राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त

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अभी तक यह समझा जाता रहा था कि अफ्रीका की भाँति भारत में भी राज्य की उत्पत्ति तथा विकास से सम्बन्धित सिद्धान्तों का पूर्ण अभाव रहा है। भारत की इस छवि के लिए सम्राज्यवादी इतिहासकार उत्तरदायी रहे हैं। इन्होंने पूर्वी निरंकुशतावाद अथवा अधिनायकवाद के रूप में भारतीय राज्य का वर्णन किया है। कुछ हद तक इस मत को पुख्ता करने में माक्र्सवादी एशियायी उत्पादन की पद्धति (Asiatic Mode of Production) का विचार भी रहा है। हालाँकि भारतीय मार्क्सवादी विचारकों ने इसे अव्यावहारिक बताकर अपनी असहमति जताई है। परन्तु उनके विचारों को न सुनकर ब्रिटिश साम्राज्यवादी विचारकों के मत को ही सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया गया है।

परन्तु यदि प्राचीन भारतीय ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस प्रकार पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन क्रम में राज्य की उत्पत्ति से सम्बन्धित अनेक मत प्रचलित है इसी प्रकार भारतीय चिन्तन क्रम में भी अनेक मत उपलब्ध है जैसे-
  1. राज्य संस्था का क्रमिक विकास (विकासवादी सिद्धान्त)
  2. समझौते का सिद्धान्त
  3. दैवी उत्पत्ति का सिद्धान्त तथा
  4. युद्ध मूलक अर्थात शान्ति सिद्धान्त आदि।

यद्यपि प्राचीन भारतीय स्रोतों से निकाले गए ये सिद्धान्त पाश्चात्य चिन्तकों द्वारा प्रतिपादित राज्य सम्बन्धी सिद्धान्तों के बहुत निकट है परन्तु ये भारतीय चिन्तकों द्वारा उतनी स्पष्टता, उतने व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत नहीं किए गए क्योंकि यह प्राय: प्राचीन ग्रंथों में वृहद सांस्कृतिक चिन्तन के एक अंग के रूप में ही प्रस्तुत किए गए हैं। राज्य, जैसा कि राबर्टस् ने कहा है एक सर्वोच्च सत्ता की उपस्थिति है, जो निश्चितता, भूप्रदेश पर शासन करती है, जो शासन के मामले में निर्णय लेने की शान्ति रखने के लिए मान्यता प्राप्त हैं, उन निर्णयों को कार्यान्वित भी कर सकती है और प्राय: उस निश्चित भूप्रदेश में भीतर व्यवस्था बनाए रखती है। कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में सप्तांग अर्थात सात अनिवार्य अवयवों (तत्वों)- स्वामी, अमात्य जनपद, दुर्ग, कोष, दंड और मित्र की बात करता है। कौटिल्य के अनुसार सातों तत्वों की मौजुदगी में ही किसी राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा, दिया जा सकता है।

राज्य की उत्पत्ति

राज्य एक ऐतिहासिक परिघटना है जो मानव के सामूहिक जीवन की उपज है- जब मानव प्राकृतिक अवस्था से निकलकर संगठित जीवन आरम्भ करता है। अत: ऐसा समय भी रहा है जब, जिसे हम राज्य कहते हैं, उसका आस्तित्व नहीं था। प्राचीन भारतीय स्रोतों के अध्ययन से राज्य की उत्पत्ति तथा विकास की जानकारी तो मिलती है इसके साथ ही राज्यपूर्व अर्थात राज्यविहीन अवस्था का वर्णन भी मिलता है। राज्यविहिन समाज की अवस्था की जानकारी ही हमें ‘राज्य क्या है’ समझने में सहायक होगी।

राज्य पूर्व (राज्य विहीन) समाज की स्थिति

राज्य की उत्पत्ति से पूर्व मानव राज्यविहीन अवस्था में था। इस अवस्था को मोरगन Savagery का नाम देता है जबकि पुराणों में इसे कृत युग के नाम से जाना जाता है।

यद्यपि राज्यपूर्व प्राकृतिक अवस्था की तस्वीरें ब्यौरों में एक-दूसरे से भिé हैं, फिर भी इस अवस्था की चार मूलभूत विशेषताएँ स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। एक तो यह कि सबसे प्रारंभिक काल में जीवन निर्वाह का साधन वृक्षों से प्राप्त फल-फूल थे। ब्राह्मण और जैन अनुश्रुतियों में जीवन यापन के मुख्य स्रोत के रूप में कल्पवृक्ष का वर्णन अनेक प्रसंगों में देखने को मिलता है। बौद्ध अनुश्रुतियों में जीवननिर्वाह के आदिकालीन स्रोतों में वनलता और भूतिपर्पटक के नाम आए हैं। स्वाभाविक ही है कि मानव जीवन की आदिम अवस्था में, जो पुराणों और महाकाव्यों में वर्णित कृतयुग के साथ सामान्यत: मेल खाती है, मनुष्य खाद्य-उत्पादक के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य-संग्राहक के रूप में जीवन यापन करता होगा। इस बात का समर्थन मानव विज्ञान से होता है, और यही बात पुरापाषाण (पैलियोलिथिक) कालीन मानव के साथ भी लागू होती है। मारगन के शब्दों में, ‘सीमित क्षेत्र में पैदा होने वाले फल-फूलों के प्राकृतिक आहार पर निर्वाह करना’, यही मनुष्य के जीविका का प्रथम साधन था। उस समय कोई भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि फल और वृक्ष एकमात्र उसी के हैं। यह प्रकृतावस्था थी, जब ‘इसे (संपत्ति को) कब्जे में रखने का लोभ उन (मनुष्यों) में शायद ही पैदा हुआ था, क्योंकि तब यह चीज (संपत्ति) प्राय: थी ही नहीं। परिग्रह की जो प्रवृत्ति आज मानवमन में सर्वोपरि शक्ति के रूप में छाई हुई है उसे पूरे ओज के साथ विकसित करने का काम तब सभ्यता के सुदूर अनागत चरण के लिए छोड़ दिया गया था।

