संस्कृति का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

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संस्कृति शब्द का प्रयोग हम दिन-प्रतिदिन के जीवन में (अक्सर) निरन्तर करते रहते हैं। साथ ही संस्कृति शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में भी करते हैं। उदाहरण के तौर पर हमारी संस्कृति में यह नहीं होता तथा पश्चिमी संस्कृति में इसकी स्वीकृति है। समाजशास्त्र विज्ञान के रूप में किसी भी अवधारणा का स्पष्ट अर्थ होता है जो कि वैज्ञानिक बोध को दर्शाता है। अत: “संस्कृति” का अर्थ समाजशास्त्रीय अवधारणा के रूप में “सीखा हुआ व्यवहार” होता है। अर्थात् कोई भी व्यक्ति बचपन से अब तक जो कुछ भी सीखता है, उदाहरण के तौरे पर खाने का तरीका, बात करने का तरीका, भाषा का ज्ञान, लिखना-पढना तथा अन्य योग्यताएँ, यह संस्कृति है।
मनुष्य का कौन सा व्यवहार संस्कृति है?

मनुष्य के व्यवहार के कई पक्ष हैं-
  1. जैविक व्यवहार (Biological behaviour) जैसे- भूख, नींद, चलना, दौड़ना।
  2. मनोवैज्ञानिक व्यवहार (Psychological behaviour) जैसे- सोचना, डरना, हँसना आदि।
  3. सामाजिक व्यवहार (Social behaviour) जैसे- नमस्कार करना, पढ़ना-लिखना, बातें करना आदि।
क्या आप जानते हैं कि मानव संस्कृति का निर्माण कैसे कर पाया ?

लेस्ली ए व्हाईट (Leslie A White) ने मानव में पाँच विशिष्ट क्षमताओं का उल्लेख किया हैं, जिसे मनुष्य ने प्रकृति से पाया है और जिसके फलस्वरुप वह संस्कृति का निर्माण कर सका है :-
  1. पहली विशेषता है- मानव के खड़े रहने की क्षमता, इससे व्यक्ति दोनों हाथों द्वारा उपयोगी कार्य करता है।
  2. दूसरा-मनुष्य के हाथों की बनावट है, जिसके फलस्वरुप वह अपने हाथों का स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी दिशा में घुमा पाता है और उसके द्वारा तरह-तरह की वस्तुओं का निर्माण करता है।
  3. तीसरा-मानव की तीक्ष्ण दृष्टि, जिसके कारण वह प्रकृति तथा घटनाओं का निरीक्षण एवं अवलोकन कर पाता है और तरह-तरह की खोज एवं अविष्कार करता है।
  4. चौथा-विकसित मस्तिष्क, जिसकी सहायता से मनुष्य अन्य प्राणियों से अधिक अच्छी तरह सोच सकता है। इस मस्तिष्क के कारण ही वह तर्क प्रस्तुत करता है तथा कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित कर पाता है।
  5. पाँचवाँ-प्रतीकों के निर्माण की क्षमता। इन प्रतीकों के माध्यम से व्यक्ति अपने ज्ञान व अनुभवों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित कर पाता है। प्रतीकों के द्वारा ही भाषा का विकास सम्भव हुआ और लोग अपने ज्ञान तथा विचारों के आदान-प्रदान में समर्थ हो पाये हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्रतीकों का संस्कृति के निर्माण, विकास, परिवर्तन तथा विस्तार में बहुत बड़ा योगदान है।

संस्कृति का अर्थ एवं परिभाषा

प्रसिद्ध मानवशास्त्री एडवर्ड बनार्ट टायलर (1832-1917) के द्वारा सन् 1871 में प्रकाशित पुस्तक Primitive Culture में संस्कृति के संबंध में सर्वप्रथम उल्लेख किया गया है। टायलर मुख्य रूप से संस्कृति की अपनी परिभाषा के लिए जाने जाते हैं, इनके अनुसार, “संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला आचार, कानून, प्रथा और अन्य सभी क्षमताओं तथा आदतो का समावेश होता है जिन्हें मनुष्य समाज के नाते प्राप्त कराता है।” टायलर ने संस्कृति का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। इनके अनुसार सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति अपने पास जो कुछ भी रखता है तथा सीखता है वह सब संस्कृति है। इस परिभाषा में सिर्फ अभौतिक तत्वों को ही सम्मिलित किया गया है।

