रूसो का सामाजिक समझौते का सिद्धांत

रूसो का सामाजिक समझौते का सिद्धांत
रूसो

रूसो ने सामाजिक समझौता सिद्धांत का वर्णन अपनी पुस्तक ‘सोशल कांट्रेक्ट’ (सामाजिक समझौता) में किया है। इस रचना में रूसो ने आदर्श समाज की स्थापना की युक्ति सुझाई है, जिससे मानव जाति की मानव जाति को प्राकृतिक अवस्था के कष्टों से मुक्ति मिल सके। जिस प्रकार हॉब्स व लॉक ने राज्य की उत्पत्ति का कारण सामाजिक समझौते को माना है, उसी प्रकार रूसो के अनुसार भी राज्य की उत्पत्ति सामाजिक समझौता का ही परिणाम है। 

रूसो ने अपने राजनीतिक विचारों एवं निष्कर्षों को प्रस् करने के लिए सामाजिक समझौता सिद्धांत को अपनाया है। रूसो का मूल प्रयास व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा राज्य की सत्ता के बीच उचित सामंजस्य स्थापित करना था। व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के साथ उसे अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने के लिए रूसो के सामाजिक समझौता सिद्धांत को प्रस्तुत किया।

रूसो का सामाजिक समझौते का सिद्धांत

सामाजिक समझौते का उद्देश्य

रूसो के सामाजिक समझौता सिद्धांत का उद्देश्य इस बात पर प्रकाश डालना नहीं है कि भूतकाल में प्रथम राज्य की स्थापना किस प्रकार हुई। उसके सामाजिक समझौता सिद्धांत का उद्देश्य तो एक ऐसे आदर्श समाज का निर्माण करना है जहाँ राज्य की सत्ता एवं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में समन्वय स्थापित हो सके और जहाँ मानव जाति अपने कष्टों से छुटकारा पा सके। उसके समक्ष “समस्या इस प्रकार के समुदाय का निर्माण करना है जो अपनी सामूहिक शक्ति से प्रत्येक सदस्य के जीवन और धन की रक्षा कर सके और जिसमें प्रत्येक व्यक्ति दूसरों के साथ मिलकर बहते हुए भी केवल अपने आदेश का पालन कर सके और पहले की तरह स्वतन्त्र भी रह सके।” रूसो इस समस्या का समाधान सामाजिक समझौते द्वारा करता है। रूसो के सामाजिक समझौते का अध्ययन हम इन भागों में कर सकते हैं :-

1. मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था : रूसो मनुष्य को सदगों व दुर्गुणों का मिश्रण मानता है। रूसो की दृष्टि में मनुष्य शान्तिप्रिय व दयावान प्राणी है। सामाजिक प्राणी होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति में आत्मरक्षा व सहानुभूति की दो प्रवृत्तियाँ अवश्य पाई जाती हैं। प्राकृतिक अवस्था में बुद्धि के स्थान पर भावनाओं का ज्यादा महत्त्व है। उसे इस अवस्था में निजी सम्पत्ति और नैतिकता का भी ज्ञान नहीं होता था। इस अवस्था में मनुष्य शान्तिप्रिय, सुखमय जीवन व्यतीत करने वाला प्राणी था। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य उदात्त वन्य प्राणी था। व्यक्ति भौतिक आवश्यकताओं की दृष्टि से आत्मनिर्भर था और उनका जीवन चिन्ता रहित था। वह अपना जीवन प्रकृति के अनुरूप व्यतीत करता था। उसमें ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं था। मनुष्य दूसरों के हितों को हानि नहीं पहुँचाते थे। उदात्त व्यवहार सहज-प्रवृत्तियों पर ही आधारित था।

2. समझौते का कारण : रूसो के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में शान्तिप्रिय व सुखमय जीवन व्यतीत करता था। यदि ऐसा था तो समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी। प्रत्येक समझौतावादी विचारक ने इसके लिए अलग-अलग कारण बताए हैं। रूसो का कहना है कि तर्क व सम्पत्ति के उदय से प्राकृतिक अवस्था की सुख-शान्ति समाप्त हो गई। समाज में आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई। कला और विज्ञान, निजी सम्पत्ति, श्रम-विभाजन, जनसंख्या में वृद्धि से सभ्य समाज की स्थापना हुई जिससे मनुष्यों की प्राकृतिक समानता व स्वतन्त्रता लुप्त हो गई। आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण मनुष्यों में ईष्र्या-द्वेष के सम्बन्ध स्थापित हो गए। 

