अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सिद्धांत एवं उपागम

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आदर्शवादी उपागम

फ्रांसी क्रांति (1789) व अमेरिकी क्रान्ति (1776) को आदर्शवादी दृष्टिकोण की प्रेरणा माना गया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कौण्डरसैट के ग्रंथ की 1795 में विश्व समाज की रचना को आधार माना गया है। इसके प्रमुख समर्थक रहे हैं - कौण्डरसैट, वुडरो विल्सन, बटन फिल्ड, बनार्ड रसल आदि। इनके द्वारा एक आदर्श विश्व की रचना की गई है जो अहिंसा व नैतिक आधारों पर आधारित होगा व युद्धों को त्याग देगा। इस दृष्टिकोण की मूल मान्यताएँ हैं-
  1. मानव स्वभाव जन्म से ही बहुत अच्छा व सहयोगी प्रवृत्ति का रहा है।
  2. मानव द्वारा दूसरों की मदद करने एवं कल्याण की भावना ने ही विकास को सम्भव बनाया है।
  3. मानव स्वभाव में विकार व्यक्तियों के कारण नहीं बल्कि बुरी संस्थाओं के विकास के कारण आता है। मानव युद्ध की ओर भी इन संस्थाओं के कारण प्रेरित होता है।
  4. युद्ध अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे खराब विशेषता है।
  5. युद्धों को रोकना असम्भव नहीं है, अपितु संस्थागत सुधारों के माध्यम से ऐसा करना सम्भव है।
  6. युद्ध एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है, अत: इसका हल भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही खोजना होगा, स्थानीय स्तर पर नहीं।
  7. समाज को अपने आप को इस प्रकार से संगठित रखना चाहिए कि युद्धों को रोका जा सके।
इस दृष्टिकोण की विशेषताएं स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं-
  1. इस दृष्टिकोण के अंतर्गत नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है। अत: यह मानती है कि राज्यों के मध्य अच्छे संबंधों हेतु शक्ति की नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों की आवश्यकता होती है। इसके अंतर्गत राज्यों के बीच भेदभाव समाप्त होंगे तथा परस्पर सहयोग का विकास होगा।
  2. इसके अंतर्गत वर्तमान शक्ति व प्रतिस्पर्धा पर आधारित विश्व संस्था को छोड़कर एक शान्ति व नैतिकता पर आधारित विश्व सरकार बनानी चाहिए। इसमें संघात्मकता व नैतिक मूल्यों के आधार पर विश्व सरकार का गठन कर शक्ति की राजनीति को समाप्त करना चाहिए।
  3. इसके अंतर्गत यह माना गया है कि युद्धों को कानून द्वारा रोका जा सकता है। कई अच्छे कानूनों द्वारा युद्ध करने सम्भावनाओं को कानूनी रूप से अवैध घोषित किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन द्वारा किसी भी प्रकार के युद्धों के संकट से बचा जा सकता है।
  4. इस दृष्टिकोण के द्वारा हथियारों की हौड़ को समाप्त करने की बात कही गई है। उनका मानना है कि हथियारों का होना भी युद्धों की प्रवृत्तियों को जन्म देने में सहायक होता है। इसके अंतर्गत भावी हथियारों के साथ-साथ वर्तमान हथियारों की व्यवस्था को घटाकर अंतत: समाप्त करने की बात कही गयी है।
  5. इस दृष्टिकोण में किसी भी प्रकार की निरंकुश प्रवृत्तियों पर रोक लगाने की बात पर बल दिया गया है। आदर्शवादियों का मानना है कि टकराव हमेशा निरंकुशवादियों एवं प्रजातांत्रिक पद्धति में विश्वास रखने वालों के बीच होता है।
  6. आदर्शवादियों का मानना है कि शान्तिपूर्ण विश्व की स्थापना हेतु राजनैतिक के साथ-साथ आर्थिक विश्व व्यवस्था को भी बदलना होगा। इस सन्दर्भ में राज्यों को आत्मनिर्णय के सिद्धान्त के साथ आर्थिक स्वतन्त्रता भी प्राप्त होती है।
  7. इस दृष्टिकोण के अंतर्गत एक आदर्श विश्व की कल्पना की गई है जिसमें हिंसा, शक्ति, संघर्ष आदि का कोई स्थान नहीं होगा।
  8. इस दृष्टिकोण के अंतर्गत राज्य किसी शक्ति अथवा युद्धों की देन नहीं है, बल्कि राज्य का क्रमिक विकास हुआ है। यह विकास धीरे-धीरे मानव कल्याण व सहयोग पर आधारित है।
आदर्शवादी सिद्धान्त की कुछ बिन्दुओं को लेकर आलोचना भी की गई है जो इस प्रकार से है-
  1. सर्वप्रथम यह सिद्धान्त कल्पना पर आधारित है जिसका राष्ट्रों की वास्तविक राजनीति से कोई लेन देन नहीं होता। इस काल्पनिक विश्व के आधार पर यह मान लेना कि सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है गलत होगा।
  2. इस उपागम में नैतिकता पर जरूरत से अधिक बल दिया गया है। यह सत्य है कि नैतिकता का समाज में अपना महत्व है, परन्तु राष्ट्रों के मध्य राष्ट्रीय हितों के संघर्ष में शक्ति व कानून दोनों का विशेष स्थान होता है। बिना कानूनी व्यवस्था के राष्ट्रों को एक विश्व में बांधना बड़ा कठिन है। तथा वास्तविकता की धरातल पर शक्ति के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
  3. अंतरराष्ट्रीय राजनीति कोरी आदर्शवादिता पर भी नहीं चलाई जा सकती। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सम्यक अध्ययन हेतु शक्ति, युद्ध आदि वास्तविक तत्वों को अपनाना अपरिहार्य है। इन मूल यथार्थ प्रेरणाओं की उपेक्षा के कारण ही आदर्शवादी दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषण में विशेष सहायक नहीं रहा है। राष्ट्र संघ की असफलता इसका प्रत्यक्ष परिणाम है।
  4. आदर्शवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघात्मक व्यवस्था अथवा विश्व सरकार बनने की सम्भावनाएं बहुत कम प्रतीत होती है। इसका सबसे बड़ा कारण राष्ट्रों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों हेतु अडिग रवैय्या अपनाना रहा है। आज के इस युग में कोई भी राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करना चाहता तथा न ही वह अपने राष्ट्रीय हितों के एवज में किसी अन्य राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु तैयार है।
यद्यपि इस उपागम में कई कमियाँ अवश्य है, परन्तु यह सत्य है कि नैतिकता व्यक्ति, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु लाभकारी होती है। यद्यपि वर्तमान स्वार्थी हितों की पूर्ति के सन्दर्भ में इसे लागू करना अति कठिन है, परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति हेतु अहितकर है।