दूसरी बात यह कि संभवत: तब स्त्री पर पुरुष के आधिपत्य पर आधारित परिवार जैसी कोई संस्था नहीं थी। प्राकृतिक अवस्था के बारे में जितनी भी अनुश्रुतियां है उनमें महाभारत को छोड़कर और किसी में उस एक विवाही परिवार (मोनोगेमस फैमिली) की उत्पत्ति का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता जिसमें पिता का स्थान सर्वोपरि हो और सारे घरेलू कार्यकलाप का केंद्र पत्नी हो। शांतिपर्व में कहा गया है कि ‘पुत्र-पौत्रों, पुत्रवधुओं और सेवकों से भरा पूरा गृहस्थ का परिवार गृहिणी के अभाव में शून्य है। घर तब तक घर नहीं होता है जब तक उसमें पत्नी नहीं आती हैं। लेकिन इस प्रकार का परिवार कैसे उद्भूत हुआ? महाकाव्यों और पुराणों की अनुश्रुतियों में कहा गया है कि पहले स्वच्छन्द यौनाचार की स्थिति विद्यमान थी और बच्चे संकल्प यानी संभोगेच्छा मात्र से उत्पé किए जा सकते थे। कृतयुग में न तो मैथुन था और न स्वीकृत एक विवाही प्रथा (द्वंद्व) थी। शांतिपर्व में उल्लेख है कि उत्तरकुरुओं के देश में विवाह जैसी कोई संस्था नहीं थी। कुरु देश के बारे में दीर्घ निकाय के ‘अटानिय-सुत्त’ में कहा गया है : ‘यहाँ ऐसे लोग रहते हैं जो न तो किसी भी वस्तु को अपना कहते हैं और न किसी स्त्री को अपनी संपत्ति।

तीसरी बात यह है कि पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि कृतयुग में कोई वर्ण नहीं था। मानव जाति की सबसे प्रारंभिक जीवनावस्था का वर्णन करते हुए बौद्ध स्त्रोतों में भी ऐसा उल्लेख कहीं नहीं किया गया है कि लोग सामाजिक श्रेणियों में विभक्त थे। चौथी बात यह है कि ‘शांतिपर्व’ के कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राकृतिक अवस्था के प्रारंभिक चराचर में राज्य नामक संस्था नहीं थी। कौटिल्य के अनुसार वैराज्य कहे जाने वाले कुछ देशों में राजपद नहीं था और इसके लोग अपना पराया नहीं जानते थे। इससे यह अर्थ निकलता है कि जब निजी संपत्ति नहीं थी तब राजा भी नहीं था।

हाल तक मौजूद आदिम समाजों को देखने से पता चलता है कि मानव जीवन की सबसे पुराकालीन अवस्था में संपत्ति, परिवार और वर्ग (या वर्ण) जैसी संस्थाओं का अस्तित्व शायद ही मिले। यह कोई संयोग की बात नहीं थी कि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, उपर्युक्त संस्थाओं का अभाव था। यद्यपि इन संस्थाओं के बिना रहने वाले लोगों को सभ्य नहीं कहा जाएगा, फिर भी ये चिंता और लोभ से मुक्त रहकर एक प्रकार का सहज सुंदर जीवन व्यतीत करते थे।

विकासवादी सिद्धान्त

(क) यह विचार सबसे पहले अर्थवेद में मिलता है। अर्थवेद के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि राज्य नामक संस्था क्रमिक विकास का परिणाम है। राज्य सहसा उत्पन्न नहीं हुआ इसकी उत्पत्ति के अंकुर मनुष्य के किसी भू भाग पर सहनिवास में निहित है। धीरे-धीरे पारस्परिक सम्बन्ध जटिल होते चले गए क्योंकि जनसंख्या कार्यक्षेत्र और आवश्यकताओं में वृद्धि से जटिलता आती है। जिससे आपसी संघर्ष जन्म लेता हे। इन संघर्षों के समाधान हेतु जिस संस्था की रचना की गई वह ‘राज्य संस्था’ के रूप में जानी जाने लगी। समाज तथा मानवीय सम्बन्धों तथा भौतिकी के विकास के साथ साथ राज्य संस्था का विकास भी होता चला गया।

अर्थवेद के अष्टकांड के दसवें सूक्त में राज्य की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत वर्णन मिलता है। सूक्त के प्रथम तेरह मन्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि राज्य किन किन अवस्थाओं से गुजरकर पूर्ण विकास की अवस्था में पहुँचा है।
  1. अर्थवेद के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में राज्य विहिन अर्थात् अराजकता की अवस्था थी। इस अवस्था में ना ही तो कोई राज्य नाम की संस्था थी और ना ही राजा तथा प्रजा जैसी कोई व्यवस्था थी। इस राज्यविहिन अवस्था को जहाँ कुछ चिन्तक एक सुखद अवस्था मानते हैं वहाँ कुछ अन्य चिन्तक एक बहुत ही भयानक तथा भयावह अवस्था।
  2. दूसरी अवस्था में ‘परिवार’ नामक संस्था थी जिसमें पति, पत्नि, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री, माता, पिता आदि के सम्बन्ध बने तथा परिवार के मुखिया, परिवार के सदस्यों के हितों की रक्षा करने लगा इसलिए इस अवस्था को ‘गार्हपत्य’ कहा गया है।
  3. तीसरी अवस्था में गृहपतियों का एक स्थान पर आव्हान किया जाता था जहाँ मिलकर वे विचार विमर्श करते थे क्योंकि जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि हुई परिवार भी बढ़े और उनके हितो और स्वार्थों की भी वृद्धि हुई। इससे आपसी संघर्ष बढ़े तब परिवारों ने मिलकर एक संगठन ओर बनाया। जिसे हम आज ग्राम संगठन या ग्राम पंचायत कहते हैं। यह अवस्था ‘आहवानीय’ अवस्था के नाम से जानी जाती है। यह पारिवारिक संगठन से उच्चतर संगठन था। इस आहवानीय के नेता को वेदों में ग्रामीण कहा गया है। इसमें विभिन्न परिवारों के कुल मुखिया एकत्रित होते थे।
  4. चतुर्थ अवस्था में ग्राम संगठनों (आहवानियों) की संख्या और हितों की ओर वृद्धि हुई जिससे परस्पर टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। इसके समाधान हेतु ग्राम से बड़ी इकाई की आवश्यकता पड़ी जिसके परिणामस्वरूप जनपद या राष्ट्र बने जिनमें आहवानियों के योग्य नेता इकट्ठे होते थे। यह अवस्था दक्षिणाग्नि कहलाई।
  5. अथर्ववेदानुसार पाँचवी अवस्था में सभा की उत्पत्ति हुई। इस अवस्था में दक्षिणाग्नि जन शक्ति सभा में परिवर्तित हुई। सभा जनपद या राष्ट्र की उच्चतम संस्था बनी जिसमें समाज के चुने हुए व्यक्ति अर्थात् ‘सभ्य’ (सभासद) मिलकर विचार विमर्श करते थे।
  6. छठी अवस्था में सभा के पश्चात् समिति अवस्था का वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सभा जनसमुदाय की संस्था रही होगी जबकि सभा के सदस्य विशिष्ट चुने हुए व्यक्ति होते होंगे। कुछ का मत इससे उलट है। अथर्ववेद के अनुसार जब समाज अधिक जटिल हो गया तो समिति विकसित हुई।
  7. अथर्ववेदानुसार सातवीं अवस्था ‘आमन्त्रण’ की अवस्था थी। इस समय आमंत्रण परिषद् का संगठन हुआ। संभवत: यह सबसे विशाल संस्था थी जिसमें जनपद के सभी लोगों को आमन्त्रित किया जाता था। अथर्ववेद के अनुसार आमंत्रण राज्य संस्था के विकास की अन्तिम अवस्था थी।
आधुनिक काल में भी मानव समाज व राज्य के प्रादुर्भाव व विकास का प्राय: यही क्रम माना जाता है। अर्थात् सबसे पहले परिवार संगठित हुए फिर ग्राम बने और फिर जन तथा जनपद अथवा राष्ट्र का विकास हुआ जिनमें उचित परामर्श हेतु सभा समिती जैसी संस्थाओं का अर्विभाव हुआ।