इससे प्राकृतिक अवस्था कष्टकारी हो गई। रूसो कहता है - समस्या एक ऐसा संगठन बनाने की है जो पूर्ण सम्मिलित शक्ति से व्यक्ति और उसके साथियों के हितों की रक्षा करे तथा जिसमें हर व्यक्ति सभी के साथ संगठित रहते हुए अपनी ही आज्ञा माने तथा पहले के समान ही स्वतन्त्र हो।” प्राकृतिक अवस्था के कष्टमय बन जाने पर ही मनुष्यों ने नये आदर्श समाज की स्थापना के लिए समझौता किया।

3. सामाजिक समझौते की विधि : रूसो के सामाजिक समझौते में प्रत्येक व्यक्ति एक ओर अपनी वैयक्तिक स्थिति में होता है और दूसरी ओर वह स्वयं अपनी निगमित स्थिति में होता है अर्थात् समझौते के दो पक्ष होते हैं। एक ओर व्यक्ति और एक ओर पूरा समुदाय। रूसो के शब्दों में- “हम में से प्रत्येक व्यक्ति दूसरों के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व और अपनी सम्पूर्ण शक्ति को सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशन में छोड़ देता है और अपनी निगमित स्थिति में हम प्रत्येक सदस्य से उस पूर्ण सत्ता के अविभाज्य अंश के रूप में मिलते हैं।” इस प्रकार रूसो के अनुसार मनुष्यों ने प्राकृतिक दशा को छोड़कर एक सामाजिक अनुबंध द्वारा सभ्य समाज का निर्माण किया। 

यह समझौता दो पक्षों के बीच होता है - व्यक्ति जीवन और सामूहिक जीवन। सामाजिक समझौते द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने प्राकृतिक अधिकार अपने सार्वभौम को सौंप देते हैं। रूसो ने समझौते को स्थायी व प्रभावशाली बनाने के लिए लिखा है- “सामाजिक समझौते को प्रभावित बनाने से रोकने के लिए इसमें यह स्पष्ट शर्त उल्लिखित है कि जो कोई भी लोकमत की अवज्ञा करेगा, उसे सभी नागरिकों के समाज द्वारा आज्ञा मानने के लिए बाध्य किया जाएगा।” इसका तात्पर्य व्यक्ति को समझौता छोड़ने की स्वतन्त्रता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति सामान्य इच्छा से बँधा हुआ होता है। 

इससे वह समाज को जो कुछ देता है, उतना ही लेता भी है। जो कुछ उसके पास है, उसको सुरक्षित करने के लिए वह पर्याप्त शक्ति भी प्राप्त करता है। 

रूसो ने लिखा है- “प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सभी को समर्पित करते हुए किसी को भी व्यक्तिगत रूप में समर्पित नहीं करता, इस तरह कोई भी ऐसा सदस्य नहीं होता है जो दूसरों पर उन्हीं अधिकारों को प्राप्त नहीं करता है जो कि वह अपने पर दूसरों को देता है; जो कुछ वह गँवाता है, उसी के बराबर वह प्राप्त कर लेता है और अपनी वस्तुओं की सुरक्षा में वृद्धि कर लेता है।” 

इस समझौते द्वारा पृथक व्यक्तियों के स्थान पर एक नैतिक और सामूहिक निकाय का जन्म होता है, जिसका अपना जीवन होता है, अपना अस्तित्व होता है, अपनी इच्छा होती है एवं अपनी सत्ता और एकता होती है। यदि यह निकाय निष्क्रिय रहता है तो राज्य, यदि सक्रिय तो सम्प्रभु कहलाता है। प्रत्येक सदस्य अपने समस्त अधिकार अथवा शक्तियाँ समाज को देता है। इस समझौते से उत्पन्न समाज एकताबद्ध, सर्वोच्च और नैतिक होता है न कि दमनकारी और स्वतन्त्रता विरोधी। इस समझौते से मनष्य कुछ नहीं खोता है। 