यथार्थवादी उपागम

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु यथार्थवाद का सिद्धान्त अति महत्वपूर्ण है। यह आदर्शवादी उपागम के बिल्कुल विपरीत वास्तविकता के धरातल पर रह कर कार्य करता है। 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में यथार्थवाद का महत्व रहा है। उसके बाद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह फिर अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया। इसके मुख्य समर्थकों में मारगेन्थाऊ, ई.एच.कार, राइनॉल्ड नेबर, जार्ज केनन, केनेथ डब्ल्यू, थामप्सन, हेनरी किंसीजर आदि है।
इस उपागम की मुख्य विशेषताएं हैं-
  1. यह दृष्टिकोण तर्क एवं अनुभव पर आधारित है। इसमें नैतिकता तथा गैर-तार्किक तथ्यों को स्वीकार नहीं किया है।
  2. यह सिद्धान्त शक्ति को अत्यधिक महत्व प्रदान करता है। तथा इसका मानना है कि राज्य हमेशा शक्ति हेतु संघर्षरत रहते हैं।
  3. इस उपागम का मानना है कि शक्ति के माध्यम से राज्य हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति में लीन रहते हैं। इसीलिए वे हमेशा अपने हितों का ही ध्यान रखते हैं, अन्य राष्ट्रों का नहीं।
  4. यथार्थवादी इस शक्ति संघर्ष से निपटने हेतु मुख्यत: शक्ति संतुलन के तरीके का प्रयोग करते हैं। शक्ति स्पर्धा को सुचारू रखने हेतु इस प्रकार के तरीके को अपनाना अनिवार्य हो जाता है।
  5. यह उपागम काल्पनिकता की बजाय हमेशा वास्तविकता में विश्वास करता है।
  6. इस दृष्टिकोण के अंतर्गत राष्ट्रीय हितों के बीच संघर्ष को टालने हेतु सभी राष्ट्रों के बीच के मध्य संतुलन स्थापित करने पर बल दिया जाता था।
  7. इसके अंतर्गत प्रत्येक राष्ट्र के लिए हित ही सर्वोपरि होते हैं तथा सभी राष्ट्र इन्हीं हितों की पूर्ति हेतु हमेशा संघर्षरत रहते हैं।
  8. इस उपागम के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन को अत्याधिक वैज्ञानिक एवं तर्कशील बनाने के प्रयास किए गए हैं।
यथार्थवाद की इन विशेषताओं को अलग-अलग विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। ना ही सभी विद्वान इन सभी बातों का उल्लेख करते है। तथा न ही ऐसी कोई सर्वसम्मति ही है। अपितु उपरोक्त विशेषताएं कुल मिलाकर विभिन्न यथार्थवादी समर्थकों के विचारों का सार है। परन्तु यथार्थवाद के एक सुस्पष्ट उपागम के रूप में स्थापित करने का कार्य मारगेन्थाऊ (पॉलिटिक्स अमंग नेशंज) ने किया है। उसके अनुसार यथार्थवादी दृष्टिकोण छ: प्रमुख सिद्धान्तों पर आधारित है-
  1. राजनीति को प्रभावित करने वाले सभी वस्तुनिष्ठ नियमों का जड़ मानव प्रकृति है। मारगेन्थाऊ का मत है कि मानव प्रकृति, जिसमें राजनीति के नियम सन्निहित है, प्राचीन काल से आज तक मूल रूप से नहीं बदली है। अत: इस मानव प्रकृति के अध्ययन के आधार पर कुछ वस्तुनिष्ठ सिद्धान्तों का प्रतिवादन किया जा सकता है। यथार्थवाद के अनुसार उदाहरण स्वरूप यदि विदेश नीति का सही आकलन करना है तो हमें सर्वप्रथम अपने आपको उस राजनीतिज्ञ की जगह रखकर सोचना होगा जिसने कोई निर्णय लिया है। इसके समक्ष उपस्थित उन सभी निर्णयों के विकल्पों को जांचना होगा जिन्होंने सम्भावित रूप से उन निर्णयों को प्रभावित किया होगा। इस प्रकार की विवेकपूर्ण व तर्क संगत कल्पना से हम वस्तुनिष्ठ स्थिति एवं सत्य के अधिक नजदीक होंगे तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति हेतु एक वस्तुनिष्ठ सिद्धान्त का निर्माण कर सकेंगे।
  2. यथार्थवाद राष्ट्रीय हित को महत्वपूर्ण मानता है तथा राष्ट्रीय हितों की शक्ति के सन्दर्भ में परिभाषित करता है। उसका मानना है कि राजनीति का मुख्य आधार राष्ट्रीय हित एवं उसकी सुरक्षा है, इसीलिए राजनीति को शक्ति से अलग रखकर नहीं समझा जा सकता। मारगेन्थाऊ का मानना है कि राष्ट्रहित की प्रधानता के कारण किसी देश की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य अन्य राष्ट्रों की तुलना में सफलता प्रदान करना रहा है। यही कारण है कि विदेश नीति की सफलता को प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रहितों में संवर्धन से जोड़ा जाता है। इसीलिए राजनेताओं के मंतव्यों और प्रयोजनों पर आधारित विदेश नीति का आकलन हो सकता है। लेकिन मारगेन्थाऊ यह भी सचेत करता है कि इस सन्दर्भ में हमें राजनेताओं की ‘नीयत’ व ‘विचारों’ की प्राथमिकताओं से सुरक्षा प्रदान करने की भ्रांतियों से भी बचना चाहिए। इसके साथ-साथ राजनेताओं के ‘व्यक्तिगत विचार’ एवं ‘राजनैतिक उत्तरदायित्व’ को भी हमें अलग-अलग रखना पड़ेगा।
  3. मारगेन्थाऊ का मानना है कि राष्ट्रहित का कोई निश्चित या निर्धारित अर्थ नहीं होता। मारगेन्थाऊ के अनुसार शक्ति व राष्ट्रीय हित दोनों ही गतिशील होते हैं। इनके परिवर्तन में अंतरराष्ट्रीय परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यदि परिवेश बदल जाता है तो उसके अनुरूप हितों में परिवर्तन आना अनिवार्य हो जाता है। अत: शक्ति के रूप में परिभाषित हित भी बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मूल तत्व शाश्वत हैं, परन्तु परिस्थितियाँ थोड़ी बहुत बदलती रहती हैं। अत: एक सफल राजनेता को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मूल तत्वों को बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार निरूपित करने का सतत प्रयास जारी रखना चाहिए।
  4. यथार्थवादी मानते हैं कि राज्यों के कार्यों में कोई सार्वभौमिक नैतिकता का पालन नहीं हो सकता। नैतिकता का महत्व है परन्तु वह अमूर्त व सार्वभौमिक नहीं हो सकती। इसके विपरीत इसे समय व स्थान की ठोस परिस्थितियों की कसौटी से बंधा होना चाहिए और परिस्थितियों के अनुकूल उसका चयन करना चाहिए। इनके अनुसार नैतिक सिद्धान्तों का पालन विवेक और सम्भावित परिणामों के आधार पर होना चाहिए। बिना विवेक के राजनैतिक नैतिकता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसीलिए कोई भी राष्ट्र नैतिकता के आधार पर अपनी सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल सकता।
  5. किसी भी राष्ट्र के नैतिक मूल्य सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों से भिन्न होते हैं। किसी सार्वभौमिक नैतिक कानून का पालन एक देश-विशेष के लिए आवश्यक रूप से लाभदायक हो ही, यह सत्य नहीं है। सम्भव है वह उसके लिए भयंकर परिणाम पैदा कर दें। अत: नैतिक सिद्धान्तों की रक्षा के लिए अपने देश के हितों को बलिदान कर देने वाला व्यक्ति राजनैतिक दृष्टि से बुद्धिमान नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नैतिकता को तिलांजलि देना इतिहासकारों की नजर में प्रशंसनीय कार्य नहीं है। इन दोनों प्रकार की अतियों के संदर्भ में इन दोनों ही परिस्थितियों से बचना चाहिए। अत: प्रत्येक राष्ट्र को अपने राष्ट्रीय हित की दिशा में अग्रसर होना पड़ेगा। अत: किसी भी एक राष्ट्र का मूल्य सार्वभौमिक नैतिक मूल्य नहीं हो सकता।
  6. अन्तिम सिद्धान्त में मारगेन्थाऊ ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को स्वायत विषय के रूप में अध्ययन करने हेतु बल दिया है। उसका मानना है कि जिस प्रकार अर्थशास्त्र में हित आर्थिक कारणों के कारण होते हैं उसी प्रकार राजनीति में राष्ट्रीय हित शक्ति पर आधारित होते हैं। उनका मानना है कि बौद्धिक रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर स्वतन्त्र क्षेत्र है, जैसे अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि। राजनैतिक यथार्थवाद मानव-प्रकृति के बाहुल्य स्वरूप को मानता है। उदाहरण स्वरूप एक व्यक्ति एक समय में आर्थिक मानव, राजनैतिक मानव, नैतिक मानव, धार्मिक मानव आदि कई प्रकार के उत्तरदायित्व निभाता है। यदि उसके इन सभी स्वरूप का गहन अध्ययन करना चाहे, तो उसके अन्य स्वरूपों को हमें परस्पर अलग रखना होगा क्योंकि तभी यह अध्ययन सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो सकेगा। राजनैतिक अध्ययन में मानव प्रकृति के अन्य स्वरूपों का स्थान अति गौण है और यही कारण है कि राजनैतिक यथार्थवाद में राजनीति की स्वतन्त्रता पर अत्याधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार से राजनीति के विभिन्न स्वरूप होते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति उसमें से एक है। अत: हमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गहन व सुव्यवस्थित रूप में अध्ययन करने हेतु इसे स्वायत्त रूप में अध्ययन करना चाहिए।
यथार्थवाद के सामान्य सिद्धान्तों एवं मारगेन्थाऊ द्वारा प्रतिपादित उपागम की इन आधारों पर आलोचनाएं भी की गई हैं-
  1. यथार्थवादी उपागम की सर्वप्रथम आलोचना इस आधार पर की गई है कि इसमें शक्ति को जरूरत से ज्यादा बल दिया गया है जो उचित नहीं है। राष्ट्रीय हितों को सुचारू रखने या प्राप्त करने हेतु बहुमुखी कारक कार्यरत होते हैं। मात्र शक्ति को ही कारण मानना सही नहीं है। इसके अतिरिक्त, यदि यह मान लिया जाए कि राज्य हमेशा शक्ति संघर्ष में ही व्यस्त रहते हैं तो विश्व व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। वास्तविक रूप में राज्य के मध्य संघर्षों के साथ-साथ सहयोग भी विकसित होता है। इस उपागम के शक्ति को ही साध्य मान लिया गया है, यह अनुचित है। क्योंकि शक्ति तो मात्र साधन है राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु। अत: यह अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता।
  2. यथार्थवादी उपागम की मानव प्रकृति के सन्दर्भ में अवधारणा भी गलत है। इसके आधार पर मनुष्य को हमेशा संघर्षरत माना गया है जबकि मानव प्रकृति का यह एकांगी पक्ष है। उसका दूसरा पहलू सहयोग का भी है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हमेशा निर्णय मानव प्रकृति द्वारा ही निर्धारित नहीं होते। निर्णायकों की भूमिका महत्वपूर्ण तो होती है लेकिन सभी सन्दर्भ में उस समय की परिस्थितयां व समय अति महत्वपूर्ण कारक की भूमिका निभाते हैं। इसीलिए अलग-अलग परिस्थितियों में निर्णय लेने वाले वही निर्णायक अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।
  3. राष्ट्रीय हित के संदर्भ में भी मारगेन्थाऊ का आकलन दोषपूर्ण है। उसके अनुसार राष्ट्रीय हित के बारे में सर्वसम्मति है कि राष्ट्रीय हित हमेशा शक्ति के सन्दर्भ में ही परिभाषित होते है। लेकिन इस बारे में प्राचीन समय में शायद सर्वसम्मति रही हों लेकिन वर्तमान समय में यह मानना उचित नही है। वर्तमान में यह विरोधों एवं अंतर्विरोधों से परिपूर्ण है। भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक साधनों, औद्योगिक क्षमताओं तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में परिवर्तनों के कारण हमारी पूर्व मान्यताओं में काफी बदलाव आ चुका है। इन परिवर्तित परिस्थितियों एवं मान्यताओं के सन्दर्भ में यह विचार सर्वथा दोषपूर्ण है कि राष्ट्रीय हितों पर राज्यों में सर्वसम्मति मिलती है।
  4. यथार्थवाद के उपागम के विरोधभाव भी स्पष्ट रूप में प्रतीत होते हैं। मारगेन्थाऊ अपने दृष्टिकोण के प्रारम्भ में मनुष्य को स्वार्थी तथा राज्यों को शक्ति के माध्यम से राष्ट्रीय हितों की पूर्ति में लगे हुए पाता है। लेकिन अपनी पुस्तक में अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वह मानते लगा कि राजनय ही सबसे उचित रास्ता है। लेकिन अच्छे राजनय हेतु अच्छे राजनीतिज्ञ की आवश्यकता है तथा उसके अनुसार राजनीतिज्ञ हमेशा स्वाथ्र्ाी हितों की पूर्ति में लगाया रहेगा। इस प्रकार मारगेन्थाऊ के विचारों में यह विरोधाभाव स्पष्ट रूप से प्रकट हो रहा है।
  5. मारगेन्थाऊ के उपागम में शक्ति/राजनीति कारकों के अतिरिक्त अन्य सभी कारकों की अवहेलना की गई है। इसके अनुसार तो उदाहरणस्वरूप यदि कोई सम्बन्ध जो शक्ति से नहीं जुड़ा वह राजनैतिक संबंध नहीं है। परन्तु अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि सभी आयाम है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इससे जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त, मारगेन्थाऊ इस बात में भी सफल नही रहे कि राजनैतिक गतिविधियों को गैर-राजनैतिक गतिविधियों से अलग किया जा सके।
उपरोक्त कमियों के बाद भी यह उपागम निरर्थक नहीं है। यह वास्तविक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को समझने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त, यह अन्य उपागमों से उचित संतुष्ट एवं वैज्ञानिक है। तीसरा यह आदर्शवाद एवं वर्तमान वैज्ञानिक सिद्धान्तों के स्थापना के बीच एक सेतु का काम कर रहा है। अत: भले ही इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सामान्य सिद्धान्त के रूप में भले ही स्वीकार न करें, परन्तु एक पक्षीय सिद्धान्त के रूप में भले ही स्वीकार न करें, परन्तु एक पक्षीय सिद्धान्त के रूप में इसी स्वीकार न करना, मागेन्थाऊ के प्रति अन्याय होगा।

