ज्ञान की अवधारणा, प्रकार एवं स्त्रोत

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मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अपनी योग्यता एवं सूझ-बूझ से इस पृथ्वी
पर कार्य करता है तथा उस कार्य को इस तरह से करता है कि उचित परिणाम प्राप्त होते है।
इसमें हम अपना योगदान किस तरह से देते है कैसे हम अपना कार्य करते है, कैसे हम उसे
सुचारू रूप से आगे चलाते है यह सब हमारी सूझबूझ का ही परिणाम होता है और उसी के
आधार पर हम समाज में अपना स्थान सुनिश्चित कर पाते है। सामाजिक ऐसे कार्य जो कि
प्रत्येक व्यक्ति सभी के हित को ध्यान में रखते हुए करता है तथा उसी के अनुसार कार्य करने
की नियति को बनाता है। यह कार्य करने का तरीका एवं आधार सुनिश्चित करना है जिससे
हम उसी प्रकार से कार्य करने के ढंग को सीखते है और आगे बढ़ते जाते है।

ज्ञान क्या है?

मनुष्य जब सबसे पहले अवतरित हुआ इस धरती पर तब उसमें रहने तथा खाने पीने
का तरीका एवं आधार गलत था इसके बाद वह धीरे-धीरे अपने कार्य संग में आगे बढ़ता गया
और अपना कार्य करने लगा एवं निरन्तर विकास की प्रक्रिया चलती रही उसी के आधार पर
उसने अपने जीवन को नए तथा आधुनिक तरीके से विकसित करना उचित समझा उसी के
आधार पर वह प्रारम्भिक अवस्था को छोड़कर निरन्तर नए परिणामों को प्राप्त करता हुआ आगे
बढ़ने लगा एवं अपना कार्य करने लगा। जिससे उसका विकास हुआ उसके सोचने समझने
एवं बोलने तथा व्यवहार करने की स्थितियों में परिवर्तन आया और वह सदैव अच्छे कार्यों के
बारे में सोचते हुए आगे बढ़ने लगा तथा उसके मस्तिष्क में आई नवीन चेतना तथा विचारों का
विकास स्वयं तथा देखकर होने लगा इस प्रकार से वह अपने वैचारिक क्षमता अर्थात् ज्ञान के
आधार पर अपने नवीन कार्यों को करने लगा एवं सीखने लगा कि किस प्रकार से कोई भी
काम को आसान तरीके से किया जाय और उसे किस प्रकार से असम्भव बनाया जाय। इसी
सोच विचारों की क्षमता या शक्ति को हम ज्ञान कहते है, जिसके आधार पर हम सभी प्रकार
के कार्यों को करते है एवं निरन्तर आगे बढ़ते है अर्थात उन्नति करते है, यह उन्नति तरक्की
और आगे बढ़ने की शक्ति ही व्यक्ति को और आगे बढ़ाने और अच्छे कार्य करने की प्रेरणा
देती है जिससे वह सदैव सत्कर्म एवं निरन्तर उचित कार्य करता है और आगे बढ़ता रहता है
इस प्रकार से सरल एवं सुव्यवस्थित जीवन को चलाने की प्रक्रिया ही हमें ज्ञान से अवगत
कराती है। किसी की निश्चित समय में किसी भी व्यक्ति या सम्पर्क में आने वाली कोई भी
वस्तु जो कि जीवन को चलाने के लिए उपयोग में आती है उसके प्रति जागरूकता तथा
साझेदारी ही ज्ञान कहलाती है। अर्थात् कैसे हम अपने जीवन को पूर्ण रूप से चला सके प्राप्त
कर सके एवं ज्ञान का बोधकर प्राप्त कर सके ज्ञान कहलाती है ज्ञान हमें अनुभव के द्वारा
तथा सीख कर एवं देखकर तथा अवलोकन के माध्यम से प्राप्त होता है कैसे प्रत्येक व्यक्ति
अपना कार्य आसानी से करते है वे अपने अनुभवों के आधार पर क्रियाशील होकर ज्ञान प्राप्त
करते है और अपने तरह से प्रत्येक कार्य को पूर्ण करते है।

