तुलनात्मक राजनीति का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र, महत्व

अनुक्रम
तुलनात्मक राजनीति तुलनात्मक सरकारों, गैर-शासकीय राजनीतिक संस्थाओं, कबीलों, समुदायों व उनकी प्रक्रियाओं व व्यवहारों का अध्ययन है।

तुलनात्मक राजनीति की परिभाषाएं 

  1. ब्रायबन्ती (Braibanti) ने लिखा है-”तुलनात्मक राजनीति सामाजिक व्यवस्था में उन तत्वों की पहचान और व्याख्या है जो राजनीतिक कार्यों तथा उनके संस्थागत प्रकाशन को प्रभावित करते हैं।”
  2. एडवर्ड ए0 फ्रीमैन (Edward A. Freeman) ने तुलनात्मक राजनीति के बारे में लिखा है-”तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक संस्थाओं तथा सरकारों के विविध प्रकारों का एक तुलनात्मक विवेचन व विश्लेषण है।”
  3. राय सी0 मैक्रिडीस (Roy C. Macridis) के अनुसार-”हैरोडोटस तथा अरस्तु के समय से ही राजनीतिक मूल्यों, विश्वासों, संस्थाओं, सरकारों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में विविधताएं जीवन्त रही हैं और इन विविधताओं में समान तत्वों की छानबीन करने के प्रयास को तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण कहा जाना चाहिए।”
  4. एम0 कर्टिस (M. Curtis) के अनुसार-”तुलनात्मक राजनीति, राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक व्यवहार की कार्य-प्रणाली में महत्वपूर्ण नियमितताओं, समानताओं और असमानताओं में तुलनात्मक अध्ययन से सम्बन्धित है।”

तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति

आज तुलनात्मक राजनीति में केवल शासन के ढांचों का ही अध्ययन न करके, बल्कि सभी राजनीतिक सिद्धान्तों, आदर्शों तथा व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। इसलिए आज तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति भी बदल चुकी है। इसलिए आज तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति को लेकर विद्वानों में मतभेदों का उभरना भी स्वाभाविक ही है। तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति सम्बन्धी दो मत प्रचलित हैं :-
  1. तुलनात्मक राजनीति एक लम्बात्मक या अनुलम्बात्मक तुलनात्मक अध्ययन है (Comparative Politics is a Vertical Comparative Study)
  2. तुलनात्मक राजनीति एक अनुप्रस्थ या क्षैतिज तुलनात्मक अध्ययन है (Comparative Politics is a Horizontal Comparative Study)

तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र

तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र आज एक विवादास्पद विषय है। आज तुलनात्मक राजनीति संक्रमणकालीन दौर मे है। आज तुलनात्मक राजनीति की सीमा व मानकों तथा व्यवहारों के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में काफी विवाद है। तुलनात्मक राजनीति की सीमाओं के बारे में परम्पराओं तथा आधुनिक राजनीतिक विश्लेषक एकमत नहीं हैं। आज तुलनात्मक राजनीति के सामने यह समस्या है कि इसमें क्या शामिल किया जाए या क्या नहीं तथा शामिल करने या न करने का आधार क्या हो ?

सीमा सम्बन्धी विवाद के बारे में सभी राजनीति शास्त्री इस बात से तो सहमत हैं कि तुलनात्मक राजनीति का सम्बन्ध राष्ट्रीय सरकारों से है और इसमें सरकारी ढांचे के साथ-साथ सरकारों की कार्यप्रणाली तथा गैर-राजनीतिक संस्थाओं के राजनीतिक कार्य व व्यवहार शामिल हैं। लेकिन उनमें राजनीतिक क्रियाकलापों का सरकार की क्रिया-कलापों की व्याख्या को लेकर मतभेद हैं। इस बारे में उनके दो दृष्टिकोण हैं-कानूनी या संस्थागत दृष्टिकोण तथा व्यवहारवादी दृष्टिकोण। इन दृष्टिकोणों की उपयोगिता को लेकर भी राजनीति शास्त्रियों में परस्पर विवाद हैं। 

कानूनी या संस्थागत दृष्टिकोण के समर्थकों का कहना है कि तुलनात्मक राजनीति में केवल संविधान द्वारा निर्धारित राजनीतिक व्यवहार तथा सरकारी ढांचे व संरचनाओं का ही अध्ययन किया जाए। इसके विपरीत किसी अन्य आधार पर राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करना बेईमानी होगी। इसलिए इस दृष्टिकोण के समर्थक राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक व्यवहार के औपचारिक अध्ययन पर ही बल देते हैं। लेकिन कानूनी दृष्टिकोण के आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार का अध्ययन सतही व दिखावटी होगा। इससे राजनीतिक प्रक्रियाओं व व्यवहार की वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। 

