भारत की विदेश नीति के सिद्धांत और उद्देश्य

किसी भी देश की विदेश नीति मुख्य रूप से कुछ सिद्धान्तों, हितों एवं उद्देश्यों का समूह होता है जिनके माध्यम से वह राज्य दूसरे राष्ट्रों के साथ संबंध स्थापित करके उन सिद्धान्तों की पूर्ति हेतु कार्यरत रहता है। इसी प्रकार प्रत्येक राज्यों की अपनी विदेश नीति होती है जिसके माध्यम से वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने संबंधों का निरूपण करते है।

विशेष रूप से सर्वप्रथम मॉडलस्की ने इसको परिभाषित करते हुए कहा था कि विदेश नीति समुदायों द्वारा विकसित उन क्रियाओं की व्यवस्था है जिसके द्वारा एक राज्य दूसरे राज्यों के व्यवहार को बदलने तथा उनकी गतिविधियों को अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में ढ़ालने की कोशिश करता है। 

भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की जड़ें उन प्रस्तावों व नीतियों में ढूंढी जा सकती है जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी स्थापना के पश्चात के 62 वर्षों (1885-1947) में महत्वपूर्ण विदेश नीति के विषयों पर अपनाई थी। यह सत्य है कि पराधीन भारत की विदेश नीति का निर्माण 1885 में स्थापित इंडिया हाउस, लंदन में होता था। अंग्रेज अन्तराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन फिर भी भारत अन्तरराष्ट्रीय कानून के रूप में ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति’ का दर्जा प्राप्त कर चुका था तथा कई विषयों पर कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं के सकारात्मक परिणाम ही नहीं निकले, अपितु स्वतंत्र भारत की नीतियों हेतु ठोस आधार भी तैयार हो गया था। इसी आधार पर पराधीन भारत को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेंलनों में भारत को भागीदारी प्राप्त होने लगी। इसके परिणाम स्वरूप ही भारत संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था का 1945 में प्रारम्भिक सदस्य बन सका।

इसके अतिरिक्त, समय-समय पर राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अभिव्यक्त विचारों ने भारतीय विदेश नीति के मुख्य आधारों की स्थापना की। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विभिन्न प्रस्ताओं एवं प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप विभिन्न सिद्धान्तों की उत्पत्ति हुई 
  1. भारतीय कांग्रेस द्वारा सदैव साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का खंडन करना बाद के वर्षो में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का भी प्रमुख लक्ष्य रहा, 
  2. भारतीय कांग्रेस द्वारा स्वयं को समय-समय पर इंग्लैंड की विदेश नीतियों से असमबद्ध घोषित करने के कारण बाद के वर्षो में भी अपने आपको महाशक्तियों के हितो से अपने को अलग रखने में सक्षम रहा
  3. मुस्लिम राष्ट्रों से सहयोग की नीतियों के कारण स्वतंत्र भारत ने भी हमेंशा अरब राष्ट्रों का ही साथ दिया
  4. कांगे्रस द्वारा एशियाई एवं पिछड़े राष्ट्रों के प्रति सहानुभूति के कारण स्वतंत्र भारत में भी अफ्रीकी व एशियाई राष्ट्रों के समर्थन की नीति अपनाई; तथा
  5. विदेश नीति की स्थापना व निर्माण के संदर्भ में भी राष्ट्रीय कांग्रेस की पहल को ही आगे बढ़ाया। 
भारत की विदेश नीति निर्धारण में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति पर ब्रिटिश विरासत, स्वाधीनता संग्राम के अनुभवों, राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं, स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व आदि का प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है। इन्ही प्रयासों एवं बदली हुई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्थिति तथा अन्य नीति निर्धारक तत्वो ने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के मुख्य उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों को जन्म दिया है।

भारत की विदेश नीति के उद्देश्य

भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है- (क) प्रमुख उद्देश्य; तथा, (ख) अन्य उद्देश्य।

भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य 

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा
  2. आर्थिक विकास
  3. उपयुक्त विश्वव्यवस्था

भारत की विदेश नीति के अन्य उद्देश्य

  1. उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद व रंगभेद का विरोध
  2. निरस्त्रीकरण का समर्थक
  3. एशिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका
  4. अफ्रो-एशियाई क्षेत्रीय सहयोग
  5. संयुक्त राष्ट्र में आस्था
  6. सभी राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण संबंध
  7. भारतीय मूल एवं प्रवासी भारतीयों की रक्षा

भारत की विदेश नीति के सिद्धांत

भारतीय विदेश नीति के सिद्धान्तों को भी दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है जो निम्न प्रकार से है-

भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत

  1. गुटनिरपेक्षता
  2. पंचशील

भारत की विदेश नीति के अन्य सिद्धांत

  1. यथार्थवाद
  2. गत्यात्मकता एवं अनुरूपता
  3. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्त्व

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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