यह हमें सीख कर खोजकर तथा शिक्षा लेकर हमें ज्ञान प्राप्त करना होता है, परन्तु जो
हम व्यवहार में करके देखते है अथवा सीखते है वह हमेशा हमें याद रहता है और हम उसे
वह व्यक्ति अथवा बालक सदैव याद रखता है तथा उसे वह सदैव ग्रहण करता है अपने
जीवन में उतारता है तथा सदैव सचेत रहता है आगे से ऐसा कोई कार्य न करें जिससे कि
उसे परेशानी हो इस प्रकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उसके सीखने की क्षमता का प्रभाव
पड़ता है और वह सदैव ज्ञान को स्थायी बनाए रखता है। सैद्धान्तिक ज्ञान जिसे हम पुस्तकों
से प्राप्त करते है और उसे उतना ही ग्रहण कर पाते है तथा समय बीत जाने पर हम उसे
याद नहीं कर पाते है अत: प्रत्येक व्यक्ति अपनी वैचारिक क्षमता के अनुसार प्रत्येक विषय वस्तु
को याद रखता है तथा उसका उपयोग समयानुसार करता है। ज्ञान शब्द अवबोध करना,
अनुभव करना, प्रोत्साहित करना, वास्तविकता धारण करना, तुलनात्मक रूप से देखना,
आत्मसात करना जोकि हमारे मस्तिष्क में पहले से धारित है या उसको हम देखकर या करके
सीख रहे है वह अनुभव के आधार पर सीखना एवं समझना ज्ञान की श्रेणी में आता है।
जैसे कि आकृति और सामग्री के आधार पर हम देखते है सीखते है और समझते है जानते है
एवं किसी भी कार्य को करते है ज्ञान अर्थात क्या हम जानते है समझते है और उसको हम
आत्मसात करते है इस प्रकार से ज्ञान हमारे एक कार्य करने की सुनियोजित योजना है
जिसके माध्यम से प्रत्येक सफल व्यक्ति कार्य करता है और जीवन पथ पर आगे बढ़ता जाता
है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन मस्तिष्क से अपनी शैक्षिक योग्यता से तथा सामान्य बुद्धि से आगे
बढ़ता जाता है और उसी प्रकार उस कार्य को करता जाता है जिससे उसके अनैतिक
क्रिया-कलाप पूर्ण होते है और वह निरन्तर आगे बढ़ता है तथा अपने से छोटे व आने वाली
पीढ़ियों को उसी ज्ञान के आधार पर अपनी क्रियाओं को आगे बढ़ाता जाता है ज्ञान जो एक
अनुभव के द्वारा आता है जिसे हम अपने आत्मज्ञान के द्वारा समझते है जानते है और उन्हीं
अनुभवों के द्वारा हम सदैव आगे जीवन से संबंधित कार्यों को करते है और उसी के आधार पर
प्रतिदिन अनुभवों के द्वारा अपने जीवन के क्रियाकलापों को करते है तथा अच्छे सभी के हित
में कार्य हो ऐसा सोचते है और करने का निर्णय लेते है

प्रत्यक्ष एवं परोक्ष आधार पर हम ज्ञान को बांट सकते है। भारतीय दर्शन में ज्ञान को
ब्रम्ह सत्य माना जाता है तथा ज्ञान को भी श्री मांसा शास्त्र से जोड़ा गया है दोनों एक दूसरे
के अभिन्न अंग है। ज्ञान है जो कि हमारे ऋषि मुनियों तथा अन्य लोगों ने इसे अपने आधार
पर समाज में विस्तार किया है और उसी के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति अपनी सकारात्मकता
एवं सोच के आधार पर अपने वैधानिक क्षमता के आधार पर ज्ञान प्रदान करता था और उसी
का हम अनुसरण करके अपना अनुभव बढ़ाते थे करके सीखते थे और उसी आधार पर हम
जीवन के तरीको को जानते थे और समझते थे। प्राचीन समय में जो हमारे पूर्वज थे उन्होंने
शिक्षा ली हो ऐसा कोई आवश्यक नही था ज्ञान केवल आधारित था जरूरी नही कि वह
शिक्षित भी हो इस तरह से प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान को महत्वपूर्ण मानकर अपना कार्य करता था।
शिक्षा ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रयास है और प्रयास से कोई आवश्यक नही कि उसे ज्ञान
प्राप्त हों। ज्ञान आंतरिक मन में जो वैचारिक प्राकट्य है वही ज्ञान है। कबीरदास, रैदास,
सूरदास मीरा बाई ऐसे कई उदाहरण हमारे समक्ष है जिन्होंने अपने आंतरिक ज्ञान से सबको
ज्ञान दिया है अर्थात् दिशा निर्देश दिया है जीने का समझने का और जानने का जिससे हम
अपना जीवन आसान बना सके और सभी के द्वारा समाज का हित कर सके, सकारात्मक
विचारधारा एवं अच्छी विचारधारा का प्रादुर्भाव प्रत्येक मनुष्य में हो इस ज्ञान की आवश्यकता
होती है। प्रचीनकाल में अर्थात् वैदिक युग में प्रत्येक विद्यार्थी मलू भूत आध्यात्मिक प्रश्नों को
स्वयं से पूछे और इनके उत्तर स्वयं खोजने का प्रयास करे जैसे –