व्यवस्था परक उपागम

‘व्यवस्था’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1920 के दशक में लुडविग वॉन बर्टलेन्फी ने जीव विज्ञान में किया। उसका मुख्य अभिप्राय सभी विज्ञानों को जोड़ना रहा था। जीव विज्ञान से यह अवधारणा मानव विज्ञान, समाजशास्त्र व मनोविज्ञान में प्रयोग होने लगी। समाजशास्त्र से इसे राजनीति शास्त्र में अपनाया गया। इस विषय में राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु डेविड ईस्टन एवं गेबीरियाल आमण्ड ने प्रयोग किया तथा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में मार्टन कापलान ने किया। अत: इस सिद्धान्त को प्रमुख रूप से राजनीति शास्त्र में व्यवहारवाद के फलस्वरूप विकसित हुआ माना जा सकता है।

इस उपागम से पूर्व यह जानना अति आवश्यक है कि यहां इस अवधारणा का क्या अर्थ लिया गया है। यद्यपि विभिन्न विद्वानों में इस पर सर्वसम्मति नहीं है, तथापि मुख्य रूप से व्यवस्था से अभिप्राय राष्ट्र राज्यों का वह समुच्चय है जो नियमित एवं अनवरत रूप से अन्त: क्रिया करते रहते हैं। इस प्रकार यह अवधारणा गतिशील होने के साथ साथ राष्ट्र राज्यों के व्यवहार के अध्ययन पर बल देते हैं। यह माना जाता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई भी परिवर्तन राष्ट्र राज्यों में आये बदलाव के कारण ही होता है, चाहे उनके व्यवहार में परिवर्तन का कारण कोई भी हो। व्यवस्थापरक उपागम द्वारा इन परिवर्तनों को समझने के प्रयास किए जाते हैं। अत: इस दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य अतीत एवं वर्तमान के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भावी स्वरूप को उजागर करता है।

इस दृष्टिकोण के समर्थकों में मुख्यत: जेम्स एन. रोजनाऊ, कैनेथ वाल्टज, चार्लज मेक्ललैंड, कैनेथ बोल्डिंग, जार्ज लिस्का, आर्थर ली बन्र्स आदि के नाम सम्मिलित हैं। लेकिन इस अवधारणा को सुस्पष्ट उपागम दृष्टिकोण का स्वरूप मॉर्टन काप्लान ने प्रदान किया। अत: व्यवस्था उपागम को सामान्यतया काप्लान के नाम से ही जाना जाता है।

कॉप्लान के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अति महत्वपूर्ण है। परन्तु वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को राजनीतिक व्यवस्था नहीं मानता क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में निर्णयकर्ताओं की भूमिका राष्ट्रीय व्यवस्था में उनके द्वारा निर्वाह की जाने वाली भूमिका के अधीनस्थ होती है। फलत: अंतरराष्ट्रीय मामलों के क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का व्यवहार सदा राष्ट्रीय हित के मौलिक विचार से प्रेरित होता है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दो प्रकार के अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का समुच्चय होता है - (i) राष्ट्रीय कार्यकर्ता (भारत, अमेरिका, नेपाल, रूस आदि); तथा (ii) अधिराष्ट्रीय कार्यकर्ता (नाटो, आशियान, यूरोपीय संघ आदि)। कॉप्लान के अनुसार अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ता अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अवयव हैं तथा अंतरराष्ट्रीय कार्यवाही उन्हीं के बीच में होती है। इन मान्यताओं पर आधारित कॉप्लान ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को छ: प्रतिमानों की कल्पना की है जो  है -