समाज का सदस्य होने के नाते जो कुछ वह समाज को देता है, वही अधिकार वह समाज के प्रत्येक सदस्य के ऊपर स्वयं प्राप्त कर लेता है। रूसो ने सामाजिक समझौता प्रक्रिया को इस प्रकार समझाया है- “हम में से प्रत्येक अपने शरीर अथवा अपनी सम्पूर्ण शक्ति को सबके साथ सामान्य रूप से सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशन में रख देता है और अपने सामूहिक स्वरूप में हम प्रत्येक सदस्य को सम्पूर्ण के एक अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार करते हैं। एकदम समझौते को करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत व्यक्तित्व के स्थान पर इस समूहीकरण से एक नैतिक तथा सामूहिक निकाय का जन्म होता है जो कि उतने ही घटकों से मिलकर बनता है जितने कि उसमें मत होते हैं। 

समस्त व्यक्तियों के संघटन से बने हुए इस सार्वजनिक व्यक्ति को पहले नगर कहते थे, अब उसे गणराज्य अथवा राजनीतिक समाज कहते हैं।”

समझौते का प्रभाव

रूसो के अनुसार इस समझौते के हो जाने पर मानव-स्वभाव में महान् परितर्वन होता है। जहाँ प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य नैसर्गिक प्रवृत्तियों द्वारा निर्देशित होता था, नागरिक समाज में न्याय द्वारा निर्देशित होता है। इससे व्यक्ति में नैतिकता का जन्म होता है। कर्त्तव्य के स्थान पर अधिकार का, शारीरिक संवेग के स्थान पर कर्त्तव्य का, इच्छा के स्थान पर विवेक का और स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ का उदय होता है। नागरिक समाज में मनुष्य की प्रतिभा मुखरित होकर उसके विचारों का विकास करती है, उसकी भावना तथा आत्मा ऊँची उठती है। 

रूसो का कहना है कि नागरिक समाज में व्यक्ति अपने मनुष्यत्व को प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में नागरिक बनने के बाद ही व्यक्ति मनुष्य बनता है।

