राजनीतिक सिद्धांत क्या है?

अनुक्रम
राजनीतिक सिद्धान्त एक ऐसा पदबन्ध है जिसे राजनीतिक चिन्तन, राजनीतिक दर्शन, राजनीतिक विचार, राजनीतिक विश्लेषण, राजनीतिक परीक्षण, राजनीतिक विचारधारा, राजनीतिक व्यवस्था के सिद्धान्त आदि के पयार्य के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक दर्शन को तो आज भी समानार्थी माना जाता है। लेकिन वास्तव में ये दोनों शब्द एक जैसे नहीं है। दर्शन एक बुद्धि का विज्ञान है। प्लेटो और अरस्तु राजनीतिक दार्शनिक इसी कारण है कि उन्होंने सत्य की खोज की है। राजनीतिक दर्शन दर्शन का एक भाग है। दर्शन संसार की प्रत्येक वस्तु की व्याख्या करने का प्रयास करता है। इस सन्दर्भ में दर्शन न केवल ‘है’ का परीक्षण करता है बल्कि यह भी देखता है कि किसी वस्तु को कैसा होना चाहिए, इसमें वैज्ञानिक परीक्षणों के साथ-साथ कल्पना-लोक की बातें भी शामिल होती है। हैलोवैल का कहना है कि-’’दर्शन अर्थ की तलाश है, यह हमारे ज्ञान को कुछ विवेकशील व सार्थक प्रतिमानों में संश्लिष्ट करने का प्रयास करता है। दर्शन का वास्तविक उद्देश्य हमारे ज्ञान को बढ़ाना ही नहीं, बल्कि उसे और अधिक गहन करना भी है। जब दर्शन को राजनीतिक घटनाओं पर लागू किया जाता है तो यह राजनीतिक दर्शन बन जाता है। हैलोवैल का कहना है-’’राजनीतिक दर्शन का एक प्रमुख कार्य यह है कि वह मानव के विश्वासों को आत्म-सजगता में लाए और तर्क व बुद्धि के आधार पर उनकी समीक्षा करें। राजनीतिक दर्शन और राजनीतिक सिद्धान्त में प्रमुख अन्तर यही है कि दार्शनिक सिद्धान्तशास्त्री हो सकता है जैसे प्लेटो व अरस्तु थे, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि सिद्धान्तशास्त्री दार्शनिक भी हो। हैरोल्ड लासवैल और चाल्र्स मेरियम सिद्धान्तशास्त्री तो हैं, लेकिन वे हॉब्स व लॉक जैसे महान दाश्रनिक नहीं है। राजनीतिक दर्शन का राजनीतिक संस्थाओं के साथ उतना निकट का सम्बन्ध नहीं है जितना उन विचारों और महत्वकांक्षाओं के साथ है जो उन संस्थाओं में निहित है। यह अन्तर्निहित प्रेरणाओं, विश्वासों और महत्वाकांक्षाओं की खोज करने की आड़ में राजनीतिक घटनाओं और संस्थाओं की सतह के भीतर देखने का प्रयास करता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राजनीतिक दर्शन का मुख्य सरोकार इस समस्या से है कि ‘उत्तम जीवन’ की प्राप्ति के लिए किस तरह का राजनीतिक संगठन उपयुक्त होगा। उत्तम जीवन क्या है?-यह नैतिक चिन्तन का विषय है। राजनीतिक-सिद्धान्त अनुभावात्मक ज्ञान पर आधारित होने के कारण उत्तम जीवन को परिभाषित करने के काफी निकट पहंचकर भी उससे दूर ही रहता है, परन्तु राजनीतिक सिद्धान्त में वैज्ञानिक अध्ययन के अन्तर्गत उत्तम जीवन की बहुत सी मान्यताओं को परखने की सहायता अवश्य मिल जाती है। राजनीतिक-सिद्धान्त के अन्तर्गत राजनीतिक जीवन की विभिन्न अभिव्यक्तियों के अध्ययन के लिए उपयुक्त पद्धतियों का चयन और प्रयोग किया जाता है। सार रूप में कहा जाता है कि राजनीति-दर्शन का सरोकार तथ्यों, आदर्शों, मानकों और मूल्यों से है।

