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सार्क (SAARC) के उद्देश्य एवं सिद्धांत

सार्क के उद्देश्य

सार्क की स्थापना का प्रयास सात देशों की 1981 में कोलम्बों में विदेश सचिव स्तर की बैठक के दौरान हुआ। दिसम्बर 1985 में ढ़ाका में प्रथम शिखर सम्मलेन आयोजित किया गया। जिसमें भारत, नेपाल, बंग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान और श्रीलंका इसके संस्थापक सदस्य बने। अब मालदीव तथा अफगानिस्तार को मिलाकर कुल 8 सदस्य देश हो चुके हैं।

सार्क के स्थापना का उद्देश्य

 क्षेत्रीय सहयोग की वचनबद्धता मूर्तरुप, मैत्री, विश्वास और आपसी सूझबूझ के साथ साझा समस्याओं, को हल करने की दिशा में मिलकर कार्य करना था। व्यापक परिप्रेक्ष्य में आर्थिक विकास की व्यूह रचना के अलावा, इसे एक प्रतिरक्षात्मक व राजनीतिक व्यवस्थाओं को नया मोड़ देने में सक्षम साबित हो सकता है। सार्क का झुकाव आर्थिक सहयोग, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन आदि प्रमुख क्षेत्रों में ठोस विकासोन्मुख विचार-विमर्श की ओर है।

सार्क 1985 में स्थापना से लेकन आज तक सराहनीय कार्य करते हुए दक्षिण एशिया की आवाज बना हुआ है। मुख्य रुप से संगठनात्मक गतिविधियों का समन्वित कार्यक्रम, व्यापार उदारीकरण (साप्टा और साफ्टा), गरीबी उम्मूलन, संयुक्त उद्यम स्थापित करने, क्षेत्रीय परियोजनाओं के लिए सार्क कोष, शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास हुआ है। सार्क के मंच से सामाजिक और नागरिक विकास; जैसे- गरीबी उम्मूलन, साक्षरता, महिला सशक्तिकरण आदि के लिए क्षेत्रीय खाद्य बैंक (2007) तथा सार्क विकास फण्ड की स्थापना की गई है। इसी प्रकार, प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए ढ़ाका, नई दिल्ली तथा मालदीव में सार्क प्राकृतिक आपदा प्रबंधन की स्थापना की गई है.

सार्क के उद्देश्य

सार्क के चार्टर के अनुच्छेद 1 में सार्क के उद्देश्यों को परिभाषित किया गया है-
  1. दक्षिण-एशिया के देशों की जनता के कल्याण को प्रोत्साहित करना तथा उनके जीवन स्तर में सुधार लाना।
  2. दक्षिण एशियाई देशों की सामूहिक आत्मनिर्भरता का विकास करना।
  3. इस क्षेत्र में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास की गति तेज करना।
  4. सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में पारस्परिक सहयोग में वृद्धि करना।
  5. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आपसी सहयोग को मजबूत बनाना अन्य क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  6. दूसरे विकासशील देशों के साथ सहयोग को बढ़ाना।
  7. सदस्य देशों में आपसी विश्वास बढ़ाना तथा समस्याओं को समझने के लिए एक दूसरे का सहयोग करना।

सार्क के सिद्धांत

सार्क के चार्ट के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत सार्क के सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है:-
  1. सार्क के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा दूसरे के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करना।
  2. क्षेत्रीय सहयोग को द्विपक्षीय व बहुपक्षीय सहयोग का पूरक बनाना।
  3. क्षेत्रीय सहयोग को द्विपक्षीय व बहुपक्षीय सहयोग के उत्तरदायित्वों के अनुकूल बनाना।

सार्क का संस्थागत स्वरूप

सार्क के चार्टर के अंतर्गत सार्क के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित अभिकरणों की व्यवस्था की गई है:

