लॉर्ड मैकाले कौन था ? मैकॉले का विवरण पत्र (Minute)

लॉर्ड मैकॉले (Lord Macaulay) एक सुयोग्य शिक्षाशास्त्री, राजनीतिज्ञ एवं कुशल प्रशासक था। वह अंग्रेजी साहित्य का प्रकाण्ड विद्वान था। वह ओजस्वी लेखक एवं वक्ता भी था। उसने 10 जून, 1834 को गर्वनर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सदस्य (Legal Advisor) के रूप में कार्य करना प्रारम्भ किया था। वह ऐसे समय में भारत में इस दायित्व, को ग्रहण करने आया था, जबकि सम्पूर्ण अंग्रेज जाति अपने पराभव पर थी। वे अपने साहित्य, संस्कृति का आधिपत्य विश्व के अधिकांश भागों में जमा चुके थे। लॉर्ड मॅकॉले इन सभी महत्त्वाकांशी गुणों से परिपूर्ण था। उस समय के गवर्नर जनरल विलियम बैन्टिक ने उसकी योग्यताओं से प्रभावित होकर उसे लोक शिक्षा समिति (Committee of Public Education Institution) का सभापति (Chairman) नियुक्त कर दिया और इसी समय उसे 1813 के आज्ञा-पत्र के प्राच्य-पाश्चात्य विवाद तथा स्वीकृत एक लाख रूपये की धनराशि को व्यय करने हेतु ‘कानूनी सलाह’ देने का महत्त्वपूर्ण कार्य दिया। इसी समस्या के कानूनी सलाह के लिए 2 फरवरी, 1835 को मैकॉले ने अपना विस्तृत विवरण-पत्र (Minute) प्रस्तुत किया। जिसने भारत में आधुनिक ब्रिटिश शिक्षा की अजस्त्र धारा प्रवाहित की तथा भारतीय शिक्षा में ब्रिटिश शिक्षा को स्थापित किया।

मैकाले मिनट क्या है ?

सन् 1813 के चार्टर एक्ट की 43वीं धारा में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण किया गया और भारतीय शिक्षा की व्यवस्था के लिए दस हजार पौण्ड अर्थात् एक लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई। इस एक्ट में भारतीय शिक्षा की नीति का निर्धारण करते समय केवल उद्देश्यों का ही उल्लेख किया गया था। इन उद्देश्यों में प्रमुखतः ‘साहित्य का पुनरुत्थान एवं विकास’, ‘विद्वान भारतीयों को प्रोत्साहन’, ‘अंग्रेजी हुकूमत के अधीनस्थ भारतीयों में विज्ञान का प्रसार’ का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था। परन्तु चार्टर एक्ट में इन उद्देश्यों की पूर्ति के हेतु कौन से प्रयास या किन विधियों का अवलम्बन करना चाहिए, इसकी ओर कोई संकेत न था। परिणामतः सन् 1813 के चार्टर एक्ट के पारित होने के पश्चात् लगभग 40 वर्ष तक यह एक तीव्र मतभेद का विषय बना रहा। इस विवादास्पद विषय के चार पहलू थे- (1) भारतीय शिक्षा के उद्देश्य क्या होने चाहिए? (2) शिक्षा देने वाली संस्थाओं का संगठन किन साधनों द्वारा होना चाहिए? (3) सामान्य जनता में शिक्षा का प्रसार करने के लिए किन विधियों का अवलम्बन करना चाहिए? और (4) शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए?

शिक्षा उद्देश्य का मतभेद एक्ट में दर्शाये गये विभिन्न उद्देश्यों में से किस उद्देश्य पर कितना जोर दिया जाना चाहिये - इस सम्बन्ध में था किन्तु उसमें तीव्रता न थी। कुछ लोगों की राय में भारतीय शिक्षा का उद्देश्य-प्रमुखतः भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को सुरक्षित रखना तथा उसका प्रसार करना था, तो कुछ लोगांे के मत में भारत में पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञान का प्रसार करना- शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य था, कुछ अन्य लोगों का कहना था कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य-भारतीयों को कम्पनी की नौकरी के योग्य बनाने तक ही सीमित रखना चाहिए।

कुछ लोगों की राय में शिक्षा-व्यवस्था करने का कार्य मिशनरी लोगों के जिम्मे छोड़ देना अधिक उचित माना जाता था। कुछ लोग इस सुझाव पर धार्मिक निष्पक्षता एवं राजनैतिक औचित्य की दृष्टि से आक्षेप करते हुए, भारतीय संस्कृति का पक्ष लेने वाली देशीय संस्थाओं द्वारा संचालित शालाओं में ही शिक्षा देने के पक्ष में थे। कुछ अन्य लोगों के मत में भारतीयों द्वारा संचालित शालायें अव्यवस्थित होने के कारण कम्पनी के द्वारा संचालित नई शालाओं में ही शिक्षा दिया जाना उचित समझा था।

