राजनीतिक संचार क्या है?

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संचार साधनों के विकास ने मनुष्य को न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक मानव भी बना दिया है। संचार साधनों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही राजनीति विज्ञान में राजनीतिक संचार की संकल्पना का विकास किया गया है। आज राजनीतिक संचार राजनीति विज्ञान की वह महत्वपूर्ण अवधारणा बन चुका है जिसके बिना किसी राजनीतिक व्यवस्था के सम्पूर्ण ताने-बाने को समझना कठिन है। व्यक्ति का राजनीतिकरण केवल राजनीतिक संचार की व्यवस्था द्वारा ही किया जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक व्यवस्था में इस अवधारणा का महत्व अधिक हो गया है। राजनीतिक संचार ने राजनीतिक व्यवस्था को नई दिशा दी है। व्यक्ति की बढ़ती राजनीतिक सहभागिता व सक्रियता राजनीतिक संचार के महत्व को प्रतिपादित करती है। राजनीतिक व्यवस्था के निवेशों और निर्गतों को जोड़ने वाली कड़ी राजनीतिक संचार ही है। आज राजनीतिक संचार के बिना कोई भी संगठन तथा राजनीतिक व्यवस्था अपने उद्देश्यों तथा लक्ष्यों में सफल नहीं हो सकती। लोकतन्त्रीय शासन प्रणालियों में राजनीतिक संचार का जो महत्व है, वह सर्वाधिकारवादी राजनीतिक व्यवस्थाओं में भी है। राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था के एक भाग से दूसरे भाग को जोड़कर राजनीतिक व्यवस्था को गतिशील बनाता है। इसी कारण आज राजनीतिक संचार को राजनीतिक व्यवस्था की रक्तधारा कहा जाने लगा है।

राजनीतिक संचार का अर्थ व परिभाषा 

राजनीतिक संचार की अवधारणा ‘संचार’ की अवधारणा पर आधारित है। संचार को समझे बिना राजनीतिक संचार को समझना कठिन है। संचार को परिभाषित करने का व्यवस्थित प्रयास सर्वप्रथम नोबर्ट वीनर ने किया है। उसके अनुसार-”संचार एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक सूचनाओं का आदान-प्रदान है।” उसने आगे कहा है-”कि जीवन में पर्यावरण से जानकारी को ग्रहण करना, उस जानकारी का पर्यावरण के साथ तालमेल बैठाने में प्रयोग करना और बाहरी पर्यावरणों के साथ प्रभावी ढंग से रहने की प्रक्रिया ही संचार है।” संचार शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द 'Kubernetes' से हुई है जिसका अंग्रेजी में अर्थ ‘संचालक’ (Steersman) है। वीनर ने इसे अंग्रेजी में इसके लिए 'Cybernetics' शब्द का प्रयोग किया है। उसकी राजनीतिक संचार की संकल्पना को राजनीतिक साइबरनेटिक्स भी कहा जाता है। ‘साइबरनेटिक्स’ सूचनाओं के आदान प्रदान को ही इंगित करता है। वीरन की बात से अन्य राजनीतिक विज्ञान भी सहमत है। राजनीति विज्ञान में प्रयुक्त संचार शब्द का अर्थ उस अर्थ से अलग है जिसका सम्बन्ध समाचारपत्रों, रेडियो और दूरदर्शन जैसे संचार साधनों से लिया जाता है। राजनीतिक संचार तो राजनीतिक व्यवस्था के एक भाग से दूसरे भाग तक मांगों और नियमों (निर्गतों) का गत्यात्मक संचरण है। यह राजनीतिक व्यवस्था के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ता है। इसलिए राजनीतिक संचार का सम्बन्ध राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन से ही सम्बन्धित है।”
  1. जीन ब्लौण्डेल ने लिखा है-”राजनीतिक सम्प्रेषण राजनीतिक व्यवस्था के एक भाग से दूसरे भाग तक मांंगों और निर्णयों का गतिशील आंदोलन है, क्योंकि राजनीतिक व्यवस्था की कोई भी संक्रिया तब तक नहीं हो सकती जब तक कि व्यवस्था के विभिन्न भाग एक दूसरे से सम्प्रेषण न कर सकें।”
  2. ल्यूशियन पाई ने अपनी पुस्तक 'Communication and Political Development' में लिखा है-”राजनीतिक सांचार राजनीतिक व्यवस्था का ताना-बाना है।” पाई की दृष्टि में राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था में गतिशीलता व सक्रियता का ऐसा माध्यम है जिनसे राजनीतिक व्यवस्था के विभिन्न भाग अन्त:क्रियाशील बनते हैं। यह राजनीतिक संचार का सीमित अर्थ है। ल्यूशियन पाई की परिभाषा भी जीन ब्लौण्डेल से मिलती-जुलती है।
  3. कार्ल डयूश के अनुसार-”राजनीतिक संचार सूचनाओं और जानकारी का राजनीतिक व्यवस्था के आर-पार सम्प्रेषण है।” इस तरह सीमित अर्थ में राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था में मांगों व निर्णयों का एक भाग से दूसरे भाग में गत्यात्मक संचलन है।”
  4. मिलेट के अनुसार-”राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था व प्रशासकीय संगठन की रक्तधारा है।”
  5. जार्ज ए0 मिलर के अनुसार-”राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था में आगत-निर्गत सहसम्बन्धों का माप है।”

