तुलनात्मक राजनीति का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र, महत्व

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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तृतीय विश्व के अभ्युदय ने तुलनात्मक राजनीति को व्यापक आधार प्रदान किया है। अब इसका सम्बन्ध पश्चिम के देशों व संस्थागत राजनीतिक संरचनाओं से न होकर गैर-राजनीतिक संरचनाओं व इन्हें प्रभावित करने वाले गैर-राजनीतिक व्यवहार तथा तृतीय विश्व के देशों की राजनीति से भी है। आज राजनीति विज्ञान में सदियों से प्रचलित राज्य, सरकार, संस्था, शक्तियों व जनमत के स्थान पर नई अवधारणाएं राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक समाजीकरण, राजनीतिक संचार, राजनीतिक आधुनिकीकरण, राजनीतिक विकास, राजनीतिक व्यवस्था आदि प्रमुख अवधारणाएं मानी जाती है, क्योंकि अन्य सभी अवधारणाएं इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। आज नई तकनीक, पद्धति व दृष्टिकोणों ने तुलनात्मक अध्ययन को वैज्ञानिक व व्यवहारिक बना दिया है। आज इसमें समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान आदि का भी अध्ययन शामिल होने के कारण यह एक अन्तर-अनुशासीय विषय के रूप में स्थान पा चुकी है। आज तुलनात्मक राजनीति का अर्थ किन्हीं दो देशों की सरकारों या संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन से नहीं है। आज इसमें सम्पूर्ण विश्व की राजनीतिक व गैर-राजनीतिक संस्थाओं, उनका व्यवहार तथा व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्वों का अध्ययन भी शामिल है। तुलनात्मक राजनीति के बारे में विभिन्न परिभाषाएं दी गई हैं :-

तुलनात्मक राजनीति की परिभाषाएं 

  1. तुलनात्मक राजनीति को परिभाषित करते हुए ब्रायबन्ती (Braibanti) ने लिखा है-”तुलनात्मक राजनीति सामाजिक व्यवस्था में उन तत्वों की पहचान और व्याख्या है जो राजनीतिक कार्यों तथा उनके संस्थागत प्रकाशन को प्रभावित करते हैं।”
  2. एडवर्ड ए0 फ्रीमैन (Edward A. Freeman) ने तुलनात्मक राजनीति के बारे में लिखा है-”तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक संस्थाओं तथा सरकारों के विविध प्रकारों का एक तुलनात्मक विवेचन व विश्लेषण है।”
  3. राय सी0 मैक्रिडीस (Roy C. Macridis) के अनुसार-”हैरोडोटस तथा अरस्तु के समय से ही राजनीतिक मूल्यों, विश्वासों, संस्थाओं, सरकारों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में विविधताएं जीवन्त रही हैं और इन विविधताओं में समान तत्वों की छानबीन करने के प्रयास को तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण कहा जाना चाहिए।”
  4. एम0 कर्टिस (M. Curtis) के अनुसार-”तुलनात्मक राजनीति, राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक व्यवहार की कार्य-प्रणाली में महत्वपूर्ण नियमितताओं, समानताओं और असमानताओं में तुलनात्मक अध्ययन से सम्बन्धित है।”
इस प्रकार कहा जा सकता है कि तुलनात्मक राजनीति तुलनात्मक सरकारों, गैर-शासकीय राजनीतिक संस्थाओं, कबीलों, समुदायों व उनकी प्रक्रियाओं व व्यवहारों का अध्ययन है।

तुलनात्मक राजनीति व तुलनात्मक सरकार में अन्तर

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि तुलनात्मक राजनीति का ही एक अंग है। तुलनात्मक सरकार का कार्यक्षेत्र तुलनात्मक राजनीति की तुलना में काफी संकुचित है। प्राय: इन दोनों को समानाथ्र्ाी माना जाता है। लेकिन इनमें मौलिक व आधारभूत अन्तर है। इनके अन्तर को स्पष्ट करते हुए जी0 के0 राबर्टस् (G.K. Roberts) ने लिखा है-”तुलनात्मक सरकार या शासन का प्रयोग राज्यों, उनकी संस्थाओं और उनके कार्यों से सम्बन्धित कुछ समूहों जैसे-राजनीतिक दल, दबाव समूह आदि के अध्ययन के लिए उपयुक्त लगता है, लेकिन तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र व्यापक है, जिसमें तुलनात्मक शासन तथा गैर राज्यीय राजनीति जैसे कबीले, निजी संस्थाएं आदि का भी अध्ययन किया जाता है।” तुलनात्मक सरकार के बारे में जीन ब्लौंडेल ने लिखा है-”तुलनात्मक सरकार विश्व की राष्ट्रीय सरकारों के विभिन्न प्रतिमानों का अध्ययन है।”

