राष्ट्रीय शक्ति के तत्व एवं सीमाएँ

अनुक्रम
साधारण शब्दों में व्यक्ति के संदर्भ में शक्ति से अभिप्राय है जब एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को नियन्त्रित करने और उनसे मनचाहा व्यवहार कराने और उन्हें अनचाहा व्यवहार करने से रोकने की सामर्थ्य या योग्यता से है। जब यही बात सभी व्यक्ति मिलकर राष्ट्र के बारे में अभिव्यक्त करके दूसरे राज्य/राज्यों के संदर्भ में करते हैं तो वह राष्ट्रीय शक्ति होती है।
  1. ऑरगैंस्की - राष्ट्रीय शक्ति दूसरे राष्ट्रों के आचरण अपने लक्ष्यों के अनुसार प्रभावित करने की क्षमता है। जब तक कोई राष्ट्र यह नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, चाहे वह कितना ही सम्पन्न क्यों न हो, परन्तु उसे शक्तिशाली नहीं कहा जा सकता है।
  2. पेडलफोर्ड एवं लिंकन- यह शब्द राष्ट्र की भौतिक व सैनिक शक्ति तथा सामथ्र्य का सूचक है। राष्ट्रीय शक्ति सामथ्र्य का वह योग है जो एक राज्य अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु उपयोग में लाता है।
  3. जार्ज रचवार्जन बर्जर - शक्ति अपनी इच्छा को दूसरों पर लादने की क्षमता है जिसका आधार न मानने पर प्रभावशाली विरोध सहना पड़ सकता है।
  4. हेंसजे मारगेन्थाऊ - शक्ति, उसे कार्यान्वित करने वालों व उनके बीच जिन पर कार्यान्वित हो रही है एक मनोवैज्ञानिक संबंध है। यह प्रथम द्वारा द्वितीय के कुछ कार्यों को उसके मस्तिष्क पर प्रभाव डालकर नियन्त्रित करने की क्षमता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि राष्ट्रीय शक्ति एक राज्य द्वारा दूसरे राज्य को प्रभावित करने की क्षमता है। परन्तु इस क्षमता के पीछे दण्डात्मक शक्ति भी होती है उसी के डर से शक्ति प्रभावी हो सकती। बिना दण्डात्मक या प्रतिबंध लगाने की क्षमता के एक राष्ट्र दूसरे पर इसे लागू नहीं कर सकता।
परन्तु शक्ति के संदर्भ में कुछ बातों को जानना अत्यंत आवश्यक है। प्रथम, शक्ति की कल्पना रिक्तता के वातावरण में नहीं की जा सकती, अपितु इसके प्रयोग हेतु कम से कम दो या दो से अधिक राष्ट्र/राष्ट्रों के समूह का होना जरूरी है। द्वितीय, शक्ति के संबंध हमेशा दो विरोधियों के मध्य ही नहीं होते, बल्कि कुछ परिस्थितियों में मित्र राष्ट्रों के बीच भी पाये जा सकते हैं। तृतीय, शक्ति का प्रयोग विरोधियों व मित्रों के इलावा तटस्थ राष्ट्रों के बीच भी हो सकते हैं। चतुर्थ, शक्ति को वस्तु या पदार्थ नहीं, बल्कि राष्ट्रों के मध्य संबंधों की स्थिति है। अन्तत: शक्ति के विभिन्न रूप हो सकते हैं।

राष्ट्रीय शक्ति के प्रमुख तत्व

शक्ति के विभिन्न तत्व होते हैं। इन्हीं तत्वों को कई बार शक्ति के निर्धारक तत्व भी कहा जाता है, परन्तु ऐसा कहना अनुचित है। क्योंकि शक्ति के तत्व अपने आप में शक्ति नहीं है, अपितु उनका होना शक्ति प्राप्त करने में सहायक होता है। अत: इन तत्वों के संबंध में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है - (i) सभी तत्व एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं तथा परस्पर निर्भरता रखते हैं। (ii) इन तत्वों को वस्तुनिष्ठ रूप में मापना कठिन होता है, उनके संबंध में अनुमान ही लगाया जा सकता है। (iii) इनका सही मात्रा में आंकलन इसलिए सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि ढांचागत एवं तकनीकी परिवर्तनों के कारण इनमें भी बदलाव सम्भव है। (iv) राष्ट्रीय शक्ति किसी एक तत्व से नहीं बल्कि विभिन्न तत्वों के किसी विशेष परिस्थिति में योग पर आधारित होती है। (v) इन्हें अपनी प्रवृत्ति के स्वरूप के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है।

विभिन्न विद्वानों ने राष्ट्रीय शक्ति के तत्वों का अलग-अलग आधारों पर वर्गीकृत किया है। मारगेन्थाऊ ने इसे दो भागों स्थाई व परिवर्तनशील में बांटा है। उनके अनुसार जहां भूगोल व प्राकृतिक संसाधन इकाई है, वहीं सैन्य तैयारी, आबादी, राष्ट्रीय चरित्र, राजनय व सरकार परिवर्तनशील है। औंरगेस्की इन्हें प्राकृतिक (भूगोल, संसाधन, आबादी आदि) एवं सामाजिक (आर्थिक विकास, राजनैतिक ढांचा, राष्ट्रीय चरित्र आदि) भागों में बांटते हैं। ई.एच.कार इन्हें सैन्य शक्ति, आर्थिक शक्ति एवं विचारों पर शक्ति के रूप में विभाजित करते हैं। महेन्द्र कुमार इन्हें प्राकृतिक (भूगोल, संसाधन, आबादी), सामाजिक (आर्थिक विकास, राजनैतिक ढांचा, राष्ट्रीय मनोबल) तथा विचारात्मक (आदर्श, बुद्धिमानी एवं नेतृत्व की बुद्धिमता) रूप में वर्णन करते हैं। पॉयर एवं पर्किंस इन्हें मूर्तरूप (मनोबल एवं विचारधारा) के रूप में वर्णित करते हैं। इन विभिन्न वर्गीकरणों के आधार पर कुल मिलाकर एक जैसे ही तत्वों को सम्मिलित किया गया है। इन तत्वों के गहन विश्लेषण के बाद ही इनका राष्ट्रीय शक्ति में योगदान बताना सम्भव हो सकेगा। अत: इन तत्वों के गहन विश्लेषण की अति आवश्यकता है जो इस प्रकार से है-

भूगोल

भूगोल भी देश की राष्ट्रीय शक्ति में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। कई विद्वान तो भूगोल को ही राष्ट्रीय शक्ति के रूप में देखते हैं। भूगोल के राष्ट्रीय शक्ति से सम्बन्धित चार बातें अतिमहत्वपूर्ण हैं - (क) क्षेत्रफल / आकार; (ख) स्थलाकृति; (ग) स्थिति; तथा (घ) (जलवायु)।

(क) क्षेत्रफल/आकार- किसी भी देश का बड़ा आकार उसको शक्तिशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोई भी महाद्वीपीय आकार का देश ही बड़ी शक्ति का रूप धारण कर सकता है न कि कोई छोटे से क्षेत्रफल का देश। लेकिन यदि यह बड़ा आकार रेगिस्तान, घने जंगल, बर्फीला प्रांत है तब यह राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने में सक्षम नहीं होता। परन्तु यदि यह क्षेत्र रहने के योग्य है तभी इस आकार का लाभ हो सकता है। बड़ा आकार सैन्य व गैर सैन्य दोनों स्थितियों में राष्ट्रीय शक्ति का विस्तार करता है। सैन्य रूप से बड़े आकार के कई सैनिक लाभ हैं। युद्ध के समय देश की सेना को पीछे भी हटना पड़े तो यह सम्भव है। इसी प्रकार इससे सामरिक गहनता भी प्राप्त होती है। अत: लम्बे युद्धों को चलाने व उनमें अपनी सुरक्षा हेतु बड़ा आकार सहायक सिद्ध होता है।

गैर सैन्य रूप से भी बड़ा आकार कई सन्दर्भों में राष्ट्र की शक्ति बढ़ाता है। इसके अंतर्गत एक बड़ी जनसंख्या के भरण पोषण की व्यवस्था उचित प्रकार से की जा सकती है। बड़े क्षेत्रफल वाले राष्ट्रों में प्राकृतिक खनिजों एवं संसाधनों की उपलब्धिता की सम्भावनाएं अधिक रहती है। इसके अतिरिक्त, इसमें उद्योगों को राज्य के विभिन्न भागों में होने से युद्ध के समय राष्ट्र सम्पूर्ण विनाश से बच सकता है। राष्ट्र का युद्ध में नुकसान होने पर भी कुछ आबादी व उद्योग धन्धे बाद में भी सुरक्षित बच जाते हैं। अत: एक बड़ा राज्य अवश्य ही शक्तिशाली बनने की सम्भावनाएं रखता है।

(ख) स्थलाकृति - किसी भी देश की स्थलाकृति भी उसे शक्ति बनाने में सहायक/रुकावट बन सकती है। किसी देश की भूमि पहाड़ी व दूरगम्य है या पैदावार वाला भूमिगत मैदान है या बर्फ से ढंका प्रान्त है यह उसे लाभ/हानि की स्थिति में रख सकता है। द्वितीय, स्थलाकृति के आधार ही सीमाओं के आकलन की स्थिति निर्भर करती है। क्या इस प्रदेश की प्राकृतिक सीमाएँ है या अस्पष्ट सीमाएं है इस प्रकार उसकी सुरक्षा सम्बन्धी दबाव निर्भर करता है। तृतीय, क्या एक राष्ट्र समुद्र से सीधे लगा हुआ है या वह एक भू-बद्ध राष्ट्र है जो अपने समुद्री मार्ग हेतु किसी अन्य पर निर्भर करता है आदि इस बात पर भी उसके शक्तिशाली बनने की क्षमता पर सीधा असर पड़ता है। अन्तत: उसका बाह्य विश्व से किस प्रकार के रिश्ते हैं यह भी निर्भर करता है उसकी स्थलाकृति पर। क्योंकि उससे पड़ौस की ओर जाने के मार्ग सरल है, व्यापार सम्भव है या नहीं, आदि इस मुद्दे को काफी हद तक प्रभावित करते हैं।

(ग) स्थिति- राष्ट्र शक्ति के सन्दर्भ में उसकी स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। प्रथम, किसी भी राष्ट्र की भूमध्य रेखा से दूरी व नजदीकी के कारण वहां के जलवायु, जनसंख्या, मौसम आदि पर सीधा असर पड़ता है। यह सुखद एवं कष्टदायक दोनों की स्थिति पैदा कर सकता है। द्वितीय, किसी राष्ट्र की स्थिति पर ही यह निर्भर होता है कि वह राष्ट्र समुद्री शक्ति या थल शक्ति बनने के योग्य है। तृतीय, किसी राष्ट्र की स्थिति उसकी विदेश नीति को भी निर्धारित करती है। अन्तत:, किसी राष्ट्र की स्थिति ही उसके सामरिक महत्व को कम या ज्यादा कर सकती है। अत: किसी भी राष्ट्र की स्थिति यदि उचित होगी तो उसके बड़ी शक्ति बनने की क्षमताएं बनी रहती है।