राबर्ट बीरस्टीड (The Social Order) द्वारा संस्कृति की दी गयी परिभाषा है कि “संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है, जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं, जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”

इस परिभाषा में संस्कृति दोनों पक्षों भौतिक एवं अभौतिक को सम्मिलित किया गया है। हर्शकोविट्स(Man and His Work) के शब्दों में “संस्कृति पर्यावरण का मानव निर्मित भाग है”

इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण के दो भाग होते हैं- पहला-प्राकृतिक और दूसरा-सामाजिक। सामाजिक पर्यावरण में सारी भौतिक और अभौतिक चीजें आती हैं, जिनका निर्माण मानव के द्वारा हुआ है। उदाहरण के जिए कुर्सी, टेबल, कलम, रजिस्टर, धर्म, शिक्षा, ज्ञान, नैतिकता आदि। हर्शकोविट्स ने इसी सामाजिक पर्यावरण, जो मानव द्वारा निर्मित है, को संस्कृति कहा है।

बोगार्डस के अनुसार, “किसी समूह के कार्य करने और विचार करने के सभी तरीकों का नाम संस्कृति है।”

इस पर आप ध्यान दें कि, बोगार्डस ने भी बीयरस्टीड की तरह ही अपनी भौतिक एवं अभौतिक दोनों पक्षों पर बल दिया है।

मैलिनोस्की-”संस्कृति मनुष्य की कृति है तथा एक साधन है, जिसके द्वारा वह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करता है।” आपका कहना है कि “संस्कृति जीवन व्यतीत करने की एक संपूर्ण विधि है जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।”

संस्कृति के प्रकार

ऑगर्बन एवं निमकॉफ ने संस्कृति के दो प्रकारों की चर्चा की है- भौतिक संस्कृति एवं अभौतिक संस्कृति।

भौतिक संस्कृति - 

भौतिक संस्कृति के अन्र्तगत उन सभी भौतिक एवं मूर्त वस्तुओं का समावेश होता है जिनका निर्माण मनुष्य के लिए किया है, तथा जिन्हें हम देख एवं छू सकते हैं। भौतिक संस्कृति की संख्या आदिम समाज की तुलना में आधुनिक समाज में अधिक होती है, प्रो.बीयरस्टीड ने भौतिक संस्कृति के समस्त तत्वों को मुख्य 13 वर्गों में विभाजित करके इसे और स्पष्ट करने का प्रयास किया है- i.मशीनें ii.उपकरण iii.बर्तन iv.इमारतें v.सड़कें vi. पुल vii.शिल्प वस्तुऐं viii.कलात्मक वस्तुऐं ix.वस्त्र x.वाहन xi.फर्नीचर xii.खाद्य पदार्थ xiii.औशधियां आदि।

भौतिक संस्कृति की विशेषताएँ

  1. भौतिक संस्कृति मूर्त होती है।
  2. इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है।
  3. भौतिक संस्कृति मापी जा सकती है।
  4. भौतिक संस्कृति में परिवर्तन शीघ्र होता है।
  5. इसकी उपयोगिता एवं लाभ का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  6. भौतिक संस्कृति में बिना परिवर्तन किये इसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है। 
अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने तथा उसे अपनाने में उसके स्वरूप में कोई फर्क नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए मोटर गाड़ी, पोशाक तथा कपड़ा इत्यादि।