शक्ति संतुलन व्यवस्था - 

कॉप्लान का मानना है कि प्रथम प्रतिमान शक्ति संतुलन व्यवस्था थी जो 18वीं व 19वीं शताब्दी में प्रचलित रही। इस व्यवस्था के अंतर्गत 4-5 बड़ी शक्तियों व बाकी अन्य राज्यों का होना आवश्यक है। शक्ति संचालन हेतु छ: महत्वपूर्ण नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है - (i) प्रत्येक मुख्य राष्ट्र अपनी क्षमताओं का विकास राजनय के माध्यम से करे, युद्ध के द्वारा नहीं; (ii) प्रत्येक राष्ट्रीय राज्य का प्रमुख कर्तव्य अपने हितों की सुरक्षा है और क्षमताओं के विकास के बिना हितों की सुरक्षा सम्भव नहीं है। अत: आवश्यकता हो तो युद्ध के खतरे को उठाकर अपनी शक्ति को बढ़ाया जाए। (iii) युद्ध की अवस्था में मुख्य शत्रु राज्य का सर्वनाश करने की अपेक्षा युद्ध रोका जाए। (iv) राष्ट्रों के किसी ऐसे गुट के निर्माण का विरोध करना जो व्यवस्था में प्रभुत्व अपना आधिपत्य की स्थिति ग्रहण कर ले। ;अद्ध किसी शक्ति अथवा राष्ट्र को अथवा अन्य राज्यों को राष्ट्रोपरि सिद्धान्तों पर चलने से रोकना; (vi) किसी मुख्य पराजित राष्ट्र को व्यवस्था में पुन: शामिल कर लेना।

इस प्रकार यह शक्ति संतुलन का सिद्धान्त 18वीं व 19वीं शताब्दी में तो कारगर रहा, परन्तु 20वीं शताब्दी के परिवर्तित परिवेश में यह नहीं दिखाई पड़ा। इस प्रकार के व्यवस्था में यदि कोई प्रमुख कार्यकर्ता किसी भी रूप में अंतरराष्ट्रीय या अधिराष्ट्रीय निरंकुशता स्थापित करना चाहेगा तो शक्ति संतुलन का सिद्धान्त बदल जायेगा क्योंकि यह विशेष राष्ट्रवाद के मूल्यों का विरोधी है। अगर यह शक्ति संतुलन अस्थिर हो जायेगा तो अवश्य यह नये प्रतिमान को जन्म देगा। शक्ति संतुलन से सम्भावित बदलाव द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था को जन्म देगा।

शिथिल द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था- 

कॉप्लान के अनुसार शक्ति संतुलन के बाद शिथिल द्वि-ध्रुवीय प्रतिमान स्थापित होगा। मुख्य रूप से यह शीतयुद्ध के उन प्रारम्भिक वर्षों की है जहां दो महाशक्तियों के अतिरिक्त गुटनिरपेक्ष आन्दोलन से जुड़े कुछ छोटे राष्ट्रों का समूह भी मौजूद था। गुटनिरपेक्ष देशों के आन्दोलन के अस्तित्व ने ही तो दोनों महाशक्तियों को थोड़ा शिथिल बना दिया। यह व्यवस्था कई अर्थों में शक्ति संतुलन सिद्धान्त से अलग थी-
  1. इसमें राष्ट्र राज्यों के साथ-साथ अधिराष्ट्रीय कारकों की भागीदारी भी थी।
  2. अधिराष्ट्रीय कार्यकर्ता भी नॉटो, वारसा पैक्ट या संयुक्त राष्ट्र जैसे कई भागों में विभक्त था।
  3. इसके अंतर्गत तीन प्रकार के सदस्य थे - दो प्रमुख गुट (पूंजीवादी एवं साम्यवादी), गैर-सदस्यी देश (गुट निरपेक्ष देश) तथा सार्वभौमिक कार्यकर्ता (संयुक्त राष्ट्र)। परन्तु इस प्रणाली में भी कई प्रकार के अन्तर्द्वद्वों का अस्तित्व था। इसीलिए कॉप्लान का मानना था कि यह दृढ द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था को जन्म देगा।

दृढ़ द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था - 

इस व्यवस्था में दो प्रमुख गुटों का ही अस्तित्व होगा। व्यवस्था केवल इन गुटों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। इस व्यवस्था में गैर-सदस्य कार्यकर्ता (गुटनिरपेक्ष देश) तथा विश्वव्यापी कार्यकर्त्ता (संयुक्त राष्ट्र) की भूमिका महत्त्वहीन हो जाती है या उनका लोप हो जाता है। परन्तु इस व्यवस्था के स्थायित्व की गारंटी तभी होती है जब दोनों गुटों कार्यकर्त्ता गोपनीय पद्धति से संगठित हों, अन्यथा वह व्यवस्था पुन: शिथिल कि-ध्रुवीय व्यवस्था से परिणत होने लगती हैं। इस व्यवस्था में विश्वव्यापी कार्यकर्त्ता (संयुक्त राष्ट्र) की भूमिका कमजोर होने के कारण यह दोनों गुटों की राजनीति में कोई प्रभावी मध्यस्थता भी करने में असमर्थ हो जाता है। अत: दोनों ध्रुव ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण बिन्दु बन जाते हैं।

सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था - 

शिथिल द्वि ध्रुवीय व्यवस्था में परिवर्तन के बाद अगला प्रतिमान सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का आता है। यदि शिथिल ध्रुवीय व्यवस्थ में सार्वभौमिक कार्यकर्ता (संयुक्त राष्ट्र) यदि अपने प्रभाव से अपनी स्थिति प्रबल बना लेता है तो यह स्थिति सम्भव है। इस स्थिति में सार्वभौमिक कार्यकर्ता इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के मध्य युद्धों को रोक सकता है तथा इसके साथ-साथ इन कार्यकर्ताओं को अपनी पहचान बनाने व शक्ति संग्रह की छूट भी दे सकता है। परन्तु ये राष्ट्रीय कार्यकर्ता इन शक्तियों का प्रयोग सार्वभौमिक कार्यकर्ता की छत्रछाया में ही पूर्ण करेंगे। इसके विरुद्ध कभी नहीं करेंगे। ये अपनी शक्ति का प्रयोग शान्तिपूर्ण रूप से करेंगे। इस स्थिति में इनके राष्ट्रीय हित व सार्वभौमिक हितों के मध्य भी समन्वय विकसित किया जायेगा। परन्तु सार्वभौमिक अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के पास शक्ति प्रधानता की सम्भावना नहीं रहती, अत: कॉप्लान का मानना है कि इस व्यवस्था में स्थायित्व के पूर्व लम्बे समय तक अस्थायित्वच बने रहने की सम्भावना है।

सोपानीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था - 

इस व्यवस्था का उदय तब होता है जब एक सार्वभौमिक कार्यकर्ता प्राय: पूरे विश्व को समेट लेता है और केवल एक राष्ट्र बाहर रह जाता है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक या सत्तावादी दोनों प्रकार की हो सकती है लोकतान्त्रिक सोपानीय व्यवस्था को गैर - निदेशात्मक तथा सत्तावादी सोपानीय व्यवस्था को निदेशात्मक भी कहते हैं। जब निरंकुश राज्य द्वारा की गई विश्व विजय के परिणाम स्वरूप राष्ट्रीय कार्यकर्ता का उदय होता है तो उसे निदेशात्मक या सत्तावादी सोपानीय व्यवस्था कहा जाता है। इसके विपरीत यदि लोकतान्त्रिक राज्यों में प्रचलित नियमों के अनुसार राष्ट्रीय कार्यकर्ता का उदय होता है तो उसे गैर निदेशात्मक सोपानीय व्यवस्था कहा जाता हे तुलनात्मक रूप से निदेशात्मक प्रणाली में अधिक तनाव बना रहता है। परन्तु इस व्यवस्था में प्रकार्यात्मक तत्व भौगोलिक तत्वों की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ माने जाते हैं। इस व्यवस्था में अधिक एकीकरण के कारण स्थायित्व भी बड़ी मात्रा में पाया जाता हे।