(घ) जलवायु- जलवायु किसी भी राष्ट्र की शक्ति बनने में अहम भूमिका निभाती है किसी राष्ट्र के उत्पादन, जनसंख्या, मानव संसाधन आदि का विकास सम्भव है। यदि किसी राष्ट्र की जलवायु वहां की आबादी के रहने, उद्योग करने, फलने-फूलने के लायक नहीं है तो वह राज्य एक बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। बड़े-बड़े रेगिस्तान, ठंडे पड़े क्षेत्र, तापमान की अधिकता व अपेक्षाकृत नमी वाले क्षेत्रों में, रेगिस्तान, ठंडे पड़े क्षेत्र में राष्ट्रीय मानव संसाधन, वनस्पति, उद्योग आदि का विकास सम्भव नहीं है। इसके लिए उपयुक्त जलवायु का होना अति आवश्यक है। वर्तमान सन्दर्भ में यह तर्क भी दिया जाता है कि विज्ञान के विकास ने प्रकृति की इन चुनौतियों पर कुछ हद तक विजय प्राप्त कर ली है। परन्तु यह तर्क एक दो दस व्यक्तियों या कुछ चन्द क्षेत्रों के विकास में शायद सहायक हो सके लेकिन सम्पूर्ण राष्ट्र के संदर्भ में सफल नहीं हो सकता है। इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक स्थितियों का मानव व विज्ञान सीमित उपाय ढूंढ सकता है लेकिन उसकी विपरीत दिशा में ज्यादा देर तक नहीं टिक सकता। अत: किसी भी देश का आकार, स्थलाकृति, स्थिति व जलवायु सम्बन्धित भौगोलिक परिस्थितियां सहायक हो तभी उस राष्ट्र के शक्तिशाली बनने की सम्भावनाएं बनी रहती हैं।

प्राकृतिक संसाधन

राष्ट्रीय शक्ति के निर्माण में एक अन्य सहायक तत्व है उस देश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन। इन संसाधनों से अभिप्राय है मुख्यत: खनिज, खाद्यान्न, भूमि और भूमि से प्राप्त अन्य पदार्थ। जिस देश के पास जितना अधिक खनिज पदार्थ उपलब्ध होगे उसके उतनी ही अधिक शक्तिशाली होने की सम्भावनाएं होती है। किसी भी राष्ट्र के पास प्रमुख खनिज पदार्थ जैसे तेल, कोयला, लोहा, ताम्बा, पीतल, माईका, यूरेनियम आदि जितनी धातुएं प्रचूर मात्रा में होंगी वह उतना ही शक्तिशाली होगा। उदाहरण के रूप में 1973 से पहले अरब देश अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण नहीं थे परन्तु तेल की उपलब्धता ने उन्हें महत्वपूर्ण बना दिया। परन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि केवल खनिजों की उपलब्धिता के कारण कोई स्वयंमेव शक्तिशाली हो जाता है, अपितु उन खनिजों के उपयोग हेतु वहां पर वैज्ञानिक क्षमता व औद्योगीकरण भी होना अनिवार्य है। इसीलिए शायद अरब राष्ट्र तेल के मालिक होने के कारण अमीर है परन्तु विश्वशक्ति नहीं हैं। परन्तु आज किसी भी सैन्य बल हेतु कच्चे माल का प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना आवश्यक है।

विज्ञान के बढ़ते विकास के कारण आज कई खनिज पदार्थ सामरिक महत्व भी प्राप्त कर चुके हैं। उदाहरणस्वरूप, यूरेनियम, थोरियम, पेट्रोलियम आदि पर नियंत्रण रखना अब सामरिक शक्ति हेतु अति आवश्यक है। परन्तु यहां भी यह सत्य है जब तक किसी राष्ट्र के पास परमाणु शस्त्र, प्रक्षेपास्त्र या अन्तरिक्ष उपग्रहों/यानों की क्षमता नहीं है वह इन परमाणु खनिजों का उचित उपयोग नहीं कर सकता।

सैन्य के साथ-साथ गैर सैन्य आवश्यकताओं हेतु वनस्पति एवं खाद्यान्नों के उत्पादन में भी राष्ट्र का आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। अपने इन घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह दूसरों पर निर्भर रहेगा तो बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। उदाहरणस्वरूप, 1950 व 1960 के दशकों में भारत की अमेरिकी गेहूं पर निर्भरता ने उसकी विदेश नीति को भी प्रभावित किया है। 1970 के दशक में आई हरित क्रांति के बाद स्थिति में काफी बदलाव आया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, उनका विकास एवं उपयोग के आधार पर ही कोई राष्ट्र महत्वपूर्ण शक्ति बन सकता है।

जनसंख्या - 

यद्यपि जनसंख्या के अनुपात में किसी राष्ट्र की शक्ति का आकलन नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होता तो चीन व भारत को विश्व की पहली व दूसरी बड़ी शक्ति होना चाहिए था। परन्तु यह भी सत्य है कि जनसंख्या के अभाव में कोई राष्ट्र महान शक्ति नहीं बन सकता। उदाहरणस्वरूप, कनाडा के पास बड़ा क्षेत्रफल, खनिज पदार्थ आदि होने के बाद भी जनसंख्या की कमी के कारण एक बड़ी ताकत नहीं है। इसीलिए जनसंख्या कुछ राष्ट्रों के लिए शक्तिशाली होने के लिए आवश्यक है तो कुछ के लिए इसके विपरीत। जैसे कनाडा, रूस, आस्टे्रलिया के लिए जरूरी तत्व हैं, तो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि के लिए यह एक अभिशाप है। वास्तव में प्रत्येक देश के क्षेत्रफल, संसाधन, औद्योगिक विकास आदि के संदर्भ में वहां की जनसंख्या की अधिकतम मात्रा तय होती है।

इसके अतिरिक्त, जनसंख्या अपने आप में शक्ति नहीं है, अपितु जनसंख्या की गुणात्मक स्थिति का है यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। एक राष्ट्र की भूखी, बीमार, बेरोजगार, अशिक्षित आबादी उसके लिए लाभप्रद सिद्ध नहीं हो सकती। बल्कि उस राष्ट्र की निपुणता उसकी जनसंख्या की अच्छी सेहत, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण आदि पर निर्भरता करता है। शीतयुद्धोत्तर युग में किसी राष्ट्र के विकास के एक मानक के रूप में उसके मानव संसाधन के विकास को माना जाता है। इस युग में जहां भूण्डलीकरण का दौर है वहां सेवाओं के क्षेत्रों का बहुत विकास हो रहा है। अत: आज मानव संसाधन के विदेशों में निर्यात की सम्भावनाएं भी बढ़ रही है। अत: हम कह सकते हैं कि गुणात्मक रूप से उच्च दर्जे की जनसंख्या जहां राष्ट्र शक्ति के विकास का साधन है, वहीं कमजोर, बीमार व अशिक्षित जनसंख्या उसका मार्ग अवरुद्ध करती है। इसीलिए जनसंख्या एक महत्वपूर्ण तत्व अवश्य है परन्तु किस प्रकार की जनसंख्या यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।

आर्थिक एवं तकनीकी विकास

किसी राष्ट्र के संसाधनों का उचित प्रयोग उस राष्ट्र के आर्थिक व तकनीकी विकास पर निर्भर करता है। यदि आर्थिक विकास सुचारू होगा तो वह वहां की जनसंख्या के जीवन स्तर को सुधारने के साथ-साथ उस राष्ट्र की सैन्य व गैर सैन्य क्षमताओं के विकास के साथ-साथ विदेशी नीति को भी सशक्तता प्रदान करेगा।

आर्थिक विकास का अर्थ है किसी राष्ट्र के आर्थिक संगठन की सुचारू व्यवस्था, जिसके आधार पर उस राष्ट्र का उत्पादन बढ़ सके। इसके अतिरिक्त, औद्योगीकरण का विकास भी अर्थव्यवस्था को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करता है इससे देश में आंतरिक रूप से तो लोगों का स्तर सुधरेगा ही, तथा इसके साथ-साथ उसके उत्पादन से पूंजी में वृद्धि भी होगी। इस पूंजी वृद्धि का उपयोग राष्ट्र आन्तरिक के साथ-साथ विदेशी नीति के उद्देश्यों हेतु भी करेगा। पूंजी सम्पन्न देश गरीब देशों को आर्थिक सहायता प्रदान कर सकता है। यह आर्थिक सहायता अन्य राष्ट्रों में उसका समर्थन बढ़ायेगी। इस समर्थन के आधार पर उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि सुधरेगी तथा अधिकतर राष्ट्र विभिन्न मुद्दों पर उसका साथ देंगे। इस प्रकार वह अन्य राष्ट्रों में अपने प्रभाव के द्वारा अथवा आर्थिक सहायता बन्द कर देने के डर से अपना प्रभुत्व जमाने में सफल हो सकेगा। ज्यादातर शक्तिशाली राष्ट्रों के प्रभुत्व के पीछे आर्थिक सहायता एक प्रमुख कारण रहा है।

संचार तकनीक व अन्य क्षेत्रों में तकनीकी विकास न केवल राज्यों की क्षमताओं का विकास करेगा, बल्कि युद्ध व शान्ति के समय उसकी प्रभाविकता बढ़ायेगा। तकनीकी विकास के माध्यम से सभी क्षेत्रों में नवीनतम प्रयोग किए जायेंगे जो कम खर्चीले, टिकाऊ, उत्पादकता बढ़ाने वाले, सुनिश्चित व सुस्पष्ट होंगे। इससे देश में संचार, कृषि, स्वास्थ्य, उद्योग आदि सभी क्षेत्रों का तीव्र विकास होगा। इससे बाह्य जगत में राष्ट्र द्वारा शक्ति प्रदर्शन की क्षमता का भी विकास होगा। इसके अतिरिक्त, इससे राष्ट्र की जनता का मनोबल भी बढ़ा रहेगा। विदेशी नीति के संदर्भ में तकनीकी हस्तांतरण के माध्यम से वह राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों की विदेश नीतियों को भी प्रभावित करेगा। अत: तकनीकी विकास आर्थिक विकास को अत्यधिक स्थाई व दूरगामी बनाने में सहायक होगा।

सैन्य क्षमता- 

एक शक्तिशाली राष्ट्र के पास अपने संसाधनों एवं क्षमता के अनुरूप सैन्य शक्ति का होना भी आवश्यक है। यह सैन्य क्षमता न अधिक बड़ी तथा न ही अधिक छोटी होनी चाहिए, बल्कि उस राष्ट्र की विदेश नीति की प्रतिबद्धताओं को लागू करने में सक्षम होनी चाहिए। यह सेना पूर्ण रूप से प्रशिक्षित एवं उचित समन्वय के आधार पर कार्य करने वाली होनी चाहिए। इस सन्दर्भ में राष्ट्र की सैन्य क्षमता तीन प्रमुख तत्वों - सैन्य नेतृत्व, गुप्तचरी व्यवस्था एवं हथियारों की उपलब्धता - पर निर्भर करती है।