चीन और रूस की संवैधानिक विधि से वहां की राजनीतिक व्यवस्था व उसके व्यवहार का सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इसी तरह ब्रिटेन व भारत में भी संविधान के ढांचे के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था के व्यवहार का सही आंकलन नहीं किया जा सकता। भारत में लम्बे समय से केन्द्र व राज्यों में कांग्रेस पार्टी के शासन ने संविधान का संघात्मक रूप एकात्मक बनाकर रख दिया। इसी तरह ब्रिटेन में संवैधानिक राजनीतिक तन्त्र के स्थान पर निरंकुश राजतन्त्र का होना संविधान के आधाार पर राजनीतिक व्यवहार को समझने की चुनौती देता है। इसलिए व्यवहारवादी विचारक तुलनात्मक राजनीति को कानूनी सीमाओं के पाश से मुक्त करके व्यवहारवादी अध्ययन पर जोर देते हैं ताकि राजनीतिक व्यवस्था की गत्यात्मकता को समझा जा सके। उनका कहना है कि संस्थागत अध्ययन की बजाय अनौपचारिक तत्वों को भी तुलनात्मक राजनीति में स्थान मिलना चाहिए।

व्यवहारवादी दृष्टिकोण के समर्थक तुलनात्मक राजनीति में राजनीति की व्यावहारिकता पर भी बल देते हैं। उनका कहना है कि तुलनात्मक राजनीति में केवल कानूनी व्यवस्था का औपचारिक अध्ययन व तुलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार व्यावहारिक बनती है तथा राजनीतिक संस्थाओं का वास्तविक व्यवहार कैसा है, इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसलिए तुलनात्मक राजनीति में राष्ट्रीय संस्थाओं व गैर-राजनीतिक संस्थाओं के राजनीतिक व्यवहार से सम्बन्धित तथ्यों को भी शामिल करना चाहिए। व्यवहारवादियों का मानना है कि हर राजनीतिक समाज में राजनीतिक गतिविधि हर तरह से शासन तन्त्र के आस-पास ही चक्कर काटती रहती है और इसी से हर राजनीतिक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। जीन ब्लौंडेल ने लिखा है-”तुलनात्मक सरकार या तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में उन तरीकों का, जो समाज में मूल्यों का अधिकृत विवरण होते हैं, परीक्षण किया जाता है।” यह परीक्षण मूल्यों के नियमन, रूपान्तरण तथा क्रियान्वयन से सम्बन्धित होता है। इस प्रकार तुलनात्मक राजनीति में मूल्यों की त्रिमुखी प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इस तरह व्यवहारवादी विचारक तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र मूल्यों के नियमण, रूपान्तरण तथा कार्यान्वयन तक ही सीमित मानते हैं।

तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र से सम्बन्धित दूसरा विवाद मानकों तथा व्यवहारों का विवाद है। मानकों का आधार कानून व नियम होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजनीतिक व्यवहार कानूनों व नियमों के अनुकूल ही हों। इसकी प्रतिकूलता तुलनात्मक अध्ययन में कठिनाईयां उत्पन्न करती हैं। यदि मानकों के अनुसार ही राजनीतिक व्यवहार रहे तो तुलना करना आसान होता है। बाह्यकारी शक्ति के प्रयोग से कानून व नियमों पर आधारित मानक अशुद्ध होते हैं। इसलिए राजनीतिक व्यवहार के बारे में यह देखना भी आवश्यक होता है कि वह मानकों के अनुकूल है या प्रतिकूल। यद्यपि राजनीतिक व्यवहार व मानकों की प्रकृति परिवर्तनशील होती है। ये दोनों गत्यात्मक हैं। जो मानक व व्यवहार आज हैं, आगे भी उनका वैसा ही होना अधिक सम्भव नहीं है। इसलिए इन दोनों में साम्य व गतिरोध का होना स्वाभाविक ही है। मानको ;छवतउेद्ध में परिवर्तन व्यवहार में परिवर्तन का कारण बन सकता है और व्यवहार भी नए मानकों की स्थापना का कारण हो सकता है। इसलिए राजनीतिक व्यवहार व मानकों के राजनीतिक पहलुओं का अध्ययन भी तुलनात्मक राजनीति में महत्वपूर्ण होता है। यदि इनकी उपेक्षा की जाएगी तो राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक व्यवहार के अध्ययन से हम दूर हो जायेंगे, क्योंकि मानक व व्यवहार सरकार की जीवित संरचना का महत्वपूर्ण अंग है।

