राजनीतिक अभिजन का अर्थ, प्रकृति, प्रकार एवं सिद्धान्त

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राजनीतिक अभिजन की अवधारणा राजनीति विज्ञान की आधुनिक व प्रमुख धारणा है, यद्यपि इस धारणा के बीज प्लेटो व अरस्तु के समय में भी मौजूद थे। यह धारणा इस मान्यता पर आधारित है कि शासन करने के गुण थोड़े से व्यक्तियों में ही होते हैं। इसी कारण इसे सामाजिक डार्विनवाद का रूप माना जाता है। अभिजन वर्ग का अध्ययन समाजविज्ञान, धर्मशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान आदि में तो लम्बे समय से होता आ रहा है, लेकिन राजनीति विज्ञान में इसका वैज्ञानिक विवेचन सबसे पहले हैरोल्ड लॉसवेल ने किया। सर्वप्रथम 1923 में इसे ऑक्सफोर्ड कोश में स्थान दिया गया और आगे चलकर पैरेटो तथा मोस्मा ने इसे अमेरिका में लोकप्रिय बनाया। आज राजनीति विज्ञान में अभिजन वर्ग के लिए विशिष्ट वर्ग, उच्च वर्ग, अभिजात्व वर्ग, शक्ति वर्ग, शासक वर्ग, राजन्य, सम्भ्रान्त वर्ग, सत्ता वर्ग आदि नामों का प्रयोग किया जाता है। राजनीतिक समाज में सत्ता, शक्ति और प्रभाव का वास्तविक प्रयोग यही वर्ग करता है। संख्या में अल्प होते हुए भी इसकी शासन-व्यवस्था में निर्णायक भूमिका रहती है। अभिजन सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादक मोस्का, पैरेटो, मिथेन्स, गेसेट, जेम्स बर्नहाम, वाल्डो, सी0 राइट मिल्स, सारटोरी, राबर्ट डॉहल, लॉसवैल, शुम्पीटर आदि विचारक हैं।

राजनीतिक अभिजन का अर्थ

प्लेटो और अरस्तु का कहना है कि शासन करने की योग्यता या गुण तो केवल गिने-चुनें व्यक्तियों में ही होते हैं। शेष जनता तो शासित होने के लिए ही है। प्रत्येक शासन प्रणाली चाहे वह सर्वसत्ताधिकारवादी या लोकतांत्रिक उसके आस-पास कुछ ऐसे लोग होते हैं जो उसे गति प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाते हैं। संख्या में कम होते हुए भी इनका राजनीतिक समाज, राजनीतिक दल व शासन तन्त्र में महत्वपूर्ण स्थान होता है। ये राजनीतिक व्यवस्था में निर्णयकारी प्रक्रिया को पूरी तरह प्रभावित करने में सक्षम होते हैं। लोकतन्त्र में सभी का शासन कहना इन्हें अखरता है। वास्तव में लोकतन्त्र में भी इन्हीं का शासन होता है। जनता का शासन तो सिद्धान्त तक ही सीमित होता है। राजनीतिक व्यवस्था के संचालन व मूल्यों के निर्धारण में इसी वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इन्हें उपरी तबके के लोग कहा जाता है। किसी भी राजनीतिक समाज के सारे कार्य यही उपरी तबके के लोग ही करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में इन्हें राजनीतिक अभिजन कहा जाता है। साधारण अर्थ में-”राजनीतिक अभिजन वे लोग हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक व्यवस्था के संचालन और उसकी निर्णयकारिता को प्रभावित करते हैं।” राजनीतिक अभिजन को कुछ विचारकों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है :-
  1. लॉसवैल के अनुसार-”राजनीतिक अभिजन राजनीतिक व्यवस्था के सत्ता धारक हैं।”
  2. पैरेटों के अनुसार-”राजनीतिक अभिजन में वे सफल लोग हैं जो राजनीतिक व्यवस्था में सबसे ऊपर आ जाते हैं।”
  3. कार्ल जे0 फ्रेडरिक के अनुसार-”राजनीतिक अभिजन उन व्यक्तियों का समूह होता है जो राजनीति में अद्वितीय कार्य सम्पन्न करने के कारण विशिष्ट होते हैं। यह वर्ग समाज विशेष के शासन को प्रभावशाली ढंग से अपने हाथों में केन्द्रित कर लेता है। इसमें समूह की भावना होती है जिसे यह समय-समय पर सहयोग के रूप में व्यक्त करता है। यह वर्ग शक्ति और शासन प्राप्त करने की योग्यता में पर्याप्त आगे बढ़ जाता है।”
  4. बॉटोमाला के अनुसार-”राजनीतिक अभिजन में वे लोग शामिल हैं जिन्हें समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है और एक समय में वे राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करते हैं।”
  5. जी0डी0एच0 कोल के अनुसार-”राजनीतिक अभिजन एक ऐसा समूह है, जो राजनीतिक समाज के प्रत्येक स्तर पर नेतृत्व प्रदान करने तथा प्रभाव डालने की स्थिति में होता है।”
इस प्रकार कहा जा सकता है कि अभिजन वर्ग अल्पतन्त्र व कुलीनतन्त्र दोनों के गुणों को समेट लेता है। यह संख्या में कम होते हुए भी श्रेष्ठ गुणों का स्वामी होता है। इसी कारण इसे समाज का चतुर व पढ़ा लिखा अल्पसंख्यक वर्ग कहा जाता है। राजनीतिक अभिजन वर्ग उन व्यक्तियों का वर्ग होता है जो अपनी विशिष्ट योग्यता के कारण देश की राजनीति व समाज में अपना प्रभाव कायम रखते हैं। बर्नी ने भी कहा है कि सम्भ्रान्त जन में अल्पतन्त्र और कुलीनतन्त्र दोनों के लक्षण शामिल हैं। इसी कारण यह दोनों से श्रेष्ठ शासन व सत्ता का संचालन करता है। इसके शासन का आधार जन सहमति का सिद्धान्त है, चाहे वह दिखावा मात्र ही क्यों न हो।

राजनीतिक अभिजनों की प्रकृति

अभिजन सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक समाज में दो प्रकार के लोग होते हैं - एक तो विशिष्ट वर्ग के रूप में तथा दूसरे जनसाधारण या जनपुंज के रूप में। मार्क्स की इतिहास की आर्थिक व्याख्या इसी मत की पुष्टि करते हैं। प्लेटो व अरस्तु विचार भी इसी मत का समर्थन करते हैं कि शासन करने की योग्यता थोड़े से लोगों में ही होती है। इसका अर्थ यह भी है कि अधिकतर लोगों में शासन करने की बजाय शासित होने की योग्यता होती है। इसी आधार पर समाज के दो वर्ग बन जाते हैं। आधुनिक राजनीतिक समाज में अभिजनों का एक बहुत बड़ा भाग भौतिक शक्ति, परम्परा, समाज के साधनों पर नियन्त्रण, योग्यता या चुनाव आदि के बल पर या परिस्थितिवश राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बना लेता है। राजनीति में विशिष्टता व लोकप्रियता के कारण इनके पैर राजनीतिक व्यवस्था में आसानी से टिक जाते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के बाद ये राजनीतिक निर्णयों व कार्यों को प्रभावित करने लग जाते हैं। इनकी प्रकृति देश और काल के साथ बदल जाती है। सामाजिक विकास की अवस्थाओं का अभिजन वर्ग की प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पूंजीवादी व्यवस्थाओं में अभिजनवर्ग समाजवादी व्यवस्थाओं से भिन्न प्रकार का होता है। व्यवस्था में परिवर्तन आने पर इनमें भी परिवर्तन आता है। एक व्यवस्था के भीतर भी इनमें परिसंचरण होता रहता है। जो आज सत्ता में हैं वे विपक्ष में चले जाते हैं और जो विपक्ष में हैं, वे सत्ता में आ जाते हैं। पैरेटो ने अभिजनों के इसी संचरण की पुष्टि की है। लोकतन्त्र में तो इनका स्थायित्व जन-सहमति पर टिका होता है। जब जनता की इनके ऊपर से अन्ध श्रद्धा समाप्त हो जाती है तो इनके पैर उखड़ जाते हैं। यदि लोकतन्त्र मेंं ये व्यवस्था के शोषक बनने का प्रयास करते हैं तो इन्हें उखाड़ने के लिए गैर-लोकतांत्रिक तरीकों का भी प्रयोग किया जाता है। तानाशाही व्यवस्था वाले देशों में ये अपनी सत्ता को स्थाई बनाने के अनेक उपाय करते हैं लेकिन जन-विद्रोह या क्रान्ति करके इनका सफाया कर दिया जाता है। लोकतन्त्र की अपेक्षा तानाशाही व्यवस्थाओं में अधिक से अधिक शक्ति अर्जित करने का प्रयास करते हैं। सत्य तो यह है कि चाहे किसी भी राजनीतिक समाज के अभिजन हों, उनका ध्येय सार्वजनिक सहभागिता के विचार का विरोध करना ही होता है। अपने स्वार्थों के लिए ये लोकतन्त्र को तानाशाही में बदनले से भी नहीं हिचकते। पैरेटो का कथन सत्य है कि शासन-अभिजन या तो मर जाते हैं या उखाड़ दिये जाते हैं। स्वयं हटना या परिवर्तित होना इन्हें स्वीकार्य नहीं होता। इसलिए इतिहास को कुलीनतन्त्रों की शमशान भूमि कहना सर्वथा उपयुक्त है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए ये बल, शत्रु-विनाश, कैद, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, धोखेबाजी अर्थात् साम, दाम, दण्ड, भेद आदि सभी उपायों का सहारा लेते हैं।