राज्य की उत्पत्ति का सम्पत्ति, परिवार तथा वर्ण सम्बन्धी सिद्धान्त

इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या के आधार पर राज्य की उत्पत्ति का विशलेषण करने वाले विचारक राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धान्त के समर्थक हैं। उनके अनुसार राज्य की उत्पत्ति के लिए सम्पत्ति परिवार तथा वर्ण उत्तरदायी कारक हैं।

जीवन का यह सहज सुंदर प्रवाह कृषि कौशल के अन्वेषण के साथ भंग हुआ। इस कौशल के सहारे मनुष्य, उसे उपभोग के लिए जितना चाहिए था उससे अधिक उत्पादन करने में समर्थ हुआ। जैसा कि राँकहिल (Rockhill) ने कहा है कि इससे चावल इकट्ठा करके रखने की प्रवृत्ति बढ़ी और लोग ‘नदियों, खेतों, पहाड़ियों, वृक्षों, झाड़ियों और पौधों को शक्ति और हिंसा द्वारा हथियाने लगे। अब पहली बार उन्होंने अपने अलग-अलग घर बसाए, जिसके लिए कानून की अभिस्वीकृति और समर्थन अपेक्षित था। धान के खेत बांट दिए गए और उनके चारों ओर यह कहकर मेंडबंदी कर दी गई- यह मेरा है, यह तेरा है।

लेकिन जब लोग एक दूसरे का धन चावल छीनने लगे तब एक ऐसे पद की जरूरत महसूस हुई जो उनके खेतों की रक्षा कर सके। इससे महाखतिय या खेतरक्षक पद का सृजन हुआ। इसी आवश्यकता ने राज्य नामक संस्था को जन्म दिया।

बौद्ध स्त्रोंतों में राज्य की उत्पत्ति में न केवल निजी संपत्ति के उदय के महत्त्व पर जोर दिया गया है, बल्कि उस संदर्भ में कुछ अस्पष्ट रूप से परिवार की भूमिका का भी उल्लेख है। तिब्बती दुल्वों के अनुसार, संसार में घरों (या परिवारों?) के आधार पर यह प्रथम विभाजन था। विभाजन को कानूनी या गैरकानूनी करार देना राजा पर निर्भर था। ‘शांतिपर्व’ में एक स्थान पर कलियुग में द्वंद्व या एकविवाही परिवार के उदय का उल्लेख है, लेकिन राज्य के उदय से इसका संबंध नहीं दिखाया गया है। राज्य के उदय में वर्णों (सामाजिक वर्ग) की भूमिका का महत्त्व मुख्यतया पुराणों में वर्णित है। इनके अनुसार, जीवननिर्वाह के साधन जुट जाने पर लोगों पर लोगों को चार वर्णों मे विभाजित किया गया। ब्राह्मणों का कर्म पूजा-प्रार्थना, क्षत्रियों का युद्ध, वैश्यों का उत्पादन तथा शुद्रों का शारीरिक श्रम निश्चित हुआ। जाहिर है कि यह विभाजन पूजा-प्रार्थना और युद्ध करने वालों के पक्ष में था और उत्पादकों के सजग वर्गों के विरोध की आशंका बराबर बनी रहती थी। इसीलिए ‘वायु पुराणों’ में यह कहा गया है कि वर्णों के कर्तव्य तो नियत कर दिए गए, लेकिन इन्होंने इन्हें पूरा नहीं किया और ये एक दूसरे का विरोध करने लगे। इस बात की ओर ध्यान जाने पर ब्रह्मा ने क्षत्रियों के लिए दंड और युद्ध का कर्म नियत किया। उसी ग्रंथ में एक दूसरी जगह राज्य की उत्पत्ति का ऐसा ही विवरण देते हुए कहा गया है कि ब्रह्मा ने वर्णाश्रम स्थापित किया, लेकिन लोगों ने स्वधर्म का पालन नहीं किया और वे एक दूसरे से झगड़ने लगे। अत: वे मनु के पास गए, जिसने प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो राजाओं को उत्पन्न किया। तब से राजा दंडाधारी होने लगे। इस तरह पौराणिक दृष्टि के अनुसार विभिन्न वर्णों के आपसी संघर्ष को रोकने के लिए राज्य का उदय हुआ। स्पष्टतया, इसमें आधुनिक विचारधारा के इस सिद्धान्त का पूर्वाभास मिलता है कि ‘वर्ग संघर्षों को रोकने की आवश्यकता के फलस्वरूप राज्य का अस्तित्व कायम हुआ।

