हिंदी की उपभाषाएँ

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अनुक्रम
भारत का उत्तर और मध्य देश बहुत समय पहले से हिंदी-क्षेत्र नाम से जाना जाता है। हिंदी-प्रयोग-क्षेत्र के
विस्तृत होने के कारण अध्ययन सुविधा के लिए उसे विविध वर्गो में विभक्त किया गया है। जॉर्ज इब्राहिम ग्रियर्सन
ने हिंदी के मुख्य दो उपवर्ग बनाए हैं – (1) पश्चिमी हिंदी, (2) पूर्वी हिंदी। उन्होंने बिहारी को अलग भाषा के
रूप में व्यवस्थित किया है।

हिंदी भाषा के ऐतिहासिक और स्त्रोत-आधार पर अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि अपभ्रंश की शौरसेनी, अर्धमागधी,
मागधी और खस शाखाओं से हिंदी का विकास विविध क्षेत्र में हुआ है। इसे मुख्यत: पाँच उपवर्गो में विभक्त
कर सकते हैं – पश्चिमी हिंदी, 2. पूर्वी हिंदी, 3. बिहारी हिंदी, 4. राजस्थानी हिंदी, 5. पहाड़ी हिंदी।

पश्चिमी हिंदी

इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। पश्चिमी हिंदी का क्षेत्र उत्तर भारत में मध्य भारत के कुछ
अंश तक फैला है। अर्थात् उत्तरांचल प्रदेश के हरिद्वार, हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश के कानपुर के पश्चिमी
भाग तक है। आगरा से लेकर मध्य क्षेत्र ग्वालियर और भोपाल तक है। क्षेत्र-विस्तार के कारण पश्चिमी
हिंदी में पर्याप्त विविधता दिखाई देती है। इसमें मुख्यत: पाँच बोलियों के रूप मिलते हैं।

कौरवी – 

प्राचीनकाल में इस क्षेत्र को कुरू प्रदेश कहते थे। इसी आधार पर इसका कौरवी नाम
पड़ा है। इसे पहले खड़ी-बोली नाम भी दिया जाता था। अब खड़ी-बोली हिंदी का पर्याय रूप है।
खड़ी-बोली नामकरण के विषय में कुछ विद्वानों का मत है कि खड़ापन (खरेपन) शुद्धता के आधार
पर है, तो कुछ भाषाविदों का कहना है कि खड़ी-पाई (आ की मात्रा ‘ा’) के प्रयोग (आना, खाना,
चलना, हँसना) आधार पर खड़ी-बोली नाम पड़ा है।

वर्तमान समय में इसका प्रयोग दिल्ली, मेरठ, मुजफ्फर नगर, रामपुर, बिजनौर, सहारनपुर (उ.प्र.) हरिद्वार,
देहरादून (उत्तरांचल), यमुना नगर, करनाल, पानीपत (हरियाणा का यमुना तटीय भाग) में होता है।

कौरवी की विशेषताएँ –

  1. क्रिया रूप अकारांत होता है; यथा – आना, खाना, दौड़ना, हँसना, फैलना और सींचना आदि।
  2. कर्ता परसर्ग ‘ने’ का प्रयोग स्पष्ट रूप में होता है। 
  3. कहीं-कहीं पर ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ ध्वनि का का प्रयोग मिलता है।
  4. इसमें तत्सम और तद्भव शब्दों की बहुलता है।
  5. अरबी और फारसी के शब्द यत्रा-तत्रा मिलते हैं।

वर्तमान हिंदी का स्वरूप इसी बोली को आधार मान कर विकसित हुआ है। हिंदी को राजभाषा, राष्ट्रभाषा और
जनभाषा का रूप देने में इस बोली की विशेष भूमिका है।

ब्रजभाषा – 

ब्रजभाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई है। हिंदी साहित्य के मध्यकाल अर्थात् भक्ति
और रीतिकाल में इस भाषा में पर्याप्त सहित्य रचा गया है। उस काल में अवधी और ब्रज में ही
मुख्यत: रचना होती थी। रीतिकाल ब्रजभाषा ही रचना की आधार भाषा थी। इसीलिए इसे हिंदी के
रूप में स्वीकृति मिली थी। विशेष महत्त्व मिलने के कारण ही ‘ब्रज बोली’ कहना अनुकूल नहीं लगता
वरन् ‘ब्रजभाषा’ कहना अच्छा लगता है।