अभौतिक संस्कृति - 

अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत उन सभी अभौतिक एवं अमूर्त वस्तुओं का समावेश होता है, जिनके कोई माप-तौल, आकार एवं रंग आदि नहीं होते। अभौतिक संस्कृति समाजीकरण एवं सीखने की प्रक्रिया द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित होती रहती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अभौतिक संस्कृति का तात्पर्य संस्कृति के उस पक्ष में होता है, जिसका कोई मूर्त रूप नहीं होता, बल्कि विचारों एवं विश्वासों कि माध्यम से मानव व्यवहार को नियन्त्रित, नियमित एवं प्रभावी करता है। प्रोñ बीयरस्टीड ने अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत विचारों और आदर्श नियमों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया और कहा कि विचार अभौतिक संस्कृति के प्रमुख अंग है। विचारों की कोई निश्चित संख्या हो सकती है, फिर भी प्रोñ बीयरस्टीड ने विचारों के कुछ समूह प्रस्तुत किये हैं-
i.वैज्ञानिक सत्य ii-धार्मिक विश्वास iii.पौराणिक कथाएँ iv.उपाख्यान v.साहित्य vi.अन्ध-विश्वास vii.सूत्र viii.लोकोक्तियाँ आदि।

ये सभी विचार अभौतिक संस्कृति के अंग होते हैं। आदर्श नियमों का सम्बन्ध विचार करने से नहीं, बल्कि व्यवहार करने के तौर-तरीकों से होता है। अर्थात् व्यवहार के उन नियमों या तरीकों को जिन्हें संस्कृति अपना आदर्श मानती है, आदर्श नियम कहा जाता है। प्रो. बीयरस्टीड ने सभी आदर्श नियमों को 14 भागों में बाँटा है-
1.कानून 2.अधिनियम 3.नियम 4.नियमन 5.प्रथाएँ 6.जनरीतियाँ 7. लोकाचार 8.निशेध 9.फैशन 10. संस्कार 11.कर्म-काण्ड 12.अनुश्ठान 13.परिपाटी 14.सदाचार।

अभौतिक संस्कृति की विशेषताएँ

  1. अभौतिक संस्कृति अमूर्त होती है।
  2. इसकी माप करना कठिन है।
  3. अभौतिक संस्कृति जटिल होती है।
  4. इसकी उपयोगिता एवं लाभ का मूल्यांकन करना कठिन कार्य है।
  5. अभौतिक संस्कृति में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से होता है।
  6. अभौतिक संस्कृति को जब एक स्थान से दूसरे स्थान में ग्रहण किया जाता है, तब उसके रूप में थोड़ा-न-थोड़ा परिवर्तन अवश्य होता है।
  7. अभौतिक संस्कृति मनुष्य के आध्यात्मिक एवं आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित होती है।

