व्यक्तित्व की अवधारणा एवं व्यक्तित्व अध्ययन के उपागम

अनुक्रम
व्यक्तित्व की प्रकृति की व्याख्या करने के लिए वैज्ञानिकों ने विभिन्न उपागमो का प्रतिपादन किया है। इन्हें सैद्धान्तिक उपागम भी कहते हैं। इन उपागमों मे से कुछ उपागमों का संक्षिप्त विवरण है-

प्रारूप उपागम 

इस उपागम में व्यक्तित्व के प्रारूप (Type) समानताओं के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया जाता है। ग्रीक चिकित्सक हिप्पोवे्रफट्स (Hippocrates) ने लोगों को उनके शरीर मे उपस्थित फ्लूइड (fluid) के आधार पर चार प्ररूपों में वर्गीकृत किया है- उत्साही (पीला पित्त), श्लैश्मिक (कफ), विवादी (रक्त) तथा कोपशील (काला पित्त)। इन द्रवों की प्रधानता के आधार पर प्रत्येक प्ररूप विशिष्ट व्यवहारपरक विशेषताओं वाला होता है क्रेश्मर एवं शेल्डन ने शरीरिक गुणों के आधार पर व्यक्तित्व को चार प्रकारों में वर्गीकृत किया है-
  1. स्थूलकाय प्रकार (Pyknik Type), 
  2. कृष्काय प्रकार (Asthenic Type), 
  3. पुष्टकाय प्रकार (Athletic Type) और 
  4. विशालकाय प्रकार (Dysplastic Type) 
    स्थूलकाय प्रकार (छोटा कद,भारी एवं गोलाकार, गर्दन छोटी एवं मोटी) के व्यक्ति सामाजिक एवं खुशमिजाज होते हैं। कृश्काय प्रकार (लम्बा कद एवं दुबला पतला शरीर) के व्यक्ति चिड़चिड़े, सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर रहने वाले और दिवास्वप्न देखने वाले होते हैं। पुष्टकाय प्रकार (सामान्य कद, शरीर सुडौल एवं संतुलित) के व्यक्ति न ही अधिक चंचल आरै न ही अधिक अवसादग्रस्त रहते हैं। ये हर परिस्थिति में आसानी से समायोजन कर लेते हैं। और विषालकाय प्रकार के व्यक्ति वे होते हैं जिनको इन तीन श्रेणियों में शामिल नहीं किया जा सकता है।

    शेल्डन ने 1940 में शारीरिक बनावट और स्वभाव कें आधार पर, गोलाकृतिक (endomorphic), आयताकृतिक (mesomorphic) और लंबाकृतिक (ectomorphic) तीन व्यक्तित्व प्ररूप प्रस्तावित किया। गोलाकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ति मोटे, मृदुल और गोल होते हैं। स्वभाव से वे लोग शिथिल और सामाजिक होते हैं। आयताकृतिक प्ररूप वाले लोग स्वस्थ एवं सुगठित शरीर वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति ऊर्जस्वी एवं साहसी होते हैं। लंबाकृतिक प्ररूप वाले दुबले-पतले, लंबे कद वाले और सुकुमार होते हैं। ऐसे व्यक्ति तीव्र बुद्धि वाले और अंतर्मुखी होते हैं। युंग (Jung) ने 1923 मे अपनी पुस्तक ‘साइकोलाजिकल टाइप्स’ में व्यक्तित्व के दो प्रकार बताये हं-ै बहिर्मुखी (Extravert) एवं अन्तर्मुखी (Introvert)। बहिमुर्ख् ाी व्यक्ति वे होते हैं जो सामाजिक तथा बहिर्गामी होते हैं। लोगों के साथ में रहते हुए तथा सामाजिक कार्यों को करते हुए वे दबावों का सामना करते हैं। दूसरी तरफ अंतर्मुखी व्यक्ति वे होते हैं जो एकांतप्रिय होते हैं, दूसरों से दूर रहते हैं, और संकोची होते हैं।

    फ्रीडमैन (Friedman) एवं रोजेनमैन (Rosenman) ने टाइप ‘ए’ तथा टाइप ‘बी’, लोगों को दो प्रकार के व्यक्तित्वों में वर्गीकृत किया है। टाइप ‘ए’ (Type-A) व्यक्तित्व वाले व्यक्ति उच्च अभिप्रेरणा वाले, कम धैर्यवान, हमेशा समय की कमी का अनुभव करने वाले और हमेशा कार्य का बोझ अनुभव करने वाले होते हैं। टाइप ‘ए’ व्यक्तित्व वाले लोगों में कॉरोनरी हृदय रोग (coronary heart disease) के होने की संभावना अधिक होती है। दूसरी तरफ; टाइप ‘बी’ (Type-B) व्यक्तित्व के लोगों में टाइप ‘ए’ व्यक्तित्व की जो विशेषतायें होती हैं उनकी कमी रहती है। मॉरिस (Morris) ने टाइप ‘सी’ (Type-C) व्यक्तित्व को बताया है। इस प्रकार के व्यक्तित्व के लोग धैर्यवान, सहयोग करने वाले और विनयशील होते हैं। इस प्रकार के लोग अपने निषेधात्मक संवेगों ;जैसे-क्रोध का दमन करने वाले और आज्ञापालन करने वाले होते हैं। इन लोगों में कैंसर रोग के होने संभावना अधिक होती है। इस श्रेणी का नवीनतम प्रकार टाइप ‘डी’ (Type-D) व्यक्तित्व सुझाया गया है। इस प्रकार व्यक्तित्व के लोगों में अवसादग्रस्त होने की अधिक संभावना होती है।