इसका केन्द्र स्थल आगरा और मथुरा है। वैसे इसका प्रयोग अलीगढ़ और धौलपुर तक होता है।
हरियाणा के गुड़गाँव और फरीदाबाद के कुछ अंश और मध्य प्रदेश के भरतपुर और ग्वालियर के
कुछ भाग में ब्रज का प्रयोग होता है।

इसकी कुछ विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं –

  1. पद-रचना में ओकार और औकार बहुला रूप है; जैसे –
  2. खाया झ खायौ झ गया झ गयो या गयौ।
  3. बहुवचन में ‘न’ का प्रयोग होता है; यथा – लोग > लागन; बात > बातन।
  4. ‘उ’ विपर्यय रूप मिलता है; जैसे – कुछ झ कछु।
  5. संबंध कारकों के विशेष रूप मिलते हैं –
  6. मेरो, तेरो, हमारो, तिहारो, आदि।
  7. तद्भव शब्दों की बहुलता है।
  8. वर्तमान समय में अरबी, फारसी के साथ अंग्रेजी शब्द भी प्रयुक्त होते हैं।
    इसके प्रमुख कवि हैं – सूरदास, नन्ददास, कृष्णदास, केशव, बिहारी, भूषण और रसखान आदि।
    हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में ब्रज की बलवती भूमिका रही है।

हरियाणवी –

 इसे बाँगारू या हरियानी नाम भी दिया जाता है। किन्तु जब हरियाणवी ही सर्वप्रचलित
और मान्य हो गया है। हरियाणा प्रदेश का उद्भव और नामकरण बोली के आधार पर हुआ है।
हरियाणवी हरियाणा के सभी जिलों में बोली जाती हैं। हरियाणवी और कौरवी में पर्याप्त समानता
है। हरियाणा की सीमा उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान से लगी हुई है। इस प्रकार
इसके सीमावर्ती क्षेत्रों में निकट की बोली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इस प्रभाव के साथ हरियाणवी
विशेष चर्चा हेतु इसे सात उपवर्गो में विभक्त कर सकते हैं।

  1. केन्द्रीय हरियाणवी – इसका केन्द्र रोहतक है। सामान्य उदाहरण देने हेतु प्राय: इसी रूप का
    उल्लेख किया जाता है। ‘णकार’ बहुला रूप होने के कारण ‘न’ के स्थान पर प्राय: ‘ण’ का
    प्रयोग किया जाता है। ‘ल’ के स्थान पर ‘ळ’ विशेष ध्वनि सुनाई देती है; यथा – बालक झ बाळक
    क्रिया ‘है’ के स्थान पर ‘सै’ का प्रयोग होता है।
  2. ब्रज हरियाणवी – फरीदाबाद और मथुरा के मध्य के हरियाणा के क्षेत्र में इसका प्रयोग होता
    है। ब्रज का रंग स्पष्ट दिखाई देता है। इसमें ‘ओ’ ध्वनियों की बहुलता है; यथा- खायौ, खायो:
    गयो, गयो; नाच्यो, नाच्यौ आदि। ‘ल’ के स्थान पर ‘र’ का प्रयोग मिलता है – काला झ कारा, बिजली झ बिजुरी आदि। 
  3. मेवाती हरियाणवी – मेव क्षेत्र के आधार पर इसका नाम मेवाती पड़ा है। इसका केन्द्र रेवाड़ी
    है। इसमें झज्जर, गुड़गाँव, बावल और नूह का क्षेत्र आता है। इसमें, हरियाणवी, ब्रज और राजस्थानी
    का प्रभाव दिखाई देता है। इसमें ‘ण’ और ‘ल’ ध्वनि की बहुलता है।
  4. अहीरवाटी हरियाणवी – रेवाड़ी और महेन्द्रगढ़ का क्षेत्र अहीरवाल है। इसी आधार पर इसका
    नामकरण हुआ हैं। नारनौल से कोसली तक इसका स्वरूप मिलता है। इसमें मेवाती, राजस्थानी
    (बागड़ी) का प्रभाव दिखाई देता है। इसमें ओकार बहुल रूप मिलता है; यथा- था झथो। 
  5. बागड़ी़ हरियाणवी – इसका क्षेत्र हिसार और सिरसा है। भिवानी जिले का पर्याप्त क्षेत्र इस
    बोली के अन्तर्गत आता है। इसे केन्द्रीय हरियाणी और राजस्थान (बागड़ी) का मिश्रित और विकसित
    रूप मान सकते है। बहुवचन रचन में आँ’ प्रत्यय का योग मिलता है; यथा- बात झबाताँ। लोप
    का बहुल रूप सामने आता है; जैसे-अहीर झ हीर, अनाज ठाना , नाज, उठाना।
  6. कौरवी हरियाणवी – कौरवी क्षेत्र से जुड़ें हरियाणा के भाग में इस उपबोली का रूप मिलता
    है। यमुना नगर, कुरूक्षेत्र, करनाल और पानीपत के कुछ भाग में इसका प्रयोग होता हैं। आकारांत
    शब्दों का बहुल प्रयोग मिलता है; यथा- खाना, धोना, सोना आदि।
  7. अबदालवी हरियाणवी- अम्बाला इसका मुख्य केन्द्र है। इस उपबोली पर पंजाबी भाषा का स्पष्ट
    प्रमुख दिखाई देता है। इसमें महाप्राण ध्वनि अल्पप्राण हो जाती है- हाथ झ हात, साथ झसात।
    लोप की बहुलता भी दिखाई देती है- कृपया झकृप्या, मिनट झ मिन्ट।