इससे स्पष्ट हो जाता है कि तुलनात्मक राजनीति तुलनात्मक शासन का विकसित रूप है। तुलनात्मक शासन या सरकार का प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले तो ठीक लगता था, आज नहीं। आज तुलनात्मक राजनीति का सम्बन्ध राजनीतिक व्यवहार की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली से जुड़ गया है। नवोदित राष्ट्रों के रूप में तृतीय विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में भूमिका के कारण तुलनात्मक अध्ययन अपनी परम्परागत सीमाएं छोड़कर तृतीय विश्व की ओर प्रस्थान कर चुका है। अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान आदि के क्षेत्र में आए व्यापक परिवर्तनों ने राजनीति विज्ञान को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। 1979 के बाद उत्तर’व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति विज्ञान को व्यक्ति की राजनीतिक व गैर-राजनीतिक गतिविधियों का विश्लेषण करने के लिए बाध्य कर दिया है। सिडनी वर्बा ने केवल पश्चिमी देशों का अध्ययन न करके, एशिया, अफ्रीका एवं लेटिन अमेरिका के नए राष्ट्रों का अध्ययन करने पर जोर दिया है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि तुलनात्मक राजनीति का कार्यक्षेत्र व्यापक हो चुका है। यह अपना परम्परागत रूप छोड़कर आधुनिकता की तरफ अग्रसर हो रही है। इसलिए तुलनात्मक सरकार से यह न केवल भिन्न है, बल्कि तुलनात्मक सरकारों को भी अपने में समेट लेती है। जहां तुलनात्मक सरकार राजनीतिक संस्थाओं व उनके कार्यों से सम्बन्धित है, वहीं तुलनात्मक राजनीति संस्थाओं व कार्यों के साथ साथ गैर-राजनीतिक संस्थाओं, कार्यों व उनके व्यवहार को भी समेट लेती है। अत: तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन क्षेत्र तुलनात्मक सरकार से व्यापक है और तुलनात्मक सरकार का अध्ययन भी तुलनात्मक राजनीति के अन्तर्गत आता है।

तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति

आज तुलनात्मक राजनीति एक स्वतंत्र विषय के रूप में अपना स्थान प्राप्त कर चुकी है। प्राचीन काल में तुलनात्मक राजनीति का सम्बन्ध केवल विभिन्न सरकारों की तुलना मात्र से ही माना जाता था। अरस्तु ने वैज्ञानिक पद्धति का आरम्भ करके तुलनात्मक अध्ययन को नई दिशा देने का प्रयास किया। उसके बाद हैरोडोटस ने भी तुलनात्मक राजनीति का विकास किया। लेकिन उनका अध्ययन केवल राजनीतिक संस्थाओं, उनके ढांचे, सरकारों तक ही सीमित रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तुलनात्मक राजनीति का प्रकृति में काफी बदलाव आया। अब इसमें राजनीतिक संस्थाओं के ढांचे व कार्यों के साथ साथ गैर राजनीतिक समुदायों, तथा निजी संस्थाओं व उनके व्यवहार का भी अध्ययन आवश्यक हो गया। इसलिए आज तुलनात्मक राजनीति में केवल शासन के ढांचों का ही अध्ययन न करके, बल्कि सभी राजनीतिक सिद्धान्तों, आदर्शों तथा व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। इसलिए आज तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति भी बदल चुकी है। इसलिए आज तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति को लेकर विद्वानों में मतभेदों का उभरना भी स्वाभाविक ही है। तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति सम्बन्धी दो मत प्रचलित हैं :-
  1. तुलनात्मक राजनीति एक लम्बात्मक या अनुलम्बात्मक तुलनात्मक अध्ययन है (Comparative Politics is a Vertical Comparative Study)
  2. तुलनात्मक राजनीति एक अनुप्रस्थ या क्षैतिज तुलनात्मक अध्ययन है (Comparative Politics is a Horizontal Comparative Study)