ईकाई वीटो व्यवस्था - 

कॉप्लान के अनुसार अन्तिम प्रतिमान ईकाई निषेधिकार व्यवस्था है। इसमें ऐसे घातक शस्त्रों का अस्तित्व होगा कि कोई राष्ट्र स्वयं नष्ट होने से पूर्व दूसरों को नष्ट कर देने में समर्थ हो। यह स्थिति इस प्रकार की बन जाती है कि मानो सभी राष्ट्रों को वीटो का अधिकार प्राप्त हो अथवा उनके स्वयं के निर्णय अन्तिम माने जायेंगे। इस व्यवस्था में सार्वभौमिक कार्यकर्ताओं के निर्णयों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता। कॉप्लान के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्था किसी भी प्रतिमान के फलस्वरूप पैदा हो सकती है। यह व्यवस्था तभी स्थाई/स्थिर हो सकती है जब अशान्ति या समस्याओं के समय सभी राष्ट्र सामूहिक रूप से उस राष्ट्र के विरुद्ध खड़े हो जाएण्जिसने यह गड़बड़ी फैलाई है। परन्तु जब कॉप्लान ने यह महसूस किया कि 1959 में उसके द्वारा प्रदत्त व्यवस्था उपागम में दिये गए प्रतिमान परिवर्तित अंतरराष्ट्रीय राजनीति से मेल नहीं खा रहे तो उसने चार नये प्रतिमान भी उसमें सम्मिलित कर लिए जो इस प्रकार से हैं-
  1. इस व्यवस्था में गुट कार्यकर्ताओं के मध्य हथियारों के नियंत्रण हेतु सतत शोध होते रहते हैं। विभिन्न गुटों द्वारा परस्पर हितों को जगह देने की निरन्तर कोशिशें होती रही है। फलस्वरूप गुटयी संरचना कमजोर नजर आती है। फिर भी निम्न गुटों द्वारा विश्वव्यापी संगठन के भीतर निष्पक्ष या तटस्थ कार्यकर्ताओं का समर्थन प्राप्त करने हेतु प्रतिद्विन्द्वता जारी रहती है।
  2. इस व्यवस्था के अंतर्गत दोनों प्रमुख कार्यकत्ताओं के बीच परस्पर तनाव शैथिल्य स्थापित होता रहा है। इसके अंतर्गत कुछ सीमा तक दोनों महाशक्तियों के मध्य परस्पर सहमति व्यवस्था बन जाना है। यद्यपि दोनों के बीच मतभेद आज भी बने रहें, परन्तु किसी भी प्रकार से ये मतभेद युद्ध की सीमा तक नहीं पहुंचे।
  3. इस व्यवस्था में दोनों महाशक्तियों के बीच तनावों का बढ़ जाना प्रमुख रहा है। इसी तनाव के कारण दोनों एक दूसरे के प्रति आशंकित रहते हैं। परिणाम हथियार नियंत्रण संबंधित किसी भी बात पर सहमति नहीं बन पाती। दोनों के बीच संघर्ष बढ़ते हैं तथा सार्वभौमिक कारक की भूमिका केवल दोनों शक्तियों की इच्छा तक ही मध्यस्थ तक सीमित होती है।
  4. यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें दोनो महाशक्तियों के अतिरिक्त 10-15 अन्य देशों की परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में आ जाते हैं यद्यपि छोटे परमाणु राष्ट्रों के संदर्भ में सन्धियाँ होना अश्चर्य सम्भव है।
यद्यपि कॉप्लान ने एक बहुत ही व्यापक ढांचागत उपागम प्रस्तुत किया है। इसकी सार्थकता बनाये रखने के लिए इसमें संशोधन भी प्रस्तुत किए। परन्तु शीतयुद्धोत्तर युग में हुए परिवर्तनों के कारण इस व्यवस्थापरक उपागम पर ही प्रश्न चिन्ह लग गये। इसके साथ-साथ कई अन्य कारणों से इस उपागम की आलोचनाएँ की गई हैं-
  1. सर्वप्रथम कॉप्लान के प्रतिमानों की इस आधार पर आलोचना की गई है कि उसका अंतरराष्ट्रीय राजनीति को छ: भागों (बाद में 10 भागों) में बाँटना स्वेच्छा पर आधारित था। इस प्रकार के विभाजन के पीछे किसी भी प्रकार के तर्क भी नही प्रस्तुत किए। इसीलिए न तो उसके प्रतिमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति की कसौटी पर खरे उतर सकें तथा न ही वे कोई उपयुक्त भविष्यवाणियाँ करने में सक्षम रहे।
  2. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिवर्तन एक क्रमबद्ध तरीके से नहीं हुआ जैसा काप्लान ने सोचा था। उदाहरणस्वरूप, कॉप्लान का मानना था कि द्वि ध्रुवीय व्यवस्था में पहले शिथिलता आयेगी व बाद में दृढ़ द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था आयेगी। परन्तु ऐसा नहीं हो सका। इसी प्रकार, 1991 में शीतयुद्ध की समाप्ति के उपरान्त सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अस्तित्व में आने के साथ पर एक ध्रुवीय व बहु ध्रुवीय व्यवस्था की स्थापना पर वाद-विवाद चल रहा है। आने वाले कुछ वर्ष तय करेंगे कि इस संक्रमण काल की परिणति एक ध्रुवीय या बहुध्रुवीय या कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में होगी। 
  3. कॉप्लान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति हेतु छ: प्रतिमानों के निरूपण करते समय उन महत्वपूर्ण तत्वों की भी अवहेलना की है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रों के व्यवहार को निर्धारित करते हैं। इसके अतिरिक्त, कॉप्लान ने मात्र राष्ट्रीय हित को ही एक कारण माना है, परन्तु इस दृष्टि से भी राष्ट्रीय हित को परिभाषित करना आवश्यक था, वह भी कॉप्लान ने नहीं किया।
  4. कॉप्लान द्वारा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न प्रकार के कार्यकर्ताओं की चर्चा की गयी है, जैसे - आवश्यक, लघु राष्ट्रीय आदि। परन्तु वास्तव में कौन कार्यकर्त्ता किस समय यह भूमिका किस रूप में निभा रहा है यह कहना व उसको पहचानना अति कठिन होता है।
अन्त में हम कह सकते हैं कि विभिन्न कमियों के बावजूद भी कॉप्लान का प्रयास सराहनीय है। उसके द्वारा स्थापित प्रतिमान किसी न किसी रूप में अलग-अलग समयों में प्रचलित रहे हैं। कई लेखकों ने भी इस उपागम को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आकलन करने के प्रयास किए हैं। कॉप्लान ने भी इस उपागम की सफलता हेतु कठोर परिश्रम किया है। यद्यपि पूर्ण रूप से तो नहीं पर कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वैज्ञानिक विश्लेषण हेतु सार्थक प्रयास है।

निर्णय परक उपागम

निर्णय परक उपागम राजनीति शास्त्र के अध्ययन हेतु व्यवहारवादी आंदोलन से प्रेरित है। यद्यपि विभिन्न लेखकों ने इस संदर्भ में लिखा है, परन्तु इसे उपागम के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय रिचर्ड सी स्नाइडर व उसके साथियों एच. डब्ल्यू बर्क या बर्टन सापिन को जाता है। 1954 में इन तीनों ने मिलकर लिखी पुस्तक - डिसिजन मेकिंग एज एन अप्रोच टू दा स्टडी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स - में सर्वप्रथम इसे प्रस्तुत किया गया। निर्णय परक सिद्धान्त के आकलन से पूर्व यह जान लेना चाहिए कि नीति निर्माण व निर्णय निर्माण कई सन्दर्भों में बिल्कुल अलग अवधारणाएं हैं।

निर्णय परक दृष्टिकोण का मानना है कि (i) निर्णय निर्माण का अध्ययन उसी राज्य की पृष्ठभूमि के संदर्भ में होना चाहिए जिस परिवेश का वह भाग है। (ii) इसका अध्ययन उन परिकल्पनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए जिस आधार पर निर्णय लेने वाला विश्व की पुनर्रचना करना चाहता है। इस दृष्टिकोण को विकसित करने के बारे में दो मुख्य उद्देश्य रहे हैं - (क) प्रत्येक देश के उन मार्मिक संरचनाओं का पहचानना आवश्यक है जहां परिवर्तन होते हैं, निर्णय लिए जाते हैं, कार्यवाहियां की जाती हैं आदि। (ख) निर्णय लेने वालों के व्यवहार की परिस्थितियों का सुव्यवस्थित अध्ययन किया जाना चाहिए।