कन्नौजी – 

कन्नौजी नामकरण कन्नौज क्षेत्र के नाम से हुआ हैं। इसका प्रयोग फर्रूखाबाद, हरदोई,
शाहजहाँपुर, पीलीभीत हैं इटावा और कानपुर के पश्चिमी भाग में भी इसका प्रयोग होता है। इसका
क्षेत्र अवधी और ब्रज के मध्य है। इस पर ब्रज का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।

बुंदेली – 

बुंदेलखंड में बोली जाने के कारण इसे बुंदेली बोली की संज्ञा दी गयी हैं इसके प्रयोग
क्षेत्र में झांसी, छतरपुर ग्वालियर, भोपाल, जालौन का भाग आता है। इसमें और ब्रज बोली में पर्याप्त
समानता है।

पूर्वी हिंदी

पूर्वी हिंदी का उद्भव अर्धमागधी अपभ्रंश से हुआ है। पश्चिमी हिंदी के पूर्व में स्थित होने के कारण इसे
पूर्वी हिंदी नाम दिया गया है। इसका प्रयोग प्राचीन कोशल राज्य के उत्तरी-दक्षिणी क्षेत्र में होता है। वर्तमान
समय में इसे उत्तर प्रदेश के कानपुर, लखनऊ, गोंडा, बहराइच, फैजाबाद, जौनपुर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़,
मिर्जापुर, इलाहाबाद, मध्य प्रदेश के जबलपुर, रीवाँ आदि जिलों से संबंधित मान सकते हैं। यह इकार,
उकार बहुल रूप वाली उपभाषा है। इसमें तीन बोलियाँ हैं – अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।

अवधी –

‘अबध’ क्षेत्र में प्रयुक्त होने के कारण इसे ‘अवधी’ नाम से अभिहित किया गया है। इसका
प्रयोग गोंडा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, रायबरेली, बाराबंकी, इलाहाबाद, लखनऊ, जौनपुर आदि जिलों में
होता है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. इसमें ‘श’ के स्थान पर ‘स’ का प्रयोग होता है- शंकर > संकर, शाम > साम आदि।
  2. इसमें ‘व’ ध्वनि प्राय: ‘ब’ के रूप में प्रयुक्त होती है; जैसे वन > बन, वाहन > बाहन आदि।
    3ण् ‘इ’ और ‘उ’ स्वरों का बहुल प्रयोग होता है। इ आगम-स्कूल > इस्कूल, स्त्री > इस्त्री उ आगम-सूर्य > सूरज > सूरूजु
  3. ‘ण’ ध्वनि के स्थान पर प्राय: ‘न’ का प्रयोग होता है।
  4. ऋ के स्थान पर ‘रि’ का उच्चारण प्रयोग होता है।

भक्तिकाल में समृठ्ठ साहित्य की रचना हुई है। तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानव’ और जायसी
कृत ‘पद्मावत’ महाकाव्यों की रचना अवधी में हुई है। सूफी काव्य-धारा के सभी कवियों ने
अवधी भाषा को ही अपनाया। समृठ्ठ लोक-साहित्य मिलता है।