लम्बात्मक तुलनात्मक अध्ययन के रूप में

इस धारणा के समर्थकों का मानना है कि तुलनात्मक राजनीति एक ही देश में विभिन्न स्तरों पर स्थापित सरकारों (राष्ट्रीय एवं स्थानीय) और इनको प्रभावित करने वाले राजनीतिक व्यवहारों का तुलनात्मक विश्लेषण का अध्ययन है। इस विचारधारा को मानने वालों का कहना है कि चूंकि क्षेत्रीय सरकारें अनेक होती हैं, इसलिए राष्ट्रीय सरकारों की उनसे राजनीतिक प्रक्रियाओं तथा संस्थाओं के सन्दर्भ में तुलना करके उपयोगी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इस धारणा के समर्थकों का कहना है कि तुलनात्मक राजनीति एक ही देश की विभिन्न सरकारों की अनुलम्ब तुलना है, इसलिए वे एक ही देश की विभिन्न सरकारों की तुलना विभिन्न स्तरों पर करने पर जोर देते हैं। लेकिन गहराई से देखा जाए तो उनकी यह तुलना सतही स्तर पर ही ठीक प्रतीत होती है। अधिक व्यापक अध्ययन व विश्लेषण से राष्ट्रीय व प्रादेशिक सरकारों में समानताओं की बजाय असमानताएं अधिक दिखाई देती हैं। तुलना करने पर इनमें आर्थिक साधनों, नियमों व शक्ति की समानता ही प्रतीत होती है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्रीय सरकार के पास आर्थिक साधन अधिक होते हैं। इसलिए आर्थिक साधनों की समानता मात्रात्मक होती है, गुणात्मक नहीं। इसी तरह नियमों में भी समानता की अपेक्षा असमानता ही अधिक होती है, क्योंकि राष्टऋ्रीय सरकार के नियमों के पीछे शक्ति का तत्व प्रभावी रहता है। राष्ट्रीय सरकार सम्प्रभु होने के नाते स्थानीय सरकार से अधिक शक्तिशाली होती है। इसलिए राष्ट्रीय सरकार व स्थानीय सरकार के नियमों में समानता की बजाय असमानता ही अधिक होती है। इसी प्रकार शक्ति के कारण राष्ट्रीय सरकार के पास उत्पीड़न (Coercion) का तत्व होने के कारण, वह स्थानीय सरकार से अधिक प्रभावशाली होती है। इस प्रकार इन तीनों समानताओं की अपेक्षा असमानताएं ही अधिक हैं। राष्ट्रीय व स्थानीय सरकारों में पाई जाने वाली समानताएं सतही हैं। इनकी सहायता से इनकी प्रकृति तो समझी जा सकती है, लेकिन कोई सामान्यीकरण नहीं निकाला जा सकता। यह लम्बात्मक तुलना संस्थाओं के औपचारिक अध्ययन के लिए तो सहायक हो सकती है, लेकिन राजनीतिक व्यवहार की वास्तविकता का ज्ञान इससे नहीं हो सकता। अत: लम्बात्मक तुलना से तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति को वास्तविक रूप में समझना असम्भव है। इसलिए लम्बात्मक तुलना की धारणा आज मान्य नहीं हो सकती।

अनुप्रस्थ या क्षैतिज तुलनात्मक अध्ययन के रूप में

इस धारणा के समर्थकों का कहना है कि तुलनात्मक राजनीति तो राष्ट्रीय सरकारों की क्षैतिज तुलना है। ऐसी तुलना ही वास्तविक अध्ययन की आधार है और राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक सिद्ध होती है। इस प्रकार की तुलना एक देश की राष्ट्रीय सरकारों में भी हो सकती है और दूसरे देश की राष्ट्रीय सरकारों के साथ भी। यह तुलना समय और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इसके द्वारा एक देश की राजनीतिक व्यवस्थाा का राजनीतिक व्यवहार भी समझा जा सकता है और दूसरे देशों को राजनीतिक व्यवस्था के राजनीतिक व्यवहार से उसकी तुलना भी की जा सकती है। यही धारणा तुलनात्मक राजनीति की वास्तविक प्रकृति को समझने में मददगार साबित होती है। इसमें तुलना एक राष्ट्र की केन्द्रीय सरकारों के बीच ऐतिहासिक आधार पर भी हो सकती है और समसामयिक आधार पर एक देश की राष्ट्रीय सरकार की तुलना दूसरे देशों की राष्ट्रीय सरकारों के साथ भी हो सकती है।