  1. मैं कौन हूँ
  2. मैं कहाँ से आया हूँ
  3. मैं कहाँ जाऊँगा, मनुष्य में यह सब ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
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ज्ञान की अवधारणा

जब हम शिक्षण देते है तो हम ज्ञान प्रदान करते है इसलिए हमें
जानना आवश्यक होता है कि हम ज्ञान के किस स्वरूप का उपयोग कर रहे है, कैसे हम
विद्यार्थी को यथार्थ ज्ञान से परिचय प्रदान करें। क्या हम जो ज्ञान उसे दे रहे है वह पूर्ण
यथार्थ ज्ञान है सत्यता से पूर्ण है यह सब हम जानते है एवं समझते है क्या इन सिद्धान्तों की
जानकारी शिक्षक को होना अति आवश्यक है। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है,
तथा जो भी तथ्य हम पढ़ाते है तो वह सत्य पर आधारित है सत्य और ज्ञान दोनो एक दूसरे
से जुडे़ है दोनों में कोई अंतर नहीं है। शाश्वत सत्य ही ज्ञान है। समाज के लिए ज्ञान ही
शिक्षा है। सभी प्राचीन ऋषि मुनियों तथा मुस्लिम संतों का े प्रथम ज्ञान हुआ तब उन्होंने उसका
प्रचार: प्रसार किया इस प्रकार से ज्ञान की उपयोगिता शिक्षा ही सिद्ध करती है। ज्ञान की
दूसरी अवधारणा है कि ज्ञान सूक्ष्म है या स्थूल है यह बात हम अध्यापक के द्वारा विद्यार्थियों
को अध्ययन कराते समय शिक्षक एवं विद्याथ्र्ाी के मन में ज्ञान सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहता है।
दूसरी ओर पुस्तकों में जो भाषा लिखी है वह ज्ञान स्थूल है। एक उदाहरण के द्वारा हम समझ
सकते है जैसे पानी में नमक डालने पर जो नमक के छोटे कण है वे घुल जाते है और जो
बडे़ डैले होते है वे दिखाई देते रहते है ठीक उसी प्रकार से यह ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान होता है
ज्ञान के दो पक्ष है – प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान।

प्रत्यक्ष ज्ञान मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव के द्वारा प्राप्त करता है। परोक्ष ज्ञान
हमे दूसरों  से कथनो या पुस्तकों द्वारा प्राप्त होता है। शिक्षा में दोनों प्रकार के ज्ञान का महत्व
है। ज्ञान केवल अनुभूति भाग है यह हम एक गेंद के द्वारा समझ सकते है। यदि हम गेंद को
देखते है तो हमें उसका रंग, रूप, आकार दिखाई देता है और यदि हम इसी गेंद को ब्रहृमाण्ड
के रूप में देखते है तो वह हमें इस पृथ्वी का आकार तथा सतह एवं उसके पूर्ण रूप को
दर्शाती है। इस प्रकार से हम ज्ञान के कई स्तरों को पाते है और विभिन्न प्रकार से मन मैं
कई प्रकार से सक्रिय होता है उसे हमें अनुभव तथा तर्क चिन्तन के माध्यम से प्राप्त करते है।

ज्ञान के प्रकार

आगमनात्मक ज्ञान हम अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से तथा निरीक्षण के माध्यम से
प्राप्त करते है जो कि हमारे समक्ष घटित होती है घटना के आधार पर प्राप्त करते है। इसमें
अलौकिक सत्ता का कोई स्थान नहीं है