संस्कृति की प्रकृति या विशेषताएँ 

संस्कृति के सम्बन्ध में विभिन्न समाजशास्त्रियों के विचारों को जानने के बाद उसकी कुछ विशेषताएँ स्पष्ट होती है, जो उसकी प्रकृति को जानने और समझने में भी सहायक होती है। यहाँ कुछ प्रमुख विशेषताओं का विवेचन किया जा रहा है-
  1. संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है - संस्कृति एक सीखा हुआ व्यवहार है। इसे व्यक्ति अपने पूर्वजों के वंशानुक्रम के माध्यम से नहीं प्राप्त करता, बल्कि समाज में समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा सीखता है। यह सीखना जीवन पर्यन्त अर्थात् जन्म से मृत्यु तक अनवरत चलता रहता है। आपको जानना आवश्यक है कि संस्कृति सीख हुआ व्यवहार है, किन्तु सभी सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति नहीं कहा जा सकता है। पशुओं द्वारा सीखे गये व्यवहार को संस्कृति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पशु जो कुछ भी सीखते हैं उसे किसी अन्य पशु को नहीं सीखा सकते। संस्कृति के अंतर्गत वे आदतें और व्यवहार के तरीके आते है, जिन्हें सामान्य रूप से समाज के सभी सदस्यों द्वारा सीखा जाता है। इस सन्दर्भ में लुन्डबर्ग (Lundbarg) ने कहा है कि,”संस्कृति व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्तियों अथवा प्राणीशास्त्रीय विरासत से सम्बन्धित नहीं होती, वरन् यह सामाजिक सीख एवं अनुभवों पर आधरित रहती है।”
  2. संस्कृति सामाजिक होती है -  संस्कृति में सामाजिकता का गुण पाया जाता है। संस्कृति के अन्तर्गत पूरे समाज एवं सामाजिक सम्बन्धों का प्रतिनिधित्व होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि किसी एक या दो-चार व्यक्तियों द्वारा सीखे गये व्यवहार को संस्कृति नहीं कहा जा सकता। कोई भी व्यवहार जब तक समाज के अधिकतर व्यक्तियों द्वारा नहीं सीखा जाता है तब तक वह संस्कृति नहीं कहलाया जा सकता। संस्कृति एक समाज की संपूर्ण जीवन विधि (Way of Life) का प्रतिनिधित्व करती है। यही कारण है कि समाज का प्रत्येक सदस्य संस्कृति को अपनाता है। संस्कृति सामाजिक इस अर्थ में भी है कि यह किसी व्यक्ति विशेष या दो या चार व्यक्तियों की सम्पत्ति नहीं है। यह समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए होता है। अत: इसका विस्तार व्यापक और सामाजिक होता है।
  3. संस्कृति हस्तान्तरित होती है - संस्कृति के इसी गुण के कारण ही संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती है तो उसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी के अनुभव एवं सूझ जुड़ते जाते हैं। इससे संस्कृति में थोड़ा-बहुत परिवर्तन एवं परिमार्जन होता रहता है। संस्कृति के इसी गुण के कारण मानव अपने पिछले ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर आगे नई-नई चीजों का अविष्कार करता है। आपको यह समझना होगा कि- पशुओं में भी कुछ-कुछ सीखने की क्षमता होती है। लेकिन वे अपने सीखे हुए को अपने बच्चों और दूसरे पशुओं को नहीं सिखा पाते। यही कारण है कि बहुत-कुछ सीखने की क्षमता रहने के बाद भी उनमें संस्कृति का विकास नहीं हुआ है। मानव भाषा एवं प्रतीकों के माध्यम से बहुत ही आसानी से अपनी संस्कृति का विकास एवं विस्तार करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में हस्तान्तरित भी करता है। इससे संस्कृति की निरन्तरता भी बनी रहती है।
  4. संस्कृति मनुष्य द्वारा निर्मित है - संस्कृति का तात्पर्य उन सभी तत्वों से होता है, जिनका निर्माण स्वंय मनुष्य ने किया है। उदाहरण के तौर पर हमारा धर्म, विश्वास, ज्ञान, आचार, व्यवहार के तरीके एवं तरह-तरह के आवश्यकताओं के साधन अर्थात् कुर्सी, टेबल आदि का निर्माण मनुष्य द्वारा किया गया है। इस तरह यह सभी संस्कृति हर्शकाविट्स का कहना है कि “संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित भाग है।”