ऐतिहासिक आधार पर एक देश की राष्ट्रीय सरकार की इसी देश की भूतकालीन राष्ट्रीय सरकारों के साथ तुलना की जा सकती इस प्रकार की तुलना वर्तमान राजनीतिक व्यवहार की प्रकृति को समझने में सहायक होती है। प्रत्येक देश की राजनीतिक व्यवस्था के राजनीतिक व्यवहार की जड़ें भूतकाल में होती हैं। उदाहरण के लिए भारत की राजनीतिक व्यवस्था तथा राजनीतिक व्यवहार की जड़ें प्राचीन, मध्य व ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत ढूंढ़ी जा सकती है। भारतीय राजनीति व्यवस्था में आज भी ब्रिटिश शासनकाल के अनेक तत्व मौजूद हैं, जो वर्तमान में राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवहार के महत्वपूर्ण अंग हैं। इस प्रकार की तुलना समान संस्कृति व सभ्यता वाले राज्यों की शासन व्यवस्था व राजनीतिक व्यवहार को समझने में तो ठीक है, लेकिन अलग प्रकार की सभ्यता व संस्कृति वाले राज्यों की शाासन व्यवस्था व राजनीतिक व्यवहार को समझने में परेशानी पैदा करती है। इसलिए इस प्रकार की तुलना का सीमित महत्व है।

समसामयिक आधार पर एक देश की राष्ट्रीय सरकार की दूसरे देशों की राष्ट्रीय सरकारों से तुलना करना बहुत उपयोगी व प्रामाणिक होता है। ब्लैंडेल ने इसे तुलनात्मक अध्ययन में सबसे उपयोगी व प्रामाणिक माना है। उसने लिखा है-”हमारे पास तुलनात्मक सरकारों के अध्ययन का केवल एक ही दृष्टिकोण शेष रहता है और वह है-समकालीन विश्व की राजनीतिक व्यवस्थाओं से सम्बन्धित राष्ट्रीय सरकारों का राष्ट्रीय सीमाओं से आर-पार अध्ययन करना।” इस प्रकार की तुलनाएं सामान्यीकरण का आधार होती हैं। इसके द्वारा राजनीतिक व्यवहार के सामान्य सिद्धान्तों का निर्माण भी किया जा सकता है। इससे राजनीतिक संस्थाओं और उनके राजनीतिक व्यवहार को सरलता से समझा जा सकता है। इस प्रकार की तुलनाएं ही सर्वश्रेष्ठ व प्रामाणिक होती हैं।

इस प्रकार तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति सम्बन्धी अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि ये एक दूसरे की पूरक हैं और राजनीतिक व्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली व उनके व्यवहार को समझने में सहायक हैं। इनके द्वारा राजनीतिक व्यवहार में समानताएं व असमानताओं को समझकर तुलनात्मक राजनीति के बारे में सामान्य सिद्धान्तों का निर्माण किया जा सकता है। यही राजनीतिक विश्लेषण की वैज्ञानिकता व विश्वसनीयता का आधार है। आज सीमाओं के आर-पार तुलनात्मक अध्ययन से तुलनात्मक राजनीति एक स्वतंत्र अनुशासन का स्थान प्राप्त कर चुकी है। यह राजनीति विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखा होने के बावजूद भी राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ गैर-राजनीतिक संस्थाओं व उनके राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्वों का भी अध्ययन किया जाता है। यही तुलनात्मक राजनीति की वास्तविक प्रकृति है।

तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र

तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र आज एक विवादास्पद विषय है। आज तुलनात्मक राजनीति संक्रमणकालीन दौर मे है। हैरी एकसटीन ने इसी बात की पुष्टि करते हुए लिखा है-”तुलनात्मक राजनीति के बारे में महत्वपूर्ण व विवादास्पद बात यह है कि वह संक्रमण की स्थिति में है-एक प्रकार की विश्लेषण शैली, दूसरे प्रकार की विश्लेषण शैली की ओर प्रस्थान कर रही है।” आज तुलनात्मक राजनीति की सीमा व मानकों तथा व्यवहारों के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में काफी विवाद है। तुलनात्मक राजनीति की सीमाओं के बारे में परम्पराओं तथा आधुनिक राजनीतिक विश्लेषक एकमत नहीं हैं। आज तुलनात्मक राजनीति के सामने यह समस्या है कि इसमें क्या शामिल किया जाए या क्या नहीं तथा शामिल करने या न करने का आधार क्या हो ?