राजनीतिक-सिद्धान्त राजनीतिक-विज्ञान की सबसे अधिक सरल और सबसे अधिक कठिन घटनाओं में से एक है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘Theoria’ शब्द से हुई है। राजनीतिक सिद्धान्त को अंग्रेजी भाषा में ‘Political Theory’ कहा जाता है। ‘Theoria’ शब्द का अर्थ, ‘समझने की दृष्टि से, चिन्तन की अवस्था में प्राप्त किसी सुकेन्द्रित मानसिक दृष्टि से है, जो उस वस्तु के अस्तित्व एवं कारणों को प्रकट करती है अर्थात् एक मानसिक दृष्टि जो एक वस्तु के अस्तित्व और उसके कारणों को प्रकट करती है। केवल वर्णन या किसी लक्ष्य के बारे में कोई विचार या सुझाव देना ही सिद्धान्त नहीं होता। सिद्धान्त के अन्तर्गत किसी भी विषय के सम्बन्ध में एक लेखक की तरह पूरी सोच या समझ शामिल होती है। उसमें तथ्यों का वर्णन, उनकी व्याख्या लेखक का इतिहास बोध, उसकी मान्यताएं और वे लक्ष्य शामिल हैं जिनके लिए किसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है। सरल अर्थ में सिद्धान्त शब्द का प्रयोग हमेशा किसी परिघटना की व्याख्या करने के प्रयास के रूप में किया जाता है। सिद्धान्त को व्यापक अर्थ में प्रयोग करते समय इसमें तथ्यों और मूल्यों दोनों को शामिल किया जाता है। आधुनिक अर्थ में राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत वे सभी गतिविधियां आ जाती हैं जो ‘सत्ता के लिए संघर्ष से संबंधित हैं। राजनीतिक सिद्धान्त को कुछ विद्वानों ने निम्न ढंग से परिभाषित किया है-
  1. कोकर के अनुसार-’’जब राजनीतिक शासन, उसके रूप एवं इसकी गतिविधियों का अध्ययन या तुलना तत्व मात्र के रूप में न करके, बल्कि लोगों की आवश्यकताओं, इच्छाओं एवं उनके मतों के सन्दर्भ में घटनाओं को समझने व उनका मूल्य आंकने के लिए किया जाता है, तब हम इसे राजनीतिक सिद्धान्त का नाम देते हैं।
  2. जेर्मिनो के अनुसार-’’राजनीतिक सिद्धान्त मानवीय सामाजिक अस्तित्व की उचित व्यवस्था के सिद्धान्तों का आलोचनात्मक अध्ययन है।’’
  3. एन्ड्रयू हेकर के अनुसार-’’राजनीतिक सिद्धान्त में तथ्य और मूल्य दोनों समाहित हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। अर्थात् राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री एक वैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों की भूमिका निभाता है।’’
  4. डेविड् हैल्ड के अनुसार-’’राजनीतिक सिद्धान्त राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित अवधारणाओं और व्यापक अनुमानों का एक ऐसा ताना-बाना है, जिसमें शासन, राज्य और समाज की प्रकृति व लक्ष्यों और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं का विवरण शामिल हैं।’’
  5. जार्ज सेबाइन के अनुसार-’’व्यापक तौर पर राजनीतिक सिद्धान्त से अभिप्राय उन सभी बातों से है जो राजनीति से सम्बन्धित हैं और संकीर्ण अर्थ में यह राजनीतिक समस्याओं की विधिवत छानबीन से सरोकार रखता है।’’
  6. जॉन प्लेमेन्टज के अनुसार-’’राजनीतिक सिद्धान्त सरकार के कार्यों की व्याख्या के साथ-साथ सरकार के उद्देश्यों का भी व्यवस्थित चिन्तन है।’’
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक-सिद्धान्त राज्य, शासन, सत्ता प्रभाव और कार्य-कलाप का अध्ययन है। यह राजनीतिक घटनाओं का तरीका है। अवलोकन, व्याख्या और मूल्यांकन तीनों तत्व ही मिलकर राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करते हैं। कोई भी सिद्धान्तशास्त्री किसी राजनीतिक घटना के अवलोकन, उसके कार्य-काल सम्बन्ध को स्थापित करके तथा अपना निर्णय देकर ही राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करता है। किसी भी राजनीतिक चिन्तक को राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करने के लिए एक वैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों ही भूमिका अदा करनी पड़ती है। इसी समय आज राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक दर्शन को समानार्थी माना जाने लगा है।

राजनीतिक सिद्धान्त का विकास

राजनीतिक सिद्धान्त की उत्पत्ति का केन्द्र बिन्दू यूनानी राजनीतिक चिन्तन को माना जाता है। यूनानी दार्शनिकों व चिन्तकों ने आदर्श राज्य की संकल्पना पर ही अपना सारा ध्यान संकेन्द्रित किया। मध्य युग में सेन्ट एक्विनास जैसे विचारकों ने राजाओं को पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार माना, जिसकी पुष्टि हीगल के विश्वात्मा के विचार में होती है। औद्योगिक क्रान्ति के बाद इंग्लैण्ड व अमेरिका में संविधानों व संवैधानिक कानूनों के विकास पर जोर दिया जाने लगा। अब राज्य, कानून, प्रभुसत्ता, अधिकार और न्याय की संकल्पनाओं के साथ-साथ सरकारों की कार्यविधियों को भी परखने की चेष्टा की जाने लगी। यह प्रक्रिया 19वीं सदी के अन्त तक प्रचलित रही। 20वीं सदी के आरम्भ में राजनीतिक सिद्धान्त को एक विशिष्ट क्षेत्र माना जाने लगा। 1903 में अमेरिकन पॉलिटिकल साइन्स एसोसिएशन (American Political Science Association) ने राजनीतिक सिद्धान्त को राजनीति-विज्ञान का महत्वपूर्ण विषय स्वीकार किया और इसके अध् ययन व विकास के प्रयास तेज किए। अब राजनीतिक सिद्धान्त के अध्ययन के विषय राजनीतिक संस्थाएं, राज्य के लक्ष्य, न्याय, सुरक्षा, स्वतन्त्रता समानता आदि के साथ-साथ विशिष्ट वर्ग, शक्ति, प्रभाव, राजनीतिक विकास, राजनीतिक संस्कृति आदि को भी राजनीतिक सिद्धान्त के दायरे में ला दिया गया। अब राजनीतिक संस्थाओं के गुण-दोषों की चर्चा के साथ-साथ इनकी अच्छाई या बुराई के निष्कर्ष निकाले जाने लगे। चाल्र्स मेरियम, जी0ई0 कैटलिन जैसे विचारकों के प्रयासों ने अब राजनीतिक सिद्धान्त को यथार्थवादी प्रवृत्ति से परिपूर्ण किया। लॉसवैल तथा ईस्टन ने व्यवहारवाद को जन्म देकर राजनीतिक सिद्धान्त को आधुनिक युग में प्रवेश करा दिया। व्यवहारवाद के आगमन ने परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त को आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त की परिधि में प्रवेश करा दिया। अब ईस्टन ने राजनीति-विज्ञान में नए राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण पर जोर देना शुरू कर दिया। 1969 में ईस्टन ने उत्तर-व्यवहारवाद की क्रान्ति का सूत्रपात करके राजनीतिक सिद्धान्त को नया आयाम दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीतिक सिद्धान्त निरन्तर नई-नई राजनीतिक समस्याओं से जूझ रहा है। इसी कारण आज तक किसी ऐसे सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण नहीं हुआ है जो विश्व के हर भाग में अपनी उपादेयता सिद्ध कर सके। इसका प्रमुख कारण इस बात में निहित माना जाता है कि आधुनिक राजनीतिक विचार किसी भी राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करते समय प्लेटो व अरस्तु जैसी विश्व-दृष्टि नहीं रखते। इसी कारण आज राजनीतिक सिद्धान्त अपरिपक्व अवस्था में है।

परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त

प्लेटो व अरस्तु से लेकर व्यवहारवादी क्रान्ति की शुरूआत होने तक का समय परम्परागत राजनीतिक-सिद्धान्त का है। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में व्यवहारवादी क्रान्ति से पूर्व प्रचलित विचार-सामग्री, राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन, विचारधाराओं तथा राजनीतिक विचारों के विश्लेषण को शामिल किया जाता है। राज्य, राज्य की प्रकृति तथा उसका आधार, सरकार, कानून, नैतिकता, प्राकृतिक विधि, राजनीतिक संस्थाएं आदि परम्परागत राजनीतिक-सिद्धान्त के महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के विकास में प्लेटो, अरस्तु, हॉब्स, लॉक, हीगल, कार्ल मार्क्स तथा मान्टेस्कयू आदि राजनीतिक विचारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

परम्परागत राजनीतिक-सिद्धान्त की विशेषताएं

  1. मूल्य-सापेक्ष – परम्परागत राजनीतिक-सिद्धान्त में मूल्यों, आदर्शों व परम तत्वों को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। प्लेटो का न्याय सिद्धान्त, अरस्तु का मध्यम-प्रजातन्त्र, लॉक का प्राकृतिक कानून, रुसो की सामान्य इच्छा इसी प्रकार के हैं। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण सिद्धान्त निर्माताओं की मान्यताओं से हुआ है। इनके समक्ष आनुभाविक तथ्यों, जांच, प्रमाण तथा अवलोकन का कोई महत्व नहीं है। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त ‘चाहिए’ प्रकृति का है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक सिद्धान्तकार हमेशा क्रियात्मक उद्देश्य को लेकर लिखते रहे हैं उनका उद्देश्य सुधार, समर्थन या विरोध करना रहा है। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में मूल्यों व मान्यताओं को इतना महत्व दिया गया है कि इससे राजनीतिक दर्शन राजनीतिक विज्ञान और राजनीति सिद्धान्त का अन्तर ही समाप्त हो गया है।
  2. समस्याओं का समाधान करने का प्रयास – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का संबंध समसामयिक समस्याओं के हल निकालने के प्रयासों से रहा है। प्लेटो का दार्शनिक राजा का सिद्धान्त तत्कालीन यूनानी नगर-राज्यों में मौजूद अराजकता के वातावरण से छुटकारा पाने के लिए किया गया है। इटली की तत्कालीन स्थिति से छुटकारा पाने के लिए मैकियावेली ने भी अपने ग्रन्थ ‘The Prince’ से छल-कपट के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। इससे स्पष्ट है कि परम्परागत सिद्धान्त के चिन्तक व सिद्धान्तकार तत्कालीन सामाजिक औरराजनीतिक समस्याओं के प्रति बड़े संवेदनशील रहे हैं। इसी कारण उन्होंने ऐसे सिद्धान्तों का निर्माण किया जो तत्कालीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में सफल रहे।
  3. मुख्यत: वर्णनात्मक अध्ययन – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता इसका वर्णनात्मक होना है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत राजनीतिक संस्थाओं की व्याख्या व विश्लेषण न करके, उनका वर्णन ही किया गया है। इस सिद्धान्त द्वारा समस्याओं का कोई समाधान नहीं हुआ है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत यह जानने का प्रयास कभी नहीं किया गया है कि संस्थाओं की समानताओं तथा असमानताओं के मूल में कौन सी ऐसी परिस्थितियां हैं जो इन्हें प्रभावित करती हैं।
  4. दर्शन, धर्म तथा नीतिशास्त्र का प्रभाव – प्लेटो से लेकर हीगल तक राजनीतिक सिद्धान्तों को सदैव आचार शास्त्र या दर्शन शास्त्र के एक अंश के रूप में प्रतिपादित किया गया है। उस समय के राजनीतिक विचारक अपने आपको किसी न किसी रूप में दर्शन, धर्म व नीतिशास्त्र से जोड़ रहे हैं। इन चिन्तकों का चिन्तन धर्म व दर्शन से प्रभावित रहा है। मध्य युग में राज्य व धर्म के आपसी सम्बन्ध इसी बात की स्पष्ट प्रमाण है। यूरोप में काफी लम्बे समय तक यह सिद्धान्त प्रचलित रहा कि चर्च की सत्ता राजसत्ता से ऊपर है। सेन्ट एकविनास की विचारधारा इसी प्रकार की थी। इस सिद्धान्त के विचारक सिद्धान्तशास्त्री होने के साथ-साथ अच्छे दार्शनिक भी रहे हैं। इसी कारण परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त पर दर्शन व धर्म का प्रभाव है।
  5. मुख्यत: निगमनात्मक अध्ययन – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में आदर्शात्मक (Normative) अध्ययन पर जोर दिया जाता है। इन लेखकों ने किसी वैज्ञानिक विधि का प्रयोग नहीं किया है। यह सिद्धान्त किसी आदर्श की कल्पना को ही व्यावहारिक रूप देने के लिए किए गए प्रयासों में से एक है। प्लेटो का दार्शनिक शासक और रुसो की सामान्य इच्छा इसी कोटि की कल्पनाएं हैं। हीगल का विश्वात्मा का विचार भी काल्पनिक विचार होने के कारण आदश्र्ाी अध्ययन का ही नमूना है। यद्यपि परम्परावादी विचारकों ने अपने सिद्धान्तों का निर्माण करते समय आनुभाविक विधियों का भी प्रयोग किया, लेकिन उनको परिणाम आदर्शों अध्ययन वाले ही रहे। 158 देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद भी अरस्तु ने आदर्श राज्य के सिद्धान्त का ही प्रतिपादन किया। इस पद्धति को प्लेटो, हॉब्स, हीगल, अरस्तु, कान्ट, बर्क आदि विचारकों ने अपनाया। इन सभी के अध्ययन निगमनात्मक पद्धति पर आधारित आदर्श अध्ययन ही रहे।
  6. मुख्यत: कानूनी, औपचारिक व संस्थागत अध्ययन – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त मुख्यत: औपचारिक संस्थाओं या विधि व संविधान द्वारा निर्मित औपचारिक संस्थाओं तक ही सीमित रहा। इन सिद्धान्त के विचारकों ने केवल औपचारिक संस्थाओं का ही वर्णन व अध्ययन किया, बाहर जाकर उनके व्यवहार का अध्ययन व परीक्षण नहीं किया। डॉयसी, जेनिग्स, लॉस्की तथा मुनरो की रचनाएं इसी कोटि के अन्तर्गत शामिल हैं। इन सभी विचारकों या विद्धानों का अध्ययन कानूनी या औपचारिक अध्ययन ही बना रहा, इन्होंने कभी भी अनौपचारिक अध्ययन का प्रयास नहीं किया।
  7. अवधारणात्मक अध्ययन – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के समर्थक न्याय, सुरक्षा, समानता, लोक कल्याण, नैतिकता, राज्य, कानून, सम्प्रभुता, राष्ट्रवाद आदि अवधारणाओं को परिभाषित करने में ही लगे रहे। इस सिद्धान्त के समर्थकों ने एक सार्वभौम समाज सुधारक व धर्म प्रचारक की तरह अपनी अवधारणाओं को परिभाषित किया, लेकिन कभी भी उन्हें व्यवहारवादी बनने का प्रयास नहीं किया। इसी कारण यह सिद्धान्त अवधारणात्मक अध्ययन तक ही सिमटकर रह गया।
  8. अधि-अनुशासनात्मक अध्ययन – परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में राजनीतिक विचारकों ने मानव जीवन के सभी चिन्तनात्मक पहलूओं का अध्ययन किया है। इसी कारण इन विचारकों के सिद्धान्तों को किसी विषय विशेष से जोड़ना असम्भव है। प्लेटो, अरस्तु, रुसो, मार्क्स आदि विचारकों का दृष्टिकोण समाज विज्ञान के सभी विषयों तथा विज्ञान से रहा है। इन विषयों से राजनीतिक सिद्धान्तों के निर्माण के लिए राजनीति-विज्ञान को अलग करके देखना सम्भव नहीं है। इसी कारण परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त अधि-अनुशासनात्मक अध्ययन का परिणाम है। इसी कारण राजनीतिक सिद्धान्त में भी विषय क्षेत्र संबंधी अस्पष्टता का जन्म हुआ है। जो आज भी विद्यमान है।
  9. आत्मनिष्ठता – परम्परागत राजनीतिक चिन्तन आत्मनिष्ठता का गुण रखता है। इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव होने के कारण यह किसी सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करने में असफल रहा है। वैचारिक अलगाववाद के कारण ही परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के किसी भी राजनीतिक चिन्तक ने प्रयास नहीं किए है। रॉबर्ट ए0 डाहल का मानना है कि ‘‘परम्परागत राजनीतिक विचारकों के चिन्तन का आधार एक व्यक्तिपरक भावात्मक विश्व-दृष्टि है। उनके विचार व्यक्तिगत दृष्टिकोण, चिन्तन, कल्पना आदि से विस्तृत हुए हैं। शाश्वत् एवं उच्चस्तरीय तत्वों से सम्बद्ध होने के कारण उनकी चिन्तन प्रणानी तार्किक और निगमनात्मक है। वे आकाश में बैठकर धरती की तरफ देखते हैं।’’ इसी कारण उनमें राजनीतिक सिद्धान्त के प्रति जागरुकता नहीं रही है। यही वैचारिक अलगाववाद व जागरुकता का अभाव सर्वमान्य व सर्वकालिक राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करने के मार्ग में बाधक रहा है।
उपरोक्त विवचेन के बाद कहा जा सकता है कि परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त आदर्शों, दार्शनिक व इतिहासवादी रहा है। इस सिद्धान्त पर दर्शन व नीति-शास्त्र का अधिक प्रभाव रहा है। व्यक्तिनिष्ठ होने के कारण परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्तों में विविधता, अस्पष्टता, अमूर्तता तथा परस्पर तुलना का अभाव पाया जाता है। मूल्यों पर आधारित होने के कारण यह व्यवहारवादी विचारकों की आलोचना का केन्द्र भी बना है। लेकिन उत्तर-व्यवहारवाद के आगमन ने राजनीतिक सिद्धान्त को मूल्य संबंधी विवाद से छुटकारा दिला दिया है। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त भी परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की तरह मूल्य-सापेक्ष माना जाता है। आनुभाविक या आधुनिक राजसिद्धान्त का कट्टर विरोधी होने के बावजूद भी यह परम तत्वों, शाश्वत् सत्यों, व सम्पूर्ण विचारों को समेटे हुए हैं। प्लेटो, अरस्तु, हॉब्स आदि के द्वारा प्रतिपादित राजनीतिक सिद्धान्त आज भी महत्वपूर्ण हैं। स्वतन्त्रता समानता, न्या, सम्प्रभुसत्ता, राष्ट्रवाद, राज्य, कानून का शासन आदि अवधारणाएं आज भी राजनीति- विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान बनाए हुए हैं।