किसी राष्ट्र की सेना कितनी ही सुसज्जित हो, बड़ी संख्या में हो, अच्छे हथियार रखती हो आदि, परन्तु यदि उसका नेतृत्व कुशल हाथों में है तो अपने उद्देश्य में सफल होगी वरना असफल रहेगी। कुशल सामरिक रणनीति व स्थिति के अनुसार सैन्य संचालन से ही कोई भी सेना सही अर्थों में अपनी चुनौतियों का मुकाबला कर सकती है। आधुनिक युग में सैन्य कौशल के साथ-साथ दूसरे राष्ट्र की तैयारियों का अनुमान भी अतिआवश्यक होता है। यह कार्य राष्ट्रों की गुप्तचरी सेवाओं के माध्यम से होता है। वर्तमान समय में गुप्तचरी आधुनिक संयंत्रों जैसे उपग्रहों आदि के माध्यम से भी होती है, परन्तु आज भी मानवीय तत्वों द्वारा की जाने वाली गुप्तचरी को भी नहीं नकारा जा सकता। गुप्तचरी की विफलता भी कई बार सैन्य हार या परेशानी का कारण हो सकता है। भारत-चीन युद्ध (1962) व भारत-पाक कारगिल संघर्ष (1998) काफी हद तक गुप्तचरी व्यवस्था की असफलता का प्रतीक है। इन दोनों तत्वों के अतिरिक्त हथियारों की उपलब्धता भी सैन्य शक्ति प्रदर्शन हेतु महत्वपूर्ण तत्व है। वर्तमान समय में परमाणु हथियारों के विकसित होने से कई राष्ट्रों का मानना है कि सुरक्षा सुनिश्चित हो गई है। लेकिन वास्तव में देखा जाए तो परमाणु, जैविक एवं रासायनिक हथियार मुख्यत: निरोधक व्यवस्था हेतु अधिक प्रयोग होते हैं। ये हथियार युद्ध से अधिक राजनय के हथियार हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि ये आज भी शक्ति के प्रतीक के रूप में माने जाते हैं तथा इनको रखने वाले राष्ट्रों से युद्ध करने से पहले विरोधी राष्ट्र को कई बार सोचना पड़ता है। इसके साथ-साथ यह भी निश्चित है कि वास्तविक युद्ध में आज भी अति आधुनिकतम परम्परागत हथियार ही प्रयोग में लाये जाते हैं। अत: किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र के पास कितने ही जैविक, परमाणु व रासायनिक हथियार हों, परन्तु परम्परागत हथियारों में श्रेष्ठता होना उसके लिए अति आवश्यक है।

सरकारी ढांचा

एक अच्छा सरकारी तंत्र का होना भी शक्तिशाली राष्ट्र हेतु आवश्यक होता है। सरकार के माध्यम से ही शक्ति के तत्वों को वास्तविकता प्रदान की जाती है। इस सन्दर्भ में सरकार के समक्ष दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करना अति अनिवार्य होता है - (i) नीतियों एवं संसाधनों में समन्वय बनाये रखना; तथा (ii) विदेश नीति हेतु जनमत का समर्थन जुटाना। (i) एक अच्छी सरकार विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्यों की पहचान कर अपनी क्षमता व संसाधनों के द्वारा उन्हें लागू करने का प्रयास करती है। यदि उद्देश्य अत्यधिक विशाल होंगे तो जन साधारण पर करों का भार बढ़ने के साथ-साथ उनसे धन प्राप्ति की स्थिति में राज्य निराशा का शिकार होगा। यदि उद्देश्य बहुत छोटे रखे तो राष्ट्र दुनिया के सामने कमजोर प्रदर्शित होगा तथा अंतर्राष्ट्रीय समाज में अपना उचित स्थान खो देगा। अत: एक ऐसी सरकार का होना अति आवश्यक है जो सही रूप से राष्ट्र के उद्देश्यों एवं साधनों में तालमेल पैदा कर सके। (ii) राज्य की किसी भी प्रकार की योजना, संसाधन, क्षमता आदि का प्रयोग जब तक किया जा सकता है जब तक उन विदेश नीति के उद्देश्यों को जनमत का समर्थन प्राप्त नहीं हो। यह कार्य जितना मुश्किल है उतना ही जरूरी भी। विदेश नीति काफी हद तक अपनी गति खो देती है यदि उसे वहां के लोगों का समर्थन न मिले। एक अच्छी सरकार को लोगों की इच्छाओं व विदेश नीति के उद्देश्यों के बीच दूरी को कम करना होगा। उसे जनमत के नेतृत्व के रूप में आगे आना होगा। जरूरत पड़े तो कुछ गैर-जरूरी विदेशी नीति के मुद्दों पर जनमत से सहयोग भी करना पड़ेगा। अत: अच्छा सरकारी ढांचा भी विदेश नीति के प्रभावी व शक्तिशाली होने में अहम् भूमिका निभा सकता है।

विचारधारा

राष्ट्रीय शक्ति के विस्तार में विचारधारा की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विशेषकर 20वीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय संबंध विचारधाराओं के द्वारा निर्धारित हुए हैं। यह व्यक्ति, समाज, अर्थव्यवस्था, राजनैतिक व्यवस्था आदि विषयों पर जनता का एक निश्चित दृष्टिकोण होता है। इन्हीं दृष्टिकोण को सामने रखकर राष्ट्र अपनी क्षमताओं/शक्ति का विकास करता है। सकारात्मक रूप में विचारधारा राष्ट्रीय का जनता को एकजुट करने का कार्य करती है। इससे लोगों में सहयोग व समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। विचारधाराएं व्यक्ति की अपेक्षा समाज या समुदाय पर अधिक बल देती हैं। अत: इसे सरकार का जन समर्थन भी आसानी से मिल जाता है। यह राज्यों द्वारा शक्ति के प्रयोग को भी आवरण प्रदान कर देती है। अत: यहां शक्ति प्रयोग महज संघर्ष हेतु नहीं अपितु कुछ अन्तिम लक्ष्य प्राप्ति हेतु होता है। इसीलिए राष्ट्र अपनी शक्ति का विकास जन समर्थन के साथ-साथ सरलतापूर्वक कर लेता है।

परन्तु कई बार विचारधाराओं द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावनाएं बनती रहती है। जैसे दोनों विश्व युद्धों के बीच नाजीवाद, फासीवाद, साम्यवाद आदि विचारधाराओं में संघर्ष व टकराव चलता रहा। इसके अतिरिक्त ज्यादातर विचारधाराएं तानाशाही, प्रवृत्तियों को जन्म देती हैं। इससे समाजों में जहां पूर्ण रूप से एक विचारधारा को स्वीकार न किया हो, विभाजन एवं संघर्ष की स्थिति भी बन रही है।

1990 के दशक के बाद विचारधाराओं का अंत होता प्रतीत हो रहा है। क्योंकि सभी राष्ट्र भूमण्डलीकरण, मुक्त बाजार व उदारवाद के दौर में विचारधारा छोड़ कर पूंजीवादी व्यवस्था से जुड़ने लगे हैं। परन्तु सही अर्थों में देखें तो यह भी अपनी एक विचारधारा है। इसके भी लाभ व हानियां हैं। इसके आधार व भी कुछ राज्य अति शक्तिशाली (अमीर) होते जा रहे हैं, तथा कमजोर राष्ट्र और कमजोर (गरीब) होते जा रहे हैं। अत: यह भी शक्ति बढ़ाने हेतु कुछ राष्ट्रों के हक में कार्यरत है।

मनोबल

मनोबल राष्ट्रीय शक्ति का एक सूक्ष्म परन्तु प्रभावशाली तत्त्व है। मनोबल का अर्थ है किसी राष्ट्र के निवासियों में निष्ठा, विश्वास, साहस आदि चारित्रिक गुणों का योग। इन गुणों से न केवल व्यक्ति का आत्मविश्वास ही बढ़ता है, अपितु इससे राष्ट्रीय हितों को भी बल मिलता है। कोई भी राष्ट्र तब तक सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकता जब तक उसकी आन्तरिक व विदेश नीतियों को पूरे जोश व जन समर्थन हासिल न हो। इसके द्वारा ही मनुष्य आपसी मतभेदों को भुलाकर स्वेच्छापूर्वक राष्ट्रीय हितों हेतु बड़े से बड़ा बलिदान देने के लिए तैयार हो जाता है। इसी मनोबल के आधार पर राष्ट्र अपनी संदिग्ध विजय को निश्चित जीत में बदल सकता है। इसे राष्ट्र प्रेम के समकक्ष भी माना जाता है। इसके सैनिकों में संचार से राष्ट्र बड़े-बड़े युद्ध भी जीत लेता है। वर्तमान युग में युद्ध जहां केवल सैनिकों तक सीमित न रहकर प्रत्येक नागरिक को भी शामिल करता है उस दृष्टि से मनोबल और अधिक महत्वपूर्ण बन गया है। मनोबल युद्ध ही नहीं, अपितु शान्तिकाल में भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

राष्ट्रीय मनोबल बढ़ाने के प्रमुख रूप से चार कारक उत्तरदायी होते हैं - (i) राष्ट्र के साथ तादात्म्य; (ii) राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति, (iii) सरकार में विश्वास; (iv) विचारधारा। राष्ट्रीय तादात्म्य से अभिप्राय है कि नागरिक किस सीमा तक उस राष्ट्र से अपने को जुड़ा हुआ महसूस करता है। अपने गौरवमय इतिहास को पहचानता व उसी प्रकार गौरव बढ़ाना हेतु प्रयासरत रहना राष्ट्रीय गोरव की अनुभूति कराता है। सरकार में विश्वास से उसका मनोबल और अधिक बढ़ जाता है। अन्तत: विचारधारा लोगों में दृढ़ता, एकता व मनोबल को जाग्रत करती है। इस प्रकार विभिन्न तरीकों से मनोबल भी राष्ट्रीय शक्ति में सहायक होता है।

राजनय

कुटनीति किसी भी देश की विदेश नीति का मस्तिष्क होती है। कुटनीति की कला से ही राष्ट्रीय शक्ति के तत्वों का अधिकतम लाभ अपने हक में किया जा सकता है। इसीलिए विदेश नीति के माध्यम से अपने अधिकतम राष्ट्र हितों की प्राप्ति करने हेतु उच्च दर्जे की राजनयिक क्षमता का विकास करना चाहिए। इतिहास साक्षी है कि बहुत से देशों के अच्छे राजनय के कारण उन्होंने अपने शक्तिशाली प्रभाव को बनाए रखा है।

कुछ विद्वानों का मानना है कि आधुनिक युग में संचार व यातायात के साधनों के कारण कूटनीति का प्रभाव कम हो गया है। इसके अतिरिक्त शिखर सम्मेलनों के कारण भी राजनयिक की भूमिका कम हो गई है। परन्तु यह पूरा सत्य नहीं है क्योंकि वर्तमान युग में परमाणु, रसायनिक व जैविक शस्त्रों के विकास ने जहां इन शस्त्रों को युद्ध के शस्त्रों के रूप में प्रतिबन्धित होने की मनाही की है तो ये हथियार अब राजनय के साधन बन गये हैं। इन्हीं सुरक्षात्मक कारणों से राजनय का महत्व परिवर्तित सन्दर्भ में और बढ़ गया है।

अत: निष्कर्ष रूप में उपरोक्त तत्व सामूहिक व अन्त:निर्भरता के आधार पर राष्ट्रीय शक्ति का विकास करते हैं। कई बार किस तत्व का कितना योगदान है यह बिल्कुल सही-सही कहना मुश्किल है। अत: इनका प्रारूप एक नदी की भांति है जिसके प्रवाह में इनके होने से राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण होता है। हां, इतना अवश्य है कि ये तत्व अपने आप में शक्ति नहीं हैं, बल्कि यह इनके उचित प्रयोग पर निर्भर करता है।