राजनीतिक संचार के अभिकरण व संरचनाएं

विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करने से यह तथ्य उजागर होता है कि प्रत्येक देश की राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार की कुछ औपचारिक व अनौपचारिक संरचनाएं या अभिकरण है जो राजनीतिक संचार के कार्य करती है। औपचारिक संरचनाओं में - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, व हित समूह शामिल हैं, जबकि अनौपचारिक संरचनाओं में परिवार, रक्त सम्बन्ध, वंश परम्पराएं, निकटस्थ समूह, पड़ोसी, समुदाय, ग्राम, जातीय और भाषायी समूह आदि हैं। लेकिन इनके साथ-साथ प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में जनसम्पर्क के साधन भी हैं जो उपरोक्त संरचनाओं को व्यावहारिक रूप प्रदान करते हैं। ऑमण्ड तथा पावेल ने इन संरचनाओं को पांच भागों में बांटा है। उसके अनुसार राजनीतिक संचार की प्रमुख संरचनाएं हैं :-
  1. राजनीतिक निदेशों की संरचनाएं (Political Input Structures)
  2. राजनीतिक निर्गतों की संरचनाएं (Political Output Structures)
  3. परम्परागत सामाजिक संस्थाएं (Traditional Social Institutions)
  4. जनसंचार के साधन (Mass Media)
  5. अनौपचारिक व प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सम्बन्ध (Informat and Direct Personal Relations)

राजनीतिक निवेशों की संरचनाएं 

प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में निवेश प्रक्रिया को गति देने के लिए कुछ संरचनाएं होती हैं जो मांगों और समर्थनों के रूप में निवेशों की राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कराती है। ये संरचनाएं प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में पाई जाती हैं, लेकिन प्रजातन्त्रीय देशों में इनका प्रभाव अधिक रहता है। राजनीतिक दल, हित समूह तथा दबाव समूह ऐसी ही औपचारिक संरचनाएं हैं जो जनता की मांगों को राजनीतिक नेताओं तक पहुंचाते हैं। बलों व समूहों तक जनता की पहुंच होने के कारण ये मांगें आसानी से राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर जाती हैं। सरकारी नियन्त्रण से मुक्त होने के कारण ये समूह राजनीतिक दलों के माध्यम से अपने व्यक्तिगत सम्पर्कों के कारण अपना यह कार्य आसानी से कर लेते हैं। इसी कारण हित समूहों की निवेश प्रक्रिया के वाहक कहा जाता है। जिस तरह निवेश संरचनाएं जनता की मांगें राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचाती हैं, उसी तरह वे सरकार की बातें भी जनता तक पहुंचाती हैं। अब राजनीतिक निवेशों की संरचनाएं राजनीतिक संचार के महत्वपूर्ण अभिकरण हैं।