आधुनिक राजनीतिक-सिद्धान्त

प्रथम विश्व युद्ध के प्रारम्भ होते ही परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त को खतरे का आभास होने लगा जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वास्तविकता में बदल गया, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न जटिल राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों में परम्परागत सिद्धान्त अप्रसांगिक लगने लगा। इन जटिल परिस्थितियों में राजनीतिक- शास्त्र के साथ-साथ राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में भी परिवर्तन आना अवश्यम्भावी था। अब राजनीतिक विज्ञान में अध्ययन की नई-नई तकनीकों, तथ्यों, विश्लेषण की इकाईयों तथ एक सुव्यवस्थित सिद्धान्त की मांग जोर पकड़ने लगी। चाल्र्स ई0 मेरियम ने अपनी पुस्तक ‘New Aspects of Politics’ में यह स्पष्ट संकेत दे डाला कि ‘‘राजनीति विज्ञान को नया मार्ग तलाशना पड़ेगा क्योंकि राजनीतिक सिद्धान्त ऐसी शक्तियों के सम्पर्क में आ गया है कि कालान्तर में वे इसकी प्रक्रिया (Process) को मूलत: संशोधित कर देगी।’’ राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में आनुभाविक पद्धति (Empirical Methods) ने राजनीतिक के अध्ययन को वैज्ञानिक बनाने पर जोर दिया और राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री की ‘शक्ति’, ‘सत्ता’, ‘राजनीतिक अभिजन’, ‘राजनीतिक प्रभाव’, ‘राजनीतिक विकास’, ‘राजनीतिक आधुनिकीकरण’ तथा ‘राजनीतिक संस्कृति’ आदि की अवधारणाओं पर अधिक जोर देने लगे। लासवैल तथा मेरियम ने शक्ति सिद्धान्त तथा मोस्का, मिचेल्स तथा परेटो ने राजनीतिक अभिजन सिद्धान्त का प्रतिपादन करके राजनीतिक सिद्धान्त को नई दिशा दी। 1953 में डेविड ईस्टन ने व्यवहारवादी क्रान्ति का नया राजनीतिक सिद्धान्त पेश करके परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की अव्यवहारिकता की पोल ही खोल दी। डेविड ईस्टन, डाहल तथा पॉवेल आदि व्यवहारवादी विचारकों ने राजनीतिक सिद्धान्त को आधुनिक बनाने पर जोर दिया और मूल्य-मुक्त राजनीतिक-सिद्धान्त की अवधारणा पेश की। लेकिन 1969 में उत्तर-व्यवहारवादी क्रान्ति का बिगुल बजाकर ईस्टन ने आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में मूल्यों को भी महत्व दिया। ईस्टन ने साथ ही रॉल्स व पॉपर जैसे विचारकों ने भी मूल्यों को बहुत महत्व दिया। 1990 के बाद जॉन डन्न, स्टीवन लूकेज, डेविड हैल्ड आदि विद्वानों ने राजनीतिक-सिद्धान्त का विकास किया।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त की विशेषताएं

