने का भी पक्षधर है। माओ उन सभी गैर-साम्यवादी दलों को साथ लेकर चलता है, जो उसके निर्बाध नेतृत्व में विश्वास करते हैं और स्वेच्छा से चीनी साम्यवादी दल के साथ सहयोग करना चाहते हैं।

इससे स्पष्ट तौर पर यह कहा जा सकता है कि माओ का अधिनायकवाद जनता के लिए है। वह सभी गैर-साम्यवादी विचारधारा वाले व्यक्तियों को भी, जो उसके सिद्धान्तों में विश्वास करते हैं, साथ लेकर चलने को तैयार हैं। उसका नवीन लोकतन्त्र तो जनता के हितों के लिए ही अधिनायकवाद हो सकता है। लेकिन यदि वास्तव में देखा जाए तो माओ ने शक्ति जैसे शब्दों की उपेक्षा की है, जो समाज के हित में नहीं हो सकती। फिर भी माओ ने चीन के लिए जो कुछ किया, वह औचित्यपूर्ण ही माना जा सकता है। यदि माओ साम्यवाद विरोधियों को न कुचलता अर्थात् लोकतन्त्रीय अधिनायकवाद स्थापित न करता तो आज चीनी समाज का नक्शा कोई और ही होता।

लोकतन्त्रीय केन्द्रीयवाद

माओ ने अपने नवीन लोकतन्त्र में इस बात पर जोर दिया है कि लोकतन्त्र की स्वतन्त्रता का प्रयोग क्रान्ति विरोधी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए न कर सकें, इस बात का भी समुचित प्रबन्ध किया जाएगा। उसने लिखा है-’’स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र का लाभ उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाएगा जो जनता के नवीन लोकतन्त्र के समर्थक व प्रबल पोषक होंगे।’’ माओ ने इसके लिए केन्द्रीय सत्ता के नियन्त्रण द्वारा सफल बनाने की व्यवस्था की है। यही बात लोकतन्त्रीय केन्द्रीयवाद की प्रमुख विशेषता है। इस प्रकार की व्यवस्था में सभी प्रांतीय व स्थानीय साम्यवादी दल की इकाईयां केन्द्रीय सत्ता के अधीन कार्य करेंगी। उन्हें अपने निर्णयों की पुष्टि केन्द्रीय सत्ता से करानी होगी। यही लोकतन्त्रीय केन्द्रीयवाद का आधार है। इस सिद्धान्त के आधार पर माओ ने साम्यवादी दल का लोकतंत्रीकरण किया है। उसने मार्क्सवाद के कठोर नियन्त्रण के विरूद्ध जनतांत्रिक विचारक होने का ही परिचय दिया है। इसके बावजूद भी माओ का साम्यवादी दल पर पूरा नियन्त्रण कायम रहा। अपने जीवन के अन्त तक उसने लोकतन्त्रीय केन्द्रीयवाद के सिद्धान्त का विकास किया।

क्रान्तिकारी वर्गों के संयुक्त अधिनायकवाद का सिद्धान्त

माओ का विचार था कि चीन में उद्योग धन्धों का जब तक पूरा विकास नहीं होगा, तब तक वहां मजदूरों की अधिनायकता स्थापित करना असम्भव है। इस संक्रमणकालीन दशा में सर्वहारा मजदूर वर्ग इस क्रान्ति को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अन्य समाजवादी विचारधारा वाले दलों का सहयोग प्राप्त कर सकता है। माओ ने इन वर्गों में मजदूर, किसान, दुकानदार तथा छोटे पूंजीपति तथा राष्ट्रीय पूंजीपति (जो समाजवाद में विश्वास रखते हैं) को शामिल किया है। माओ ने कहा है कि ये चारों वर्ग साम्यवादी दल के नेतृत्व के कार्य करेंगे। इसमें कृषक वर्ग का योगदान सबसे अधिक हो सकता है। क्योंकि कृषक ग्रामीण क्षेत्रों मे क्रान्तिकारी अड्डे स्थापित कर सकते हैं और शहरों की तरफ कूच करके उद्योगों पर धीरे-धीरे अपना नियन्त्रण स्थापित कर सकते हैं। सामन्तवाद के विरोधी होने के कारण कृषक वर्ग की भूमिका क्रान्ति में अधिक हो सकती है। इसी तरह अन्य समाजवादी वर्ग भी संयुक्त अधिनायतन्त्र की स्थापना में अपना योगदान देकर क्रान्ति के लक्ष्यों को स्थाई रूप से प्राप्त कर सकते हैं। जब सर्वहारा वर्ग उद्योगों को पूरी तरह अपने नियन्त्रण में ले लेगा, तब संयुक्त अधिनायकतन्त्र धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा और चीन में सर्वहारा वर्ग का ही शासन होगा।