राजनीतिक निर्गतों की संरचनाएं 

जिस तरह निवेशों की संरचनाएं होती हैं, उसी तरह प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में निर्गतों की भी औपचारिक राजनीतिक संरचनाएं होती हैं। इन संरचनाओं में सरकारी व प्रशासकीय मशीनरी आती है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा नौकरशाही ऐसी ही संरचनाएं है। इनका राजनीतिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हाथ होता है। सूचनाओं को राजनीतिक व्यवस्था के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुंचाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इन्हीं के कारण राजनीतिक व्यवस्था गतिशील बनी रहती है और सम्पूर्ण शासनतन्त्र एक ढांचे में बंधा रहता है। ये संस्थाएं जनता व नेताओं को जोड़ती है और जनता को राजनीतिक व्यवस्था के घेरे में जानकारी देती है। इन्हीं संरचनाओं के माध्यम से निर्गतों के रूप में निर्णयों को समाज में लागू किया जाता है। सरकारी तन्त्र की सभी सूचनाओं या निर्णयों को ये संरचनाएं ही समाज में वितरित करती है। इस तरह निर्गत-संरचनाएं भी राजनीतिक संचार की प्रक्रिया में अहम् भूमिका अदा करने वाले अभिकरण हैं।

परम्परागत सामाजिक संरचनाएं

इन संरचनाओं के अन्तर्गत परिवार, जाति, मत, रक्त सम्बन्ध, वंश परम्पराएं, निरुक्त समूह, पड़ोसी, समुदाय, ग्राम आदि आते हैं। इन सामाजिक व आर्थिक संस्थाओं का भी राजनीतिक संचार में महत्वपूर्ण योगदान रहता है। कबीलों तथा जनजातियों के सरदार अपने विशेष प्रभाव के कारण अपने समाज पर राजनीतिक प्रभाव डालने में सफल रहते हैं। राजनीतिक समाज की समस्त जानकारी रखने वाले व उसका प्रवाह करने वाले यही एकमात्र आधार होते हैं। आजकल धार्मिक नेताओं द्वारा भी राजनीतिक प्रश्नों तथा विवादों की व्याख्या की जाने लगी है। श्रीलंका तथा वियतनाम में धार्मिक नेता ही विशिष्ट वर्गों तथा साधारण जनता में राजनीतिक सम्प्रेषण का कार्य करते हैं। परिवार व जातीय समूह भी राजनीतिक सूचनाओं के आदान-प्रदान में पीछे नहीं हैं। वास्तव में सभी परम्परागत सामाजिक संरचनाएं ही राजनीतिक ज्ञान की सूचनाओं का आदान-प्रदान करने वाले अभिकरण हैं।

जनसंचार के साधन 

इन्हें जनसम्पर्क के साधन भी कहा जाता है। इनमें पत्र-पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्र, पुस्तकें, इन्टरनेट आदि व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन साधनों का प्रयोग सभी राजनीतिक दल, दबाव समूह तथा निवेश व निर्गत राजनीतिक संरचनाएं खुलकर करती हैं। लोकतन्त्रीय देशों में इन साधनों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त रखकर सम्प्रेषण कार्य कराया जाता है, जबकि सर्वाधिकारवादी देशों में ये सरकारी नियन्त्रण में रहकर ही संचार कार्य करती है। ये साधन विशेषीकृत व विभेदीकृत होने के कारण राजनीतिक संचार के सर्वाधिक प्रभावशाली साधन माने जाते हैं। ये साधन जन मान्यताओं और अभिरुचियों को राजनीतिक व्यवस्था के अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इसलिए जनसंचार के साधन राजनीतिक संचार के सबसे अच्छे व प्रभावी अभिकरण हैं।