शांतिपर्व में इन चिंतनों का समन्वय है। इसमें राज्य की उत्पत्ति में संपत्ति परिवार और वर्ण इन तीनों संस्थाओं की भूमिका का इकट्ठा वर्णन मिलता है। जिन परिस्थितयों में राज्य का सृजन हुआ, ये इसमें स्पष्ट रूप में वर्णित है: ‘एक व्यक्ति का धन दो व्यक्ति छीनते हैं, उन दोंनो का धन अनेक व्यक्ति मिलकर छीनते हैं। जो दास नहीं है वह दास बनाया जाता है। स्त्रियों बलात अपहृत की जाती हैं। इन कारणों से देवताओं ने लोगों के संरक्षणार्थ राजाओं का सृजन किया। और, जब लोगों ने ऐसी स्थिति को समाप्त करने के लिए आपस में समझौता और अनुबंध किया तब उसकी दो मुख्य शर्तें तय हुई कि उन लोगों को समाज से निकाल बाहर करें जिन्होंने दूसरों की स्त्रियों कर अपहरण किया हो या दूसरों की संपत्ति लूटी हो। इनके अलावा सभी वर्णों के बीच विश्वास उत्पन्न करने के उद्देश्य से भी यह अनुबंध किया गया। इस अनुबंध को स्थायीत्व प्रदान करने के लिए वे लोग राजा की खोज में निकले। वे उसे अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा और विवाह में सुंदर कुमारियां देने को तैयार हुए।

राजा के मुख्य कर्त्तव्यों को देखने से भी, जिस प्रयोजन से उसका पद सृजित हुआ उस पर प्रकाश पड़ता है। राजा के मुख्य कर्त्तव्यों में से एक था चोरों को दंडित कर निजी संपत्ति की और परस्त्रीगामियों को दंडित कर परिवार की रक्षा करना। संपत्ति की रक्षा का उत्तरदायित्व इतना महत्त्वपूर्ण था कि प्रजा की चुराई गई संपत्ति, चाहे जैसे हो, उसे वापस दिलाना राजा के लिए आवश्यक था।

परिवार की रक्षा और जारकर्म रोकना राजा का दूसरा दायित्व था। मनु ऐसे अठारह अपराध गिनाता है, जिनकी ओर राजा को ध्यान देना चाहिए। इनमें से दस का संपत्ति से और दो का परिवार से संबंधित है। इसी प्रकार का कात्यायन दस आसत कार्य बतलाता है, जिनकी ओर राजा का ध्यान जाना चाहिए। इनमें पाँच का संपत्ति से और एक का परिवार से संबंध है। बौद्ध स्त्रोतों में वर्णव्यवस्था के अनुरक्षण का उल्लेख नहीं है, यद्यपि ब्राह्मण स्त्रोंतो के अनुसार यह राजा के उल्लेखनीय कर्त्तव्यों में से था। करीब-करीब सभी महत्त्वपूर्ण स्त्रोतों में यह कहा गया है कि राजा का यह कर्तव्य है कि वह चतुर्वर्ण द्वारा स्वधर्म का पालन कराए। ‘रामायण’ के अनुसार, दशरथ के आदर्श शासन में विभिन्न जातियों के लोग अपना अपना कर्म करते थे। अभिलेखोंमें भी इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं कि वर्णव्यवस्था बनाए रखना राजा का दायित्व था।

प्राचीन स्मृतिकारों में मनु ने राजा द्वारा वर्णव्यवस्था बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है। उनके मतानुसार, राज्य तभी तक उन्नति कर सकता है जब तक वर्णों की शुद्धता बनी रहती है, अन्यथा यह समस्त निवासियों के साथ विनष्ट हो जाता है। लगभग यही विचार प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में भी व्यक्त हुए हैं जो इस प्रकार हैं : ‘तीनों वर्गों द्वारा एक दूसरे के मामले में किसी भी प्रकार का अनधिकृत हस्तक्षेप राज्य के लिए अनिष्टकर होगा और इसे बुराई की पराकाष्ठा कहना उचित होगा। शांतीपर्व में गृहदाह चोरी या वर्ण संकरता फैलाने वाले के लिए उसी दंड की व्यवस्था है जो राजा को मारने के लिए “ाडयन्त्र करने वाले के लिए है। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रारम्भिक चिंतकों और स्मृतिकारों की राय में सम्पत्ति परिवार तथा वर्ण की भूमिका राज्य की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण तथा आधारभूत रही है।

राज्य की उत्पत्ति का अनुबंध सिद्धान्त

पाश्चात्य जगत में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यत: सत्रहवीं शताब्दी में हॉब्स, लॉक तथा रूसों ने किया। उनके अनुसार एक अवस्था ऐसी थी जब कोई राजनैतिक संगठन न था, जिसे उन्होंने प्राकृतिक अवस्था कहा है। परन्तु कालान्तर में कुछ ऐसी परिस्थियाँ हुई जिसके कारण समाज में अनेक दोष उत्पन्न हो गए तथा अव्यवस्था फैल गई। ऐसी दशा में लोगों ने आपस में एक समझौता किया और एक व्यक्ति को अपने सारे अधिकार सौंपकर सर्वशक्तिमान राजा बनाया। भारत के प्राचीन साहित्य में भी इस अनुबन्ध सिद्धान्त और प्राकृतिक अवस्था का वर्णन मिलता है।

राज्य की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त का धुंधला सा आभास सबसे पहले दो ब्राह्मणों में मिलता है। इनमें असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए देवताओं के बीच राजा के चुनाव का जिक्र है। ऐतएव ब्राह्मण में इंद्र के राज्यभिषेक के संदर्भ में इस विचार को प्रकट किया है। इसके अनुसार प्रजापति के नेतृत्व में देवताओं ने आपस में कहा कि हमारे बीच इंद्र ‘कार्य संपादन के लिए सर्वाधिक स्वस्थ, शक्तिशाली, सर्वरूपेण, पूर्ण और सर्वोत्तम है।’ इसलिए उन्होंने उसे राजपद पर प्रतिष्ठित करने और तदनुसार उसका महाभिषेक करने का निश्चय किया। इस अभिषेक में उसके विभिन्न प्रकार के राजसंस्कार किए गए। जाहिर है कि निर्वाचन में निर्वाचक और निर्वाचित के बीच एक प्रकार की सहमति होती है। लेकिन इस ग्रंथ में निर्वाचकों और निर्वाचित के पारस्परिक दायित्वों का उल्लेख नहीं है। फिर भी चूँकी युद्ध की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर यह निर्वाचन हुआ था, जिसमें सबसे अधिक जोर राजा के शारीरिक गुणों पर था।

इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि इस अनुबंध में प्रजा का आज्ञापालन का दायित्व और राजा का प्रजा को आदेश देने और उसकी रक्षा करने का दायित्व तय हुआ होगा।