    शीलगुण उपागम 

    शीलगुण उपागम में व्यक्तित्व की व्याख्या व्यक्ति के शीलगुणों के आधार पर की जाती है। शीलगुण उपागम व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मूल तत्वों की खोज करते हैं। लोगों में मनोवैज्ञानिक गुणों में भिन्नता पायी जाती है। इन्हीं भिन्नताओं को आधार मानकर ऑलपोर्ट और कैटेल(Cattel) ने अपने-अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किये। ऑलपोर्ट ने शीलगुणों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया- प्रमुख शीलगुण, केंद्रीय शीलगुण तथा गौण शीलगुण । प्रमुख शीलगुण (cardinal traits) सामान्य प्रवृत्तियाँ होती हैं। ये प्रवृत्तियाँ उस लक्ष्य को दर्शाती है जिसके इदर् िगर्द ही व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत होता है जैसे- मदर टेरेसा का सेवाभाव और हिटलर का नाजीवाद इत्यादि। कम व्यापक किंतु फिर भी सामान्य प्रवृत्तियाँ केंद्रीय गुण (central traits) मानी जाती हैं। जैसे- इमानदार, मेहनती आदि। व्यक्ति के सबसे कम सामान्य गुणों के रूप में गौण शीलगुण (Secondary traits) जाने जाते हैं। जैसे-’मैं सेब पसंद करता हूँ’ अथवा ‘मैं अकेले घूमना पसंद करता हॅं’ आदि।

    कैटेल ने कारक विश्लेषण (Factor analysis) के आधार पर 16 मूल शीलगुण बताये हैं। मूल शीलगुण (source traits) स्थिर होते है और व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इसके अलावा अनेक सतही शीलगुण (surface traits) भी होते है जो मूल शीलगुणों की अंत:क्रिया के फल-स्वरूप उत्पन्न होते हैं। उन्होंने शीलगुण व्यक्तित्व मूल्यांकन के लिए एक परीक्षण विकसित किया जिसे सोलह व्यक्तित्व कारक प्रश्नावली (Sixteen Personality Factor Questionnaire, 16PF)

    मनोविष्लेषणात्मक उपागम 

    इस उपागम का प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड द्वारा किया गया था। फ्रायड एक चिकित्सक थे और उन्होंने अपना सिद्धांत अपने पेशे के दौरान ही विकसित किया। उन्होंने मानव मन को चेतना के तीन स्तरों (चेतन, पूर्वचेतन और अचेतन) के रूप में विभक्त किया है। प्रथम स्तर चेतन (conscious) होता है जिसमें वे चिंतन, भावनाएँ और क्रियाएँ आती हैं जिनकी जानकरी लोगों को रहती है। द्वितीय स्तर पूर्वचेतना (preconscious) होता है जिसमें वे मानसिक क्रियाएँ आती हैं जिनकी जानकारी लोगों को तभी होती है जब वे उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। चेतना का तृतीय स्तर अचेतन (unconscious) होता है जिसमें ऐसी मानसिक क्रियाएँ आती है जिनकी जानकारी लोगों को नहीं होती है।

    फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना के तीन तत्व बताये है इदम् या इड (id) vga (ego) और पराहम (superego) । इदम असमन्वित सहज प्रकृति है, जो सुख के सिद्धान्त पर आधारित होता है। अहं सुनियोजित होता है, जो वास्तविकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है और पराहम पूर्णता को प्रदर्शित करता है, नैतिकता पर आधारित होता है। फ्रायड ने रक्षा युक्तियों (defence mechanisms) के बारे में विस्तार से बताया है।

    फ्रायड ने रक्षा युक्तियाँ वास्तविकता को विकृत कर दुश्चिंता को कम करने का माध्यम हैं। रक्षा युक्तियों में सबसे महत्वपूर्ण दमन (repression) है जिसमें दुश्चिंता उत्पन्न करने वाले व्यवहारों और विचारों को पूरी तरह चेतना के स्तर से विलप्ु त कर देते हैं। दमन करते समय उन्हें इसका ज्ञान भी नहीं रहता है। कुछ और युक्तियाँ रक्षा प्रक्षेपण, प्रतिक्रिया निर्माण और युक्तिकरण, इत्यादि हैं।

