संघात्मक सरकार का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, गुण एवं दोष

अनुक्रम
संघात्मक सरकार संघवाद की अवधारणा पर आधारित है। संघवाद की जड़ें प्राचीन समय में भी किसी न किसी रूप में विद्यमान थी। आधुनिक समय में संघवाद का सर्वोत्तम उदाहरण अमेरिका में है। विश्व निरन्तर संघवाद की ओर प्रगति कर रहा है। यद्यपि 1991 में सोवियत संघ के विघटन से संघवाद को करारा झटका लगा है, लेकिन विश्व में संघवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें आसानी से उखाड़ना असम्भव है। आज भारत, स्विट्जरलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, युगोस्लाविया, अमेरिका आदि देशों में संघवाद अपनी चरम सीमा पर है।

संघात्मक सरकार का अर्थ और परिभाषा

संघात्मक सरकार की अवधारणा ‘संघ’ शब्द पर आधारित है। अंग्रेजी भाषा में संघ शब्द के लिए 'Federation' शब्द का प्रयोग होता है। यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'Foedus' से निकला है, जिसका अर्थ है - सन्धि या समझौता। इस तरह शाब्दिक दृष्टिकोण से संघात्मक सरकार समझौते पर निर्मित सरकार है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत अनेक इकाइयां कुछ सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक केन्द्रीय सरकार का गठन करते हैं और शेष विषयों में अपनी अपनी अलग स्वतन्त्र सत्ता कायम रखते हैं। केन्द्रीय सरकार ही सम्पूर्ण देश का शासन चलाती है। इसके रहते हुए भी प्रान्तीय या प्रादेशिक सरकारों की स्वतन्त्रता का लोप नहीं होता है। केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों में शक्तियों का विभाजन संविधान रूपी समझौते के तहत ही होता है। प्रत्येक सरकार अपने अपने क्षेत्रों में सर्वशक्तिमान होती है। प्राय: दोनों ही सरकारें एक दूसरे के क्षेत्राधिकार में प्रवेश से बचने का हर सम्भव प्रयास करती रहती हैं। दोनों सरकारों का अस्तित्व संविधानिक प्रावधानों पर आधारित होता है। संघात्मक सरकार दोहरी सरकार होती है। इसमें केन्द्रीय सरकार के साथ साथ प्रान्तीय सरकारें भी होती हैं। प्रान्तीय सरकारों को अलग अलग विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका होती हैं। ऐसी सरकार में संविधान ही सर्वोच्च होता है। दोनों सरकारें को संविधान की मर्यादाओं के अन्तर्गत ही देश का शासन चलाना होता है। इस प्रकार संघात्मक शासन वह होता है जहां संविधान के द्वारा शक्तियां केन्द्र और प्रान्तों में बंटी होती हैं और दोनों अपने कार्यों में स्वतन्त्र होते हुए भी संघात्मक शासन की सफल्ता के लिए सह-अस्तित्व की भावना के आधार पर कार्य करते हैं। अनेक विद्वानों ने संघात्मक सरकार को इस प्रकार से परिभाषित किया है :-
  1. फाईनर के अनुसार-”संघात्मक शासन वह है जिसमें सत्ता एवं शक्ति का एक भाग संघीय इकाइयों या प्रान्तों में निहित होता है और दूसरा भाग केन्द्रीय संस्था में निहित होता है जो क्षेत्रीय इकाइयों द्वारा जानबूझकर संगठित की जाती है।” 
  2. मॉण्टेस्क्यू के अनुसार-”सघात्मक सरकार एक ऐसा समझौता है जिसके द्वारा बहुत से एक जैसे राज्य एक बड़े राज्य के सदस्य बनने को सहमत हो जाते हैं।”
  3. डॉयसी के अनुसार-”संघवाद एक राजनीतिक समझौता है जिसके अनुसार राज्य के अधिकारों को सुनिश्चित करने के साथ-साथ सारे राष्ट्र की एकता को भी स1निश्चित किया जाता है।”
  4. गार्नर के अनुसार-”संघात्मक सरकार एक ऐसी प्रणाली है जिसमें केन्द्रीय तथा स्थानीय सरकारें एक सामान्य प्रभुसत्ता के अधीन होती है। यह सरकारें अपने अपने निश्चित क्षेत्र में सर्वोच्च होती हैं। उनका कार्यक्षेत्र संविधान द्वारा ही निश्चित किया जाता है।”
  5. के0सी0 व्हीयर के अनुसार-”संघ शासन का अर्थ एक ऐसी पद्धति है जिसके सामान्य और प्रादेशिक शासकों में सामंजस्य होते हुए भी वे अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र होते हैं।”
  6. सी0एफ0 स्ट्रांग के अनुसार-”संघ राज्य एक ऐसी राजनीतिक योजना है जिसका उद्देश्य राज्यों के अधिकारों का राष्ट्रीय एकता तथा शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। अर्थात् संक्षेप में ऐसा शासन जिसमें विधायिनी सत्ता केन्द्रीय या संघीय शक्ति और ऐसी लघुत्तर इकाईयों में विभाजित रहती है जो अपनी शक्ति की पूर्णता के अनुसार राज्य या प्रान्त कहलाती है।”
  7. डेनियल जे0 एलाजारा के अनुसार-”संघीय व्यवस्था अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों को एक ऐसी बृहत्तर राजनीतिक व्यवस्था में संगठित व एकताबद्ध करती है जिसमें हर राजनीतिक इकाई अपनी आधारभूत राजनीतिक अखण्डता से युक्त रहती है।”
  8. कोरी के अनुसार-”संघवाद सरकार एक ऐसा दोहरापन है जो विविधता के साथ एकता का समन्वय करने की दृष्टि से शक्तियों के प्रादेशिक व प्रकार्यात्मक विभाजन पर आधारित होता है।”
  9. नाथन के अनुसार-”संघात्मक राज्य छोटे छोटे राज्यों का एक योग होता है जिसमें प्रत्येक अपनी पृथक सत्ता का रखते हुए परिभाषित समान उद्देश्य के लिए संघ के रूप में एक दूसरे से मिलते हैं जो कम-से-कम सैद्धान्तिक रूप में विघटनशील नहीं हैं।” 
  10. जैलिनेक के अनुसार-”एक संघात्मक कई राज्यों के मेल से बना हुआ एक प्रभुसत्तासम्पन्न राज्य है जो अपनी शक्ति संघ को बनाने वाले राज्यों से प्राप्त करता है, क्योंकि संघ के प्रति वे राज्य इस तरह बंधे होते हैं कि एक सर्वोच्च सत्ता सम्पन्न संस्था का निर्माण हो जाता है।”
  11. हैमिल्टन के अनुसार-”संघात्मक शासन राज्यों का एक समुदाय है जो एक नए राज्य का निर्माण करता है।”
इस प्रकार उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि संघात्मक शासन प्रणाली ऐसी प्रणाली होती है जिसमें शक्तियों का विभाजन केन्द्र व इकाइयों के मध्य संविधान या कानूनी सीमाओं के अन्तर्गत किया जाता है। अपने अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र होते हुए भी केन्द्र व इकाइयां देश के संविधान के प्रति उत्तरदायी होते हैं। एक दूसरे के अधीन न होकर भी केन्द्रीय व प्रादेशिक सरकारें एक दूसरे की समन्वयक बनी रहती हैं और संघात्मक सरकार के सारे उद्देश्य आसानी से प्राप्त कर लिए जाते हैं।