  1. राजनीतिक अध्ययन की अन्त:शास्त्रीय पद्धति – आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तकारों का मानना है कि मानव-व्यवहार विभिन्न तत्वों का सैट है। इसी सन्दर्भ में राजनीतिक विज्ञान भी समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मनोविज्ञान आदि से प्रभावित होता है। किसी भी समाज की राजनीतिक व्यवस्था और उसके व्यवहार को समझने के लिए उस समाज की आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है। यह विचार भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया का भी पोषण करता है। विश्व-व्यापी राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि विश्व समाज की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक व्यवस्थाओं को एक साथ लाकर ही सिद्धान्त निर्माण के प्रयास किए जाएं। किसी भी राजनीतिक घटना को अन्त: अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से परखने का प्रयास ही सामान्य सिद्धान्त निर्माण के लक्ष्य तक पहुंच सकता है। लेकिन अधिकतर राजनीतिक विज्ञान के विद्वान इस बात पर ही अड़े हुए हैं कि राजनीतिक-विज्ञान एक स्वतन्त्र अनुशासन ह रहे। इसी कारण ग्राम वालास, आर्थर वेन्टले, चाल्र्स मेरियम, लासवैल जैसे विद्वानों का अन्त:अनुशासनात्मक अध्ययन का दृष्टिकोण कुछ बाधित सा प्रतीत होता है। लेकिन अब यथार्थ में स्थिति कुछ बदल रही है। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान और सिद्धान्तकार को अन्त: अनुशासनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर ही राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करना चाहिए ताकि एक सामान्य व सर्वव्यापक राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण हो सके।
  2. आनुभाविक अध्ययन – आधुनिक राजनीतिक विद्वान राजनीतिक विज्ञान को विशुद्ध विज्ञान बनाने के लिए राजनीतिक तत्यों के संकलन, मापन व अध् ययन की नवीन तकनीकें अपनाने पर जोर देते हैं। डेविड ईस्टन का जोर इसी बात पर रहा है कि ‘‘राजनीति विज्ञान में खोज सुव्यवस्थित होनी चाहिए। यदि कोई सिद्धान्त आंकड़ों पर आधारित नहीं है तो वह निरर्थक साबित होगा।’’ इसलिए सभी व्यवहारवादी विद्वानों ने वर्णनात्मक एवं अनुभवात्मक अध्ययन पर जोर दिया है जो पर्यवेक्षण, माप, तार्किक, युक्तियुक्तता आदि तकनीकों पर आधारित हैं। इसमें व्यक्तिनिष्ठता की अपेक्षा वस्तुनिष्ठता पर जोर दिया जाता है। लासवैल, चाल्र्स मेरियम जैसे विद्वानों ने राजनीति-विज्ञान और राजनीतिक सिद्धान्त दोनों को आनुभाविक विधियों के आधार पर वैज्ञानिक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे मतदान, चुनावी आचरण आदि का साक्षात्मकारों व जातीय अध्ययनों द्वारा उचित अध्ययन करने व जनमत का पता लगाने में बड़ी सुविधा हुई है।
  3. परम्परागत सीमाएं छोड़कर अध्ययन – आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत राजनीतिक विद्वान अध्ययन की परम्परागत सीमाएं छोड़कर ही अपना कार्य करते हैं। राजनीतिक विद्वान अब तथ्य और घटनाओं को प्रत्येक क्षेत्र व विषय से ग्रहण करने में संकोच नहीं करते हैं। इसी कारण आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अध्ययनमुक्तत्ता के गुण में सम्बन्धित है। राजनीतिक तथ्य और घटनाएं जहां भी उपलब्ध हो, चाहे वे समाजशास्त्र, धर्म या अर्थशास्त्र के विषय में हो अथवा व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र और विश्व से सम्बन्धित हो, अब राजनीति-विज्ञान का विषय बन गए हैं। यहां तक कि वैयक्तिक और सामूहिक स्तर पर बचपन, युवावस्था आदि में विकसित राजनीतिक प्रवृत्तियों को भी सर्वेक्षण और शोद्य का विषय बना लिया गया है। अब राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री की यही भावना रहती है कि वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन करके ही अवधारणात्मक आधार पर सिद्धान्त निर्माण का कार्य किया जाए। ईस्टन, डाहल, वेबर तथा आमॅण्ड आदि विद्वानों ने विश्लेषणात्म्क पद्धति का प्रयोग करके ही राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के प्रयास किए हैं। इसी कारण इसे राजनीतिक सिद्धान्त अधिकांश राजनीतिक विद्वानों द्वारा मान्य है।
  4. मूल्य-निरपेक्ष बनाम मूल्य-सापेक्ष अध्ययन – अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में राजनीतिक सिद्धान्त में मूल्यों की उपेक्षा की गई थी। व्यवहारवादी विद्वानों ने इस बात पर बल दिया कि शोद्यकर्त्ता को अनुसन्धान में स्वयं के मूल्यों एवं धारणाओं से दूर रखना चाहिए ताकि अध्ययन पर उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं व धारणाओं का प्रभाव न पड़ने पाए। व्यवहारवादी लेखकों ने मूल्य-निरपेक्ष राजनीतिक विज्ञान की धारणा पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सच्चा चिन्तक वही है जो अच्छे बुरे में भेद न करके यथार्थवादी आंकड़ों व तथ्यों के संकलन, वर्गीकरण व विश्लेषण में ही लगा रहता है। व्यवहारवादी चिन्तकों ने बौद्धिक निष्पक्षता की आड़ में राजनीतिक सिद्धान्त व राजनीतिक विज्ञान को कोरा सिद्धान्तवादी बना दिया। व्यवहारवादी विद्वानों ने सिद्धान्त निर्माण करते समय ‘चाहिए’ शब्द की उपेक्षा करे अपने को मूल्य निरपेक्षवादी सिद्ध करने का प्रयास किया। व्यवहारवाद के जनक डेविड ईस्टन ने स्वयं 1969 में अपनी भूल को सुधारते हुए 1969 में उत्तर-व्यवहारवादी क्रान्ति का बिगुल बजाकर यह घोषणा की कि राजनीतिक सिद्धान्त व राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन को मूल्य-सापेक्ष होना चाहिए। उत्तर-व्यवहारवादियों ने यह तर्क दिया कि राजनीति-विज्ञान कभी भी प्राकृतिक विज्ञान की तरह पूर्ण विज्ञान नहीं बन सकता। इसलिए राजनीतिक-सिद्धान्तशास्त्रियों को चाहिए कि वे समस्याओं के समाधान का प्रयास करें और मानवीय तथा आनुभाविक उपागमों के महत्व को स्वीकार करें। डेविड ईस्टन ने स्वयं कहा कि मूल्य निरपेक्ष या तटस्थ अध्ययन राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण में बाधक है। इसलिए राजनीतिक विद्वानों व सिद्धान्तशास्त्रियों को नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहन देना चाहिए। उसने यह भी कहा कि ‘‘हम चाहे कितना भी प्रयास करें, मूल्यों से छुटकारा नहीं पा सकते। मूल्य हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है। मानव होने के नाते हम अपने मनोभावों और अपनी पसंद और ना पसंद से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।’’ ईस्टन की तरह की कब्बन ने भी मूल्यों के पुन:र्निर्माण पर जोर दिया। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री अब इसी बात पर जोर देते हैं कि राजनीति-विज्ञान में अध्ययन करते समय तथ्यों व आंकड़ों के साथ-साथ मूल्यों को भी महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए। तथ्यों और मूल्यों को मिलाकर ही उपयोगी राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण किया जा सकता है।
