धर्म का अर्थ, परिभाषा, वर्गीकरण एवं धार्मिक व्यवहार

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अनुक्रम

धर्म का अर्थ कर्तव्य, संस्कारों और गुण से होता है। शाब्दिक दृष्टि से धर्म शब्द ‘धृ’ धारणे अर्थात धृ धातु जिसका अर्थ धारण करना होता है। धर्म का अर्थ है किसी वस्तु की अस्तित्ववत्ता को धारण करना या सिद्ध करना। किसी वस्तु की अनिवार्य सत्ता को बनाये रखना धर्म का अनिवार्य गुण है। जैसे सूर्य का प्रकाश तथा शर्करा की मिठास। विश्व की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करने तथा सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था का निर्माण करने में और सामाजिक नियंत्रण के एक प्रमुख अभिकरण के रूप में धर्म का सर्वोच्च स्थान है।

संकुचित अर्थ में धर्म का अर्थ अन्धविश्वास करना, माला जपना, मंदिर जाना, तिलक लगाना आदि क्रियाओं से लगाया जाता है। व्यापक अर्थों में धर्म का तात्पर्य हृदय को पवित्र बनाना, उत्तम चरित्र एवं नैतिकता प्राप्त करना, मन में आध्यात्मिक मूल्यों को स्थापित करना आदि क्रियाएं आती है। धर्म एस मौलिक शक्ति के रूप में जाना जा सकता है जो भौतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था का आधार रूप है और जो उस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है।

धर्म की परिभाषा

  1. एडवर्ड टायलर के अनुसार धर्म आध्यात्मिक शक्ति का विश्वास है।
  2. मैलिनोवस्की के अनुसार धर्म क्रिया की एक विधि है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।
  3. हॉबल के अनुसार, धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है जिसमें आत्मवाद व मानववाद दोनों सम्मिलित हैं।

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते है कि धर्म किसी न किसी प्रकार की अतिमानवीय या अलौकिक शक्ति पर विश्वास है जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता की धारणा है और जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना, पूजा या आराधना आदि के रूप में की जाती है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का आधार है, जीवन का शाश्वत सत्य है, जो श्रेष्ठ है। हिन्दू धर्म में त्याग और भोग का आर्दश समन्वय पाया जाता है। व्यक्ति को यहां सांसारिक सुखों का उपभोग और जीवन की वास्तविकता से परिचय प्राप्त करते हुए, अपने इहलोक और परलोक को उत्तम बनाने की ओर अग्रसर किया गया है। हिन्दू धर्म में कत्र्तव्य की भावना पर जोर दिया गया है।

धर्म का वर्गीकरण

वर्ण धर्म

सामाजिक संगठन के आधार पर वर्णों को चार भागों में विभक्त किया जाता है। ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। धार्मिक रूप से इन चारों वर्णों के पृथक-पृथक धर्म निर्धारित है जिससे प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की तुलना में अपने दायित्वों का उचित रूप से निर्वाह कर सके। अर्थात् ब्राह्मण का धर्म है कि पढ़ाना, आत्मनियंत्रण तथा तप का अभ्यास करना तथा यज्ञ कराना। अध्ययन करना, लोगों की रक्षा करना, युद्व करना आदि क्षत्रियों का धर्म है। उसी प्रकार गाय-बैल आदि पशुओं की रक्षा करना, दान करना, उचित साधनों हेतु धन का उपार्जन करना, व्यापार करना आदि वैश्य का मुख्य कर्तव्य धर्म है। शूद्र की सृष्टि अन्य तीनों वर्णों के सेवक के रूप में बिना ईर्ष्या के सेवा करना है।

आश्रम धर्म

समाज में प्रत्येक व्यक्ति के सभी कर्तव्यों को दूसरे व्यक्ति के प्रति, समाज के प्रति, स्वयं के प्रति पूरा करने के दृष्टिकोण से जीवन को चार भागों में विभाजित किया जाता है- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम तथा सन्यास आश्रम। प्रत्येक आश्रम में व्यक्ति के कुछ विशेष कर्म निर्धारित है जिन्हे मानसिक, शारीरिक, नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का विकास करके अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की ओर बढता है।