बघेली – 

इस बोली का केन्द्र रीवाँ हैं। मध्य प्रदेश के दमोह, जबलपुर, बालाघाट में और उत्तर प्रदेश
के मिर्जापुर में कुछ अंश तक बघेली का प्रयोग होता है। इस क्षेत्र पर अवधी का विशेष प्रभाव
दिखाई देता है। कुछ विद्वानों ने बघेली को स्वतंत्रा बोली न कह कर अवधी का दक्षिणी रूप कहा
है। इसमें अवधी की भांति ‘व’ ध्वनि ‘ब’ के रूप मे प्रयुक्त होती है।

छत्तीसगढ़ –

 ‘छत्तीसगढ़’ क्षेत्र से संबंधित होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ी बोली नाम दिया गया है।
वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ प्रदेश के रायपुर, बिलासपुर क्षेत्र में इसका प्रयोग होता है।
इसमें कहीं-कहीं पर ‘स’ ध्वनि ‘छ’ हो जाती है।अल्पप्राण ध्वनियों के महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति विशेष रूप से मिलती है।
समृठ्ठ लोक-साहित्य मिलता है।

बिहारी हिंदी

बिहार प्रदेश में प्रयुक्त होने के आधार पर इसे बिहारी नाम दिया गया है। इसका उद्भव मागधी अपभ्रंश
भाषा से हुआ है। ग्रियर्सन ने आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बर्गीकरण में बिहारी को हिंदी से अलग
वर्ग में व्यवस्थित किया है। ये भाषाएँ आकार बहुल हैं।
बहुवचन बनाने हेतु नि या न का प्रयोग होता है; यथा- लोग > लागनि, लोगन
सर्वमान के विशेष रूप प्रयुक्त होते हैं- तोहनी हमनी आदि।
बिहारी की अनेक प्रवृत्तियाँ पूर्वी हिंदी के समान मिलती हैं –
इससे मुख्यत: तीन बोली भागो में विभक्त करते है।

भोजपुुरी – 

भोजपुरी निश्चय ही बिहारी हिंदी का सबसे विस्तृत क्षेत्र में पयुक्त रूप है। भोजपुर बिहार
का एक चर्चित स्थान है। इसी के नाम पर इसे भोजपुरी कहते हैं। इसका केन्द्र बनारस है। भोजपुरी
का प्रयोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, बनारस, आजमगढ़, देवरिया, गोरखपुर जिलों में पूर्ण या
आशिंक रूप में और बिहार के छपरा, चम्पारन तथा सारन में प्रयोग होता है। इस भाषा में अवधी
की कुछ प्रवृत्तियाँ मिलती हैं।

इसमें ‘र’ ध्वनि का प्राय: लाप हो जाता है; यथा- लरिका झलरका ( लड़का), करया झकइया (काला)
‘ल’ की ध्वनि की प्रबलता दिखाई देती है; जैसे खाइल्, चलल, पाइल आदि।
इकार और उकार बहुल रूप में मिलता है।

समृठ्ठ लोक-साहित्य मिलता है।

मैथिली – 

मिथिला क्षेत्र की भाषा होने के कारण इसे ‘मैथिली’ नाम दिया गया है। इसका प्रयोग
दरभंगा, सहरसा, मुजफ्फरनगर, मुंगेर और भागलपुर में होता है।
इसमें शब्द स्वरांत होते है।

इसमें संयुक्त स्वरों (ए, ऐ, ओ, औ) के दीर्घ स्वर के साथ हृस्व रूप भी प्रयुक्त होता है।
इसमें सहायक क्रियाओं के विशेष रूप मिलते हैं; यथा- छथि, छल आदि।
इ, उ बहुला रूप अवधी के ही समान हैं।

मैथिली साहित्य में तत्सम शब्दाबली का आकर्षक प्रयोग साहित्यकारों के संस्कृत ज्ञान का परिचायक है।
इसमें समृठ्ठ लोक-साहित्य और आकर्षक साहित्य रचा गया है। मैथिल कोकिल विद्यापति मैथिली भाषा
को अपनाने वाले सुनाम धन्य कवि हैं।