उपरोक्त विवेचन के बाद यह कहा जा सकता है कि तुलनात्मक राजनीति में न केवल विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं, उनके कार्यों का ही अध्ययन शामिल नहीं है, बल्कि इसमें गैर-राजकीय संस्थाओंं के राजनीतिक कार्य व व्यवहार भी शामिल हैं। आज तुलनात्मक राजनीति में शासन प्रणाली व उसके राजनीतिक व्यवहार के समान व असमान दोनों तत्व ही शामिल हैं। मुनरो, हस्नम फाइनर, लास्की जैसे विद्वानों के प्रयासों ने अरस्तु के तुलनात्मक अध्ययन को बहुत व्यापक बना दिया है। आज तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र पश्चिमी देशों की सरकारों या राजनीतिक संस्थाओं व उनके व्यवहार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रसार तृतीय विश्व तक हो चुका है। अब राज्य से सम्बन्धित संस्थाओं व संगठनों की बजाय गैर-राजनीतिक संस्थाओं व उनके व्यवहार को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। 

आज तुलनात्मक राजनीति अन्धकार में भटकने की बजाय निश्चित कारणों को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक व्यवहार की महत्वपूर्ण नियमितताओं, समानताओं व असमानताओं पर अधिक ध्यान दे रही है। आज तुलनात्मक राजनीति में सजग तुलनाओं का विशेष महत्त्व है। आज राजनीतिक विद्वान तुलनात्मक अध्ययन को निरर्थक व बोझिल बनाना नहीं चाहते। आज तुलनात्मक राजनीति में नए-नए विषयों व नई-नई तकनीकों को महत्व दिया जा रहा है तथा तुलनात्मक राजनीति अन्य सामाजिक शास्त्रों से भी काफी कुछ ग्रहण कर रही है। इसलिए तुलनात्मक राजनीतिक अध्ययन कानून-निर्माण, कानून प्रयोग, विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं के अंगों से सम्बन्धित निर्णयों, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों के अध्ययन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें समस्त व्यक्तियों, संस्थाओं और समुदायों के सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन भी शामिल है। 

आज तुलनात्मक राजनीति में राज्यों की संस्थागत संरचनाएं, राजनीतिक समाजीकरण, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक दल व दबाव समूह, राजनीतिक अभिजन, राजनीतिक हिंसा व राजनीतिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक विकास, राजनीतिक आधुनिकीकरण, प्रतियोगी राज्यों के बीच शक्ति सम्बन्ध, जनमत, तुलनात्मक विश्लेषण आदि का अध्ययन शामिल है। लेकिन तुलनात्मक राजनीति अभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर चुकी है, बल्कि यह संक्रमणकाल के दौर से गुजर रही है। राजनीतिक विद्वान अभी भी इस अनिश्चय की स्थिति में हैं कि तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र क्या हो ?

तुलनात्मक राजनीति का महत्व

आज राजनीतिक व्यवहार को तुलनात्मक आधार पर समझने के लिए नए नए दृष्टिकोण का उपागम विकसित हो रहे हैं। तुलनात्मक अध्ययन या राजनीति का महत्व इन बातों से दृष्टिगोचर होता है :-

1. राजनीतिक व्यवहार को समझना -

तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन देश-विदेश की राजनीति व राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक होता है। तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन द्वारा विभिन्न राजनीतिक प्रक्रियाओं की समानताओं व असमानताओं का ज्ञान कराता है। इससे राजनीतिक घटनाचक्रों का भी ज्ञान होता है। तुलनात्मक अध्ययन राजनीतिक अभिजनों को भी महत्वपूर्ण जानकारी देता है। इसी के आधार पर वे राजनीतिक व्यवहारों व दृष्टिकोणों की जाँच-परख करके उनकी प्रासंगिकता जांचते हैं। तुलनात्मक अध्ययन राजनेताओं के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। इसके द्वारा वे जनता के लिए योग्य सुझाव प्रस्तुत करते हैं और बदलते राजनीतिक व्यवहार के मानकों की जानकारी भी ग्रहण करते हैं। 

उदाहरण के लिए-राजनेता मतदान व्यवहार के विभिन्न तत्वों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष तुलनात्मक आधार पर ही निकाल सकते हैं कि मतदान व्यवहार को प्रभावित करने में सबसे अधिक भूमिका किस तत्व की है। तुलनात्मक राजनीति का महत्व विद्याथ्र्ाी, शिक्षक व नागरिकों के साथ-साथ जनसाधारण के लिए भी होता है। इससे हम यह भली-भाँति जान सकते हैं कि विभिन्न राजनीतिक समाज के लोगों का राजनीतिक व्यवहार परस्पर अलग क्यों होता है, उसके मूल्य और विधियां कौन सी हैं, जो वे एक दूसरे को समझने के लिए प्रयोग करते हैं। इसके द्वारा राजनीतिक व्यवहार की जटिलताओं को सरलता से समझा जा सकता है। 

