भ्रष्टाचार का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं अनिवार्य तत्व

भ्रष्टाचार शब्द का क्या अर्थ लगाते हैं या उसके किस रूप पर विचार करते हैं? सामान्य: भ्रष्टाचार का अर्थ भ्रष्ट आचरण से लिया जाता है। भ्रष्टाचार के निम्नलिखित अर्थ समझे जाते हैं- जिसका आचार एवं विचार बिगड़ गया हो। या वह स्थिति, जिसमे अधिकारी तथा कर्मचारी विहित कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक, भली-भाँति और समय पर नहीं करते, बल्कि मनमाने ढंग से, विलम्ब से तथा अनुचित रूप से करते हैं। इत्यादि रूप भ्रष्टाचार की श्रेणी में आते हैं। 

परन्तु उपर्युक्त भ्रष्ट आचरण के प्रकार को एक तकनीकी शब्द बनाना आवश्यक है और वह तकनीकी शब्द ‘सत्ता का दुरूपयोग’ कहा जा सकता है यह सत्ता किसी भी प्रकार की हो सकती है : सरकार की, संगठन की या धन की। नैतिक या आध्यात्मिक सत्ता का दुरूपयोग भी सम्भव है। ज्यादातर प्रलोभन आर्थिक एवं भौतिक ही होते हैं। कोर्इ अधिकारी व्यभिचारी है तो उसे भ्रष्ट नहीं माना जाना चाहिए वह नैतिक रूप से एक कमजोर आदमी हो सकता है। लेकिन हो सकता है वह अपने सरकारी काम-काज में बहुत चुस्त हो और बेर्इमानी का पैसा नहीं स्वीकार करता है। लेकिन वह अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कुछ प्रलोभन देकर किसी औरत को फँसाता है, तो यह जरूर भ्रष्टाचार माना जायेगा। 

इस प्रकार वह मंत्री, अफसर, कर्मचारी भ्रष्ट है जो अपनी सरकारी स्थिति या सत्ता का अनुचित लाभ उठाता है। इसी का विस्तार रूप भार्इ-भतीजावाद या पक्षपात है। इस प्रकार भ्रष्टाचार ऐसे भ्रष्ट व्यवहार को ही कहा जा सकता है जहां पर सत्ता है या शक्ति है। जिसका उपयोगकर्ता अपने पद के अधिकारों का उपयोग जनहित में न करके स्व-हित में करें, उसका यह आचरण भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

परन्तु यहाँ ध्यातव्य है कि भारतीय जनसामान्य की धारणा में केवल कानून के विपरीत कार्य करना ही भ्रष्ट व्यवहार नहीं माना जाता बल्कि समाज की रीति-रिवाज परम्पराओं के विपरीत किये जाने वाले आचरण को भी भ्रष्टाचार माना जाता है। जैसे- कानूनन अन्तरजातीय विवाह होने पर कोर्इ आपत्ति नहीं है परन्तु समाज इसकी मान्यता नहीं देता और ऐसे क्रिया-कलापों को करने वालो को भ्रष्ट तथा कराने वाले को समाज भ्रष्टाचारी की उपाधि प्रदान करता है। इसी प्रकार देश काल के अनुसार भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण के अर्थ परिवर्तित हो जाते है। 

उदाहरण के लिए वर्ण व्यवस्था के भीतर वर्णाश्रम धर्म की मान्यताओं के बाहर जा कर आचरण करना, वर्ण की मर्यादाओं को तोड़ना भ्रष्टाचार माना जाता था। इसी प्रकार विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में उनके कर्म-काण्डों का अतिक्रमण भ्रष्ट आचरण माना जाता है। इसके अलावा सभी समाजों में यौन सम्बन्धों के कुछ नियम होते हैं, जिन्हें तोड़ना भ्रष्ट आचरण माना जाता है और ऐसा करने वाले को दुश्चरित्र माना जाता है। लेकिन विभिन्न समाजों में यौन सम्बन्धी नियमों में इतनी विभिन्नताएँ है कि जो सम्बन्ध एक समाज के लिए स्वाभाविक माना जाता है। वही दूसरे में घोर भ्रष्टाचार। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि भ्रष्टाचार की अवधारणा परिवेश-सापेक्ष होती है और हम अपने आज के परिवेश में भ्रष्ट आचार की प्रचलित मान्यताओं के आधार पर ही इस समस्या पर विचार कर सकते हैं। इस प्रकार यदि भ्रष्टाचार के इस अवधारणा यानी परिवेश-सापेक्ष को ध्यान में रखा जाय तो आधुनिक समाज के संस्थागत नियमों, विशेषकर नियुक्तियों और आर्थिक लाभ से सम्बद्ध नियमों के इर्द-गिर्द केन्द्रित होती है।

