विदेश नीति क्या है?

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किसी भी देश की विदेश नीति मुख्य रूप से कुछ सिद्धान्तों, हितों एवं उद्देश्यों का समूह होता है जिनके माध्यम से वह राज्य दूसरे राष्ट्रों के साथ संबंध स्थापित करके उन सिद्धान्तों की पूर्ति हेतु कार्यरत रहता है। इसी प्रकार प्रत्येक राज्यों की अपनी विदेश नीति होती है जिसके माध्यम से वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने संबंधों का निरूपण करते है। विशेष रूप से सर्वप्रथम मॉडलस्की ने इसको परिभाषित करते हुए कहा था कि विदेश नीति समुदायों द्वारा विकसित उन क्रियाओं की व्यवस्था है जिसके द्वारा एक राज्य दूसरे राज्यों के व्यवहार को बदलने तथा उनकी गतिविधियों को अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में ढ़ालने की कोशिश करता है। परन्तु विदेश नीति की इस प्रकार की परिभाषा को अति सरलीकरण माना जाएगा क्योंकि विदेश नीति का उद्देश्य मात्र दूसरों के व्यवहार का परिवर्तन मात्र नहीं हो सकता है। अपितु इसके माध्यम से दूसरे राज्यों की गतिविधियों का नियत्रंण करना भी अति आवश्यक होता है। इस प्रकार विदेश नीति में परिवर्तन के साथ-साथ कई बार निरंतरता की आवश्यकता भी होती है। क्योंकि विदेशी नीति परिवर्तन एवं यथास्थिति दोनों प्रकार की नीतियों का समन्वय होता है। बल्कि फेलिम्स ग्रास तो इससे भी एक कदम आगे निकल जाते हैं जब वे कहते है कि कई बार किसी राज्य के साथ कोई संबंध न होना या उसके बारे में कोई निश्चित नीति न होना भी विदेश नीति कहलाता है। इस प्रकार विदेश नीति के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पहलू होते है। यह सकारात्मक रूप में जब होती है जब वह दूसरे राज्यों के व्यवहार का प्रयास करती है तथा नकारात्मक रूप में तब होती है जब वह दूसरे राज्यों के व्यवहार को परिवार्तित करने का प्रयास करती है।

अत: विदेश नीति उन सिद्धान्तों, हितो व उद्देश्यों के प्रति वचनबद्धता जिनके द्वारा एक राज्य दूसरे राज्यों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में अपने संबंधों का निर्वाह करता है। इस संदर्भ में विदेश नीति पर निर्णय लेने के साथ-साथ इसका अन्य राज्यों के साथ संबधों का वहन करना भी अति महत्त्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन इस प्रकार के व्यवहार के समय राज्य को अपने लाभ-हानि अर्थात् संसाधन एवं जोखिम दोनों का मूल्यांकन भी कर लेना चाहिए।

इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि विदेश नीति एवं राष्ट्रीय हितों के बीच एक गहन संबंध होता है। राष्ट्रहित विभिन्न संदर्भो में विदेश नीति हेतु आवश्यक भूमिका निभाते हैं-प्रथम, ये विदेश नीति को अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के संदर्भ में सामान्य अभिविन्यास प्रदान करते है। द्वितीय, ये निकट भविष्य की स्थिति में विदेश नीति को नियंत्रण करने वाले मापदण्डों का विकल्प प्रदान करते है। तृतीय, राष्टी्रय हित विदेश नीति को निरतंरता प्रदान करते है। चतुर्थ, इन्ही के आधार पर विदेश नीति बदलते हएु अंतर्राष्टी्रय स्वरूप में अपने आपको ढा़लने में सक्षम हो सकती है। पंचम, राष्ट्रीय हित विदेश नीति को मजबतू आधार प्रदान करते हैं क्योंकि ये समाज के समन्वित एवं सर्वसम्मति पर आधारित मूल्यों की अभिव्यक्ति होते हैं। अन्तत: ये विदेशी नीति हेतु दिशा निर्देशन का कार्य करते हैं।

विदेश नीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

किसी भी देश की विदेश नीति एक विशिष्ट आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण के स्वरूप द्वारा काफी हद तक निर्धारित की जाती है। इसके अतिरिक्त उसका इतिहास, विरासत, व्यक्तित्व, विचार धाराएँ,विभिन्न संरचनाओं आदि का प्रभाव भी उस पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। भारत भी इस स्थिति का अपवाद नहीं है। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्यों के निर्धारण एवं सिद्धान्तों के प्रतिपादन में भी इन्ही बहुमुखी तत्वों का योगदान रहा है। अत: भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों को सही दिशा में समझने हेतु इसके ऐतिहासिक संदर्भ का अध्ययन करना अनिवार्य है। क्योंकि इस पृष्ठभूमि का विदेश नीति पर गहरा प्रभाव होता है। इस संदर्भ में टिप्पणी करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उचित ही कहा था कि- ‘ यह नहीं समझना चाहिए की भारत ने एकदम नये राज्य के रूप में कार्य प्रारम्भ किया है। इसकी नीतियाँ हमारे भूत व वर्तमान इतिहास तथा राष्ट्रीय आंदोलन के विकास तथा इनके द्वारा अभिव्यक्त विभिन्न आदर्शो पर आधारित है।’

इसलिए भारत की विदेश नीति की समझ एवं आंकलन हेतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं स्वाधीनता संग्राम के इतिहास पर दृष्टिपात करना अति आवश्यक बन पड़ा है। इस काल में होने वाले घटनाक्रमों के आधार पर ही स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का विकास हुआ है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की जड़ें उन प्रस्तावों व नीतियों में ढूंढी जा सकती है जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी स्थापना के पश्चात् के 62 वर्षों (1885-1947) में महत्वपूर्ण विदेश नीति के विषयों पर अपनाई थी। यह सत्य है कि पराधीन भारत की विदेश नीति का निर्माण 1885 में स्थापित इंडिया हाउस, लंदन में होता था। अग्रेंज अन्तराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन फिर भी भारत अन्तरराष्ट्रीय कानून के रूप में ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति’ का दर्जा प्राप्त कर चुका था तथा कई विषयों पर कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं के सकारात्मक परिणाम ही नहीं निकले, अपितु स्वतंत्र भारत की नीतियों हेतु ठोस आधार भी तैयार हो गया था। इसी आधार पर पराधीन भारत को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेंलनों में भारत को भागीदारी प्राप्त होने लगी। इसके परिणाम स्वरूप ही भारत संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था का 1945 में प्रारम्भिक सदस्य बन सका।