इस उपागम का मुख्य विचार है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुख्य अभिकर्ता तो राष्“ट्र इही होते हैं, परन्तु अपनी इस भूमिका का प्रयोग कुछ व्यक्तियों के माध्यम से ही करता है। अत: राष्ट्रों के व्यवहार का सही आंकलन राष्ट्र के उन प्रतिनिधियों के व्यवहार द्वारा संभव हो सकता है। अत: निर्णयकर्त्तओं के व्यवहार का अध्ययन करना अति अनिवार्य है। लेकिन निर्णयकर्त्ताओं के इस व्यवहार का अध्ययन उसकी सभी परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए। इस प्रकार उस सारी प्रक्रिया का अध्ययन किया जाना चाहिए जिसके माध्यम से वह निर्णय लेने वाला गुजरता है। अत: स्नाइडर व अन्य विद्वानों का मानना है कि किसी भी निर्णय को समझने हेतु यह जानना आवश्यक है कि (i) निर्णय किसने लिया?; (ii) किन-किन बौद्धिक एवं अंत:क्रियाओं के माध्यम से वह/वे व्यक्ति इस निर्णय पर पहुंचे? स्नाइडर के अनुसार निर्णय लेने वाले मुख्य रूप से तीन बातों से प्रभावित होते हैं-
  1. सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव निर्णय लेने वाले पर समाज के आन्तरिक परिवेश का होता है। इस आन्तरिक परिवेश में जनमत के साथ साथ उसका व्यक्तित्व, भूमिकाएं, सामाजिक मूल्य, नागरिकों का चरित्र, उनकी मांगे, सामाजिक संगठन की मुख्य विशेषताएं जैसे समूह संरचना, सामाजिक प्रक्रियाएं, विभेदीकरण, ढांचागत स्थिति आदि उसे अत्यधिक प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त समाज की भौतिक व प्रौद्योगिक स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
  2. आन्तरिक के साथ-साथ बाह्य परिवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। इसमें मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संकट, संघर्ष व सहयेाग, महाशक्तियों की भूमिका, पड़ोसियों का रुख आदि महत्वपूर्ण होते हैं। अत: दुनिया के अन्य राष्ट्रों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं का भी व्यापक असर निर्णायकों पर पड़ता है।
  3. आन्तरिक व बाह्य वातावरण के साथ-साथ निर्णय प्रक्रिया की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। इसके मुख्य रूप से प्रशासनिक ढांचे, सरकारी व गैर सरकारी अभिकर्ताओं की परस्पर क्रिया, कार्यपालिका व विधानमण्डल की अन्त:क्रिया आदि का प्रभाव भी महत्त्व रखता है।
इस प्रकार स्नाइडर ने राज्य को निर्णय लेने वालों के रूप में माना है। अत: इन निर्णय लेने वालों के व्यवहार के अध्ययन से अनुभव सिद्ध शोध सम्भव है। इस प्रकार व्यवहारवाद के माध्यम से स्नाइडर ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का वैज्ञानिक अध्ययन करने का प्रयास किया है। सैद्धान्तिक रूप में तो स्नाइडर के समर्थक उसकी मुख्य अवधारणा को मानते हैं, परन्तु व्यावहारिक रूप में समर्थकों की कार्य शैली में थोड़ा अलगाव है। परन्तु वे सभी भी निर्णय परक उपागम की मूल मान्यताओं से सहमत हैं। निर्णय परक उपागम की विद्वानों ने विभिन्न कारणों से आलोचनाएं भी की हैं जो हैं -
  1. सर्वप्रथम कुछ आलोचक इस सिद्धान्त को अति तर्कशील तो कुछ इसे तर्क विहीन कहकर आलोचना करते हैं। जो इस उपागम को अति तर्कशील मानते हैं उनका कहना है कि इस उपागम के अनुसार निर्णय लेने वाले - (i) निर्णय के सभी वर्गों व उप वर्गों के फायदे व नुकसान का आकलन करते हैं; (ii) फिर कई विकल्प बनाते हैं; (iii) प्रत्येक विकल्प पर समान गम्भीरता से विचार करते हैं; तथा (iv) फिर सोच समझ कर एक विकल्प चुनते हैं। परन्तु दूसरी ओर तर्क विहीनता के संदर्भ में आलोचकों का कहना है कि स्नाइडर ने कभी नहीं कहा कि (i) निर्णय लेने वाले जाने या अनजाने में मूल्यों के बारे में सोचे; (ii) उपलब्ध साधनों के बारे में स्पष्ट या अस्पष्ट विचार रखें; (iii) अपने संसाधनों का लक्ष्य के साथ मेल करें; तथा (iv) अंतत: कुछ विकल्पों को चुनें।
  2. आलोचकों का मानना है कि इस अध्ययन करने हेतु शोधकर्त्ता का मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ होना आवश्यक है। क्योंकि स्नाइडर का मानना है कि विदेशी नीति के शोधकर्त्ता को निर्णय लेने वाले के उद्देश्य को नकारना नहीं चाहिए। क्योंकि इस निर्णय लेने वालों के राजनैतिक उद्देश्य उनके व्यक्तिगत उद्देश्यों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
  3. इस उपागम की एक आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि यह एक विश्वसनीय सिद्धान्त के प्रतिपादन में असफल रहा है। इस दृष्टिकोण के अंतर्गत निर्णयों को कई वर्ग व उपवर्गों में बांट दिया गया है, बल्कि उसकी एक समग्र प्रस्तुती नहीं की गई। इसके माध्यम से किसी भी निर्णय लेने में आन्तरिक, बाह्य तथा प्रक्रिया संबंधी कमजोरी एवं ताकत को तो दर्शाया गया है। परन्तु ये तीनों ही स्थितियां अलग-अलग निर्णयों को अलग-अलग रूप में प्रभावित करती है, कोई एक समग्र या सामान्यीकरण प्रस्तुत नहीं करती।
  4. इस उपागम को व्यवहारवादियों की भांति मूल्य रहित रखने की बात की है, परन्तु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। विदेशी नीति संबंधी मामलों का मूल्य रहित आंकलन उन्हीं निर्णयों पर लागू होता है जो मामले हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, उन मुद्दों के विश्लेषण में निर्णयों के सही या गलत होने का फैसला भी इस उपागम के माध्यम से सम्भव नहीं है। अन्तत: प्रत्येक निर्णय का सही या गलत होना उस राष्ट्र से समृद्ध मूल्यों पर ही टिका होता है, मूल्य-रहितता पर नहीं।
  5. यह दृष्टिकोण समस्या के समाधान में भी सहायक नहीं है। इस उपागम के माध्यम से यह जानकारी तो मिल जाती है कि अमुक निर्णय क्यों, कहां व किसने लिया। परन्तु उसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा, समस्या का समाधान हुआ या नहीं आदि कोई संकेत इस उपागम से नहीं मिलते। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि यह आंशिक दृष्टिकोण ही रहा तथा किसी सार्वभौमिक सिद्धान्त के प्रतिपादन में भी असफल रहा। परन्तु इसके दो परिणाम फिर भी उपयोगी रहे - एक, व्यक्तियों के वस्तुनिष्ठ व्यवहार के अध्ययन से राज्यों के निर्णयों का सही आंकलन होने से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनकी भागीदारी के स्वरूप का कुछ ज्ञान हुआ। दूसरे, विदेश नीति सम्बन्धी विभिन्न निर्णयों का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव हो सका। अत: इस सीमा तक इस उपागम की उपयोगिता बनी हुई है।

खेल/क्रीड़ा उपागम

यह उपागम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु आंशिक उपागमों में से एक है। मूलत: इसका विकास गणितज्ञों एवं अर्थशास्त्रियों ने किया। सबसे प्रथम इसे पहचान व इसको विकसित किया मार्टिन शुबिक (गेम्ज थ्योरी एण्ड रिलेटिड अप्रोचिज टू सोशल बिहेवियर (1954), ऑस्कर मॉर्गन्स्टर्न (थ्योरी ऑफ गेम एण्ड ईकोनोमिक बिहेवियर (1964), मोरटन डी. डेविस (गेम थ्योरी : ए नॉन टेक्नीकल इंट्रोडक्सन (1970) आदि। लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक प्रतिमान के रूप में लागू किया मार्टन कॉप्लान, काल डॉयस, आर्थर ली. वन्र्स, रिचर्ड कवांट आदि ने।