मोस्का का मानना है कि अभिजनों में परिवर्तन संचरण प्रक्रिया द्वारा ही होता है। प्रतिनिधित्व और निर्वाचन, सहवरण तथा प्रतिस्थापन आदि माध्यमों से अभिजन लोकतन्त्र के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं और अपने अस्तित्व को कायम रखने में सफल हो जाते हैं। संचरण प्रक्रिया से अभिजनों के दो वर्गों का स्पष्ट आभास होता है। एक वर्ग तो शासक अभिजनों का होता है और दूसरा प्रतिपक्षी अभिजनों का। प्रतिपक्षी अभिजन अवसर की तलाश में रहते हैं कि कैसे शासक अभिजनों का स्थान लिया जाये। इसलिए कई बार जनता को गुमराह करके ये सत्ता अभिजन बन जाते हैं। फाईनर का मानना है कि लोकतन्त्र में नए अभिजनों की उल्ट-पुल्ट ही होती है, बदली नहीं। लोकतन्त्र में नए अभिजनों को भी प्रवेश मिल जाता है। इसी कारण लोकतन्त्र में अभिजनों की प्रकृति निरंकुश शासन-व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक खुलापन व स्थाईपन लिए हुए होती है। राजनीतिक अभिजनों की इस प्रकृति से राजनीतिक अभिजनों की निम्न विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं :-
  1. राजनीतिक समाज में दो वर्गों में से यह सत्ता का धारक वर्ग होता है।
  2. यह जनसाधारण से काफी श्रेष्ठ व उच्च स्थान पर होता है।
  3. यह समाज का अल्पसंख्यक वर्ग होता है।
  4. इसके हित आम लोगों से भिन्न व विरोधी होते हैं।
  5. यह वर्ग चालाकी और बल प्रयोग से सत्ता में रहने के हर सम्भव प्रयास करता है।
  6. यह वर्ग प्रत्येक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में मिलता है।
  7. राजनीतिक अभिजन शासक व प्रतिपक्षी दो प्रकार के होते हैं।
  8. इस वर्ग का राज्य की नीति-निर्माण व निर्णयकारी प्रक्रिया पर पूरा नियन्त्रण रहता है।
  9. यह वर्ग आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से शेष लोगों से अधिक श्रेष्ठ होता है।
  10. यह वर्ग प्रभुत्व युक्त होने के बाद भी खुलापन रखता है।
  11. राजनीतिक अभिजनों में परिवर्तन व हेर-फेर होता रहता है।
  12. इनके पास बल-प्रयोग का वैध अधिकार भी होता है।
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीतिक अभिजन राजनीतिक क्षेत्र के साथ साथ समाज के हर क्षेत्र में ऊपर के सिरे पर होते हैं। सत्ता प्राप्ति के बाद इनकी शक्ति और लोकप्रियता कई गुणा बढ़ जाती है। ये लोग प्रत्येक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। समस्त निर्णय व नीतियां इनसे प्रभावित होती हैं। इनका अस्तित्व वैधता तथा स्वेच्छाचारिता दोनों पर ही आधारित होता है।

राजनीतिक अभिजनों के प्रकार

राजनीति विज्ञान मेंं अभिजनों के अनेक प्रकार बताए गए हैं। पैरेटो ने शासक-अभिजन व विपक्षी अभिजन दो प्रकारों का वर्णन किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से अभिजनों को शासक प्रजाति, कुलीनतन्त्र, शासक वर्ग, व्यूहिक अभिजन (Strategic Elites) आदि वर्गों में बांटा जाता है। टी0बी0 बोटोमोर ने अभिजनों को बुद्धिजीवी, प्रबन्धक तथा नौकरशाह तीन वर्गों में बांटा है। विकासशील देशों के सन्दर्भ में एडवर्ड शील्स ने अभिजनों को वंश परम्परागत, क्रान्तिकारी, मध्यमवर्गीय, औपनिवेशिक प्रशासक तथा राष्ट्रीय नेता पांच वर्गों में विभाजित किया है। इस प्रकार अभिजनों के अनेक प्रकार हैं। लेकिन राजनीतिक अभिजनों की दृष्टि से आज अभिजनों का दो तरह से अध्ययन किया जाता है :- (1) सामान्य दृष्टिकोण से (2) आधुनिक दृष्टिकोण से।

सामान्य रूप में अभिजन तीन प्रकार के माने जाते हैं :- (i) परम्परागत अभिजन (ii) शाही परिवार के सदस्य (iii) नवोदित अभिजन वर्ग। आधुनिक दृष्टिकोण से पैरेटो ने अभिजनों को दो भागों में बांटा है - (i) शासकीय अभिजन (ii) अशासकीय या प्रतिपक्षी अभिजन। परम्परागत अभिजनों में विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों के मुखिया शामिल होते हैं। इस प्रकार के अभिजन उन देशों में पाए जाते हैं जहां धर्म का ज्यादा प्रभाव है। पाकिस्तान, बंगला देश, ईरान, मोराक्को आदि देशों में इसी तरह के अभिजन हैं। शाही परिवार के सदस्य राजतन्त्रीय प्रणालियों में अभिजनों की भूमिका निभाते हैं। नेपाल, ब्रिटेन, जापान आदि देशों में ये अभिजन पाए जाते हैं। स्वतन्त्रता से पहले भारत में भी रियासतों के राजा इसी प्रकार के अभिजन वर्ग थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद की समाप्ति से तथा उससे पहले औद्योगिक क्रान्ति के कारण आए परिवर्तनों व आधुनिकीकरण के दौर में जिस नए अभिजन वर्ग का उदय हुआ उसे नवीन अभिजन वर्ग कहा जाता है। नौकरशाही एक ऐसा ही अभिजन वर्ग है। आज विश्व के अधिकांश विकसित व विकासशील देशों में इसी प्रकार के अभिजन पाए जाते हैं।

पैरेटो के विचार से आज राजनीतिक अभिजनों को शासकीय व अशासकीय दो भागों में बांटा जा सकता है। एस0ई0फाइनर भी अपनी पुस्तक 'Comparative Government' में सत्ता या शासक अभिजन (Governing Elites) तथा प्रतिपक्षी या विपक्षी अभिजन (Counter Elites) की ही बात करता है। वैसे तो अभिजनों के अनेक प्रकार व उप-प्रकार हैं, क्योंकि से समाज के हर क्षेत्र में पाए जाते हैं और राजनीतिक भूमिकाओं का भी निष्पादन करते रहते हैं। सामान्य तौर पर राजनीतिक अभिजन वे लोग ही होते हैं जो राजनीतिक व्यवस्था के सर्वोच्च शिखर पर होते हैं और उसकी निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। वास्तव में यह राजनीतिक अभिजन की सीमित व्याख्या है। राजनीतिक व्यवस्था में अभिजनों का एक ऐसा वर्ग भी होता है जो विपक्ष में होता है और सत्ता संभालने के लिए तैयार रहता है। लोकतन्त्र में चुनावी प्रक्रिया द्वारा इनका हेर-फेर होता रहता है। निरंकुश राजनीतिक व्यवस्थाओं में क्रान्तिकारी तरीकों से इन्हें उखाड़ फैंका जाता है और विपक्षी अभिजन उनका स्थान ले लेते हैं और गृह-युद्ध जैसी स्थिति को समाप्त कर देते हैं। विपक्षी अभिजनों का अभाव तानाशाही को जन्म देता है। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था के विकास व स्थायित्व के लिए दोनों प्रकार के अभिजनों का होना जरूरी है।