अनौपचारिक व प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सम्बन्ध 

राजनीेतिक संचार की प्रक्रिया में व्यक्ति का व्यक्ति से अनौपचारिक व प्रत्यक्ष सम्पर्क भी राजनीतिक संचार का अभिकरण है। यह अभिकरण प्रत्येक प्रकार के नियन्त्रण से मुक्त रहता है। राजनीतिक संचार के जनसंचार के अभिकरण भी इतने प्रभावशाली नहीं हरते, जितना यह अभिकरण। राजनीतिक घटनाओं की जानकारी रखने वाले व्यक्ति राजनीतिक संचार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उनके सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति अवश्य ही राजनीतिक बातों का ज्ञान प्राप्त करेंगे। राजनीतिक घटनाओं की जानकारी रखने वाले व्यक्ति कभी-कभार राजनीतिक नेतृत्व को भी प्राप्त कर लेते हैं। उस स्थिति में उनकी राजनीतिक संचार के अभिकरण के रूप में भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि रजानीतिक संचार को गति देने वाली अनेक सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं या अभिकरण हैं। सभी अभिकरण राजनीतिक व्यवस्था में एक स्थान से दूसरे स्थान तक एक भाग से दूसरे भाग तक राजनीतिक सूचनाओं का आदान प्रदान करते हैं। ये अभिकरण ही राजनीतिक व्यवस्था की गतिशीलता का आधार होते हैं और राजनीतिक व्यवस्था मेंं रक्त संचार की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था के जीवन का आधार यही अभिकरण होते हैं। इसी कारण इन्हें राजनीतिक व्यवस्था की प्राणवायु कहा जाता है।

राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार की भूमिका

प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। राजनीतिक संचार ही वह साधन है जो व्यवस्था के पक्ष में स्वस्थ जनमत तैयार करता है और राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। राजनीतिक जागरूकता लाकर राजनीतिक विकास को गति देने में संचार साधनों की भूमिका ही महत्वपूर्ण रहती है। लोकतन्त्रीय व्यवस्था में तो राजनीतिक संचार के अभिकरण ही व्यवस्था को गतिशील बनाए रखते हैं। राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर उद्योगों को भी संचार के साधन ही सहारा प्रदान करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था के लिए विशेष राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण तैयार करने में राजनीतिक संचार के अभिकरणों की ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। राजनीतिक संचार द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के लिए किए गए कार्य ही उसकी भूमिका को स्पष्ट करते हैं। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार की भूमिका हो सकती है :-
  1. राजनीतिक संचार राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान करता है।
  2. राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था व उसकी संरचनाओं के लिए स्वस्थ जनमत का निर्माण करता है।
  3. राजनीतिक संचार राजनीतिक विकास को गति देता है।
  4. राजनीतिक संचार जनता में राजनीतिक चेतना व जामरूकता का स्तर ऊँचा करता है।
  5.  राजनीतिक संचार के अभिकरण औद्योगिक विकास में भी अहम् भूमिका निभाते हैं।
  6. राजनीतिक संचार राजनीतिक व्यवस्था के लिए विशेष व अनुकूल वातावरण का निर्माण करता है।
  7. राजनीतिक संचार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का सम्मान बढ़ाता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क में वृद्धि करता है।

राजनीतिक संचार की राजनीतिक प्रक्रिया के संचालन में भूमिका

प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था कुछ न कुछ प्रकार्यों का निष्पादन करती है। इन प्रकार्यों के निष्पादन के लिए बहुप्रकार्यात्मक राजनीतिक संरचनाएं होती हैं। इन संरचनाओं की प्रकार्यात्मक व्यवस्था को राजनीतिक प्रक्रिया कहा जाता है। यह राजनीतिक प्रक्रिया राजनीतिक व्यवस्था के निवेश व निर्गत सम्बन्धी कार्यों को निष्पादित करने वाली व्यवस्था है। इसमें राजनीतिक संचार की संरचनाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। राजनीतिक संचार ही राजनीतिक प्रक्रिया को गतिशील बनाकर राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता है। कार्ल ड्यूश ने राजनीतिक व्यवस्था में प्रक्रियात्मक संरचनाओं के संचालन के लिए एक नया सिद्धान्त पेश किया है, जिसे राजनीतिक संचार का सिद्धान्त कहा जाता है।