इसके अतिरिक्त, समय-समय पर राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अभिव्यक्त विचारों ने भारतीय विदेश नीति के मुख्य आधारों की स्थापना की। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विभिन्न प्रस्ताओं एवं प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप विभिन्न सिद्धान्तों की उत्त्पति हुई (i) भारतीय कांग्रेस द्वारा सदैव साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का खंडन करना बाद के वर्षो में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का भी प्रमुख लक्ष्य रहा, (ii) भारतीय कांग्रेस द्वारा स्वयं को समय-समय पर इंग्लैंड की विदेश नीतियों से असमबद्ध घोषित करने के कारण बाद के वर्षो में भी अपने आपको महाशक्तियों के हितो से अपने को अलग रखने में सक्षम रहा, (iii) मुस्लिम राष्ट्रों से सहयोग की नीतियों के कारण स्वतंत्र भारत ने भी हमेंशा अरब राष्ट्रों का ही साथ दिया; (iv) कांगे्रस द्वारा एशियाई एवं पिछड़े राष्ट्रों के प्रति सहानुभूति के कारण स्वतंत्र भारत में भी अफ्रीकी व एशियाई राष्ट्रों के समर्थन की नीति अपनाई; तथा (v) विदेश नीति की स्थापना व निर्माण के संदर्भ में भी राष्ट्रीय कांग्रेस की पहल को ही आगे बढ़ाया। अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत की विदेश नीति निर्धारण में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति पर ब्रिटिश विरासत, स्वाधीनता संग्राम के अनुभवों, राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं, स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व आदि का प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है। इन्ही प्रयासों एवं बदली हुई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्थिति तथा अन्य नीति निर्धारक तत्वो ने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के मुख्य उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों को जन्म दिया है।

विदेश नीति के उद्देश्य

प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु विदेश नीति के उद्देश्य तय करते है। भारत की विदेश नीति ने भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विभिन्न उद्देश्य निर्धारित किए है। भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है- (क) प्रमुख उद्देश्य; तथा, (ख) अन्य उद्देश्य। इनके अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों को सम्मिलित किया जा सकता है।

प्रमुख उद्देश्य 

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा
  2. आर्थिक विकास
  3. उपयुक्त विश्वव्यवस्था

अन्य उद्देश्य

  1. उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद व रंगभेद का विरोध
  2. निरस्त्रीकरण का समर्थक
  3. एशिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका
  4. अफ्रो-एशियाई क्षेत्रीय सहयोग
  5. संयुक्त राष्ट्र में आस्था
  6. सभी राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण संबंध
  7. भारतीय मूल एवं प्रवासी भारतीयों की रक्षा

विदेश नीति के सिद्धान्त

भारत ने विदेश नीति के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कुछ सिद्धान्तों का पालन किया है। सिद्धान्त न केवल विदेश नीति के तर्क संगत विश्लेषण में सहायक होते है, बल्कि नीति को निरंतरता भी प्रदान करते हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के अनुभवों एवं स्वतंत्र भारत के समक्ष विश्व की उभरती स्थिति ने मुख्य रूप से भारत की विश्व नीति के सिद्धान्तों की उत्त्पति की है। भारतीय विदेश नीति के सिद्धान्तों को भी दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है जो निम्न प्रकार से है-

प्रमुख सिद्धान्त

  1. गुटनिरपेक्षता
  2. पंचशील

अन्य सिद्धान्त

  1. यथार्थवाद
  2. गत्यात्मकता एवं अनुरूपता
  3. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्त्व

विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ

पिछले 56 वर्षों के इतिहास पर नजर डालने से भारत की विदेश नीति की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से उजागर होती है। गुटनिरपेक्षता की नीति भारत की विदेश नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू एवं केन्द्रबिन्दु है। इसकी घोषणा स्वतंत्रता से पूर्व ही अन्तरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रथम रेडियो भाषण के रूप में 7 सितम्बर 1946 को ही कर दी थी। इस विदेश नीति को अपनाने के दो प्रमुख स्रोत रहे है- भौतिक तत्त्व एवं गैर-भौतिक तत्त्व। भौतिक तत्त्वों में प्रमुख रूप से भारत की तत्कालिक भू-राजनैतिक स्थिति एवं आर्थिक स्थिति महत्त्वपूर्ण रहें है। गैर-भौतिक तत्त्वों में भारत की ऐतिहासिक विरासत,भारतीय दर्शन एवं परम्पराएँ प्रभावी रहे हैं।

इसके बारे में विस्तारपूर्वक जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि गुटनिरपेक्षता क्या है? सामान्य रूप से इसे सैन्य गठबन्धनों से अलग रहने की नीति मानते हैं। परन्तु यह विदेश नीति बहुत व्यापक एवं गतिशील है। अत: यह उपरोक्त से कहीं अधिक उपयुक्त मानी जा सकती है। इस नीति के दो सकारात्मक एवं नकारात्मक - पहलू है। नकारात्मक रूप में इसे (i) सैन्य गुटों या शीतयुद्ध गुटबन्दियों से अलग रहना; तथा (ii) सैन्य गठबन्धनों में शामिल न होने की नीति माना जा सकता है। सकारात्मक रूप में इसे (i) विश्व शान्ति स्थापित करने; (ii) उपनिवेशवाद,साम्राज्यवाद, रंगभेद आदि समाप्त करने; (iii) विश्व में स्वतंत्रता का प्रसार करने; (iv) सभी राष्ट्रों के मध्य सहयोग विकसित करने; तथा (v) नव-स्वतंत्र राष्ट्रों की सहायता करने की नीति माना जा सकता है।