एक पक्ष का मत था कि शिक्षा का प्रसार ऊपरी स्तर से नीचे के स्तर की ओर होना चाहिए। अतः कम्पनी केवल कुछ उच्च स्तर के लोगों को ही शिक्षित करने का प्रयास करे तथा जन-साधारण की शिक्षा का कार्य इन उच्च-स्तरीय शिक्षित लोगों के जिम्मे छोड़ दिया जाये। इसके विपरीत, कुछ लोगों का मत था कि शिक्षा के प्रसार का यह ‘स्यंदन सिद्धान्त’ (फिल्टेªशन थ्योरी) उस समय में भारत के लिए उपयुक्त न था। अतः जनसाधानण की शिक्षा का कार्य कम्पनी स्वयं प्रत्यक्ष रूप से अपने हाथ में ले।

परन्तु सबसे अधिक एवं तीव्र मतभेद का विषय तो शिक्षा के माध्यम का था। इस सम्बन्ध में तीन मत प्रतिपादित किये जाते थे। पहला था कम्पनी के अनुभवी एवं पुराने अफसरों का मत, जो वारेन हेस्टिंग्ज तथा मिन्टो द्वार समर्थित शिक्षा की नीति थी। इसके अनुसार संस्कृत एवं अरबी के अध्ययन को प्रोत्साहन देना श्रेयस्कर था और इन्हीं भाषाओं के माध्यम से पाश्चात्य विज्ञान का प्रसार करना भी उचित था। दूसरा मुनरो एवं एलफिन्सटन द्वारा प्रतिपादित पक्ष वालों का मत था, जो अर्वाचीन भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाना अधिक औचित्यपूर्ण समझता था। तीसरे पक्ष के लोग पाश्चात्य विज्ञान का प्रसार अंग्रेजी भाषा के माध्यम द्वारा करने पर जोर देते थे।

इस प्रकार के मतभेद न केवल सामान्य भारतीयों में या कम्पनी के अफसरों में थे, किन्तु सन् 1823 ई. में बंगाल के गवर्नर जनरल द्वारा नियुक्त की गई लोक शिक्षण की सामान्य समिति के सदस्यों में भी तीव्र रूप से विद्यमान थे। इस समिति में 10 सदस्य थे, जिनमें से पाँच सदस्य, जिनका नेतृत्व श्री एच. टी. प्रिन्सेप, जो कि बंगाल सरकार के शिक्षा-विभाग के सचिव थे, कर रहे थे। वे भारतीय साहित्य और भाषाओं के प्रसार के पक्ष में थे। इस पक्ष को ‘प्राच्यवादी’ (ओरिएण्टलिस्ट) पक्ष कहा जाता था। शेष पाँच सदस्य भारत में अंग्रेजी माध्यम द्वारा पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञान के प्रसार के पक्ष में थे। इन्हें ‘पाश्चात्यवादी’ (एंग्लिसिस्ट) पक्ष कहते थे। इसी पक्ष के एक प्रबल नेता थे राजा राममोहन राय। विधि की विडम्बना देखिए कि प्राच्य ज्ञान का समर्थन अंग्रेज कर रहे थे और पाश्चात्य ज्ञान का समर्थन एक भारतीय कर रहा था।

सन् 1834 ई. में मैकाॅले ने जब इस समिति के सभापतित्व का भार सम्हाला उस समय ये मतभेद बड़े तीव्र रूप में थे। परिणामतः समिति के कार्य का सुचारू रूप से संचालन करना बड़ा कठिन हो गया था। ऐसी परिस्थिति में दोनांे पक्षों ने अपने-अपने पक्ष का समर्थन करने वाले विचार गवर्नर जनरल के समक्ष निर्णय देने के लिए प्रस्तुत करने का निश्चय किया। यद्यपि मैकाॅले ने समिति की बैठकों में किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं किया, फिर भी गवर्नर जनरल के सामने निर्णयार्थ भेजे जाने वाले कागजातों पर टिप्पणी ‘मैकाॅलेज मिनिट’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह 2 फरवरी, सन् 1835 को लिखा गया था और भारतीय शिक्षा की नीति-निर्धारण की दृष्टि से भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लेख माना जाता है।