कार्ल डयूश का कहना है कि अपने क्रियात्मक रूप को व्यवहारिक व गतिशील बनाए रखने के लिए प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था को सूचना-प्रवाहों की आवश्यकता पड़ती है। उसका कहना है कि राजनीति और सरकार निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव प्रयासों का संचालन और समन्वय करने की प्रक्रियाएं हैं। इन प्रक्रियाओं का गत्यात्मक अध्ययन ही राजनीतिक प्रक्रिया का अध्ययन है। इस प्रक्रियात्मक अध्ययन के लिए संकल्पनाएं विकसित की गई हैं :-
  1. परिचालन संरचनाओं से सम्बन्धित संकल्पनाएं।
  2. प्रवाहों और संक्रियाओं से सम्बन्धित संकल्पनाएं।
  3. परिणामों से सम्बन्धित संकल्पनाएं।
  4. विशिष्ट संकल्पनाएं।
इन संकल्पनाओं के आधार पर कार्ल डयूश ने अपना संचार सिद्धान्त खड़ा किया है और राजनीतिक व्यवस्था की क्रियात्मकता पर संचार के प्रभाव को इंगित किया है। कार्ल डयूश का कहना है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था का प्रक्रियात्मक ढांचा घरेलू और विदेशी व्यवस्थाओं से सूचना प्राप्त करता है। उसके बाद सूचना की जांच पड़ताल और कांट-छांट होती है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में सूचनाओं के स्वागत व जांच-पड़ताल के लिए स्वागतकर्ता तथा स्वागत व्यवस्थाएं होती हैं। इसमें स्मृति का प्रतिनिधित्व करने वाले संरचनाएं सूचना को तुरन्त ही प्रक्रियाओं और परिणामों से सम्बन्ध रखने वाली अतीत के अनुभवों को अधिमान्यताओं से जोड़ देती है। मूल्यों को निर्धारित करने वाली सूचनाएं सम्भावनाओं को अधिमान्यताओं से जोड़ देती है और इसके बाद ही राजनीतिक व्यवस्था निर्णय-निर्माण की तरफ आगे बढ़ती है। संचालक संरचनाओं से और भी संरचनाएं होती हैं जो व्यवस्था द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करती है। ये संरचनाएं व्यवस्था द्वारा लागू किए गए निर्णयों के ऊपर लोगों की प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में सूचना को फिर से राजनीतिक व्यवस्था में प्रवाहित कर देती हैं। उनके निर्णय निर्माण तक वही प्रक्रिया दोहराई जाती है जो पहले दोहराई गई थी। इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया सूचनाओं के प्रवाह-प्रतिमान के रूप में चलती रहती है।

सूचना-प्रवाहों और संक्रियात्मक संकल्पनाओं का सम्बन्ध सूत्रों, भरों व भार-क्षमता से होता है। सूचना प्रवाहों का प्रतिमानित सेट वास्तव मेंं संचार का ताना-बाना होता है। भार का तात्पर्य सूचना की भेजी जाने वाली मात्रा से है। भार क्षमता इस बात पर निर्भर है कि सूचना के आदान-प्रदान के लिए कितने सूत्र (Channel) व्यवस्था में उपलब्ध हैं। भार-क्षमता का सम्बन्ध ग्रहणशीता, विश्वस्तता और विकृति से भी जोड़ा जाता है। यह सब राजनीतिक व्यवस्था में सूचना के संसाधन का कार्य करते हैं। यदि कोई अभिकरण व्यवस्था में आने वाली सूचना से कुशलता से निपट लेता है तो यह इसकी अनुक्रियात्मकता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो अवश्य सूचना के प्रवाह के रास्ते में कोई बाधा है।

