प्रार्थना के प्रकार

अनुक्रम

समूह प्रार्थना

प्रार्थना के अन्य भेदों में सकाम तथा निष्काम प्रार्थना है। इन दोनों में कौन सी अधिक महत्त्वपूर्ण है यह निर्णय करने से पूर्व हमें इनका विभिन्न स्वरूप समझना चाहिए। पाश्चात्य देशों में सर्वत्र सकाम प्रार्थना का प्रचार है। इसके विपरीत प्राचीन आर्यों में निष्काम प्रार्थना का ही अधिक महत्व था।

सकाम प्रार्थना

नाम से ही स्पष्ट है कि किसी इच्छा, कामना की पूर्ति हेतु जब ईश्वर को याद किया जाता है, वह सकाम प्रार्थना है। आज इसी का प्रचलन अधिक है। सकाम प्रार्थना से कामनाएँ पूर्ण होती है, जिन वस्तुओं के लिए आग्रह किया जाता है, उनकी प्राप्ति होती है। इस बात को सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण समय-समय पर ‘युनिटी’ नामक अमेरिकन पत्रिका में प्रकाशित होते रहते हैं। यदि इन सब प्रार्थनाओं का संग्रह किया जाए, तो एक स्वतन्त्र पुस्तक तैयार हो सकती है। अतएव हम यही निर्देश करेंगे कि जिस वस्तु के लिए विधिपूर्वक, सच्चे हृदय से प्रार्थना की जाती है वह अवश्यमेव प्राप्त होती है।

ईश्वर प्रार्थना सुनते हैं तथा उसे पूर्ण करते हैं। इसमें किंचित भी संदेह नहीं है। टेलिफोन के रिसीवर की तरह प्रार्थना साधन से सैकड़ों मील की दूरी पर बैठे हुए किसी हृदय से अपना सम्बन्ध जोड़ लेते हैं। प्रार्थना के लिए सच्ची निष्ठा, पूर्ण श्रद्धा एवं जीता-जागता विश्वास अपेक्षित है। साकार या निराकार, सगुण अथवा निर्गुण के व्यर्थ बकवास में मत पड़ो। सच्चे आत्म-निवेदन द्वारा तुम आत्म-निवेदन के योग्य बन सकते हो। उसी के द्वारा तुम अपने शरीर की सीमाओं को उल्लंघन करके अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ हो सकोगे और परमात्मा का सजीव स्पर्श कर सकोगे। ईश्वर द्वारा हमें प्रत्येक वस्तु मिलेगी यह विश्वास हमारी प्रार्थना को अनुप्राणित करता रहे। यह विश्वास ही मनुष्य की आत्मा की चिर-सम्पत्ति है। बिना इन श्रद्धा के हमारी आवश्यक पोशण नहीं पा सकती।

निष्काम प्रार्थना

हमारे प्राचीन मनीशियों, ऋशियों, आर्यों ने निष्काम प्रार्थना को ही सर्वोत्तम माना है तथा उसकी महिमा का गुणगान किया है। ईश्वर के शरणागत होकर निष्काम (अर्थात बिना किसी इच्छा अथवा कामना के) और प्रेम भव से उसके नाम का अभ्यास करना, बिल्कुल स्वार्थ रहित होकर मानस पूजा करना उनकी दृष्टि में बड़ा उत्तम है। वे अपने जीवन निर्वाह की समस्त चिन्ताएँ ईश्वर पर छोड़ देते थे। निष्काम प्रार्थना में ही वास्तविक शान्ति प्राप्त होती है। सकाम प्रार्थना में तो यह इच्छा बनी रहती हैकि कुछ प्राप्ति होगी, फल मिलेगा, यह होगा वह होगा, किन्तु निष्काम में मन शान्त हो जाता है। निष्काम भाव से और गुप्त रीति से की हुई प्रार्थना का फल अल्पकाल में ही मिल जाता है। साधक अहंकार रहित होकर अपना स्वार्थ भगवान का समर्पित कर देता है अर्थात अपनी इच्छाओं को उनमें विलीन कर देता है। जिस प्रार्थी ने कामना, इच्छा, स्वार्थ को तिलांजलि देकर निष्काम प्रार्थना का आश्रय ग्रहण किया है, वह जब प्रार्थना में ध्यानावस्थित होता है, तो अपने भीतर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को उसके वास्तविक रूप में देखता है। उस समय उसे आत्मा की पूर्णता का भी ज्ञान हो जाता है और वह ईश्वरीय नियम की समता को भी देखता है। उसे विदित हो जाता है कि ईश्वर ने मनुष्य तथा सृष्टि को सर्वांगपूर्ण बनाया है।

निष्काम प्रार्थना से मनुष्य को आन्तरिक शान्ति प्राप्त होती है, मन की कल्मश धुलती है, दैवी सम्पदा की वृद्धि होती है, आत्मबल बढ़ता है, तथा आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है। आत्म-ज्ञान ही मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च फल है किन्तु मोहवश मनुष्य सकाम प्रार्थना में ही अटका रहता है और अन्त समय उसे बड़ा पश्चाताप होता है। एकान्त में बैठकर करुण भाव से और गद्गद् वाणी से भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘हे परमेश्वार! मैं आपकी हृदय से समृति चाहता हूँ। जब सर्वशक्तिमान् सर्वाधार, सर्वलकमहेश्वर भगवान् सबके प्रेरक सर्वान्तर्यामी और सबके परम सुहृद हैं, तो आप मेरे भी सब कुछ हैं। मैं अपने मन, बुद्धि, शरीर, इन्द्रिय, प्राण और समस्त धनादि को आपको अर्पण करना चाहता हूँ। हे देवाधिदेव! वही मुझे प्रदान कीजिए। तात्पर्य यह है कि इस सिद्धान्त के अनुसार प्रार्थी किसी भी जीव से न तो द्वेष रख सकता है, न स्वार्थ में अन्धा होकर संकुचित ही रह सकता है, ममता एवं अहंकार की दुर्द्धर्श विभीशिकाओं से भी बच सकता है।

