जैविक खेती के उद्देश्य, सिद्धांत एवं आवश्यकता

कृषि में बायोतकनीकी व जैविक खेती का प्रयोग एक क्रान्तिकारी कदम है। भारत के मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम 2001-02 में जैविक खेती का आन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खण्ड के एक गॉव में जैविक खेती (Organic Farming) की शुरुआत की गई। 


जैविक खेती किसे कहते हैं?

जैविक खेती के उद्देश्य

जैविक खेती के दो उद्देश्य हैं।
  1. प्रणाली को टिकाऊ बनाना
  2. जैविक खेती को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना 
इन दोनों लक्ष्यों तक पहॅुचने के लिए ऐसे मानक तैयार करने की जरुरत है जिनका अनुसरण हो। जैसे कि आप जानते हैं कि भारतीय कृषि में शुद्ध जैविक खेती को अपनाकर रासायनिक उवर्रकों के प्रयोग की सम्भावना विद्यमान है। जैविक खेती को अपनाने के लिए समन्वित (Integrated Nutient Management) पोषण प्रबन्धन और जैविक नियंत्रण विधियों को सशक्त करने की आवश्यक्ता है ताकि रसायनों की जरुरतों में कमी हो सके।

जैविक खेती के सिद्धांत

जैविक खेती की सफलता तीन आधार भूत सिद्धान्तों पर आधारित है:-
  1. अन्तनिर्भरता (Interdependency) - इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है अन्तनिर्भरता, जैविक (ऑर्गेनिक) खेती में एक खेत को पारिस्थिकीयतंत्र (Ecosystem) के रुप में देखा जाता है और यह माना जाता है कि एक खेत पर किया गया परिवर्तन दूसरे खेत में प्रभाव अवश्य डालेगा। उदाहरण के लिए मृदा में अधिक नाइट्रोजन के होने से खरपतवार (Weeds) की वृद्धि तेजी से होगी। इस समस्या को दूर करने के लिए किसान ऐसी फसल को उगाने का प्रयास करेगा जो मृदा से नाइट्रोजन की अधिक मात्रा को अवशोषित कर लेगा और इस प्रकार मृदा में पोषक तत्वों के बीच सन्तुलन बना लेगा।
  2. विविधता (Divorsity) - ऑर्गेनिक खेती का दूसरा सिद्धान्त विविधता का है। जैविक खेती मृदा में पोषक तत्वों में सन्तुलन बनाये रखने के लिए किया जाता है। किसानों का फसलों व पशुधन के मध्य सन्तुलन बनाये रखने के लिए किसानों को खेतों के साथ-साथ पशुधन भी पालने चाहिए। फसलों व पशुधन में विविधता किसानों की आय में भी विविधता व लचीलापन लाती है। दूसरी ओर पारिस्थितिकी तन्त्र में किसी कीट या खरपतवार या बीमारी को समस्या बनने से रोकता है।
  3. पुन: चक्र (Recycling) - जैविक खेती का तीसरा सिद्धान्त पुन: चक्र (Recycling) है, अर्थात् दोबारा से प्रयोग करना। इसमें पौधों व पशुओं के अवशेष पुन: प्रयोग में आ जाने के कारण खेतों के पोषक तत्वों को बनाये रखने में सहायक होते हैं।

जैविक खेती की आवश्यकता

भारत में कृषि उत्पादन, विशेषकर खाद्य पदार्थों का उत्पादन पिछले कई दशकों में तेजी से बढ़ा है। यह उपलब्धि खेतों में उन्नत किस्म के बीज, रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग व कृषि में मशीनीकरण के प्रयोग से हुई है। एक लम्बे समय तक रासायनिक खादों के प्रयोग से मृदा की उत्पादकता कम हो जाती है और दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है। इन समस्याओं ने खेती में वैकल्पिक तरीकों को तलाशने का प्रयास किया है। इस दिशा में आजकल आधुनिक खेती से जैविक खेती पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। जैविक खेती मृदा, खनिज, जल, पौधों, कीटों, पशुओं व मानव जाति के समन्वित संबंधों पर आधारित है। यह मृदा को संरक्षण प्रदान करता है वहीं पर्यावरण को भी सरंक्षण प्रदान करता है। 