माओ ने 1949 में जनवादी क्रान्ति के सफल होने के बाद चीन में विभिन्न वर्गों को मिलाकर जनवादी सरकार बनाई थी। उस सरकार ने धीरे-धीरे चीन की अर्थव्यवस्था व कृषि के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए और धीरे-धीरे बड़े पैमाने के उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करके जनहित को बढ़ावा दिया। इससे जनता का शोषण रूक गया और चीनी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई।

लम्बी छलांगों का सिद्धान्त

माओ ने 1958 तक कम्युनिस्ट पार्टी के अन्तर्गत काफी शक्ति अर्जित कर ली थी। उसने देश के विकास के लिए अनेक कार्य किए। उसने लम्बी छलांगों का सिद्धान्त प्रतिपादित करके तेज गति से औद्योगिक विकास करने की विचारधारा जनता के सामने पेश की। उसने एक साथ लघु मध्यम व विशाल उद्योगों को विकास करने का आº्वान किया। उसने स्वदेशी व आधुनिक तकनीक पर जोर दिया। उसने लम्बी छलांगों के सिद्धान्त का प्रमुख उद्देश्य त्वरित औद्योगिक विकास करना था। माओ का मानना था कि प्रौद्योगिक दृष्टि से अल्प विकास के बावजूद भी चीनी समाज कम्यूनों के माध्यम से समाजवाद के अन्तिम साम्यवादी चरण में द्रुत गति से प्रवेश करेगा। उसने आर्थिक नियोजन पर बल दिया और जनता की उत्पादक शक्ति में वृद्धि करने की महत्वपूर्ण योजनाएं बनाई ताकि लम्बी छलांग के कार्यक्रम को सफलता प्राप्त हो सके। माओ ने कहा है-’’समाजवाद से साम्यवाद के संक्रमणकाल में हमें अपनी प्रगति समाजवाद के चरण पर ही नहीं रोक देनी चाहिए बल्कि साम्यवाद के अन्तिम लक्ष्य तक जारी रखनी चाहिए।’’ उसने तीन वर्ष के कठोर परिश्रम द्वारा हजार वर्ष का सुख प्राप्त करने पर बल दिया। लेकिन 1959 . 61 में चीन भयानक अकाल, बाढ़ों, व महामारियों की भरमार हो गई। और माओ का लम्बी छलांग मारकर आगे बढ़ने का स्वप्न टूट गया। डाली एल यांग ने कहा है-’’माओ-त्से-तुंग की लम्बी छलांग दुर्भिक्ष की छलांग बन गई।’’

इस प्रकार कहा जा सकता है कि माओ का लम्बी छलांगें मारकर आगे बढ़ने का कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण था। उस समय की आर्थिक रिपोर्टों से पता चलता है कि चीन में लोहा व इस्पात में आश्चर्यजनक प्रगति हुई। इस आन्दोलन को लोहे व इस्पात की लड़ाई कहा गया। जनता ने अपने घरों के पिछवाड़े में ही इस्पात भट्ठियां लगा दी। लेकिन माओ के इस कार्यक्रम को प्राकृतिक प्रकोपों ने धराशायी कर दिया। उसका प्रमुख औद्योगिक देश ब्रिटेन से आगे निकलने का स्वप्न अधूरा रह गया।