राष्ट्रीय शक्ति का मूल्यांकन

राष्ट्रीय शक्ति का मूल्यांकन एक बहुत ही जटिल परन्तु अनिवार्य प्रक्रिया है। इसके तत्व परस्पर जुड़े रहते हैं अत: इनके स्पष्ट प्रभाव को देखना उतना सरल नहीं होता। राष्ट्रीय शक्ति के सभी तत्वों का मूर्त रूप न होने के कारण भी समस्या आती है। परन्तु इन सभी समस्याओं के बाद भी आकलन को करना ही पड़ता है। परन्तु इसके मूल्यांकन में समस्या इन कारणों से आती है -
  1. किसी भी एक राज्य की शक्ति का मूल्यांकन करके कई बार हम उसे उचित मान लेते हैं। परन्तु वस्तुत: उसकी सही शक्ति दूसरे राष्ट्रों के सापेक्ष कम होती है। अत: अलग से एक राष्ट्र की शक्ति का आकलन पूर्ण सत्य नहीं बताता। ;पपद्ध इसकी दूसरी समस्या है शक्ति का परिवर्तनशील रूप। किसी भी राष्ट्र की शक्ति का आंकलन किसी विशेष संदर्भ या समय में तो ठीक होता है, परन्तु उसकी निरन्तरता को मानना गलत है।
  2. कई बार किसी एक कारक को ही राष्ट्रीय शक्ति का आधार मान लेना भी उसके सही आकलन की प्रस्तुती नहीं है। कई विद्वान भूगोल, सैन्य शक्ति, राष्ट्रीयवाद आदि किसी भी एक तत्व को इतना महत्वपूर्ण मान लेते हैं कि अन्य सभी तत्व गौण प्रतीत होते हैं परन्तु इस आधार पर भी शक्ति का आकलन गलत होता है।
  3. शक्ति का अधिकार मूल्यांकन अनुमान पर आधारित होता है। अनुमान व वास्तविक शक्ति की सही स्थिति का ज्ञान कई बार सम्भव नहीं हो पाता। उन दोनों में कितना अन्तर है यह शक्ति के प्रयोग की स्थिति में ही पता लग सकता है। परन्तु कई बार वह स्थिति आती ही नही।
  4. राष्ट्र की वर्तमान शक्ति व सम्भावित शक्ति में भी बड़ा अन्तर होता है। कोई राष्ट्र आज शक्तिशाली नहीं है, परन्तु भविष्य में एक बड़ी शक्ति बनने की सम्भावनाएं रख सकता है। परन्तु यह भी सत्य है कि शक्ति होने व शक्ति बनने के मध्य कई प्रकार के किन्तु, परन्तु एवं परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। अत: इसका वास्तविक भविष्य क्या होगा यह बात अनिश्चितता के गर्भ में छिपी हुई है। 
  5. अन्तत: एक समस्या इस दिशा में यह भी है कि शक्ति के विश्वसनीयता की। कई बार किसी राष्ट्र के पास विभिन्न हथियार होते हैं, परन्तु क्या आज के सन्दर्भ में उनका प्रयोग कर पायेगा क्या उसे इसका मौका मिलेगा? क्या उसका अपना विनाश भी उसके साथ ही हो जायेगा? इस प्रकार के प्रश्न शक्ति की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देते है।
उपरोक्त मूल्यांकन संबंधित समस्याओं को देखते हुए शक्ति के मूल्यांकन के संदर्भ में निम्न सामान्य बातें कही जा सकती है-
  1. राष्ट्र शक्ति का निर्माण विभिन्न तत्वों से होता हैं जो एक दूसरे के पूरक एवं अन्त: निर्भर होते हैं।
  2. शक्ति कभी भी निरपेक्ष न होकर सापेक्ष होती है।
  3. राज्य की शक्ति हमेशा गतिशील व परिवर्तनीय होती है।
  4. राष्ट्र भक्ति में भूगोल को छोड़कर शेष अन्य तत्व अस्थिर होते हैं।
  5. राष्ट्र शक्ति विभिन्न तत्वों के अस्तित्व के साथ-साथ इसके प्रयोग पर निर्भर करती है।
  6. उपयुक्त शक्तिशाली राष्ट्र बनने हेतु सभी तत्वों का उचित प्रयोग अनिवार्य है।
निष्कर्ष के रूप में यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय शक्ति में अभिवृद्धि हेतु भी सभी तत्वों का अधिकतम सदुपयोग जरूरी है। यह ज्ञात है कि शक्ति स्थाई नहीं रहती तथा इसका मूल्य सापेक्ष होता है, इसीलिए किसी भी राष्ट्र को अपनी सुरक्षा हेतु यह आवश्यक है कि उसे अपने विरोधियों की शक्ति के संदर्भ में भी उचित ज्ञान हो। शायद इसीलिए प्रत्येक राष्ट्र अपने शक्ति के विस्तार हेतु प्रयत्नशील रहते हैं और इसी कारण राष्ट्रों के मध्य शक्ति-संघर्ष निरंतर बना रहता है।

राष्ट्रीय शक्ति की सीमाएं

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी राष्ट्र को इतना शक्तिशाली नहीं बनने दिया जाता कि वह सम्पूर्ण विश्व पर अपना अधिपत्य स्थापित कर सके। इस सन्दर्भ में राष्टत्र््रों का शक्ति के विस्तार पर कुछ सीमाएं लगा दी गई है। इनमें प्रमुख हैं - (i) (शक्ति संतुलन; (ii) सामूहिक सुरक्षा; (iii) अंतर्राष्ट्रीय कानून; (iv) अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता; तथा (v) अंतर्राष्ट्रीय जनमत। यद्यपि इन पांचों को एक श्रेणी में वर्गीकृत करने में कुछ आपत्ति है। वास्तव में पहले दो (शक्ति संतुलन व सामूहिक सुरक्षा) शक्ति प्रबन्धन के तरीके हैं तथा बाकी के तीन शक्ति पर प्रतिबंध के तरीके। परन्तु कई विद्वान इस अन्तर को नहीं मानते। अत: इस वाद-विवाद में उलझे बिना इन पांचों का गहन अध्ययन अनिवार्य है। इसी विश्लेषण के उपरान्त यह सुस्पष्ट हो सकेगा कि किस प्रकार इन तरीकों के माध्यम से राष्ट्रों की शक्ति पर अंकुश सम्भव है-

शक्ति संतुलन

शक्ति संतुलन की अवधारणा लगभग 15वीं शताब्दी से अंतर्राष्ट्रीय स्तर में प्रचलित है। शायद इसीलिए कुछ लेखक इसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का बुनियादी सिद्धान्त तो कुछ इसे सार्वजनिक सिद्धान्त या राजनीति के मौलिक सिद्धान्त की संज्ञा देते हैं। साधारण शब्दों में शक्ति संतुलन का अर्थ है जब एक राज्य/राज्यों का समूह दूसरे राज्य/राज्यों के समूह के सापेक्ष अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ले कि वह उसके समकक्ष हो जाए। परन्तु इस धारणा की परिभाषा को लेकर विद्यमान एकमत नहीं हैं। शायद इसीलिए इनिंस एल क्लॉड का कहना है कि यह ऐसी अवधारणा है जिसकी परिभाषा की समस्या नहीं है बल्कि समस्या यह है कि इसकी बहुत सारी परिभाषाएं हैं। इन परिभाषाओं से पहले यह बताना भी आवश्यक है कि यह दो प्रकार की होती हैं - सरल एवं जटिल। सरल या साधारण शक्ति संतुलन जब होता है जब यह तुलना दो राष्ट्रों या दो राष्ट्रों के बीच में सीधे तौर पर हो। लेकिन यदि यह संतुलन दो समुदायों के परस्पर तथा इनमें सम्मिलित समुदायों में आन्तरिक रूप में भी हो तब यह जटिल संतुलन कहलाता है। इसके संदर्भ में विद्वानों ने विभिन्न परिभाषाएं दी हैं जो इस प्रकार हैं।
  1. मारगेन्थाऊ- प्रत्येक राष्ट्र यथास्थिति को बनाये रखने अथवा परिवर्तित करने के लिए दूसरे राष्ट्रों की अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त करने की आकांक्षा रखता है। इसके परिणामस्वरूप जिस ढांचे की आवश्यकता होती है वह शक्ति संतुलन कहलाता है।
  2. जार्ज स्थवार्र्जन बर्गट- शक्ति संतुलन वह साम्यावस्था या अंतर्राष्ट्रीय संबंध में कुछ मात्रा में स्थिरता या स्थायित्व है, जो राज्यों के बीच मैत्री-संधियों या अन्य दूसरे साधनों की मदद से प्राप्त किए जा सकते हैं। 
  3. क्विन राइट- शक्ति संतुलन वह व्यवस्था है जिसके अंतर्गत प्रत्येक राज्य में यह विश्वास बनाये रखने का सतत प्रयत्न किया जाता है कि यदि राज्य आक्रमण का प्रयत्न करते हैं तो उन्हें अजेय दूसरे राष्ट्रों के समूह का प्रतिरोध करना होगा।
  4. सिडनी फे- शक्ति संतुलन से अभिप्राय राष्ट्रों के परिवारों के सदस्यों के बीच शक्ति की न्यायपूर्ण साम्यवस्था से है जो किसी राष्ट्र को इतना शक्तिशाली होने से रोकता है ताकि वह दूसरे राष्ट्र पर अपनी इच्छा लाद न सके।
इस प्रकार शक्ति संतुलन को विद्वानों ने विभिन्न दृष्टियों से देखा है। कोई इसे शक्ति के वितरण के रूप में देखते हैं तो कोई इसे समूहों के बीच साम्यावस्था के रूप में, कोई इसे स्थायित्व के रूप में, तो कोई इसे युद्ध व अस्थिरता के रूप में। कहने का अर्थ यह है कि इन परिभाषाओं में सर्वसम्मति का अभाव है। शायद यह इसलिए है कि शक्ति संतुलन के अनेक अर्थ/प्रयोग हैं जिस वजह से यह भ्रांति बनी हुई है। मुख्य तौर पर शक्ति संतुलन को चार सन्दर्भों में प्रयोग किया जाता है-
  1. एक अवस्था के रूप में;
  2. एक नीति के रूप में;
  3. एक व्यवस्था के रूप में;
  4. एक प्रतीक के रूप में।
मान्यताएं- क्विंसी राईट के अनुसार शक्ति संतुलन का सिद्धान्त पांच मान्यताओं पर आधारित है-
  1. प्रत्येक राष्ट्र अपनी उपलब्ध शक्ति एवं साधनों के द्वारा, जिनमें युद्ध भी शामिल है, अपने मार्मिक हितों - राष्ट्रीय स्वतन्त्रता, क्षेत्रीय अखण्डता, राष्ट्रीय सुरक्षा, घरेलू राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था की रक्षा आदि के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
  2. राज्य के मार्मिक हितों को या तो खतरा होता है या खतरे की सम्भावना बनी रहती है। अत: राज्यों के लिए प्रतिदिन परिवर्तनशील शक्ति संबंधों से परिचित होना आवश्यक हो जाता है।
  3. शक्ति संतुलन के द्वारा राज्यों के मार्मिक हितों की रक्षा होती है। शक्ति संतुलन के कारण या तो अधिक शक्तिशाली राज्य का आक्रमण करने का साहस ही नहीं होता और यदि वह ऐसा करने का दुस्साहस भी करे तो आक्रमण के शिकार राज्य को हार का मुंह नहीं देखना पड़ता।
  4. राज्यों की सापेक्षिक शक्ति को निश्चित तौर पर आंका जा सकता है। यद्यपि शक्ति का आंकलन एक कठिन समस्या है, परन्तु इसके अतिरिक्त राज्यों के पास कोई ऐसा आधार भी नहीं है जिसके सहारे वे सैनिक तैयारी पर अपने खर्च का अनुपात तय कर सके।
  5. शक्ति सम्बन्धित तथ्यों की बुद्धिपूर्ण सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही राजनीतिक विदेश नीति संबंधी निर्णय लेते हैं अथवा ले सकते हैं।
विशेषताएं- शक्ति संतुलन की विशेषताएं होती हैं-
  1. सामान्य रूप से यह यथास्थिति बनाए रखने की नीति है, परन्तु वास्तव में यह हमेशा गतिशील व परिवर्तनीय होती है।
  2. यह कोई दैवी वरदान नहीं है, अपितु यह मानव के सतत हस्तक्षेप का परिणाम है।
  3. यह व्यक्तिपरक व वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार से परिभाषित होता है। इतिहासकार हमेशा इसका वस्तुनिष्ठ आकलन करते हैं जबकि राजनयिक हमेशा इसकी व्यक्तिपरक विवेचना करते हैं।
  4. यद्यपि यह शान्ति स्थापित करने का तंत्र है, परन्तु यह मुश्किल से ही कभी शान्ति स्थापित करता है।
  5. यह मुख्यतया महाशक्तियों का खेल है। छोटे राष्ट्र तो मात्र दर्शक की भूमिका ही निभाते हैं।
  6. इसके सही संचालन हेतु एक संचालक की आवश्यकता होती है जो आज के युग में नदारद है।
  7. यह साम्यावस्था के आधार पर शक्तियों का समान वितरण करता है। परन्तु यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के इतिहास को देखने से ज्ञात होता है कि ऐसा समय कभी नहीं रहा।
  8. शक्ति संतुलन की व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शायद ही दृष्टिगोचर हो, क्योंकि शक्ति तत्व का मापना व स्थिर कर पाना सम्भव नहीं है।