वर्णाश्रम धर्म

चारों वर्णों के पृथक पृथक वर्ण धर्म में प्राविधान के साथ ही आश्रम धर्म के पालन का विधान किया गया था। प्रथम तीन वर्ण के व्यक्तियों द्वारा ही आश्रम धर्म का पालन किया जाता था। शूद्र वर्ण के लिए आश्रम धर्म नहीं था।

गुण धर्म

गुण धर्म का संबंध राजधर्म से था जिसका तात्पर्य केवल क्षत्रिय धर्म से नहीं वरन् जो प्रजा की रक्षा करें अर्थात् शासनकर्ता के धर्म से है। क्योकि पूजा समाज तथा धर्म का रक्षक है इसलिए सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को संतुलित बनाने के लिए राजा का कर्तव्य दूसरे व्यक्तियों के धर्मों से बहुत भिन्न है अर्थात् राजधर्म भी एक विशेष धर्म है।

निमित्त धर्म

वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के निमित्त जो विधियां है उनको नैमितक धर्म कहते है। उनके पालन में जो भी कुछ त्रुटियां हो जाती हैं उनको दूर करने के लिए प्रायश्चित विधि भी इसके अन्तर्गत आती है।

साधारण धर्म

सामान्य धर्म का अर्थ धर्म के उस रूप से है जो सभी द्वारा अनुसरणीय है। व्यक्ति चाहे किसी भी वर्ण, आयु, लिंग, वर्ग आदि का क्यों न हो सामान्य धर्म का पालन करना सभी का कत्र्तव्य है। यह धर्म व्यक्ति विशेष का न होकर समस्त मानव जाति का होता है। इसके नैतिक नियम समस्त मानव जाति के लिए समान होते हैं इसी कारण इसे ‘मानव धर्म’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।यदि इसका पालन किसी इच्छा की पूर्ति के लिए किया जाय तो इससे लौकिक कल्याण में वृद्धि होगी और निश्काम रूप से इसका पालन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस धर्म का मुख्य उद्देश्य यह है कि मानव में सद्गुणों का विकास करना तथा इस लक्ष्य की प्राप्ति करना कि सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। इस प्रकार सामान्य धर्म का उद्देश्य मनुष्य की इसी श्रेष्ठता को बनाये रखना और उसे सामान्य कल्याण की ओर प्रेरित करना है।

विशिष्ट धर्म

विशिष्ट धर्म को स्वधर्म भी कहा जाता है क्योकि यह विशेष व्यक्ति का अपना धर्म है। समय, परिस्थिति और स्थान के अनुसार सभी व्यक्तियों के लिए भिन्न भिन्न कर्तव्यों को पूरा करना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न व्यक्तियों के गुण, स्वभाव, व्यवहार, आयु और सामाजिक पद में भी भिन्नता होती है। ऐसी स्थिति में सभी व्यक्तियों का धर्म अथवा कर्त्तव्य एक दूारे से भिन्न होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के धर्म अपने अपने वर्ण के अनुसार है, स्त्री और पुरूष का धर्म अलग- अलग है, गुरू और शिष्य का एक-दूसरे से भिन्न होता है, सैनिक का धर्म एक तथा राजा का धर्म दूसरा होता है।

इस प्रकार समाज में दूसरे व्यक्तियों की तुलना में एक व्यक्ति की जो स्थिति निर्धारित होती है। और उसके सामने जिस प्रकार की परिस्थितियां होती है, उसके अनुसार निर्धारित होने वाले कर्त्तव्यों को ही विशिष्ट धर्म कहते है। इस धर्म की विशेषता यह है कि व्यक्ति का विशिष्ट धर्म चाहे उसे नीची स्थिति प्रदान करता हो अथवा ऊँची लेकिन ऐसा विश्वास किया जाता है कि अपने धर्म का पालन करने से ही मोक्ष का अधिकारी होता है।

