शीत युद्ध का अंत

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एक लंबे समय तक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करने वाली शीत युद्ध की अवधारणा 1985 ई. के बाद समाप्त होती दिखाई देने लगी, द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद दो महाशक्तियों के बीच तनाव का जो वातावरण था, वह शांति के वातावरण में बदलता प्रतीत होने लगा। यद्यपि शीत युद्ध में 1970 में भी कमी आई थी लेकिन 1979 में अफगानिस्तान संकट ने इसके स्थाई अंत की सम्भावनाओं को धराशायी कर दिया और एक नए प्रकार के शीत युद्ध को जन्म देकर विश्व को फिर से नए विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया था। लेकिन अपरिहार्य कारणों से अमेरिका और सोवियत संघ तथा इनके सहयोगी राष्ट्र अब विश्व में स्थायी शान्ति के प्रयास करने पर सहमत दिखाई देने लगे और अन्त में वे अपने इस उद्देश्य में सफल हो गए तथा शीत युद्ध का विश्व से सफाया होना अवश्यम्भावी हो गया।

शीत युद्ध के अन्त के प्रयास

1985 से अमेरिका, सोवियत संघ तथा कुछ अन्य राष्ट्रों ने शीत युद्ध को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने शुरू कर दिये और उन्होंने आपसी विश्वास की भावना कायम करके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नए युग की शुरुआत की। अब विश्व में आतंक का संतुलन समाप्त होने लगा और धीरे धीरे स्थायी शान्ति की नींव पड़ने लगी। अमेरिका और सोवियत संघ ने पुरानी शत्रुता भुलाकर शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व और सहयोग की नीति अपना ली। शीतयुद्ध का स्थान शान्ति, समृद्धि तथा विकास के प्रयासों ने ले लिया। 1985 से शुरू होने वाले शान्ति प्रयासों को अन्त में 1991 में सफलता मिल गई और शीत युद्ध की समाप्ति हो गई। दोनो महाशक्तियों द्वारा शीत-युद्ध की समाप्ति की दिशा में किए जाने वाले प्रयास हैं।
  1. दोनों महाशक्तियों में नवम्बर, 1985 में जेनेवा में एक बैठक हुई जिसमें परमाणु अप्रसार पर जोर दिया गया तथा दोनों देशों में सांस्कृतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा आर्थिक सम्बन्धों को बढ़ावा देने पर विचार किया गया। शीतयुद्ध को कम करने का यह सर्वप्रथम प्रयास था जो स्थायी शान्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।
  2. 11 अक्तूबर, 1986 में राष्ट्रपति रीगन तथा मिखाइल गोर्बाच्योव के बीच आइसलैंड में वार्ता हुई। इसमें सामरिक हथियारों में 50 प्रतिशत तक कटौती करने, यूरोप तथा एशिया में मध्यम दूरी के प्रक्षेपास्त्रों की संख्या कम करने तथा स्टारवार्स कार्यक्रम (अन्तरिक्ष कार्यक्रम) दस वर्ष तक रोकने पर विचार हुआ। लेकिन राष्ट्रपति गोर्बाच्योव ने स्टारवार्स कार्यक्रम स्थगित करने पर असहमति जताई जिससे शान्ति के इस प्रयास को धक्का लगा।
  3. 9 दिसम्बर, 1987 को अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन तथा सोवियत राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाव्योव के बीच आई.एन.एफ. सन्धि हुई, जिसके अनुसार 1139 परमाणु हथियारों को नष्ट करने पर दोनों देश सहमत हो गए। यह दोनों देशों की तरफ से निरस्त्रीकरण का प्रथम और महत्वपूर्ण प्रयास था। इस सन्धि के अनुसार दोनों देश परस्पर निरीक्षण पर सहमत हो गए। इस सन्धि ने दोनों देशों में लम्बे समय से चले आ रहे तनाव के वातावरण में कुछ कमी की।
  4. 1 जून 1988 को दोनों देशों के बीच भूमिगत परमाणु विस्फोटों, अंतरामहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम की सूचना एक दूसरे को देने की बात पर सहमति हुई। इसमें पारस्परिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी सहमति दी गई। 5. 8 दिसम्बर, 1988 को संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में सोवियत राष्ट्रपति गोर्बाच्योव ने पूर्वी यूरोप के देशों से अपने 5 लाख सैनिक वापिस बुलाने की घोषणा की। इससे सोवियत संघ की विदेश नीति में अमेरिका के प्रति आए बदलाव के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने लगे। इससे विश्व शान्ति का आधार मजबूत हुआ।
  5. 2 दिसम्बर, 1989 को अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश तथा सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाच्योव के मध्य भूमध्यसागर में एक वार्ता हुई। इसमें अमेरिकन राष्ट्रपति ने सोवियत राष्ट्रपति को अमेरिका आने का निमंत्रण दिया। इसमें आपसी बातचीत के कार्यक्रम को जारी रखने पर सहमति हुई।
  6. 9 नवम्बर, 1989 को बर्लिन दीवार को तोड़ दिया गया और दोनों देशों ने इस पर अपनी सहमति जता दी।
  7. 1 जुलाई, 1990 को जर्मनी का एकीकरण हो गया और दोनों देशों ने इस अपनी सहमति की मुहर लगा दी। इससे लम्बे समय से दोनों देशों में चला आ रहा पारस्परिक तनाव भी खत्म हो गया।
  8. 8 सितम्बर, 1990 को राष्ट्रपति बुश व गोर्बाच्योव के बीच हेलसिंकी में आपसी वार्ता हुई। दोनों ने ईराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण की निन्दी की और संयुक्त राष्ट्र संघ को मजबूत बनाने पर सहमति जताई।
  9. 9 नवम्बर 1990 को जर्मनी तथा सोवियत संघ ने परस्पर तनाव कम करने के लिए एक अनाक्रमण समझौता किया, इससे यूरोप में नई शान्ति की शुरुआत हुई।
  10. सोवियत संघ ने 1 जुलाई, 1991 को अपने सैनिक गठबन्धन ‘वारसा पैक्ट’ की समाप्ति की घोषणा कर दी।
  11. 31 जुलाई, 1991 में दोनों देशों में मास्को में एक बैठक हुई जिसमें सर्वाधिक खतरनाक व विनाशकारी हथियारों में कटौती के लिए स्टार्ट सन्धि पर हस्ताक्षर किए गए।
  12. अक्तूबर, 1991 में नाटो सदस्य देशों ने अपने परमाणु हथियारों में 80 प्रतिशत कटौती करने की घोषणा की। 14. 12 सितम्बर, 1991 को मास्को में दोनों महाशक्तियों ने अफगानिस्तान में शान्ति बहाल करने की बात पर एक समझौता किया।