शक्ति संतुलन के तरीके

शक्ति संतुलन की स्थापना हेतु इन तरीकों का प्रयोग किया जाता है-
  1. क्षतिपूर्ति- कभी-कभी बड़ी शक्तियां छोटे राज्यों की भूमि को आपसी शक्ति संतुलन हेतु बांट लेती हैं। यह सीमा परिवर्तन इस आधार पर किया जाता है कि आपसी शक्तियों में से कोई भी एक दूसरे से शक्तिशाली न बन जाए। उदाहरण के रूप में, यूट्रेक्ट की संधि के बाद 1713 में स्पेन की भूमि को बोर्बोन व हेप्सबर्ग के बीच बांट दिया गया। इसी प्रकार पोलैंड को तीन बार (1772, 1793 व 1795) में इस प्रकार विभाजित किया गया कि शक्ति संतुलन न बिगड़े। इसी प्रकार 18वीं व 19वीं शताब्दी में विभिन्न सन्धियां इसी दृष्टिकोण को मध्यनजर रखकर हुई।
  2. संधियां एवं प्रति संधियां- मैत्री संधियां भी शक्ति संतुलन का प्रमुख साधन रही है। लेकिन जब एक राष्ट्र मैत्री सन्धियों के द्वारा अपनी शक्ति बढ़ा लेता है तब अन्य राज्य भी आशंकित होकर आपस में प्रति मैत्री सन्धियां करने लगते हैं। इस क्रम का अन्त विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा विरोधी गुटों में संगठित होकर होता है। इस प्रकार की मैत्री सन्धियों एवं प्रति मैत्री सन्धियों का दौर यूरोप की राजनीति में आमतौर पर देखने को मिलती है। उदाहरणस्वरूप 1882 के त्रिराष्ट्रीय संधि के गठन के विरोध स्वरूप अन्य राष्ट्रों के बीच भी विरोधी त्रिराष्ट्रीय मैत्री सन्धियों पर सहमति हुई ताकि यूरोप की राजनीति में संतुलन बनाया जा सके। इसी प्रकार के उदाहरण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महाशक्तियों के बीच स्थापित गठबंधनों के रूप में सामने आया।
  3. शस्त्रीकरण व निशस्त्रीकरण- शस्त्रीकरण शक्ति का प्रत्यक्ष एवं अग्रतम रूप है। इसीलिए राज्यों के मध्य, विशेषकर अपने प्रतिद्वंद्वी से, शस्त्रों को संचय करने की होड़ लग जाती है। इस संचय से उनकी सैन्य शक्ति का विकास होता है तथा अपने विरोधियों पर दबाव बढ़ाने के काम आता है। परन्तु दूसरा राष्ट्र या राज्यों का समूह भी पीछे नहीं रहना चाहता, अत: दोनों ही एक दूसरे को संतुलित करना चाहते हैं। उदाहरणस्वरूप, शीतयुद्ध युग में पूर्व सोवियत संघ व अमेरिका के बीच शस्त्रीकरण ही दोनों द्वारा एक दूसरे को संतुलित करने का माध्यम रहा है। शस्त्रीकरण के साथ-साथ निरस्त्रीकरण भी कई बार शक्तियों के मध्य संतुलन बनाने का कार्य करता है। जब शस्त्रीकरण एक चरम सीमा के बाद आगे बढ़ाना सम्भव न रह सके तब शक्तियां निरस्त्रीकरण की तरफ कदम बढ़ाती है। उदाहरण के रूप में, दोनों महाशक्तियों के बीच साल्ट-I, साल्ट-II, स्टार्ट-I व स्टार्ट-II, आईएनएफ संधि आदि समझौते इसका प्रमाण है। अन्य राष्ट्रों के बीच भी वर्तमान समय में शस्त्रीकरण से तंग आकर विश्वसनीयता बढ़ाने वाले कदमों का उठाया जाना इसका प्रमाण है।
  4. मध्यवर्ती राज्य- कई बार दो शक्तियां आपसी सीधे टकराव को टालकर किसी एक राज्य को मध्य रखकर आपसी संतुलन बनाए रखती हैं। अत: ऐसा कमजोर व तटस्थ राज्य हमेशा दो बड़ी ताकतों के बीच युद्ध की संभावनाएं टली रहने के साथ-साथ शक्ति संतुलन भी बना रहता है। उदाहरण रूप में, काफी समय तक पोलैण्ड रूस व जर्मनी के बीच मध्यवर्ती राज्य बना रहा। अफगानिस्तान रूस व इंग्लैण्ड के बीच इस स्थिति में काफी देर तक रहा। कभी-कभी दो गैर मित्र राष्ट्र मध्यवर्ती क्षेत्र को बराबर-बराबर बांट लेते हैं। ऐसी स्थिति में मध्यवर्ती क्षेत्रों का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। उदाहरण के रूप में जर्मनी, कोरिया, हिन्द चीन का विभाजन। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति ये क्षेत्र समाप्त प्राय हो गये हैं। अत: इनका प्रभाव भी शक्ति संतुलन हेतु नगण्य हो गया है।
  5. हस्तक्षेप एवं अहस्तक्षेप- हस्तक्षेप की नीति हमेशा शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा दूसरे के मामले में दखलंदाजी करके अपने प्रभाव को बढ़ाने से है। इसका उद्देश्य बड़े राष्ट्र द्वारा वहां पर किसी शासन के बने रहने या बदलने के स्वरूप में होता है। इस साधन के माध्यम से शक्ति संतुलन बनाये रखने का प्रयास होता है। शीतयुद्ध काल में दोनों महाशक्तियों ने इसका खूब प्रयोग किया। पूर्व सोवियत संघ ने जहां हंगरी, चेकोस्लोवाकिया व अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया, वहीं अमेरिका ने ग्रेनेडा, क्यूबा, निकारागुआ, कोरिया, ईराक, अफगानिस्तान आदि में हस्तक्षेप किया है।
अहस्तक्षेप द्वारा संतुलन बनाए रखने की नीति आमतौर पर छोटे राष्ट्रों द्वारा अपनाई गई है। इससे छोटे राज्यों द्वारा तटस्था के रूप में अपनाया गया है। कुछ परिस्थितियों में बड़े राष्ट्रों ने भी इसका सहारा लिया है। ज्यादातर एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिकी देशों ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाकर अहस्तक्षेप नीति का पालन किया है। इससे युद्ध न करने या उसे सीमित रखने या उसके स्थानीय स्वरूप देने का प्रयास आदि इसी के अंतर्गत आ जाते हैं। (च) फूट डालो और राज करो- अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी ताकतों द्वारा फूट डालो, राज करो की नीति का भी अनुसरण किया है। राज्यों को दो विरोधी गुटों में बांट कर भी शक्तियां उस क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करती हैं। यह नीति मुख्य रूप से ब्रिटेन द्वारा अपने साम्राज्य को एकीकृत रखने हेतु काफी बार प्रयोग की गई। 1947 का भारत-पाक विभाजन इसका सशक्त उदाहरण है। इस नीति के अंतर्गत अपने प्रतिद्वंदियों को कमजोर करके संतुलन बनाने का प्रयास किये जाते रहे हैं। शीतयुद्ध काल में महाशक्तियों ने भी गुटनिरपेक्ष देशों में इस प्रकार की नीति का अनुसरण किया है।

मूल्यांकन

यदि शक्ति संतुलन का मूल्यांकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तरीके से शक्ति पर पूर्ण सीमाएं तो न लग सकी। हां कुछ हद तक यह सिद्धान्त अपने उद्देश्यों में सफल हो सका। इस सिद्धान्त के पूर्ण रूप से शक्ति के विकास पर अंकुश न लगा पाने के कारण रहे-
  1. इससे शान्ति स्थापना की बजाय शक्ति प्रतिद्वंदिता बढ़ी जिसके परिणामस्वरूप युद्धों को बढ़ावा ही मिला।
  2. शक्ति संतुलन को व्यवहारिक रूप देने में शक्ति का सही आकलन अति आवश्यक है, परन्तु वास्तविकता यह है कि किसी राष्ट्र की बिल्कुल सही शक्ति आंकना सम्भव ही नहीं है।
  3. यह सिद्धान्त अंतर्राष्ट्रीय कानून व अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के भी विरुद्ध है। कानून व नैतिकता की प्रवाह किए बिना स्थाई शान्ति की स्थापना संभव नहीं है।
  4. शक्ति संतुलन के आधार पर केवल महाशक्तियों हेतु लाभकारी है। इससे छोटे, निर्बल एवं विकासशील देशों को फायदा नहीं होगा। यह विश्व के एक बड़े भाग को शान्ति के लाभों से वंचित रखेगा अत: यह विश्व हेतु भी लाभकारी नहीं हो सकता।
  5. यह सिद्धान्त सामान्यतया स्थिरता हेतु बनाया गया है, परन्तु इसमे संलिप्त राज्य हमेशा अस्थिर रहेंगे। क्योंकि उन्हें शक्ति संतुलन हेतु हमेशा परस्पर समीकरण, फिर नये समीकरण बनाने पड़ते रहेंगे। अत: यह वास्तविक रूप में स्थिरता प्रदान नहीं कर सकता।
उपरोक्त विचारों से यह स्पष्ट है कि शक्ति विस्तार या शक्ति संघर्ष रोकने हेतु यह सिद्धान्त पूर्णरूपेण सक्षम नहीं है। लेकिन इसके माध्यम से आंशिक सफलता अवश्य मिलती है, क्योंकि - प्रथम, छोटे राज्य अपनी सुरक्षा आश्वस्त कर सकते हैं। द्वितीय, यह किसी बड़ी शक्ति के आधिपत्य स्थापना पर भी अंकुश रखेगा। तृतीय, यह युद्धों को भी टालने में सक्षम है। चतुर्थ, संप्रभू राज्यों पर किसी केन्द्रीय सत्ता के अभाव में अंतर्राष्ट्रीय कानून भी केवल शक्ति संतुलन से ही सम्भव है। अत: यह कुछ हद तक शक्ति के निरंकुश या आधिपत्य स्थापित करने की सम्भावनाओं को आंशिक रूप में रोकने में सक्षम है।

सामूहिक सुरक्षा

शक्ति विस्तार व विश्व में युद्धों को रोकने का एक कारगर माध्यम सामूहिक सुरक्षा माना गया है। इसके अंतर्गत सुरक्षा का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु राष्ट्रों द्वारा सामूहिक प्रयास करने की बात कही गई है। यद्यपि यह सिद्धान्त प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरान्त स्थापित राष्ट्र संघ एवं संयुक्त राष्ट्र संगठनों के अंतर्गत अपनाया गया, परन्तु इसकी उपस्थिति को 17वीं शताब्दी के कई विद्वानों के गं्रथों में पाया जाता है। 1648 की वेस्टफेलिया की सन्धि में भी यह उल्लेख था कि इस सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यों को यह अधिकार है कि किसी के भी विरुद्ध कदम उठाने व कार्यवाही करने का अधिकार है जिससे शान्ति की रक्षा की जा सके। बाद में ओस्जेब्रुक की सन्धि में भी सम्भावित शत्रु के विरुद्ध सामूहिक कार्यवाही करने की बात कही गई थी। 19वीं शताब्दी में कई लेखकों ने भी इसका समर्थन किया, परन्तु इसको व्यावहारिक रूप 20वीं शताब्दी में राष्ट्रसंघ एवं संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत ही प्राप्त हुआ।