जैविक प्रबन्धन आसपास पाये जाने वाले मानव संसाधन, ज्ञान व प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग पर बल देता है। जैविक कृषि खाद्य सुरक्षा में वृद्धि करने व अतिरिक्त आय सृजित करने में भी सहायक है। जैविक खेती सतत कृषि विकास व ग्रामीण विकास के उद्देश्य को पूरा करने में धनात्मक भूमिका निभाता है तथा मृदा की उर्वरता को बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की सामाजिक आर्थिक स्थितियों में भी बदलाव लाता है। जैविक खाद्य पदार्थों की 20-25 प्रतिशत दर से मांग विकसित व विकासशील देशों में लगातार बढ़ती जा रही है। 

सम्पूर्ण विश्व में 130 देश प्रमाणित जैविक पदार्थों का उत्पादन व्यापारिक स्तर पर करते हैं। केवल परम्परागत फसलों को उगाकर ही किसान समृद्ध नहीं हो सकते, बदलती मांग व कीमतों के अनुरुप फसल प्रतिरुप में परिवर्तन भी आवश्यक है। प्राकृतिक विधि व जैविक खाद के उपयोग से उगाए गए खाद्य पदार्थों की मांग यूरोप, अमेरिका, जापान में तेजी से बढ़ रही है। इस बढ़ती मांग के अनुरुप उत्पादन करके किसानों को लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया जाना आवश्यक है।

जैविक खेती के प्रभाव

1. कृषक के दृष्टिकोण से -

  1. मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। फसलों की उत्पादकता बढ़ जाती है और कृषक अधिक आय अर्जित हो पाती है।
  2. रासायनिक उर्वरक में निर्भरता कम होने से लागत कम हो जाती है।
  3. यह कृषकों के खेती करने के पुरातन व देशी ज्ञान को संरक्षित रखता है।
  4. अन्तराष्ट्रीय बाजार में आर्गेनिक पदार्थों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होती है।

2. मृदा के दृष्टिकोण से -

  1. यह मृदा में पोषक तत्वों को पौधों के लिए धीरे-धीरे प्रदान करता है और इस प्रकार इस खाद का प्रभाव कई साल तक बना रहता है।
  2. यह मृदा में नाइट्रोजन, पोटाश फॉसफोरस व कैल्शियम जैसे आवश्यक तत्व बढ़ाता है और इस प्रकार भौतिक गुणों को सुधारने में सहायक होता है।
  3. जैविक खाद के प्रयोग से काफी समय तक मृदा में नमी बनी रहती है।
  4. आर्गेनिक खादों में कुछ नाइट्रोजनयुक्त लाभप्रद पदार्थ पाये जाते हैं जो कि पौधों की वृद्धि शीघ्र करने में सहायक होता है।
  5. यह मृदा संरक्षण व जल संरक्षण में सहायक है।

3. पर्यावरण के दृष्टिकोण से -

  1. कचरे का प्रयोग खाद बनाने में किया जाता है जिससे वातावरण स्वच्छ रहता है और बीमारियॉ कम करने में सहायता मिलती है।
  2. यह स्वास्थ्यवर्धक, पौष्टिक व गुणवत्ता खाद्य पदार्थों के उत्पादन में सहायक है। यह पर्यावरण मित्र होते हैं।
  3. यह जैविक चक्र केा प्रोत्साहित करता है जिसमें सूक्ष्म कीटाणुओं, मृदा पौधों व पशुओं व मानव के बीच अन्तनिर्भरता को बढ़ाता है व पारिस्थिकी तंत्र में सन्तुलन बनाये रखता है।
  4. रासायनिक कृषि से जहॉ हमारे संसाधनों की गुणवत्ता घटती है, वही जैविक कृषि से हमारे संसाधनों का संरक्षण होता है।
  5. कृषि जैव विविधता का सरंक्षण होता है।