धर्म का प्रादुर्भाव

धर्म कैसे शुरू हुआ? और धर्म कैसे विकसित हुआ? यह विकासवादी चिन्तन डार्विन के विकासवाद सिद्धांत से प्रभावित था। कालांतर में इन सवालों ने दो मुख्य सिद्धांतों आत्मवाद और प्रकृतिवाद को जन्म दिया।

आत्मवाद

आत्मवाद के अनुसार आत्मा की धारणा धर्म के मूल में है अर्थात् आत्माओं में विश्वास। इसीलिए इसका नाम आत्मवाद है। टायलर के अनुसार आदिम आत्मा के विचार को गलती से अपनाता था। आत्मा का विचार मनुष्यों के सामान्य जीवन की जाग्रत और सुप्त दो अवस्थाओं के दृश्यों के विषय में भ्रामक ज्ञान उत्पन्न हुआ है। आदिम मनुष्य स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों को जाग्रत अवस्था में दिखाई देने वाले तथ्यों के समान ही सत्य और महत्वपूर्ण समझता है। अत: व्यक्ति को यह अनुभव होने लगा कि व्यक्ति के शरीर में दो आत्मा है। एक सोते समय शयन स्थान पर विद्यमान रहता है, और एक शरीर को छोड़कर बाहर विचरण करता है। शरीर से पृथक शून्य में स्वतन्त्र विचरण करने वाली यह आत्मा ही पूर्वात्मा या सामान्य शब्दों में ये प्रेतात्मा बन जाती है।

अत: आदिम मनुष्य प्रत्येक घटना की व्याख्या इन प्रेतात्माओं के आधार पर करता है। बीमारी, पागलपन इत्यादि सभी प्रेतात्माओं का फल मान लिया जाता है। इस प्रकार मनुष्य के द्वारा प्रेतात्माओं को प्रसन्न करने के लिए की पूजा करने लगे जबकि आत्मा अमूर्त होती है और मनुष्य के द्वारा आत्मा में शक्ति का विश्वास मानकर पूर्वजों की पूजा करना आरम्भ कर देते हैं।

आत्मवाद की विशेषताएं

  1. आत्मवाद अपने आप में कर्म नहीं है। यह तो एक आदर्श प्रारूप है जिसे द्वारा धर्म के उद्विकास का अध्ययन किया जाता है।
  2. आत्मवाद में जीवात्मा की अवधारणा है। जीवात्मा वह है जो जीवित व्यक्तियों के शरीर में निवास करती है। मृत्यु के पश्चात् या शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी जीवात्मा बनी रहती है।
  3. प्रेतात्मा और जीवात्मा दोनों अलौकिक शक्ति के रूप है और इन्हे पेड़-पौधों, पत्थर इत्यादि में देखा जा सकता है।
  4. मनुष्य प्रकृति के साथ होने वाले अपने संघर्ष में जीवात्मा की पूजा करके सुरक्षित रहना चाहता है।