1. शिखर सम्मेलन- इसमें सदस्य देशों के शासनाध्यक्ष आपसी समस्याओं पर विचार करने व सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष किसी निश्चित स्थान पर एकत्रित होते हैं। सार्क का पहला शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1985 में ढाका में हुआ था। अब तक इसके 11 शिखर सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। सार्क का 11वां शिखर सम्मेलन जनवरी, 2002 में काठमांडू में आयोजित हुआ।

2. मन्त्रिपरिषद- इसमें सदस्य देशों के विदश मन्त्री शामिल होते हैं। इसके बैठक आवश्यकतानुसार कभी भी आयोजित की जा सकती है। इसको प्रमुख कार्य संघ की नीति निर्धारित करना, सामान्य हित के मुद्दों के बारे में निर्णय करना व सहयोग के लिए नए क्षेत्र तलाश करना है। 3. स्थायी समिति- इसमें सदस्य देशों के सचिव शामिल हैं। इसका कार्य सहयोग के कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग करना तथा अध्ययन के आधार पर सहयोग के नए मित्रों की पहचान करना है। यह तकनीकी समिति के कार्यों का निरीक्षण करती है व उसके कार्यों को प्रभावी बनाने के लिए सुझाव भी देती है।

3. तकनीकी समितियां- इसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि होते हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में कार्यक्रम लागू करने, समन्वय करने व उन्हें मॉनिटरिंग करने के लिए उत्तरदायी हैं। ये सहयोग के नए क्षेत्रों की सम्भावनाओं का भी पता लगाती है। इनके सभी कार्य तकनीकी आधार के हैं।

4. सचिवालय- महासचिव इसका अध्यक्ष होता है। उसका कार्यकाल 2 वर्ष होता है। यह पद सदस्य देशों को बारी-बारी से प्राप्त होता रहता है। सचिवालय को 7 भागों में बांटा गया है। प्रत्येक विभाग का कार्य निदेशक की देखरेख में चलता है। सचिवालय संगठन के प्रशासनिक कार्यों का निष्पादन करता है। इसकी स्थापना 16 जनवरी, 1987 को दूसरे सार्क सम्मेलन (बंगलौर) द्वारा की गई है।

इनके अतिरिक्त सार्क की एक कार्यकारी समिति भी है। जिसकी स्थापना स्थायी समिति द्वारा की जाती है। सार्क के कार्यों के निष्पादन के लिए एक वित्तीय संस्था का भी प्रावधान किया गया है। जिसमें सभी सदस्य देश निर्धारित अंशदान के आधार पर वित्तीय सहयोग देते हैं। इसमें भारत का हिस्सा 32 प्रतिशत है।

सार्क के शिखर सम्मेलन

  1. सार्क का पहला शिखर सम्मेलन (First summit of SAARC)
  2. सार्क का दूसरा शिखर सम्मेलन (Second summit of SAARC)
  3. सार्क का तीसरा शिखर सम्मेलन (Third summit of SAARC)
  4. सार्क का चौथा शिखर सम्मेलन (Fourth summit of SAARC)
  5. सार्क का पांचवां शिखर सम्मेलन (Fifth summit of SAARC)
  6. सार्क का छठा शिखर सम्मेलन (Sixth summit of SAARC)
  7. सार्क का सातवां शिखर सम्मेलन (Seventh summit of SAARC)
  8. सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन (Eighth summit of SAARC)
  9. सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन (Ninth summit of SAARC)
  10. सार्क का दसवां शिखर सम्मेलन (Tenth summit of SAARC)
  11. सार्क का ग्यारहवां शिखर सम्मेलन (Eleventh summit of SAARC)

1. पहला शिखर सम्मेलन

सार्क का प्रथम शिखर सम्मेलन 7 से 8 दिसम्बर, 1985 को बंगलादेश की राजधानी ढाका में हुआ। इसमें सातों सदस्य देशों ने भाग लिया। यह सम्मेलन जिआ-उर-रहमान के स्वप्न का साकार रूप था। इसके आयोजन से एक क्षेत्रीय सहयोग संगठन का सैद्धान्तिक आधार तैयार हो गया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता बंगलादेश के राष्ट्रपति एच.एम. इरशाद ने की। 