समझौते की विशेषताएँ

  1. यह समझौता एक बार ही हुआ।
  2. यह समझौता व्यक्ति द्वारा अपनी स्वतन्त्रता को सुरक्षित करने तथा अराजकता का अन्त करने के लिए किया जाता है। प्राकृतिक दशा में सभी व्यक्ति ‘ग्राम्य सुषमा के आनंद’ का जीवन व्यतीत करते हैं। परन्तु प्राकृतिक अवस्था में आधारभूत परिवर्तनों जैसे कला और विज्ञान, निजी सम्पत्ति, श्रम-विभाजन आदि के कारण मनुष्य संघर्षरत रहने से दु:खी होकर अराजकता तथा अशान्ति के वातावरण को समाप्त करने के लिए यह कदम उठाता है।
  3. इस समझौते द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने प्राकृतिक अधिकार अपने सामूहिक अस्तित्व को समर्पित कर देता है। अर्थात् व्यक्ति स्वयं समझौते का भागी होता है। इसकी स्थापना के बाद व्यक्ति इससे अलग नहीं हो सकता।
  4. समझौते के परिणामस्वरूप उत्पन्न समाज स्वतन्त्रता विरोधी नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि समझौता करने से उसकी स्वतन्त्रता सीमित नहीं होती। इस समझौते द्वारा व्यक्ति अपनी प्राकृतिक स्वतन्त्रता खोकर नागरिक स्वतन्त्रता प्राप्त करता है। रूसो के अनुसार- “समझौते द्वारा व्यक्ति सिर्फ उसी स्वतन्त्रता को खोता है जो उसे असामाजिक भावनाओं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करती है एवं जो केवल शारीरिक शक्ति द्वारा मर्यादित होती है। रूसो इसे नैतिक स्वतन्त्रता कहता है। यह स्वतन्त्रता सच्ची स्वतन्त्रता होती है। इसके द्वारा व्यक्ति अपने ऊपर नियन्त्रण रख सकता है। रूसो के अनुसार- “सामाजिक अनुबंध के द्वारा मनुष्य अपनी प्राकृतिक स्वतन्त्रता खो देता है और उन सब वस्तुओं पर उसका असीमित अधिकार नहीं रह जाता जो उसे आकर्षित करती थी, उसे मिलती है नागरिक स्वतन्त्रता अर्थात जो कुछ उसके पास है वह उसकी सम्पत्ति हो जाता है।” इस समझौते में प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा शामिल रहती है, एतएव व्यक्ति कानूनों का पालन कर सच्ची स्वतन्त्रता का उपभोग करता है। इस प्रकार समझौते द्वारा व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन नहीं होता।
  5. रूसो के सामाजिक समझौते द्वारा जिस सामान्य इच्छा का निर्माण होता है, वह सभी व्यक्तियों के लिए सर्वोच्च होती है। सभी व्यक्ति उसके अधीन होते हैं। रूसो की सामान्य इच्छा राज्य शक्ति व सम्प्रभु है।
  6. रूसो के समझौते के आधार पर निर्मित सामान्य इच्छा सदैव ही जनहित पर आधारित एवं न्याययुक्त होती है। सभी व्यक्ति रूसो की सामान्य इच्छा द्वारा निर्देशित होते हैं।
  7. रूसो के समझौते में प्रत्येक व्यक्ति एक ओर तो वैयक्तिक स्थिति में और दूसरी ओर वह स्वयं अपनी निगमित स्थिति में होता है अर्थात् सामाजिक समझौते के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति के दो पक्ष हैं - व्यक्तिगत और सामूहिक पक्ष। प्रत्येक व्यक्ति प्रभुसत्ता का सहभागी बना रहता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का समर्पण किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं, यह सम्पूर्ण समाज के प्रति करता है। इसलिए यह सिद्धांत व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों का रक्षक है, विनाशक नहीं।
  8. रूसो के सामाजिक समझौता द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने समस्त अधिकारों व शक्तियों को सम्पूर्ण समाज को सौंप देता है। इसलिए कोई भी व्यक्ति इसे इतना कठोर नहीं बनाना चाहेगा कि व्यक्ति का दमन हो और स्वतन्त्रता नष्ट हो जाए। अत: यह समझौता दमनकारी और स्वतन्त्रता विरोधी नहीं है।
  9. इस समझौते द्वारा प्रत्येक को लाभ होता है, हानि नहीं। वह जो कुछ सबको देता है, उसे सम्पूर्ण समाज का अभिन्न अंग होने के नाते प्राप्त भी कर लेता है। अत: इससे प्रत्येक को लाभ होता है।
  10. हॉब्स व लॉक के विपरीत रूसो के समझौते से उत्पन्न राज्य का स्वरूप आंगिक एवं समष्टिवादी है। रूसो राज्य को केल यान्त्रिक साधन न मानकर उसे नैतिक प्राणी मानता है, जिसका अपना जीवन व इच्छा होती है। राज्य मानव में मानवीय गुणों का समावेश करके उसे पूर्ण नैतिक मानव बना देता है। राज्य स्वयं एक उद्देश्य है, किसी उद्देश्य की पूर्ति का साधन नहीं। राज्य का अपना अलग अस्तित्व होता है, जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व भी शामिल है। अत: रूसो का राज्य आंगिक व समष्टिवादी है।
  11. रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता व्यक्ति के सभी अधिकारों का स्रोत है। रूसो अधिकार को नैसर्गिक न मानकर राज्य द्वारा प्रदत्त मानता है। राज्य से बाहर व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता।
  12. रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता कोई ऐसी घटना नहीं है जो कभी एक बार घटी हो। यह तो निरन्तर चलने वाला क्रम है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति सामान्य इच्छा में निरन्तर भाग लेता रहता है।
सामाजिक समझौते के द्वारा सरकार का निर्माण नहीं होता है। सरकार की स्थापना प्रभुसत्तासम्पन्न जनता द्वारा की जाती है। सरकार जनता की प्रतिनिधि है और उसे कोई स्वतन्त्र शक्ति या अधिकार प्राप्त नहीं है। जनता को यह अधिकार है कि वह सरकार बदल दे। रूसो के अनुसार इस समझौते में प्रत्येक व्यक्ति को लाभ होता है। इसमें किसी को कोई हानि नहीं होती। जो अधिकार वह देता है, वही दूसरों के ऊपर प्राप्त कर लेता है। अर्थात् इससे प्रत्येक व्यक्ति को लाभ होता है। 