आज आधुनिक राजकीय, वित्तीय या औद्योगिक संस्थाओं में ऊँचे पदों पर नियुक्तियॉ मनुष्य के सामाजिक स्तर और आर्थिक सुविधाओं को गहरे रूप से प्रभावित करती है इसलिए अर्थ को केन्द्र मे रख कर चलने वाले हमारे समाज में इन नियमों का पालन काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण है इन नियुक्तियों में योग्य व्यक्तियों के चयन का संस्थाओं की क्षमता से गहरा सम्बन्ध होना। इसलिए इन नियुक्तियों को यथा संभव कुल, परिवार या भावनाओं पर आधारित अन्य सामाजिक सम्बन्धों के प्रभाव से मुक्त रखने के नियम बनाये जाते हैं। ताकि संस्था की बेहतरी के लिए अधिक से अधिक योग्य व्यक्ति का चयन विभिन्न पदों पर किया जा सके। इसलिए इन नियमों का उल्लंघन संस्थागत भ्रष्टाचार माना जाता है।

समाज विज्ञानियों के अनुसार भ्रष्टाचार की उत्पत्ति ‘उपहार’ की परम्परा में है। उपहार का तात्पर्य स्वेच्छा से किसी को कुछ देने से लिया जाता है। परन्तु उपहार देने वाली इच्छा सर्वोपरि होती है यानी दाता का विचार महत्वपूर्ण होता है। जबकि स्वीकार करने वाले की कोर्इ इच्छा नहीं होती है। परन्तु जब उपहार लेने वाले की इच्छा के अनुसार दाता को उपहार देने की बाध्यता उपस्थित हो तो इसे उपहार नहीं बल्कि भ्रष्टाचार या घूस कहा जाता है। क्योंकि इस प्रकार के उपहार में उपहार देने वाला व्यक्ति स्वेच्छा से उपहार नहीं देता, बल्कि मजबूरी में अपना कार्य निकालने के लिए, उपहार लेने वाले की इच्छा के अनुसार उपहार देना पड़ता है। धीरे-धीरे उपहार सत्ता से जुड़ कर रिश्वत व भ्रष्टाचार का रूप ले लेता है।

भ्रष्टाचार का अर्थ

bhrashtachar ka arth भ्रष्टाचार “भ्रष्ट और आचरण” दो पदों के योग से बना है। भ्रष्टाचार शब्द का अर्थ है - निकृष्ट आचरण अथवा बिगड़ा हुआ आचरण। भ्रष्टाचार सदाचार का विलोम और कदाचार का समानार्थी माना जाता हे। नीति न्याय, सत्य, ईमानदारी आदि मौलिक और सात्विक वृत्तियों स्वार्थ, असत्य और बेईमानी से सम्बन्धित सभी कार्य भ्रष्टाचार से सम्बन्धित हैं।

भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार” से मिलकर बना है। “भ्रष्ट” का अर्थ होता है - निम्न, गिरा हुआ, पतित, जिसमें अपने कर्त्तव्य को छोड़ दिया है तथा “आचार” शब्द का अर्थ होता है आचरण, चरित्र, चाल, चलन, व्यवहार आदि। अत: भ्रष्टाचार का अर्थ है - गिरा आचरण अथवा चरित्र और भ्रष्टाचारी का अर्थ होता है - ऐसा व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलना करके निजी स्वार्थ के लिये कुछ ऐसे कार्य किए हैं, जिनकी उससे अपेक्षा नहीं थी। 