प्रकृतिवाद

इस सिद्धांत के मुख्य प्रतिपादक मैक्समूलर रहे हैं। मैक्समूलर ने धर्म की प्रकृतिवादी एवं अनुभूतिपरक व्याख्या प्रस्तुत की मैक्समूलर के अनुसार धर्म को यदि हमारी चेतना के वैध तत्व के रूप में स्थान प्राप्त करना है, तो इसे अन्य समस्त ज्ञान की भांति इन्द्रियात्मक अनुभव के प्रारम्भ होना चाहिए। मैक्समूलर ने वेदों के आधार पर प्रकृतिवाद के सिद्धांत को प्रस्तुत किया। मैक्समूलर उन अनुभूतियों की व्याख्या करता है जिनके कारण धर्म की उत्पत्ति हुई। इनके आत्मवाद में प्राकृतिक शक्तियों के प्रति श्रद्धा और भय मिश्रित भावनाओं के कारण धर्म का विकास हुआ। मैक्समूलर ने प्रत्येक जड़ व चेतन पदार्थ में एक जीवित सत्ता का विश्वास किया है वे कहते है कि आदि मानवों ने विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों जैसे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, जल, पेड़- पौधों के प्रति पूजा और आराधना द्वारा अपनी श्रद्धा को दिखाते है जिससे वे प्राकृतिक के दुष्परिणामों से बचकर उसकी शक्ति से लाभ उठा सकें। इस प्रकार प्रकृतिवाद मानव की संवेदनाओं पर प्रकृति की शक्तियों व चमत्कारों के प्रभावों की प्रतिक्रिया है। उनके अनुसार देवताओं के नाम प्राकृतिक तथ्यों के नाम पर रखे गये हैं। मैक्समूलर ने जोर देकर कहा कि प्रकृति की वस्तुओं के प्रति भय या प्रेम व आदर का व्यवहार एक बीमार दिमाग की उपज था जिसने जीवनरहित चीजों में जीवन और वे सभी शक्तियां डाल दीं जो जीवन से संबंधित हैं। यह पुन: प्रारम्भिक मनुष्य की मूर्खता से उपजा जिसके मूल में उसका भाषिक अहापोह था ये भाषिक गड़बड़ियां जैसे सूरज उगता और डूबता है या आंधी बारिश भेजती है और पेड़ पत्तियां व फूल पैदा करते हैं इस धारणा को मजबूत बनाने में सफल रहीं कि सूरज, पेड़ तथा आंधी में कोई न कोई शक्ति अन्तनिर्हित है। इस प्रकार एक आत्मा को बीच में लाना जरूरी हो गया जो उनके नाम पर होने वाले अनुष्ठानों का आलबंन है।

मैक्समूलर के विचारोनुसार मनुष्य के सामने सबसे पहली वास्तविकता प्रकृति के रूप में ही दृष्टिगोचर हुई, और उसने प्राकृतिक तथ्यों को देखकर आश्चर्य का, भय का, शोभा और सौन्दर्य का अनुभव किया। प्रकृति के तथ्य स्थायी और बार-बार प्रकट होने के कारण ही प्राकृतिक कहलाए। प्रकृति का ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जो हमारे मन में एक अनन्त की यह अत्यधिक अनुभूति जगाने के योग्य नहीं है, जो हमारे चारों ओर व्याप्त है, हम पर शासन करता है।

टोटमवाद

यह उस सामाजिक व्यवहार का बोध कराता है जिसके अंतर्गत सांकेतिक रूप से मानवीय और गैर मानवीय वस्तुओं प्राय: जीव जंतु या बनस्पति के बीच तादात्म्य स्थापित किया जाता है। दुर्खीम के अनुसार आस्ट्रेलिया के आदिवासियों में टोटमवाद सरलतम और सबसे बुनियादी धर्म-रूप है। इन लोगों के बीच टोटम की वस्तु न केवल धर्म से बल्कि कुल की सदस्यता से भी जुड़ी है। हर कुल का एक टोटम होता है जो प्राय: कोई जानवर या पौधा होता है। दुर्खीम किसी गोत्र समूह की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करता है।

  1. गोत्र का सदस्य परस्पर नातेदारी के सम्बन्धों के आधार पर संगठित होता है।
  2. गोत्र का नाम किसी भौतिक वस्तु के नाम पर होता हे जिसे टोटम कहते है।