  1. प्रयोगमूलक ज्ञान – प्रयोजनवादी मानते है कि ज्ञान प्रयागे द्वारा प्राप्त होता है। हम
    विधियों का प्रयोग करके तथा किसी भी तथ्य को प्रयोग द्वारा समझते है व
    आत्मसात करते है।
  2. प्रागनुभव ज्ञान – स्वयं प्रत्यक्ष की भॉति ज्ञान को समझा जाता है जैसे गणित का
    ज्ञान प्रागनुभव ज्ञान है जो की सत्य है वह अनुभव के आधार पर होते है तथा-स्वयं
    में स्पष्ट एवं निश्चित ज्ञान प्रागनुभव ज्ञान होता है।
  3. ज्ञान के स्त्रोत – सदैव हम ज्ञान को एक दूसरे को देखकर तथा उनकी बातों को
    सुनकर प्राप्त करते है, कभी भी हम स्वयं अपने ज्ञान से परिपूर्ण नहीं हो पाते है।
    कोई भी व्यक्ति सदैव अपने बृद्धि बल पर आगे नही बढ़ सकता है जब तक की वह
    दूसरों के द्वारा किए गए कार्यो का अनुभव न प्राप्त कर ले क्योंकि हम मनुष्य जीवन
    में सदैव एक दूसरे से देखकर सीखते है- चाहे वह प्रत्यक्ष रूप या अप्रत्यक्ष रूप
    प्रत्यके व्यक्ति अपनी मानसिक एवं शारीरिक योग्यता-नुसार सीखता है देखता है
    और अपना व्यवहार करता है अर्थात् जो कार्य उसको करने की लालसा तथा
    महत्वाकांक्षा है उसी के आधार पर वह आगे बढ़ता है और निरन्तर कार्य सीखता
    जाता है। इस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति देखकर बाले कर सुनकर तथा किसी भी कार्य
    को करके सीखता है जो कि सदैव अनुभव के आधार पर सीखता जाता है तथा
    उसी आधार पर सदैव भाग ज्ञानार्जन कर अपने जीवन को सरल एवं सुगम बनाता
    जाता है जीवन में मनुष्य सभी से सीखता है उसके आस-पास वातावरण तथा
    परिवार एवं अपने अनुभवों के माध्यम से वह जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखता रहता
    है। 

ज्ञान के स्त्रोत 

मनुष्य सदैव स्त्रोतों के माध्यम से सीखता है ये स्रोत है।

प्रकृति – 

प्रकृति ज्ञान का प्रमुख स्त्रोत है एवं प्रथम स्रोत है प्रत्येक मनुष्य ज्ञान
प्राप्त करता है जन्म से पूर्व एवं जन्म के पश्चात जैसे अभिमन्यु ने चक्र व्यहू तोड़कर
अन्दर जाना अपनी माता के गर्भ से ही सीखा था और हम आगे किस प्रकार से
प्रत्यके व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार प्रकृति से सीखता है जैसे- फलदार वृक्ष सदैव
झुका रहता है कभी भी वह पतझड  की तरह नहीं रहता हमेशा पंिछयों को छाया
देता रहता है। सूर्य ब्रहृमाण्ड का चक्कर लगाता है पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है
चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है यह क्रिया सब अपने आप होती है और उसी से
दिन रात का होना और मौसम का बनना तथा इस प्रकार से प्रकृति अपने नियमों
का पालन करती है और उनसे हम सीखते है कि किस प्रकार से अपना जीवन ठीक
से चला सकेगें। हमारे आस-पास के सभी पेड़ पौधे, नदी, तालाब तथा पर्वत पठार
मैदान सभी से हम दिन रात सीखते रहते है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोनों रूप हो
सकते है। और इन्ही से हम अपना ज्ञानार्जन करते रहते है इस प्रकार से प्रकृति हमें
सीखाती है और हम सीखते है।

पुस्तकें –

किताबे ज्ञान का प्रमुख स्त्रोत है प्राचीन समय मैं जब कागज का निर्माण
नही  हुआ था तब हमारे पूर्वज ताम्रपत्र, पत्थर तथा भोज पत्रों पर आवश्यक बाते
लिखते थे और उन्ही के आधार पर चलते थे अर्थात् नियमों का अनुसरण करते थे
इस प्रकार से प्रत्येक पीढ़ियाँ समयानुसार उनका उपयोग करती थी और सदैव
अनुपालन करती थी।