रूसो के अनुसार- “प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सबके हाथ समर्पित करते हुए अपने ओपको किसी के हाथ समर्पित नहीं करता।” यह समझौता निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इससे प्रत्येक व्यक्ति को लाभ प्राप्त होता रहता है। इस समझौते का प्रत्येक सदस्य अपने सारे अधिकार अथवा शक्तियाँ सम्पूर्ण समाज को दे देता है। व्यक्ति उन्हीं अधिकारों को राज्य को सौंपता है जो सम्पूर्ण समाज से सम्बन्धित हैं। वह व्यक्तिगत अधिकार अपने पास रख लेता है। व्यक्तिगत या सामाजिक कार्य का निर्माण समाज करता है। राज्य को व्यक्तिगत अधिकारों से कुछ लेना-देना नहीं है। राज्य केवल व्यक्तिगत हित में सार्वजनिक हित की सुरक्षा हेतु ही हस्तक्षेप कर सकता है।

रूसो के अनुसार समझौता निष्क्रिय प्रजा और सक्रिय सम्प्रभु दोनों के बीच होता है। मनुष्य अपनी शक्तियाँ सम्पूर्ण समाज को समर्पित करता है और उसकी क्रियाओं पर समाज के समस्त सदस्यों का समान अधिकार होता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल उतना ही स्वतन्त्र रहता है जितना कि वह पहले था, वरन् सामूहिक परिस्थितियों के अन्तर्गत वह पहले से कहीं अधिक स्वतन्त्र हो जाता है। 

संविदा के फलस्वरूप उत्पन्न समाज का रूप सावयवी होता है। यह समाज नैतिक तथा सामूहिक प्राणी है। व्यक्ति राज्य का अभिन्न अंग होने के नाते, राज्य से किसी प्रकार भी अलग नहीं हो सकता। व्यक्ति राज्य के विरुद्ध आचरण भी नहीं कर सकता। रूसो ने हॉब्स की तरह अराजकता का अन्त करने के लिए ही सामाजिक समझौता किया।

सामाजिक समझौता सिद्धांत की आलोचनाएँ

रूसो द्वारा प्रतिपादित सामाजिक समझौता सिद्धांत की इन आधारों पर आलोचना हुई है :-

1. तार्किक असंगतियाँ : रूसो ने जिन तर्कों को आधार बनाकर राज्य का निर्माण किया है, वे हास्यास्पद और विसंगतियों से भरे हैं। रूसो कहता है कि समझौते में शामिल प्रत्येक व्यक्ति जो पूरे समुदाय से समझौता करता है, वह वास्तव में अपने से ही समझौता करता है। ऐसे कथन निरर्थक प्रलाप जैसे लगते हैं। समझौते द्वारा बनने वाला सम्प्रभु न कोई व्यक्ति है और न व्यक्तियों का समूह। 

वह एक सामान्य इच्छा है, फिर भी उसका अपना व्यक्तित्व है, अपनी इच्छा है। इसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। एक मनोवैज्ञानिक इकाई के साथ व्यक्ति का काम करना कल्पना लोक की बात है। 

2. समझौता अवैधानिक: जिस समय यह समझौता हुआ, उस समय उसे लागू करने वाली कोई वैध शक्ति नहीं थी। अत: इसे वैध नहीं माना जा सकता।

3. रूसो के राज्य में व्यक्ति समाप्त हो गया है : रूसो ने राज्य की चेतना को इतना सार्वभौमिक बना दिया है कि उसमें व्यक्ति एकाकार होकर रह गया है। वान का कहना है कि रूसो व्यक्तिवाद को समष्टिवाद के साथ इस तरह मिला देता है कि यह जनसाधारण से परे चला गया है। समझौते के अनुसार व्यक्ति अपने सारे अधिकार राज्य को दे देता है तथा समाज का सदस्य होने के नाते उन्हें पुन: प्राप्त कर लेता है। यह सैद्धान्तिक कथन है। सच्चाई तो यह है कि रूसो ने व्यक्ति को निरंकुशता के हवाले कर दिया है।

4. प्राकृतिक अवस्था का वर्णन काल्पनिक है : इतिहास में इस तरह का कोई वर्णन नहीं मिलता कि सम्पत्ति व जनसंख्या की वृद्धि ने प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति के जीवन को कष्टमय बना दिया। यह सैद्धान्तिक रूप से तो ठीक हो लेकिन इतिहास में इसका कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए रूसो की प्राकृतिक अवस्था का वर्णन निराधार व काल्पनिक है।