सामान्य रूप से सटीक परिभाषा दे तों इसका अर्थ है- “एक के लिए सब और सब के लिए एक।” इस प्रकार से किसी राष्ट्र की शान्ति व सुरक्षा हेतु सभी सामूहिक कार्यवाही करने को तत्पर रहेंगे। परन्तु इस प्रकार की कार्यवाही से पूर्व यह बताना आवश्यक है कि इस अवधारणा की कुछ आधारभूत मान्यताएं हैं, जो हैं-
  1. सामूहिक सुरक्षा पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए ताकि आक्रमणकारी या तो युद्ध न कर सके और यदि करें भी तो उसे पराजय का मुंह देखना पड़े।
  2. सामूहिक सुरक्षा हेतु एकत्रित राष्ट्रों के बीच सुरक्षा सम्बन्धित मुख्य बातों को लेकर समान विचार होने चाहिए।
  3. सामूहिक सुरक्षा से सम्बद्ध राष्ट्रों को इस कार्यवाही हेतु अपने परस्पर विरोधी विचारों को त्यागना होगा।
  4. सामूहिक सुरक्षा से जुड़े राष्ट्र मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यथास्थिति बनाये रखने के पक्षधर होते हैं।
  5. सामूहिक सुरक्षा के कारगर होने हेतु सभी राष्ट्र आक्रामककर्ता का निर्णय लेने में एकमत होंगे।
  6. इससे सम्बद्ध राष्ट्रों के मध्य इस विचारधारा में पूरी आस्था होनी चाहिए।
  7. इसके अत्याधिक प्रभावशाली होने हेतु सभी या कम से कम अधिकांश राष्ट्र इसमें सम्मिलित होने चाहिए।
इस प्रकार उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था शक्ति प्रबन्धन को सुचारू रूप से चला सकती है।

सैद्धान्तिक रूप से इस व्यवस्था की निम्नलिखत विशेषताएं स्पष्ट रूप से उजागर होती हैं -
  1. यह व्यवस्था मुख्य रूप से सामूहिक प्रयास है जो - “एक के लिए सब तथा सबके लिए एक” के सिद्धान्त पर आधारित है।
  2. यह व्यवस्था आक्रामक बल प्रयोग का विरोध करती है। इसमें प्रारम्भ में मतभेदों को शान्तिपूर्ण तरीकों के माध्यम से हल करने की कोशिश की जाती है। बल प्रयोग केवल अन्तिम विकल्प के रूप में ही प्रयोग किया जाता है।
  3. सभी राष्ट्रों के सामूहिक प्रयास व संयुक्त संसाधनों के माध्यम से शक्ति प्रयोग को भंग करने वालों के प्रति निवारक के रूप में होता है।
  4. सामूहिक सुरक्षा ‘शान्ति’ को एक अखंडनीय व अविच्छीन मानता है।
  5. इस सिद्धान्त के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यथा शक्ति को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।
  6. यह सिद्धान्त यह मानता है कि सभी राष्ट्रों के लिए सुरक्षा उसकी सर्वोपरि प्राथमिकता होती है।
  7. यह मानता है कि विश्व शान्ति हेतु प्रत्येक राज्य की सुरक्षा में सभी राष्ट्रों का सहयोग अति आवश्यक होता है।
इस व्यवस्था का व्यवहारिक स्वरूप 20वीं शताब्दी में राष्ट्रसंघ व संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत देखने को मिला है जो इस प्रकार है -

(क) राष्ट्रससंघ व सामूहिक सुरक्षा- सर्वप्रथम राष्ट्र संघ के संविदा के अनुच्छेद 10-16 तक इसका वर्णन सम्मिलित किया गया था। इन धाराओं में इसका वर्णन निम्न प्रकार से है-
  1. अनुच्छेद 10 के अंतर्गत सभी सदस्यों को प्रादेशिक एकता एवं राजनैतिक स्वतंत्रता के सम्मान के खतरे की स्थिति में परिषद् उचित कार्यवाही हेतु कदम उठा सकती है।
  2. अनुच्छेद 12 में प्रत्येक विवादों को न्यायिक प्रक्रिया द्वारा हल करने के प्रयास किए जाऐंगे लेकिन कम से कम न्यायिक निर्णय के 3 माह तक राज्यों को युद्ध का अधिकार नहीं होगा।
  3. अनुच्छेद 16 में यह दिया गया है कि जब अन्य तरीकों से समस्या का समाधान नहीं होता तब परिषद् सामूहिक सुरक्षा हेतु उपयुक्त कदम उठा सकती है।
परन्तु उपयुक्त प्रावधानों के होते हुए भी राष्ट्र संघ ने उनका कभी उपयोग नहीं किया। राष्ट्र संघ के असफलता हेतु जिम्मेदार तत्वों ने सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी प्रभाव डाला। इसमें मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा राष्ट्रसंघ का सदस्य न बनना, विजित व हारे राष्ट्रों के बीच प्रतिद्वंदिता जारी रहना, जर्मनी व फ्रांस के मतभेद वहीं पर रहना, सोवियत संघ का इस संगठन से बाहर रहना, परिषद् की सदस्यता बदलते रहना, जापान, जर्मनी व इटली द्वारा इसकी खुली अवमानना करना आदि बहुत से ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से प्रारंभिक कुछ वर्षों को छोड़ दें तो राष्ट्र संघ विफल रहा। अत: स्वभाविक था कि सामूहिक सुरक्षा की भी विफलता अनिवार्य थी। अत: सामूहिक सुरक्षा के विकास व इसे लागू करने के संदर्भ में राष्ट्रसंघ पूर्ण रूप से दुविधाग्रस्त था तथा प्रारम्भ से ही शक्तिहीन रहा।

(ख) संयुक्त राष्ट्र संघ व सामूहिक सुरक्षा- राष्ट्र संघ के अनुभवों से शिक्षा लेते हुए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में इसका अति स्पष्ट आलेख किया गया। यद्यपि सम्पूर्ण चार्टर में “सामूहिक सुरक्षा” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, परन्तु अध्याय सात में ‘संयुक्त कार्यवाही’ ही सामूहिक सुरक्षा का स्वरूप है। सैद्धान्तिक रूप में चार्टर में चार व्यवस्थाओं के अंतर्गत इसका उल्लेख है - (i) अनुच्छेद-1 (अध्याय 1); (ii) अनुच्छेद 39-51 (अध्याय 7); (iii) अनुच्छेद 52-54 (अध्याय 8); तथा “शांति के लिए एकता प्रस्ताव” (1950)।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के भाग 1 में इसके उद्देश्यों का वर्णन करते हुए अनुच्छेद 1 में कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा हेतु संयुक्त राष्ट्र / सामूहिक कार्यवाही करेगी। क्षेत्रीय शान्ति व सुरक्षा हेतु ये संगठन संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के साथ सामूहिक कार्यवाही कर सकते हैं। 1950 में कोरिया के संकट के समय महासभा द्वारा शांति के लिए एकता प्रस्ताव के माध्यम से यह व्यवस्था की गई है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के खतरे की आशंका पर सुरक्षा परिषद् कोई कार्यवाही नहीं करता है तो महासभा सुरक्षा परिषद् को कार्यवाही हेतु कह सकता है। अत: उपरोक्त तीनों परिस्थितियों से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों एवं व्यवहार में सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। वास्तविक रूप में अध्याय 7 में दण्डात्मक कार्यवाही के रूप में इसकी व्याख्या की गई है। इसके अंतर्गत कार्यवाही से पूर्व अनुच्छेद 41 में गैर सैनिक कदम उठाने पर जोर दिया गया है ताकि आक्रमणकारी राज्य विश्व शान्ति को खतरा न बने। इसके बाद अनुच्छेद् 42 में घेराबन्दी की व्यवस्था की गई है। अन्तत: सैन्य कार्यवाही का प्रावधान है जिसमें सभी राष्ट्रों का दायित्व है कि वे सेना में अपना सहयोग देंगे (अनुच्छेद 43 व 44)। इसके बाद एक सैन्य स्टाफ समिति के गठन की बात की गई है जो एक कमाण्डर के अधीन संयुक्त राष्ट्र के झंडे के नीचे कार्यवाही करेंगे (अनुच्छेद् 47)। अत: इस प्रकार सभी अन्य कार्यवाही के विफलता के बाद युद्ध की कार्यवाही को स्वीकृत किया है। इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस कार्यवाही का अगुवा संयुक्त राष्ट्र का कमाण्डर होगा, किसी एक देश या अन्य संगठन का नहीं। इस कार्यवाही हेतु भाग लेने के लिए अधिकांश देशों का होना अनिवार्य नहीं तो कम से कम वांछनीय अवश्य है।

मूल्यांकन

सामूहिक सुरक्षा की कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के अधीन शक्ति को रोकने या सीमाबद्ध करने में सक्षम है या नहीं यह इसके सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पहलुओं के मूल्यांकन के बाद ही कहा जा सकता है। सैद्धान्तिक रूप से, इसकी सफलता के संदर्भ में कई प्रश्न उठाये गये हैं। क्या सभी राष्ट्र आक्रमणकारी को पहचानते हैं? क्या आक्रमण को रोकने हेतु सभी पूर्ण रूप से इच्छुक हैं? क्या सामूहिक समूह आक्रमणकारी से अधिक शक्तिशाली हैं? क्या विश्व शांति शक्ति विस्तार से संभव है? क्या सभी देश राष्ट्रहितों को भुलाकर एकजुट हो सकेंगे? आदि।

सैद्धान्तिक के साथ-साथ व्यवहारिक रूप से भी देखें तो शीतयुद्ध तथा उत्तर शीतयुद्ध कालों में अपनी-अपनी प्रकार से सामूहिक सुरक्षा की अवहेलना की है। शीतयुद्ध काल में युद्ध व शाति का प्रश्न विचारधारा के आधार पर तय किया जाता था। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र के फैसलों पर समर्थन। इसीलिए शायद इस युग में हुई कोरिया (1950) के विरुद्ध सामूहिक सुरक्षा की कार्यवाही पूर्णतया सफल नहीं हो सकी। बल्कि यह कार्यवाही भी विशेष स्थिति में ही सम्भव हो सकी जब यह निर्णय दिया गया कि संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही से गैर-हाजिर रहना वीटो नहीं माना जा सकता। शीतयुद्धोत्तर युग में ईराक के विरुद्ध हुई कार्यवाही (1990 व 2003_) को भी वस्तुनिष्ठ एवं संयुक्त राष्ट्र की संज्ञा देना गलत होगा। यह कार्यवाही भी मुख्य रूप से अमेरिका व नाटो देशों या बाद में अमेरिका व ब्रिटेन की संयुक्त कार्यवाही कहा जा सकता है। इस कार्यवाही के दौरान न तो संयुक्त राष्ट्र चार्टर की धाराओं का पालन किया तथा न ही युद्ध टालने की कोशिशे की गई। बल्कि ऐसा लगा कि अपने कुछ अस्पष्ट हितों की पूर्ति हेतु यह युद्ध लड़ा गया। इसके अतिरिक्त, अब युद्ध में हुए भारी मात्रा में विध्वंस के बाद अमेरिका द्वारा यह स्वीकारना कि हथियारों के संदर्भ में उसे गलत रूप से सूचित किया इस सारे घटनाक्रम को हास्यास्पद बना देता है। परन्तु क्या ऐसा कहने से ईराक के नुकसान की भरपाई हो जायेगी। परन्तु वास्तविकता यह है कि शीतयुद्धोत्तर युग में अमेरिका के एकमात्र शक्ति रहने के कारण उसकी किसी भी कार्यवाही को रोक पाना असम्भव है। अत: अमेरिका द्वारा किए गए सभी आक्रमण उचित माने जायेंगे।