राज्य की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त का प्रारंभिक ब्राह्मण साहित्य में आभास मात्र मिलता है; इसका प्रथम स्पष्ट और विस्तृत प्रतिपादन बौद्ध धार्मिक ग्रंथ ‘दीघ निकाय’ में प्राप्त होता है। इसकी सृष्टिकथा हमें रूसों की राज्यपूर्व आदर्श अवस्था की याद दिलाती है। इसके उपरांत जिस अवस्था का प्रादुर्भाव होता है, वह बहुत कुछ हॉब्स द्वारा वर्णित प्राकृतिक अवस्था से मेल खाती है। ब्राह्मणों के श्रेष्ठता के दावे का खंडन करने के लिए स्वयं बुद्ध ने इस कथा का सहारा लिया है। इस कथा के अनुसार, एक समय ऐसा था जब लोग सर्वथा दोषरहित और सर्वांगपूर्ण थे तथा सुख-शांती से रहते थे। यह सभी दृष्टियों से पूर्ण और निर्दोष अवस्था युगों तक चली। लेकिन अंततोगत्वा पुरातन पवित्रता का पतन होने लगा और इससे नई नई समस्याएँ पैदा हुई। चोरी और अन्य प्रकार के असामाजिक आचरण सामने आने लगे। अत: लोग इकट्ठे हुए, और तय किया गया कि ऐसे व्यक्ति को प्रधान के रूप में चुना जाए जो ‘सर्वाधिक समर्थित, सर्वाधिक आकर्षक और सर्वाधिक योग्य हो।’ उन लोगों के आग्रह पर उस व्यक्ति ने करार किया वह ‘वहीं पर क्रोध करेगा जहाँ क्रोध करना चाहिए, उसी की भत्र्सना करेगा जिसकी भत्र्सना होनी चाहिए, उसी को देश निकाला देगा जिसे देश निकाला मिलना चाहिए। बदले में लोगों ने उसे अपनी संपत्ति का एक अंश देना स्वीकार किया। इस प्रकार जो व्यक्ति निर्वाचित हुआ उसने क्रमश: तीन उपाधियाँ धारण कीं (1) माहसम्मत, (2) खत्तिय और (3) राजा। ‘दीघ निकाय’ के अनुसार पहले का अर्थ सभी लोगों द्वारा चुना गया व्यक्ति, दूसरे का खेतों का मालिक, और तीसरे का वह व्यक्ति है जो धर्म द्वारा लोगों को मोहित करे।

‘दीघ निकाय’ में वर्णित सृष्टिकथा में जो चिंतन मिलता है, वह सामाजिक विकास की काफी निखरी हुई अवस्था की देन है। इससे पता चलता है कि अब तक जनजातिय समाज टूट चुका था, और स्त्री पुरूष के बीच, विभिन्न जातियों और वर्णों के बीच तथा असमान संपत्ति वाले लोगों के बीच संघर्ष होने लगा था। और इस तरह कुल मिलाकर राजा का दायित्व अपराधी को रोकने, लोगों के खेतों की रक्षा करना प्रजा को प्रसन्न करना (राजा) था। साथ ही ‘दीघ निकाय’ की विचारधारा की विशेषता यह है कि इसके अनुसार राजनीतिक अनुबंध के पहले सामाजिक अनुबंध की स्थापना हुई, यह बात ब्राह्मणों में प्रतिबंधित अनुबंध सिद्धान्त से स्पष्ट नहीं होती है। सामाजिक अनुबंध का विकास ‘दीघ निकाय’ में कई चरणों में दिखाया गया है। पहले इसमें परिवार की रचना का संकेत है, फिर निजी संपत्ति के उदय का। दूसरों के परिवार और निजी धन खेतों पर हाथ न डालने का दायित्व केवल ध्वनित है, व्यक्त नहीं। लेकिन निस्संदेह इस ग्रंथ में राजनितिक अनुबंध की अपेक्षा सामाजिक अनुबंध की परिकल्पना का अधिक विस्तृत वर्णन है।

‘दीघ निकाय’ में राजनीतिक अनुबंध में राजा के रूप में निर्धारित होने के लिए न केवल अलग ढ़ंग की योग्यताओं पर जोर दिया गया है, बल्कि इसमें उसके उत्तरदायित्व भी स्पष्ट रूप से बता दिए गए हैं। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में आकर्षण और योग्यता पर बल दिया गया है। इसका स्पष्ट कारण बौद्धों की बलप्रयोग तथा हिंसाविरोधी प्रवृति है।

अपराधियों को देशनिकाला देना एकमात्र ऐसा दंड है जिसका स्पष्ट उल्लेख हुआ। जहाँ राजा के अनेक दायित्वों का उल्लेख है, वहीं प्रजा का केवल एक दायित्व बताया गया है- यह कि अपने धान का एक अंश राजा को भी दे। कर की दर तो निहित नहीं है, लेकिन समकालीन बौधायन धर्मसूत्र में बताया गया है कि राजा लोगों से उपज का छठा भाग लेकर बदले में लोगों की रक्षा करे। इस प्रकार मौर्य पूर्व काल के ब्राह्मण परंपरा के चिंतकों के बीच भी यह मान्यता प्रचलित थी कि राजा प्रजा से कर प्राप्त करके बदले में उसकी रक्षा करे। लेकिन कहना कठिन है कि यह बात बौद्धो से ब्राह्मणों में आई या ब्राह्मणों से बौद्धों में। अनुबंधात्मक विचारधारा की संभावित उत्पत्ति उस समय के राजनीतिक संगठन में खोजी जानी चाहिए। बिना अनिवार्य कर प्रणाली के मगध तथा कोसल जैसे बडे़ राज्य कायम नहीं हो सकते थे। इसके अतिरिक्त गौतम बुद्ध के समय पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तर बिहार में अनेक छोटे-छोटे राज्य थे जिनमें क्षत्रिय शासक थे।

आरंभ में एक ओर केवल एक क्षत्रिय और दूसरी ओर सामान्य जनों के बीच करार होता है, लेकिन आगे चलकर प्रथम पक्ष में समस्त क्षत्रिय समुदाय को शामिल कर लिया जाता है। ‘दीघ निकाय’ की सृष्टिकथा के अंत में कहा गया है कि इस प्रकार खत्तिय मंडल, अर्थात् क्षत्रियों के सामाजिक वर्ग का उदय हुआ। इस प्रकार यहां जिस चीज का वर्णन है वह केवल आदिम क्षत्रिय शासक और जनसामन्य के बीच का ही करार नहीं है, बल्कि यह एक ओर क्षत्रिय कुलमंत्र में निहित शासक वर्ग और दूसरी ओर गैर क्षत्रीय जन सामान्य के बीच का करार है। बौद्ध अनुबंध सिद्धान्त की विशेषता है कि ब्राह्मणीय ‘शांतीपर्व’ में या रूसों की कृति में प्रतिपादित सिद्धान्त के विपरीत, यह किसी एक व्यक्ति को राज्य का प्रधान नहीं बनाता है, बल्कि यह उन सभी व्यक्तियों को जो शासक श्रेणी में आते हैं, राजा मानता है।