5. विरोधाभासी : रूसो के अनुसार समझौता व्यक्ति और समाज में होता हे। दूसरी ओर वह कहता है कि समाज समझौते का परिणाम है। उसके विचार में स्पष्ट विरोधाभास है। उसका सामाजिक समझौता सिद्धांत हॉब्स के मानव समाज के विचार पर आधारित है। आलोचकों के अनुसार कहीं रूसो समझौते को ऐतिहासिक घटना कहता है, कहीं निरन्तर चलने वाला क्रम। अत: यह सिद्धांत विरोधाभासी है।

6. मानव स्वभाव का गलत वर्णन : रूसो ने प्राकृतिक अवस्था में मानव स्वभाव का वर्णन करते हुए कहा है कि मौलिक रूप से मानव अच्छा है। उसके सारे दोष बाह्य परिस्थितियों की देन हैं। वास्तव में ऐसा नहीं है। मानव स्वभाव दैत्य व देव दो प्रवृत्तियों का मेल है।

7. राज्य समझौते का नहीं, विकास का परिणाम है : आधुनिक समय में यह सिद्ध हो चुका है कि राज्य समझौते का परिणाम न होकर धीरे-धीरे होने वाली सामाजिक संस्थाओं के विकास का परिणाम है। अत: राज्य को समझौते का परिणाम कहना सरासर गलत है।

8. सामाजिक प्रगति सिद्धांत का विरोधी : रूसो का सामाजिक समझौता सिद्धांत सम्पत्ति का उदय तथा जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूप प्राकृतिक अवस्था दोषपूर्ण हुई। आज तक का इतिहास विज्ञान व ज्ञान के परिणामस्वरूप निरन्तर प्रगति का इतिहास है। रूसो की धारणा इस सिद्धांत की विरोधी है।

9. रूसो के सामाजिक समझौते में यह कमी नजर आती है कि रूसो ने मनुष्य को बुराई से बचने के लिए मार्गदर्शन किया है परन्तु अच्छाई के मार्ग पर ध्यान नहीं दिया है अर्थात् रूसो ने भ्रष्टाचार, दुराचार और स्वार्थ से बचने के लिए अपने मत प्रस् किये हैं, परन्तु उनके विकास और प्रगति की ओर ध्यान नहीं दिया है।

10. स्पष्टता का अभाव : रूसो सामाजिक समझौते को निरन्तर चलती रहने वाली प्रक्रिया मानता है। इस कथन का कोई स्पष्ट अर्थ रूसो प्रस्तुत नहीं करता। अत: रूसो का यह सिद्धांत अस्पष्ट है।

रूसो के समझौता सिद्धांत का महत्व

रूसो का समझौता सिद्धांत ऐतिहासिक, कानूनी और तार्किक दृष्टि से दोषपूर्ण होते हुए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसका महत्व है :-
  1. इस सिद्धांत द्वारा राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत पर करारी चोट की गई है।
  2. इस सिद्धांत ने राज्य को मानवीय संस्था बनाकर निरंकुश शासन का विरोध किया और उत्तरदायी प्रजातन्त्रीय शासन प्रणाली का समर्थन किया है।
  3. इसने शासन का आधार जन-स्वीकृति को बताया है, जो आधुनिक प्रजातन्त्र को मजबूती प्रदान करती है।
  4. रूसो ने लोकप्रिय प्रभुसत्ता को सुदृढ़ बनाया है।
  5. यह सिद्धांत अमेरिका तथा फ्रांसीसी क्रान्तियों का प्रेरणा-स्रोत है।
अत: हम कह सकते हैं कि अनेक त्रुटियों के बावजूद यह सिद्धांत राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

रूसो का सम्प्रभुता का सिद्धांत

रूसो के सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार उसके ‘सामाजिक अनुबंध सिद्धान्त’ से सम्बन्धित है। इस सिद्धांत में रूसो ने निरंकुशवाद एवं उदारवाद जैसे दो परस्पर विरोधी विचारों को समन्वित करने का प्रयास किया है। रूसो के सिद्धांत में सामाजिक समझौता, सम्प्रभुता और सामान्य इच्छा की धारणाएँ परस्पर इस प्रकार जुड़ी हुई हैं कि एक के बिना दूसरे की व्याख्या नहीं की जा सकती। समप्रभुता की आधुनिक धारणा का विकास बोदाँ के सिद्धांत से प्रारम्भ हुआ, जिसे हॉब्स ने और अधिक स्पष्ट किया। बोदाँ और हॉब्स ने निरंकुश सम्प्रभुता का समर्थन किया। 