शीतयुद्ध की समाप्ति के कारण

विश्व में लगभग तीन दशक तक आतंक का संतुलन काम रखने वाली शीत युद्ध की अवधारणा आखिरकार 1991 को अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से लुप्त हो गई। इसकी समाप्ति के कारण हैं-

सोवियत संघ का विघटन -

 प्रथम विश्व युद्ध के समय 1917 की साम्यवादी क्रांति के बाद एक शक्तिशाली देश के रूप में उभरने वाले तथा 1945 से 1991 तक विश्व सम्बन्धों में एक महाशक्ति के रूप में जाने वाले देश सोवियत संघ का 1991 में विघटन हो गया। उसके तीन बाल्टिक राज्य - एस्तोनिया, लैटविया तथा लिथुआनिया तो पहले ही स्वतन्त्र हो चुके थे। शेष राज्य भी एक एक करके स्वतन्त्रता के प्रयास करने लगे। आन्तरिक आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं के कारण इनको एक सूत्र में बांधकर रखना सम्भव नहीं था। इन्होंने मिखाइल गोर्बाच्योव की उदारवादी नीतियों का पूरा लाभ उठाया और अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया, अपने समय में महाशक्ति के रूप में पहचान रखने वाला देश सोवियत संघ अपने राजनीतिक बिखराव को नहीं रोक सका, उस साम्यवादी दल भी समाप्त हो गया। गोर्बाच्योव की आर्थिक नीतियां, साम्यवाद की हठधर्मिता, बाल्टिक राज्यों की भूमिका, मुकत बाजार व्यवस्थ, लोकतन्त्र का आकर्षण आदि तत्वों ने सोवित संघ के विघटन में योगदान दिया और इससे शीत युद्ध स्वत: ही समाप्त हो गया।