शासकीय अभिजन (Governing Elites) राजनीतिक व्यवस्था के शिखर पर पहुंचे हुए वे लोग होते हैं जो विधिवत् सत्ता के धारक होते हैं और औपचारिक रूप से राजनीतिक व्यवस्था में समस्त निर्णय लेने व लागू करवाने का अधिकार रखते हैं। ये न्यायसंगत बल प्रयोग का अधिकार भी रखते हैं। इनका मुख्य कार्य व्यवस्था को एक सूत्र में पिरोना व बनाए रखना होता है। ये जन सहमति के नाम पर ही शासन करते हैं और बहुसंख्यक वर्ग (जनता) से अपनी अलग पहचान रखते हैं। ये किसी समय विशेष में सत्ता व नेतृत्व की भूमिकाओं के निष्पादक होते हैं। इसके विपरीत प्रतिपक्षी या अशासकीय अभिजन (Counter or Non-Governing Elites) ऐसा अभिजन वर्ग होता है जो आवश्यकता पड़ने पर शासकीय अभिजनों का स्थान ले सकता है। यह वर्ग सत्ता में नहीं होता। यह या तो पहले सत्ता में रह चुका होता है या परिस्थिति होने पर सत्तारूढ़ होने की योग्यता व इच्छा रखता है। यह वर्ग भी सरकार की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करता रहता है। संभावित सत्ताधारक होने के नाते इसका भी समाज व राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान होता है। शासकीय अभिजन तो सत्ता में ही होते हैं, जबकि अशासकीय सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। दोनों अभिजन जन समर्थन प्राप्त करने व बनाए रखने के लिए हर सम्भव कोशिश करते रहते हैं और दोनों में सत्ता प्राप्ति के लिए कठोर प्रतियोगिता व संघर्ष चलता रहता है।

राजनीतिक अभिजनों का सिद्धान्त

राजनीतिक अभिजन वर्ग का सिद्धान्त राजनीेति विज्ञान का बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के बीज प्लेटो और अरस्तु के दर्शन मेंं भी मिलते हैं। लेकिन इस सिद्धान्त को वैज्ञानिक रूप देने का सर्वप्रथम प्रयास लॉसवैल ने किया। 1950 के दशक में अमेरिका में इस सिद्धान्त को व्यापक आधार प्रदान करने के लिए शुम्पीटर, लॉसवैल तथा सी0 राइट मिल्स द्वारा प्रयास किए गए। इसके बाद पैरेटो, मोस्का, मिथेल्स और गैसेट ने इसे सुनिश्चित आधार प्रदान किया। इन विचारकों ने इस सिद्धान्त के आधार पर राजनीतिक व्यवस्थाओं की प्रकृति, उनकी कार्यक्षमता, उनके परिवर्तन, विकास और पतन को समझने का प्रयत्न किया है। अरस्तु और प्लेटों की तरह ये भी शासकीय श्रेष्ठता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। इस सिद्धान्त की मूल मान्यता यह है कि शासन करने के गुण या क्षमता थोड़े से व्यक्तियों में ही होती है और शेष जनपुंज शामिल होने के लिए ही जन्म लेता है। पैरेटो, मोस्का और मिचेल्स का मानना है कि प्रत्येक समाज का शासन ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग के हाथों में होता है जिसके पास सम्पूर्ण सामाजिक और राजनीतिक सत्ता पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेने के आवश्यक गुण होते हैं। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह वर्ग अन्य वर्गों से शीर्ष स्थान पर पहुंच जाता है।” यह वर्ग जोड़-तोड़ में निपुण होने के कारण राजनीति में छा जाता है और राजनीतिक व्यवस्था को खुला रखता है ताकि अन्य अभिजन भी इसमें प्रवेश पा सकें। अभिजन वर्ग अपनी असाधारण योग्यता, अनोखी सूझ-बूझ, कार्यकुशलता या प्रबन्ध-क्षमता के बल पर सम्पूर्ण संगठन में प्रभावशाली स्थान प्राप्त कर लेता है और उसे अपनी इच्छा या योजना के अनुसार संचालित करता है। इसके विपरीत बहुसंख्यक वर्ग में नेतृत्व के गुण और उत्तरदायित्व की भावना का नितान्त अभाव होने के कारण वे इस अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग के निर्देशों में चलने में ही अपना हित समझते हैं। इस सिद्धान्त का विकास सिद्धान्तकारों ने किया है :-

पैरेटो के राजनीतिक अभिजनों पर विचार 

पैरेटो ने अपनी पुस्तक 'The Mind and Society' में लिखा है कि समाज अनिवार्य रूप से दो वर्गों में बंटा रहता है : विशिष्ट वर्ग और गैर-विशिष्ट वर्ग या जनपुंज। विशिष्ट वर्ग में वे लोग आते हैं जो किसी भी कार्यक्षेत्र में सर्वोच्च योग्यता रखते हैं। विशिष्ट वर्ग के भीतर सत्तारूढ़ या शासकीय अभिजन और गैर सत्तारूढ़ या अशासकीय अभिजन होते हैं। समय के परिवर्तन के अनुसार गैर-शासकीय वर्ग शासकीय अभिजनों को हटाकर उनका स्थान ले लेता है। इसे अभिजनों की अदला-बदली या संचलन (Circulation of Elites) कहा जाता है। पैरेटो ने अभिजन सिद्धान्त में अपनी विचारधारा की पुष्टि करते हुए लिखा है कि इतिहास कुलीनतन्त्रों का कब्रिस्तान है। इसमें अभिजनों में परिवर्तन अवश्यमभावी है। समाज के मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से अभिजनों की विशेषताएं भी बदल जाती हैं। इनका ऊपर नीचे आना जाना लगा रहता है। अपनी बुद्धि और जोड़-तोड़ से प्रक्रिया से समाज का यह अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग जनपुंज पर शासन करता रहता है। अभिजन के संचरण सिद्धान्त का सार भी यही है कि जनता शासित होने व अभिजन शासन करने के लिए ही जन्म लेते हैं। इस प्रक्रिया में अभिजन स्थाई नहीं होते हैं। उनकी अदला-बदली इस सिद्धान्त का शाश्वत नियम है। पूराने अभिजनों का स्थान नए अभिजन ले लेते हैं। कभी कभी यह परिवर्तन शासकीय सम्बन्धों तक ही सिमटकर रह जाता है। इसमें शासकीय व अशासकीय अभिजनों में भी अदला-बदली होती है। राजनीति अभिजनों का यही संचरण क्रान्तियों से राजनीतिक व्यवस्था को दूर रखता है और स्थायित्व प्रदान करता है। फीस राजनीतिक व्यवस्था में इस संचरण का अभाव होता है, वहां क्ऱान्तियों का जन्म लेना अवश्यम्भावी बन जाता है।