भ्रष्टाचार की परिभाषा

सेन्चूरिया के अनुसार, “किसी भी राजनीतिक कार्य का भावना एवं परिस्थितियों के आधार पर परीक्षण करने के पश्चात यदि समकालीन सिद्च्छा एवं राजनीतिक नैतिकता के तर्क इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि व्यक्तिगत हितों के लिए सार्वजनिक हितों को बलिदान किया गया है तो निश्चित रूप से वह कार्य राजनीतिक भ्रष्टाचार का अंग है।”

(David H. Bayley) कहते हैं कि “भ्रष्टाचार एक सामान्य शब्दावली है जिसमें अपने व्यक्तिगत लाभ के विचार के परिणामस्वरूप सत्ता का दुरुपयोग भी आता है, जो जरूरी नहीं धन-संबंधी हो।” 

(J.S. Nye) भ्रष्टाचार की परिभाषा इस प्रकार करते हैं, “ऐसा व्यवहार जो एक सार्वजनिक भूमिका के औपचारिक कर्त्तव्यों से निजी (व्यक्तिगत, निकट परिवार, निजी गुट) आर्थिक लाभ या स्तरीय लाभ के कारण विचलित हो जाता है, या कुछ प्रकार के निजी प्रभावों से प्रभावित हो कर नियमों का उल्लंघन करता है, भ्रष्टाचार कहलाता है”। 

भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय-9 में भ्रष्टाचार को विस्तृत रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें उपबन्धित धारा 161 प्रमुखत: लोक सेवकों में भ्रष्टाचार से संबंधित है, जिनकी परिधि में घूस अथवा रिश्वत और सहवर्ती अपराध, विधि विरुद्ध कार्य एवं लोक सेवकों के प्रतिरूपण संबंधी कार्य आते हैं। धारा 161 में उपबन्धित है कि वह व्यक्ति भ्रष्टाचार का दोषी माना जायेगा जो कोई लोक सेवक होते हुए या होने को प्रत्यक्ष रखते हुए वैध पारिश्रमिक से भिन्न किसी प्रकार का भी परितोशण इस बात को करने के लिए या इनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने को सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करने का प्रयास करेगा कि वह लोक सेवक अपना कोई पदीय कार्य करे या प्रवृत्त रहें अथवा किसी व्यक्ति को अपने पदीय कृत्यों के प्रयोग में कोई अनुग्रह दिखाये या दिखाने से प्रवृत्त रहें अथवा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या संसद या किसी राज्य के विधानमण्डल में या किसी लोक सेवक के यहाँ उसको वैसी हैसियत में किसी व्यक्ति का कोई उपकार या अपकार करे या करने का प्रयत्न करें।

आक्सफोर्ड शब्दकोश में भ्रष्टाचार का अर्थ निम्न प्रकार से बताया गया है। ‘रिश्वत अथवा अवैधानिक और अनुपयुक्त साधनों से गलत या अनैतिक कार्य की ओर उन्मुख होना, तथा सही और नैतिक कार्यो से विरक्त होना भ्रष्टाचार है।’ 

इस कथन में जहाँ भ्रष्टाचार को अनैतिकता से जोड़ा गया है, वहाँ अनैतिकता भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। इसलिए भ्रष्टाचार को सही अर्थो में समझने के लिए नैतिकता को समझना अनिवार्य प्रतीत होता है। अर्नेस्ट हेमिंग्वे का वक्तव्य ‘‘जिस काम को करने के बाद आप सुखद अनुभव करें वह नैतिक, और जिसे करने के बाद आप बुरा अनुभव या महसूस करते हैं, वह अनैतिक है।’’ यहाँ पर हेमिंग्वे का सुख सम्बन्धी कथन भौतिक सुख नहीं बल्कि आत्मिक सुख को प्रतिध्वनित करता है। यह आत्मिक सुख स्वहित नहीं बल्कि पर-हित एवं सार्वजनिक हित सम्बन्धी कार्यो को सम्पन्न कर के प्राप्त किया जा सकता है।