संघ और परिसंघ में अन्तर 

संघात्मक शासन व्यवस्था परिसंघात्मक और एकात्मक शासन के बीच की व्यवस्था है और परिसंघात्मक शासन व्यवस्था एकात्मक शासन के पूर्णतया: विपरीत व्यवस्था है। परिसंघात्मक सरकार स्वतन्त्र राज्यों ने कुछ महत्वपूर्ण मामलों में कुशल सहयोग को सम्भव बनाने के लिए परिसंघ में शामिल होने वाले राज्यों के आपसी समझौते का ही परिणाम होती हैं। इसमें राज्य शक्ति के अनेक स्वतन्त्र केन्द्र होते हैं और उन्हें मौलिक सत्ता भी प्राप्त रहती है। सामूहिक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग आदि के लिए कुछ शक्तियां राज्य सरकारों द्वारा परिसंघ सरकार को दे दी जाती है। परिसंघात्मक सरकार की शक्तियां संविधानिक सत्ता को देन नहीं होती हैं। इस सरकार का राज्य सरकारों से अप्रत्यक्ष सम्बन्ध ही रहता है। परिसंघात्मक सरकार का अस्तित्व भी राज्य सरकारों की इच्छा पर ही निर्भर करता है। यह सरकार राज्य सरकारों की सेविका बनकर कार्य करती है, स्वामी बनकर नहीं। यह सरकार राज्य सरकारों के समानान्तर भी नहीं हो सकती। इसके विपरीत संघात्मक सरकार एकात्मक और परिसंघात्मक शासन व्यवस्थाओं के बीच की कड़ी है। इसमें राज्य व केन्द्रीय सरकार की शक्तियों का òोत संविधान होता है। दोनों की पृथक पृथक शक्तियां व स्वतन्त्र अस्तित्व रहता है। इसमें राज्य सरकारें केन्द्रीय सरकार के अस्तित्व को चुनौती नहीं दे सकती। इस सरकार की प्रमुख विशेषता यह है कि एकात्मक तथा परिसंघात्मक सरकार से अलग होते हुए भी दोनों की विशेषताओं को समेटे हुए हैं। इन दोनों सरकारों में अन्तर हो सकते हैं :-
  1. परिसंघात्मक सरकार अस्थाई होती है क्योंकि इसका निर्माण संघात्मक इकाइयों द्वारा निश्चित उद्देश्यों के लिए स्वेच्छा से किया जाता है। निश्चित उद्देश्यों को पूरे करने के बाद ये सरकारें या तो विघटित हो जाती हैं या संघ राज्य की ओर उन्मुख हो जाती हैं। इसके विपरीत संघात्मक सरकार स्थाई होती है। इसका निर्माण दीर्घकालीन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संविधानिक व्यवस्था के तहत किया जाता है।
  2. संघात्मक शासन में इकाइयां स्वतन्त्र व प्रभुसत्तासम्पन्न नहीं होती। इसमें केन्द्रीय सरकार या संविधान ही सर्वोच्च सत्ता का स्वामी होता है। संघ निर्माण के बाद सम्प्रभु शक्तियां इकाइयों द्वारा केन्द्रीय सरकार को ही सौंप दी जाती है। इसके विपरीत परिसंघात्मक सरकार प्रभुसत्ता से विहीन होती है, क्योंकि वास्तविक सम्प्रभुता तो समझौता करने वाली इकाइयों के पास ही रह जाती है।
  3. संघात्मक शासन में एक राष्ट्रीयता व एक राष्ट्र का गुण पाया जाता है, जबकि परिसंघात्मक शासन में राष्ट्रीयता व पूर्ण राष्ट्र का अभाव पाया जाता है, क्योंकि समझौता करने वाली इकाइयां वास्तविक प्रभुसत्ता का त्याग नहीं करती और न ही अपनी राष्ट्रीयता परिसंघ को देती है।
  4. संघात्मक सरकार में दोहरी नागरिकता, दोहरी सरकार आदि तथ्वों का समावेश होता है, जबकि परिसंघात्मक सरकार में नागरिकता व संघीय सरकार का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
  5. संघात्मक सरकार की स्थापना का आधार संविधान होता है, जबकि परिसंघात्मक सरकार की स्थापना का आधार संघात्मक इकाइयों द्वारा परस्पर किया जाने वाला समझौता या सन्धि होती है।
  6. संघात्मक सरकार का निर्माण साधारण परिस्थितियों में होता है, जबकि परिसंघात्मक सरकार का जन्म असाधारण या बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा जैसे कारणों की देन है।
  7. संघात्मक शासन में नए नए कानूनों का निर्माण होता रहता है, जबकि परिसंघात्मक शासन व्यवस्था में पहले वाले कानून ही प्रभावी रहते हैं। यह शासन अपने को परिवर्तनशील व गतिशील बनाने में समर्थ नहीं हैं। ऐसा गुण तो संघात्मक शासन में है जो संविधान संशोधनों के द्वारा अपने को गतिशील व प्रासंगिक बनाए रखता है।
  8. परिसंघात्मक शासन में केन्द्रीय सरकार की शक्तियां सीमित प्रकृति की होती हैं, क्योंकि उन्हें राज्य सरकारों द्वारा प्रदान किया जाता है। इसके विपरीत संघात्मक सरकार में केन्द्रीय सरकार की शक्तियां व्यापक होती हैं, क्योंकि ये स्वतन्त्र रूप में संविधान द्वारा प्रदत्त हैं। 

संघात्मक शासन के आधारभूत सिद्धान्त

संघात्मक शासन संघात्मक संविधान तथा संघात्मक सरकार की अवधारणा पर आधारित है। संघात्मक संविधान वह होता है जिसमें केन्द्रीय व राज्य सरकारों की शिक्त्यों का विभाजन इस प्रकार किया जाता है जिससे दोनों सरकारों की स्वतन्त्रता बरकरार रहती है। विभाजन के साथ साथ यह दोनों सरकारों की शक्तियों का òोत भी होता है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि जहां संघात्मक संविधान हो, वहां संघात्मक सरकार भी होगी। संघात्मक सरकार तो वही हो सकती जहां केन्द्रीय सरकार व प्रादेशिक सरकारों की शक्तियों का ऐसा विभाजन हो कि व्यवहार में प्रत्येक सरकार एक दूसरे के बराबर व स्वतन्त्र हो। यही संघात्मकता का सिद्धान्त है। लेकिन आज अनेक सरकारें इस सिद्धान्त पर खरा नहीं उतरती इसलिए उनके संघात्मक यहोने पर शक किया जाता है। लेकिन उदारीकरण का प्रभाव अब संघात्मक शासन व्यवस्था पर भी पड़ने लगा है, इसलिए अब संघात्मकता के सिद्धान्त का भी आधुनिकीकरण हो रहा है। आज प्रत्येक देश में संघात्मक सरकार या शासन को सुनिश्चित करने वाले कुछ सिद्धान्त या मापदण्ड हैं :-

सर्वोच्च, लिखित व कठोर संविधान 

संघात्मक शासन में संविधान का लिखित होना बहुत आवश्यक है ताकि केन्द्र और प्रान्तों में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जा सके। यदि संविधान लिखित नहीं होगा तो दोनों सरकारों में क्षेत्राधिकार या शक्तियों के बंटवारे तथा प्रयोग सम्बन्धी गतिरोध व झगड़े जन्म लेते रहेंगे। इसी तरह शक्तियों के विभाजन को अमली जामा पहनाने तथा राजनीतिक व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए संविधान का सर्वोच्च होना भी आवश्यक है। जिस शासन व्यवस्था में संविधान के अनुसार कानूनों व नियमों का निर्माण नहीं होता हो, वह व्यवस्था संघात्मक व्यवस्था नहीं हो सकती। सर्वोच्च संविधान ही सत्ता के रूप में अपने नियमों को राज्य व केन्द्रीय सरकारों पर थोप सकता है और उन्हें व्यावहारिक रूप दे सकता है। कोई भी सरकार या संस्था संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। संविधान का उल्लंघन करने का अधिकार किसी को नहीं हो सकता। भारत व अमेरिका में संविधान की सर्वोच्चता का पालन किया गया है। इसलिए वहां संघवाद सफल रहा है। संविधान की सर्वोच्चता के साथ-साथ संविधान का अचल या कठोर होने भी आवश्यक है। कठोर संविधान के होने से कोई भी सरकार सरलता से न तो कानून में परिवर्तन कर सकती है और न नए कानून का निर्माण कर सकती है। यदि किसी सरकार को संविधान में संशोधन का एकतरफा अधिकार दिया गया तो उससे संघात्मकता को गहरा आघात पहुंच सकता है। डॉसयी ने संविधान की अटलता व अपरिवर्तनशीलता का ही समर्थन किया हे। अमेरिका में संविधान की कठोरता के कारण ही वहां संघवाद अधिक प्रभावी है। इस प्रकार संविधान का लिखित, कठोर व सर्वोच्च रूप ही संघवाद का आधारभूत सिद्धान्त है। इसके अभाव में किसी भी देश में संघात्मक शासन या सरकार की स्थापना नहीं की जा सकती।

शक्तियों का विभाजन 

संघात्मक शासन की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों के बीच संविधान द्वारा स्पष्ट तौर पर शक्तियों का बंटवारा लिखित रूप में किया जाए। संघात्मक सरकार की स्थापना वहीं हो सकती है जहां शक्तियों का विभाजन केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के बीच में होता है। इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय तो केन्द्रीय सरकार को तथा कम व गौण महत्व के विषय प्रान्तीय सरकारों के क्षेत्राधिकार में आ जाते हैं। इस विभाजन का उद्देश्य यही होता है कि दोनों सरकारें अपने अपने क्षेत्रों में सीमित रहें और एक दूसरे के क्षेत्राधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप करके संघ को कोई हानि न पहुंचाएं स्ट्रांग का कहना है कि “शक्ति विभाजन का लक्ष्य यह होता है कि संघ तथा संघ निर्मात्री इकाइयां अपने अपने क्षेत्रों में सीमित हैं और उनमें से कोई भी सर्वोच्च नहीं है।” अमेरिका में शक्ति-विभाजन के सिद्धान्त का कठोरता से पालन किया गया है। इसलिए संघवाद के लिए शक्तियों का स्पष्ट व लिखित बंटवारा होना भी जरूरी है। इसके बिना संघात्मक शासन को सफल नहीं बनाया जा सकता।