  5. शोद्य एवं सिद्धान्त में घनिष्ठ सम्बन्ध – आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्रियों का मानना है कि शोद्य और सिद्धान्त में घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिए। इसी कारण आज राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्री व राजनीतिक विद्वान वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग द्वारा साधारणीकरणों, व्याख्याओं एवं सिद्धान्तों के निर्माण में लगे रहते हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्रियों का एकमात्र उद्देश्य राजनीति के सैद्धान्ति प्रतिमानों को विकसित करना है। इसके लिए वे शोद्य व सिद्धान्त में एकरूपता बनाए रखने का प्रयास करते हैं। शोद्य और सिद्धान्त की एकरूपता के आधार पर ही आधुनिक राजनीतिक विद्वान घटनाओं और तथ्यों में सम्बन्ध स्थापित करके उनका विश्लेषण करते हैं।
  6. अनौपचारिक तत्वों का अध्ययन – आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्रियों का कहना है कि आज परम्परागत अध्ययन की औपचारिक संस्थाओं जैसे-राज्य, सरकार, दल आदि का अध्ययन ही पर्याप्त नहीं है। राबर्ट डॉहल, व आमॅण्ड-पावेल का मानना है कि सिद्धान्त निर्माण व राजनीतिक विश्लेषण के लिए अर्थात राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने के लिए अनौपचारिक तत्वों के अध् ययन के बिना किसी भी सर्वव्यापक व सामान्य राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण कर पाना असम्भव है। इसलिए आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तकारों ने जनमत, मतदान, आचरण, विधानमण्डल, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, दबाव व हित समूहों आदि के अध्ययन पर भी जोर दिया है।
  7. समस्या समाधान का प्रयास – उत्तर-व्यवहारवाद के आगमन से पहले ऐसा लगता था कि राजनीति-विज्ञान कोरा विज्ञानवाद बन जाएगा और इसमें समस्याओं के समाधन की कोई गुंजाईश नहीं रहेगी। लेकिन उत्तर-व्यवहारवादियों ने इस शंका को दूर करते हुए स्वयं को मूल्यों, नीतियों और समस्याओं से जोड़े रखा है। वे अपने विश्लेषण द्वारा राजनीतिक विज्ञान की महत्वपूर्ण अवधारणाओं-राजसत्ता, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, प्रभुसत्ता, न्या, समानता व लोकतन्त्र आदि को नए सिरे से परिभाषित करने के प्रयास करते रहे हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्रियों ने उत्तर-व्यवहारवाद की मदद से युद्ध और शान्ति, बेरोजगारी, सामाजिक परिवर्तन, असमानता, पर्यावरण और विकासवाद, प्रदुषण आदि समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने के प्रयास किए हैं।
  8. विकासशील सिद्धान्त – आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है। हमें आज ऐसा लगता है कि एक व्यापक राजनीतिक सिद्धानत का निर्माण हो चुका है, लेकिन यथार्थ में ऐसा नहीं है। आज जो अनेक राजनीतिक सिद्धान्त विकसित या निर्मित हो चुके हैं, वे राजनीतिक सिद्धान्त न होकर उपागम हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण करने वाली पद्धतियां निश्चित हो चुकी हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त धीरे-धीरे एकीकरण, प्रगति एवं सामंजस्य की तरफ बढ़ रहा है। इसलिए आधुनिक राजनीतिक अनिश्चित व अपूर्ण अवस्था में है। इसमें विश्वसनीय व सत्यापित सामान्यीकरणों की मात्रा बहुत ही सीमित है। अत: आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त विकासशील अवस्था में है।
  9. स्वायत्तता एवं विकास के प्रति जागरुकता – आधुनिक राजनीतिक विद्वानों का एक ऐसा वर्ग भी है जो राजनीति विज्ञान को एक स्वतन्त्र विषय बनाना चाहता है। इस वर्ग में ईस्टन डाहल, कैटलिन आदि उच्च कोटि के राजनीतिक विद्वान आते हैं। इन विद्वानों की रुचि राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण, स्थयित्व, विश्वसनीयता और व्यापकता में है। ये राजनीतिक विद्वान राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के लिए जागरुकता का परिचय देते हुए राजनीतिक तथ्यों और निष्कर्षों में एक क्रमबद्धता व सम्बद्धता लाना चाहते हैं। इसी कारण इन्होंने सामान्य व्यवस्था सिद्धान्त का निर्माण किया है।
उपरोक्त विश्लेषण के बाद कहा जा सकता है कि आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अब परम्परागत सीमाएं छोड़ चुका है। उत्तर-व्यवहारवाद के आगमन ने इसे मूल्य-सापेक्ष अध्ययन करने पर बाध् य किया है। इसी कारण आधुनिक राजनीतिक विद्वान व सिद्धान्तशास्त्री परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त की तरह मूल्यों को बहुत महत्व देते हैं। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में शोद्य व सिद्धान्त में जो पारस्परिक सम्बन्ध पाया जाता है, उसने आधुनिक सिद्धान्त के निर्माण का मार्ग विकासोन्मुखी बना दिया है। यद्यपि कुछ विद्वान राजनीतिक सिद्धान्त व राजनीतिक विज्ञान को अन्त:अनुशासनात्मक बनाने पर भी जोर देते हैं, जबकि ईस्टन, डाहल व कैटलीन जैसे विद्वानों ने इसे स्वायत: बनाने पर जोर दिया है। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अभी विकासशील अवस्था में है। आधुनिक राजनीतिक विद्वानों पर यह प्रयास है कि राजनीति-विज्ञान को सामाजिक सन्दर्भ अनुस्थायी अध्ययन पर आधारित करके सिद्धान्त शास्त्रियों के कार्य को आगे बढ़ाया जाए। आज राजनीतिक सिद्धान्तशास्त्रियों व राजनीतिक वैज्ञानिकों के प्रयासों को देखकर कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान में भी सामान्य व सर्वव्यापक सिद्धान्त निर्माण संभव है।