व्यक्ति-पूजा का सिद्धान्त

माओ व्यक्ति-पूजा के सिद्धान्त का प्रतिष्ठापक है। उसने एक तरफ तो सैकड़ों फूलों को एक साथ खिलने की बात कही, दूसरी तरफ लोकतन्त्रीय केन्द्रीयवाद, सर्वहारा वर्ग की तानाशही आदि सिद्धान्तों के नाम पर साम्यवादी पार्टी में अपना पूर्ण नियन्त्रण व प्रभाव स्थापित किया। उसने चीन के शासन पर अपना प्रभुत्व इस प्रकार स्थापित किया कि वह चीन का आराध्य देवता बन गया। 1966 की सांस्कृतिक क्रान्ति की सफलता ने माओ को चीनी जनता का सिरोताज बना दिया। उसको घर-घर आराध्य देव मानकर पूजा होने लगी। उसका एक-एक शब्द वेद वाक्य माना जाने लगा। माओ गीता का घर-घर पाठ होने लगा। माओ की शिक्षाओं ने तीनों समाज के राजा और ईश्वर दोनों को भूला दिया। समाज में हर छोटा-बड़ा व्यक्ति माओ के रंग में रंग गया। सांस्कृतिक क्रान्ति ने साम्यवादी दल का महत्व कम करके माओ का महत्व बढ़ा दिया। माओ की निम्न शिक्षाओं-I. युद्ध में मनुष्य और शस्त्र की तुलना में मनुष्य का अधिक महतव है क्योंकि युद्ध के निर्णायक मनुष्य हैं, शस्त्र नहीं। II. सेना में राजनीति को अन्य सैनिक कार्यों की तुलना में प्राथमिकता देनी चाहिए। III. माओवाद ही सही राजनीति व अर्थशास्त्र है, इसलिए इसे ही प्राथमिकता देनी चाहिए। IV. माओवाद ही सच्चा आदर्श है। टण् जीवन में व्यावहारिक ज्ञान को सैद्धान्तिक ज्ञान की तुलना में प्राथमिकता देनी चाहिए। आदि को सभी चीनियों ने मानना शुरू कर दिया। प्रत्येक व्यक्ति ने माओ के विचारों को श्रेय देना शुरू कर दिया। इस तरह माओ ने चीन में व्यक्ति-पूजा के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया। अत: माओ आज भी चीनियों के आराध्य देव हैं। उनकी गीता का आज भी प्रतिदिन घर-घर में पाठ होता है।

विचार स्वतन्त्रता का सिद्धान्त

माओ ने 1957 में जनता को स्वतन्त्र चिन्तन एवं आलोचना करने का अधिकार देने की दृष्टि से एक बड़ी ही आकर्षक नारा दिया। उसने कहा कि, ‘‘सैकड़ों फूलों को एक साथ खिलने दो और सैकड़ों विचारधाराओं को जुझने दो।’’ (Let a hundred flowers boom together and let a hundred schools of thought contend)। माओ ने विचार स्वतन्त्रता को महत्व देकर साम्यवाद की कमियों का पता लगाने का प्रयास किया। उसने बुद्धिजीवियों और उदारवादियों का सहयोग प्रापत करने के लिए यह नारा दिया। लेकिन उसने क्रान्ति विरोधी तत्वों, सामन्तवादियों, पूंजीवादियों और प्रतिक्रियावादियों से यह हम छीन लिया कि वे अपने स्वतन्त्र विचार रख सकें। माओ ने कहा है-’’अपने से विरोधी विचारधारा रखने वालों को विचारों की स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती।’’ इस दृष्टि में माओ का यह नारा भेदभावपूर्ण है। यह वर्ग-विशेष के हितों का ही पोषक है। इससे वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा मिलता है और समाज में सामाजिक विभाजन की दरार और अधिक गहरी होती है।