वर्तमान युग आधुनिकता का युग है आज के समय में सभी लोग पाठ्य पुस्तकों के
द्वारा तथा प्रमुख पुस्तकों के माध्यम से अपना अध्ययन करते है इनके द्वारा हम ज्ञान
वृद्धि कर चौगुनी तरक्की कर सकते है। आज के युग में प्रत्येक विषय पर हमें
किताबे मिल सकती है यह ज्ञान का भण्डार होती है आज के समय में हम जिस
विषय में चाहे उस विषय की पुस्तक खरीद सकते है और अपने ज्ञान का अर्जन
कर-सकते है। ऑनलाइन भी ई-लाइब्रेरी के द्वारा अध्ययन कर सकते है।

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इंद्रिय अनुभव –

इंद्रिय अर्थात् शारीरिक अंग जोकि मनुष्य को उसकी जीवितता
का आभास कराते है। वह सदैव उन्ही के द्वारा अनुभव करता जाता है, और संवेदना
जागृत करता जाता है, यह संवेदना ही ज्ञान प्रदान करती है अनुभव के आधार पर
वह प्रत्येक व्यक्ति अपनी कार्यशैली और प्रत्यक्षी करण कराती है, अर्थात् प्रत्येक
पदार्थों से जो कि हमारे जीवन को चलाने में संचालित करते है उनके सहारे ही हम
आगे बढते है तथा अपने जीवन में निरन्तर आगे बढ़ाते है।

साक्ष्य – 

साक्ष्य के द्वारा हम दूसरों के अनुभवों एवं आधारित ज्ञान को मानते है
जो हम अपने अनुभवों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करते है। साक्ष्य में व्यक्ति स्वयं निरीक्षण
नही करता है दूसरों के निरीक्षण पर ही तथ्यों का ज्ञान लेता है। इस प्रकार से हम
कह सकते है कि हम किसी अन्य के अनुभवों के द्वारा ही हम सीखते है।
किसी अन्य के द्वारा किसी भी वस्तु का ज्ञान देना और समझाना तथा बताना
और उसी बात को समझना ही साक्ष्य है। हमारा भौतिक वातावरण जो हमें प्रकृति के
साथ रखकर कार्य करता है जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए उद्यत करता
है, या प्रेरणा देता है वही साक्ष्य है।

तर्क बुद्धि 

प्रतिदिन जीवन में होने वाले अनुभवों से हमें ज्ञान प्राप्त होता है तथा यही ज्ञान
हमारा तर्क में परिवर्तित हो जाता है, जब हम इसे प्रमाण के साथ स्पष्ट कर स्वीकार करते है
अर्थात् तर्क द्वारा हम संगठित करके हम ज्ञान का निर्माण करते है। यह एक मानसिक प्रक्रिया
है।

अन्त: प्रज्ञा 

इसको अंग्रेजी में इन्टुयूशन कहते है। इसका तात्पर्य है किसी तथ्य को पा
जाना। इसके लिए किसी भी तर्क की आवश्यकता नहीं होती है, हमारा उस ज्ञान में पूर्ण
विश्वास हो जाता है।

अन्त:दृष्टि द्वारा ज्ञान 

यह ज्ञान प्रतिभाशाली लोगों को अकस्मात कुछ बोध होकर प्राप्त
होता है, जैसे महात्मा बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे बैठने से ज्ञान प्राप्त हुआ और भी संत तथा
महात्मा हुए है जिन्हें विभिन्न स्थानों पर बैठने से ज्ञान प्राप्त हुआ। कई मनाेि वज्ञानिकों द्वारा
पशुओं पर किए गए प्रयोगों से सिद्ध हुआ कि समस्या से जुझते हुए जानवर अकस्मात समस्या
का हल प्राप्त हो जाता है, ऐसा तब होता है जब वह समस्या की संपूर्ण जानकारी प्राप्त कर
लेता है। शिक्षा में बालकों की सृजनात्मक शक्ति के विकास में इससे सहायता प्राप्त होती है।

अनुकरणीय ज्ञान

मानव समाज में सभी मनुष्य विभिन्न मानसिक शक्तियों के है कुछ बहुत
ही तीव्र बुद्धि वाले कुछ निम्न बुद्धि वाले होते है। इनमें जो प्रतिभाशाली होते है। वह प्रत्येक
कार्य को इस प्रकार करते है कि वह सैद्धान्तिक बन जाता है। अत: उनके द्वारा किया गया
किसी भी संग में कार्य जिसको हम स्वीकार करते है अनुकरणीय हो जाता है।

अनुकरण के द्वारा ही हम सामाजिक कुरीतियों को दूर कर सकते है इसी के माध्यम से
हम समाज को नई दिशा प्रदान कर सकते है।