मगही – 

‘मागधी’ अपभ्रंश से विकसित होने और ‘मगध’ क्षेत्र में प्रयुक्त होने के आधार पर इसके
नाम की इसके स्वरूप और भोजपुरी के स्वरूप में बहुत कुछ समानता है।
इसमें सहायक ‘हल्’ से हकी, हथी, हलखिन आदि का रूप प्रयुक्त होते है।
कारक-चिह्नों में सामान्य के साथ अतिरिक्त चिह्न भी प्रयुक्त होते है; यथा- संप्रदान-ला, लेन, आधकरण-मों।
शब्दों में तद्भव या बहुल तद्भव रूप मिलते है; यथा- बच्चे के लिए ‘बुतरू’ का प्रयोग।
उच्चारण में अनुनासिक बहुल रूप है।

राजस्थानी हिंदी

राजस्थानी प्रदेश के नाम पर विकसित हिंदी को यह नाम मिला है। इसका उदगम शौरसेनी अपभ्रंश से
हुआ है। इसके प्रारंभिक रूप में डिंगल का प्रबल प्रभाव रहा है। इसकी कुछ प्रवृत्तियाँ ब्रजभाषा के समान
हैं।

इसमें टवर्गीय ध्वनियों की प्रधानता होती है; यथा- ड, ड़, ण, ळ।
महाप्राण ध्वनियों का अल्पप्राणीकरण होने की भी प्रवृत्ति है।
बहुबचन परिवर्तन में मुख्यत: ‘आँ’ का प्रयोग होता है।
तद्भव शब्दावली का प्रबल रूप मिलता है।
राजस्थानी में एक ओर वीर रस की ओजप्रधान रचनाएँ मिलती हेै, तो श्रंगार रासो, दूहा काव्य-ग्रंथो की
रचना हुई है। इसमें समृठ्ठ साहित्य और लोक-साहित्य सृजन क्रम चल रहा है।

राजस्थानी में चार प्रमुख बोलियों के रूप मिलते हैं- मेवाती, जयपुरी, मारबाड़ी और मालवी।

मेवाती –

मेव जाति के नाम पर इस बोली का नाम ‘मेवाती’ रखा गया है। इसका प्रयोग राजस्थान
के अलवर और भरतपुर के उत्तर-पश्चिम भाग में होता है। हरियाणा के गुड़गाँव के कुछ भाग में
भी इस बोली का रूप देखा जा सकता है। ब्रज क्षेत्र से लगा होने के कारण इस पर ब्रज का
प्रभाव होना स्वाभाविक है। मेवती में समृठ्ठ लोक-साहित्य है।

जयपुरी –

इस बोली का केन्द्र जयपुर है, इसलिए इसे जयपुरी नाम दिया गया है। इसका प्रयोग
पूर्वी राजस्थान, जयपुर, कोटा और बँूदी में होता है। इस बोली पर ब्रज का प्रभाव दिखाई देता
है। परसर्गो में कर्म-संप्रदान-नै, कै; करण-अपादान-सूं, सौ; अधिकरण-मै, मालैं विशेष रूप से उल्लेखनीय
हैं। इसमें समृठ्ठ लोक-साहित्य मिलता है।

मारबाड़ी़ – 

इस बोली को ‘मेबाड़’ क्षेत्र के नाम पर ‘मेबाड़ी’ कहा गया है। राजस्थान के पश्चिमी भाग
में प्रयुक्त प्रयुक्त होने के कारण इसे पश्चिमी राजस्थान नाम भी दिया जाता है। इसका मुख्य क्षेत्र जोधपुर
है। पुरानी मारवाड़ी डिंगल कहते थे। मारवाड़ी व्यवसाय की दृष्टि से राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिठ्ठ कवि नरपति
नाल्ह, चन्दबरदाई इसी से संबंधित रहे हैं। मीराबाई की रचनाओं में यह रूप देख सकते हैैं।
इसमे ‘स’ ध्वनि ‘श’ हो जाती है।
अनुनासिक ध्वनि का बहुल प्रयोग।
तद्भव शब्दावली का बहुल रूप है।