गुटनिरेपक्षता की नीति को लेकर विदेशी विशेषज्ञों के मन में कई भं्रातियाँ थी। शायद इसलिए उन्होंने नेहरू के आशयों पर विश्वास करने के बजाय इसे अन्य विदेश नीतियों जैसे अलगाववाद, गैर-सम्बद्धता, तटस्थता, तटस्थीकरण, एकलवाद, अहिस्सेदारी आदि धारणाओं के समकक्ष माना। लेकिन नेहरू ने उनके इन विचारों का खण्डन करते हुए स्पष्टीकरण दिए। उनका कहना था कि जहां तक ‘तटस्थता’ व ‘तटस्थीकरण’ का प्रश्न है ये दोनों ही धारणाएँ बहुत सीमित हैं, क्योंकि आज के सन्दर्भ में विश्व युद्धों से तटस्थ रहना सम्भव नहीं है। इसके विपरीत गुटनिरपेक्ष देश को तो युद्ध में हिस्सा लेना पड़ सकता है यदि वह उसके हितों के विरूद्ध है। इसीलिए जहां स्वतंत्रता, न्याय अथवा युद्ध होंगें वहां भारत तटस्थ नहीं रह सकता। इसी प्रकार ‘अलगाववाद’ के विषय में नेहरू का मानना था कि सैन्य गुटबन्दियों में हिस्सा न लेना अलगाववाद नहीं है। कई लेखकों ने इसे ‘तीसरी शक्ति’ के रूप में भी माना है। परन्तु यह नीति दोनों गुटों के बीच टकराव या संघर्ष की नीति न होकर अन्तत: एक विश्व व्यवस्था की कामना करती है अत: यह तीसरी शक्ति भी नहीं हो सकती।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कारण थे कि भारत ने इस नीति का अनुसरण किया तथा इसके भारत हेतु क्या परिणाम निकले। भारत की स्वतंत्रता के समय की स्थिति व बाद के अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम को देखने से ज्ञात होता है कि इस नीति को अपनाने हेतु बहुमुखी कारण थें-
  1. भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद व रंगभेद के विरूद्ध एक लम्बा संघर्ष था इसलिए आजादी के बाद भारत का इन मुछों के विरूद्ध लड़ना अनिवार्य था। इस प्रकार का संघर्ष भारत विश्व सैन्य गुटों से अलग रहकर एक स्वतंत्र विदेश नीति के द्वारा ही कर सकता था।
  2. भारत की भू-राजनैतिक व्यवस्था के फलस्वरूप इसे इस नीति को अपनाना पड़ा। भारत के निकट पड़ोस में दो साम्यवादी ताकतों (सोवियत संघ व चीन) का होना तथा भारत के पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद को लेकर भारत किसी भी गुट बन्धन से अलग रहना चाहता था।
  3. भारत की उस समय की आर्थिक एवं सैन्य क्षमता तथा भविष्य में भारत की आर्थिक विकास की इच्छाओं के कारण भी उसे विश्व के सभी देशों से पूंजीनिवेश,आर्थिक सहायता,व्यापार आदि की बहुत आवश्यकता थी। अत: वह किसी एक गुट के साथ जुडना ज्यादा लाभप्रद नहीं मानता था।
  4. विभिन्नि देशों से जुड़ना एक यथार्थवादी पिदृश्य भी था क्योंकि इससे भारत के पास अपने विकास के विभिन्न विकल्प उपलब्ध थे।
  5. एक नव - स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत अब अपनी घरेलू एवं बाह्य नीतियों में किसी अन्य राष्ट्र का हस्तक्षेप पसंद नहीं करता था।
  6. नेहरू का अपना व्यक्तित्व, नये राष्ट्र के समक्ष अपनी स्वतंत्र पहचान की चाह एवं विकास की बाध्यताओं के अनुरूप भी यही नीति अधिक श्रेयस्कर प्रतीत हुई।
उपरोक्त आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से अपनाई गई गुटनिरपेक्षता की नीति के भारत के लिए निम्न परिणाम देखने को मिले-
  1. इसका अर्थ यह निकला कि भारत को अब अपनी नीति में सैन्य के स्थान पर विकास को वरीयता प्रदान करनी होगी। यह केवल आदर्शवादिता ही नहीं थी, अपितु अनिवार्यता थी।
  2. भारत की आर्थिक सहायता की मांग को देखते हुए भी अब इसे विश्व में सैन्य खर्चों में कटौती तथा गैर - सैन्य तरीकों के द्वारा विश्व शान्ति हेतु प्रयास करना आवयश्यक हो गया।
  3. भारत को आर्थिक सहायता का स्वरूप भी अपने को दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर न बनाते हुए चुनना था। इसीलिए उसे सभी प्रमुख अर्थव्यवस्था से जुड़ना था। अत: इसकी अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक एवं व्यक्तिपरक या निजी क्षेत्रों को बराबर स्थान देना आवश्यक था।
  4. भारत की सुरक्षा मात्र सभी देशों से अच्छे संबंधों के कहने मात्र से आश्वस्त नहीं हो जाती है। इस दृष्टि से भारत को अपने राज्यों की रक्षा सामथ्र्य बढ़ाने की बजाय, राजनैतिक/राजनयिक विकल्पों पर जोर देने वाला बनना होगा।
  5. शीतयुद्ध की प्रवृतियों के महत्वपूर्ण हो जाने से भारत को इन गठबंधनों से दूर रहते हुए विश्व शान्ति हेतु वैकल्पिक प्रयास करने होंगे।
  6. परमाणु शक्ति के खतरों को देखते हुए भारत को निरस्त्रीकरण बढ़ाने हेतु प्रयास ही नहीं करने होंगे बल्कि इसे अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख परम्परा के रूप में विकसित करना होगा।
अत: जहां तक भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने का प्रश्न है कि इसके माध्यम से नेहरू ने प्रमुख उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा था कि इससे भारत स्वतन्त्र विदेश नीति, गुटों से अलग रहना, विश्व शान्ति, आर्थिक विकास आदि प्राप्त करना चाहता है। इसके अतिरिक्त, भारत अपनी राष्टी्रय गरिमा के साथ - साथ नवोदित राष्ऋट्रों की समस्या से भी अवगत था। अत: इस नीति के माध्यम से भारत उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा रंगभेद की नीतियों के भी विरूद्ध था। परन्तु भारत उपनिवेशवाद का शिकार होते हुए भी किसी के विरूद्ध स्थाई कट्टरता का रूख नहीं रखता था। अत: भारत ब्रिटेन, अमेरिका, चीन,पूर्व सोवियत संघ आदि सभी देशों के साथ मित्रतापूर्वक संबंध बनाते हुए अन्तत: शान्तिपूर्ण व सहअस्तित्व पर आधारित एक विश्व स्थापित करने की दिशा में आस्था रखता था।

भारत की सुरक्षा हेतु इस नीति के अन्तर्गत भारत ने सैनिक क्षमता या गुटबन्दी के स्थान पर राजनय को सशक्त माध्यम बनाया। परिणामस्वरूप एक ओर भारत ने दोनों महाशक्तियों से समान दूरी वाले संबंध विकसित करने के प्रयास किए, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी राष्ट्रों से मित्रतापूर्वक संबंध बनाने की भरसक कोशिश की। भारत ने इस सन्दर्भ में प्रारम्भ से ही पाश्चात्य देशों (विशेषतौर पर)अमेरिका से मधुर संबंध बनाने के प्रयास किए परन्तु अमेरिका की नीतियों के कुछ प्रमुख विरोधाभाषों के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका। पूर्व सोवियत संघ के साथ भी प्रारम्भ में थोड़ी सी दूरी बनी रही परन्तु शीघ्र ही दोनों के बीच घनिष्ठ संबंधों का विकास हुआ। 1970 के दशक तक आते - आते दोनों के बीच कुछ मुख्य मुद्दों को लेकर समान दृष्टिकोणों का विकास हुआ। ये मुद्दे थे - नवोदित राष्ट्रों की स्वतंत्रता का समर्थन ; हिन्द महासागर में बढ़ते सैन्यीकरण का विरोध; तीसरी दुनिया के देशों का विकास ; मुख्य तौर पर समाजवादी व्यवस्था में आस्था आदि। इसके बाद शीत युद्ध के अन्त के बाद रूस से संबंधों की निरन्तरता के साथ - साथ, अमेरिका से भी मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित कर लिए। पड़ोसियों के साथ भी पंचशील के ढाँचे के अन्तर्गत द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय आधार पर संबंधों को मजबूत बनाया। लेकिन कई कारणों से पाकिस्तान से समस्याओं के समाधान में अभी भी कड़वाहट बनी हुई है।