मानव प्रयासों के रूप में ज्ञान

जिज्ञासा –

जानने की इच्छा, समझने की इच्छा किसी भी विषय या प्रकरण को
अर्थात शीर्षक को समझने की उत्सुकता ही जिज्ञासा है। जिज्ञासा मनुष्य के अन्र्तमन
की एक ऐसी क्रिया है जो सदैव जानने, समझने हेतु प्रोत्साहित करती है, जब तक कि
उसको पूर्णत: उत्तर नहीं मिल जाता और वह संतुष्ट न हो जाता है। संतुष्टि उसको
तभी प्राप्त होती है, जब वह पूर्ण रूप से मन की जिज्ञासा को शांत नहीं कर लेता हैं।
इस प्रकार से वह ज्ञान एकत्रित करता है तथा उसका सदैव उपयोग करता है।
जिज्ञासा पूर्ण होने पर प्रत्येक व्यक्ति खोज, आविष्कार एवं अवलोकन तथा सीखने के
माध्यम का उपयोग कर उसे दैनिक व्यवहार में लाता है और अपने अनुभवों को सांझा
करता है जिससे अन्य लोगों में किसी भी कार्य को करने व आगे बढ़ने की उत्सुकता
बढ़ती है।

अभ्यास –

अभ्यास के माध्यम से ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। प्रत्येक मनुष्य अपने
अनुभवों के माध्यम से सीखता है, प्रतिदिन वह नए अनुभवों को ग्रहण करता है और
उसी को प्रमाण मानकर आगे कार्य रूप देकर उसे अपने जीवन में उतारता है तथा
उसी के आधार पर प्रत्येक कार्य को करता है और आगे आने वाले सभी लोगों को इसी
के अनुसार ज्ञान प्रदान करता जाता है। अभ्यास के माध्यम से ही विभिन्न आविस्कार
हुए तथा हम आधुनिकता के इस युग में प्रत्येक कार्य को परिणाम तक पहुँचा सके है।
यदि हमारा अभ्यास पूर्ण नहीं है तो हम परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते है। प्रत्येक
मनुष्य में ईश्वरीय देन है कि, वह अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार प्रत्येक क्षेत्र जिसमें
उसको रूचि हो अभ्यास के द्वारा अच्छे कार्य करके उनका प्रदर्शन कर सकता है और
समाज को एक नई दिशा प्रदान कर सकता है चाहे वह विज्ञान, समाज तथा शिक्षा या
अन्य किसी भी क्षेत्र में हो उसी आधार पर वह अपने व्यक्तित्व अनुभवों को सदैव
आविष्कारिक रूप में आगे बढ़ाता रहता है।

संवाद –

संवाद ज्ञान को प्रसारित तथा बढ़ाने का एक माध्यम है जिसके द्वारा हम
ज्ञान प्राप्त करते है एवं इसको आत्मसात करते है, जैसे कि लोकोक्तियाँ  एवं मुहावरो
के द्वारा तथा अनेकों दार्शनिको: समाज सुधारकों एवं विद्वजनो द्वारा प्रेरित अनुभवों के
आधार पर संवाद के माध्यम से ज्ञान का प्रसारण करते है जो कि प्रत्येक मनुष्य को
लाभान्वित करता है। संवाद के उदाहरण – ‘‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत।’’ ‘‘पानी पीयो छानकर, गुरू करो
जानकर।’’ पढे़गा इंडिया, बढे़गा इंडिया’’ आदि।

इस प्रकार से कई संवाद प्रत्येक मनुष्य प्राणी के मन पर प्रभाव डालते है,
जिससे ज्ञान का अर्विभाव होता है तथा वह प्रत्यके मनुष्य के मन मस्तिष्क पर अत्यधिक
प्रभाव डालता है।

मानवीय ज्ञान एवं सामाजिक व्यवहार –

मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है उसके अनुभवों तथा संस्कारों से जैसे उसका वातावरण
होगा वह वैसा ही व्यवहार करेगा और उसी के आधार पर उसकी वैचारिक क्षमता
तथा मानसिक योग्यता निर्भर करती है उसके प्रदर्शन तथा उसके व्यवहार पर यदि वह
किसी भी प्राणी को उसके सम्पर्क में आता है, उसकी बात समझता है, उसके साथ
उचित व्यवहार करता है और यह मानता है, कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी समस्या है
और वह किस प्रकार से अपना कार्य कर रहा है कैसे वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं
को पूर्ण कर रहा है तो वह उसके साथ उचित व्यवहार करता है तथा उसकी
समस्याओं को समझ कर उनका समाधान करता है। यही मानवीय व्यवहार तथा
सामाजिक व्यवहार कहलाता है।