खेल दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक विश्लेषण प्रणाली तथा विभिन्न विकल्पों में से एक विकल्प चुनने का तरीका है। यह विचारों का ऐसा समूह है जो तर्क संगत निर्णयों एवं प्रतियोगिता व संघर्ष की परिस्थितियों में, जब प्रत्येक प्रतिभागी अधिकतम लाभ के लिए प्रयत्नशील होता है, श्रेष्ठतम रणनीति के चयन से सम्बद्ध है। यह उपागम कोशिश करता है कि किन परिस्थितियों में कौन सा निर्णय या प्रक्रिया या विकल्प तर्कसंगत है। अत: इस उपागम द्वारा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णयकर्त्ताओं को अपने विकल्पों की उपादेयता जांचने का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करता है। अत: यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तर्कसंगत व्यवहार का प्रतिमान है जिससे प्रत्येक राज्य अपनी विदेशी नीति संचालन के क्रम में ऐसा निर्णय ले जिससे उसके हितों में वृद्धि के अधिकतम अवसर प्राप्त हो सके।

यह उपागम रणनीति का खेल है, संयोग का नहीं। इसमें खेल के अपने नियम, खिलाड़ी, क्रियाएं, रणनीति, क्षतिपूर्ति आदि होते हैं। खेल प्रतिस्पर्द्धापूर्ण एवं सहकारितापूर्ण दोनों ही प्रकार का हो सकता है। इस खेल के खिलाड़ी निर्णय लेने वाले होते हैं जो दो या दो से अधिक भी हो सकते हैं। खेल के निश्चित नियम होते हैं जिन पर खिलाड़ियों का नियंत्रण नहीं होता। प्रत्येक खिलाड़ी का प्रयास तो अपने हितों के संदर्भ में अधिकतम लाभ कमाने का होता है।

सामान्यतया इस उपागम के समर्थक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के संदर्भ में मुख्य तौर पर निम्न प्रश्नों के उत्तर खोजने के प्रयास करते हैं - खिलाड़ी के पास कौन-कौन सी रणनीतियां हैं?, अपने विरोधी के पास कौन-कौन सी रणनीतियां हैं?, विरोधी व अपनी रणनीतियों की तुलना करता है, विभिन्न परिणामों के मूल्यों का आकलन करते हैं, तथा अपने विरोधी द्वारा इन मूल्यों का किस प्रकार आकलन किया जा रहा है आदि। खेल कई प्रकार के होते हैं जिनमें से मुख्यतया इन तीन प्रकार के खेलों को अधिक महत्त्व दिया जाता है -
  1. शून्य योग खेल - इसमें मुख्यत: दो खिलाड़ी होते हैं जिसमें किसी भी एक पक्ष का लाभ किसी दूसरे की कीमत पर होता है। अत: इस खेल में संघर्ष निर्णायक होता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अंतर्गत द्विपक्षीय संबंधों के अध्ययन हेतु अति महत्त्वपूर्ण है।
  2. स्थिर योग खेल- इस खेल में किसी भी पक्ष का लाभ दूसरे की कीमत पर नहीं होता। इसमें खिलाड़ियों के मध्य पारस्परिक सहयोग अधिक होता है तथा इसी सहयोग के साथ समान लाभ प्राप्त करने की कोशिश की जाती है। 
  3. गैर-शून्य-योग खेल- यह खेल उपरोक्त दोनों के बीच की स्थिति का द्योतक है। इसमें खेल के विभिन्न पक्षों के बीच प्रतिस्पर्धा एवं सहयोग दोनों ही उपलब्ध होते हैं। इसमें दोनों ही पक्ष लाभान्वित भी हो सकते हैं तथा दोनों की हानियां भी हो सकती है।
विभिन्न आलोचकों ने इस सिद्धान्त की भी इन आधारों पर आलोचनाएं की हैं-
  1. सर्वप्रथम आलोचकों का कहना है कि यह सत्य है कि इस उपागम के माध्यम से विदेश नीति के तर्कपूर्ण निर्णयों का पता लगा सकते हैं। इसके साथ-साथ यह भी जान सकते हैं कि विदेश नीति का अमुक फैसला तर्कसंगत है या नहीं। परन्तु समस्या वहां आती है जहां व्यवहार अविवेकपूर्ण होता है। यह उपागम इस बात को बताने में सक्षम नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खिलाड़ी अविवेकपूर्ण अथवा गैर-तर्कसंगत व्यवहार क्यों करते हैं।
  2. इस उपागम के माध्यम से लाभ-हानि का आकलन करने की कोशिश की जाती है। परन्तु यह दृष्टिकोण इस संदर्भ में यह मानकर चलता है कि प्रत्येक खिलाड़ियों के उद्देश्यों, मानकों, नेतृत्व की विशेषताओं आदि समान होती हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत होती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ज्यादातर प्रतिभागियों के हित एक दूसरे से प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं, सहयोगात्मक बहुत कम होते हैं।
  3. यह उपागम यह मानकर चलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णयकर्त्ता और उसके निर्णय पूर्णतया विवेकपूर्ण एवं नैतिक होते हैं। इसके साथ-साथ यह भी माना जाता है कि इन निर्णयों के संबंध में उनके पास पूर्ण सूचनाएं उपलब्ध होती हैं। लेकिन वास्तविकता ठीक इसके विपरीत होती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत सारी सूचनाएं गोपनीय होती हैं तथा ज्यादातर निर्णय विवेकपूर्ण या नैतिक नहीं होते हैं, बल्कि स्वाथ्र्ाी राष्ट्रहित से प्रेरित होने के कारण सिर्फ अपने राष्ट्र के भले हेतु ही लिए जाते हैं।
  4.  मुख्य रूप से यह उपागम दो राष्ट्रों के शून्य-योग खेल तक ही अधिक कारगर हो सकता है। क्योंकि दो राष्ट्रों के सीधे संबंधों के संदर्भ में लाभ हानि का स्पष्ट आंकलन सम्भव हो सकता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परिस्थितियों के संदर्भ में यह दृष्टिकोण कारगर नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की स्थिति बहुत कम ही उपलब्ध होती है। इसीलिए इसकी सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसीलिए कुछ आलोचकों का मानना है कि यह उपागम युद्ध, युद्ध निवारण, आतंकवाद, परमाणु खतरों, निरोधक व्यवस्था, व्यापक प्रतिशोध जैसी कई परिस्थितियों एवं समस्याओं का अध्ययन करने हेतु सक्षम नहीं है।
  5. यह उपागम अमूर्त रूप में ही है, बहुत कम परिस्थितियों में इसके स्वरूप को उजागर किया जा सकता है। इसी प्रकार इसके अन्य खेल के नियमों की बात है। यह भी अस्पष्ट है तथा स्पष्ट रूप से सभी खिलाड़ी इसे मानते हों ऐसा आवश्यक नहीं। अत: यह दृष्टिकोण व्यवहारिकता से भी काफी परे है।
उपरोक्त कमियों के बावजूद भी कुछ सीमा तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में द्वि पक्षीय संबंधों के अध्ययन करने में यह अवश्य सक्षम है, लेकिन यह एक सार्वभौमिक सिद्धान्त या सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने में बिल्कुल उपयुक्त नहीं है।

संचार उपागम

संचार उपागम के बारे में सर्वप्रथम गणितज्ञ नार्बर्ट वीनर ने अपने संचार, साइबरनेटिक्स, फील्ड बैक आदि अवधारणाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। परन्तु इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कार्ल डब्ल्यू ने अपनी पुस्तक - नर्वज ऑफ गवर्नमेंट - के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस उपागम के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लक्ष्यों को निर्णय प्रक्रिया व समायोजन के माध्यम से जानना है। यह सरकारी तंत्र की कार्यवाही को सूचना प्रवाह की तरह मानती है। अत: विभिन्न ढांचों के माध्यम से किस प्रकार सूचना प्रवाह की प्रक्रिया होती है इसे जानना जरूरी है। इस उपागम की निर्णय के परिणामों की बजाय निर्णयों की प्रक्रिया में अधिक रूचि है। अत: यह साइबरनेटिक्स के अनुरूप ही है क्योंकि उसमें भी संचालन व समायोजन पर अधिक बल दिया जाता है न कि निर्णयों के परिणामों पर।