  5. संस्कृति मानव आवश्यकताओं की पूर्ति करती है - संस्कृति में मानव आवश्यकता-पूर्ति करने का गुण होता है। संस्कृति की छोटी-से-छोटी इकाई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति करती है या पूर्ति करने में मदद करती है। कभी-कभी संस्कृति की कोई इकाई बाहरी तौर पर निरर्थक या अप्रकार्य प्रतीत होती है, लेकिन सम्पूर्ण ढाँचे से उसका महत्वपूर्ण स्थान होता है। मैलिनोस्की के विचार - प्रसिद्ध मानवशास्त्री मैलिनोस्की का कथन है कि संस्कृति के छोटे-से-छोटे तत्व का अस्तित्व उसके आवश्यकता पूर्ति करने के गुण पर निर्भर करता है। जब संस्कृति के किसी भी तत्व में आवश्यकतापूर्ति करने का गुण नहीं रह जाता तो उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। उदाहरण के तौर पर प्राचीनकाल में जो संस्कृति के तत्व थे वे समाप्त हो गए क्योंकि वे आवश्यकता पूति में असमर्थं रहे, इसमें सतीप्रथा को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। इसी प्रकार, व्यवस्था में कोई इकाई कभी-कभी बहुत छोटी प्रतीत होती है मगर व्यवस्था के लिए वह इकाई भी काफी महत्वपूर्ण होती है। इस प्रकार, संस्कृति का कोई भी तत्व अप्रकार्यात्मक नहीं होता है बल्कि किसी भी रूप में मानव की आवश्यकता की पूर्ति करती है।
  6. प्रत्येक समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है - प्रत्येक समाज की एक विशिष्ट संस्कृति होती है। हम जानते हैं कि कोई भी समाज एक विशिष्ट भौगोलिक एवं प्राकृतिक वातावरण लिये होता है। इसी के अनुरूप सामाजिक वातावरण एवं संस्कृति का निर्माण होता है। उदाहरण के तौर पर पहाड़ों पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का भौगोलिक पर्यावरण, मैदानी लोगों के भौगोलिक पर्यावरण से अलग होता है। इसी प्रकार, इन दोनों स्थानों में रहने वाले लोगों की आवश्यकताएं अलग-अलग होती है। जैसे-खाना, रहने-सहने का तरीका, नृत्य, गायन, धर्म आदि। अत: दोनों की संस्कृति भौगोलिक पर्यावरण के सापेक्ष में आवश्यकता के अनुरूप विकसित होती है।
  7. संस्कृति में अनुकूलन का गुण होता है - संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है कि यह समय के साथ-साथ आवश्यकताओं के अनुरूप् अनुकूलित हो जाती है। संस्कृति समाज के वातावरण एवं परिस्थिति के अनुसार होती है। जब वातावरण एवं परिस्थिति में परिवर्तन होता है तो संस्कृति भी उसके अनुसार अपने का ढ़ालती है। यदि यह विशेषता एवं गुण न रहे तो संस्कृति का अस्तित्व ही नहीं रह जायेगा। संस्कृति में समय एवं परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन होने से उसकी उपयोगिता समाप्त नहीं हो पाती।
  8. संस्कृति अधि-सावयवी है - मानव ने अपनी मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के प्रयोग द्वारा संस्कृति का निर्माण किया, जो सावयव से ऊपर है। संस्कृति में रहकर व्यक्ति का विकास होता है और फिर मानव संस्कृति का निर्माण करता है जो मानव से ऊपर हो जाता है। मानव की समस्त क्षमताओं का आधार सावयवी होता है, किन्तु इस संस्कृति को अधि-सावयवी से ऊपर हो जाती है। इसी अर्थ में संस्कृति को अधि-सावयवी कहा गया है।
  9. संस्कृति अधि-वैयक्तिक है - संस्कृति की रचना और निरन्तरता दोनों ही किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं है। इसलिए यह अधि-वैयक्तिक(Super-individual) है। संस्कृति का निर्माण किसी व्यक्ति-विशेष द्वारा नहीं किया गया है बल्कि संस्कृति का निर्माण सम्पूर्ण समूह द्वारा होता है। प्रत्येक सांस्कृतिक इकाई का अपना एक इतिहास होता है, जो किसी एक व्यक्ति से परे होता है। संस्कृति सामाजिक अविष्कार का फल है, किन्तु यह अविष्कार किसी एक व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज नहीं है।
  10. संस्कृति में संतुलन तथा संगठन होता है - संस्कृति के अन्तर्गत अनेक तत्व एवं खण्ड होते हैं किन्तु ये आपस में पृथक नहीं होते, बल्कि इनमें अन्त: सम्बन्ध तथा अन्त: निर्भरता पायी जाती है। संस्कृति की प्रत्येक इकाई एक-दूसरे से अनग हटकर कार्य नहीं करती, बल्कि सब सम्मिलित रूप से कार्य करती है। इस प्रकार के संतुलन एवं संगठन से सांस्कृतिक ढ़ाँचे का निर्माण होता है।
  11. संस्कृति समूह का आदर्श होती है - प्रत्येक समूह की संस्कृति उस समूह के लिए आदर्श होती है। इस तरह की धारण सभी समाज में पायी जाती है। सभी लोग अपनी ही संस्कृति को आदर्श समझते हैं तथा अन्य संस्कृति की तुलना में अपनी संस्कृति को उच्च मानते हैं। संस्कृति इसलिए भी आदर्श होती है कि इसका व्यवहार-प्रतिमान किसी व्यक्ति-विशेष का न होकर सारे समूह का व्यवहार होता है।