इस सम्मेलन में SAARC के उद्देश्यों व सिद्धान्तों पर आपसी सहमति हो गई। इसमें जो घोषणा पत्र प्रस्तुत किया गया उसमें सदस्य देशों को प्रतिवर्ष किसी निश्चित स्थान पर एकत्रित होने के लिए कहा गया। इसमें एक मन्त्रिपरिषद् बनाने का भी निर्णय हुआ। इसमें तकनीकी समिति व कार्यकारी समिति के निर्माण की बात भी पास हो गई। 

इस सम्मेलन में विभिन्न समस्याओं तथा सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार - विमर्श हुआ।

2. दूसरा शिखर सम्मेलन

SAARC का द्वितीय शिखर सम्मेलन 16-17 नवम्बर, 1986 को बंगलौर (भारत) में हुआ। यह सम्मेलन दो दिन तक चला और इसमें सभी सदस्य देशों ने विभिन्न समस्याओं व सहयोग के क्षेत्रों पर व्यापक विचार विमर्श करके सांझी योजनाएं व नीतियां बनाने का समर्थन किया। इस सम्मेलन में भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी ने किया। उन्होंने बंगलादेश के राष्ट्रपति इरशाद से SAARC का अध्यक्ष पद भी प्राप्त किया। इसमें बांग्लादेश के अनुभवी कूटनीतिज्ञ अबुल हसल को सार्क का महासचिव नियुक्त किया गया। इसमें विकासशील गतिविधियों में स्त्रियों के सहयोग पर तथा मादक पदार्थों के प्रयोग को बन्द करने के लिए एक तकनीकी समिति के निर्माण का निर्णय हुआ। इसमें सहयोग के नए क्षेत्रों रेडियो-दूरदर्शन कार्यक्रम, पर्यटन, शिक्षा व आपदा प्रबन्ध पर अध्ययन को शामिल किया गया। इसमें दक्षिण एशिया को आतंकवाद से मुक्त करने पर भी आपसी समझौता करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यद्यपि इस सम्मेलन में पाकिस्तान ने द्विपक्षीय मुद्दे उठाकर माहौल को खराब करने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। 

जब भारत ने दक्षिण एशिया में एक सांझा बाजार (Common Market) स्थापित करने की बात कही तो पाकिस्तान ने इसका विरोध किया। पाकिस्तान भारत की बड़ी आर्थिक भागेदारी से चिन्तित था। इस सम्मेलन में विकासशील देशों पर बढ़ते ऋणों के भार पर भी चिन्ता प्रकट की गई। इसमें NIEO की मांग भी दोहराई गई तथा परमाणु नि:शस्त्रीकरण पर काफी जोर दिया गया। इस प्रकार SAARC का द्वितीय शिखर सम्मेलन एक ऐतिहासिक यादगार बन गया।

3. तीसरा शिखर सम्मेलन

SAARC का तीसरा शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1987 में नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में आतंकवाद निरोधक समझौता किया गया जिसमें प्रत्येक सार्क देश को किसी अन्य देश में आतंकवादी गतिविधियां संचालित न करने की बात कही गई। इसमें आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति को अपने-अपने देशों में राजनीतिक शरण न देने पर सहमति हुई। नेपाल नरेश ने सार्क की मूल भावना सहयोग व आपसी सौहार्द को मजबूत बनाने का आव्हान किया। इसमें भारत के सहयोग को भी सराहा गया। भारत ने इस सम्मेलन में केन्द्रीय आर्थिक क्षेत्रों जैसे - व्यापार, उद्योग, शक्ति तथा वातावरण में सहयोग देने का विचार रखा लेकिन उसे पूर्ण समर्थन न मिलने के कारण घोषणा पत्र में शामिल नहीं किया गया। 