अत: टोटम की विवेचना में गोत्र की विवेचना अत्यन्त आवश्यक है।

टोटमवाद की विशेषताएं

  1. इसके साथ एक गोच के सदस्य अपना कई प्रकार का गूढ़, अलौकिक तथा पवित्र संबंध मानते है।
  2. टोटम के साथ इस अलौकिक तथा पवित्र संबंध के आधार पर ही यह विश्वास किया जाता है कि टोटम उस शक्ति का अधिकारी है जो उस समूह की रक्षा करती है, सदस्यों को चेतावनी देती है और भविष्यवाणी करती है।
  3. टोटम के प्रति भय, श्रृद्धा और भक्ति की भावना रखी जाती है। वह इस बात पर निर्भर नहीं होती कि कौन सी वस्तु टोटम है या वह कैसी है, क्योंकि टोटम तो प्राय: अहानिकारक पशु या पौधा होता है। टोटम सामुदायिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक है तथा टोटम की उत्पत्ति उसी सामुदायिक रूप में समाज के प्रति श्रद्धाभाव के कारण हुई। यही श्रद्धाभाव पवित्रता को जन्म देती है।
  4. टोटम के प्रति भय, श्रृद्धा और भक्ति की भावना रखी जाती है। टोटम को खाना, मारना, हांनि पहुचाना वर्जित होता है। उसके चित्र रखे जाते हैं और उससे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु को पवित्र माना जाता है।
  5. टोटम के संबंध में जो निशेध होते हैं उनका कड़ाई से पालन किया जाता है और मर्यादा भंग करने पर दंड का प्रावधान होता है।
  6. टोटम एक प्रकार की ऐसी रहस्यमयी सर्वशक्ति वस्तु समझी जाती है जो समूह के सम्पूर्ण जीवन को निर्देशित और नियंत्रित करती है।

धार्मिक व्यवहार

धार्मिक व्यवहारों के द्वारा समाज व धर्म के संबंध को रेखांकित होते हैं प्रत्येक धर्म में कुछ तत्व समान होने के साथ ही कुछ विशिष्ट तत्व पाए जाते हैं जिनसे व्यक्ति का व्यवहार प्रभावित होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं।

अनुष्ठान अथवा कर्मकाण्ड

अनुष्ठान, विशिष्ट संस्कारें के अवसरों पर बार-बार दोहराया जाने वाल वाला कार्य है जिसके माध्यम से हर समुदाय अपनी आस्था मूर्त रूप में अभिव्यक्त करता है।यह एक निश्चित विन्यास वाला क्रियाकलाप है जिसका उद्देश्य मानवीय परिस्थितियों को नियंत्रित करना होता है। प्रत्येक धर्म में भिन्न-भिन्न अनुष्ठान किये जाते है जैसे पूजा-पाठ, प्रार्थना, यज्ञ, हवन, नमाज आदि विभिन्न मानवीय समाजों में अनुष्ठानों के अलग-अलग रूप और प्रकार मिलते है। कुछ अनुष्ठान सरल होते है और कुछ जटिल। त्याग करना यह सभी धर्मों में पाया जाता है।

वालेस के अनुसार अलौकिक शक्ति को सक्रिय बनाने के लिए धर्म के मूलभूत घटक के रूप में अनुष्ठान को प्रयोग में लाया जाता है। यह परम्पराओं को स्थायित्व प्रदान करने का कार्य करता है।

हर अनुष्ठान में समूह के सदस्यों के बीच भावनात्मक एकता भी कायम करते है और इस तरह ऐसे अवसरों पर व्यक्ति और समूह दोनों के लिए एक नैतिक निर्देश/ नियम में विश्वास मजबूत होते हैं। इस प्रकार के नैतिक नियम अप्रत्यक्ष रूप में सामाजिक व्यवस्था के संगठन में सहायता करते है। लोगों या व्यिक्त्यों का विश्वास है कि त्याग करने में दैवीय शक्ति प्रसन्न होगी। इन दैवीय शक्ति की कृपा जीवन पर्यन्त बनी रहेगी। इसीलिए लोग दान करते हैं। उदाहरण सिक्ख धर्म में आय का कुछ प्रतिशत भाग दान या लंगर के रूप में लगाया जाता है। अनुष्ठान द्वारा किसी भी सामाजिक रीति से पवित्र बनाया जा सकता है और जो कुछ भी पवित्र होता है उसे अनुष्ठान का रूप दिया जा सकता है।