दोहरी नागरिकता

संघवाद में दोहरी नागरिकता का प्रावधान होता है। इसमें नागरिकों को एक तरफ तो सारे देश की नागरिकता प्राप्त होती है और दूसरी तरफ उस इकाई या प्राप्त की नागरिकता प्राप्त होती है, जिसमें वह रहता है। उदाहरण के लिए भारत में हरियाणा में रहने वाले नागरिक को एक तो भारत का नागरिक कहा जाता है और दूसरी ओर हरियाणा का नागरिक माना जाता है। यह नागरिकता प्रत्येक संघात्मक शासन व्यवस्था में दोहरी ही होती है। इससे नागरिकों की दोहरी राजभक्ति का आभास होता है। संघात्मक शासन व्यवस्था में जनता की निष्ठा राज्य व संघीय दोनों कानूनों के प्रति रहती है। इस तरह दोहरी नागरिकता भी संघात्मक शासन की आधारभूत विशेषता है।

न्यायपालिका की सर्वोच्चता

संघात्मक शासन में केन्द्र व प्रान्तों में मतभेदों को सुलझाने के लिए स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना भी बहुत आवश्यक है। संविधान की रक्षा, केन्द्र व प्रान्तों के झगड़ों को हल करने तथा संविधान की व्याख्या करने के लिए न्यायपालिका का सर्वोच्च होना जरूरी है। संघात्मक शासन व्यवस्था में कानून की व्याख्या, शक्तियों के प्रयोग आदि बातों को लेकर केन्द्र व प्रान्तों में झगड़े हो सकते हैं। कई बार कोई भी सरकार संविधान के नियमों के विरुद्ध कानून भी बना सकती है। इसलिए न्यायपालिका के पास न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का होना भी जरूरी है ताकि उस अनुचित व संविधान विरोधी कानून को अवैध घोर्षित किया जा सके। अमेरिका तथा भारत में सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है। इसी कारण आज इन देशों में न्यायिक सर्वोच्चता के सिद्धान्त का पालन करने से संघवाद का आधार मजबूत बना हुआ है। इसी कारण न्यायपालिका का स्वतन्त्र व सर्वोच्च होना संघात्मक शासन की सफलता का आधार है।

द्विसदीय विधायिका

संघात्मक शासन व्यवस्था में मुख्य रूप से दो सदनों का होना जरूरी है। इसमें एक सदन तो सारे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा प्रान्तों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। भारत में लोकसभा और राज्यसभा संसद के दो सदन हैं। इसी तरह अमेरिका में भी द्विसदनीय विधायिका या संसद की स्थापना की गई है। द्वितीय सदन पहने सदन की निरंकुशता को रोकने में कारगर सिद्ध हो सकता है और संघवाद की आत्मा का विकास कर सकता है। इसी कारण द्वितीय सब सीनेट को अमेरिका में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसकी गणना संसार के शक्तिशाली द्वितीय सदनों में की जाती है। भारत व कनाडा में इस सदन की स्थिति काफी कमजोर है। लेकिन संघवाद के समर्थक द्वितीय सदन का होना संघात्मक शासन के लिए शुभ लक्षण मानते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संविधान का लिखित व कठोर रूप, संविधान व न्यायपालिका की सर्वोच्चता, द्विसदीय विधानमण्डल, दोहरी नागरिकता, शक्तियों का विभाजन आदि बातें संघात्मक शासन का आधार है। इसके अभाव में संघवाद की कल्पना करना निरर्थक है। भारत व अमेरिका में इन सिद्धान्तों का सफलतापूर्वक पालन हुआ है। यही कारण है कि आज अमेरिका को एक सफल संघात्मक राज्य का दर्जा दिया जाता है।

संघात्मक शासन की विशेषताएं

संघात्मक शासन के आधारभूत सिद्धान्तों का अवलोकन करने से संघात्मक शासन व्यवस्था की विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं :-
  1. संघात्मक सरकार में शक्तियों का बंटवारा केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के बीच में होता है।
  2. संघात्मक सरकार में सम्प्रभुसत्तात्मक शक्तियां राज्य या संविधान के पास ही रहती हैं।
  3. संघात्मक सरकार में दोहरी शासन-व्यवस्था होती है। इसमें प्रान्तीय व केन्दीय सरकारें अपने अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र होते हुए भी संघात्मक शासन को सफल बनाने के लिए सहअस्तित्व के आधार पर ही कार्य करती है।
  4. संघात्मक शासन में संविधान लिखित, कठोर व सर्वोच्च होता है।
  5. संघात्मक सरकार दोहरी नागरिकता के सिद्धान्त पर आधारित होती है।
  6. संघात्मक सरकार राष्ट्रीय एकता और प्रान्तों की स्वतन्त्रता का सामंजस्य स्थापित करती है।
  7. संघात्मक सरकार में इकाइयों को संघ से पृथक होने की स्वतन्त्रता नहीं होती है।
  8. संघात्मक सरकार द्विसदनीय विधानमण्डल की व्यवस्था करती है।
  9. संघात्मक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका स्वतन्त्र व सर्वोच्च होती है।
  10. संघात्मक शासन में शिक्त्यों का स्पष्ट विभाजन होता है। इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय तो केन्द्रीय सरकार के पास तथा कम महत्व के विषय प्रांतीय सरकारों के पास होते हैं।
  11. संघात्मक सरकार स्वयं उत्पन्न नहीं होती, बल्कि उसका निर्माण संविधानिक प्रावधानों के तहत किया जाता है।
  12. संघात्मक शासन में केन्द्र व इकाइयों के बीच समन्वय की भावना का पाया जाना ही संघात्मक शासन की सफलता का आधार है।
लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि ये सारी विशेषताएं प्रत्येक संघात्मक राज्य में पाई जाएं। जिन राज्यों में ये सभी विशेषतउएं पाई जाती हैं, उन्हें पूर्ण संघात्मक राज्य कहते हैं। इसके विपरीत जिन राज्यों में संघवाद की कुछ या कम विशेषताएं देखने को मिलती हैं, उन राज्यों के0सी0 व्हीयर ने अर्द्ध-संघात्मक ;फनेंप.थ्मकमतंसद्ध राज्य कहा है।

सघात्मक सरकार के निर्माण व सफलता की आवश्यक शर्तें

संघात्मक सरकार एक मिश्रित प्रकृति की सरकार होती है। इसका निर्माण होता है, उत्पत्ति नहीं। इसका निर्माण एकात्मक सरकार को संघात्मक सरकार में परिवर्तित करने से भी हो सकता है और आर्थिक व सुरक्षा सम्बन्धी उद्देश्यों के दृष्टिगत प्रांतीय सरकारों द्वारा अपनी सम्प्रभुत्ता का त्याग करके संघ निर्माण से भी हो सकता है। इसमें संघवाद की प्रवृत्ति केन्द्रोन्मुख होती है। ऐसा संघवाद ही सर्वोत्तम संघवाद होता है। प्रत्येक संघवाद व्यवस्था का निर्माण कु्रछ निश्चित गन्तव्यों तक पहुंचने के लिए होता है। इसलिए संघात्मक शासन प्रणाली की सफलता के लिए यह अपरिहार्य हो जाता है कि वह अपने उद्देश्यों व गन्तव्यों को प्राप्त करने के लिए संघात्मक शासन की आवश्यक शर्तें पूरी करती हो। अनेक विद्वानों ने संघात्मक शासन प्रणाली के निर्माण और सफलता की कुछ आवश्यक शर्तें बताई हैं :-

एकता की प्रबल इच्छा - 

संघवाद की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संघ में शामिल होने वाली इकाईयों में ‘संघ निर्माण’ की प्रबल इच्छा हो। इसका निर्माण तभी सम्भव है जब छोटे छोटे राज्य या इकाइयां अपने सीमित साधनों तथा सुरक्षा की दृटि से अपने को असुरक्षित महसूस करते हों और अपनी सुरक्षा और आर्थिक विकास की दृष्टि से एक होने को तैयार हों। अमेरिका में वर्तमान संविधान के निर्माण से पहले अमेरिका के राज्य उपनिवेशों के रूप में बिखरे हुए थे। लेकिन अपनी स्वतन्त्रता को प्राप्त करने तथा अपना अस्तित्व बनाए रखने की प्रबल इच्छा ने उनको संघ के रूप में एक होने को विवश कर दिया। सुरक्षा और आर्थिक विकास की इच्छा न केवल संघ का निर्माण कर सकती है, बल्कि संघ में स्थायित्व भी लाती है। इस तरह एकता की प्रबल इच्छा होने से संघ का निर्माण सम्भव हैं विविधता में एकता का गुण ही संघात्मक व्यवस्था को सफल बना सकता है।

भौगोलिक सामीप्य - 

संघात्मक शासन व्यवस्था के सफल रहने के लिए यह आवश्यक है कि संघ की इकाईयां भौगोलिक दृष्टि से आपस में जुड़ी हों। इस बात का ज्यादा अन्तर नहीं पड़ता कि इकाइयां बड़ी हैं या छोटी। इकाइयों में भौगोलिक सामीप्य और सम्बद्धता ही संघात्मक सरकार की सफल्ता का आधार है। भारत व अमेरिका में भौगोलिक दृष्टि से सभी प्रान्तीय इकाइयां इस तरह जुड़ी हुई हैं कि केन्द्रीय सरकार का प्रान्तीय सरकारों से निरन्तर स म्पर्क बना रहता है। भौगोलिक दृष्टि से समीप इकाइयां ही आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से राष्ट्रीय विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। अमेरिका की संघात्मक शासन व्यवस्था की सफलता का कारण इकाइयों की भौगोलिक निकटता ही हैं। इसलिए गिलक्राइस्ट ने भौगोलिक एकता को राष्ट्रीय एकता स्थापित करने वाला तत्व माना है।