सामुदायिक प्रार्थना

सम्पूर्ण विश्व के साथ हम हैं, उसकी भलाई, उसकी प्रसन्नता ही सर्वोपरि है- यह भाव लेकर की गई प्रार्थना सामुदायिक प्रार्थना है, इसके परिणाम बहुत सकारात्मक होते हैं। प्रार्थना व्यक्तिगत एवं सामुदायिक दोनों प्रकार से की जा सकती है। व्यक्तिगत प्रार्थना से हम केवल अपनी भलाई की भावनाएँ प्रकट करते हैं। अपने तक ही सब कुछ परिमित रखते हैं, यह दृष्टिकोण कुछ संकुचित सा है। अकेले-अकेले केवल अपनी भलाई के लिए प्रार्थना करने में वह शक्ति नहीं जो सामूहिक प्रार्थना में होती है। वेदों में जहाँ भी प्रार्थना संबंधी ऋचाएँ और मन्त्र दिए गए हैं, उक्त वैदिक प्रार्थनाओं में एक व्यक्ति के लिए नहीं, किन्तु समुदाय के लिए, सब समाज के लिए, राष्ट्र के अभ्युत्थान के निमित्त, विश्व के कल्याण के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं। विश्व की भलाई में हमारी भलाई सम्मिलित है। सम्पूर्ण विश्व के साथ हम हैं यह भाव लेकर की गई प्रार्थना उच्चता है। वेदों का मूल मन्त्र गायत्री है। उस गायत्री मन्त्र में ‘‘धियो यो न: प्रचोदयात्’’ का अर्थ वही है कि जिस सर्वश्रेष्ठ आनन्ददायक तेज से सब विश्वव्याप्त हो रहा है उस अत्यन्त आनन्ददायक तेज का हम ध्यान करते हैं। वह ‘हमें सद्बुद्धि दे, हमारे मन में शुभ विचार उत्पन्न करे।’ हममें से प्रत्येक का कर्त्तव्य है कि प्रात:काल सूर्योदय के पूर्व जागृत हो कुछ अपने हृदयस्थ आत्मा से परमपिता परमात्मा का साक्षात्कार करे और अपना रोम-रोम पवित्र कर ले। शान्ति को प्रवाहित होने दे। विशुद्ध हृदय से महाप्रभु के अनन्त उपकारों का आभार मान कर समग्र प्राणीमात्र के जीवन, आनन्द, सुख वृद्धि के लिए प्रार्थना करे। इस निर्मल विशुद्ध उपासना से परमात्मा का दिव्य स्पर्श आपकी आत्मा को होगा। आपके समस्त मनस्ताप और क्लेश भस्मीभूत होकर नवजीवन और नवीन बल प्राप्त होगा और जीवन परम शान्ति और सुखी होगा। यह क्लेशों से मुक्ति का सुगम उपाय है। यही प्रार्थना का रहस्य है।

आशावादी प्रार्थना 

जो लोग यह कहते हैं - ‘‘मैं मूरख खल कामी’’ मैैं मूर्ख हूँ, मैं पाप में पड़ा हूँ, मुझे पाप-पंक से निकालिए। वह बड़ी भूल करते हैं। ऐसे प्रार्थियों का विश्वास पाप में है। पाप में परमात्मा कब मिला है ? आपको तो प्रार्थना में कहना चाहिए ‘‘ हे परमेश्वर आप तेज पुंज हो, आप बुद्धि के सागर हो, शक्ति के अथाह उदधि हो। मुझे भी तेज से परिपूरित कीजिए। बुद्धि उड़ेल दीजिए शक्ति से अंग-अंग भर दीजिए। प्रार्थना हमेशा आशावादी होनी चाहिए। मन में आशावादी भावना धारण कीजिए और कहिए-’तेजोऽसि तेजोमयि देहि।’’ हे तेज ! पुंज के पुुंज, मुझे भी तेज युक्त कीजिए, करना आशावादी प्रार्थना है।

स्वेच्छा स्वीकार

ईश्वर के सम्मुख अवांछनीय कार्यों को स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार करने से ईश्वर के प्रति हमारी निश्ठा की पुष्टि होती है। उक्त प्रकार की प्रार्थना सभी प्रमुख धर्म ग्रन्थों में पाई जाती है। उदा. - ईसाई, हिन्दु, बौद्ध इत्यादि। गौतम बुद्ध के जीवन काल में तो बौद्ध सन्यासी अपने अवांछनीय कार्यों का भरी सभा में दो बार स्वेच्छा - स्वीकार किया करते थे।

सिफारिशी प्रार्थना 

नि:स्वार्थ भाव से दूसरों के लाभ के अर्थ से की जाने वाली प्रार्थना - मूसा ईश्वर से कहते थे - तुम्हारे अपने ही लोगों को तुम माफ कर दो अन्यथा मुझे जीवन की किताब से मिटा दो।

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