सोवियत संघ का आर्थिक दिवालियापन - 

1945 के बाद सोवियत संघ लगातार अपना अधिकतर पैसा शस्त्र निर्माण व अन्तरिक्ष अनुसंधान पर खर्च करता चला आ रहा था। उसने अपने देश में ऐसे कारखानों या उत्पादन ईकाईयों की स्थापना व विकास पर ध्यान नहीं दिया जिससे उसके व्यापार में वृद्धि हो, लोगों को रोजगार मिले और उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो। उसकी पश्चिमी शक्तियों के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा ने उसको दिवालिया बना दिया। उसकी राष्ट्रीय आय लगातार घटती रही। उसका निर्यात लगातार कम होते होते शून्य स्तर पर पहुंच गया। उसका कृषि उत्पादन भी चौपट हो गया। लगातार श्रमिक हड़ताल करने लगे। खाड़ी यु़द्ध ने उसके शस्त्र निर्यात को गहरा आघात पहुंचाया। उसके लगातार गिरते उत्पादन ने लोगों में गरीबी व भ्रष्टाचार को जनम दिया। लोगों की क्रय शक्ति कम हो गई। उसने पश्चिमी देशों से आर्थिक सहायता की मांग की। पश्चिमी देशों ने उस पर कठोर शर्तें लगा दी और प्राप्त सहायता से वह अपनी सैनिक प्रतिस्पर्धा जारी नहीं रख सकता था। इसी कारण से वह अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रता के लिए उठने वाले आन्दोलनों को भी नहीं रोक सका। सभी राज्यों ने एक एक करके स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी और अन्त में इस साम्यवादी देश का विघटन हो गया। इस तरह उसका आर्थिक दिवालियापन या आर्थिक मजबूरियां ही उसके अन्त का कारण बनी और इसी से शीत युद्ध का भी अन्य हो गया।

लोकतन्त्रीय विचारधारा का अन्त- 

साम्यवाद की हठधर्मिता ने जनता को लोकतन्त्रीय विचारधारा की ओर जाने पर विवश कर दिया। जनता साम्यवादी अत्याचारों से मुक्ति पाने को तैयार थी। जनता को 1991 में एक ऐसा अवसर मिल गया। पूर्वी यूरोप के देश स्वतन्त्र निर्वाचन वाली बहुदलीय लोकतन्त्रीय राजनीतिक व्यवस्था को अपनाने लगे। सोवियत संघ के सभी नवोदित स्वतन्त्र राज्यों ने मिखाईल गोर्बाच्योव के उदारवादी स्वभाव का फायदा उठाकर साम्यवाद को नष्ट कर दिया। सोवियत संघ में भी 1990 में साम्यवादी पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और जन भावनाओं को व्यापक महत्व दिया गया, लोगों के मन पश्चिमी देशों के प्रति सहयोग व प्रेम की भावना का जन्म हुआ। साम्यवादी देश के रूप में पश्चिमी देशों के प्रति अविश्वास की भावना की पूरी तरह समाप्ति हो गई।

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था -

1990 में पूर्वी यूरोप के अधिकतर देशों ने लोकतन्त्रीय राजनीतिक व्यवस्था के साथ साथ मुक्त बाजार व्यवस्था को भी स्वीकार कर लिया। आर्थिक विकास का कम्युनिस्ट मॉडल अप्रासांगिक प्रतीत होने लगा था। केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था ने जनता की क्रय शक्ति में कमी कर दी थी। गोर्बाच्योव के उदारवादी कार्यक्रम में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था को प्रमुख स्थान दिया। गोर्बाच्योव ने स्वयं अपनी इस नीति की घोषणा की। लोगों की लम्बे समय से चली आ रही मांग अब पूरी हुई। इससे सोवियत संघ और पश्चिमी देशों में व्यापार में वृद्धि होने लगी और जी-7 देशों से भी उसे आर्थिक सहायता प्राप्त होने की सम्भावना में वृद्धि हुई। अमेरिका तथा जर्मनी ने सोवियत संघ को आर्थिक मदद देकर जनता के मन में अपनी प्रति चली आ रही वैमनस्य की भावना को समाप्त कर दिया। जनता ने अपने साम्यवादी नेताओं और उनके आर्थिक कार्यक्रमों की आलोचना शुरू कर दी। इससे उनकी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का स्वप्न पूरा हुआ और अन्त में रूप से शीत युद्ध का भी अन्त हो गया।