पिछले 56 वर्षों में गुटनिरपेक्षता की नीति की सफलताओं एवं असफलताओं का आंकलन करने से ज्ञात होता है कि इसके माध्यम से भारत को अपने हितों की पूर्ति में आंशिक सफलता प्राप्त हुई।
  1. सर्वप्रथम, 1950 व 1960 के दशकों में इस नीति के आधार पर भारत कुछ मामलों में बहुत सफल रहा। उदाहरणस्वरूप, नव-स्वतन्त्र राष्ट्रों की मांगों को अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने के सन्दर्भ में भारत को आशातीत सफलता प्राप्त हुई। परन्तु वहीं दूसरी ओर 1962 चीन व 1965 में पाकिस्तान युद्ध के समय गुटनिरपेक्ष देशों से समर्थन प्राप्ति को लेकर भारत को घोर निराशा हुई। 1962 के युद्ध के समय कोई भी गुटनिरपेक्ष देश चीन को आक्रमणकारी कहने को राजी नहीं हुआ चीन व भारत के मामलों को सुलझाने सम्बन्धित पहल भी बहुत प्रभावी नहीं रही। 1965 के युद्ध के समय यह स्थिति और भी भयंकर सिद्ध हुई। गुटनिरपेक्ष राज्यों, द्वारा भारत को समर्थन तो दूर बल्कि कई देशों ने (मुख्य रूप से इंडोनेशिया) पाकिस्तान को भारत के विरूद्ध लड़ने हेतु हथियार भी प्रदान किए। इस प्रकार इन दशकों में गुटनिरपेक्षता की नीति भारत को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही।
  2. द्वितीय, परन्तु 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय इसी नीति का अनुसरण करते हुए भारत को अत्याधिक सफलता मिली। भारत केवल अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से ही निपटने में सफल नहीं रहा, अपितु पाकिस्तान-चीन-अमेरिका त्रिगुट को भेदने में भी सफल रहा। भारत की इस सफलता का मुख्य केन्द्र बिन्दु पूर्व सोवियत संघ के साथ हस्ताक्षरित मित्रता एवं सहयोग की सन्धि को माना जाता है। लेकिन गुटनिरपेक्षता की नीति ने ही भारत को आवश्यक लचक प्रदान की जिससे वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अपनी विदेश नीति को ढालने में सक्षम रहा।
  3. भारत की विदेश नीति को सबसे महत्वपूर्ण चुनौती 1991 के बाद शीत युद्ध की समाप्ति के बाद हुए परिवर्तनों के अनुरूप अपने आपको ढालने की थी। भारत ने इस अन्तर्राष्ट्रीय संकट की घड़ी में भी अपने हितों की उचित रक्षा की। गुटनिरपेक्ष के लचीलेपन के कारण ही भारत जहां एक ओर पूर्व सोवियत संघ के सहयोग पर आश्रित अपनी स्थिति बदलकर अमेरिका से निकट सहयोग बनाने में सक्षम रहा वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने को साम्यवादी देशों से विफल आर्थिक व व्यापारिक हितों को आशियान व पूर्वी एशिया के देशों से जोड़ने में सफलता प्राप्त की। इसके अतिरिक्त, परमाणु अप्रसार, सीटी बीटी व प्रक्षेपास्तों के प्रतिबन्धों से निपटने तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर आमसहमति विकसित करने में भी सफलता प्राप्त की। इस प्रकार शीतयुद्धोत्तर युग में नवीन समीकरणों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति में सफलता के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति द्वारा आवश्यक लचीलापन प्राप्त हुआ।
इस प्रकार गुटनिरपेक्षता की नीति ने विभिन्न क्षणों एवं चुनौतियों के सन्दर्भ में भारत को राजनयिक लचीलापन प्रदान किया है ताकि यह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राप्त करने में सक्षम हो सके। यद्यपि प्रारम्भिक संकटों में इसके माध्यम से भारत को सफलता नहीं मिल सकी, परन्तु बाद के वर्षों में यह भारत के लिए अनुकूल साबित हुई। इसके अतिरिक्त, इस नीति के अग्रणीय नेता होने के कारण जवाहरलाल नेहरू अपने समान विचार रखने वाले नेताओं (नासिर, टीटो एवं सुकार्णों) के साथ इसे आन्दोलन का रूप देने में सफल रहे। इसीलिए इसे आन्दोलन के जनक के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसीलिए तीसरी दुनिया के देशों में भारत की छवि इन देशों को नेतृत्व प्रदान करने वाली भी बनी। इसके अतिरिक्त, भारत को विभिन्न देशों से आर्थिक सहायता, तकनीक, पूंजीनिवेश आदि प्राप्त होने में सहायक सिद्ध हुई। इस नीति के कारण ही भारत विश्व में शीतयुद्ध युगीन दोनों गुटों से समन्वय बनाने में सफल रहा। वर्तमान शीतयुद्धोतर में आवश्यक लचीलेपन की आवश्यकता की पूर्ति भी भारत को इसी नीति के माध्यम से रही। यद्यपि आज यह विवाद जारी है कि शीतयुद्धोतर युग के नवीन ध्रुवीकरण के कारण यह नीति निरर्थक बन गई है। परन्तु यह सत्य नहीं है; क्योंकि गुटनिरपेक्षता की राष्ट्र की विदेश नीति एवं आन्दोलन दो अलग-अलग वस्तु है। तीसरी दुनिया के एक आन्दोलन के रूप में यह अवश्य शिथिल पड़ गया है, परन्तु एक राष्ट्र की विदेश नीति के रूप में यह हमेंशा सार्थक रहेगी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भारत है जिसने विश्व में हुए विभिन्न उतार-चढ़ावों के बावजूद इस नीति के माध्यम से अपने हितों की सफलतापूर्वक पूर्ति की है।

पंचशील को अपनाना - 

भारतीय विदेश नीति में पंचशील की नीति इसके नैतिक एवं शान्ति स्थापना के मूल्यों का द्योतक है। पंचशील इस दृष्टि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त का ही भाग है। इसके माध्यम से भारत ने अपने पड़ोसियों से संबंधों के मापदण्डों की घोषणा की है। यह सिद्धान्त भारत के ही नहीं अपितु किन्हीं दो पड़ोसियों के आदर्श संबंधों के मापदण्ड भी कहे जा सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति को केवल कल्पना तक ही सीमित नहीं रखना चाहजे थे, अपितु विश्व शान्ति स्थापना हेतु इसे व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना चाहते थे। इसीलिए इस नीति के क्रियान्वन हेतु शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इन सिद्धान्तों को सर्वप्रथम 29 अप्रैल 1954 के भारत - चीन व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में प्रतिपादित किया गया जिसे बाद में 28 जून 1954 को चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई की भारत यात्रा के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र में दोहराया गया। पंचशील के प्रमुख सिद्धान्त हैं-
  1. एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता व सर्वोच्च सत्ता के लिए परस्पर सम्मान की भावना;
  2. अनाक्रमण
  3. परस्पर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना;
  4. समानता व पारस्परिक लाभ; तथा
  5. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व
नेहरू के लिए यह सिद्धान्त मात्र भारत-चीन सहयोग तक ही सीमित नहीं था, अपितु यह भारत के संघर्षों का अन्त हो सकता है। पंचशील द्वारा, गुटनिरपेक्षता की भांति, नेहरू एशिया में ‘शान्तिक्षेत्र‘ को बढ़ाना चाहते थे ताकि इसके अधिप्लावन प्रभावस्वरूप सम्पूर्ण विश्व में शान्ति स्थापित हो सके। शायद यही कारण था कि इस सिद्धान्त को अफ्रो - एशियाई देशों के बाण्डुग (इन्डोनेशिया) सम्मेंलन 1955 तथा 14 दिसम्बर 1959 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 82 देशों द्वारा इसे भारत की पहल पर स्वीकृत किया। इस प्रकार यह सिद्धान्त भारत द्वारा संघर्ष व युद्ध के विकल्प के रूप में चीन, अपने अन्य पड़ोसी राज्यों तथा विश्व राष्ट्रों हेतु शान्ति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। यद्यपि 1962 के भारत - चीन युद्ध ने इसकी सफलता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया था, परन्तु भारत ने इसका अनुसरण करना नहीं छोड़ा। इसके विपरीत शीतयुद्धोत्तर भारत - चीन के सुधरते सम्बन्धों में इस सिद्धान्त को दोबारा व्यवहार में लाया जा रहा है। उदाहरणस्वरूप, 1988 के बाद इन दोनों देशों के सुधरते संबंधों के परिणामस्वरूप राजीव गाँधी (1988), पी0 वी0 नरसिम्हाराव (1993), के0 आर0 नारायणन (1999) तथा अटल बिहारी वाजपेयी (2003) की चीन यात्राओं तथा ली पेंग (1991), जियांग जमीन (1996), ली पेंग (2001) तथा झू रोंगजी (2002) की भारत यात्राओं के दौरान दोनों देशों ने पंचशील के सिद्धांतों में फिर संयुक्त घोषणापत्रों के माध्यम से आस्था अभिव्यक्त की है।

शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व में आस्था - 

भारत की विदेश नीति की एक अन्य विशेषता यह है कि वह शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व में विश्वास रखती है। य़द्यपि यह सिद्धान्त पंचशील का ही एक हिस्सा है, तथापि यह एक व्यापक अर्थ रखती है। व्यापक संदर्भ में यह भारत की ‘जियो और जीने दो’ की परम्परा का धोतक है। इस पंचशील से एक संदर्भ में अलग देखा जा सकता है, क्योंकि शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व द्वारा विश्व में वैचारिक या अन्य किन्हीं आधारों पर स्थापित भेदभाव की मान्यता को अस्वीकार कर सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापना पर बल दिया गया है। इसके अतिरिक्त, सैन्य गठबंधनों के संबंध में भी उनके गुट में भागीदारी न करते हुए भी अन्य क्षेत्रों में संबंध विकसित करने की मनाही नहीं है। शीतयुद्ध काल में साम्यवादी एवं पूंजीवादी गुटों की सैन्य नीतियों की आलोचना करते हुए भी सीमित स्तर तक आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सांस्कृतिक आदि संबंधों का विकास जारी रहा। इस प्रकार विश्व शांति व विकास की सभी प्रतिक्रियाओं में सभी राष्ट्रों से मित्रतापूर्वक एवं सद्भावना आधारित संबंधों पर बल दिया। शीतयुद्धोत्तर भी विभिन्न राज्यों से परमाणु अप्रसार, भावी आर्थिक विश्व व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र का प्रजातान्त्रिकरण, निरस्त्रीकरण, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, युद्ध एवं शान्ति के मुद्दों आदि विषयों पर मतभेद होने के बावजूद भी इनसे व्यापार, पूंजीनिवेश, प्रौद्योगिकी सहयोग आदि आज भी जारी है।

साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद एवं रंगभेद का विरोध - 

भारत ने उपनिवेशवाद के विरूद्ध अपना संघर्ष अति गंभीर रूप से लिया। भारत ने इसे केवल अपने देश की स्वतन्त्रता तक ही सीमित न रखकर सम्पूर्ण उपनिवेशवादी ताकतों के विरूद्ध तथा सभी अधीन देशों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के रूप में लिया है। इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भारत ने इंडोनेशिया की स्वतन्त्रता के रूप में लड़ी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से ही नहीं, बल्कि नई दिल्ली में 1949 में एशियाई देशों का सम्मेंलन बुलाकर इंडोनेशिया की आजादी हेतु भरसक प्रयास किए। जिनके परिणामस्वरूप अन्तत: इंडोनेशिया को पूर्ण स्वतन्त्र राज्य घोषित कराने में सफल हुआ। 1950 के दशक में भारत ने कई राष्ट्रों की स्वतन्त्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसमें प्रमुख रूप से इटली एवं फ्रांस के अधीन उपनिवेशों को स्वतन्त्र कराने के प्रयास शामिल हैं। भारत ने इटली के पूर्व उपनिवेशों लीबिया, इरिटेरिया व इटालियन सोमालीलैंड (1949-52) तथा फ्रांस के पूर्व उपनिवेशों मोरक्को (1951-56), तुनिसिया (1952-56), अल्जीरिया (1955-56) तथा साइप्रस (1956-60) को भी मुक्त कराया। अत: 1950 व 60 के दशकों में ज्यादातर अफ्रीकी व एशियाई देशों को उपनिवेशवाद से मुक्त कराने हेतु भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंचों एवं इसके बाहर बहुत महत्वपूर्ण प्रयास किए।

रंगभेद की नीतियों के विरूद्ध भी भारत ने भरसक प्रयत्न किए। दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीतियों का विरोध महात्मा गांधी से लेकर स्वतन्त्र भारत में भी बहुत सशक्त रूप से हुआ। भारत ने लम्बे समय तक इस देश के साथ अपने राजनयिक सम्बन्ध भी इसी नीति के विरोध स्वरूप स्थापित नहीं किए। संयुक्त राष्ट्र, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से इस नीति को समाप्त करने की बात बहुत ही सशक्त रूप से पेश की। यद्यपि इस रंगभेद के विरूद्ध भारत की लड़ाई में अमेरिका व इंग्लैंड का पूर्ण सहयोग प्राप्त न होने के कारण कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। परन्तु फिर भी भारत जनमत को इसके विरूद्ध करने में सफल रहा। भारत के निरन्तर प्रयासों के कारण सुरक्षा परिषद् ने दक्षिणी अफ्रीका की सरकार के विरूद्ध प्रतिबंधों की घोषणा की। 1963 में इन प्रतिबंधों के अन्तर्गत इस देश को भेजे जाने वाले सभी सैन्य सामानों पर रोक लगा दी गयी है। 1965 में इस देश के विरूद्ध आर्थिक प्रतिबन्धों की घोषणा की गई। इस समस्या की ओर अन्तर्राष्टऋ्रीय समुदाय का ध्यानाकर्षण हेतु 1971 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'रंगभेद नीति पर नियन्त्रण हेतु कार्य करने का अन्तर्राष्ट्रीय वर्षश् घोषित किया गया। इस प्रकार भारत की सक्रिय भूमिकाओं के साथ-साथ अन्य एशियाई व अफ्रीकी देशों के समर्थन से जिम्बावे (1980), नामीबिया (1990) आदि की स्वतंत्रता के साथ-साथ दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद रहित सरकार की स्थापना हुई। अत: भारत की विदेश नीति में रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। भारत अपने विदेश नीति के सिद्धान्तों एवं व्यवहार में हमेंशा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर रंगभेद नीति की समाप्ति हेतु प्रसासरत ही नहीं रहा, अपितु अग्रणीय राष्ट्रों में से रहा है। उसने इस मुद्दे पर पहल ही नहीं की अपितु इसे व्यवहारिक दर्जा देने हेतु अपने राष्ट्रीय हितों की परवाह न करते हुए सभी महत्वपूर्ण कदम उठाए। अन्तत: भारत के दबावो, जनमत तथा तीसरी दुनिया के देशों के सामूहिक प्रयासों से भारत को इस नीति को समाप्त करने में सफलता प्राप्त हुई।