परिणामों से सम्बन्धित संकल्पना में प्रतिसम्भरण या पुनर्निवेश की संकल्पना शामिल है। कार्ल डयूश ने नाबर्ट वीनर ये से अवधारणा ग्रहण की है। उसने अपनी इस संकल्पना पर ही संचार-सिद्धान्त खड़ा करते हुए कहा है कि व्यवस्था की प्रतिसम्भरण की प्रक्रिया ही उसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रभावकारी अधिकार देती है। कार्ल डयूश ने प्रतिसम्भरण की व्यवस्था को सकारात्मक तथा नकारात्मक दो भागों में बांटा है। उसने व्यवस्था के व्यवहार को घोषित दिशा में ले जाने वाली शक्ति को सकारात्मक प्रतिसम्भरण कहा है। उसका कहना है कि नकारात्मक प्रतिसम्भरण वह प्रक्रिया है जो निर्णयों और उनको लागू करने से उत्पन्न होने वाले परिणामों को स्वत: ही ऐसी दिशा में मोड देता है जो व्यवस्था को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के पास ले जाते हैं। कार्ल डयूश का मानना है कि नकारात्मक प्रतिसम्भरण की व्यवस्था ही व्यवस्था का आंतरिक संतुलन कम करके उसे गतिशील बनाए रखती है। इसी कारण कुछ विद्वानों ने नकारात्मक प्रतिसभ्मरण को संचार सिद्धान्त की आत्मा कहा है। इस नकारात्मक प्रतिसम्भरण द्वारा ही कोई व्यवस्था अपने निर्णयों या निर्गतों को नियमित करके वांछित लक्ष्यों की तरफ ले जाती है। इसलिए इसका राजनीतिक व्यवस्था में होना बहुत आवश्यक है।

विशिष्ट संकल्पनाएं नकारात्मक प्रतिसम्भरण (Feedback) की प्रक्रियाओं के परिचालन की व्याख्या से सम्बन्धित हैं। इस भार (Load), विलम्ब (Lag), लाभ (Gain) तथा अग्रता (Lead) शामिल हैं। भार का अभिप्राय परिवर्तनों की उस व्यापकता और गति से है जो व्यवस्था को अपने लक्ष्यों की तरफ ले जाती है। विलम्ब परिणामों और कार्यों के परिणामों के बारे में सूचना पर रिपोर्ट और कार्य करने में देरी का माप है। लाभ इस सूचना की प्राप्ति के बारे में व्यवस्था की अनुक्रियाओं से सम्बन्धित विस्तार को दिखाता है। अग्रता भारी परिणामों के पूर्वानुमानों की अनुक्रियाओं में कार्य करने की क्षमता है। इस प्रकार राजनीतिक संचार के सिद्धान्त के माध्यम से कार्ल डयूश ने राजनीतिक व्यवस्था के प्रक्रियात्मक पहलु पर जोर देकर राजनीतिक व्यवस्था को व्यवस्थित व गतिशील बनाए रखने पर जोर दिया है। उसका कहना है कि राजनीतिक व्यवस्था के सभी कार्य राजनीतिक संचार के माध्यम से ही किए जाते हैं। सभी राजनीतिक संरंचनाएं मांगों या निवेशों की प्रक्रिया से लेकर नियम-निर्माण व निर्णयों के निर्गतों के रूप में कार्य करने तक राजनीतिक प्रक्रिया के अंग बनी रहती है। राजनीतिक संचार ही राजनीतिक व्यवस्था के सभी अंगों की सूचना प्रवाह से जोड़कर उसकी क्रियात्मकता में वृद्धि करता है। अत: निष्कर्ष तौर पर यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक संचार राजनीतिक प्रक्रिया के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

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