मालवी- 

मालवा क्षेत्र से संबंधित होने के आधार पर इसे मालवी नाम मिलता है। राजस्थान के दक्षिण
में प्रयुक्त होने से दक्षिण नाम भी दिया जाता था। इसके प्रयोग क्षेत्र में उज्जैन, इन्दौर और रतलाम
आते हैं।
हिन्दी और उसका विकास
इसमें ‘ड़’ ध्वनि का विशेष प्रयोग होता है।
इसमें ‘ण’ ध्वनि नहीं हेै।

विभिन्न ध्वनियों का अनुनासिक रूप सामने आता है। इसमें समृठ्ठ लोक-साहित्य मिलता है।

पहाड़ी़ हिंदी

पहाड़ी हिंदी का उद्भव ‘खास’ अपभ्रंश से हुआ है। पहाड़ी क्षेत्र में यातायात की शिथिलता के कारण
भाषा में विविधता का होना निश्चित रहा। अध्ययन सुविधा के लिए इसे तीन उपवर्ग में विभक्त किया जाता
है – पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी, पूर्वी पहाड़ी।

पश्चिमी पहाड़ी़- 

इसका केन्द्र शिमला है। इसमें चंबाली, कुल्लई, क्योंथली आदि मुख्य बोलियाँ आती
है। यहाँ की बोलियों की संख्या तीस से अधिक है। ये मुख्यत: टाकरी या टक्करी लिपि में लिखी
जाती हैं। यहाँ हिंदी का मूलरूप हिंदी में ही मिलता है।

मध्य पहाड़ी़- 

नेपाल पूर्वी पहाड़ी का केन्द्र है। नेपाली, गुरखाली, पर्वतिया और खसपुरा नाम भी दिए
जाते है। इसमें समृठ्ठ लोक-साहित्य और संक्षिप्त-साहित्य भी मिलता है। नेपाल के संरक्षण मिलने
के आधार पर इसका साहित्यिक रूप में विकास हो रहा है। इसकी लिपि नागरी है।

दक्खिनी हिंदी

दक्खिनी शब्द दक्षिण का तद्भव शब्द है। आर्यो का आगमन जब सिंध, पंजाब प्रांत में हुआ, तो यह भाग
दाहिने हाथ की ओर था, उसे दक्षिण कहा गया है। हिंदी साहित्य के इतिहास पर प्राचीनकाल से यदि
विचार करें, तो भारत में प्रचलित विभिन्न लिपियों में हिंदी साहित्य मिलता है। गुजराज और महाराष्ट्र में
हिंदी का प्रयोग हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र के समान ही होता रहा है। मध्य युग में, हिंदी दक्षिण के प्रांतो
में आर्कषक रूप में प्रयुक्त होती थी।

अकबर के समय में दक्खिन क्षेत्र में मालवा, बरार, खानदेश, औरंगाबाद, हैदराबाद, मुहम्मदाबाद और बीजापुर
आ गए हैं। इस प्रकार दक्खिन क्षेत्र में प्रयुक्त होने के कारण इसे दक्खिनी हिंदी नाम दिया गया है।

उद्भव-विकास :
चौदहवीं शताब्दी में दिल्ली का शासक मुहम्मद-बिन-तुगलग था। उन्होंने दक्षिण की शासन
व्यवस्था को अनुकूल रूप देने के लिए अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद करने का निर्णय लिया।
मुहम्मद-बिन-तुगलक के जाने से पूर्व निजामुद्दीन चिश्ती ने 400 सूफी पहले ही दक्षिण भेज दिए थे। तुगलक
अपने साथ सूफी फकीर भी ले गया। वहाँ शासन व्यवस्था अनुकूल होने पर राजधानी को पुन: दौलताबाद
से दिल्ली लाने का निर्णय लिया। उस समय आज की तरह-यातायात सुविधा न थी। इस प्रकार अनेक
सूफी-संत और सिपाही वहाँ से लौटे ही नहीं। इस निर्णय से तुगलक को ‘पागल’ की उपाधि उवश्य मिली,
किन्तु इससे दर्क्षिण में प्रभावी प्रचार हुआ। दिल्ली से जाने वालों की भाषा खड़ी-बोली, ब्रज, अवधी, पंजावी
आदि के मिश्रित के रूप में थी। वहाँ हिंदी का प्रचार होता गया। अलाउद्दीन खिलजी, अकबर, जहाँगीर,
शाहजहाँ और औरंगजेब के समय तक दक्खिनी हिंन्दी विकसित होती गई है। दक्खिनी भाषा के स्वरूप
के विषय में डॉ. परमानंद पांचाल का कथन इस प्रकार है – ‘‘दक्खिनी हिंदी  का वह रूप है, जिसका विकास 14 वीं सदी से अठारहवीं सदी तक दक्षिण के बहमनी,
कुतुबशाही और आदिलशाही आदि राज्यों के सुलतानों के संरक्षण में हुआ था। यह मूलत: दिल्ली के आसपास
की हरियाणवी एवं खड़ी-बोली ही थी, जिस पर ब्रज, अवधी और पंजाबी के साथ मराठी, सिंधी, गुजराती
और दक्षिण की सहवर्ती भाषाओं अर्थात तेलगु, कन्नड़ और पूर्तगाली आदि का भी प्रभाव पड़ा था और
इसने अरबी, फारसी, तुर्की तथा मलयालम आदि भाषाओं के शब्द भी प्रचुर मात्रा में ग्रहण किये थे। इसके
लेखक और कवि प्राय: इस्लाम के अनुयायी थे। इसे एक प्रकार से सबसे मिश्रित भाषा कहा जा सकता
है।’’ डा. श्रीराम शर्मा के अनुसार, बरार, हैदराबाद, महाराष्ट्र और मैसूर में ही दक्खिनी हिंदी भाषा का
उद्भव विकास हुआ है।
इसमें अव्यय शब्द ‘और’ के स्थान पर ‘होर’ का प्रयोग होता है।