राजनीतिक सिद्धान्त का महत्व

राजनीतिक सिद्धान्त में राज्य, सरकार, शक्ति, सत्ता, नीति-निर्माण, राजनीतिक विकास, राजनीतिक आधुनिकीकरण, राजनीतिक दल, मताधिकार, चुनाव, जनमत, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक अभिजनवाद, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध व संस्थाएं, क्षेत्रीय संगठन, नारीवाद आदि का अध् ययन किया जाता है। आज राजनीतिक सिद्धान्त एक स्वतन्त्र अनुशासन की दिशा में गतिमान है। राजनीतिक सिद्धान्त की आवश्यकता इस बात में है कि यह राजनीति विज्ञान के एक अनुशासन के रूप में परम् आवश्यक है। इसी पर इस विषय में एकीकरण सामंजस्य, पूर्वकथनीयता एवं वैज्ञानिकता लाना एवं शोद्य सम्भावनाएं निर्भर हैं। बिना सिद्धान्त के न तो रजनीति-विज्ञान का विकास संभव है और न ही कोई शोद्य कार्य, अवधारणात्मक विचारबद्ध के रूप में राजनीतिक सिद्धान्त राजनीति विज्ञान में तथ्य संग्रह एवं शोद्य को प्रेरणा एवं दिशा प्रदान करता है। यह राजनीति विज्ञान में एक दिशा मूलक की तरह कार्य करता है। यह राजनीतिक घटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या कने तथा सामान्यीकरण के आधार पर राजनीतिक व्यवहार का एक विज्ञान विकसित करने में मदद करता है। इसके द्वारा ज्ञान के नए क्षेत्रों की खोज व सिद्धान्तों की प्राप्ति होती है। एक अच्छा राजनीतिक सिद्धान्त अनुशासन में एकसमता, सम्बद्धता तथा संगति का गुण पैदा करता है। यह राजनीतिक शासन-प्रणाली एवं शासकों को औचित्यपूर्णता प्रदान करता है। यह कभी समाजवाद के रूप में कार्य करता है तो कभी विशिष्ट वर्ग के रूप में। राजनीतिक सिद्धान्त ही वह साधन है जो राजनीतिक तथ्यों एवं घटनाओं, अध्ययन पद्धतियों तथा मानव-मूल्यों में एक गत्यात्मक सन्तुलन स्थापित कर सकता है। राजनीति के वास्तविक प्रयोगकर्ताओं-राजनीतिज्ञों, नागरिकों, प्रशासकों, राजनेताओं एवं राजनयिकों के लिए राजनीतिक सिद्धान्त का बहुत महत्व हैं राजनीतिक सिद्धान्त ही इन सभी को राजनीति के वास्तविक स्वरूप से परिचित करा सकता है। इसी कारण मानव समाज की राजनीतिक, संविधानिक और वैधानिक प्रगति के लिए राजनीतिक सिद्धान्त का होना अति आवश्यक है। आज के परमाणु युग में शक्ति पर नियन्त्रण रखने का मार्गदर्शन आनुभाविक राजनीतिक सिद्धान्त द्वारा ही सम्भव है। राजनीति के रहस्यों, प्रतिक्षण परिवर्तनशील घटनाओं तथा जटिल अन्त:सम्बन्धों तक पहुंचने के लिए राजनीतिक सिद्धान्त एक सुरंग की तरह कार्य करता है। अत: इसे आधुनिक समाज, लोकतन्त्र मानव-मूल्यों एवं अनुसंधन का एक प्रकाश स्तम्भ माना जा सकता है। क्रान्तिकारी राजनीतिक सिद्धान्त के बिना न तो शांति सम्भव है और न ही क्रान्ति। इसलिए राजनीतिक सिद्धान्त के बिना सामाजिक परिवर्तन की कल्पना करना बेकार है।