संघ की इकाइयों में समानता - 

संघात्मक सरकार की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि संघ में शामिल होनेवाली इकाईयों के अवयवी समानता हो। अवयवी इकाईयों में जनसंख्या, क्षेत्रफल, परम्पराओं आदि में समानता होना ही संघवाद को सफल अना सकता हैं यदि असमान विशेषताओं वाली इकाइयों को मिलाकर संघ का निर्माण किया जाएगा तो संघ में जल्दी विघटन के आसार पैदा हो सकते हैं। इसलिए वहीयर ने लिखा है-”सघ की इकाइयां न तो बहुत बड़ी होनी चाहिए और न बहुत छोटी।” संघ में कोई भी इकाई इतनी ताकतवर नहीं होनी चाहिए कि वह संयुक्त शक्ति या अन्य इकाई से विरोध करने का साहस करे। इससे समान सांझेदारी के सिद्धान्त को आघात पहुंचेगा और संघ का विघटन हो जाएगा। यद्यपि संघ की इकाइयों में आकार व जनसंख्या की दृष्टि से असमानता भी हो सकती है, लेकिन उन्हें समान राजनीतिक सुविधाएं या प्रतिनिधित्व देकर समान बनाया जा सकता है। इससे छोटे राज्यों के प्रति बड़े राज्यों के मन में घृणा का भाव पैदा नहीं होगा और संघ की सभी इकाइयां समान सांझेदारी के लिए कार्य करेंगी। इसलिए संघवाद की सफलता के लिए संघ की इकाइयों में राजनीतिक अधिकारों की दृष्टि से सन्तुलन को कायम रखना अपरिहार्य है।

राजनीतिक चेतना - 

संघ का निर्माण करते समय संघ के निर्माण में सहयोग देने वाली इकाइयों में उच्च स्तर की राजनीतिक सोच होनी चाहिए। जिस देश में लोगों में अपनी राजनीतिक संस्कृति के प्रति मूल्यवान विचार नहीं होते, वहां संघात्मक शासन कभी सफल नहीं हो सकता। संघात्मक सरकार की सफलता के लिए यह आवश्यक होता है कि संघ की इकाइयों के शासक-वर्ग के साथ साथ जनसाधारण में राजनीतिक चेतना का स्तर विकसित व उन्नत किस्म का हो, उन्हें राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अपने अधिकारों व कर्त्तव्यों का समुचित ज्ञान हो, अधिकार व कर्त्तव्यों के प्रति आंख बंद करने वाली जनता व शासक वर्ग संघीय व्यवस्था का न तो निर्माण कर सकता है और न उसका सफलतापूर्वक संचालन कर सकता है।

भाषा, धर्म, जाति, इतिहास, संस्कृति आदि में एकता - 

संघवाद की सफलता के लिए यह अनिवार्य है कि भौगोलिक दृष्टि से निकट इकाइयां अपनी भाषा, धर्म, इतिहास, जाति, संस्कृति आदि की दृष्टि से भी एकता का भाव रखने वाली हों। यदि संघ में विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं, संस्कृति वाली इकाइयों को शामिल किया गया तो संघ के संचालन में अनेक कठिनाइयां पैदा होंगी। भारत में पृथक राज्यों की मांग का प्रमुख कारण भाषा सम्बन्धी विभिन्नताएं भी रही हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि भाषा, धर्म, संस्कृति आदि की दृष्टि में संघ में समानता पाई जाए। लेकिन जहां तक सम्भव हो इन असमानताओं से बचने का ही प्रयास किया जाना चाहिए।

सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं में समानता -

संघवाद की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संघ का निर्माण करते समय राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तरों पर समान प्रकार के शासन वाली सरकारें स्थापित होनी चाहिए। उदाहरण के लिए भारत में केन्द्र तथा राज्यों में संसदीय शासन प्रणाली है। उसी तरह अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है। इससे संविधान के बुनियादी ढांचे को सफल बनाने में मदद मिलती है। यदि केन्द्रीय व प्रांतीय अवयवों में सामाजिक संस्थाओं की दृष्टि से भी समानता हो तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। इसके बाद संघवाद की सफलता में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हो सकती।

समान सामाजिक-आर्थिक विकास -

संघात्मक शासन व्यवस्था की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संघ में शामिल होने वाली इकाइयों को समान आर्थिक विकास की सुविधाएं प्रदान की जाएं। किसी भी इकाई को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि आर्थिक-सामाजिक विकास की दृष्टि से उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। संचालक शासन प्रणाली की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि जनता को शिक्षित किया जाए और उन्हें आधुनिक विचारों से सुसज्जित किया जाए। सामाजिक-आर्थिक विकास ही संघवाद की सफलता का आधार है और संघात्मक इकाइयों का एकता के सूत्र में बांधे रखने का साधन है।

केन्द्र-राज्य सम्बन्ध - 

संघवाद का स्वरूप सहकारी होना चाहिए। संघवाद को सफल बनाने के लिए केन्द्र व राज्यों में मधुर व विश्वासपूर्ण सम्बन्ध होने चाहिएं। प्रति वर्ष समय समय पर केन्द्र-राज्य की समीक्षा की जानी चाहिए। केन्द्र सरकार को ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे राज्य सरकारों के साथ उसके सम्बन्ध समन्वयकारी हों। अवशिष्ट शक्तियों को लेकर केन्द्रीय सरकारों को राज्य सरकारों के साथ सहयोगात्मक व्यवहार करना चाहिए ताकि केन्द्र व इकाइयों में आंगिक एकता बनी रहे। केन्द्र का व्यवहार क्षेत्रीय सरकारों के प्रति हमेशा सहयोगात्मक व सकारात्मक ही होना चाहिए। इसी पर संघवाद की सफलता निर्भर है।

संघात्मक व्यवस्था की लोकतन्त्रीय प्रकृति - 

संघात्मक शासन प्रणाली का निर्माण जनतन्त्रीय भावना पर ही होना चाहिए। किसी भी इकाई की इच्छा के विरुद्ध उसे संघ में शामिल करना उस इकाई की भावनाओं का शोषण करना है। निरंकुशता संघवाद का सबसे प्रबल शत्रु है। संघात्मक सरकार का आधार हमेशा सहयोग व समझौतावादी ही होना चाहिए। लोकतांत्रिक भावनाओं को कुचलकर संघ के निर्माण व संचालन का प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता। 1958 में मिश्र और सीरिया को मिलाकर बनाया गया संयुक्त अरब गणराज्य 1961 में ही टूट गया। पिछले दशक में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का लोकतन्त्रीय भावना पर किया गया एकीकरण आज भी बरकरार है। इसलिए जनतन्त्रीय भावना पर आधारित संघवाद ही सफल होता है।

सामान्य उद्देश्यों पर मतैक्य - 

संघात्मक सरकार की सफलता के लिए यह आवश्यक होता है कि केन्द्र तथा इकाइयों में संघ के सामान्य गन्तकों या लक्ष्यों तक पहुंचने में सहमति की भावना हो। यदि सामान्य उद्देश्यों पर सहमति का अभाव पाया जाएगा तो न तो संघवाद की स्थापना ही की जा सकती है और न ही संघवाद को सफल बनाया जा सकता है। सामान्य उद्देश्यों पर यह सहमति संघ के निर्माण तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसकी व्यवहारिकता संघ के निर्माण के बाद भी संघ की सफलता के लिए अन्तिम क्षणों तक रहनी चाहिए।

शांति व सम्पन्नता -

यदि संघवाद का निर्माण शांति व आर्थिक सम्पन्नता के दौर में किया जाएगा तो वहीं संघ हमेशा के लिए कार्य करता रहेगा। राजनीतिक व्यवस्था में बार-बार उठने वाले आर्थिक संकट व युद्ध संघवाद को खोखला बना देते हैं। इससे संघवाद की प्रतिकूल प्रवृत्तियों का जन्म होने लगता है और उसके परिणामस्वरूप संघात्मक शासन का अन्त हो जाता है। इसलिए संघवाद का निर्माण शांतिकाल में ही किया जाना चाहिए और राजनीतिक व्यवस्था को बार बार आने वाले आर्थिक संकटों से बचाना चाहिए। के0सी0 व्हीयर का कहना है कि “युद्ध और आर्थिक संकट संघात्मक व्यवस्था को एकात्मक व्यवस्था में परिवर्तित कर देते हैं।”

राष्ट्रीयता की भावना - 

संघात्मक शासन की सफलता के लिए यह अनिवार्य है कि संघ का निर्माण करने वाली इकाइयों के अन्दर राष्ट्रीयता की प्रबल भावना हो। जब तक इकाइयां संकुचित राष्ट्रीयता या संकीर्ण स्वार्थों का शिकार रहेंगी, तब तक संघ का निर्माण नहीं हो सकता। राष्ट्रीयता की भावना ही विविधता में एकता स्थापित कर सकती है। इसलिए प्रत्येक संघात्मक इकाई में राष्ट्रीयता की तीव्र इच्छा व भावना होनी चाहिए। इसी पर संघ की सफलता निर्भर करती है।