समाजशास्त्री ‘रार्बट बु्रम्स’ ने भी भ्रष्टाचार को परिभाषित करते हुए कहा कि ‘‘इसमें किसी मूर्त या अमूर्त लाभ के लिए किये जाने वाले गैर-कानूनी कार्य सम्मिलित होते है।’’ 

उपर्युक्त कथनों एवं परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार, ऐसे गिरे हुए आचरण को कहा जाना चाहिए जो कानूनी एवं नैतिक दृष्टि से गलत हो, नैतिक दृष्टि का तात्पर्य पर हित या सार्वजनिक हित से है, अपने पद की शक्तियों की दुरुपयोग करते हुए (ये शक्ति किसी भी प्रकार की हो सकती है) व्यक्तिगत, या चहेतो को लाभ पहुँचाना भ्रष्टाचार की श्रेणी के अन्तर्गत आता है।

भ्रष्टाचार के कुछ अनिवार्य तत्व

  1. यह एक लोक-अधिकारी द्वारा अपनी स्थिति, स्तर अथवा संसाधनों का जानबूझ कर या ऐच्छिक दुरुपयोग है।
  2. यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में किया जा सकता है। 
  3. यह अपने निजी स्वार्थ या लाभ को बढ़ाने के लिये किया जाता है, चाहे वह आर्थिक लाभ हो या शक्ति, सम्मान या प्रभाव को बढ़ाना हो। 
  4. यह व्यवहार के विधिवत, मान्य अथवा सामान्य स्वीकृत नियमों का उल्लंघन करके किया जाता है। 
  5. यह समाज या अन्य व्यक्तियों के हितों के प्रतिकूल किया जाता है। आजादी के पूर्व भारतीयों ने स्वतन्त्र भारत के लिए अनेक सपने संजोये थे। उनमें से उनका एक प्रमुख सपना भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था तथा समाज का भी था परन्तु दुर्भाग्यवष उनका यह सपना महज सपना ही है। यह एक कटु सत्य है कि जैसे-जैसे नैतिकतापूर्ण, भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था तथा समाज निर्माण की ओर बढने के प्रयास किये जा रहे हैं वैसे-वैसे समाज में भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता के नये-नये रूप में नित नये कीर्तिमान भी स्थापित हो रहे हैं।
भ्रष्ट आचरण, इसके अन्तर्गत वह सभी भ्रष्ट आचरण में आते हैं जो नैतिकता के विरुद्ध होते हैं, अर्थात् कोई भी ऐसा व्यवहार जो लोकाचार अथवा सदाचार के विपरीत है, वस्तुत: यह भ्रष्टाचार है। कदाचार, दुराचार, स्वेच्छाचार, मिथ्याचार, छल-छद्म, अत्याचार, अन्याय, पक्षपात, पाखण्ड, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, गबन, तस्करी, विश्वासघात, देशद्रोह, व्यभिचार, आदि सब भ्रष्टाचार के ही वंशज हैं। भ्रष्टाचार का स्तर और प्रकार परिस्थितियों अथवा संस्कृतियों पर निर्भर करता है। लेकिन बेईमानी स्वत: भ्रष्टाचार की मूल अवस्था है, जो भ्रष्ट आचरण से भ्रष्ट व्यवस्था को जन्म देती है। 

भ्रष्टाचार के प्रकार

भ्रष्टाचार कितने प्रकार के होते हैं? भ्रष्टाचार को छ: प्रकारों में वर्गीकृत किया है-
  1. प्रशासनिक भ्रष्टाचार, 
  2. राजनीतिक भ्रष्टाचार, 
  3. लोक भ्रष्टाचार, 
  4. निजी भ्रष्टाचार, 
  5. वृहद् भ्रष्टाचार, 
  6. लघु भ्रष्टाचार।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post