नकारात्मक शब्द ‘नही’ के लिए ‘नक्को’ का प्रयोग होता है।

विविध भारतीय भाषाओं के तत्सम और तत्सम शब्दों के साथ अरबी, फारसी शब्दों का प्रभावी प्रयोग मिलता
है। शब्द रूप में पर्याप्त विधिता मिलती है; यथा- एक झयेक, यकी, यक्की, इक आदि
दक्खिनी हिंदी का भाषायी स्वरूप, भक्ति का तीन संत काव्य की भाषा से बहुत कुछ मेल खाता है-

‘‘वे अरबी बोल न जाने,,
न फारसी पछाने
यूँ देखत हिंदी बोल
पन मानी है नफ्तोल’’
– मीराँजी शम्सुल उश्शाक्
‘‘ऐब न राखे हिंदी बोल,
माने तो चख देख घंडोल।’’
– शेख बुराहानुददीन जानम
‘‘तुलना-
‘‘लूंचत मूंडत फिर फोकट तीरथ करे या हज।
थान देख जे भान भई मूरख भज।।’’
– मीरँजी शम्सुल उश्शाक
‘‘मूड़ मड़ाइ हरि मिले, तो सब कोउ लेठ मुड़ाय।
बार-बार के मूड़ते भेड़ न बैकुंठ जाय।।’’
– कबीर

दक्खिनी हिंदी में समृठ्ठ साहित्य है। इसके कुछ प्रतिनिधि साहित्यकार हैं-
उश्शक्, शेख बुराहानुददीन जानम, काजी महमूद बहरी, गुलाम अली, और मुहम्मद अमीन आदि।
निश्चय ही दक्खिनी हिंदी में हिंदी भाषा का एक विशेष स्वरूप है और इसमें समृठ्ठ साहित्य है। इसलिए हिंदी
भाषा और हिंदी साहित्य के इतिहास में दक्खिनी हिंदी का महत्व स्वत: सिठ्ठ है।

पश्चिमी और पूर्वी हिंदी की तुलना

हिंदी भाषा के विभिन्न छ: भागों-पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी, राजस्थानी हिंदी, पहाड़ी हिंदी और दक्खिनी
हिंदी में पूर्वी और पश्चिमी हिंदी का विशेष महत्व है। हिंदी भाषा के मध्य युग में इन्ही दो वर्गो की अवधी और ब्रज
दो बोलियों को हिंदी के रूप में मान्यता मिली थीं। इसी में काव्य-रचना होती रही है। भक्तिकाल में अवधि और
ब्रज दोनों भाषाओं को काव्य-सृजन में अपनाई जाती रही हैं और रीतिकाल में ब्रजभाषा प्रयुक्त होती थी। तुलसीदास
ने ‘रामचरित मानस’ महाकाव्य की रचना अवधी में की है। जायसी ने ‘पदमावत’ की रचना ठेठ अवधि में की है।
‘प्रमाश्रयी काव्य’ अवधी में ही लिखा गया है। भक्ति काल के समस्त अष्टछाप कवियों ने ब्रजभाषा को अपनाया है,
तो रीतिकाल के केशव, घनानन्द, बिहारी आदि कवियों ने ब्रजभाषा को ही अपनाया है।