सम्पर्क भाषा की विद्यमानता - 

संघात्मक व्यवस्था की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि संघ का निर्माण करते समय सम्पर्क भाषा या इकाइयों को परस्पर जोड़ने वाली कड़ी के रूप में एक सम्पर्क भाषा का प्रयोग किया जाए। इसका महत्व उन संघात्मक राज्यों में अधिक होता है, जहां भाषाई विभिन्नता पाई जाती है। सम्पर्क भाषा के अभाव में केन्द्र व इकाइयों में गतिरोध पैदा हो सकता है और यह गतिरोध सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था को गर्त में धकेल सकता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि संघवाद का निर्माण करते समय इकाइयों में प्रबल एकता, अवयवी समानता, भौगोलिक निकटता, राजनीतिक चेतना, सांस्कृतिक समानता, सामान्य उद्देश्यों पर मतैक्य आदि बातों का ध्यान रखना जरूरी है। आधुनिक युग में सैनिक सुरक्षा, आर्थिक विकास और राष्ट्रीयता की भावना संघवाद के निर्माण का प्रमुख आधार बनकर उभर रही है। संघवाद की सफलता के लिए यह अपरिहार्य हो गया है कि संघ का निर्माण करने वाली इकाइयों में एकता की प्रबल इच्छा हो और सैनिक सुरक्षा व आर्थिक विकास को अपना प्रबल लक्ष्य मानने वाली हों। आज के प्रजातन्त्रीय युग में संघवाद की सफलता के लिए उसका उदारवादी, जनभावनाओं पर टिका रहना बहुत जरूरी है। इन्हीं परिस्थितियों में संघात्मक व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर सकती है।

संघवाद के प्रकार 

आज विश्व की संघात्मक प्रणालियों का व्यापक विश्लेषण करने के बाद राजनीतिक विश्लेषक इस बात से चिन्तित हैं कि आधुनिक संघवाद किस दिशा में जा रहा है। अपने प्राचीन स्वरूप में जो संघवाद स्थापना के समय सहकारी स्वरूप का था, वही संघवाद आज सौदेबाजी का संघवाद बन गया है। इस सौदेबाजी की व्यवस्था ने संघात्मक प्रणाली में संकीर्ण प्रान्तीय हितों को जन्म दिया है। आज केन्द्रीय व राज्य सरकारें संघ के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आपसी विचार-विनिमय के समय सौदेबाजी करती प्रतीत होती है। 1967 के बाद भारत में संघवाद का सौदेबाजी वाला स्वरूप स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। इस सौदेबाजी की आड़ मेंं आज आर्थिक विकास व राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताओं ने केन्द्रीय सरकारों को अधिक शक्तिशाली बना दिया है। प्रान्तीय सरकारों द्वारा आर्थिक विकास का बोझ न उठाए जाने के कारण इस कार्य को केन्दीय सरकारें ही कर रही हैं। इससे शक्तियों के केन्द्रीयकरण का विकास हुआहै। इसके परिणामस्वरूप संघवाद का एक नया रूप उभर रहा है, जिसे एकात्मक संघवाद या केन्द्रीकृत संघवाद भी कहा जाता है। इस प्रकार संघवाद के आज तीन प्रतिमान दृष्टिगोचर होते हैं :-
  1. सहकारी संघवाद 
  2. सौदेबाजी का संघवाद 
  3. एकात्मक संघवाद 

सहकारी संघवाद 

संघात्मक व्यवस्था में केन्द्र व प्रांतीय सरकारों में शक्तियों का विभाजन करने के बाद सरकार के दोनों स्तरों पर सहयोग को बढ़ाने वाली व्यवस्थाएं भी की जाती हैं ताकि संघ के वांछित लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सके। इस सहयोग की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि सरकार के दोनों स्तर समान लक्ष्यों की दिशा में अग्रसर होते हैं। संघात्मक व्यवस्था के सामान्य उद्देश्य दोनों सरकारों के अलग-अलग कार्यों के बाद भी उनके अन्त:क्षेत्राीय सम्बन्धों को अनिवार्य बना देते हैं। व्हीयर का कहना है कि अन्त:क्षेत्राीय सम्बन्धों के बिना प्रादेशिक सरकारें आपसी अनुभवों के लाभों से वंचित हो जाएंगी और केन्द्रीय सरकार के अनुभवों से भी वंचित रह जाएंगी। इसलिए यह सहयोग प्रादेशिक सरकारों के मध्य होने के साथ साथ केन्द्रीय व प्रादेशिक सरकारों के बीच में भी होना आवश्यक है। इसी कारण विश्व के अनेक संघीय प्रणालियों में इस सहयोग को बढ़ाने वाले अभिकरणो की व्यवस्था की गई है। अमेरिका, भारत, कनाडा तथा आस्ट्रेलिया में सहयोग को बढ़ाने वाले अभिकरण कार्यरत हैं। आस्ट्रेलिया में अन्त:प्रादेशिक सम्मेलन, प्रीमियर्स कान्फ्रेंस, ऋण परिषद् के वार्षिक सम्मेलन, अमेरिका में राज्यपालों के सम्मेलन, कनाडा में डोमिनियन प्रोविन्सियल सम्मेलन, भारत में मुख्यमिन्त्रायों, राज्यपालों व क्षेत्राीय परिषदों के सम्मेलन केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के आपसी सहयोग को बढ़ाने का साधन हैं। भारत के संविधान में ही केन्द्र-राज्यों के अन्त:सम्बन्धों को विकसित करने वाली अनेक व्यवस्थाएं की गई हैं। वित्त आयोग अन्त:-राज्यीय समितियां, क्षेत्राीय परिषदें, योजना आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद आदि अभिकरण भारतीय संघ में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में सहयोग की प्रवृत्ति बढ़ाने की दिशा में ठोस कार्य कर रहे हैं। भारत के संविधान में ही भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया है। इसलिए भारत की संघीय प्रणाली की स्थापना का आधार ही सहकारी संघवाद है। ग्रेनविल आस्टिन ने भी भारतीय संघं को सहकारी संघ कहा है। विश्व के अन्य देशों में भी सहकारी संघवाद की स्थापना का प्रमुख कारण एक ही राजनीतिक व्यवस्था में एक ही संघीय ढांचे द्वारा अनेक सरकारों की स्थापना करना है। जब सरकारें एक ही संघीय ढांचे से जन्म लेगी तो वे अवश्य ही उस ढांचे से अपना सम्बन्ध रखेंगी जिसने उनको खड़ा किया है। इसी कारण सहकारी संघवाद में विविधतायुक्त संस्कृतियां, संस्थाएं, विघटनकारी शक्तियां संस्थागत आधार पर ही सहयोगरत रहती हैं। जहां पर संघीय ढांचे में सहयोग की संस्थाओं का प्रावधान नहीं होता, वहां भी परम्पराओं के रूप में प्राय: ये जन्म ले ही लेती हैं। यही सहयोग की प्रवृत्ति संघात्मक व्यवस्था को विघटन से बचाती है। आज आर्थिक विकास की जरूरतें, सुरक्षा की गारन्टी जैसी आवश्यकताओं ने सहकारी संघवाद को मजबूत आधार प्रदान किया है। आज का युग कल्याणकारी सरकारों का युग है। प्रान्तीय सरकारों के पास आर्थिक साधनों का प्राय: अभाव ही होता है। अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाएं प्रादेशिक सरकारों की अर्थव्यवस्था को झकोर देती है। उनसे उभरने के लिए केन्द्रीय सरकारों से सहयोग प्राप्त करने के सिवाय उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचता। इसलिए अनेक समस्याएं प्रांतीय सरकारों को संघात्मक ढांचे के बुनियादी सिद्धांत की ओर अग्रसर होने के लिए बाध्य कर देती हैैं। इसी कारण प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय सरकार से सहयोग करती रहती है। यह संघवाद संघात्मक शासन प्रणाली का मौलिक रूप है। आज विश्व के अनेक देशों में यह प्रतिमान भी प्राय: देखने को मिल जाता है।