2. राजनीति को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना -

अरस्तु के समय से ही तुलनात्मक अध्ययन द्वारा राजनीति के अध्ययन को वैज्ञानिक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। 1955 के बाद व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति को तुलनात्मक आधार पर एक विज्ञान का रूप देने का प्रयास किया है। व्यवहारवादियों ने राजनीतिक व्यवहार की निरन्तरताओं या नियमितताओं का पता लगाकर सामान्यीकरण के आधार पर सिद्धान्त विकसित करने के प्रयास किए हैं, क्योंकि यहीं सामान्यीकरण वैज्ञानिकता का आधार है। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही राजनीतिक व्यवहार की नियमितताओं का पता लगाकर उनके कारणों का भी पता लगाया जा सकता है। इस तरह व्यवहारवादियों के प्रयासों से ही आज राजनीति विज्ञान राजनीति का विज्ञान बनने की ओर अग्रसर है।

3. राजनीति में सिद्धान्त निर्माण -

तुलनात्मक अऋध्ययन द्वारा राजनीतिक व्यवहार की नियमितताओं का पता चलने से सिद्धान्त निर्माण करना आसान हो जाता है। राजनीति शास्त्र में ऐसे सिद्धान्तों की तलाश की जा रही है जो सम्पूर्ण विश्व के राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक हों। तुलनात्मक राजनीति आनुमाविक सिद्धान्तों तक पहुंचने में सहायता करती है। ये आनुभाविक सिद्धान्त ही राजनीतिक व्यवहार के वास्तविक तथ्यों को समझने में मदद करते हैं। इसमें राजनीति शास्त्री स्वयं तथ्यों का संकलन करने के लिए राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में जाकर राजनीतिक व्यवहार का अवलोकन करता है। आदश्री सिद्धान्त की कल्पना पर आधारित होने के कारण सिद्धान्त निर्माण ठोस तथ्यों के अभाव में नहीं हो सकता। इसलिए आनुभाविक सिद्धान्त ही राजनीतिक वास्तविकताओं से सीधा सम्बन्ध रखता है। इसी कारण से तुलनात्मक राजनीति आदश्री सिद्धान्तों की बजाय आनुभाविक सिद्धान्तों के अधिक समीप होती है। यथार्थ राजनीतिक व्यवहार की तुलना करना ही आनुभाविक सिद्धान्तों का निर्माण करना है। इस तरह तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन का महत्व राजनीतिक व्यवहार के सम्बन्ध में सिद्धान्त निर्माण में है।

4. प्रचलित राजनीतिक सिद्धान्तों की प्रामाणिकता परखना -

तुलनात्मक अध्ययन द्वारा राजनीतिक सिद्धान्तों का पुन: परीक्षण करके, उनकी प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है। प्रचलित सिद्धान्तों या अतीत में स्थापित सिद्धान्तों की समसामयिक प्रासांगिकता की जाँच तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही की जा सकती है। तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक सिद्धान्तों की जांच-परख के लिए नवीन उपकरण व तकनीक उपलब्ध कराती है। किसी भी शास्त्र में परम सिद्धान्त नहीं हो सकते, इसलिए राजनीतिक सिद्धान्त भी परम सिद्धान्त नहीं हो सकते। मानव व्यवहार एक परिवर्तनशील वस्तु है। इसलिए मानव व्यवहार पर आधारिक राजनीतिक सिद्धान्तों की बदलती परिस्थितियों में जांच करना आवश्यक हो जाता है। इस कार्य में तुलनात्मक राजनीति ही सहायक होती है। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही यह निष्कर्ष निकाला हा सकता है कि प्रचलित राजनीतिक सिद्धान्त वर्तमान सन्दर्भ में कितने प्रासंगिक हैं या कितने अप्रासंगिक।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि तुलनात्मक अध्ययन से हम अपने देश की संस्थाओं को अधिक गहराई से समझकर उपस्थित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा छात्रों, शिक्षकों, राजनीतिक विद्वानों सभी को उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है। इसके द्वारा हम अपने देश की शासन पद्धति का दूसरे देशों की शाासन-पद्धतियों से तुलनात्मक अध्ययन करके उपयोगी निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इससे राजनीतिक व्यवहार को समझने, राजनीति-शास्त्र को विज्ञान बनाने, आनुभाविक अध्ययनों के आधार पर सिद्धान्त निर्माण करने तथा प्रचलित सिद्धान्तों की औचित्यता व प्रामाणिकता जांचने में सहायता मिलती है। आज की लोक कल्याणकारी राजनीतिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक व्यवहार के बारे में सामान्य नियमों का निर्धारण करना बहुत आवश्यक हो गया हैं ताकि सामान्य राजनीतिक सिद्धान्तों का निर्माण किया जा सके और राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व का गुण प्रदान किया जा सके।

Comments

  1. It is a very useful topic for my Syllabus. I would like to say thank you to this organisation.

    ReplyDelete
  2. This is very useful and tonic topic.

    ReplyDelete
  3. I was here to read something new and clear my doubt. But unfortunately it's copied from Mdu notes which i already have.

    ReplyDelete

Post a comment