संचार उपागम का मुख्य बल परिवर्तन पर है। इसका मानना है कि यह परिवर्तन शक्ति की बजाय संचार पर आधारित होगा तो अधिक प्रभावी व कारगर रहेगा। डॉयस का मानना है कि प्रत्येक प्रणाली में सूचना को ग्रहण करने वाले कारक होते हैं। कई सूचना ग्रहण करने वाले ढांचे मात्र सूचना ग्रहण ही नहीं करते अपितु उसे चुनते हैं, छांटते हैं, आंकड़ाबद्ध करते है। आदि। निर्णय लेने वाली प्रक्रिया में उन सूचनाओं को याद रखने, मूल्य की जटिलता आदि के माध्यम से वास्तविक निर्णय लेने तक संभाल कर रखा जाता है।

सूचना ग्रहण करने के अतिरिक्त, डॉयस के अनुसार, राजनैतिक तंत्र में चैनलों के भार व उनकी क्षमताओं का वर्णन भी होता है। राजनैतिक प्रणाली में सुचनाओं का भार प्रणाली के पास उपलब्ध समय की दृष्टि से तय होता है। उसी प्रकार भार की क्षमता चैनलों के उपलब्धिता पर आधारित है। इन्हीं आधारों पर यदि वो राजनैतिक व्यवस्था आने वाली सभी सूचनाओं को सुनिश्चित रूप से संभाल पाती है तो वह प्रणाली उत्तरदायी है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाती है तो प्रणाली अनुत्तरदायी है। कार्ल डॉयस का यह भी मानना है कि सूचनाओं की मापतोल व गिनती सम्भव है। भेजी गई सूचना किस मात्रा में सही या विकृत रूप में प्राप्त की जाती है उसका अनुमान लगाने के लिए सम्प्रेषण सारणियों की उपलब्धता, क्षमता या मर्यादा का परिमाणात्मक रूप से अध्ययन किया जा सकता है। डॉयस ने समूहों, समाजों, राष्ट्र व अंतरराष्ट्रीय समाजों, सभी संगठनों आदि की संश्लिष्टता मापने हेतु सूचना प्रवाहों के अध्ययन की पद्धति का प्रयोग किया है।

इस उपागम में ‘नकारात्मक फीडबैक’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है। इसका अभिप्राय उन प्रक्रियाओं से है जिसके माध्यम से निर्णयों व उनसे क्रियान्वयन से उत्पन्न होने वाले परिणामों की सूचना व्यवस्था में पुन: इस प्रकार स्थापित कर सकें कि वह व्यवस्था के व्यवहार को स्वत: ऐसी दिशा प्रदान करें कि लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव हो सके। अत: इस दृष्टिकोण में नकारात्मक फीडबैक लक्ष्यों की प्राप्ति में अति सहायक सिद्ध होती है। एक कुशल व्यवस्था वह है जो सूचना को अधिकृत रूप से सही समय पर ले सके तथा उसके आधार पर अपनी स्थिति व व्यवहार में समय पर यथोचित बदलाव कर सके। इस प्रकार डॉयस राजनीतिक प्रणाली को जीवित प्राणी की शारीरिक व्यवस्था के समान मानता है।

डॉयस ने अपने इस संचार उपागम में ढांचागत सुधार हेतु चार मात्रात्मक अवधारणाओं का समावेश किया है। ये चार अवधारणाएँ हैं - (i) भार (लोड), (ii) देरी (लेग), (iii) लाभ (गेन), तथा (iv) अग्रता (लीड)। भार से उसका अभिप्राय है व्यवस्था द्वारा अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु संचार की गति व उसकी मात्रा को लक्ष्य के साथ समन्वित करना। देरी का अर्थ है सूचना के सही व उचित समय पर पहुंचने पर भी व्यवस्था द्वारा निर्णयों का उसके फलस्वरूप उत्पन्न परिणामों में देरी करना। लाभ से उसका अभिप्राय है कि प्राप्त होने वाले सूचना के प्रतिउत्तर में शीघ्रता व प्रभावी होना। अग्रता से अभिप्राय सम्भावित परिणामों का पूर्व आकलन करके अपने निर्धारित लक्ष्यों को समय पर प्राप्त करना। अत: डॉयस का मानना है कि इन चार कारणों से संचार उपागम का मात्रात्मक ढंग से अध्ययन सम्भव है।

अत: संचार दृष्टिकोण में डॉयस ने अध्ययन की मूल ईकाई सूचना प्रवाह को माना है। क्योंकि इसी के माध्यम से संचालन की प्रक्रिया को गति के साथ सम्बद्ध किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी निर्णयों हेतु सूचना प्रवाह अति आवश्यक बन पड़ा है। जिन राष्ट्रों के पास सुचारू, सुस्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ सूचना तंत्रों का जाल बिछा है वे अपने विदेशी नीति के निर्धारण एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने में ज्यादा सफल होते हैं। इसी के परिणामस्वरूप वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। संचार उपागम की भी कई आधारों को लेकर आलोचनाएँ की गई हैं जो इस प्रकार से हैं-
  1. इस उपागम की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह निर्णयों के परिणामों की बजाय निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में ज्यादा बल देता है। सूचना प्रवाह के स्वरूप पर तो इसका मुख्य ध्यान है, लेकिन उन विभिन्न ढांचों को नकारती है जिन्होंने सूचना को यह स्वरूप प्रदान किया है इस प्रकार से जो बहुत महत्वपूर्ण पहलू है उसे नकार कर यह दृष्टिकोण गौण पहलू को जरूरत से अधिक महत्त्व प्रदान करता है।
  2. इस उपागम का विवरण इतना जटिल एवं यांत्रिकी बन गया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सामान्य विद्यार्थियों की समझ से परे है। इसके आधार पर मानव प्रकृति को यान्त्रिकी से सम्बद्ध कर कई प्रकार की जटिलताएं पैदा कर दी हैं। ;पपपद्ध सामान्य रूप से प्रतिमानों की स्थापना विषय के सरलीकरण हेतु की जाती है। परन्तु डॉयस का यह मॉडल अपने आप में इतना जटिल है कि इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रारूप को समझना और कठिन हो गया है। इस प्रतिमान के माध्यम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलाव व विकास के लिए जरूरी ढांचों एवं संचार प्रवाह को प्रदर्शित करना सम्भव नहीं हो सका है।
  3. इस उपागम के अंतर्गत जिस प्रकार के उच्च स्तर की भूमिकाओं की विशेषता की आवश्यकता होती है, वह वास्तविक जिन्दगी में शायद ही आवश्यक होती है। इसके अतिरिक्त, इनको बनाने वाले सूचना प्रवाह चैनल भी कभी-कभी इतने औपचारिक नहीं होते जितने इस उपागम में दर्शाये गए हैं। राजनैतिक प्रक्रिया की कार्यशैली भी इतनी सुस्पष्ट नहीं होती है। इसके अलावा, कई बार तो निर्णय लेने वालों की दृष्टि में लक्ष्य भी इतने सुनिश्चित नहीं होते और निर्णयों की दिशा तो हमेशा ही अनिश्चित होती है। इसीलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस दृष्टिकोण को राजनैतिक शोध हेतु शायद ही प्रयोग में लाया जाये।
  4. अन्तत:- इस उपागम की यह भी आलोचना है कि यद्यपि डायॅ स का कार्य काफी गहन व व्यापक था, परन्तु इस दृष्टिकोण के सभी निष्कर्ष सलाहमात्र थे। यह उपागम सरकारों की गतिविधियों के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार के प्रश्न तो अवश्य उठाता है, लेकिन उन प्रश्नों के उत्तर देने में यह बहुत कम मदद करता है।
उपरोक्त कमियों के उपरान्त भी एक सन्दर्भ में इसका महत्त्व है। विदेश नीति निर्माण में संचार तंत्रों का विशेष महत्त्व है तथा वर्तमान सूचना तकनीक के विकास के युग में इसका महत्व कम होने की बजाय बढ़ने की सम्भावनाएं हैं।

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