जहाँ तक ब्राह्मण चिंतन धारा का संबंध है, राज्य की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त का स्पष्ट प्रतिपादन सर्वप्रथम कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र‘ में मिलता है। इसमें अनुबंध की शर्तों में कुछ ऐसे नए तत्त्वों का समावेश कराया गया है जो ‘दीर्घ निकाय’ में नहीं है। इसमें कहा गया है कि अराजक परिस्थिति में पड़कर लोगों ने मनु वैवस्वत को अपना राजा निर्वाचित किया और वचन दिया कि वे अपने सोने का एक अंश देने के अलावा अनाज का छठा अंश और बिकाऊ वस्तुओं का दसवां अंश चुकाएंगें। इन करों के बदले उसने लोगों को वचन दिया कि वह अनिष्टकारी कार्यों का निरोध करेगा, तथा अपराधियों को करों और दंड से प्रताड़ित करेगा और इस प्रकार समाज का कल्याण साधेगा। वनवासियों के लिए भी वन के उत्पादनों का छठा भाग देना आवश्यक बनाया गया। राज्योत्पत्ति विषयक यह वृत्तांत इस नीति वचन के साथ समाप्त होता है कि राजा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। अत: हॉब्स की तरह कौटिल्य के भी अनुबंध सिद्धान्त का प्रयोजन राजशक्ति का संवर्धन है। इसमें उनका सिद्धान्त लॉक के सिद्धान्त से, जिसका प्रयोजन राजशक्ति को सीमित करना है, भिन्न है।

राज्य की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त के इतिहास का अगला चरण ‘महावस्तु’ में वर्णित है। ईसापूर्व प्रथम शताब्दी के लगभग लिखा गया यह बुद्ध का जीवन चरित्र है। यद्यपि यह ग्रंथ ‘दीघ निकाय’ के करीब तीन सौ वर्ष बाद लिखा गया फिर भी राजत्व की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त का विवेचन करते हुए इसमें पूर्ववर्ती ग्रंथ की सृष्टिकथा का अधिकांश भाग पुन: उद्धत कर दिया गया है। पूर्ववर्ती ग्रंथ की ही तरह पहले इसमें मानव जीवन की आदर्श अवस्था का जिक्र है। फिर, उसी तरह पतनावस्था का वर्णन है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक करार करके परिवार और संपत्ति की स्थापना की गई। अंतत: उसी प्रकार सर्वाधिक सुशोभन और शक्तिशाली व्यक्ति को हम राजा निर्वाचित होते देखते हैं, जिसे महासम्मत कहा गया है। राजा के चुनाव के फलस्वरूप राज्य की स्थापना होती है और इस तरह व्यवस्था ठोस बन जाती हे। लेकिन ‘महावस्तु’ में निर्धारित अनुबंध की शर्तों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दंड देने का वचन देता है, वरन एक नए दायित्व के रूप में, उन लोगों का सम्मान करने का वादा करता है जो सम्मान योग्य हैं। सुपात्रों को पुरस्कृत करने की बात पहले की सिद्धान्त परिकल्पनाअेां में नहीं पाई जाती। सुपात्रों को पुरस्कृत करने का राजा का दायित्व ‘महावस्तु’ में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। फिर, इसमें राजा के साथ लगाई जाने वाली दो नई उपाधियों से उसके दूसरे दायित्वों का भी बोध होता है। वह है लोगों की रक्षा तथा परिपालना करना तथा नगर और ग्राम के लोगों के बीच उनके माता पिता के रूप में उपस्थित रहना राजा द्वारा रक्षा का वचन दिये जाने पर जनता उसे अपने धान का कुछ हिस्सा देने की प्रतिज्ञा करता है। राजा द्वारा वचनरक्षा आदि का वचन दिए जाने पर जनता उसे अपने धान की उपज का छठा भाग देने की प्रतिज्ञा करती है। यह दर ‘दीघ निकाय’ में बताई गई दर और कौटिल्य द्वारा निर्दिष्ट दर के भी अनुरूप है। यद्यपि ईसा की प्रथम दो शताब्दियों में व्यापार उन्नत अवस्था में था और राजा को नगरीय और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में रहने वालों की हितरक्षा में सन्नद्ध दिखलाया।

राजपद की उत्पत्ति के बारे में ‘शांतिपर्व’ में दो सिद्धान्त परिकल्पनाएं हैं। इन दोनों में राज्स की उत्पत्ति के अनुबंध सिद्धान्त के तत्व समाविष्ट हैं। पहली परिकल्पना 59वें अध्याय में प्रस्तुत की गई, जो दंड और दंडनीति के महत्त्व के दीर्घ विवेचन से शुरू होती है। वहां बताया गया है कि प्रशासन का उत्तरदायित्व संभालने के लिए विष्णु ने एक मानस पुत्र पैदा किया। लेकिन उसने तथा उसके अनेक वंशजों ने सन्यास ले लिया। जिसके फलस्वरूप अंतत: वेन का अत्याचारी शासन प्रारंभ हुआ। ऋषियों ने उसे मारकर उसकी दार्इं जांघ से पृथु को उत्पन्न किया, जो विष्णु की आठवीं पीढ़ी में पड़ता था। एक अनुबंध करके ऋषियों ने स्पष्ट शब्दों में वे शर्तें निर्धारित कर दीं जिनका पालन करके ही पृथु वैन्य सिंहासनासीन रह सकता था। ऋषियों ने उससे प्रतिज्ञा कराई कि वह दंडनीति के अनुसार शासन करेगा, ब्राह्मणों को दंड से परे मानेगा और संसार को वर्णसंकरता से बचाएगा। इस पर पृथु ने ऋषियों के नेतृत्व में देवताओं को वचन दिया कि वह सदा ब्राह्मणों की पूजा करेगा। इसके पूर्व उसने आश्वासन दिया कि वह वही करेगा जो उचित और राज्यशास्त्र से सम्मत है। यह अनुबन्ध राजा तथा जनता के बीच नहीं हुआ बल्कि ब्राह्मणों के साथ हुआ जो मोर्यों तथा गुप्त काल में उनके बढ़ते प्रभाव की पुष्टि करता है।