गोर्बाच्योव की उदारवादी नीतियां -

1985 में सत्ता सम्भालते ही मिखाईल गोर्बाच्योव ने अमेरिका के साथ शान्तिपूर्ण सह- अस्तित्व व सहयोग की नीति अपनाई, उसने शीत युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका के साथ कम और मध्यम दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों को नष्ट करने वाली सन्धि (I.N.F.) पर हस्ताक्षर किए। उसने ग्लास्नोस्त (खुलेपन) तथा ‘पेरेस्त्रोइका’ (पुननिर्माण) की नीति लागू की। इससे राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय जगत में नई व्यवस्था की शुरुआत हुई। उसकी इस नीति ने सोवियत संघ में अलगाववाद की प्रवृति को जन्म दिया। उसने पूर्वी यूरोप के देशों की स्वतन्त्रता तथा लोकतन्त्र का भी समर्थन करके अपने उदारवादी कार्यक्रम को स्पष्ट किया। उसने वार्सा पैक्ट भंग करने की घोषणा करके साम्यवादी कार्यक्रम को गहरा आघात पहुंचाया। भ्रष्टाचार व आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार जनता ने उनकी उदारवादी नीतियों का पूरा फायदा उठाया और स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करने शुरू कर दिए। इससे सोवियत संघ का विघटन हुआ और इस विघटन ने शीत युद्ध का भी अन्त कर दिया।

इस प्रकार सोवियत संघ के अवसान (Disintegration), गोर्बाच्योव की उदारवादी नीतियां, सोवियत संघ का आर्थिक दिवालियापन, लोगों का लोकतंत्र के प्रति बढ़ता रुझान आदि ने शीत युद्ध को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वारसा पैक्ट समाप्त कर दिया गया और अमेरिका के साथ सहयोग व शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की भावना में वृद्धि होने लगी। लम्बे समय से चला आ रहा तनाव समाप्त हो गया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।

शीतयुद्ध के अन्त का अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर प्रभाव

1945 के बाद से अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य चला आ रहा शीत युद्ध सोवियत संघ की सुप्रीम सोवियत द्वारा सोवियत संघ की समाप्ति का प्रस्ताव पारित होने के साथ ही समाप्त हो गया। इसके विश्व सम्बन्धों पर प्रभाव पड़े-
  1. इससे विश्वशान्ति का आधार मजबूत हुआ और दोनों देशों में लम्बे समय से चलते आ रहे तनाव का अन्त हो गया।
  2. इससे विश्व में आतंक के संतुलन के स्थान पर हितों का संतुलन स्थापित हुआ। इसने तृतीय विश्व युद्ध की सम्भावना को समाप्त कर दिया।
  3. विश्व में अब सुरक्षा और विचारधारा के स्थान पर व्यापार और पूंजी निवेश के मुद्दों का विकास होने लगा।
  4. सोवियत संघ तथा पश्चिमी राष्ट्रों में पारस्परिक सहयोग की भावना में वृद्धि हुई। अपने आर्थिक पुननिर्माण के लिए सोवियत संघ को ळ.7 के देशों व अन्य पश्चिमी राष्ट्रों से आर्थिक सहायता मिलने लगी।
  5. सोवियत संघ को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक की सदस्यता प्रदान की गई।
  6. इससे निरस्त्रीकरण के प्रयासों में वृद्धि हुई।
  7. सोवियत संघ तथा अन्य साम्यवादी देशों में लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों का विकास हुआ।
  8. इससे संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका में वृद्धि हुई।
  9. विश्व में अमेरिका एक प्रमुख शक्ति बन गया।
शीत युद्ध के अन्त ने अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को नए ढंग से निर्धारित करने के लिए विवश कर दिया। इससे अंतर्राष्ट्रीय जगत में अमेरिकन दादागिरी को बढ़ावा मिला। उसका प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी सोवियत संघ अब इस स्थिति में नहीं रहा कि वह अपनी शत्रुता जारी रख सके। लेकिन उसकी दादागिरी अधिक लम्बे समय तक नहीं चल सकती। आज अनेक देश आर्थिक व सैनिक शक्ति के रूप में उभर रहे हैं।

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