कोस्मा के राजनीतिक अभिजन पर विचार 

मोस्का भी पैरेटो की तरह इटली की अभिजनवादी समाजशास्त्री था। उसने अपनी पुस्तक 'The Ruling Class' में विचार व्यक्त किया कि प्रत्येक समाज में दो वर्ग दृष्टिगोचर होते हैं :- शासक और शासित। शासक वर्ग जिसकी संख्या कम होती है और जो राजनीतिक कार्य करता है, सत्ता पर उसका एकाधिकार होता है और वह धन-संपदा, शक्ति और सम्मान से सम्पन्न होने के कारण दूसरे वर्ग से अधिक शक्तिशाली होता है। दूसरा वर्ग जिसकी संख्या बहुत अधिक होती है, उसका नियन्त्रण व निर्देशन पहले वर्ग द्वारा ही किया जाता है। चाहे कोई भी और कहीं भी तथा किसी भी शासन प्रणाली को अपनाया जाए, शक्ति का स्वामी यह अल्पसंख्यक वर्ग ही होता है। अपने शासन को उचित ठहराने के लिए यह नैतिक और कानूनी सिद्धान्तों की शरण भी लेता है और ये सिद्धान्त प्राय: शासित वर्ग को मान्य होते हैं। दोनों वर्गों के सम्बन्ध कभी कभी स्वेच्छाचारिता पर भी आधारित हो सकते हैं। इस अल्पसंख्यक वर्ग की दो प्रमुख विशेषताएं होती हैं :- एक आदेश देने की अभिवृति तथा दूसरी राजनीतिक नियन्त्रण की क्षमता। इनका अभाव उनको नष्ट कर सकता है। जब इन दोनों तत्वों का राजनीतिक अभिजनों में अभाव हो जाता है तो उनका परिवर्तन अपरिहार्य हो जाता है। सामाजिक परिवर्तन भी इस परिवर्तन या अभिजनों की अदला-बदली को अनिवार्य बना देते हैं। जो वर्ग सामाजिक परिवर्तनों के प्रति ध्यान देने से चूक जाता है या देरी करता है तो उसका ठहराव या परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। इस तरह मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारणों से भी अभिजनों में संचलन होता है।

राबर्ट मिचेतस के राजनीतिक अभिजनों पर विचार 

मोस्का के संगठनात्मक सिद्धान्त की पुष्टि उसके शिष्य रॉबर्ट मिचेल्स ने अपने अभिजन सिद्धान्त में की है। मिचेल्स ने इसे ‘अल्पतन्त्र या कुलीनतन्त्र का लौह नियम’ कहा है। उसने अपनी पुस्तक 'Political Parties' में बताया है कि आधुनिक युग में संगठन के बिना कोई भी आन्दोलन व राजनीतिक दल सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे-जैसे संगठन का आकार बढ़ता हे, वैसे वैसे अधिक से अधिक कार्य उसके आन्तरिक नेताओं को सौंपने पड़ते हैं और धीरे-धीरे वे अपनी चतुराई व बल प्रयोग द्वारा सम्पूर्ण संगठन पर अपनी तानाशाही स्थापित कर लेते हैं। वे अपनी शक्तियों और विशेषाधिकारों के लिए इतने निरंकुश बन जाते हैं कि इन्हें उनके पद से हटाना असम्भव सा हो जाता है। मिचेल्स ने लिखा है-”ये नेता एक बार सत्ता में आ जाएं तो इन्हें उनके शक्ति के शिखर से हटाना असम्भव है।” यही कुलीनतन्त्र का लौह नियम है। सभी व्यवस्थाओं व सभ्यताओं में कुलीनतन्त्र का यही नियम लागू होता है। मिचेल्स का मानना है कि अधिकतर लोग स्वभाव से गुलाम प्रवृत्ति के होते हैं। उनको नेताओं द्वारा मूर्ख बनाना कोई कठिन काम नहीं है। खुशामद, प्रार्थना और भावनाओं का वास्ता दिलाकर नेता लोग उन्हें सरलता से धोखा दे सकते हैं। गुलामी की शाश्वत् वृति के कारण वे सहजता से दूसरों का नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं। सत्ता प्राप्ति के बाद मुट्ठी भर लोग बहुसंख्यकों का शोषण करते हैं और स्वयं मौज से सत्ता का सुख भोगते हैं। इस प्रकार का अल्पसंख्यक वर्ग प्रत्येक समाज में ऐसा ही व्यवहार करता है। अपनी वाक्पटुता, भाषणकला तथा समझाने-बुझाने की कला में दक्ष यह वर्ग अपनी सत्ता को स्थाई बनाए रखने के हर सम्भव प्रयास करते हैं। यदि एक बार ये सत्ता में अपना स्थान बना लें तो इन्हें कोई हटा नहीं सकता। मिचेल्स ने लिखा है-”नेताओं का प्रभुत्व को नियन्त्रित करने के लिए यदि कानून बनाए जाते हैं तो धीरे धीरे वे सारे कानून भी प्रभावहीन हो जाते हैं।” लेकिन इनका अभिजनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि क्रान्ति द्वारा उन्हें हटा भी दिया जाए तो उनके स्थान पर उतने ही निरंकुश दूसरे शासक आ जाते हैं। इसलिए मिचेल्स से अपनी पुस्तक 'Political Parties' में लिखा है-”इतिहास की लोकतांत्रिक लहरें एक दूसरे के बाद आने वाली लहरों से मिलती जुलती हैं।” इसका तात्पर्य यह है कि अभिजनों को बदलना जनता के दु:ख कम नहीं कर सकता क्योंकि सभी अभिजन लगभग समान स्वभाव वाले होते हैं। अभिजनों के बारे में यह लौह-नियम प्रत्येक समाज पर लागू होता है और इसने प्रत्येक समाज को जकड़ लिया है।

सी0 राइट मिल्स के राजनीतिक अभिजनों पर विचार

सी0 राइट मिल्स ने अपनी पुस्तक 'The Power Elite' में अपना ‘शक्ति अभिजन’ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। उसका कहना है कि अभिजन समाज के संस्थागत या संरचनात्मक ढांचे के प्रतिफल होते हैं। आधुनिक समाज में शक्ति संस्थाकृत होती है। जनता संस्थाकृत शक्ति का ही पालन करती है। इन संस्थाओं के धारकों को चुनने में जनता को पूरी स्वतंत्रता होती है। नेताओं का बदलाव संस्थागत ढांचे से जुड़ा हुआ होता है। अभिजन वर्ग को सत्ता के संस्थीकरण के कारण सर्वोच्च शिखर पर होने के कारण सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। राजनीतिक अभिजन वर्ग वे लोग होते हैं जो संस्था में बड़े निर्णय लेने या निर्णयों को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं और उनका आधुनिक समाज के पुरुष संगठनों पर पूर्ण प्रभुत्व रहता है। यह वर्ग सामाजिक दृष्टि से उच्चस्तरीय, सामंजस्यपूर्ण तथा लोक नियन्त्रण को अस्वीकार करने वाला होने के कारण राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आर्गेटा वाई0 गेसेट के राजनीतिक अभिजनों पर विचार

गेसेट का मानना है कि राजनीतिक अभिजन न तो व्यक्तिगत योग्यता और न ही जोड़ तोड़ से सत्ता में आते हैं और बने रहते हैं, बल्कि जनता की इच्छा का परिणाम होते हैं। जनता चुने हुए तत्वों (नेताओं) के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करती है और उन्हें अपना समर्थन प्रदान करती हैं। यह जनसमर्थन ही अभिजन वर्ग की सत्ता का आध् ाार है। जब तक जनता को अपने नेताओं पर विश्वास रहता है, तब तक वे सत्ता में बने रहते हैं। यदि जनता को अपने नेताओं पर अविश्वास पैदा होने लगता तो जनता उन्हें बदल देती है और नए अभिजनों को सत्ता सौंप देती है। इसी कारण अभिजन वर्ग सत्ता में रहने के लिए जन इच्छा के अनुसार ही कार्य करता है और राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। एस0पी0 वर्मा ने कहा है-”जब कुलीनतन्त्र भ्रष्ट और अकुशल हो जाता है तो लोग विद्रोह कर देते हैं और विद्रोह के पीछे यह प्रेरणा प्रमुख होती है कि उन पर किसी सक्षम कुलीनतन्त्र का शासन हो।” यदि कोई समाज यह विश्वास करता है कि वह कुलीनतन्त्र के बिना भी कार्य चला सकता है, तो वह देश या समाज निश्चित रूप से पतन की ओर जाने वाला होता है। इसीिए अभिजन वर्ग को जनता की इच्छा का और जनता को कुलीनतन्त्र के शासन पर अपना विश्वास जरूरी होता है।