‘शांतिपर्व’ के 67वें अध्याय में राज्योत्पत्ति की जो ेदूसरी कल्पना है, उसे स्पष्टत: राज्य की उत्पत्ति का अनुबंध सिद्धान्त माना जा सकता है। इसमें सामाजिक और राजनितिक दोनों प्रकार के अनुबंध सिद्धान्त वर्णित है। कहा गया है कि प्राचीन काल में जब अराजकता व्याप्त थी तब लोगों ने आपस में करार किया। इसके अनुसार उन्होंने उन लोगों का बहिष्कार करने का निर्णय किया जो चोर थे, क्रूर थे, परधनहर्ता थे, और परस्त्रीगामी थे। साफ है कि यह परिवार और सम्पत्ति जैसी संस्थाओं की रक्षा के लिए एक सामाजिक करार था, जो बौद्ध ग्रंथों में इतने स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया।

राज्योदय की अगली अवस्था का संकेत राजनीतिक अनुबंध की स्थापना से मिलता है। कहा गया है कि लोगों ने अनुबंध (समय) का पालन नहीं किया, जिससे उनके दुर्दिन आए। अत: उन्होंने ब्रह्मा से जाकर एक ऐसा अधिपति (ईश्वर) मांगा जिसकी पूजा वे साथ मिलकर करेंगे और जो उनकी रक्षा करेगा। ब्रहमा ने मनु से इनका शासन संभालने को कहा, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया, क्योंकि दुष्ट और झूठे लोगों पर शासन करना दुष्कर कार्य था। परंतु लोगों ने मनु को यह प्रतिज्ञा करके तैयार किया कि वे उसके कोष की वृद्धि (कोषवर्धन) के लिए अपना 1/50 पशु, 1/50 सोना और 1/10 अन्न देंगें। उन्होंने यह भी प्रतिज्ञा की कि जो लोग शस्त्रास्त्र प्रयोग में सबसे आगे होंगे, वे उसी तरह मनु का अनुसरण करेंगे जिस तरह देवगण इंद्र करते हैं। इसके बदले लोगों ने राजा से अपनी रक्षा की मांग की, और यह वचन भी दिया कि राजरक्षित प्रजा जो पुण्य अर्जित करेगी, उसका चौथा भाग राजा को मिलेगा। मनु ने सहमत होकर एक बड़ी सेना के साथ दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया।

‘शांतिपर्व’ में विर्णेत दूसरे अनुबंध की विशिष्टता यह है कि करों के अतिरिक्त प्रजा पर यह जिम्मेदारी लादी गई है कि वह राजा को सर्वोत्तम योद्धा सैनिक सेवा के लिए दे। इस स्त्रोत के प्रासंगिक श्लाकों के कुछ अन्य पाठों में लोगों द्वारा राजा को सुंदर कन्या अिर्पेत किए जाने का उल्लेख है। राज्य विषयक प्राचीन भारतीय परिभाषा की दृष्टि से, दूसरा अनुबंध सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति के संबंध में सर्वोधिक पूर्ण सिद्धान्त माना जाना चाहिए। इसमें राजा और प्रजा दोनों शामिल हैं, जो क्रमश: स्वामी और जनपद से साम्य रखते हैं। लोगों के राजा को कर चुकाने और सैनिक सेवा देने के दायित्वों से प्रकट होता है कि कोष और दंड के तत्व विद्यमान थे। इस प्रकार, ‘शांतिपर्व’ के 67वें अध्याय में राज्य की उत्पत्ति का जो अनुबंध सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है, उसमें राज्य के सात अंगों में से चार महत्त्वपूर्ण अंग स्पष्टत: देखे जा सकते हैं।

राज्योत्पत्ति का अनुबंध सिद्धान्त राजनीतिक विचारधारा में प्राचीन भारतीय विचारकों का मौलिक योगदान माना जाना चाहिए। यद्यपि यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु ने राजनीतिविज्ञान को प्राय: स्वतंत्र शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया, पर उन्होंने राजा और जनसामान्य के पारस्परिक अनुबंध की संभावना पर ध्यान।

दैैवी सिद्धान्त

यह प्राचीनतम सिद्धान्त है, जिसके अनुसार यह माना जाता है कि राज्य की स्थापना आरम्भ में ईश्वर द्वारा हुई। यहूदी धर्म-ग्रन्थों में उल्लेख है कि ईश्वर ने स्वयं आकर राज्य स्थापित किया; अन्य धर्म ग्रन्थों के अनुसार ईश्वर ने किसी दैवी पुरूष को प्रेषित कर राज्य की रचना की। बाइबिल में उल्लेख है कि प्रत्येक आत्मा (मनुष्य) सर्वोच्च शक्तियों के अधीन हैं, क्योंकि सभी शक्तियों का स्त्रोत ईश्वर है। प्राचीन भारत में अधिकतर संस्थाओं की उत्पत्ति दैवी मानी जाती थी और राज्य की उत्पत्ति के विषय में भी ऐसी ही धारणा थी। प्राचीन भारत में राजा को देवांश माना जाता था, अर्थात् राजा की उत्पत्ति विभिन्न देवों के अंश से हुई है। इस सिद्धान्त का उल्लेख ऋग्वेद और यजुर्वेद आदि वैदिक साहित्य, ब्राह्मण ग्रन्थों, स्मृति, साहित्य, महाभारत और प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि ब्रह्मा ने राजा की सृष्टि की जिससे कि वह सभी प्राणियों की रक्षा कर सके। मनु ने यहाँ तक कहा कि बालक राजा का भी इस विचार से अपमान नहीं करना चाहिए कि वह साधारण मनुष्य होता हे। यह देवता है यद्यपि रूप में वह मनुष्य ही है। वेदों के अनुसार भी राजा को स्वयं इन्द्र समझना चाहिए और उसका इन्द्र के ही समान आदर करना चाहिए। महाभारत के शान्तिपर्व में यह वर्णन है कि प्राचीन काल में जब अराजकता फैली हुई थी, मनुष्यों ने आपस में एक समझौता किया और वे ब्रह्मा के पास गये और प्रार्थना की कि वह किसी को राजा बना दें। ब्रह्मा ने मनु को प्रथम राजा बनाया।