भारत ने अफगानिस्तान को सार्क का सदस्य बनाने पर अपनी सहमति प्रकट की तथा पाकिस्तान ने ‘दक्षिण-एशियाई परमाणु विहीन क्षेत्र‘ की बात कही। इन प्रस्तावों को भी अन्तिम घोषणा पत्र में स्थान नहीं मिल सका। इस सम्मेलन में दक्षिण एशिया संरक्षित खाद्यान्न भंडार समझौता भी हुआ ताकि इस क्षेत्र में खाद्यान्न की कमी या अकाल की स्थिति में उसका सामना किया जा सके।

4. चौथा शिखर सम्मेलन

सार्क का चौथा शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1988 में इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बेनजीर भुट्टो ने की। इस सम्मेलन में सार्क के सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्धता को दोहराया गया। 31 दिसम्बर को जारी इस्लामाबाद घोषणापत्र में मादक पदार्थों के उत्पादन, तस्करी व दुरुपयोग पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गई और 1989 को ‘मादक पदार्थों के दुरुपयोग के विरुद्ध सार्क वर्ष’ घोषित करने का निर्णय लिया गया। इस सम्मेलन में सार्क के शासनाध्यक्षों ने इस शताब्दी के अन्त तक खाद्यान्न, वस्त्र, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण व पर्यावरण संरक्षण पर एक सामूहिक कार्य योजना बनाने का निश्चय किया गया जिसे “सार्क-2000 बुनियादी आवश्यकता परियोजना’ के नाम से जाना जाता है। 

इस सम्मेलन में दक्षिण एशियाई उत्सवों को समय-समय पर आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसमें ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ तथा दक्षिण एशिया पर इसके प्रभावों के अध्ययन को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने पर भी निर्णय हुआ। इसमें काठमाण्डू घोषणापत्र के प्रावधानों को भी दोहराया गया।

5. पांचवां शिखर सम्मेलन

सार्क का पांचवां शिंखर सम्मेलन मालद्वीव की राजधानी माले में (नवम्बर, 1990) हुआ। इसमें भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर ने किया। उन्होंने सार्क क्षेत्र को शान्ति क्षेत्र घोषित करने पर बल दिया। सम्मेलन के घोषणापत्र में आर्थिक क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने तथा जन संचार माध्यम, जैविक तकनीकी और पर्यावरण को आर्थिक मुद्दों में शामिल करने पर सहमति की बात स्वीकार की गई। इसमें मादक पदार्थों के गैर कानूनी व्यापार, मादक पदार्थों की तस्करी तथा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध गहरी चिन्ता प्रकट की गई। इसमें यह भी निर्णय लिया गया कि सार्क का अगला सम्मेलन श्रीलंका में होगा। 

इस सम्मेलन में 1991 को सार्क आवास वर्ष, 1992 को ‘सार्क पर्यावरण वर्ष’ तथा 1993 को ‘सार्क अपंग व्यक्ति वर्ष’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।

6. छठा शिखर सम्मेलन

सार्क का छठा शिखर सम्मेलन 21 दिसम्बर, 1991 को कोलम्बो (श्रीलंका) में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने किया। इस सम्मेलन में क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसमें आतंकवाद, की निंदा करने, नि:शस्त्रीकरण का स्वागत करने, गरीबी निवारण हेतु दक्षिण-एशियाई समिति का गठन करने तथा सार्क देशों में प्राथमिक शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार करने पर जोर दिया गया। 

7. सातवां शिखर सम्मेलन

सार्क का सातवां शिखर सम्मेलन बंगला देश की राजधानी ढाका में 11-13 अप्रैल, 1993 को आयोजित हुआ। इसमें सभी सदस्य देशों ने भाग लिया। इसमें भारत की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने की। इसमें अंत:क्षेत्रीय व्यापार के उदारीकरण के लिए एक समझौता (SAPTA) किया गया। इसमें व्यापार वस्तु, निर्माण और सेवाएं, पर्यावरण, जनसंख्या, आवास, बच्चों, अपंग व्यक्तियों, स्त्री विकास, प्रौद्योगिकी, आतंकवाद, मादक पदार्थों का व्यापार आदि के सम्बन्ध में सार्क घोषणा पत्र में संगठित कार्य योजना को भी स्वीकार किया गया। 