साम्राज्यवाद का सिद्धान्त

माओ का साम्राज्यवाद का सिद्धान्त समस्त विश्व को दो भागों में बांटता है। उसका कहना है कि एक और तो साम्राज्यवादियों-अमेरिका व उसके साथी देशों का शिविर है और दूसरी तरफ साम्राज्यवाद विरोधी देश-रुस, चीन व पूर्वी यूरोप के देश हैं। इन दोनों गुटों से पृथक देशों का इस व्यवस्था में कोई महत्व नही है। इस व्यवस्था में चीन और रुस का साथ नहीं देने वाले देश पागल कुत्ते (Raving Dogs), भाड़े के टट्टू (Hirelings) तथा साम्राज्यवादी हैं। माओ ने लिखा है-’’तटस्थता धोखे की टही है और तीसरे गुट का कोई औचित्य नहीं है।’’ इसका स्पष्ट संकेत भारत की गुटनिरपेक्ष नीति की तरफ था। माओ का साम्राज्यवाद का सिद्धान्त संकीर्ण राष्ट्रवाद की परिधि से घिरा हुआ है। रुस से मतभेद होने के बाद स्वयं चीन ने रुस की साम्राज्यवाद का पोषक कहना शुरू कर दिया था। माओ ने कहा है कि आज विश्व में प्रमुख विरोध विश्व की जनता जिसमें चीनी जनता शामिल है, और साम्राज्यवाद के बीच में है।

माओ का साम्राज्यवाद का सिद्धान्त संकीर्ण स्वार्थों पर आधारित है। माओ युद्ध में विश्वास व्यक्त करके स्वयं साम्राज्यवाद का पोषक है। दूसरी तरफ वह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का साम्राज्यवादी कहता है।

अन्तर्विरोध का सिद्धान्त

माओ ने अन्तर्विरोध के नियम के रूप में द्वन्द्वात्मक पद्धति की नई व्याख्या देने का प्रयास किया है। माओ का कहना है कि सही नीति का निर्माण गलत नीति के साथ संघर्ष करके ही होता है। अत: विरोध और संघर्ष समस्त ऐतिहासिक परिवर्तन के लिए अनिवार्य है। माओ ने अपनी पुस्तक ‘On Contradictions’ में दर्शाया है कि सामाजवाद या साम्यवाद की स्थापना होने के बाद भी यह नियम समाप्त नहीं होता। क्रान्ति अन्तिम समाधान नहीं है, बल्कि प्रगति का एक चरण हैं अन्त:र्विरोध शाश्वत् है। एक अन्तर्विरोध दूसरे को जन्म देता है, जब पुराने अन्तर्विरोध सुलझ जाते हैं, तो नए अन्तर्विरोध जन्म ले लेते हैं। किसी वस्तु के विकास का काल उसके बाहर नहीं, बल्कि उसके अन्दर ही होता है। प्रत्येक वस्तु में आंतरिक अन्तर्विरोध होते है। इसी कारण से वह वस्तु गतिमान और विकासमान होती है।

माओ ने कहा है कि अन्तर्विरोध का नियम सभी सामाजिक विन्यासों (Social Formation), वर्गों, व्यक्तियों व साम्यवादी दल पर भी लागू होता है। यह नियम सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता संभालने पर भी लागू रहेगा, केवल इसका रूप बदल जाएगा। मनुष्य अन्तर्विरोधों को समाप्त नहीं कर सकता, वह इनका केवल रूप व दिशा बदल सकता है। इस तरह माओ ने मार्क्स के वर्ग-विहीन समाज की स्थापना में अन्तर्विरोध समाप्त होने की बात का खण्डन करके अन्तर्विरोध या द्वन्द्ववाद को शाश्वत् प्रक्रिया माना है। इस प्रक्रिया में एक वस्तु के दूसरी वस्तुओं से पारस्परिक सम्बन्ध और प्रभाव उसके विकास के गौण कारण होते हैं।

माओवाद का मूल्यांकन

माओ-त्से-तुंग एक ऐसे साम्यवादी नेता थे जिन्होंने रुसी समाजवाद को चीनी परिस्थितियों के अनुसार ढालने का कार्य किया। माओ ने रुसी समाजवादियों पर आरोप लगाए कि वे मार्क्सवाद-लेनिनवाद से दूर हो गए हैं और संशोधनवादी हो गए हैं। जबकि स्वयं माओ संशोधनवादी है। यद्यपि माओ ने कृषक वर्ग को क्रान्ति में महत्व देकर एक महत्वपूर्ण कार्य िया है। माओ ने क्रान्ति की विशिष्ट तकनीक अपनाकर रुसी क्रान्ति से अपने को अलग कर लिया है। माओ ने निरन्तर क्रान्ति के सिद्धान्तों को चीनी सन्दर्भ में संगतिपूर्ण बनाने का प्रयास किया है। माओ ने जन नेतृत्व के सिद्धान्त को प्रतिपादित करके मार्क्स व लेनिन से अधिक लोकप्रियता प्राप्त की है। माओ ने साम्यवादी दल की अपेक्षा जनशक्ति को अधिक महत्व दिया है। इस दृष्टि से चीनी साम्यवाद साम्यवादी क्रान्ति के आरम्भ से लेकर अन्त तक न तो मार्क्सवादी है और न लेनिनवादी, बल्कि पूर्ण माओवादी हैं। माओ ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद से प्रेरणा तो ग्रहण की है लेकिन विशुद्ध मार्क्सवाद का पोषण नहीं किया है। वह स्वयं साम्राज्यवाद का विरोध करता है और स्वयं अपना साम्यवादी प्रभाव विश्व में फैलाना चाहता है।