आस्था

डेविस के अनुसार आस्थाएं धर्म का ज्ञानात्मक पक्ष होता है। ये अनुभव पर आधरित न होकर विश्वास पर आधारित होती हैें। प्रत्येक धर्म में कुछ कथन होते है जिन्हे अनुयायी मानते है। प्रत्येक धर्म में ये कथन भिन्न भिन्न होते हैं। आस्थाएं मनुष्य या व्यक्तियों को अच्छा जीवन जीने का मार्गदर्शन देती है इस उद्देश्य के बिना आस्थाओं का कोई अस्तित्व नही होता तथा इन्हे नैतिक प्रभावी को मूल्यांकित करना चाहिए न संज्ञात्मक वैधता के लिए नही। इन्हे दो भागों में विभक्त किया जाता है।

  1. धार्मिक मूल्य- ये वे धारणाएं है जो क्या अच्छा है , क्या वांछनीय है तथा क्या उचित है आदि से संबंधित होती हैं ये उस धर्म के मानने वाले समस्त लोग मान्य करते हैं ये मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं तथा सामाजिक संस्थाओं में अमिट छाप छोड़ते हैं।
  2. ब्रह्मण्डिकी- इसके अंतर्गत उन धारणाओं का समावेश होता है जिसमें स्वर्ग, नरक, जीवन मृन्यु आदि का वर्णन होता है। प्रत्येक धर्म इनका वर्णन भिन्न प्रकार से करता है तथा व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करता है। उइाहरण व्यक्ति समाज में बुरे कार्य इसलिए नहीं करता कि उसे मरने के बाद नरक प्राप्त होगा।

अनुभव

धार्मिक अनुभव से तात्पर्य उस अनुभव से है जब व्यक्ति दैवी शक्ति से एक रूप में हो जाता है तथा इन अनुभवों द्वारा व्यक्ति शांति प्राप्त करता है। किसी विशिष्ट धर्म की आस्थाएं व अनुष्ठान धार्मिक अनुभवों के लिये सौहार्दपूर्ण अथवा प्रतिकूल वातावरण का निर्माण कर सकते हैं।

धर्म तथा सामाजिक नियंत्रण

धर्म मनुष्य के जीवन का एक अनिवार्य तत्व है यह मानव जीवन के अनेक पक्षों एवं आयामों को प्रभावित करती है साथ ही मानव के व्यवहारों को नियंत्रित करता है। इसलिए धर्म सामाजिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण साधन है।

  1. धर्म समाज द्वारा मान्य व्यवहार न करने पर समाज के साथ-साथ भगवान भी नाराज हो जायेगा। इस विचार से नियंत्रण में सहायता देते है।
  2. धर्म की संस्थाएं और उनके संगठन मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और उनसे संलग्न धार्मिक व्यक्ति विभिन्न स्तर पर अपने सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रण करते रहते हैं।
  3. संस्कारों, समारोह, प्रार्थना, पुजारियों की सत्ता, धार्मिक प्रवचनों, उपदेशों के माध्यम से भी सदस्यों के व्यवहारों पर संस्थागत नियंत्रण रखते हैं।
  4. प्रत्येक धर्म में किसी न किसी रूप में पाप और पुण्य की धारणा का समावेश होता है। पाप और पुण्य उचित और अनुचित, अच्छाई और बुराई तथा सद्कर्म और दुश्कर्म की धारणाएं शैशवकाल से ही व्यवहार के अंग बन जाती है जो जीवनपर्यन्त व्यक्ति का निर्देशन करती रहती है। धर्म व्यक्ति में पाप और पुण्य की भावना को विकसित कर व्यक्तियों में यह प्रेरणा भरता है कि धर्म के अनुसार आचरण करने से उसे पुण्य होगा और धर्म के विरूद्ध आचरण करने से उसे पाप होगा। इसलिए व्यक्ति धार्मिक आचरणों का उल्लघंन नही करते। अत: यह कहा जा सकता है कि धर्म के द्वारा भी समाजीकरण होता है।
  5. धर्म व्यक्तियों में नैतिकता की भावना तथा आत्म नियंत्रण पैदा करता है क्योंकि धार्मिक नियमों का पालन करने से यह होता है। इसका फल उनको अच्छा मिलेगा।
  6. धर्म एक ऐसा तरीका है जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के स्थान पर सामूहिक स्वार्थ का महत्व हो जिस कारण सामाजिक एकीकरण को बढावा मिलता है। वे परस्पर सहयोग करते हैं, उनमें समान भावनाए, विश्वास एवं व्यवहार पाए जाते है। धर्म व्यक्ति को कर्तव्यों के पालन की प्ररेणा देता है। सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों कापालन करके सामाजिक संगठन एवं एकता को बनाये रखने में योग देते हैं।