लॉसवैल के राजनीतिक अभिजनों पर विचार

हरोल्ड लॉसवेल का कहना है कि राजनीतिक अभिजन शक्ति के धारक होते हैं। सत्ता प्राप्त करने के बाद जो अपनी शक्ति को बनाए रखते हैं वे ही अभिजन वर्ग में टिक पाते हैं, बाकी नहीं। इन सत्ता धारकों को अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए हिंसा, प्रतीकों, आचरणों आदि का प्रयोग करने की छूट होती है। लॉसवेल का कहना है कि राजनीतिक अभिजन वे लोग होते हैं जिन्हें समाज में स्वयं सब कुछ दिया है। ये लोग जोड़-तोड़ मे माहिर होने के कारण अपनी सत्ता शक्ति के बल पर बनाए रखने में सफल रहते हैं। इस आधार पर लॉसवेल ने समाज को तीन वर्गों में बांटा है :- शक्तिशाली वर्ग, मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग। उसका कहना है कि सर्वाधिक शक्तिशाली अल्पसंख्यक वर्ग ही राजनीतिक अभिजन है जो निर्णय भी ले सकता है और बल प्रयोग से इन्हें लागू भी कर सकता है। मध्यम वर्ग राजनीतिक अभिजनों के लिए जनसमर्थन जुटाता है ओर निम्न वर्ग बल प्रयोग से डरने के कारण राजनीतिक अभिजनों की प्रत्येक बात सरलता से स्वीकार करता है। लॉसवेल ने शक्ति के साथ साथ जनसहमति को अभिजनों के लिए अनुकूल बताकर अभिजन सिद्धान्त को नया अर्थ प्रदान किया है।

बर्नहाम के राजनीतिक अभिजनों पर विचार 

बर्नहाम के विचार माक्र्सवाद से प्रभावित हैं। उसने राजनीतिक अभिजनों के आर्थिक पक्ष पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। उसका कहना है कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति होती है, उसी के पास राजनीतिक शक्ति भी होती है। अभिजन वर्ग की शक्ति का आधार उत्पादन और वितरण के साधनों पर नियन्त्रण में निहित है। इसी विशेषाधिकारयुक्त स्थिति के कारण सत्तारूढ़ गुट समाज से पक्षपातपूर्ण व्यवहार करता है और दूसरों को सत्ता प्राप्त करने से भी रोकता है। इसी तरह समाज में शासक गुट का पता लगाने का तरीका यह देखना है कि किसी गुट की आय सबसे अधिक है। लेकिन भविष्य में अभिजन वर्ग उभरने से इस अभिजन वर्ग को खतरा उत्पन्न हो सकता है। अपनी पुस्तक 'The Managerial Revolution' मेंं बर्नहाम ने लिखा है-”पूंजीवाद पतन की ओर जा रहा है और एक नया अभिजन वर्ग उभर रहा है जो प्रबन्धकों का है। भविष्य में समाज आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से प्रबन्धकीय अभिजन द्वारा ही संचालित होगा।” माक्र्स ने जिस प्रबन्धकीय वर्ग की उपेक्षा की थी, बर्नहाम ने उसे आर्थिक व राजनीतिक शक्ति के बीच एकता स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण वर्ग माना है।

शुम्पीटर व कार्ल मैनहीम के राजनीतिक अभिजनों पर विचार 

शुम्पीटर व कार्ल मैनहीन बहुलवादी विचारक हैं। उन्होंने अभिजन वर्ग को बहुलवादी धारणा का समर्थन किया है। इनका कहना है कि लोकतन्त्र में सारे निर्णय जनता द्वारा ही किए जाते हैं, यह बात अव्यवहारिक है। वास्तव में सारे निर्णय गिने-चुने लोग ही करते हैं। वेबर ने भी लोकतन्त्र को नया अर्थ दिया है। उसका कहना है कि लोकतन्त्र राजनीतिक नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा है। इसी बात को स्वीकार करते हुए शुम्पीटर ने अपनी पुस्तक 'Capitalism, Socialism and Democracy' में लिखा है कि लोकतन्त्र के राजनीतिक निर्णय नेताओं द्वारा लिए जाते हैं, जनता द्वारा नहीं। लोकतन्त्र में केवल यह खूबी है कि वहां पर राजनीतिक अभिजन असीम सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकते, बल्कि वे राजनीतिक बाजार में अधिक से अधिक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अधिक-से-अधिक आकर्षक नीतियां और कार्यक्रम प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। लोकतन्त्र में अभिजनों के अनेक समूह होते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक समाजों को बहुलवादी समाज कहा जाता है। इसी तरह मैनहीम ने अपनी पुस्तक 'Ideology and Utopia' में लिखा है कि “शक्ति अभिजन वर्ग के ही हाथों में होती है और यह अभिजन वर्ग लोकतन्त्र में बहुलवादी होता है तथा इसमें सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष चलता रहता है।” इस तरह लोकतन्त्र में शासित अपने हितों के अनुरूप शासक वर्ग को चलने को मजबूर कर देते हैं। यद्यपि नागरिकों को सरकार में सीधे भाग लेने से रोका जा सकता है, लेकिन उनकी इच्छा का दमन नहीं किया जा सकता है।

मिलोपन जिलास व मैक्स वेबर के राजनीतिक अभिजनों पर विचार

इन दोनों विद्वानों का कहना है कि समाजवादियों का यह मानना गलत है कि समाजवादी व्यवस्था में अभिजन वर्ग नहीं होता। समाजवादियों का कहना है कि समाजवाद में अभिजनवर्ग की तानाशाही की बजाय सर्वहारा वर्ग की तानाशाही होती है, लेकिन रेमण्ड आरोन का कहना है कि समाजवादी समाज में भी एक अभिजन वर्ग अवश्य होता है जिसे सर्वहारा की तानाशाही कहा जाता है। वर्गविहीन समाज में इस अभिजन वर्ग से बचने का कोई उपाय नहीं होता है। मैक्स वेबर ने भी इसी मत की पुष्टि की है। उनका कहना है कि समाजवादी देशों में शासन सत्ता एक नये अभिजन वर्ग के हाथों में आ गई है जिसमें साम्यवादी दल के बड़े-बड़े नेता और उच्च अधिकारी शामिल हैं। मिलोवन जिलास ने भी इसी एकमात्र अभिजन वर्ग को समाजवादी व्यवस्था का अभिजन वर्ग कहा है। इसमें वे सभी लोग शामिल हैं जिन्हें प्रशासनिक एकाधिकार के कारण कुछ विशेषाधिकार और शक्तियां प्राप्त होती हैं। यही वर्ग समस्त सुविधाओं का लाभ उठाता है।

विभिन्न विचारकों के अभिजन सम्बन्धी विचारों का अध्ययन करने के बाद कह सकते हैं कि प्रत्येक राजनीतिक समाज चाहे वह समाजवादी हो या सर्वसत्ताधिकारवादी, लोकतन्त्रीय हो या निरंकुश शासन व सत्ता के धारक कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपनी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक स्थिति के कारण आम जनता से अलग होते हैं और राजनीतिक समाज के सर्वोच्च शिखर पर होते हैं। ये लोग अल्पसंख्यक होते हुए भी राजनीतिक समाज के बहुसंख्यक वर्ग या जनपुंज के लिए निर्णय लेते हैं और उन्हें लागू करते हैं। लोकतन्त्र में तो ये जनसहमति का कुछ अधिक ध्यान रखते हैं, लेकिन निरंकुश शासन-व्यवस्थाओं में यह जनसहमति की बजाय बल-प्रयोग पर अधिक विश्वास रखते हैं। समाजवादी व्यवस्थाओं में भी इनका एक वर्ग अवश्य होता है। इनकी खुली प्रतिस्पर्धा तो लोकतन्त्र में ही चलती है। ये जोड़-तोड़ में माहिर होने के कारण अपने को सत्ता में बनाए रखने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। इनमें परिवर्तन भी होता रहता है। इनकी प्रकृति स्थाई नहीं होती। इन्हें सामाजिक परिवेश में ध्यान में रखकर ही कार्य करना पड़ता है। लोकतन्त्र में चुनावों द्वारा तथा निरंकुश व्यवस्थाओं में जन क्रान्तियों द्वारा ही इन्हें बदला जा सकता है। लेकिन अभिजन वर्ग कभी जनता का साथ नहीं छोड़ता। पुराने अभिजनों का स्थान समयानुसार नए अभिजन लेते रहते हैं। इसलिए प्रत्येक राजनीतिक समाज में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यवस्था की निर्णयकारी प्रक्रिया पर इसी वर्ग का वर्चस्व होने के कारण ये जनपुंज के भाग्य विधाता हैं और राजनीतिक व्यवस्था के आधार हैं।