सीमा सम्बन्धी विवाद के बारे में सभी राजनीतिशास्त्री इस बात से तो सहमत हैं कि तुलनात्मक राजनीति का सम्बन्ध राष्ट्रीय सरकारों से है और इसमें सरकारी ढांचे के साथ-साथ सरकारों की कार्यप्रणाली तथा गैर-राजनीतिक संस्थाओं के राजनीतिक कार्य व व्यवहार शामिल हैं। लेकिन उनमें राजनीतिक क्रियाकलापों का सरकार की क्रिया-कलापों की व्याख्या को लेकर मतभेद हैं। इस बारे में उनके दो दृष्टिकोण हैं-कानूनी या संस्थागत दृष्टिकोण तथा व्यवहारवादी दृष्टिकोण। इन दृष्टिकोणों की उपयोगिता को लेकर भी राजनीति शास्त्रियों में परस्पर विवाद हैं। कानूनी या संस्थागत दृष्टिकोण के समर्थकों का कहना है कि तुलनात्मक राजनीति में केवल संविधान द्वारा निर्धारित राजनीतिक व्यवहार तथा सरकारी ढांचे व संरचनाओं का ही अध्ययन किया जाए। इसके विपरीत किसी अन्य आधार पर राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करना बेईमानी होगी। इसलिए इस दृष्टिकोण के समर्थक राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक व्यवहार के औपचारिक अध्ययन पर ही बल देते हैं। लेकिन कानूनी दृष्टिकोण के आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार का अध्ययन सतही व दिखावटी होगा। इससे राजनीतिक प्रक्रियाओं व व्यवहार की वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। चीन और रूस की संवैधानिक विधि से वहां की राजनीतिक व्यवस्था व उसके व्यवहार का सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इसी तरह ब्रिटेन व भारत में भी संविधान के ढांचे के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था के व्यवहार का सही आंकलन नहीं किया जा सकता। भारत में लम्बे समय से केन्द्र व राज्यों में कांग्रेस पार्टी के शासन ने संविधान का संघात्मक रूप एकात्मक बनाकर रख दिया। इसी तरह ब्रिटेन में संवैधानिक राजनीतिक तन्त्र के स्थान पर निरंकुश राजतन्त्र का होना संविधान के आधाार पर राजनीतिक व्यवहार को समझने की चुनौती देता है। इसलिए व्यवहारवादी विचारक तुलनात्मक राजनीति को कानूनी सीमाओं के पाश से मुक्त करके व्यवहारवादी अध्ययन पर जोर देते हैं ताकि राजनीतिक व्यवस्था की गत्यात्मकता को समझा जा सके। उनका कहना है कि संस्थागत अध्ययन की बजाय अनौपचारिक तत्वों को भी तुलनात्मक राजनीति में स्थान मिलना चाहिए।

व्यवहारवादी दृष्टिकोण के समर्थक तुलनात्मक राजनीति में राजनीति की व्यावहारिकता पर भी बल देते हैं। उनका कहना है कि तुलनात्मक राजनीति में केवल कानूनी व्यवस्था का औपचारिक अध्ययन व तुलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार व्यावहारिक बनती है तथा राजनीतिक संस्थाओं का वास्तविक व्यवहार कैसा है, इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसलिए तुलनात्मक राजनीति में राष्ट्रीय संस्थाओं व गैर-राजनीतिक संस्थाओं के राजनीतिक व्यवहार से सम्बन्धित तथ्यों को भी शामिल करना चाहिए। व्यवहारवादियों का मानना है कि हर राजनीतिक समाज में राजनीतिक गतिविधि हर तरह से शासन तन्त्र के आस-पास ही चक्कर काटती रहती है और इसी से हर राजनीतिक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। जीन ब्लौंडेल ने लिखा है-”तुलनात्मक सरकार या तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में उन तरीकों का, जो समाज में मूल्यों का अधिकृत विवरण होते हैं, परीक्षण किया जाता है।” यह परीक्षण मूल्यों के नियमन, रूपान्तरण तथा क्रियान्वयन से सम्बन्धित होता है। इस प्रकार तुलनात्मक राजनीति में मूल्यों की त्रिमुखी प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इस तरह व्यवहारवादी विचारक तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र मूल्यों के नियमण, रूपान्तरण तथा कार्यान्वयन तक ही सीमित मानते हैं।

तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र से सम्बन्धित दूसरा विवाद मानकों तथा व्यवहारों का विवाद है। मानकों का आधार कानून व नियम होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजनीतिक व्यवहार कानूनों व नियमों के अनुकूल ही हों। इसकी प्रतिकूलता तुलनात्मक अध्ययन में कठिनाईयां उत्पन्न करती हैं। यदि मानकों के अनुसार ही राजनीतिक व्यवहार रहे तो तुलना करना आसान होता है। बाह्यकारी शक्ति के प्रयोग से कानून व नियमों पर आधारित मानक अशुद्ध होते हैं। इसलिए राजनीतिक व्यवहार के बारे में यह देखना भी आवश्यक होता है कि वह मानकों के अनुकूल है या प्रतिकूल। यद्यपि राजनीतिक व्यवहार व मानकों की प्रकृति परिवर्तनशील होती है। ये दोनों गत्यात्मक हैं। जो मानक व व्यवहार आज हैं, आगे भी उनका वैसा ही होना अधिक सम्भव नहीं है। इसलिए इन दोनों में साम्य व गतिरोध का होना स्वाभाविक ही है। मानको ;छवतउेद्ध में परिवर्तन व्यवहार में परिवर्तन का कारण बन सकता है और व्यवहार भी नए मानकों की स्थापना का कारण हो सकता है। इसलिए राजनीतिक व्यवहार व मानकों के राजनीतिक पहलुओं का अध्ययन भी तुलनात्मक राजनीति में महत्वपूर्ण होता है। यदि इनकी उपेक्षा की जाएगी तो राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक व्यवहार के अध्ययन से हम दूर हो जायेंगे, क्योंकि मानक व व्यवहार सरकार की जीवित संरचना का महत्वपूर्ण अंग है।

उपरोक्त विवेचन के बाद यह कहा जा सकता है कि तुलनात्मक राजनीति में न केवल विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं, उनके कार्यों का ही अध्ययन शामिल नहीं है, बल्कि इसमें गैर-राजकीय संस्थाओंं के राजनीतिक कार्य व व्यवहार भी शामिल हैं। आज तुलनात्मक राजनीति में शासन प्रणाली व उसके राजनीतिक व्यवहार के समान व असमान दोनों तत्व ही शामिल हैं। मुनरो, हस्नम फाइनर, लास्की जैसे विद्वानों के प्रयासों ने अरस्तु के तुलनात्मक अध्ययन को बहुत व्यापक बना दिया है। आज तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र पश्चिमी देशों की सरकारों या राजनीतिक संस्थाओं व उनके व्यवहार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रसार तृतीय विश्व तक हो चुका है। अब राज्य से सम्बन्धित संस्थाओं व संगठनों की बजाय गैर-राजनीतिक संस्थाओं व उनके व्यवहार को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है। आज तुलनात्मक राजनीति अन्धकार में भटकने की बजाय निश्चित कारणों को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक व्यवहार की महत्वपूर्ण नियमितताओं, समानताओं व असमानताओं पर अधिक ध्यान दे रही है। आज तुलनात्मक राजनीति में सजग तुलनाओं का विशेष महत्त्व है। आज राजनीतिक विद्वान तुलनात्मक अध्ययन को निरर्थक व बोझिल बनाना नहीं चाहते। आज तुलनात्मक राजनीति में नए-नए विषयों व नई-नई तकनीकों को महत्व दिया जा रहा है तथा तुलनात्मक राजनीति अन्य सामाजिक शास्त्रों से भी काफी कुछ ग्रहण कर रही है। इसलिए तुलनात्मक राजनीतिक अध्ययन कानून-निर्माण, कानून प्रयोग, विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं के अंगों से सम्बन्धित निर्णयों, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों के अध्ययन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें समस्त व्यक्तियों, संस्थाओं और समुदायों के सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन भी शामिल है। आज तुलनात्मक राजनीति में राज्यों की संस्थागत संरचनाएं, राजनीतिक समाजीकरण, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक दल व दबाव समूह, राजनीतिक अभिजन, राजनीतिक हिंसा व राजनीतिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक विकास, राजनीतिक आधुनिकीकरण, प्रतियोगी राज्यों के बीच शक्ति सम्बन्ध, जनमत, तुलनात्मक विश्लेषण आदि का अध्ययन शामिल है। लेकिन तुलनात्मक राजनीति अभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर चुकी है, बल्कि यह संक्रमणकाल के दौर से गुजर रही है। राजनीतिक विद्वान अभी भी इस अनिश्चय की स्थिति में हैं कि तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र क्या हो ?