लॉक और माण्टेस्क्यू ने सम्प्रभुता के सिद्धांत की उपेक्षा की। उन्होंने इसे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का शत्रु माना। रूसो ने लॉक के उदारवाद तथा हॉब्स के निरंकुशवाद में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है।

रूसो के अनुसार समुदाय सभी मनुष्यों के योग से बनता है। इस समुदाय में सामान्य इच्छा का निवास है जो सर्वोच्च होती है। जब समुदाय सामान्य इच्छा द्वारा संचालित होता है, तो वह सम्प्रभु कहलाता है। परन्तु जब वह निष्क्रिय होता है तो वह राज्य कहलाता है। रूसो के अनुसार सामान्य इच्छा ऐसी प्रभुसत्ताधारी है जो लॉक के लोकप्रिय प्रभुसत्ताधारी और हॉब्स के पूर्ण सत्ताधारी प्रभु के समन्वय का प्रतीक है।

रूसो सम्प्रभुता को परिभाषित करते हुए कहता है- “सम्प्रभुता सामान्य इच्छा की कार्यान्विति है” (Sovereignty is the exercise of the General Will)। दूसरे शब्दों में रूसो के राज्य में सामान्य इच्छा ही सम्प्रभु है। रूसो के अनुसार- “जिस प्रकार प्रकृति ने मानव को अपने सभी अंगों के ऊपर निरपेक्ष शक्ति प्रदान की है, उसी प्रकार सामाजिक समझौता राजनीतिक समाज को अपने सभी सदस्यों पर असीम शक्ति प्रदान करता है और यही असीम शक्ति जब सामान्य इच्छा के द्वारा निर्देशित होती है तो सम्प्रभुता का नाम धारण कर लेती है। इस प्रकार रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता द्वारा उत्पन्न समुदाय सम्प्रभु होता है। रूसो की मान्यता है कि संधीकरण का कार्य एक नैतिक तथा सामूहिक सत्ता को जन्म देता है। इस सत्ता का अपना अस्तित्व, जीवन व इच्छा होती है। 

रूसो इस इच्छा को सामान्य इच्छा कहता है। इसी सामान्य इच्छा में सम्प्रभुता निवास करती है। रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता राजनीतिक समाज को अपने सभी सदस्यों पर निरंकुश शक्ति प्रदान करता है। सामान्य इच्छा द्वारा निर्देशित होने पर यह शक्ति सम्प्रभुता होती है। अत: सम्प्रभुता समपूर्ण समाज में निहित है, वह सर्वोच्च शक्ति है। उसके विरुद्ध किसी को भी विद्रोह करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह जनता की शक्ति की प्रतीक है।” रूसो के अनुसार सम्प्रभुत्ता सम्पूर्ण समाज में निहित है। प्रत्येक व्यक्ति समझौते में भागीदार होने के कारण सम्प्रभुता का भी भागीदार है। किसी को उसके विरुद्ध विद्रोह का अधिकार नहीं है। अत: रूसो ने जनता की सत्ता का प्रतिपादन करके ‘लोकप्रिय प्रभुसत्ता के सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया है। 

रूसो के शब्दों में- “प्रभुसत्ता का प्रत्येक कार्य अर्थात् लोकमत का प्रत्येक अधिकृत कार्य सभी नागरिकों के लिए समान रूप से हितकर हो।” प्रभुसत्ता लोकमत में होती है। रूसो का सम्प्रभु सारा समाज है। इसलिए आलोचक कहते हैं कि यह हॉब्स का ‘लेवियाथन’ है जिसका सिर काट दिया गया है।