शासक-वर्ग का अभिजन सिद्धान्त

यह सिद्धान्त समाजवादी विचारक कार्ल माक्र्स की देन है। कार्ल माक्र्स की तरह अन्य समाजवादी भी माक्र्स के वर्ग-संघर्ष में विश्वास व्यक्त करते हैं। समाजवादियों का मानना है कि समाज में दो वर्ग होते हैं-एक तो शासक वर्ग और दूसरा शासित वर्ग। इनमें शासक वर्ग उत्पादन व वितरण के साधनों पर स्वामित्व वाला वर्ग होता है जो राजनीतिक शक्ति का प्रयोग भी अपने पास रखता है। शासक और शासित वर्ग के हितों में भिन्नता होने के कारण इन दोनों में लम्बे समय तक संघर्ष चलता रहता है। समाज में ऐतिहासिक दृष्टि से गौर किया जाए तो सदैव वर्ग-संघर्षों का अस्तित्व रहा है। स्वतन्त्र तथा दास, जागीरदार और कृषक, पूंजीपति व मजदूर, अमीर व गरीब, शासक व शासित आदि दो वर्गों के रूप में दोनों वर्ग एक दूसरे के विरोधी हितों का पोषण करते रहते हैं। जब तक क्रान्ति नहीं होगी तब तक शासित वर्ग को उखाड़ फैंकना असम्भव है। क्रान्ति के लिए वर्ग-संघर्ष का चरम सीमा पर पहुंचना आवश्यक है। आगे चलकर अन्य समाजवादियों ने भी माक्र्स की बात से सहमति दिखाई। समाजवादियों का कहना है कि समाजवाद में अभिजनवर्ग की तानाशाही से छुटकारा पाया जा सकता है क्योंकि वहां पर वर्ग-विहीन समाज की स्थापना हो जाती है। लेकिन वास्तव में देखा जाए तो समाजवाद में भी अभिजन वर्ग का सिद्धान्त ही कार्य करता है। युगोस्वालावाकिया में साम्यवादी नेता मिलोवन जिलास ने लिखा है कि साम्यवादी देशों में अफसरों की एक पूरी फौज शोषक के रूप में उभर रही है जो देश की सम्पत्ति का उपभोग करती है, उसका आनन्द लेती है और उसका संचालन करती है। इसी प्रकार मैक्स वेबर भी समाजवादी देशों में सत्ता को नए वर्ग के हाथों में स्थानान्तरित होने की बात की पुष्टि करता है। रेमण्ड एरोन का कहना है कि साम्यवादी देशों में उभरने वाला नया अभिजन वर्ग लोकतन्त्रीय देशों के अभिजनों से भी अधिक शक्तिशाली हैं। इससे स्पष्ट होता है कि साम्यवादी देशों में भी शासक और शासित दो वर्ग आज भी विद्यमान हैं। 1917 की क्रान्ति के बाद रूस से तथा अन्य साम्यवादी देशों से भी इस वर्ग का सफाया नहीं हो सकता है। आज विश्व के सभी साम्यवादी देशों में इस वर्ग की पूर्ण प्रभुता है।

मार्क्स व अन्य समाजवादियों द्वारा दिया गया शासक-वर्ग का सिद्धान्त आज कम प्रासंगिक है, क्योंकि उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या पर इस सिद्धान्त को खड़ा करके इसे आलोचनाओं का भी पात्र बना दिया है। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारणों पर अधिक ध्यान देकर गैर-आर्थिक तत्वों पर कम ध्यान दिया है। माक्र्स का यह विचार कि अन्त में पूंजीपति गुट समाप्त हो जाएगा और सर्वहारा शासक वर्ग बन जाएगा, सत्य नहीं निकली। अनेक देशों में पूंजीपति और श्रमिक वर्ग एक दूसरे के साथ रहकर ही अपने हितों का भला देखने लगे और आज मध्यम वर्ग के उदय ने माक्र्स के शासक-वर्ग के विचार को धूमिल कर दिया है। आज समाजवादी देशों में भी जो नया अभिजन वर्ग उभर रहा है, वह जनता के हितों का पोषक है। चीन में अभिजन वर्ग देश के चहुंमुखी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज का शासक-वर्ग माक्र्स के शासक-वर्ग से काफी भिन्न प्रकृति का है। वह जन-सहमति को व्यापक महत्व देता है। वास्तव में माक्र्स का शासक-वर्ग का सिद्धान्त ही अभिजन-सिद्धान्त का पोषक है। माक्र्स ने जिस शासक-वर्ग की पुष्टि की थी, वास्तव में वही शासक-वर्ग आज का अभिजन-वर्ग है। समाजवादी देशों में सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के रूप में जो नया अभिजन वर्ग उभरा है, वह आधुनिक अभिजनों जैसी प्रकृति वाला है। इस अभिजन वर्ग की राजनीतिक-निर्णयों के निर्माण व लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। एस0पी0 वर्मा ने लिखा है-”अभिजनवर्ग का सारा सिद्धान्त माक्र्स के शासक-वर्ग के सिद्धान्त के प्रतिरोध में खड़ा किया गया है।” आज सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार के आ जाने से शासक-वर्ग की धारणा का स्थान अभिजन वर्ग ले चुका है जो काफी लोकतांत्रिक स्वरूप के निकट है। जनसहमति को अपना आधार बनाकर यह वर्ग राजनीतिक व्यवस्था में नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। अत: माक्र्स का शासक-वर्ग का सिद्धान्त आज अप्रासंगिक सा प्रतीत होता है। उसके स्थान पर अभिजन-वर्ग का जो नया सिद्धान्त प्रचलित हुआ है, वह उससे अधिक व्यवहारिक व प्रासंगिक है।

लोकतन्त्र का अभिजन सिद्धान्त

यद्यपि लोकतन्त्र और अभिजन एक दूसरे से बेमेल से पड़ते हैं, क्योंकि लोकतन्त्र तो बहुमत का शासन होता है जबकि अभिजन अल्पमत के शासन को व्यक्त करता है। लोकतन्त्र में प्रत्यक्ष रूप में जहां सारे निर्णय जनपुंज द्वारा लिए जाते हैं, वास्तविक रूप में सारे निर्णय गिने चुने लोगों या सत्ताधारियों द्वारा ही लिये जाते हैं। जर्मन समाज वैज्ञानिक मैक्स वेबर ने भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहा है कि लोकतन्त्र जनता का शासन न होकर ‘राजनीतिक नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा’ है। अमेरिकी अर्थशास्त्री जो सेफ शुंपीटर ने भी वेबर की बात से सहमति प्रकट करते हुए अपनी पुस्तक 'Capitalism, Socialism and Democracy' में लिखा है कि “लोकतन्त्र में समस्त निर्णय राजनीतिक नेताओं द्वारा ही लिए जाते हैं, जनसाधारण द्वारा नहीं।” परन्तु लोकतन्त्र की यह प्रमुख विशेषता है कि इसमें राजनीतिक नेता तानाशाही की तरह असीम शक्ति व सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकते बल्कि लुभावनी घोषणाओं और कार्यक्रमों से व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करने के प्रयासों में लगे रहते हैं।” इसी तरह आरवैल ने भी कहा है कि समाज के वास्तविक शासक अप्रकट होते हैं और ये शासन को बहुत प्रभावित करते हैं।