इसमें सार्क को मजबूत बनाने के निश्चय को भी दोहराया गया तथा अगला सार्क सम्मेलन भारत में आयोजित करने की घोषणा की गई।

8. आठवां शिखर सम्मेलन

सार्क का आठवा शिखर सम्मेलन 3-4 मई, 1995 को भारत की राजधानी नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। इसमें सभी देशों के शासनाध्यक्षों ने भाग लिया। इसके घोषणापत्र में सभी देशों द्वारा गरीबी और आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करने का आव्हान किया गया। इसमें SAPTA समझौता लागू करने का भी निश्चय किया गया। इस सम्मेलन में आतंकवाद के बढ़ते प्रभाव तथा परमाणु शस्त्रों की बढ़ती होड़ पर नियंत्रण करने की मांग की गई। 

इसमें वर्ष 1995 को गरीबी समाप्ति का वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इसमें सार्क को अधिक उपयोगी संस्था के रूप में विकसित करने पर भी विचार-विमर्श हुआ।

9. नौवां शिखर सम्मेलन

सार्क देशों का नौवां शिखर सम्मेलन मई, 1997 में मालद्वीव की राजधानी माले में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में भारत की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री इन्द्र कुमार गुजराल ने की। इसमें सभी सदस्य देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में भारत ने दक्षिण एशियाई आर्थिक समुदाय के गठन का आव्हान भी किया। इसमें दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) की 2001 में स्थापना के लिए प्रयासों को तेज करने की घोषणा की गई। इसमें गरीबी उन्मूलन व स्त्रियों की खरीद-फरोख्त पर भी व्यापक विचार विमर्श हुआ। 

माले घोषणा पत्र में अगला सम्मेलन श्रीलंका में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् का विस्तार करने का भी आहवान किया गया। इसमें इस क्षेत्र से वीजा अवरोधक समाप्त करने व शरणार्थी कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया। इसमें आतंकवाद को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। 

इसमें सार्क देशों के बीच आवागमन, पर्यटन तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का भी संकल्प लिया गया।

10. दसवां शिखर सम्मेलन

सार्क का दसवां शिखर सम्मेलन 29 जुलाई 1998 को श्रीलंका की राजधानी कोलम्बों में आयोजित हुआ। इसमें भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। इसमें भारत ने सम्पूर्ण नि:शस्त्रीकरण की बात कही। इसके घोषणापत्र में सार्क देशों की एकीकृत कार्य योजना पर बल दिया गया। 

इसमें आर्थिक विकास के लिए सांझे आर्थिक कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसमें आतंकवाद पर नियंत्रण तस्करी पर रोक, स्वास्थ्य, जनसंख्या, महिला व बाल कल्याण योजनाओं पर बल तथा पर्यावरण सुरक्षा को महत्व दिया गया। इसमें भारत की तरफ से 2000 वस्तुओं के तटकर को कम करने की घोषणा की गई। 

इसमें सदस्य देशों को विज्ञान व तकनीकी सहयोग में वृद्धि करने की आवश्यकता पर बल दिया गया तथा SAFTA की 2001 तक स्थापना करने का निर्णय लिया गया।

11. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय संगठन का ग्यारहवां शिखर सम्मेलन

सार्क का 11वां शिखर सम्मेलन काफी लम्बे समय बाद जनवरी, 2002 को नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में हुआ। यह सम्मेलन उस वातावरण में हुआ जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के आसार थे। पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में अपने द्विपक्षीय मुद्दों को उठाने का प्रयास किया लेकिन उसे असफलता का मुंह देखना पड़ा। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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