तुलनात्मक राजनीति का महत्व

तुलनात्मक राजनीति, राजनीति विज्ञान का नया तत्व नहीं है। इसका अध्ययन भी उस समय से होता आ रहा है, जब से राजनीति व राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन आरम्भ हुआ। तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ से ही मानव के ध्यान का केन्द्र रहा है। अरस्तु से लेकर आज तक तुलनात्मक अध्ययन का काफी प्रचलन बढ़ा है। आज राजनीतिक व्यवहार को तुलनात्मक आधार पर समझने के लिए नए नए दृष्टिकोण का उपागम विकसित हो रहे हैं। तुलनात्मक अध्ययन या राजनीति का महत्त्व इन बातों से दृष्टिगोचर होता है :-

राजनीतिक व्यवहार को समझना

तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन देश-विदेश की राजनीति व राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक होता है। तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन द्वारा विभिन्न राजनीतिक प्रक्रियाओं की समानताओं व असमानताओं का ज्ञान कराता है। इससे राजनीतिक घटनाचक्रों का भी ज्ञान होता है। तुलनात्मक अध्ययन राजनीतिक अभिजनों को भी महत्वपूर्ण जानकारी देता है। इसी के आधार पर वे राजनीतिक व्यवहारों व दृष्टिकोणों की जाँच-परख करके उनकी प्रासंगिकता जांचते हैं। तुलनात्मक अध्ययन राजनेताओं के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। इसके द्वारा वे जनता के लिए योग्य सुझाव प्रस्तुत करते हैं और बदलते राजनीतिक व्यवहार के मानकों की जानकारी भी ग्रहण करते हैं। उदाहरण के लिए-राजनेता मतदान व्यवहार के विभिन्न तत्वों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष तुलनात्मक आधार पर ही निकाल सकते हैं कि मतदान व्यवहार को प्रभावित करने में सबसे अधिक भूमिका किस तत्व की है। तुलनात्मक राजनीति का महत्व विद्याथ्र्ाी, शिक्षक व नागरिकों के साथ-साथ जनसाधारण के लिए भी होता है। इससे हम यह भली-भाँति जान सकते हैं कि विभिन्न राजनीतिक समाज के लोगों का राजनीतिक व्यवहार परस्पर अलग क्यों होता है, उसके मूल्य और विधियां कौन सी हैं, जो वे एक दूसरे को समझने के लिए प्रयोग करते हैं। इसके द्वारा राजनीतिक व्यवहार की जटिलताओं को सरलता से समझा जा सकता है। मैक्रीडिस तथा वार्ड के अनुसार, तुलनात्मक राजनीति एक ऐसा मार्गदर्शक है जो घर बैठे-बिठाए ही देश-विदेश की सैर करा देता है। इस द्वारा इस बात का पता आसानी से लगाया जा सकता है कि एक ही प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था एक समाज में सफल तथा दूसरे में असफल क्यों होती है ? लोकतन्त्र का सफल संचालन भारत में क्यों हो रहा है, पाकिस्तान में क्यों नहीं। चीन में साम्यवाद सफल है-रूस में असफल क्यों हुआ। इस प्रकार के राजनीतिक प्रश्नों का हल तलाश करने के लिए तुलनात्मक अध्ययन ही उपयोगी रहता है। राजनीतिक व्यवहार की जटिलताओं को समझे बिना इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए जा सकते।

राजनीति को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना

अरस्तु के समय से ही तुलनात्मक अध्ययन द्वारा राजनीति के अध्ययन को वैज्ञानिक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। 1955 के बाद व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति को तुलनात्मक आधार पर एक विज्ञान का रूप देने का प्रयास किया है। व्यवहारवादियों ने राजनीतिक व्यवहार की निरन्तरताओं या नियमितताओं का पता लगाकर सामान्यीकरण के आधार पर सिद्धान्त विकसित करने के प्रयास किए हैं, क्योंकि यहीं सामान्यीकरण वैज्ञानिकता का आधार है। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही राजनीतिक व्यवहार की नियमितताओं का पता लगाकर उनके कारणों का भी पता लगाया जा सकता है। इस तरह व्यवहारवादियों के प्रयासों से ही आज राजनीति विज्ञान राजनीति का विज्ञान बनने की ओर अग्रसर है।