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सामाजिक व्यवहार व्यक्ति तभी करता है जब वह स्वयं को समाज का अभिन्न
अंग मानकर उसके हित कल्याण की बात सोचता तथा समझता है कल्याण की बात
अर्थात् सभी साथियो ं की परेशानियां े को समझना, उनकी समस्याओं को सुलझाना, उन्हें
सही राह दिखाना, उनके वयक्तित्व में विकास करना, सहयोग करना उचित मार्गदर्शन
देना, समाज के कल्याण की बात करना, नई योजनाओं से परिचित करवाना नई एवं
सर्व कल्याण के हित की नीतियाँ बनाना जैसे :- स्वास्थ्य, शिक्षा, पालन पोषण,
अज्ञानता को दूर करने के लिए युवा वर्ग द्वारा साक्षरता का प्रसारण करना प्रत्येक
व्यक्ति शिक्षित हो एवं आगे बढे़ समझकर, लिंग भेद को दूर करना सबसे बड़ी समस्या
है, वर्तमान समय में कितना भी आधुनिक युग हो, परन्तु अभी भी अधिकतर जनता के
विचार आज भी वही संकुचित विचार धारणा है जो कि बेटा और बेटी में अन्तर स्थापित
करती है। इस प्रकार की मानसिकता को दूर करना शिक्षा, के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति
का अपना महत्व है और उसी प्रकार से उस समाज के सभी सदस्यों को समझाना तथा
उनकी मानसिक विचारधारा को परिवर्तित करना एवं इस प्रकार की अन्य सामाजिक
कुरीतियों को दूर करना। शिक्षित एवं सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह समाज की
बुराइयां े को दूर करे एवं समाज में एक अच्छा वातावरण तैयार कर स्वस्थ समाज की
व्यवस्था करे जिससे जमाखोरी, अंधविश्वास, कुरीतियां े तथा सभी प्रकार की सामाजिक
बुराइयां े का अंत हो सके। समाज एक आदर्श रूप में स्थापित हा े सके और देश की
उन्नति में सहायक हो सके। इस प्रकार से हमारा कर्तव्य है कि यदि हम शिक्षित हांगे े
तो समाज शिक्षित होगा समाज शिक्षित होगा तो समुचा देश शिक्षित होगा और सभी
की उन्नति होगी तथा सभी के विकास के साथ-साथ देश का विकास होगा।

अत: सामाजिक व्यवहार हेतु ज्ञान अति आवश्यक है। यदि मनुष्य को ज्ञान होगा तो
कोई भी किसी भी प्रकार से उसे कमजोर नही बना सकेगा अर्थात उसका शोषण नहीं
कर पायगे ा, इस प्रकार से शिक्षा मनुष्य को मनुष्य बनाती है तथा सामाजिक विकास में
सहयोग प्रदान करती है। इस प्रकार से सक्रिय ज्ञान के माध्यम से हम अपने विचारों
को जाग्रत रखते है तथा परस्पर उन पर ध्यान तथा विचार विमर्श करते है और उनका
पालन करते है। इस प्रकार से ज्ञान के द्वारा हमें सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है जो
हमारे जीवन को सरल तथा सफल बनाता है।

ज्ञान जो हमें प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से प्राप्त होता रहता है, इसके लिए
आवश्यक नहीं कि हम अपने से उम्र में बड़ों के द्वारा ही सीखे अर्थात् यदि कोई उम्र में
छोटा भी है तो वह यदि ज्ञान रखता है तो उससे हम ज्ञान प्राप्त कर सकते है उसके
विचारा ें तथा क्रियाकलाप के माध्यम से और उसकी गतिविधियों के माध्यम से इस
प्रकार से ज्ञान के माध्यम से सामाजिक व्यवहार को हम पूर्ण कर सकते है और समाज
को सही मार्गदर्शन दे सकते है। सत्य और ज्ञान में कोई भेद नहीं है जो सत्य है वही
ज्ञान है जैसे सूर्य का उदय होना हमें प्रकाशित करता है, चन्द्रमा हमें दिखाई देता है
और ठंडक प्रदान करता है ऋतुओं के अनुसार मौसम में परिवर्तन होता है और समय
के अनुसार सभी प्राणियो एवं सजीवो में अंतर आता है तथा वे अपने समान दूसरा जीव
इस धरती पर लाते है जो कि वास्तविकता है इसी ज्ञान के आधार पर हम प्रत्येक होने
वाली दुर्घटनाओ का पूर्वाभास करके सचेत होते है तथा उससे बचने के उपाय प्रारम्भ
कर देते है, जो हमारे ज्ञान को दर्शाता है और सदैव सचेत रहने की प्रेरणा प्रदान
करता है।