तुलनात्मक अध्ययन

  1. पश्चिमी हिंदी की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई, तो पूर्वी हिंदी का उद्भव अर्थ-मागधी से हुआ।
  2. पश्चिमी हिंदी की पाँच प्रमुख बोलियाँ हैं-कौरवी, हरियाणवी, ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली। पूर्वी हिंदी की तीन
    प्रमुख बोलियाँ है – अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
  3. पश्चिमी हिंदी निकटवर्ती भाषा पंजाबी से यत्रा-तत्रा प्रभावित लगती है और पूर्वी हिंदी में बिहारी हिंदी से
    पर्याप्त समानता मिलती है।
  4. पूर्वी हिंदी में ‘इ’ और ‘उ’ का बहुल रूप में प्रयुक्त पश्चिमी हिंदी में ‘ई’ और ‘ऊ’ के प्रयोग की प्रमुखता है। 
  5. पश्चिमी हिंदी में संयुक्त स्वरों का स्वतंत्र रूप में उच्चारण होता है, यथा- बालक झ बालक किन्तु पूर्वी
    हिंदी में पूर्ववत रहती है।
  6. पूर्वी हिंदी में संयुक्त स्वरों का स्वतंत्र रूप में उच्चारण होता है, यथा-और झ क अउर ऐनक झ अइनक।
    पश्चिमी हिंदी में संयुक्त स्वर का बहुल रूप में प्रयोग होता है।
  7. पूर्वी हिंदी में ‘ल’ के स्थान पर यदा-कदा ‘र’ का प्रयोग होता है, यथा-केला झ केरा, फर झ फल आदि।
    पश्चिमी हिंदी में ‘ल’ का प्रयोग होता है।
  8. पूर्वी हिंदी में ‘श’ ध्वनि प्राय: ‘स’ के रूप में प्रयुक्त होती है, यथा-शंकर झ संकर, शेर झ सेर। पश्चिमी
    हिंदी में प्राय: मूल रूप प्रयुक्त होता है।
  9. पूर्वी हिंदी में ‘व’ ध्वनि प्राय: ‘ब’ के रूप में प्रयुक्त होता है; यथा-वन झ बन, आशर्वाद झ आसीर्वाद आदि।
    पश्चिमी हिंदी में प्राय: मूल रूप प्रयुक्त होता है।
  10. पूर्वी हिंदी में कारक-चिह्न ‘ने’ का प्रयोग विरल रूप में होता है, जबकि पश्चिमी हिंदी का मुख्य चिह्न है। 
  11. पूर्वी हिंदी में उत्तम पुरुष सर्वनाम में एकवचन के लिए ‘हम’ और बहुवचन के लिए ‘हम’ या ‘हम सब’
    प्रयुक्त होते हैैं। जबकि पश्चिमी हिंदी में प्राय: एकवचन के लिए ‘मैं’ और बहुवचन के लिए ‘हम’ का प्रयोग
    होता है।
  12. पूर्वी हिंदी में क्रिया के साथ यत्रा-तत्रा ‘ब’ का प्रयोग होता है-चलब, करब आदि तो पश्चिमी हिंदी (ब्रज)
    में ओकार रूप सामने आता है – चलना झ चलनों, करना झ करनो। 
  13. क्रिया के भविष्यत् काल के रूप निर्धारण में ग, गी, गे के प्रयोग पश्चिमी हिंदी में मिलते हैं, किन्तु पूर्वी
    हिंदी में रूप-विविधता है।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि हिंदी की प्रमुख उपभाषाओं-पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ
की शब्द-संपदा में बहुत कुछ समानता है, वहीं उनकी ध्वन्यात्मक, शब्द-संरचनागत और व्याकरण आधार पर
पर्याप्त भिन्नता है। यह भिन्नता ही संबंधित बोलियो की अपनी विशेषताएँ हैं। हिंदी की इन दोनों उप-भाषाओं
और उनकी बोलियों का महत्त्व स्वत: सिद्ध है।

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