राजनीति में सिद्धान्त निर्माण

तुलनात्मक अऋध्ययन द्वारा राजनीतिक व्यवहार की नियमितताओं का पता चलने से सिद्धान्त निर्माण करना आसान हो जाता है। राजनीति शास्त्र में ऐसे सिद्धान्तों की तलाश की जा रही है जो सम्पूर्ण विश्व के राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक हों। तुलनात्मक राजनीति आनुमाविक सिद्धान्तों तक पहुंचने में सहायता करती है। ये आनुभाविक सिद्धान्त ही राजनीतिक व्यवहार के वास्तविक तथ्यों को समझने में मदद करते हैं। इसमें राजनीति शास्त्री स्वयं तथ्यों का संकलन करने के लिए राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में जाकर राजनीतिक व्यवहार का अवलोकन करता है। आदश्री सिद्धान्त की कल्पना पर आधारित होने के कारण सिद्धान्त निर्माण ठोस तथ्यों के अभाव में नहीं हो सकता। इसलिए आनुभाविक सिद्धान्त ही राजनीतिक वास्तविकताओं से सीधा सम्बन्ध रखता है। इसी कारण से तुलनात्मक राजनीति आदश्री सिद्धान्तों की बजाय आनुभाविक सिद्धान्तों के अधिक समीप होती है। यथार्थ राजनीतिक व्यवहार की तुलना करना ही आनुभाविक सिद्धान्तों का निर्माण करना है। इस तरह तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन का महत्व राजनीतिक व्यवहार के सम्बन्ध में सिद्धान्त निर्माण में है।

प्रचलित राजनीतिक सिद्धान्तों की प्रामाणिकता परखना

तुलनात्मक अध्ययन द्वारा राजनीतिक सिद्धान्तों का पुन: परीक्षण करके, उनकी प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है। प्रचलित सिद्धान्तों या अतीत में स्थापित सिद्धान्तों की समसामयिक प्रासांगिकता की जाँच तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही की जा सकती है। तुलनात्मक राजनीति राजनीतिक सिद्धान्तों की जांच-परख के लिए नवीन उपकरण व तकनीक उपलब्ध कराती है। किसी भी शास्त्र में परम सिद्धान्त नहीं हो सकते, इसलिए राजनीतिक सिद्धान्त भी परम सिद्धान्त नहीं हो सकते। मानव व्यवहार एक परिवर्तनशील वस्तु है। इसलिए मानव व्यवहार पर आधारिक राजनीतिक सिद्धान्तों की बदलती परिस्थितियों में जांच करना आवश्यक हो जाता है। इस कार्य में तुलनात्मक राजनीति ही सहायक होती है। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ही यह निष्कर्ष निकाला हा सकता है कि प्रचलित राजनीतिक सिद्धान्त वर्तमान सन्दर्भ में कितने प्रासंगिक हैं या कितने अप्रासंगिक।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि तुलनात्मक अध्ययन से हम अपने देश की संस्थाओं को अधिक गहराई से समझकर उपस्थित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। तुलनात्मक अध्ययन द्वारा छात्रों, शिक्षकों, राजनीतिक विद्वानों सभी को उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है। इसके द्वारा हम अपने देश की शासन पद्धति का दूसरे देशों की शाासन-पद्धतियों से तुलनात्मक अध्ययन करके उपयोगी निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इससे राजनीतिक व्यवहार को समझने, राजनीति-शास्त्र को विज्ञान बनाने, आनुभाविक अध्ययनों के आधार पर सिद्धान्त निर्माण करने तथा प्रचलित सिद्धान्तों की औचित्यता व प्रामाणिकता जांचने में सहायता मिलती है। आज की लोक कल्याणकारी राजनीतिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक व्यवहार के बारे में सामान्य नियमों का निर्धारण करना बहुत आवश्यक हो गया हैं ताकि सामान्य राजनीतिक सिद्धान्तों का निर्माण किया जा सके और राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व का गुण प्रदान किया जा सके।

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