भ्रष्टाचार का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

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भ्रष्टाचार एक गंभीर चुनौती है क्योंकि यह स्वयं नुकसानदेह होने के साथ-साथ अनेक समस्या का जनक भी है । भ्रष्टाचार सरकारी योजनाओं की सफलता को प्रभावित करता है, महंगाई को जन्म देता है, कालाबाजारी तथा मिलावट जैसी समस्या को संरक्षण देता है और गैरकानूनी तथा अनैतिक कार्यों को बढ़ावा देता है । 

भ्रष्टाचार का अर्थ

भ्रष्टाचार “भ्रष्ट और आचरण” दो पदों के योग से बना है। भ्रष्टाचार शब्द का अर्थ है - निकृष्ट आचरण अथवा बिगड़ा हुआ आचरण। भ्रष्टाचार सदाचार का विलोम और कदाचार का समानार्थी माना जाता हे। नीति न्याय, सत्य, ईमानदारी आदि मौलिक और सात्विक वृत्तियों स्वार्थ, असत्य और बेईमानी से सम्बन्धित सभी कार्य भ्रष्टाचार से सम्बन्धित हैं।

भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार” से मिलकर बना है। “भ्रष्ट” का अर्थ होता है - निम्न, गिरा हुआ, पतित, जिसमें अपने कर्त्तव्य को छोड़ दिया है तथा “आचार” शब्द का अर्थ होता है आचरण, चरित्र, चाल, चलन, व्यवहार आदि। अत: भ्रष्टाचार का अर्थ है - गिरा आचरण अथवा चरित्र और भ्रष्टाचारी का अर्थ होता है - ऐसा व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलना करके निजी स्वार्थ के लिये कुछ ऐसे कार्य किए हैं, जिनकी उससे अपेक्षा नहीं थी। 

भ्रष्टाचार की परिभाषा

सेन्चूरिया के अनुसार, “किसी भी राजनीतिक कार्य का भावना एवं परिस्थितियों के आधार पर परीक्षण करने के पष्चात् यदि समकालीन सिद्च्छा एवं राजनीतिक नैतिकता के तर्क इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि व्यक्तिगत हितों के लिए सार्वजनिक हितों को बलिदान किया गया है तो निश्चित रूप से वह कार्य राजनीतिक भ्रष्टाचार का अंग है।”

(David H. Bayley) कहते हैं कि “भ्रष्टाचार एक सामान्य शब्दावली है जिसमें अपने व्यक्गित लाभ के विचार के परिणामस्वरूप सत्ता का दुरुपयोग भी आता है, जो जरूरी नहीं धन-संबंधी हो।” 

(J.S. Nye) भ्रष्टाचार की परिभाषा इस प्रकार करते हैं, “ऐसा व्यवहार जो एक सार्वजनिक भूमिका के औपचारिक कर्त्तव्यों से निजी (व्यक्तिगत, निकट परिवार, निजी गुट) आर्थिक लाभ या स्तरीय लाभ के कारण विचलित हो जाता है, या कुछ प्रकार के निजी प्रभावों से प्रभावित हो कर नियमों का उल्लंघन करता है, भ्रष्टाचार कहलाता है”। 

भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय-9 में भ्रष्टाचार को विस्तृत रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें उपबन्धित धारा 161 प्रमुखत: लोक सेवकों में भ्रष्टाचार से संबंधित है, जिनकी परिधि में घूस अथवा रिष्वत और सहवर्ती अपराध, विधि विरुद्ध कार्य एवं लोक सेवकों के प्रतिरूपण संबंधी कार्य आते हैं। धारा 161 में उपबन्धित है कि वह व्यक्ति भ्रष्टाचार का दोषी माना जायेगा जो कोई लोक सेवक होते हुए या होने को प्रत्यक्ष रखते हुए वैध पारिश्रमिक से भिन्न किसी प्रकार का भी परितोशण इस बात को करने के लिए या इनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने को सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करने का प्रयास करेगा कि वह लोक सेवक अपना कोई पदीय कार्य करे या प्रवृत्त रहें अथवा किसी व्यक्ति को अपने पदीय कृत्यों के प्रयोग में कोई अनुग्रह दिखाये या दिखाने से प्रवृत्त रहें अथवा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या संसद या किसी राज्य के विधानमण्डल में या किसी लोक सेवक के यहाँ उसको वैसी हैसियत में किसी व्यक्ति का कोई उपकार या अपकार करे या करने का प्रयत्न करें।

भ्रष्टाचार के कुछ अनिवार्य तत्व

  1. यह एक लोक-अधिकारी द्वारा अपनी स्थिति, स्तर अथवा संसाधनों का जानबूझ कर या ऐच्छिक दुरुपयोग है।
  2. यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में किया जा सकता है। 
  3. यह अपने निजी स्वार्थ या लाभ को बढ़ाने के लिये किया जाता है, चाहे वह आर्थिक लाभ हो या शक्ति, सम्मान या प्रभाव को बढ़ाना हो। 
  4. यह व्यवहार के विधिवत, मान्य अथवा सामान्य स्वीकृत नियमों का उल्लंघन करके किया जाता है। 
  5. यह समाज या अन्य व्यक्तियों के हितों के प्रतिकूल किया जाता है। आजादी के पूर्व भारतीयों ने स्वतन्त्र भारत के लिए अनेक सपने संजोये थे। उनमें से उनका एक प्रमुख सपना भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था तथा समाज का भी था परन्तु दुर्भाग्यवष उनका यह सपना महज सपना ही है। यह एक कटु सत्य है कि जैसे-जैसे नैतिकतापूर्ण, भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था तथा समाज निर्माण की ओर बढने के प्रयास किये जा रहे हैं वैसे-वैसे समाज में भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता के नये-नये रूप में नित नये कीर्तिमान भी स्थापित हो रहे हैं।
भ्रष्ट आचरण, इसके अन्तर्गत वह सभी भ्रष्ट आचरण में आते हैं जो नैतिकता के विरुद्ध होते हैं, अर्थात् कोई भी ऐसा व्यवहार जो लोकाचार अथवा सदाचार के विपरीत है, वस्तुत: यह भ्रष्टाचार है। कदाचार, दुराचार, स्वेच्छाचार, मिथ्याचार, छल-छद्म, अत्याचार, अन्याय, पक्षपात, पाखण्ड, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, गबन, तस्करी, विश्वासघात, देशद्रोह, व्यभिचार, आदि सब भ्रष्टाचार के ही वंशज हैं। भ्रष्टाचार का स्तर और प्रकार परिस्थितियों अथवा संस्कृतियों पर निर्भर करता है। लेकिन बेईमानी स्वत: भ्रष्टाचार की मूल अवस्था है, जो भ्रष्ट आचरण से भ्रष्ट व्यवस्था को जन्म देती है। 

भ्रष्टाचार के प्रकार

भ्रष्टाचार को छ: प्रकारों में वर्गीकृत किया है-
  1. प्रशासनिक भ्रष्टाचार, 
  2. राजनीतिक भ्रष्टाचार, 
  3. लोक भ्रष्टाचार, 
  4. निजी भ्रष्टाचार, 
  5. वृहद् भ्रष्टाचार, 
  6. लघु भ्रष्टाचार।

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