सौदेबाजी का संघवाद 

यद्यपि संघवाद की स्थापना का मूल आधार केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों में पाया जाने वाला पारस्परिक सहयोग है, लेकिन कुछ देशों में आज पारस्परिक सहयोग का स्थान सौदेबाजी ने ले लिया है। एशिया और अफ्रीका के नवोदित देशों ने पाश्चात्य संघवाद को गहरा आघात पहुंचाया है। इन देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दलीय व्यवस्था के नए प्रतिमान स्थापित हुए हैं। इन राज्यों में द्विस्तरीय प्रकृति वाले राजनीतिक दलों के जन्म लेने से संघात्मक व्यवस्था में सौदेगाजी का प्रचलन बढ़ा है। आज बहुत से राजनीतिक दल संकीर्ण स्थानीय हितों को प्रमुखता देकर संघवाद के केन्द्रीय ढांचे को चुनौती दे रहे हैं और संघात्मक सरकार के सामान्य लक्ष्यों से मुंह फेर रहे हैं। यह सत्य है कि दोनों सरकारों के बिना संघात्मक शासन के लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सकते। जब राजनीतिक दल जनता का समर्थन संकुचित व क्षेत्राीय आधार पर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं तो इससे दो स्तरीय सरकारें ऐसे दलों के नियन्त्राण में आ जाती हैं कि उन पर राष्ट्रीय हित के लक्ष्यों को प्राप्त करने का बंधन नहीं रहता। इस प्रकार की स्थिति सौदेबाजी को जन्म देती है। यद्यपि आज तक व्यापक स्तर पर ऐसी सौदेबाजी किसी भी देश में नहीं हुई है, लेकिन इसके सीमित प्रयोग के संकेत अनेक संघात्मक देशों में प्रकट हुए हैं। भारत में 1967 के बाद सौदेबाजी का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था। इसी कारण मोरिश जोन्स ने भारतीय संघात्मक शासन प्रणाली को सौदबाजी का संघ कहा है। सांझा सरकारों की आवश्यकता ने सौदेबाजी के संघवाद को अधिक पुष्ट किया है। आज भारत में राष्ट्रीय सरकार को अपने हितों को पूरा करने के लिए प्रांतीय सरकारों के सहयोग की आवश्यकता है। यह सहयोगात्मक आधार ही संघवाद की प्राथमिक शर्त है। लेकिन आज संकीर्ण स्वार्थों से परिपूर्ण प्रांतीय क्षेत्रों में कार्यरत क्षेत्राीय दल केन्द्र-राज्य सहयोग को कम करके सौदेगाजी की दिशा में धकेल रहे हैं। परन्तु चाहे सौदेबाजी पर आधारित ये राजनीतिक दल राष्ट्रीय दलों के साथ कितना ही खेल खेलें, संघात्मक व्यवस्था का अन्त नहीं कर सकते। जिस देश में संविधानिक व्यवस्थाएं इतना प्रबल हों कि वे संकीर्ण क्षेत्राीय हितों को राष्ट्रीय हितों के साथ आसानी से मिला दें, वहां पर संघवाद को कोई हानि नहीं हो सकती। भारत जैसे विविधता वाले देश में तो क्षेत्राीय दल राष्ट्रीय लक्ष्यों से अलग प्रादेशिक हित निर्धारित करके अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते। आधुनिक परिस्थितियों में सुरक्षा व आर्थिक विकास की आवश्यकता ने संकीर्ण प्रांतीय हितों का राष्ट्रीय हितों के साथ सामंजस्य स्थापित कर दिया है। संघात्मक शासन व्यवस्था में सौदेबाजी के अंकुर तब तक अवश्य फूटे रहेंगे जब तक दो पृथक स्वतन्त्रा सरकारों का अस्तित्व रहेगा। लेकिन ये अंकुर संघात्मक शासन व्यवस्था का विघटन कभी नहीं कर सकेंगे। सौदेबाजी के लक्ष्य यदा-कदा ही किसी संघात्मक शासन में परिलक्षित हो सकते हैं, लेकिन इनसे संघात्मक शासन व्यवस्था पर कोई विशेष प्रभाव पड़ने वाला नहीं होता।

एकात्मक संघवाद 

संघात्मक व्यवस्था एक गतिशील व्यवस्था है। अनेक उप-व्यवस्थाओं को अपने में समेटते हुए यह जटिल प्रक्रिया को जन्म देती है। इस जटिल प्रक्रिया में प्रादेशिक सरकारें अपना पृथक व स्वतन्त्रा अस्तित्व कायम रखने में परेशानी महसूस करती है। आज संघात्मक सरकार का व्यवहार अनेक गैर-राजनीतिक संस्थाओं व तत्वों से भी प्रभावित होने लगा है। संघात्मक व्यवस्था का बारीकी से अवलोकन करने पर यह तथ्य उजागर होता है कि संघात्मक व्यवस्था एकात्मक व्यवस्था की तरफ अग्रसर हो रही है। कई बार व्यवहार में केन्द्र व राज्यों की सरकारों का सीमांकन करना असम्भव होता है। यही स्थिति एकात्मक संघवाद की स्थिति होती है। पहले जो कार्य प्रादेशिक सरकारों द्वारा सम्पादित किए जाते थे, वे अब केन्द्रीय सरकार को पूरे करने पड़ रहे हैं। लोकतन्त्रा में तो जनता सुविधाएं व सुरक्षाएं चाहते हैं, चाहे वे केन्द्रीय सरकार से मिले या राज्य सरकार से। बदलते विश्व परिवेश में सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक विकास की प्रवृ़त्ति ने केन्द्रीय सरकारों को अधिक शक्तिशाली बना दिया है। के0सी0 व्हीयर ने भी केन्द्रीय सरकारों के पक्ष में शक्तियों के झुकाव की बात स्वीकार की है। वर्तमान समय में संघवाद की जो स्थिति है, वह न तो विशुद्ध रूप में संघात्मक है और न ही एकात्मक, बल्कि दोनों के बीच की स्थिति एकात्मक संघवाद है। एकात्मक संघवाद का जन्म केन्द्रीय सरकार के पक्ष में शक्तियों के अधिक झुकाव का परिणाम है। इस झुकाव के प्रमुख कारण हैं :-
  1. युद्ध राजनीति।
  2. लोक-कल्याण की राजनीति।
  3. दल राजनीति।
  4. टेकनो या शिल्पी राजनीति।
  5. आर्थिक मदद की राजनीति।
  6. मंदी की राजनीति।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति।
आज युद्ध-राजनीति राष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या को जन्म देने वाला प्रमुख तत्व है। द्वितीय विश्व युद्ध इसी वैचारिक युद्ध-राजनीति का परिणाम था। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आज केन्द्रीय सरकारें प्रान्तीय सरकारों की अपेक्षा अधिक शक्तियां केन्द्रित कर रहीं हैं, ताकि आपातकालीन परिस्थितियों का सामना किया जा सके। आज लोक कल्याण के विचार की कोई भी सरकार अवहेलना नहीं कर सकती। प्रान्तीय सरकारें सीमित आर्थिक साधनों के कारण लोक कल्याण का जिम्मा केन्द्रीय सरकार का ही समझने लगती हैं। इसी कारण धीरे-धीरे लोक कल्याण के लिए केन्द्रीय सरकार आर्थिक साधनों पर अपना पूर्ण नियन्त्राण स्थापित कर रही है ताकि आर्थिक साधनों का प्रादेशिक सरकारों द्वारा दुरुपयोग न किया जा सके। आज दल-राजनीति भी क्षेत्राीय हितों का राष्ट्रीय हितों के सााि अपनी राष्ट्रव्यापी प्रवृत्ति के कारण सामंजस्य स्थापित करने का सशक्त माध्यम है। बढ़ती राजनीतिक जागरुकता के कारण आज दलों का स्वरूप भी राष्ट्रीय स्तर का होता जा रहा है। भारत को छोड़कर किसी भी संघात्मक व्यवस्था वाले देश में क्षेत्राीय दलों का चरित्रा भी राष्ट्रीय प्रकृति का है। आज वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति ने शासनतन्त्रा के व्यवहार को प्रभावित करना शुरु कर दिया है। आधुनिक सरकारें नौकरशाही तन्त्रा पर आधारित होती जा रही हैं। यह नौकरशाही तन्त्र प्रादेशिक सरकारों तक भी छा गया है। इस नौकरशाही तन्त्रा की भर्ती केन्द्रीय सरकार द्वारा ही की जाती है और विशेषज्ञों के रूप में उनकी भूमिका केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बना देती है। आज आर्थिक विकास के लिए प्रादेशिक सरकारें केन्द्र पर ही निर्भर होती जा रही हैं। आर्थिक सहायता के नाम पर केन्द्रीय सरकारों प्रादेशिक सरकारों पर अपना अप्रत्यक्ष नियन्त्राण स्थापित कर रही हैं। आज जनता आर्थिक मन्दी के दौर से गुजर रही है। जनता का प्रादेशिक सरकारों पर आर्थिक मन्दी को दूर करने की मांग का भारी दबाव पड़ रहा है। इसी कारण प्रादेशिक सरकारें केन्द्रीय सरकार पर अधिक आश्रित होती जा रही हैं। इन सभी कारणों के साथ-साथ आज राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपनी महान भूमिका अदा करना चाहती है। बढ़ती राजनीतिक चेतना प्रादेशिक सरकारों को राष्ट्रीय हित के लिए अपने संकीर्ण स्वार्थों को छोड़ने को विवश करती हैं और प्रादेशिक सरकारें स्वयं भी इस बात को अच्छी तरह समझने लगी हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सम्मान प्राप्त किए बिना उनका अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए आज संघात्मक सरकार के केन्द्रीय ढांचे की तरफ अधिक रूझान बढ़ रहा है और विश्व में संघवाद का झुकाव एकात्मकता की तरफ बढ़ रहा है। यह एकात्मक संघवाद आज समय की मांग है और आर्थिक विकास की एक आवश्यकता है। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि इससे प्रांतीय या प्रादेशिक सरकारों की राष्ट्र-विकास में भूमिका समाप्त हो गई है। यह तो राजनीतिक व्यवस्था की गत्यात्मक प्रकृति है जो केन्द्र व इकाइयों के सहयोग से ही आगे बढ़ती है। इसी कारण संघात्मक व्यवस्था भी कठिन व जटिल होते हुए भी अपने को लचीली व अनुकूलनशील बनाए रखने में सफल रहती है।