    नव-फ्रायडवादी उपागम 

    नव-फ्रायडवादीयों में युंग, हॉर्नी, एडलर, एरिक्सन आदि का नाम महत्वपूर्ण है। सबसे पहला नाम युंग का आता है। पहले यंगु (Jung) ने फ्रायड के साथ ही काम किया किंतु बाद में वे फ्रायड से अलग हो गए। युंग के अनुसार मनुष्य काम-भावना और आक्रामकता स्थान पर उद्देश्यों और आकांक्षाओं से अधिक निर्देशित होते हैं। उन्होंने व्यक्तित्व का अपना एक सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसे विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान (analytical psychology) कहते हैं।

    फ्रायड के अनुयायियों में युंग के बाद दूसरा नाम हॉर्नी का आता है। हॉर्नी आशावादी दृष्टिकोण को मानने वाले थे। उनके अनुसार माता-पिता बच्चे के प्रति यदि उदासीनता, हतोत्साहित करने और अनियमिता का व्यवहार करते हैं तो बच्चे के मन में एक असुरक्षा की भावना विकसित होती है जिसे मूल दुश्ंिचता (basic anxiety) कहते हैं। एकाकीपन और असुरक्षा की भावना के कारण बच्चों के स्वास्थ्य के विकास में बाधा होती है।

    एडलर (Adler) ने वैयक्तिक मनोविज्ञान (individual psychology) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसके अनुसार व्यक्ति उद्देश्यपूर्ण एवं लक्ष्योन्मुख व्यवहार करता है। एडलर के अनुसार हर एक व्यक्ति हीनता से ग्रसित होता है। एक अच्छे व्यक्तित्व के विकास के लिए इस हीनता की भावना का समाप्त होना अति आवश्यक है। एरिक्सन (Erikson) ने व्यक्तित्व-विकास में तर्कयुक्त चिन्तन एवं सचेतन अहं पर बल दिया है। उनके अनुसार विकास एक जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है और अहं अनन्यता का इस प्रक्रिया में केन्द्रीय स्थान है।

    व्यवहारवादी उपागम 

    यह उपागम उद्दीपक-अनुक्रिया के आपसी तालमेल के आधार पर अधिगम और प्रबलन को महत्व देता है। व्यवहारवादियों के अनुसार पर्यावरण के प्रति व्यक्ति की अनुक्रिया के आधार पर उसके व्यक्तित्व को अचछी तरह से समझा जा सकता है। व्यवहारवार के प्रमुख सिद्धांतो में पावलव द्वारा दिया गया प्राचीन अनुबंधन, स्किनर द्वारा दिया गया नैमित्तिक अनुबंधन और बंडुरा द्वारा दिया गया सामाजिक अधिगम सिद्धांत मुख्य हैं। व्यवहारवार के इन प्रमुख सिद्धांतों का व्यक्तित्व विकास के विष्लेषण में बहुतायत से प्रयोग हुआ है। प्राचीन एवं नैमित्तिक अनुबंधन सिद्धांतों में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का कोई स्थान नहीं है, जबकि सामाजिक अधिगम सिद्धांत में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को प्रमुख स्थान दिया गया है।

    मानवतावादी उपागम 

    मानवतावादी उपागम में रोजर्स (Rogers) और मैस्लो (Maslow) के सिद्धांत प्रमुख हैं। रोजर्स ने आत्म (Self) पर अधिक बल दिया है। जिसमें उन्होंने वास्तविक आत्म (real self) और आदर्श आत्म (ideal self) की चर्चा की है। प्रत्येक व्यक्ति का एक आदर्श आत्म होता है जिसको प्राप्त करने के लिए वह हमेशा तत्पर रहता है। आदर्श आत्म वह आत्म होता है जो कि एक व्यक्ति बनाना चाहता है। जब वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म समान होते हैं तो व्यक्ति प्रसन्न रहता है और दोनों प्रकार के आत्म के बीच विसंगति के कारण प्राय: अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अपनी अन्त:षक्तियों को पहचानने और उसी के अनूरूप व्यवहार करने की विशेष क्षमता होती है। व्यक्तित्व विकास के लिए संतुष्टि एक अभिपे्ररक शक्ति का कार्य करती है। लोग अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं को उत्कृष्ट तरीके से अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं।

    रोजर्स ने शर्तरहित स्वीकारात्मक सम्मान (unconditional positive regard) को अधिक महत्व दिया है। दूसरी तरफ मैस्लो ने व्यक्तिगत वर्धन (personal growth) और आत्म निर्देश (self direction) की क्षमता पर अधिक बल दिया है, और व्यक्तिगत अनुभूतियों को नगण्य माना है। उन्होंने अपने सिद्धांत में आशावदी दृष्टिकोण को महत्व दिया है। जिससे मानव की आन्तरिक अंत:शक्तियों को समझने में काफी सुविधा हुई है। मैस्लो ने आत्मसिद्धि (self-actualisation) की प्राप्ति कों मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ लोगों की विशेषता माना है। आत्मसिद्धि वह अवस्था होती है जिसमें लोग अपनी संपूर्ण क्षमताओं को विकसित कर लेते हैं। मैस्लो के आशावादी और सकारात्मक दृष्टिकोण के अनुसार मानव में प्रेम, हर्ष और सृजनात्मक कार्यों की क्षमता होती है।

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