निरस्त्रीकरण स्थापित करना -

भारत ने सदैव विश्व में सामान्य एवं व्यापक निरस्त्रीकरण हेतु प्रयास किए है। इस सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र या उसके बाहर सभी मंचों पर निरस्त्रीकरण की प्रबल वकालत करने वाले राष्ट्रों में हमेंशा भारत अग्रणीय स्थान रहा है। भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्तावों का समर्थन किया है या अपने ज्ञापनों एवं संशोधनों के माध्यम से इस प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाया है। इस दिशा में नेहरू सबसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने परमाणु शस्त्रों से मुक्त विश्व स्थापित करने हेतु 2 अप्रैल 1954 में संयुक्त राष्ट्र में “स्टैंडस्टील रैजोल्यूशन” प्रस्तुत किया। परन्तु जब 1959 तक भारत के बार - बार दोहराने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई तब भारत की पहल पर 1961 में महासभा ने ‘निरस्त्रीकरण समिति ‘ के रूप में एक स्थाई समिति की स्थापना पर सहमति व्यक्त की। इन प्रयासों के फलस्वरूप ही 1963 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘ मास्को टेस्ट बेन ट्रीटी’ आंशिक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि (पी0टी0बी0टी) पर सहमति हुई। इसे पांच परमाणु शक्तियों एवं भारत सहित कई राज्यों ने स्वीकृति प्रदान की।

यह सर्वविदित है कि 1963 की सन्धि आंशिक थी, क्योंकि इसके माध्यम से केवल जल, वायु तथा थल पर ही परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाया गया था, लेकिन भू-गर्भ द्वारा किए जाने वाले परीक्षणों पर कोई रोक नहीं लगाई गई थी। भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के माध्यम से ‘निरस्त्रीकरण समिति’ के माध्यम से एक नई सन्धि के पारित होने पर बल दिया। इसके परिणामस्वरूप 12 जून 1968 को परमाणु अप्रसार सन्धि (एनपी0टी) पर सहमति हो गई जिसे मार्च 1970 से माना गया। परन्तु भारत ने इस सन्धि की कमियों के कारण आज तक उस पर हस्ताक्षर नहीं किए है। भारत का इस सन्दर्भ में मुख्य विरोध इस सन्धि का महासभा द्वारा पारित नवम्बर 1965 में 18 राष्ट्रों की समिति के प्रस्तावों के अनुरूप न होना है। उस प्रस्ताव में सम्मिलित चार मुख्य आधारों की पूर्ति इस सन्धि के माध्यम से नहीं होती है। ये चार प्रमुख तत्व थे- (i) इस सन्धि द्वारा परमाणु राष्ट्रों एवं गैर-परमाणु राष्ट्रों द्वारा परमाणु प्रसार पर पूर्ण नियन्त्रण होना चाहिए; (ii) इससे परमाणु एवं गैर परमाणु राष्ट्रों के बीच परस्पर उत्तरदायित्व व कार्यों के बीच तालमेंल होना चाहिए; (iii) यह सामान्य एवं व्यापक निरस्त्रीकरण, विशेषकर परमाणु निरस्त्ररीकरण, स्थापित करने की दिशा में कदम होना चाहिए; तथा (iv) इसमें इस सन्धि को प्रभावी करने सम्बन्धित धाराओं का प्रावधान होना चाहिए। बाद के वर्षों में भारत ने इस सन्धि के भेदभाव पूर्ण होने तथा व्यापक न होने के कारण भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

परमाणु अप्रसार सन्धि से उत्पन्न गतिरोधों के बावजूद भी भारत ने व्यापक आधार वाली सन्धि पर सहमति के प्रयास जारी रखे। परन्तु 1978 तक ज्यादातर निरस्त्रीकरण सम्बन्धित प्रयास दोनों महाशक्तियों के बीच ही सिमट कर रह गए। काफी समय बाद 1978 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निरस्त्रीकरण पर पहला विशेष सम्मेंलन बुलाया। इसी कड़ी में द्वितीय विशेष सम्मेंलन, 1982 में श्रीमति इंदिरागांधी ने परमाणु शस्त्रों के प्रयोग न करने पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेंलन बुलाने; परमाणु हथियारों के उत्पादन या विस्फोटक सामग्री के उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाने, तथा सभी हथियारों से जुड़े परमाणु परीक्षणों पर तुरन्त प्रतिबन्ध लगाने के बारे में सुझाव दिए।

संयुक्त राष्ट्र का तीसरा विशेष सम्मेंलन जून 1988 में बुलाया गया जिसमें भारत ने विशेष भूमिका निभाई। राजीव गांधी ने इस सन्दर्भ में सन् 2010 तक विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने हेतु महत्वपूर्ण रूपरेखा पेश की। यह प्रस्ताव तीन चरणों में पूरा होना था। प्रथम चरण (1988 - 1994) में मुख्य रूप से आणविक हथियारों में भारी मात्रा में कटौती; परमाणु हथियारों एवं विस्फोटक सामग्री के उत्पादन पर प्रतिबन्ध; परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध; परमाणु हथियारों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध; अन्तरिक्ष में हथियारों के परीक्षणों एवं विस्थापन पर रोक; संयुक्त राष्ट्र जाँच व्यवस्था आदि को सम्मिलित किया गया। इसके अतिरिक्त, नाटो एवं वारस सन्धि देशों के पारम्परिक हथियारों में कटौती की बात भी की गई। द्वितीय चरण (1995-2000) में, प्रथम चरण की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के कार्यक्रम निर्धारित किए गए। इसमें मुख्य रूप से पारम्परिक हथियारों के सैन्य सम्बन्धित अड्डों की समाप्ति करने; एक व्यापक विश्व सुरक्षा व्यवस्था बनाने; संयुक्त राष्ट्र को मजबूत बनाने आदि के कार्यक्रमों को सम्मिलित किया गया। तृतीय चरण (2001-2010) में मुख्य रूप से सभी राज्यों के लिए कम से कम आवश्यक सुरक्षा सम्बन्धित निरस्त्रीकरण होना चाहिए तथा अहिंसा पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के नये ढाँचे का निर्माण होना चाहिए। इस कार्यक्रम के माध्यम से राजीव गाँधी का मानना था कि सभ्य समाज हेतु अहिंसा पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संबंध ही केवल एकमात्र विकल्प है।