सम्प्रभुता की विशेषताएँ

  1. प्रभुसत्ता अहस्तान्तरणीय है : प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और उसे वहीं रहना चाहिए। रूसो कहता है- “मैं कहता हूँ कि प्रभुसत्ता केवल लोकमत का कार्यान्वयन होने के कारण भी हस्तान्तरणीय नहीं हो सकती। शक्ति को तो हस्तान्तरिक किया जा सकता है, प्रभुसत्ता का नहीं।” यदि सम्प्रभु अपनी सम्प्रभुता का हस्तान्तरण करता है तो उसका अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा।
  2. प्रभुसत्ता अविभाज्य है : जिस प्रकार सम्प्रभुता का हस्तान्तरण नहीं हो सकता, उसी प्रकार सम्प्रभुता अविभाज्य भी है। मत का एक गुण यह होता है कि वह एकतायुक्त तथा अविभाज्य होता है। यदि लोकमत का विभाजन करेंगे तो वह नष्ट हो जाएगा। इसलिए लोकमत ही सम्प्रभुता हो सकती है। प्रभुसत्ता का कार्यपालिका, विधानपालिका व न्यायपालिका में विभाजन वास्तव में प्रभुसत्ता का विभाजन न होकर उसके कार्यों का विकेन्द्रीयकरण है। इसके बाद भी सम्प्रभुता अविभाज्य रूप में जनता में निवास करती है। प्रभुसत्ता के विभाजन का अर्थ है पहले उसे अपने स्थान से हटाना।
  3. प्रभुसत्ता अदेयेय है : रूसो के अनुसार किसी समुदाय को प्रभुसत्ता से दूर नहीं हटाया जा सकता। इसलिए यह अदेय है। रूसो के शब्दों में- “जिस कारण से प्रभुसत्ता अदेय है, उसी कारण से अविभाज्य भी है।” अत: रूसो की सम्प्रभुता अदेय है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति के शरीर से उसके प्राण को पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार सामान्य इच्छा से सम्प्रभुता को अलग करना सम्भव नहीं है। इसका हस्तान्तरण भी सम्भव नहीं है।
  4. प्रभुसत्ता का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता : रूसो के अनुसार- “चूँकि सम्प्रभुता अदेय होती है और सामान्य इच्छा में निहित रहती है। सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं किया जा सकता; इसलिए सम्प्रभुता का भी प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता। प्रभुसत्ता जनता में निहित होने का कारण उसका प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता। “जैसे कोई जाति अपना प्रतिनिधि नियुक्त करती है, वह स्वतन्त्र नहीं रहती तथा अपने अस्तित्व को खो देती है।”
  5. सम्प्रभुता असीम है : सामाजिक समझौते के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने प्राकृतिक अधिकार अपने सामूहिक अस्तित्व को समर्पित कर देता है। अत: प्रभुसत्ताधारी पूर्ण सत्तासम्पन्न हो जाती है। सिद्धांत के विरोध का अधिकार किसी को नहीं है तथा प्रभुसत्ताधारी के आदेश का पालन होता है।
  6. रूसो के अनुुसार सम्प्रभुता सभी कानूनों का स्रोत है : राज्य के समस्त कानून सम्प्रभु के द्वारा निर्मित होते हैं। सम्प्रभु कानून द्वारा अपनी इच्छा को व्यक्त करता है और अपने सारे कार्यों का सम्पादन करता है। सम्प्रभुता दोषातीत है, क्योंकि यह सामान्य इच्छा पर आधारित है। इससे त्रुटि की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
  7. सम्प्रभुता एकता स्थापित करने का सूत्र है।
  8. सम्प्रभुता सदैव नयायशील होती है।
  9. सम्प्रभुता अविच्छेद्यता का गुण भी रखती है। सामान्य इच्छा के रूप में यह जनता में रहती है। अत: इसको जनता से दूर नहीं किया जा सकता।
उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रूसो जनप्रभुता का उपासक है। उसकी सम्प्रभुता अदेय, अविभाज्य, असीम, दोषातीत है। सम्प्रभुता एकता का प्रतीक तथा कानून का स्रोत है। रूसो ने लोकप्रिय प्रभुसत्ता के विचार को आगे बढ़ाया है। उसने सम्प्रभु सामान्य इच्छाको अविभाज्य, अदेय, असीम, अप्रतिनिधिक तथा एकता का सूत्र कहा है। रूसो ने अपने सामान्य इच्छा के सिद्धांत द्वारा जनता को सम्प्रभु बनाया है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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