पैरेटो और मोस्का ने प्रजातन्त्र में भी अभिजन वर्ग का महत्व प्रतिपादित किया है। उनका कहना है कि लोकतन्त्र में व्यक्तियों की प्रतिभाओं और योग्यताओं आदि में स्वाभाविक असमानता पाई जाती है। इसीलिए प्रजातन्त्र प्रजा का और प्रजा के लिए तो शासन हो सकता है, लेकिन प्रजा के द्वारा शासन कभी नहीं हो सकता। मिचेल्स का कहना है कि अधिकतर मनुष्य स्वभाव से आलसी व दास वृत्ति के होते हैं जो अपना शासन स्वयं नहीं चला सकते। इसलिए उन्हें भी शासित होने के लिए बुद्धिजीवि शासक-वर्ग की आवश्यकता पड़ती है। मोस्का का यह कहना सही है कि लोकतन्त्र में विभिन्न वर्गों में शक्तियों का संतुलन रखने का कार्य अभिजन वर्ग ही करता है। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इस वर्ग द्वारा समाज में सन्तुलन बनाए रखना व प्रजातन्त्र के साथ तालमेल बनाए रखना आवश्यक होता है। कार्ल मैन्हाइम ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'Ideology and Utopia' में लिखा है कि लोकतन्त्रीय व्यवस्था में जब समाज नीति-निर्माण का कार्य विशिष्ट वर्ग को सौंप देता है तो वह लोकतन्त्र शून्य नहीं हो जाता। जनसाधारण निश्चित अन्तराल के बाद वोट डालकर अपनी भावना प्रकट कर देता है। अपने मताधिकार के बल पर वे नेताओं को बहुमत के हित में निर्णय करने को विवश कर सकते हैं। विशिष्ट वर्ग के शासन और लोकतन्त्रीय शासन में तालमेल बिठाने के लिए यह आवश्यक होता है कि नेताओं का चुनाव योग्यता के आधार पर किया जाए और अभिजनवर्ग तथा जनपुंज की दूरी कम की जाए। रेमोंद आरों ने अपनी पुस्तक 'Social Structure and the Ruling Class' में लिखा है कि लोकतन्त्र तथा अन्य शासन-प्रणालियों के अभिजनों में बुनियादी अन्तर पाया जाता है। जहां समाजवाद में एक ही अभिजन को शासन का एकमात्र अधिकार प्राप्त होता है, वहीं उदार लोकतन्त्र में विशिष्ट वर्ग की बहुलता होती है और शासन में नियन्त्रण एवं संतुलन की ऐसी व्यवस्था पाई जाती है कि असीम सत्ता का प्रयोग असम्भव हो जाता है। उदारवादी लोकतन्त्र में सारा शासन जनमत की इच्छा से चलता है। जब एक अभिजन-वर्ग जनता की इच्छा का सम्मान करने में असफल हो जाता है तो उसका स्थान दूसरा अभिजन वर्ग ले लेता है। सारटोरी ने भी अपनी कृति 'Democratic Theory' में लिखा है कि लोकतन्त्र में अभिजन वर्ग चुनावी मैदान में उतरकर आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं। लेकिन विशिष्ट वर्ग को लोकतन्त्र की अपूर्णता नहीं समझना चाहिए। चूंकि जनपुंज अपने आप में शासन चलाने में समर्थ नहीं होता, इसलिए शासन सचमुच योग्य नेताओं का कार्य है। इसलिए लोकतन्त्र को असली खतरा नेतृत्व के अस्तित्व में नहीं है, बल्कि नेतृत्व के अभाव में है। यदि लोगों को उचित नेतृत्व नहीं मिलेगा तो लोकतन्त्र विरोधी अभिजन लोकतन्त्र को नष्ट कर सकता है।

लोकतन्त्र एक खुली व्यवस्था होने के कारण इसमें भी अभिजन वर्ग का परिसंचरण होता है। शक्तिधारकों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनना ही पड़ता है। स्वयं अभिजनों में कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है। अपने को शासन व सत्ता में बनाए रखने के लिए उन्हें कड़ी चुनावी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जो शासक-वर्ग जनहित की उपेक्षा करता है और सामाजिक परिवर्तन के प्रति उदासीन रहता है, वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है और उसका स्थान दूसरा अभिजन वर्ग लेता है जो सामाजिक परिवर्तन व जनहित के प्रति अधिक सचेत रहता है। लोकतन्त्र में मिचेल्स का लौह नियम लागू नहीं हो सकता, क्योंकि प्रजातन्त्र बहुदलीय व्यवस्था होती है। इसमें निश्चित अवधि के बाद चुनाव अभिजनों की वैधता की परीक्षा करा देते हैं। लोकतन्त्र में भी अभिजनों और जनता के बीच विरोधों का मिलना एक स्वाभाविकता है। प्रजातन्त्र में इन दोनों वर्गों के विरोधी हितों में पूर्ण सामंजस्य सम्भव नहीं है, लेकिन फिर भी काफी हद तक आपसी विरोधों को टाला जा सकता है। यदि अभिजनों में मानवीय विशेषताएं उच्च कोटि की हों, अच्छे प्रशासक के गुण हों, प्रजातांत्रिक आत्मनियंत्रण की भावना हो तो अभिजनों और जनता के बीच संघर्ष को काफी हद तक कम किया जा सकता है। प्रजातन्त्र प्रतियोगिता की बजाय मतैक्य पर अधिक सफल हो सकता है। इसलिए इसमें छोटे छोटे समूहों की प्रतियोगिता से बचना चाहिए।

लोकतन्त्र में अभिजनों की भूमिका

यद्यपि लोकतन्त्र और अभिजन सर्वथा एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं। लेकिन कुछ विद्वानों ने इन दोनों में मेल कराने का प्रयास किया है। लेकिन व्यवहार में देखा जाए तो लोकतन्त्र का सारा कार्य अभिजन वर्ग ही करता है। लेकिन कई बार यह लोकतन्त्रीय आस्थाओं को कुलचने वाला तानाशाही शासक बन जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका में जिन देशों में लोकतन्त्रीय व्यवस्थाएं स्थापित हुई थी, वहां धीरे धीरे अभिजन वर्ग के कारनामों से सैनिक सरकारें स्थापित होने लगी और अभिजन वर्ग लोकतन्त्र का रक्षक बनने की बजाय लोकतन्त्र का भक्षक बन गया। लेकिन फिर भी लोकतन्त्र में अभिजनों को बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। लोकतन्त्र में इसकी भूमिका पर विचार करते हुए पीटर बाचार्च ने लिखा है-”लोकतांत्रिक खेल के नियमों को बनाए रखने का उत्तरदायित्व जनता के कन्धों पर न होकर विशिष्ट जनों के कन्धों पर होता है।” डाई व जिगलर ने अपनी पुस्तक 'The Theory of Democracy' में लिखा है-”यह लोकतन्त्र की विडम्बना है कि यह लोगों का शासन होते हुए भी इसको बनाए रखने का दायित्व अभिजनों के कन्धों पर ही होता है न कि सामान्य लोगों के ऊपर।” राबर्ट सी0 बोन का कहना है कि “लोकतन्त्र की विचित्र बात यह है कि लोकतांत्रिक समाज के परम्परागत मूल्यों से प्रतिबद्धता जनसाधारण की न होकर अभिजनों की ही होती है।”