संस्कृति के प्रकार्य

  1. व्यक्ति के लिए
  2. समूह के लिए

व्यक्ति के लिए-

  1. संस्कृति मनुष्य को मानव बनाती है।
  2. जटिल स्थितियों का समाधान।
  3. मानव आवश्यकताओं की पूर्ति
  4. व्यक्तित्व निर्माण
  5. मानव को मूल्य एवं आदर्श प्रदान करती है।
  6. मानव की आदतों का निर्धारण करती है।
  7. नैतिकता का निर्धारण करती है।
  8. व्यवहारों में एकरूपता लाती है।
  9. अनुभव एवं कार्यकुशलता बढ़ाती है।
  10. व्यक्ति की सुरक्षा प्रदान करती है।
  11. समस्याओं का समाधान करती है।
  12. समाजीकरण में योग देती है।
  13. प्रस्थिति एवं भूमिका का निर्धारण करती है।
  14. सामाजिक नियन्त्रण में सहायक।

समूह के लिए-

  1. सामाजिक सम्बन्धों को स्थिर रखती है।
  2. व्यक्ति के दृश्टिकोण को विस्तृत करती है।
  3. नई आवश्यकताओं को उत्पन्न करती है।

सभ्यता और संस्कृति में अन्तर

सभ्यता और संस्कृति शब्द का प्रयोग एक ही अर्थ में प्राय: लोग करते हैं, किन्तु सभ्यता और संस्कृति में अन्तर है। सभ्यता साधन है जबकि संस्कृति साध्य। सभ्यता और संस्कृति में कुछ सामान्य बातें भी पाई जाती हैं। सभ्यता और संस्कृति में सम्बन्ध पाया जाता है। मैकाइवर एवं पेज ने सभ्यता और संस्कृति में अन्तर किया है। इनके द्वारा दिये गये अन्तर इस प्रकार हैं-
  1. सभ्यता की माप सम्भव है, लेकिन संस्कृति की नहीं- सभ्यता को मापा जा सकता है। चूँकि इसका सम्बन्ध भौतिक वस्तुओं की उपयोगिता से होता है। इसलिए उपयोगिता के आधार पर इसे अच्छा-बुरा, ऊँचा-नीचा, उपयोगी-अनुपयोगी बताया जा सकता है। संस्कृति के साथ ऐसी बात नहीं है। संस्कृति की माप सम्भव नहीं है। इसे तुलनात्मक रूप से अच्छा-बुरा, ऊँचा-नीचा, उपयोगी-अनुपयोगी नहीं बताया जा सकता है। हर समूह के लोग अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताते हैं। हर संस्कृति समाज के काल एवं परिस्थितियों की उपज होती है। इसलिए इसके मूल्यांकन का प्रश्न नहीं उठता। उदाहरण स्वरूप हम नई प्रविधियों को देखें। आज जो वर्तमान है और वह पुरानी चीजों से उत्तम है तथा आने वाले समय में उससे भी उन्नत प्रविधि हमारे सामने मौजूद होगी। इस प्रकार की तुलना हम संस्कृति के साथ नहीं कर सकते। दो स्थानों और दो युगों की संस्कृति को एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
  2. सभ्यता सदैव आगे बढ़ती है, लेकिन संस्कृति नहीं- सभ्यता में निरन्तर प्रगति होती रहती है। यह कभी भी पीछे की ओर नहीं जाती। मैकाइवर ने बताया कि सभ्यता सिर्फ आगे की ओर नहीं बढ़ती बल्कि इसकी प्रगति एक ही दिशा में होती है। आज हर समय नयी-नयी खोज एवं आविष्कार होते रहते हैं जिसके कारण हमें पुरानी चीजों की तुलना में उन्नत चीजें उपलब्ध होती रहती हैं। फलस्वरूप सभ्यता में प्रगति होती रहती है।
  3. सभ्यता बिना प्रयास के आगे बढ़ती है, संस्कृति नहीं- सभ्यता के विकास एवं प्रगति के लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती, यह बहुत ही सरलता एवं सजगता से आगे बढ़ती जाती है। जब किसी भी नई वस्तु का आविष्कार होता है तब उस वस्तु का प्रयोग सभी लोग करते हैं। यह जरूरी नहीं है कि हम उसके सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखें या उसके आविष्कार में पूरा योगदान दें। अर्थात् इसके बिना भी इनका उपभोग किया जा सकता है। भौतिक वस्तुओं का उपयोग बिना मनोवृत्ति, रूचियों और विचारों में परिवर्तन के किया जाता है, किन्तु संस्कृति के साथ ऐसी बात नहीं है। संस्कृति के प्रसार के लिए मानसिकता में भी परिवर्तन की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसके लिए उसे मानसिक रूप से तैयार होना पड़ता है, लेकिन किसी वस्तु के उपयोग के लिए विशेष सोचने की आवश्यकता नहीं होती।