जैविक खेती समस्यायें/बाधायें

भारत में कम्पोस्ट की कमीं, जैविक सामग्री में पोषक तत्वों का अंतर, कचरे से संग्रह करने और प्रसंस्करण करने में जटिलता, विभिन्न फसलों के लागत लाभ अनुपात के साथ जैविक कृषि के व्यवहारों को शामिल करने में पैकेज का अभाव और वित्तीय सहायता के बिना किसानों द्वारा इसे अपनाने में कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त जैविक खेती की प्रगति में कई बाधाएं हैं :-

1. जागरुकता की कमी - किसानों के पास कम्पोस्ट तैयार करने के लिए आधुनिक तकनीकों के प्रयोग की जानकारी का भी अभाव है। किसान अधिकांशत: यह करते है कि गड्ढा खोदकर उसे कचरे को कम मात्रा में भर देते हैं। अक्सर गड्ढा वर्षा के जल से भर जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि कचरे का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह कम्पोस्ट नहीं बन पाता ओश्र नीचे का हिस्सा कड़ी खली की तरह बन जाता है। जैविक कम्पोस्ट तैयार करने के बारे में किसानों को समुचित प्रशिक्षण देने की जरुरत है।

2. विपणन की समस्या - ऐसा पाया जाता है कि जैविक फसलों की खेती शुरु करने के पहले उनका विपणन योग्य होना और पारंपरिक उत्पादों की तुलना में लाभ सुनिश्चित करना। ऐसा प्रमाण मिला है कि राजस्थान में जैविक गेहॅू के किसानों को गेहॅू के पारम्परिक किसानों की तुलना में कम कीमतें मिली। दोनों प्रकार के उत्पादों के विपणन की लागत भी सामान थी और गेहॅू के खरीददार जैविक किस्म के लिए अधिक कीमत देने को तैयार नहीं थे।

3. अधिक लागत होना - भारत के छोटे और सीमान्त किसान पारम्परिक कृषि प्रणाली के रुप में एक प्रकार की जैविक खेती करते रहे हैं। वे खेतों को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय अथवा अपने संसाधनों को इस प्रकार प्रयोग करते हैं कि परिस्थितिकी के अनुकूल वातावरण कायम रहे। जैविक खादों की लागत रासायनिक उर्वरकों से अधिक है। मूंगफली की खली, नीम के बीज और उसकी खली जैविक कम्पोस्ट, खाद, गोबर और अन्य खादों का प्रयोग जैविक खादों के रुप में होता रहा है। इनकी कीमतों में वृद्धि होने से ये छोटे किसानों की पहॅुच से बाहर होते जा रहे हैं।

4. वित्तीय सहायता का अभाव - जैविक उत्पादों के विपणन के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों की ओर से किसी प्रकार की सहायता नहीं दी जाती। यहां तक कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वित्तीय प्रक्रिया का भी सर्वथा अभाव है।

5. निर्यात की मांग पूरा करने में अक्षमता - अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे उन्नतशील देशों में जैविक उत्पादों की बहुत मांग है। अमरीकी उपभोक्ता जैविक उत्पादों के लिए 60 से 100 प्रतिशत का लाभकारी मूल्य के भुगतान के लिए तैयार है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केन्द्र (आई. टी. सी.) द्वारा वर्ष 2000 में कराए बए बाजार सर्वेक्षण से यह संकेत मिला है कि विश्व बाजारों के कई हिस्सों में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ी है, जबकि उसकी आपूर्ति नहीं की जा सकती। भारत में जैविक पदार्थों के निर्यात को प्रोत्साहन का अभाव पाया जाता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post