राजनीतिक सिद्धान्त की समस्याएं

प्लेटो व अरस्तु से लेकर 20वीं सदी राजनीतिक सिद्धान्त के विकास की गति काफी धीमी रही है। ‘अमेरिकन पॉलिटिकल साइन्स एसोसिएशन’ तथा ‘सोशल साइन्स रिसर्च कौंसिल’ की स्थापना से राजनीतिक सिद्धान्त के विकास में कुछ तेजी आई। इतना होने के बावजूद अधिकतर विकासशील देशों में तो राजनीतिक सिद्धान्त की दशा आज भी काफी शोचनीय है। विकासशील देशों में तो यह एक स्वतन्त्र अनुशासन के स्तर से काफी दूर है। इन देशों में राजनीतिक सिद्धान्त के अध्ययन के लिए उपयुक्त अध्ययन पद्धतियों का अभाव है। यूरोप के देशों में तो इसका तीव्र विकास हुआ है लेकिन विकासशील देशों में नहीं। उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का शिकार रह चुके इन देशों में शोद्य संबंधी सुविधाओं का नितान्त अभाव रहा है। विकासशील देशों में राजनीतिक सिद्धान्त का परम्परागत रूप ही देखने को मिलता है। इन देशों में मौलिक चिन्तन और अनुभवात्मक शोद्य का अभाव आज भी है। यद्यपि भारत में इस दिशा में कुछ प्रगति अवश्य हुई है। विकासशील देशों में राजनीतिक सिद्धान्त को वैज्ञानिक बनाने तथा राजनीतिक समस्याओं को हल करने में राजनीतिक विद्वानों ने कोई खास योगदान नहीं दिया है। इन देशों में राजनीतिक विद्वानों में राजनीतिक तटस्थता की भावन का पाया जाना ही राजनीतिक सिद्धान्त के पिछड़ेपन का कारण है।

विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित देशों में राजनीतिक सिद्धान्त की स्थिति कुछ अच्छी है। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त आज अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। अनेक प्रयासों के बावजूद भी राजनीतिक-विज्ञान आज तक किसी वैज्ञानिक राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण नहीं कर पाए हैं। राबर्ट डाहल ने तो यहां तक कह दिया कि राजनीतिक सिद्धान्त अंग्रेजी भाषी देशों में तो मृत हो चुका है। साम्यवादी देशों में बन्दी है तथा अन्यत्र मरणासन्न है। अनेक प्रयासों के बाद भी अर्थात् वैज्ञानिक शोद्य पद्धतियों तथा व्यवहारवादी क्रान्ति को आत्मसात् कर लेनक के बाद भी राजनीति विज्ञान में कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक राज-सिद्धान्त नहीं बन सका है। राजनीतिक सिद्धान्त के समर्थन में यह कहा जाने लगा है कि आज राजनीतिक सिद्धान्त के लिए बहु-अनुशासनात्मक दृष्टियुक्त राजनीतिक विद्वानों, बहु-पद्धति विशेषज्ञों एवं निष्ठावान शोद्यकर्ताओं की जरूरत है। जिन्हें कार्य करने के लिए पर्याप्त धन-सुविधाएं एवं अभिप्रेरणाएं दी जानी चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त में अन्त:अनुशासनात्मक व स्वतन्त्र अनुशासन के बीच संतुलन कायम किया जाए तथा मूल्यों संबंधी विवाद पर भी सर्वमान्य सहमति की जाए। इसका अर्थ यह है कि मूल्य-निरपेक्ष बनाम मूल्य-सापेक्षता की समस्या को सुलझा लिया जाए ताकि अनुसंधान प्रक्रिया में संगति व क्रमबद्धता लाई जा सके। राजनीतिक सिद्धान्त के सामने आज जो प्रमुख समस्या है, वह है-युद्ध और शान्ति, प्रजातन्त्र और तानाशाही, के बीच संतुलन कायम रखना। विकासशील देशों में भूख, गरीबी, अशिक्षा, संकीर्णता, रुढ़िवादिता आदि समस्याओं के रहते इन देशों में भी राजनीतिक सिद्धान्त के विकास की कल्पना करना बेकार है। अत: एक व्यापक राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि इस दिशा में सभी राजनीतिक विद्वानों, समाज सुधारकों, राजनीतिज्ञों, प्रशासकों, नीति-धारकों, समाजशास्त्रियों आदि को सकारात्मक प्रयास करने चाहिएं और राजनीतिक सिद्धान्त के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के हर सम्भव प्रयास किए जाएं।

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