  4. सभ्यता बिना किसी परिवर्तन या हानि के ग्रहण की जा सकती है, किन्तु संस्कृति को नहीं- सभ्यता के तत्वों या वस्तुओं को ज्यों-का-त्यों अपनाया जा सकता है। उसमें किसी तरह की परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस एक वस्तु का जब आविष्कार होता है, तो उसे विभिन्न स्थानों के लोग ग्रहण करते हैं। भौतिक वस्तु में बिना किसी परिवर्तन लाये ही एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, तब ट्रैक्टर का आविष्कार हुआ तो हर गाँव में उसे ले जाया गया। इसके लिए उसमें किसी तरह के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ी। किन्तु संस्कृति के साथ ऐसी बात नहीं है। संस्कृति के तत्वों को जब एक स्थान से दूसरे स्थान में ग्रहण किया जाता है तो उसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन हो जाता है। उसके कुछ गुण गौण हो जाते हैं, तो कुछ गुण जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि धर्म परिवर्तन करने के बाद भी लोग उपने पुराने विश्वासों, विचारों एवं मनोवृत्तियों में बिल्कुल परिवर्तन नहीं ला पाते। पहले वाले धर्म का कुछ-न-कुछ प्रभाव रह जाता है।
  5. सभ्यता बाध्य है, जबकि संस्कृति आन्तरिक- सभ्यता के अन्तर्गत भौतिक वस्तुऐं आती हैं। भौतिक वस्तुओं का सम्बन्ध बाºय जीवन से, बाहरी सुख-सुविधाओं से होता है। उदाहरण के लिए, बिजली-पंखा, टेलीविजन, मोटरगाड़ी, इत्यादि। इन सारी चीजों से लोगों को बाहरी सुख-सुविधा प्राप्त होती है। किन्तु संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति के आन्तरिक जीवन से होता है। जैसे -ज्ञान, विश्वास, धर्म, कला इत्यादि। इन सारी चीजों से व्यकित को मानसिक रूप से सन्तुष्टि प्राप्त होती है, इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सभ्यता बाºय है, लेकिन संस्कृति आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित होती है।
  6. सभ्यता मूर्त होती है, जबकि संस्कृति अमूर्त- सभ्यता का सम्बन्ध भौतिक चीजों से होता है। भौतिक वस्तुऐं मूर्त होती हैं। इन्हें देखा व स्पर्श किया जा सकता है। इससे प्राय: सभी व्यक्ति समान रूप से लाभ उठा सकते हैं, किन्तु संस्कृति का सम्बन्ध भौतिक वस्तुओं से न होकर अभौतिक चीजों से होता है। इन्हें अनुभव किया जा सकता है, किन्तु इन्हें देखा एवं स्पर्श नहीं किया जा सकता। इस अर्थ में संस्कृति अमूर्त होती है।
  7. सभ्यता साधन है जबकि संस्कृति साध्य-सभ्यता एक साधन है जिसके द्वारा हम अपने लक्ष्यों व उद्देश्यों तक पहुँचते हैं। संस्कृति अपने आप में एक साध्य है। धर्म, कला, साहित्य, नैतिकता इत्यादि संस्कृति के तत्व हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए भौतिक वस्तुऐं जैसे-धार्मिक पुस्तकें, चित्रकला, संगीत, नृत्य-बाद्य इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार सभ्यता साधन है और संस्कृति साध्य।

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