धर्म और विज्ञान

धर्म और विज्ञान का भी मानव जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। दोनों ही संस्कृति के अभिन्न अंग है और दोनों का ही प्रयोग मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये किया जाता है। धर्म और विज्ञान किसी अस्तित्व को देखने समझने और परखने की शैली है। विज्ञान परिस्थितियां की समीक्षा करता है जबकि धर्म जीवन जीने की कला सिखाता है। धर्म नाश्वान और श्रणिक वस्तुओं के प्रति उदासीन रहता है किन्तु विज्ञान उन्ही वस्तुओं का निरीक्षण, परीक्षण और सामान्यीकरण करता है। जहां धर्म ईश्वर और पारलौकिक शक्ति के सहारे मानवीय समस्याओं का समाधान खोजता है वहीं विज्ञान वास्तविकता के आधार पर कार्य एवं कारण के सहारे समस्याओं का तार्किक हल प्रस्तुत करता है वही धर्म का अतार्किक स्वरूप समाज तथा व्यक्ति दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रूढ़िवादी धर्म ने विज्ञान का विरोध किया है। गैलिलियों ने सिद्ध किया था कि पृथ्वी सूर्य के चारों और घूमती है यह धार्मिक विश्वास के विरूद्ध था उसी कारण गैलिलियों को फांसी पर लटकना पड़ा।

धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी होने के बावजूद एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित है। विज्ञान जीवन में स्वतन्त्र चिन्तन, परिष्कृत विचार उत्पन्न करता है और धर्म जीवन में शुद्धता, प्रेम और त्याग की भावना उत्पन्न करता है। अत: दोनों एक-दूसरे पर निर्भर है इसलिए आंइसटीन ने कहा है कि विज्ञान धर्म के बिना लंगडा है और धर्म विज्ञान के बिना अंधा। धर्म और विज्ञान के बीच द्वन्द्व तब तक उपस्थित होता है जब धर्म प्राकृतिक प्रघटनाओं को व्याख्यायित करने लगता है और ऐसी व्याख्यायें अर्थहीन होती हैं। विज्ञान जोर देता है कि कोई सिद्धांत केवल तभी जीवित रह सकता है जब वह अपनी अनुकूलता और भविष्य सूचक शक्ति की कठिन परीक्षाओं से गुजरे। इस प्रकार जब विज्ञान की परिधि व्यापक हो जाती है तब धर्म और विज्ञान के बीच द्वन्द्व होता है। विज्ञान उन्ही चीजों पर भरोसा करता है जो कार्यकारण संबंधों पर आधारित और अलौकिक है। विज्ञान ने व्यक्ति की सोच को यथार्थपरक बनकर स्वर्ग-नरक के चक्र से मुक्त कर दिया है। पहले लोग नरक के भय से बुरे कर्मों से दूर रहते थे, इससे जहां तक समाज में व्यवस्था बनी रहती है।

इस प्रकार हम देखते है कि विज्ञान ने धर्म से अविभूत परंपरागत स्थिर भारतीय समाज को गतिशील समाज मे परिणत कर दिया है जिससे समाज का संगठित ढांचा विघटित हुआ है। मैक्स वेबर ने विज्ञान और धर्म की पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए आर्थिक व्यवस्था से जुड़े हुए तर्क का प्रयोग किया विज्ञान और टैक्नोलाजी का उन देशों में अधिक विकास नहीं हुआ जहां लोगों की आस्था धर्म पर आधारित थी। विकसित समाजों में धर्म की अपेक्षा विज्ञान का महत्व अधिक है।

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