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि सिद्धान्त व व्यवहार दोनों की परिस्थितियों में अब सामूहिक सुरक्षा के आधार पर शक्ति पर अंकुश लगाना कठिन है। कारण जो भी हो यह बात शीतयुद्ध काल में भी सत्य थी और आज शीतयुद्धोत्तर युग में भी सही है। इसके साथ-साथ परमाणु, जैविक एवं रासायनिक हथियारों के संदर्भ में युद्धों को रोकना भी कठिन होता जा रहा है। अत: इस सिद्धान्त हेतु शक्ति पर सीमाएं लगाना अधिक कारगर नहीं रहा।

अंतर्राष्ट्रीय कानून

अंतर्राष्ट्रीय कानून भी शक्ति पर अंकुश लगाने का एक प्रभावशाली तरीका है। वर्तमान समय में अंतर्राष्ट्रीय कानून का महत्व बढ़ता जा रहा है। यदि इसकी परिभाषाओं का आकलन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून का दायरा भी बढ़ता जा रहा। परन्तु इन सब बातों का अध्ययन करने से पूर्व इसे परिभाषित करना आवश्यक है जो इस प्रकार से है-
  1. ओपनहाइम- अंतर्राष्ट्रीय कानून उन परंपरागत एवं परस्पर समझौतों से निर्मित अभिसमयात्मक नियमों का ऐसा संग्रह है जिन्हें सभ्य राज्य अपने व्यवहार में पालने योग्य समझते हैं।
  2. ºयूज - अंतर्राष्ट्रीय कानून ऐसे सिद्धान्त का समूह हैं जिनको सभ्य राष्ट्र पारस्परिक व्यवहार में प्रयोग करना बाध्यकारी समझते हैं। यह कानून प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्रों की स्वीकृति पर निर्भर रहता है।
  3. जे. जी. स्टार्कर्- यह एक एसे कानून का समूह है जिसके अधिकाश भाग का निमार्ण उन सिद्धान्ता ें तथा आचरण के नियमों से हुआ है जिसके सम्बन्ध में राज्य यह अनुभव करते हैं कि वे इसका पालन करने हेतु बाध्य हैं। इसमें दो प्रकार के नियम सम्मिलित होते हैं - (क) अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं व संगठनों की कार्यप्रणाली से संबंध रखने वाले तथा इन संस्थानों के राज्यों तथा व्यक्तियों से संबंध रखने वाले कानून के नियम; (ख) व्यक्तियों से तथा राज्योपरिसत्ताओं से संबंध रखने वाले कानून के नियम।
इस प्रकार उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का क्षेत्र बढ़ा व्यापक होता जा रहा है। यह एक तरफ जहां राष्ट्रों, राष्ट्रोपरि संस्थाओं, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों एवं संस्थाओं, इनसे जुड़े व्यक्तियों आदि सभी के अध्ययन का समावेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्व समुदाय के लिए बाध्यकारी संहिता का हिस्सा बनता जा रहा है।

वर्तमान समय में विभिन्न कारणों से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इनका महत्व बढ़ता जा रहा है। शक्ति संघर्ष को कम करने तथा अराजकता की स्थिति को दूर करने हेतु कुछ नियमों का होना अनिवार्य हो गया है। इसके अतिरिक्त, दूरगामी विश्वशांति का आधार तैयार करने हेतु भी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का अति महत्व है। वर्तमान समय में परमाणु, जैविक व रासायनिक हथियारों के विकास के दौर मे राज्यों के बीच समन्वय पैदा करना अनिवार्य ही नहीं अपितु मजबूरी बन गया है। वर्तमान भूमण्डलीकरण के दौर में राज्यों के मध्य आर्थिक व व्यापारिक हितों का सुचारू संचालक हेतु भी कुछ नियमावली का होना अति आवश्यक है। वर्तमान शीतयुद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हुए ध्रुवीकरण के पश्चात् गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के कमजोर पड़ने तथा अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व के परिणामस्वरूप भी यह अति महत्वपूर्ण हो गया है। अन्तत: ईराक जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए भी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का महत्व अति आवश्यक है।

परन्तु अंतर्राष्ट्रीय कानून द्वारा किस हद तक शक्ति विस्तार पर अंकुश लगाया जाता है, इससे पूर्व कुछ लोग इसके कानून होने या न होने पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। जिन विद्वानों का मत है कि यह कानून नहीं है उनके तर्क इस प्रकार से हैं - इनके पीछे बाध्यकारी शक्ति नहीं होती यह सम्प्रभु का आदेश नहीं है इसको बनाने वाली विधानमण्डल का अभाव है; इसकी व्याख्या करने वाली राष्ट्रीय न्यायपालिका जैसी संस्था नहीं है; इसकी संहिता का अभाव है आदि। लेकिन इसके कानून होने के पक्षधर कुछ इस प्रकार की दलीलें देते हैं। नैतिकता के नियम ज्यादा प्रभावी होते हैं; कानून को न मानने का अर्थ इसके अस्तित्व को नकारना नहीं है; सभी राष्ट्र अपने व्यवहार में इनका पालन करते हैं; इसके निर्माण की भी संस्थाएं (संयुक्त राष्ट्र) उपलब्ध हैं, अंतर्राष्ट्रीय न्यायपालिका भी है आदि। इन दोनों पक्षों के वाद-विवाद के बाद हम कह सकते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता, भले ही वास्तविकता में इसका विषय क्षेत्र, अध्ययन पद्धति, कानून निर्माण व्यवस्था, आदि राष्ट्रीय कानूनों के समकक्ष भी न हों।

इस प्रकार सभी पहलुओं के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून बेसक कमजोर है परन्तु शक्ति पर अंकुश रखने में कई प्रकार से भूमिका निभाता है - प्रथम, राज्य कानूनों का पालन इसलिए करते हैं कि इससे अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में अराजकता की स्थिति न पनपे। क्योंकि यदि राष्ट्रों को अपने राष्ट्रहितों की पूर्ति करनी है तो वह केवल शान्ति व व्यवस्थापरक विश्व में ही सम्भव हो सकती है। अत: कानून शक्ति पर अंकुश लगाकर ही राष्ट्रहित पूर्ति में सहायक हैं। द्वितीय, बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय खतरों को देखते हुए भी यह शक्ति पर अंकुश रखता है। वर्तमान समय में मानव जाति के विध्वंस के हथियारों (परमाणु, जैविक एवं रासायनिक) पर भी रोक अंतर्राष्ट्रीय कानून के माध्यम से ही लगाई जा सकती है। तृतीय, अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने वाला विश्व जनमत को अपने विरुद्ध पाता है। इस प्रकार राष्ट्रों के समुदाय में अपनी छवि ठीक रखने हेतु भी राष्ट्रों को ऐसा करना पड़ता है। चतुर्थ, अंतर्राष्ट्रीय कानून के आधार पर राज्यों के विरुद्ध कार्यवाही भी हो सकती है। उदाहरण स्वरूप, सुरक्षा परिषद् चार्टर के अनुसार अनुच्छेद् 10, 39, 41, 45 व 94(2) के अंतर्गत कानून तोड़ने वाले राज्यों के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है। अत: अंतर्राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत दण्डात्मक कार्यवाही। सामूहिक सुरक्षा की कार्यवाही भी राज्यों पर उचित अंकुश रखती है। पंचम, समय-समय पर शान्ति व सुरक्षा से निपटने हेतु अंतर्राष्ट्रीय सन्धि व समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाते हैं। इनके माध्यम से हस्ताक्षरित राष्ट्र अपने आपको प्रतिबन्धित करते हैं। इन समझौतों के उल्लंघन करने की दिशा में ऐसे राज्यों के विरुद्ध कार्यवाही भी की जा सकती है। अन्तत: अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के माध्यम से राज्यों के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही के इलावा विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध, राजनयिक तिरस्कार व इस प्रकार के अन्य कदम भी उठाये जा सकते हैं। अत: अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का स्वरूप व दण्ड देने की क्षमता कितनी भी कम हो, परन्तु यह काफी सीमा तक उपरोक्त तरीकों से शक्ति पर अंकुश लगाने में सक्षम है। शायद यही कारण है कि जब राष्ट्र शक्ति का नग्न प्रदर्शन भी करते हैं तो अपनी उस कार्यवाही को अंतर्राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत स्पष्टीकरण देते हुए उसे न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं। यही इस बात का प्रमाण है कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की शक्ति पर सीमा लगाने हेतु उपयोगिता है।

अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता

अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता भी शक्ति पर कुछ हद तक सीमाएं लगाती है। मुख्य रूप से देखें तो यह कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता से अभिप्राय है कि राष्ट्र के उन कुछ मूल्यों का पालन करते हुए विश्व में वही कार्य करना जो करने योग्य हों। परन्तु इसकी परिभाषा व अस्तित्व को लेकर विद्वानों में परस्पर मतभेद व्याप्त है। इसमें कौन-कौन से मूल्यों का समावेश होना चाहिए इस पर भी राष्ट्रों में सर्वसम्मति का अभाव है। इतना भी सुनिश्चित है कि व्यक्ति की नैतिकता व राष्ट्र की नैतिकता दोनों अलग-अलग होती हैं। परन्तु अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता क्या है? अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता उन मानदण्डों व मूल्यों का संग्रह है जिनका दूसरे राष्ट्रों से व्यवहार करते समय पालन करना राष्ट्र एवं अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपरिहार्य समझते हैं।

यद्यपि यथार्थवादियों एवं आदर्शवादियों के बीच नैतिकता को लेकर विपरीत मत हैं। परन्तु नैतिकता से सम्बन्धित तीन महत्त्वपूर्ण पहलू हैं - प्रथम, यदि आन्तरिक रूप से राज्य नैतिक मूल्यों पर चल सकते हैं तो राष्ट्र बाह्य सन्दर्भों में भी इसका पालन कर सकते हैं। द्वितीय, राष्ट्र अपने हितों की पूर्ति भी वृहत विश्व/मानव जाति के संदर्भ में ही कर सकता है। तृतीय, किसी भी प्रकार के अत्याचारों के विरोध पर तो सहमति हो सकती है।

इन तीन महत्त्वपूर्ण पहलुओं के साथ-साथ कई विद्वानों का मत है कि विभिन्न बाध्यताओं के स्वरूप भी अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का अस्तित्व बना रहता है। ये बाध्यताएं हैं - (i) निर्णायकों की अंतर्रात्मा की; (ii) अंतर्राष्ट्रीय कानून की; (iii) विश्व जगत की; (iv) अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आदि।

अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता पर असहमति, इसकी कमजोरी, यथार्थवादियों द्वारा इसकी अस्वीकृति आदि के उपरान्त भी हम कह सकते हैं कि अपने सीमित सन्दर्भ में यह निम्न प्रकार से प्रभावी होती है-
  1. आज अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में विवादों के समाधान हेतु युद्ध के विकल्प की निंदा की गई है। अत: समस्याओं को राजनयिक रूप से हल करने के प्रयास को उचित माना गया है। इसीलिए यदि किसी स्थिति में युद्ध भी करना पड़े तो अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का समर्थन लेना अनिवार्य है। अत: या तो इस डर से राज्य युद्ध के विकल्प का प्रयोग ही नहीं करते, अथवा न्यायोचित युद्ध की परिकल्पना स्थापित करने की कोशिश करते हैं। अत: आज युद्ध व शांति के मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के स्वरूप / समर्थन को भी ध्यान में रखा जाता है।
  2. आज राज्य को उचित या अनुचित का निर्देशन भी अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के माध्यम से प्राप्त होता है। प्रत्येक राष्ट्र यह समझता है कि उसकी कार्यवाही को जब तक विश्व जनमत का समर्थन नहीं प्राप्त हो सकता तब तक वह उसे अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता हेतु सही न सिद्ध कर दें। उदाहरण के रूप में अमेरिका द्वारा 1990 व 2003 की कार्यवाहियाँ बेसक अमेरिका के राष्ट्रहितों के अनुरूप की गई लेकिन उसने दोनों समय संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का सहारा लिया अथवा बहुराष्ट्रीय कार्यवाही का स्वरूप देने की कोशिश की। शायद इसके पीछे उसके द्वारा अपनी कार्यवाही को अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के अनुरूप प्रमाणित करने का प्रयास रहा है।
  3. कई बार अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का पालन इसलिए नहीं होता कि इसके पीछे कोई बाध्यकारी स्वरूप जुड़ा हुआ है, बल्कि यह इसलिए भी की जाती है क्योंकि यदि विश्व रहेगा तब ही राष्ट्रों के हित पूर्ण होंगे, यदि ऐसा नहीं होगा तो विपरीत स्थिति होगी। वर्तमान समय में शास्त्रों के आधुनिकतम स्वरूप से युद्ध केवल दो राष्ट्रों के बीच आपसी संघर्ष तक ही सीमित नहीं होते, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के विनाश तक कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, परमाणु हथियारों के संदर्भ में अब जीत-हार नहीं होगी बल्कि “परस्पर तय विनाश” निश्चित है। अत: अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को आज नैतिकता के दायरे में ही संयोजन करना महत्त्वपूर्ण हो गया है।
  4. अन्तत: वर्तमान विश्व में सभी क्षेत्रों मे राष्ट्रों के मध्य तीव्र प्रतिस्पर्धा विद्यमान है। राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक आदि सभी क्षेत्रों में राष्ट्र एक दूसरों से संघर्ष व निरन्तर सर्वोच्चता प्राप्त करने में लगे रहते है। सभी राष्ट्र शक्ति संचय की दृष्टि से अधिक से अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु प्रयासरत हैं। ऐसी स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं नैतिकता के द्वारा ही विश्व व्यवस्था को सुनिश्चित व सुव्यवस्थित ढंग से रखा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होगा तो अराजकता व शक्ति हेतु अन्धे संघर्ष की स्थिति बन जायेगी जो किसी भी राष्ट्र हेतु उचित नहीं होगी। इस प्रकार यह सत्य है कि अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के पीछे कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं होती जो इसे लागू कर सके। यथार्थवादी तो इस शक्ति संघर्ष के युग में तो इसके अस्तित्व को ही नकारते हैं। इसके साथ-साथ कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका अंतर्राष्ट्रीय स्थिति में महत्त्व गिरता जा रहा है। कम होता जा रहा है। लेकिन युद्ध के भयानकता, हथियारों के विनाशकारी स्वरूप, राज्यों के मध्य बढ़ती अंतर्निर्भरता आदि के कारण चाहे इसके प्रभाव में कमी भी हो, परन्तु इसका अस्तित्व अवश्य बना रहेगा। वास्तविकता में ना भी करें, लेकिन सिद्धान्त रूप में सभी राष्ट्र अपने निर्णयों को अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता के अनुरूप सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।

विश्व जनमत

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विश्व जनमत की अवधारणा एक अस्पष्ट अवधारणा है। इसके अतिरिक्त यह मूर्त रूप की बजाय मुख्यतया अनुभूत की स्थिति है। राष्ट्रीय जनमत की तुलना में यह कम विकसित तथा अशिक्षित अवस्था में है। फिर भी इसका प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कई परिस्थितियों में देखने को मिलता है। परन्तु इसके प्रभाव को जानने से पूर्व इसे परिभाषित करने व इसके स्वरूप के बारे में जानकारी अति महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए मारगेन्थाऊ का मानना है कि विश्व जनमत राष्ट्रोपरि होता है तथा यह विभिन्न राष्ट्रों के सदस्यों को कुछ मूल अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सर्वसम्मति से एकीकृत करता है।

परन्तु यह अवधारणा स्वचालित नहीं है तथा भ्रामक भी है। अलग-अलग राष्ट्रों द्वारा जनमत की अभिव्यक्ति अपने राष्ट्रहितों के द्वारा प्रभावित होती है। इसीलिए कई विषयों पर एक राष्ट्र एक प्रकार की राय देता है तो दूसरा राष्ट्र ठीक उसके विपरीत। ऐसी स्थिति में सत्य क्या है यह जानना भ्रामक हो जाता है। तीसरा राष्ट्र भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही उन मुद्दों पर अपनी राय कायम करता है। इसीलिए कई विषयों पर विश्व जनमत संगठित हो जाता है तो कई अन्य विषयों पर ऐसा नहीं हो पाता।

मारगेन्थाऊ के अनुसार इस स्थिति हेतु तीन कारण उत्तरदायी होते हैं जो निम्न प्रकार से है-
  1. सर्वप्रथम, विश्व में मनोवैज्ञानिक एकता का अभाव है। उसका मानना है कि सभी तीन बातें - स्वतन्त्रता, शान्ति व व्यवस्था - को अनिवार्य मानते हैं। ये तीनों बुनियादी बातें विश्व जनमत का मूल आधार है तथा विश्व जनमत का प्रतीक भी है। आमतौर पर सभी राष्ट्र इससे सहमत हैं लेकिन नैतिक व राजनैतिक मूल्यांकनों में सभी विभिन्न राय रखते हैं। इस प्रकार के निर्णयों में परिस्थितियों की भी भूमिका होती है। इस प्रकार के राजनैतिक मतभेदों के कारण एक समान विश्व जनमत तैयार नहीं हो पाता।
  2. द्वितीय, विश्व औद्योगिकरण के विकास के कारण भी एकीकरण की संदिग्धता बनी रहती है। यद्यपि औद्योगिक विकास, विशेषकर सुचना प्रसार के क्षेत्र में विकास, के माध्यम से राज्य नजदीक आ रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ‘‘विश्व सरकारकी ओर अग्रसर है। लेकिन इसके बाद भी राजनैतिक रूप से आज भी राष्ट्रीय हितों की प्रधानता को नकारा नहीं जा सकता। कई राष्ट्रों के संदर्भ में आर्थिक व व्यापारिक हित इतने सशक्त हो जाते हैं कि राज्यों के अन्दर एक आम सहमति नहीं विकसित होती।
  3. अन्तत:, राज्यों के बहुआयामी विकास के बाद भी आज भी राष्ट्रीय हित ही सर्वोत्तम समझे जाते हैं। राष्ट्रीय हित इतने प्रभावी माने जाते हैं कि उनके लिए आज भी राज्य युद्ध लड़ने को तैयार है। आज भी राष्ट्र ‘अंतर्राष्ट्रीय’ या ‘विश्व’ राजनीति के हितों के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के लिए ज्यादा सजग हैं। अत: इसके कारण भी विश्व जनमत के निर्माण में व्यवधान पड़ता है। इस प्रकार उपरोक्त तीनों कारणों से विश्व जनमत के विकास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कठिनाईयां आ रही हैं।
इस अवधारणा के सन्दर्भ में एक महत्त्वपूर्ण कठिनाई यह है कि क्या विश्व जनमत वास्तव में होता है? जिनका मानना है कि यह जनमत नहीं है उनके तर्क हैं कि - विश्व समस्याओं का समाधान विश्व की बड़ी शक्तियों की सर्वसम्मति पर ही निर्भर होता है; विकासशील देशों में पिछड़ेपन के कारण यह सम्भव नहीं कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़ी शक्तियां ही अधिक प्रभावी होती हैं; मानवाधिकारों की समस्या सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है; तथा, शीतयुद्धोत्तर युग में एक-शक्ति के वर्चस्व स्थापित करने के कारण अब यह और अधिक कठिन हो गया है।

परन्तु दूसरी ओर कई नई परिस्थितियों के घटनाक्रम से विश्व जनमत की उपस्थिति दर्ज होती है। जैसे - संचार साधनों के द्वारा विश्व का जुड़ना; अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा इन्हें बढ़ावा देना; युद्ध विरोधी, मानवाधिकार व अन्य शान्ति संगठनों द्वारा इसे प्रोत्साहन देना; राज्यों के बीच विभिन्न प्रकार के समझौतों का होना; विभिन्न संकट कालीन परिस्थितियों में एक दूसरे राज्यों की मदद करना आदि।

इस प्रकार विभिन्न अवरोधक कारणों व नकारात्मक अस्तित्व के बाद भी यह सत्य है कि विश्व जनमत है तथा इसके द्वारा निम्न रूप से शक्ति पर अंकुश रखा जाता है -
  1. सर्वप्रथम, शक्ति के विकास के साथ राज्य प्राय: अपने साम्राज्य विस्तार में अग्रसर होते हैं। इसके लिए कई बार वह युद्धों का सहारा भी लते हैं। लेकिन युद्ध के माध्यम से शक्ति प्रदर्शन पर आमतौर पर सभी राज्य उसकी निन्दा करते हैं तथा विरोध जताते है। इसी विश्व जनमत के कारण शायद बड़ी शक्तियां प्राय युद्ध नहीं करती।
  2. द्वितीय, वर्तमान युग में हथियारों की होड़, अपने चरम पर पहुंची हुई है। इस शस्त्र विकास में बहुत से विनाशकारी शस्त्र भी शामिल हैं। इन शस्त्रों की विध्वंसक क्षमता को देखते सारा विश्व जनमत हमेशा निरस्त्रीकरण पर बल देता है ताकि विश्व को विनाश के कगार पर जाने से रोका जा सके। शायद इसी कारण से समय-समय पर राष्ट्रों के मध्य द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सन्धि व समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
  3. वर्तमान युग में यह सत्य है कि चाहे कितना भी विकसित देश हो या विकासशील देश, परन्तु वे सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर नहीं है। अर्थात् सभी राष्ट्र आज परस्पर अन्तर्निर्भर हैं। इस परस्पर आर्थिक आदान-प्रदान की बाध्यता के कारण राष्ट्रों के मध्य आर्थिक संबंध, समानता तथा न्याय पर आधारित हों इसके लिए भी समय-समय पर जनमत की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।
  4. किसी भी देश द्वारा आक्रामक व अत्याचारी विदेश नीति के अपनाने पर हमेशा जनमत ने इसका विरोध किया है। सम्पूर्ण 20वीं शताब्दी में जब भी किसी राष्ट्र ने दूसरे राज्यों के साथ हस्तक्षेप की नीति अपनाई है तभी राष्ट्रों ने मिलकर उसका विरोध व्यक्त किया है।
अत: सीमित ही सही परन्तु जब-जब विश्व में शांति व सुरक्षा को खतरा होता है या राज्य के अस्तित्व को कोई चोट पहुंचती है या विश्व विनाश के कगार पर पहुंचता है तब-तब विश्व जनमत की अभिव्यक्ति होती है। वर्तमान सन्दर्भ में विश्व सभी क्षेत्रों में भूमण्डलीकरण की ओर अग्रसर है इसीलिए अनुमान है इस राज्यों के मध्य बढ़ते सहयोग से विश्व जनमत के विकास को और बल मिलेगा।

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