संघात्मक शासन के गुण

आधुनिक समय में विश्व के लगभग दो दर्जन देशों में संघीय सरकारें हैं। भारत, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा ब्राजील प्रमुख रूप से संघात्मक राज्य है। जिस प्रकार मध्य युग सामन्तवाद का युग था, इसी प्रकार आधुनिक युग संघवाद का युग माना जाता है। राष्ट्रीय एकता व राष्ट्रीय विकास के लिए संघातमक व्यवस्था से बढ़कर अन्य कोई विकल्प नहीं हो सकता। वास्तव में संघात्मक व्यवस्था ही प्रादेशिक हितों व राष्ट्रीय हितों में सामंजस्य स्थापित कर सकती है। आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से कमजोर देशों के लिए तो संघात्मक व्यवस्था प्राणदायिनी है। सिजविक ने इसे राज्यों के शांतिपूर्ण एकीकरण की पद्धति माना है, लेकिन संघवाद के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों का भी होना आवश्यक है। जिस देश में संघवाद के विकास के अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हों, वहां संघ के निर्माण के बाद संघात्मक व्यवस्था को कोई ताकत हानि नहीं पहुंचा सकती। अनेक विद्वानों ने संघात्मक शासन के गुण बताये हैं :-

विविधता में एकता 

संघात्मक शासन व्यवस्था में विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं को राष्ट्रीय एकता के सूत्रा में बांधा जाता है। इसमें प्रादेशिक सरकारें अपनी स्वतन्त्राता भी बनाए रखती हैं और राष्ट्रीय विषयों पर एकीकरण का परिचय भी देती है। इस व्यवस्था में एकता और विभिन्नता के गुणों को िमालने का गुण है। इसकी स्थापना का लक्ष्य ही राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ स्थानीय स्वतन्त्राता का भी सामन्जस्य करना है। सामान्य परिस्थितियों में तो संघवाद प्रादेशिक सरकारों को स्वतन्त्राता प्रदान करता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में यही स्वतन्त्राता राष्ट्रीय हित का प्रमुख साधन बन जाती है और विविधता में एकता स्थापित हो जाती है।

संघात्मक शासन केन्द्रीय सरकार की निरंकुशता रोकता है 

संघात्मक शासन शक्तियों के विभाजन या विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त पर आधारित होता है। इसमें प्रादेशिक तथा केन्द्रीय सरकारों के अलग अलग क्षेत्राधिकार होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में किसी भी सरकार को एक दूसरे के क्षेत्रा में प्रवेश का अधिकार नहीं है। प्रत्येक सरकार वही निश्चित कार्य करती है जो उसे संविधान द्वारा सौंपा गया है। इसलिए इसमें न तो एक व्यक्ति की तानाशाही चल सकती है और न नौकरशाही की मनमानी। इसमें न्यायपालिका की स्वतन्त्राता व सर्वोच्चता का सिद्धान्त सरकार की निरंकुश प्रवृत्तियों पर सबसे बड़ी रोक है। इससे नागरिकों के अधिकार व स्वतन्त्राताएं भी सुरक्षित रहते हैं और प्रांतीय सरकारों को केन्द्रीय सरकार के कोप का भाजन भी नहीं बनना पड़ता। ब्राइस ने लिखा है-”संघात्मक व्यवस्था नागरिकों की स्वतन्त्राता को खतरे में डालने वाले व शक्तियों को निगलने वाले निरंकुश केन्द्रीय शासन के उत्थान को रोकता है।”

बड़े देशों के लिए उपयुक्त

संघात्मक शासन प्रणाली भारत जैसे विशाल देशों के लिए अधिक है उपयुक्त है। जिन देशों की जनसंख्या व क्षेत्राफल अधिक है और वहां पर एकात्मक सरकार द्वारा शासन चलाना कठिन होता है तो वहां पर समस्त देश को प्रान्तों व प्रादेशिक इकाइयों में बांटकर केन्द्रीय सरकार के भार को कम किया जा सकता है। यह उन देशों के लिए भी उपयुक्त है जहां विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं व संस्कृतियों के लोग रहते हों। इस व्यवस्था के अन्तर्गत बड़े देश का शासन आसानी से चलाया जा सकता है।

आर्थिक विकास के लिए लाभदायक 

संघात्मक शासन प्रणाली मितव्ययी है। सभी राज्यों के एक स्थान पर संगठित हो जाने से आय में वृद्धि होती है ओर सेनाओं तथा आर्थिक योजनाओं पर खर्च किया जाने वाला पैसा केन्द्रीय सरकार की जिम्मेवारी बन जाती है। ऐसे छोटे-छोटे राज्य या इकाइयां जो आर्थिक दृष्टि से बहुत कमजोर हैं और आर्थिक विकास के लिए दूसरे शक्तिशाली राज्यों पर निर्भर हैं तो वे संगठित होकर संघ का निर्माण कर सकती हैं। इससे उनकी स्वतन्त्राता की गारन्टी मिल सकती है। भारत में आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलने का प्रमुख कारण यही है कि प्रादेशिक सरकारों को सुरक्षा व आर्थिक साधन केन्द्रीय सरकार द्वारा ही उपलब्ध कराए जाते हैं।

निर्बल राज्यों की रक्षा 

संघात्मक शासन प्रणाली के अपनाने से निर्बल राज्यों की शिक्त्शाली राज्यों से सुरक्षा हो जाती है। संघात्मक सरकार के अन्तर्गत छोटे-छोटे राज्य मिलकर अपना शक्तिशाली संगठन बना सकते हैं। सबल केन्द्रीय सरकार ही निर्बल राज्यों की स्वतन्त्राता की रक्षा कर सकती है। इससे राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ क्षेत्राीय स्वतन्त्राता की भी सुरक्षा होगी और छोटे राज्यों का गौरव व प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। यदि 13 राज्य मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका जैसा शक्तिशाली संघ न बनाते तो उन राज्यों को वह प्रतिष्ठा तथा गौरव कभी नहीं मिल सकता था जो आज प्राप्त है।

शासन में कार्यकुशलता 

संघात्मक शासन व्यवस्था में शक्तियों का बंटवारा होने के कारण प्रशासनिक उत्तरदायित्वों का भी विकेन्द्रीकरण हो जाता है। इससे स्थानीय स्तर की समस्याएं स्थानीय प्रशासन द्वारा ही हल कर दी जाती हैं। अपने अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी होने के कारण केन्द्रीय व प्रादेशिक सरकारें पूरी निष्ठा के साथ अपने कार्यों का सम्पादन करती हैं। कार्यभार कम होने के कारण प्रत्येक समस्या को भी शीघ्रता से हल कर लिया जाता है। केन्द्रीय सरकार को प्रादेशिक समस्याओं की चिन्ता नहीं रहती, क्योंकि इस स्तर पर कार्य करने वाली सरकारें पहले ही मौजूद रहती हैं। इसलिए त्वरित निर्णय लेने और समस्या समाधान के लिए विकेन्द्रीकरण के समस्त लाभ प्रशासन को मिल जाते हैं और सरकार सुचारू ढंग से कार्य करती है।

स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति 

संघात्मक शासन में स्थानीय समस्याओं को हल करने का प्रमुख उत्तरदायित्व स्थानीय प्रशासन या प्रादेशिक सरकारों का होता है। अपनी अलग शक्तियों से परिपूर्ण प्रादेशिक सरकारें अपना शासन प्रबन्ध चलाने के लिए स्वतन्त्रा होती हैं। प्रत्ेक इकाई की समस्याएं दूसरी इकाई से भिन्न प्रकृति की ही होती हैं। उनका एक ही नीति से समाधान नहीं हो सकता। इसलिए संघात्मक व्यवस्था के अन्तर्गत ही प्रादेशिक समस्याओं का हल भली-भांति किया जा सकता है, क्योंकि स्थानीय प्रबन्ध के लिए प्रादेशिक सरकारों को केन्द्रीय सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती।

लोगों को राजनीतिक शिक्षा देना 

संघात्मक शासन व्यवस्था में जनता को प्रशासन में भागीदारी निभाने के पूर्ण अवसर प्राप्त होते हैं। यह व्यवस्था जनता को स्वशासन सिखाती है। इसमें जनता की सार्वजनिक कार्यों के प्रति रुचि बढ़ती है। स्थानीय जनता और प्रशासन स्थनीय समस्याओं को स्वयं हल करते हैं। इससे लोगों का शासन के प्रति रूझान बड़ता है और धीरे धीरे उनकी राजनीतक चेतना का विकास भी होता जाता है। स्थानीय निकायों के चुनावों में जन-सहभागिता जनता को राजनीतिक शिक्षा देने का सशक्त माध्यम है। भारत में स्थानीय स्वशासन में जनता की बढ़ती भागीदारी ने आज आम व्यक्ति को भी राजनीतिक रूप से शिक्षित बना दिया है।