वैदिक परम्परा के अनुसार राजा में इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरूण, चन्द्र और कुबेर- विभिन्न देवों के अंश विद्यमान रहते हैं। परन्तु महाभारत के अनुसार कोई भी राजा केवल अभिषेक समारोह के उपरान्त ही राजा बनता है। इस विषय में दीक्षितर ने लिखा है-जबकि स्टूअर्ट राजाओं का दैवी अधिकार में विश्वास था, राजा की शक्ति के विषय में हिन्दू संकल्पना यह थी कि प्रजा की रक्षा करना ईश्वर द्वारा विहित कर्त्तव्य है। प्रथम नाथ बनर्जी का विचार है कि केवल धार्मिक राजा ही दैवी समझा जाता था और राजा देवता नहीं वरन् नरदेवता माना जाता था। परन्तु डॉñ घोषाल ने शान्ति पर्व के अध्याय 58 के अन्तिम श्लोक को उद्धृत करते हुए यह तर्क दिया है कि राजा केवल देवता नहीं वरन् देवता के तुल्य होता है।

प्राचीन भारत मेंप्रतिपादित दैवी सिद्धान्त सम्बन्धी विचारों की पाश्चात्य विचारों से तुलना करते हुए डॉ0 घोषाल ने कहा है- “पश्चिम में प्रतिपादित दैवी सिद्धान्त मुख्यत: हैं- (1) राजतन्त्र ईश्वरकृत संस्था है। (2) राजाओं को शासन का आनुवंशिक अधिकार है; (3) राजा केवल ईश्वर के ही प्रति उत्तदायी है; (4) राजाओं का विरोध नहीं करना चाहिए; और (5) राजतन्त्र ही शासन का अनन्य उचित रूप है। परन्तु प्राचीन भारत में दैवी सिद्धान्त के सम्बन्ध में भिन्न धारणाऐं थी। प्राचीन भारतीय विचारक यह नहीं मानते कि राजा केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी होता है इसके विपरित स्मृतियों की धारणा तो यह है कि राजा धर्म और कानूनों के अधीन होता है। मनु और भीष्म ने बुरे राजा के विरूद्ध विरोध को न्यायोचित ठहराया है। अन्त में प्राचीन भारतीय सिद्धान्त में ऐसा कोई समानान्तर सिद्धान्त नहीं है कि जन्म प्राप्त अधिकार छीना नहीं जा सकता। ग्रन्थों में अनेक राजाओं के उदाहरण है जिन्हें उनकी प्रजा ने सिंहासन से अलग किया तथा भी की, यस्था वेन और राजा सगर का पुत्र असमंज। आधुनिक राजशास्त्री इस सिद्धान्त को बुद्धिसंगत नहीं मानते और इसे सर्वथा त्याग दिया गया है। वास्तव में आज के युग में तो राजतन्त्र का स्थान ही प्रजातन्त्र अथवा अन्य प्रकार के सरकारों ने ले लिया है।

शक्ति अथवा युद्ध मूलक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के नाम से ही स्पष्ट है। राज्य की उत्पत्ति शक्ति-प्रसार की भावना या अधिपत्य के प्रयोग से हुई है। इसके अनुसार शक्तिशाली कबीलों, जनों के सरदारों ने दुर्बल कबीले अथवा जनों पर विजय प्राप्त कर राज्य की स्थापना की। विजयी कबीलों का सरदार शासक बना तथा शेष जन शासित रहे। दूसरे शब्दों में, राजा की उत्पत्ति युद्ध से हुई। ऐतरेय ब्राहमण में वर्णन है कि देवासुर संग्राम में देव पराजित हुए। उन्होंने अपनी पराजय का कारण यह माना कि उनका कोई राजा न था जबकि असुरों का राजा था। अत: उन्होंने भी एक राजा चुनने का संकल्प किया। इस पर टिप्पणी करते हुए डॉñ जायसलाल ने लिखा है कि यदि इसका कोईे ऐतिहासिक महत्त्व है तो यही की आरम्भ में आर्यों ने द्रविड़ों से, ‘राजपद की संस्था को ग्रहण किया जिन्हें वे असुर कहते थे वे उनकी तुलना में अपने को सुर।’

यह तो माना हुआ सत्य है कि प्राचीन आर्य प्रारम्भ में जनों में संगठित थे और प्रत्येक जन का सबसे ज्येष्ठ अथवा शक्तिशाली पुरूष नेता होता था। वही अपने जन का युद्ध में नेतृत्व करता था। अत: प्रारम्भिक राज्यों के निर्माण में शक्ति और युद्ध का अवश्य ही महत्त्वपूर्ण भाग रहा होगा। डॉñ सिन्हा ने राष्ट्र (अथवा प्रथम राज्य की उत्पत्ति के विषय में लिखा है- ‘जब आर्य जन (कबीले) निश्चित भूभाग परी रहने लगे तो उन्हें उस भूमि से अवश्य ही प्रेम उत्पन्न हुआ होगा; उस पे्रम के साथ उनमें आदिवासियों के प्रति घृणा और अपने वर्ण (रंग) तथा विजित प्रदेश के मरण के लिए गहरी चिन्ता उत्पन्न हुई होगी। इस प्रकार आर्यों के मन में उसी भू भाग के प्रति जहाँ के वे निवासी थे एक सुदृढ़ भावना पैदा हुई होगी; क्योंकि उस भूमि से वह कभी हटना नहीं चाह सकते थे। इस भावना ने जिस प्रतिरक्षा व आक्रमण की आवश्यकता ने अधिक सुदृढ़ बनाया होगा, प्रारम्भिक राजन एक चेतना का रूप धारण किया होगा और इस प्रकार प्रथम राज्य, जिसे वैदिक आर्यों ने राष्ट्र कहा, उत्पन्न हुआ। पाश्चात्य विद्वान जैंक्स ने भी कहा है कि ऐतिहासिक दृष्टि से यह सिद्ध करने में कोई कठिनाई नहीं कि आधुनिक ढंग के सभी राजनीतिक समुदायों का अस्तित्व सफल युद्धक्रिया का परिणाम है। अन्य राजनीतिक विचारक भी यह स्वीकार करते हैं कि राज्य की उत्पत्ति में शक्ति का प्रयोग अथवा युद्ध एक महत्त्वपूर्ण योग देने वाला कारण रहा है। परन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारत में शक्ति सिद्धान्त का किसी विचारक ने प्रतिपादन नहीं किया।

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