इन सभी विद्वानों का मानना है कि उदारवादी व्यवस्थाओं में प्रजातांत्रिक मूल्य जनता द्वारा नहीं अभिजन वर्ग द्वारा ही सुरक्षित रखे जाते हैं। जब उनके ऊपर कोई आंच आती है तो ये लोकतन्त्र को छोड़कर निरंकुश व्यवस्था के रूप में अपने को शासन व सत्ता में कायम रख लेते हैं। इसलिए लोकतन्त्र की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि जनता को राजनीति से अलग ही रखा जाए। जन राजनीति अभिजनों के लिए खतरे की घण्टी है। इससे भयभीत होकर ही वे लोकतन्त्रीय आस्थाओं का त्याग करते हैं। लोकतन्त्र की रक्षा के लिए ही वे लोकतन्त्र की बलि देकर निरंकुश व्यवस्थाओं की स्थापना करने लगते हैं। जब उन्हें सत्ता को कोई खतरा उत्पन्न हुआ लगता है तो लोकतन्त्र को बचाने के नाम पर समाचार पत्रों या प्रैस की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगवा देते हैं और प्रत्येक असहमति को कुचलने का प्रयास करते हैं। लोगों के मौलिक अधिकारों व स्वतन्त्रताओं का नाश करने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती। समस्त पुलिस तन्त्र को मजबूत बनाकर वे विरोधी अभिजनों तक को भी जेल में डाल देते हैं और भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का गला घोट देते हैं। डाई व जिगलर ने ठीक ही कहा है-”विडम्बना वास्तव में यह है कि लोकतन्त्र को बचाने के लिए अभिजन लोकतन्त्र की ही बलि चढ़ा देते हैं।” इसलिए लोकतन्त्र को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि अभिजनों को कोई आधारभूत चुनौती न मिले और राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्रों में कोई परिवर्तन न हो। अभिजन वर्ग को भी इतना खुला रखा जाए ताकि योग्य व्यक्ति उसमें प्रवेश पा सकें और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता दिखा सकें।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लोकतन्त्र और अभिजन सिद्धान्त बेमेल प्रतीत होते हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब अभिजनों ने लोकतन्त्रीय आस्थाओं का गला घोटा है। जर्मनी में अभिजनों ने लोकतन्त्रीय आस्थाओं का जो जनाजा निकाला था, वह किसी से छिपा नहीं है। लोकतन्त्र में लगभग पांच वर्षों बाद होने वाले चुनाव अभिजनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि कर देते हैं। प्रत्येक पांच वर्ष के अन्तराल पर अभिजनों के नए वर्ग उभर कर लोकतन्त्र में भीड़तन्त्र को जन्म देते हैं। अभिजनों का का जल्दी जल्दी बदलाव, परिवर्तन और संचलन अभिजनों को अपने पैर स्थाई तौर पर कभी नहीं जमने देता। इसलिए वास्तव में लोकतन्त्र में अभिजन बन ही नहीं पाते। एस0पी0 वर्मा का ऐसा ही मानना है। इसलिए लोकतन्त्र और अभिज्ञान सिद्धान्त बेमेल है। लेकिन हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि विकासशील देशों में राष्ट्रीय आन्दोलनों को सफल बनाने में विशिष्ट वर्ग और बुद्धिजीवियों ने ही महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसलिए आज भी राजनीतिक विकास व आधुनिकीकरण को गति देने में इसी वर्ग का विशेष योगदान है। जब तक अभिजनों की सत्ता को कोई खतरा उत्पन्न नहीं होता है, तब तक ये लोकतन्त्र के सजग प्रहरी बनकर ही कार्य करते हैं। इसलिए लोकतन्त्र की सुरक्षा के लिए जनता और अभिजनों को टकराव की नीति छोड़कर लोकतन्त्रीय आस्थाओं की सुरक्षा के लिए सहयोग के आधार पर ही कार्य करना चाहिए। इसी में जनता और अभिजन वर्ग दोनों का भला है और लोकतन्त्र में अभिजनों की सार्थकता का औचित्य भी है।

राजनीति अभिजन-सिद्धान्त का मूल्यांकन

यद्यपि अभिजन सिद्धान्त का जन्म माक्र्सवादी विचारों या शासक-वर्ग की कल्पना को असत्य सिद्ध करने के लिए हुआ था, लेकिन लोकतन्त्र के बढ़ते ज्वार ने इस सिद्धान्त को पैरों तले रौंद डाला। आज अभिजन सिद्धान्त पर तरह तरह के आपेक्ष लगाए जाते हैं :-
  1. यह सिद्धान्त राजनीति में जोड़-तोड़ जैसे शब्दों का प्रयोग करके राजनीति के नैतिक व आध्यात्मिक पक्षों की अवहेलना कर देता है। यदि इस सिद्धान्त को मान लिया जाए तो आधुनिक युग में मैकयावेली और हॉब्स के कथन मानव स्वभाव को सही रूप में चित्रित करने लगेंगे और राजनीति में अच्छे जीवन और परिचालन के सिद्धान्तों का अन्त हो जाएगा।
  2. यह सिद्धान्त सत्ताधारकों और साधारण जनता के बीच कल्पित शक्ति आधारों के साथ सत्ता और नेतृत्व की समानता करने का भी दोषी है। यह सिद्धान्त सत्ताधारियों व उसके अनुयायियों में प्रेरणा के तत्व की भूमिका की अवहेलना कर देता है।
  3. इस सिद्धान्त का यह विचार गलत है कि निर्णय-निर्माण में अभिजन वर्ग की भूमिका ही प्रमुख होती है। लोकतन्त्र में कोई भी सरकार जनमत की अवहेलना नहीं कर सकती। लोकतन्त्र में नीति-निर्माण में गैर-राजनीतिक तत्वों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अत: लोकतन्त्र की दृष्टि से यह विचार गलत है कि नीति व निर्णय निर्माण प्रक्रिया पर अभिजनों का ही एकाधिकार होता है।
  4. यह सिद्धान्त सत्ता या शक्ति, प्राधिकार और प्रभाव जैसे शब्दों के बलच भेद को भुला देता है, जबकि ये सभी आपस में सम्बिन्ध् ात होने के कारण भी एक दूसरे से भिन्न होती है।
  5. यह सिद्धान्त माक्र्सवादी विचारधारा का खण्डन तो करता है, लेकिन उसका व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करने में असफल रहा है। यह सिद्धान्त माक्र्सवादी सिद्धान्त के विरूप एक मध्यवर्गीय सिद्धान्त खड़ा करने के प्रयास के सिवाय कुछ नहीं है। इसने लोकतन्त्र का भी एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था के साथ तालमेल कर दिया है जिसे सामाजिक परितर्वन कीे संतोषजनक व्याख्या करना सम्भव नहीं है।
  6. इस सिद्धान्त का यह कहना गलत है कि अभिजन समृद्ध लोगों में से ही आते हैं। मुसोलिनी एक लुहार का पुत्र था, वह गरीब परिवार में जन्म लेकर भी इटली के अभिजन वर्ग का नेता बना। इस तरह के इतिहास में अनेकों उदाहरण हैं जब गरीब तबके से भी अभिजन पैदा हुए हैं।
  7. अभिजनों द्वारा बल-प्रयोग की बात निरंकुश शासन व्यवस्थाओं में तो कुछ तर्कसंगत हो सकती है, लेकिन सदैव बल प्रयोग उचित नहीं रहता। रूस में जार के बल प्रयोग के बाद भी वहां उसका तख्ता पलट दिया गया और शासन पर श्रमिक वर्ग का अधिकार हो गया। शासित वर्ग का शासक बनना अभिजन सिद्धान्त की मान्यताओं को ठुकरा देता है। लोकतन्त्र में तो बल प्रयोग को न्यायसंगत रूप में ही बड़ी मुश्किल से स्वीकार किया जाता है। खुला बल-प्रयोग अभिजनों के पतन का कारण बनता है।
  8. अभिजन सिद्धान्त का यह कहना गलत है कि अभिजन वर्ग अपने हितों के साथ-साथ जनपुंज के हितों का भी पोषक होता है। सत्य तो यह है कि इस वर्ग में संकीर्ण स्वार्थ व अहम् की भावना इतनी प्रबल होती है कि ये अपने स्वार्थों के लिए देश-हित का भी बलिदान कर देते हैं। 1950 के बाद एशिया व अफ्रीका के कई देशों में अभिजनों के कारण लोकतन्त्र की बजाय सैनिक व्यवस्थाएं स्थापित हो गई थी। जर्मनी में हिटलर द्वारा नाजीवाद और इटली में फासीवाद की स्थापना का एक कारण हिटलर व मुसोलिनी की महत्वाकांक्षा था।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि अभिजन सिद्धान्त में अनेक दोष हैं, लेकिन इन दोषों से हमें यह नहीं समझ लेना चाहिए कि व्यवहारिक राजनीति-विज्ञान में इस सिद्धान्त की कोई संगतता व उपयोगिता नहीं है। इस सिद्धान्त के द्वारा विश्व की अनेक राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या की जा सकती है। विकासशील देशों की राजनीति को समझने में यह सिद्धान्त बहुत सहायक है क्योंकि इन देशों में राष्ट्रीय आन्दोलनों के विकास और स्वतन्त्रता के बाद संस्कृति-निर्माण, आर्थिक विकास, समाज सुधार, धार्मिक पुनरुत्थान आदि कार्यों को करने में अभिजन वर्ग का ही महत्वपूर्ण हाथ था। इन देशों में हम उन सामााजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों की जानकारी अभिजन सिद्धान्त के सन्दर्भ में ही प्राप्त कर सकते हैं जिनके कारण विकासशील देशों में नए सम्भ्रान्त वर्गों का जन्म हो रहा है। आधुनीकिकरण व राजनीतिक विकास में अभिजनों की भूमिका की जानकारी इसी सिद्धान्त के सन्दर्भ में ही प्राप्त की जा सकती है। आज हर राजनीतिक व्यवस्था में निर्णय-प्रक्रिया की बागडोर इसी अभिजन वर्ग के हाथ में है। अत: अभिजन वर्ग का सिद्धान्त राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण सिद्धान्त है।

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