माओवाद का महत्व इस बात में है कि माओ ने नेपोलियन के स्वप्न को साकार करके चीन को विश्व की एक महान शक्ति बना दिया हैं माओ को चीन का आधुनिक निर्माता कहने के पीछे इसी कारण का हाथ है। माओ एक ऐसा क्रान्तिकारी था, जिसने चीन को थोड़े समय में ही वश्वि मानचित्र के ऊपरी पृष्ठ पर स्थान दिलवाया। आज चीन का विश्व अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान माओ की आर्थिक योजनाओं का ही प्रतिफल है। माओवाद आज चीनियों की गीता है और माओ की चीनियों के आराध्य देव है। माओ ने नवीन लोकतन्त्र की अवधारणा का प्रतिपादन करके साम्यवाद की कठोरता पर जो तीव्र प्रहार किए हैं, वह माओ की चीनी साम्यवाद के रूप में महत्वपूर्ण देन है। माओ ने मार्क्स के द्वन्द्ववाद को नया रूप देकर इस प्रक्रिया को शाश्वत् माना है, जो साम्यवाद या समाजवादी समाज की स्थापना के बाद भी जारी रहेगी। उसने प्रशासन में जन सहभागिता की अवधारणा का महत्व सिद्ध किया है। उसने मार्क्सवाद में उपेक्षित कृषक वर्ग को अपने साम्यवाद में उचित स्थान देकर किसानों का सम्मान बढ़ाया है।

लेकिन चीन के निर्माता होने का श्रेय प्राप्त करने के बावजूद माओ के शक्ति व युद्ध सम्बन्धी विचार आधुनिक मानव समाज के लिए घातक है। चीन का नि:शस्त्रीकरण के प्रति उपेक्षा का रवैया मानवता के लिए शुभ संकेत नहीं है। माओ की श्ािक्त, हिंसा और वर्ग-संघर्ष को जन्म देने वाली विचारधारा सम्पूर्ण मानवता का महाविनाश के कगार पर लाने के लिए पर्याप्त है। माओ का व्यक्ति-पूजा का सिद्धान्त विश्व समाज व मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। स्वयं चीनी साम्यवादी भी इस बात को भली-भांति जानते हैं। इसलिए आज चन में माओवाद का प्रभाव कुछ कम हो रहा है। माओ की मृत्यु के बाद चीन शांतिपूर्ण सह-अस्तितव की नीति में विश्वास करने लगा है। चीन के अमेरिका से सुधरते सम्बन्ध दर्शाते हैं कि चीनी साम्यवादी नीति राष्ट्रीय साम्यवाद की ओर अग्रसर हैं जो पूंजीवाद के साथ भी मिलकर चीने को तैयार है। इस तरह माओवाद का रुझान निरन्तर परिवर्तन की ओर है। इससे मानवता के अस्तित्व के इस गृह पर लम्बा होने के संकेत दिखाई देने लगे हैं। वस्तुत: आज चीनी साम्यवादी नेतृत्व माओ के विचारों से अपने को दूर रखने का ही प्रयास कर रहा है। लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि माओवाद तत्कालीन चीनी समाज की आवश्यकता थी। माओ ने चीनी समाज की सम्पूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। नि:सन्देह माओ चीन के महान नेता हैं और उनका बलिदान चीनी समाज के लिए अमर है।

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