इसके अतिरिक्त, भारत ने हमेंशा भेदभावपूर्ण एवं आंशिक निरस्त्रीकरण सम्बन्धी सन्धियों का विरोध किया है। इस दिशा में 1970 की ‘परमाणु अप्रसार सन्धि’ (एन.पी.टी.) पर भारत का विरोध सर्वविदित है। इस कमी को पूरा करने हेतु शीतयुद्धोत्तर युग में दिसम्बर 1993 में भारत ने अमेरिका के साथ संयुक्त रूप से ‘व्यापक परमाणु निषेध संधि’ (सी. टीबी. टी) का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत किया। परन्तु इस बीच ही परमाणु शस्त्रों से सम्पन्न राष्ट्रों ने ‘परमाणु अप्रसार सन्धि’ को भी 1995 में “असीमित” समय के लिए स्वीकृत करा लिया। जिसे बाद में विश्व के लगभग 180 राष्ट्रों की स्वीकृति मिल गई। इस घटना क्रम तथा सी.टी.बी.टी. के प्रारूप पर हुई बहस ने यह सिद्ध कर दिया कि यह नई सिन्ध् (सी.टी.बी.टी.) भी एक व्यापक व सार्वभौमिक सन्धि होने के बजाय भारत के परमाणु कार्यक्रमों पर रोक लगाने तथा अन्तत: समाप्त करने हेतु बनाई जा रही है। सन्धि पर वार्ताओं के दौर में भारत की बातों को नकारते हुए इस सन्धि के प्रभावी होने के अनुच्छेद से भारत को स्पष्ट हो गया कि यह उसके विरूद्ध “ाड़यंत्र का स्वरूप है। अत: उसने इसे मानने से इन्कार करते हुए इससे अपने को अलग कर लिया। अन्तत: परमाणु शक्ति राष्ट्रों के बढ़ते दबाओं के कारण 11व 13 मई 1998 को अपने परमाणु विकल्प का प्रयोग कर अपने को परमाणु शक्ति सम्पन्न घोषित कर दिया। भारत की नीति में उपरोक्त परिवर्तन स्तही तौर पर निरस्त्रीकरण के प्रति विरोधाभास प्रतीत होता है। लेकिन यदि गहन अध्ययन करें तो पता चलता है कि अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश की बाध्यताओं के अनुरूप भारत को अपने 24 वर्षों का संयम (1974 से 1998) तोड़ना पड़ा। अभी भी परमाणु विस्फोटों के बाद भारत ने स्वयं पर अंकुश लगाने की बात की तथा यह एकतरफा कार्यवाई बिना किसी दबाव के होगी। भारत ने ‘प्रथम प्रयोग न करने’ के सिद्धान्त तथा गैर-परमाणु राष्ट्रों के विरूद्ध भी परमाणु हथियारों के प्रयोग की मनाही की है। भारत ने सिर्फ अपनी सुरक्षा हेतु इसे ‘न्यूनतम निरोधक’ क्षमता तक ही विकसित करने की बात की है। अत: भारत आज भी किसी भी व्यापक स्वरूप वाली समता पर आधारित सार्वभौमिक सन्धि पर हस्ताक्षर करने का पक्षधर है। इसलिए निरस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्धता आज भी भारतीय विदेश नीति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

नई अन्तर्राष्टीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना की पक्षधर - 

भारत की विदेश नीति में राजनैतिक व सामरिक मुद्दों के साथ-साथ आर्थिक मुद्दों पर भी महत्त्वपूर्ण बल दिया। विश्व व्यवस्था के सन्दर्भ में 1950 व 1960 के दशकों में राजनैतिक मुद्दों को भारत ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एवं संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से उठाया। परन्तु 1970 के दशक में ज्यादातर तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्थिति में सुधार एवं विकास हेतु ‘नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ (एन.आई.ई.ओ) की स्थापना पर बल दिया। भारत का इसके पीछे तर्क था कि जब तक इन विकासशील देशों की आर्थिक समस्याओं, जैसे- गरीबी, भूख, बीमारी,बेरोजगारी आदि, का निदान नहीं होता तब तक वहां आर्थिक समृद्धि नहीं आ सकती। इस आर्थिक क्षमता के विकास के बिना इन राष्ट्रों को विश्व में समानता, स्वतन्त्रता एवं सम्मान भी प्राप्त नहीं हो सकता। अत: भारत ने गुटनिरपे्रक्ष आन्दोलन के मंचों के माध्यम से 1970 के दशक में इसे इस आन्दोलन की विषय सूची का भाग बनाया। 1973 के अल्जीरिया सम्मेंलन में विश्व शान्ति की समस्या को आर्थिक विकास व स्वतन्त्रता से जोड़ा गया। अन्तत: भारत व अन्य विकासशील देशों के प्रयास के बाद संयुक्त राष्टऋ्र ने 1 मई, 1974 को ‘नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ की घोषणा की। बाद में 1983 की ‘नई दिल्ली घोषणा’ में भी इसे अत्याधिक महत्त्च प्रदान किया गया।

शीतयुद्धोत्तर युग में यद्यपि भारत अब भूमंडलीकरण, उदारीकरण व मुक्त बाजार व्यवस्था अपना रहा है परन्तु वह आज भी इन देशों के हितों की रक्षा करके इस बदलाव के दौर में इन राष्ट्रों में स्थाईत्व का पक्षधर बना हुआ है। सर्वप्रथम, गैर वार्ताओं के माध्यम से ‘विश्व व्यापार संगठन’ के अन्तर्गत बहुपक्षीय आधार पर व्यापारिक शर्तों को विकासशील देशों हेतु न्यायोचित बनाने में प्रयासरत रहा है। द्वितीय, जी -77 व जी-15 देशों के समूह के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र में तथा दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ाकर भारत इनके आर्थिक विकास हेतु सचेत है। तृतीय, बदलते हुए परिवेश में विकसित देशों के आर्थिक गुटों में बटने के कारण (यूरोपीय संघ,नाफता,एशिया-प्रशान्त सहयोग आदि) भारत तीसरी दुनिया या गुटनिरपेक्ष देशों को भी विभिन्न क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों (हिन्दमहासागर टिम,साफ्ता आदि) के माध्यम से विकास करने का पक्षधर है। अत: इन प्रयासों के माध्यम तथा अपनी विदेश आर्थिक नीति के माध्यम से भारत आज भी विकासशील देशों तक बदलती हुई विश्व व्यवस्था के आर्थिक लाभों को पहुँचाना चाहता है। इसके अतिरिक्त, भारत इस नई स्थिति में इन देशों के विरूद्ध बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा या विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से सामाजिक धारा,बाल श्रम, मानवाधिकार आदि के नाम पर होने वाले किसी भी प्रकार के शोषण से रक्षा हेतु भी भरसक प्रयत्न कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र में निष्ठा - 

भारत ने अपनी नीति द्वारा हमेंशा न केवल संयुक्त राष्ट्र की स्थापना प्रक्रिया का समर्थन किया है बल्कि इसके द्वारा स्थापित मूल सिद्धान्तों व उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अपनी वचनबद्धता दोहराई है। नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में बोलते हुए 3 नवम्बर 1948 को कहा था कि भारत न केवल पूर्ण रूप से चार्टर के सिद्धांतों एवं उद्देश्यों हेतु वचनबद्ध है अपितु अपनी पूर्ण क्षमता के साथ उनको लागू करने की कोशिश भी करेगा। क्योंकि नेहरू का मानना था कि कुछ कमियों के बावजूद भी यह मूल कार्य को करने में सक्षम है और इसे यदि हमने आज स्थापित व मजबूत नहीं किया होता तब भी राष्ट्र इस प्रकार के संगठन की स्थापना हेतु अवश्य एकजुट हो जाते। लगभग इसी प्रकार के उदगार नेहरू ने 5 मई 1950 को संयुक्त राष्ट्र नेटवर्क से न्यूयार्क में बोलते हुए प्रकट किए जब उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के मात्र अस्तित्व से ही हमने अपने आपको कई प्रकार के खतरों एवं संकटों से बचा लिया है। इसके साथ-साथ, आज के विश्व में राष्ट्रों के मध्य शान्तिपूर्ण सहयोग की यह एक मात्र किरण है। सामान्य समय में ही नहीं बल्कि निराशा के दौर में भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र से कभी भी अपना समर्थन वापिस नहीं लिया। कश्मीर जैसे मुद्दे का हल न होने पर भी भारत की संयुक्त राष्ट्र से आस्था में कभी कमी नहीं आई।

भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों में आस्था का प्रमुख कारण भारत का स्वतन्त्रता आन्दोलन एवं संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों व उद्देश्यों में काफी समानताएँ विद्यमान होना है। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्त,जैसे विश्व शान्ति, समस्याओं का शान्तिपूर्ण हल, रंगभेद की समाप्ति, सहनशीलता, अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक व आर्थिक सहयोग, शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व आदि मूल रूप में संयुक्त राष्ट्र कार्यसूची का भी भाग है। भारतीय गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रमख मूल्य एवं आदर्श भी संयुक्त राष्ट्र के मूल्यों एवं आदर्शों से काफी हद तक मेंल खाते हैं।

इसीलिए शीतयुद्ध युगीन विश्व व्यवस्था के दौरान भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, रंगभेद आदि की समस्याओं के निवारण के साथ-साथ विश्व शान्ति की स्थापना हेतु पारम्परिक एवं परमाणु निरस्त्रीकरण की समस्या को हल करवाने के काफी प्रयास किए। यद्यपि कुछ मुद्दों पर सफलता भी मिली, परन्तु सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका। परन्तु भारत इस संगठन के माध्यम से उन्हें भी विश्व जनमत के सम्मुख प्रस्तुत कर सका। उत्तर-शीतयुद्ध काल में भी नई आर्थिक व्यवस्था के गठन, उत्तर-दक्षिण संवाद, आदि के आर्थिक मुद्दों पर भी भारत की प्रतिक्रियाएँ महत्त्वपूर्ण रही है। संयुक्त राष्ट्र में आजकल चर्चित बहुत सी महत्त्वपूर्ण रही है। संयुक्त राष्ट्र में आजकल चर्चित बहुत सी महत्त्वपूर्ण चर्चाओं जैसे पर्यावरण सुधार, आतंकवाद पर प्रतिबन्ध, धरती को बचाने के कार्यक्रमों, ओजोन परत को क्षीण होने से रोकना, प्रदूषण को कम करना आदि के संदर्भों में भी भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। परन्तु संयुक्त राष्ट्र में पाँच महाशक्तियों द्वारा प्रयोग में की गई वीटो शक्ति के कारण भारत की भूमिका उतनी सशक्त नहीं हो पा रही है। दूसरे विश्व में आये आमूलचूक परिवर्तनों के मध्य नजर भी संयुक्त राष्ट्र का शक्ति विभाजन संतुलित प्रतीत नहीं होता। इसीलिए इस संस्था को और अधिक कारगर एवं उपयोगी बनाने हेतु भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रजातान्त्रिकरण हेतु भी काफी प्रयास कर रहा है। अत: विभिन्न बदलावों के बावजूद भारत की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र में आस्था, इसमें सक्रिय योगदान व रूचि तथा इसके उत्तरदायित्वों को वहन करने की नीति निरन्तर रूप से जारी है।

विवादों को शान्तिपूवूवूर्वक हल करने का पक्षधर -

भारत की विदेश नीति हमेंशा विश्व में घटित विवादों को शान्तिपूर्ण हल करने की पक्षधर रही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा शान्ति स्थापित करने की कार्यवाही के सन्दर्भ में भारत हमेंशा अध्याय VII ;दंडात्मक कार्यवाही/सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से) के स्थान पर अध्याय VI (शान्तिपूर्ण तरीको से विवादों को सुलझाना) के अन्तर्गत कार्यवाही का पक्षधर रहा है।

भारत का मानना रहा है कि दण्डात्मक कार्यवाही से राज्यों के बीच मतभेद या मनमुटाव और बढ़ जाता है, जबकि शान्तिपूर्ण तरीकों के माध्यम से किया गया समाधान ज्यादा स्थाई सिद्ध होता है। इस सन्दर्भ में भारत सुरक्षा परिषद सुरक्षा एवं महासभा की शक्तियों में परिवर्तन का पक्षधर नहीं है अपितु इसका मानना है कि किसी भी प्रकार से परिषद् की शक्तियों को घटाकर महासभा की शक्तियों में वृद्धि नहीं की जानी चाहिए। ऐसा करना अन्यायपूर्ण ही नहीं, अपितु राजनैतिक तौर पर भी गलत होगा। शायद इसी कारण से जब नवम्बर 1949 को ‘शान्ति के लिए एकता प्रस्ताव’ के माध्यम से महासभा की शक्तियों में वृद्धि करने की बात हुई तब भारत वोट डालने के समय अनुपस्थित रहा। बल्कि भारत का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की किसी भी कार्यवाही को प्रभावी रूप से करने हेतु पाँचों वीटो शक्तियों की सहमति आवश्यक है, उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र की सैन्य कार्यवाही हेतु भी पाँचों वीटो शक्तियों की स्वीकृति का प्रावधान है।

शीतयुद्धोत्तर युग में भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रजातान्त्रिकरण हेतु भी शक्ति नहीं बल्कि आपसी सहमति को आधार बनाने का पक्षधर है। भारत की मांग बदले हुए विश्व के क्षितिज तथा समानांतर स्थिति के साथ-साथ नैतिकता एवं सर्वसम्मति पर आधारित है। भारत की यह मांग मूलत: नैतिकता, राजनैतिक, सुचारू विश्व व्यवस्था तथा प्रभाविकता पर आधारित है। अत: प्रारम्भिक वर्षों से लेकर शीतयुद्धोत्तर युग तक भारत का अटूट विश्वास रहा है कि विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से हल करना ही स्थाई एवं कारगर तरीका है। इसी माध्यम से विश्व में दूरगामी शांति एवं स्थिरता बनी रह सकती है। अत: निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि भारत की विदेश नीति की उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर ही भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति मात्र में व्यस्त है, अपितु वह विश्व शान्ति के प्रयासों को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। इन्ही विशेषताओं के द्वारा वह अपने द्विपक्षीय मतभेदों को हल करके परस्पर राष्ट्रों से अच्छे संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित करने में प्रयासरत है। भारत की विदेश नीति के अन्तर्गत इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु हिंसा का कोई स्थान नहीं है, बल्कि वह चाहता है कि मतभेदों को भी शान्तिपूर्ण ढ़ग से हल करना ज्यादा श्रेयकर रहेगा। इसके साथ-साथ इसका है कि इस सन्दर्भ में राज्यों को हथियारों की होड़ को समाप्त करके निरस्त्रीकरण पर बल देना होगा। इस सम्पूर्ण विश्व व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु वह समानता व न्याय पर आधारित नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विश्व व्यवस्था का पक्षधर है। परन्तु यह तभी सम्भव हो सकता है जब इस बदले हुए विश्व में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था कार्य करे। शायद इसीलिए वर्तमान सन्दर्भ में ईराक के किरूद्ध कार्यवाही में भारत संयुक्त राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका का का पक्षधर है। इसके साथ-साथ भारत संयुक्त राष्ट्र के प्रजातान्त्रिकरण की मांग भी करता रहा है। अत: भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, पंचशील, शान्तिपूण। सह-अस्तित्व के साथ-साथ विश्व शान्ति, सहयोग, निरस्त्रीकरण आदि को बढ़ावा देने की नीति है।

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