ज्ञान ही एक ऐसा माध्यम है जो मनुष्य को मनुष्यत्व सीखाता है तथा हमारे ग्रंथों में
लिखा है कि ज्ञान से बड़कर कोई पवित्र वस्तु नही है। ज्ञान सदैव मार्गदर्शन करता है
सम्पर्क करने की प्रेरणा देता है तथा अच्छे कर्म करने को उत्साहित करता है। ज्ञान
यदि मनुष्य में है तो वह सदैव अपने अस्तित्व को परमात्मा की देन समझ कर समाज
तथा सम्पर्क में आने वाले सभी से उचित व्यवहार कर प्ररे णा स्त्रोत बनेगा।

ज्ञान न कि उडेलना है वरन् व्यक्ति चयनित रूप से वातावरण की प्रक्रिया पर ध्यान
देकर वह अपने अनुभवों के आधार पर सूचना एकत्रित करता है और ज्ञान प्राप्त करता
है। खोज के द्वारा सीखना महत्वपूर्ण है परन्तु कुशल तथा पूर्ण अनुभव के द्वारा सीखना
ही ज्ञान है। यह हमें जीवन में पूर्णता प्रदान करता है जैसे – धन, शक्ति, नाम,
शोहरत, सफलता और पद देता है। ज्ञान के द्वारा ही व्यक्ति समझने विश्लेषण करने
और बुद्धिमानी विचारों को विकसित करने की क्षमता देता है। यह हमें अच्छाई की
भावना रखना सीखाता है तथा हमारे आसपास के लोगों के जीवन को सुधारने में मदद
करता है।

ज्ञान जीवन में अधिक अवसरों को प्राप्त करने का साधन है। ज्ञान के द्वारा मनुष्य
‘‘प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति कर सकता है वह सदैव प्रत्येक विषय पर अपना नियन्त्रण
रखता है और प्रत्येक क्षेत्र में अनुभव के आधार पर अपना वर्चस्व रखता है ज्ञान के
माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी किसी भी समस्या का हल आसानी से कर सकता है।
वह सभी प्रकार से पूर्ण व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता है। ज्ञान एक ऐसा तत्व है जो सदैव
रहता है धन नष्ट हो जाता है तन जर्जर हो जाता है हमारे साथी और परिवार के लोग
छूट जाते है पर ज्ञान सदैव हमारे साथ रहता है वह कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ता
है। ज्ञान यह हमें सीखने की प्रक्रिया से आता है। जितना हम सीखते जाते है ज्ञान हमें
प्राप्त होता जाता है। हमारे धर्म ग्रंथो में भी ज्ञान को प्रकृति और पुरूष के स्वरूप को
समझकर गुणों के सहित प्रकृति से सदैव जुडे रहना है।

मानवीय ज्ञान जो कि ईश्वर की अनुपम कृति है जिसे ईश्वर ने प्रदत्त की है इसके
बिना मनुष्य पुशओ के समान व्यवहार करता है न वह ठीक से व्यवहार करता है न
किसी की भावना को समझ पाता है और न ही वह मानवता सीखा पाता है तो वह
व्यवहार असामाजिक व्यवहार हो जाता है जो कि मनुष्य को पशुत्व का व्यवहार
सीखाता है तथा उसके आधार पर वह असामाजिक कार्य करने लगता है यह
असामाजिक कार्य ही आतंक तथा देशद्रोह का कार्य करते है जिनके कुकृत्य करने से
सभी सामाजिक प्राणियों को परेशानियो का सामना करना पड़ता है जिससे समाज की
सभी व्यवस्थाएँ गड़बड़ा जाती है और उपद्रव तथा अशांति का वातावरण बन जाता है,
जिससे सभी सामाजिक, क्रियाकलापों पर प्रभाव पड़ता है तथा उससे सभी प्रकार की
गतिविधियॉ प्रभावित होती है और वह सब प्रगति में सहायक न होकर पिछड़ता चला
जाता है।

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