नागरिकों वे देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि

संघात्मक शासन प्रणाली अपनाने से प्रादेशिक इकाइयों के नागरिकों का राष्ट्रीय नागरिकता के रूप में सम्मान बढ़ता है। जब नागरिक विदेशों में जाते हैं तो उनकी पहचान देश की नागरिकता से होती है, राज्यों की नागरिकता से उतनी नहीं। इसी तरह संगठित इकाई के रूप में देश का सम्मान भी अन्तर्राष्ट्रीय जगत में बढ़ता है और अपनी विदेश नीति को संगठित राष्ट्र ही प्रभावी बना सकता है। यदि भारत संघ न होता तो प्रादेशिक इकाइयों में बंटा होने के कारण इसका सम्मान उतना नहीं होता जितना आज है। 1947 से पहले 562 रियासतों के रूप में बंटे हुए भारत की अन्तर्राष्ट्रीय जगत में प्रतिष्ठा अधिक नहीं थी।

यह विश्व राज्य के लिए एक आदर्श है 

संघात्मक शासन प्रणाली सम्पूर्ण मानव जाति के हित में है। आज संकीर्ण स्वार्थों में बंटे हुए विश्व के छोटे-छोटे व निर्बल राष्ट्र भी तीसरे युद्ध के भय से संघ के रूप में संगठित होकर अपने आपको मुक्त कर सकते हैं। यदि विश्व के रूप में देशों का संघ स्थापित हो जाए तो तीसरे युद्ध की सम्भावना नष्ट हो सकती है और मानव जाति युद्ध की लपटों से बच सकती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संघात्मक व्यवस्था विश्व राज्य का भी आदर्श बन सकती है। एम0एम0 बाल ने कहा है-”एक संघीय प्रणाली विश्व सरकार के लिए एक नमूना प्रस्तुत करती है।”

संघात्मक शासन या सरकार के दोष

यद्यपि संघवाद का प्रतिमान विश्व के लिए अनेक प्रकार के लाभों की कामना रखता है, लेकिन फिर भी आज तक अनेक देशों ने इस शासन प्रणाली को नहीं अपनाया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह शासन प्रण्सााली उतनी उपयोगी नहीं है, जितनी संघवाद के समर्थक इसे बताते हैं। अनेक विद्वानों ने संघात्मक शासन प्रणाली की खूब आलोचना की है। उनकी दृष्टि में इसमें दोष हैं :-
  1. संघीय सरकार एक दुर्बल सरकार होती है, क्योंकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता केन्द्र या प्रांतीय सरकारों द्वारा बनाए गए कानूनों के लिए बहुत बड़ा खतरा होती है। सरकार की शक्तियों का विभाजन होने के कारण केन्द्रीय सरकार महत्वपूर्ण मामलों में भी प्रादेशिक सरकारों पर दबाव नहीं डाल सकती। संघीय सरकार में कोई भी इकाई केन्द्र के प्राधिकार को भी चुनौती दे सकती है और अलगाववाद का रास्ता अपना सकती है। डॉयसी ने स्पष्ट किया है कि संघीय संविधान एकात्मक संविधान की अपेक्षा अधिक कमजोर होता है। इसमें शक्तियों के विकेन्द्रीयकरण से शीघ्र निर्णय, एकरूपता, दृढ़ता, सुचारुता तथा उद्देश्य की एकता का अभाव पाया जाता है।
  2. संघात्मक शासन से विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा मिलता है और राष्ट्रीय एकता का विकास रुक जाता है। इस शासन प्रणाली में प्रादेशिक सरकारों को काफी स्वतन्त्राता मिलने से संकीर्ण क्षेत्राीय भावनाएं उभरने लगती हैं और नागरिक देश हित को भूल जाते हैं। यदि भारत में एकात्मक शासन व्यवस्था होती तो पृथक्कतावादी, आतंकवादी ओर अलगाववादी ताकतें जन्म नहीं लेती और पंजाब तथा जम्मू कश्मीर जैसी समस्याएं जन्म नहीं ले पाती।
  3. संघात्मक शासन प्रणाली विदेश नीति के सफल संचालन में बाधक होता है। इसमें यह आवश्यक नहीं है कि जो सन्धि या समझौता केन्द्र सरकार करे, उसे प्रान्तीय सरकारें भी मान लें। इसलिए विदेश नीति के संचालन से पहले प्रांतीय सरकारों की राय जानना भी जरूरी होता है। इस प्रकार संघात्मक शासन में स्वतन्त्रा विदेश नीति का न तो निर्णय हो सकता है और न ही सचालन।
  4. संघात्मक शासन प्रणाली एक खर्चीली व्यवस्था है। इसमें दोहरी सरकार का बोझ केन्द्र को उठाना पड़ता है। केन्द्र के साथ साथ प्रान्तीय सरकारों का खर्चा भी देश को ही वहन करना पड़ता है। बार बार होने वाले चुनाव, पुलिस व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन आदि पर किया जाने वाला खर्च इस प्रणाली को अधिक खर्चीली प्रणाली साबित करता है। शासन तन्त्रा की दोहरी प्रणाली एकात्मक शासन की अपेक्षा इस व्यवस्था में समय और शक्ति के अपार व्यय को बढ़ा देती है।
  5. संकटकाल या राष्ट्रीय आपदा के समय यह प्रणाली काफी कमजोर साबित होती है। संकटकाल का मुकाबला तो एकात्मक सरकार ही कर सकती है, क्योंकि यह सर्वशक्ति सम्पन्न होती है। उसे प्रान्तीय सरकारों की राय लेने की जरूरत नहीं होती। 
  6. संघात्मक व्यवस्था में संविधान में परिवर्तन की कठोर प्रक्रिया राजनीतिक व्यवस्था के विकास का मार्ग अवरुद्ध करती है। कई बार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सहमति न बन पाने के कारण उपयोगी कानून भी निर्मित होने से चूक जाते हैं।
  7. संघात्मक शासन प्रणाली न्यायिक निरंकुशता को जन्म देती है। प्रत्येक संघात्मक शासन में केन्द्र व इकाइयों में झगड़े होना स्वाभाविक है। उन झगड़ों को निपटाने के लिए संघात्मक राज्यों में न्यायपालिका को स्वतन्त्रा व सर्वोच्च बनाया गया है। न्यायपालिका इपनी इस शक्ति का दुरुपयोग भी कर सकती है। न्यायपालिका को केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के कानूनों को अवैध घोषित करने का भी अधिकार है। कई बार न्यायपालिका कानून की गलत व्याख्या करके जन महत्वों के कानूनों को भी गलत करार दे देती है। अमेरिका तथा भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का न्यायपालिका ने कई बार दुरुपयोग किया है।
  8. संघात्मक शासन व्यवस्था में केन्द्र-राज्यों के झगड़ों का जन्म होता है। अपने अधिकार-क्षेत्रा को लेकर या भारत जैसे संघात्मक देश में अवशिष्ट शक्तियों के प्रयोग को लेकर प्राय: केन्द्र-राज्यों में विवाद चलते रहते हैं। कई बार ये विवाद दो या दो से अधिक प्रादेशिक सरकारों में भी चलते रहते हैं। हरियाणा-पंजाब में सतलुज नहर के निर्माण को लेकर, तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी नदी के जल को लेकर कई बार विवाद हुआ है। भारत में संविधान की धारा 356 को लेकर राज्यपालों की संदिग्ध भूमिका पर कई बार केन्द्र के साथ राज्यों का टकराव हुआ है। 
  9. संघात्मक शासन में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था राष्ट्रीय एकता की भावना में कमी करती है। नागरिक प्रादेशिक हितों तक ही अपनी सोच रखने लगते हैं। उन्हें देश हित की अधिक चिन्ता नहीं होती।
  10. संघात्मक शासन व्यवस्था एक जटिल शासन प्रणाली है। इसमें विधायिका, प्रशासन, न्याय निर्णय आदि का दोहराव आम व्यक्ति के मन में संघात्मक सरकार के प्रति सन्देह की भावना पैदा करता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि संघात्मक सरकार में दोहरे शासन, दोहरी नागरिकता, अधिकरा क्षेत्रा सम्बन्धी विवाद, नीति, कानून और प्रशासन में विविधता आदि के कारण सुदृढ़ व सक्षम सरकार का अभाव पाया जाता है। संकटकालीन परिस्थितियों में संघात्मक सरकार अधिक कारगर नहीं होती। अधिक खर्चीली व कमजोर आधार वाली सरकार एकात्मक सरकार जैसे लाभों से अछूती रहने के कारण आलोचना का पात्रा बन जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संघात्मक सरकार बिल्कुल अनुपयोगी है। आज विश्व के लगभग दो दर्जन देशों द्वारा संघात्मक व्यवस्था को अपना लेना इसका महत्व प्रतिपादित करता है। आज अमेरिका, आस्ट्रेलिया, स्विस, कनाडा तथा भारत में संघात्मक सरकारें सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। प्रजातन्त्राीय भावनाओं के विकास तथा विश्व संघ के निर्माण में संघात्मक सरकार का प्रतिमान ही सर्वोत्तम है।

Comments