मैकॉले का विवरण पत्र

मैकॉले का विवरण-पत्र 1813 के आज्ञा-पत्र के सन्दर्भ में 43वीं धारा की विवेचना एवं व्याख्या इस रूप में प्रस्तुत करता है-
  1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी शिक्षा के लिए केवल एक लाख रुपया सालाना व्यय करने के लिए तो बाध्य है, किन्तु इस धनराशि को वह किस आधार पर व्यय करेगी यह उसकी स्वेच्छा पर निर्भर है।
  2. 1813 के आज्ञा-पत्र (Charter) में जो कथन साहित्य के पुनर्जीवन तथा परिमार्जन (Improvement and revival of literature) के लिए प्रयुक्त किया गया है, उस ‘साहित्य’ का तात्पर्य केवल अरबी अथवा संस्कृत से नहीं है, उसमें ‘अंग्रेजी’ साहित्य को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  3. तीसरा महत्त्वपूर्ण पद जो इस आज्ञा-पत्र में दिया गया है वह है-
  4. भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन (The encouragement of learned Natives of India)यहॉं ‘भारतीय विद्वान’ शब्द का अर्थ ऐसे विद्वान व्यक्ति से है, जिसे लॉक एवं मिल्टन की कविताओं का उच्च ज्ञान हो, न्यूटन की भौतिकी में निपुण हो न कि उस व्यक्ति से जिसे हिन्दू शास्त्र कण्ठस्थ हो तथा समस्त दैवीय रहस्यों का अनुपालन करने वाला हो। आगे मैकॉले ने कहा है फिर भी यदि हम प्राच्यवादियों से सहमत हो जायें तो भावी परिवर्तनों के विरूद्ध निर्णायक कदम होगा। 
  5. प्राच्यवादियों (Orientalists) ने अंगेज विद्वानों का जोरदार खण्डन करते हुए उसने पाश्चात्यीकरण (Westernization) की पुष्टि करते हुए निम्नलिखित अकाट्य, अतिरंजित, अंग्रेजी अहम् एवं संस्कृति से परिपूर्ण तर्क प्रस्तुत किये थे-
‘‘भारतीयों में प्रचलित क्षेत्रीय भाषाएं साहित्यिक एवं वैज्ञानिक दुर्बलता का शिकार हैं। वे पूर्ण अपरिपक्व तथा असभ्य हैं। उन्हें किसी भी बाह्य शब्द भण्डार द्वारा इस स्थिति में सम्विर्द्धत नहीं किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में उस भाषा द्वारा किसी अन्य भाषा के साहित्य एवं विज्ञान के अनुवाद की कल्पना कर पाना असम्भव है।’’

इसी विवरण-पत्र में अन्य स्थान पर भारतीय भाषाओं एवं साहित्य का घोर अपमान करते हुए लिखा है- यद्यपि में संस्कृत एवं अरबी भाषा के ज्ञान से अनविभज्ञ हू। .................... किन्तु क्षेष्ठ युरोपीय पुस्तकालय की मात्र एक अलमारी, भारतीय एवं अरबी भाषा के सम्पूर्ण साहित्य से अधिक मूल्यवान है। इस तथ्य को प्राच्यवादी भी सह”र स्वीकार करेंगे।’’

अंग्रेजी भाषा की महत्ता को व्यक्त करते हुए आगे मैकॉले ने लिखा है- ‘‘यह भाषा पाश्चात्य भाषाओं में भी सर्वोपरि है। जो इस भाषा को जानता है, वह सुगमता से उस विशाल भण्डार को प्राप्त कर लेता है, जिसकी रचना विश्व के श्रेष्ठतम व्यक्तियों ने की है।’’

संक्षेप में मैकॉले के पाश्चात्यवादी दृष्टिकोण में अंग्रेजी के महत्त्व को अग्रलिखित बिन्दुओं से समझाया जा सकता है, जो कि उसके विवरण-पत्र (Minute) में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं-
  1. अंग्रेजी समस्त विश्व में शासकों की भाषा है तथा सर्वश्रेष्ठ साहित्य से सम्विर्द्धत है।
  2. अंग्रेजी पढ़ने हेतु भारत के अधिकांश लोग आतुर हैं।
  3. ‘अंग्रेजी’ एवं अंग्रेजी संस्कृति ने विश्व के अनेक राष्ट्रो को जंगलियों की दशा से उठाकर सभ्य बनाया है।
  4. अंग्रेजी भाषा भारत में नवीन संस्कृति का पुनरूत्थान कर सकेगी।
  5. प्राच्य शिक्षा ग्रहण करने के लिए बालकों को छात्रवृत्ति आदि देकर प्रोत्साहित किया जाता है, किन्तु अंग्रेजी पढ़ने के लिए छात्र स्वयं खर्च वहन करने को तैयार हैं।
  6. केवल मुस्लिम एवं हिन्दुओं को न्याय दिलवाने हेतु उनके अरबी, हिन्दू शास्त्रों को अंग्रेजी में अनुवाद कराने से ही काम चल सकता है न कि उनकी फौज तैयार करके।
‘‘अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करने का हमारा अभिप्राय इस देश में एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना है जो रक्त एवं रंग में तो भारतीय हों, पर वह रूचियों, विचारों, नैतिकता एवं विद्वता में अंग्रेज जैसा हो।’’

लार्ड विलियम बैण्टिक द्वारा मैकॉले के विवरण-पत्र को स्वीकृति : लार्ड विलियम बैण्टिक ने मार्च, 1835 को मैकॉले विवरण पत्रिका को शब्दश: स्वीकृति प्रदान करके पाश्चात्यवादी स्वरूप एवं शिक्षा प्रयासों पर मोहर लगा दी। इस प्रकार यह ब्रिटिन सरकार की प्रथम शिक्षा नीति के रूप में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बन गया।

लॉर्ड विलियम द्वारा प्रस्तावित भारतीय शिक्षा के स्वरूप ने पत्रिका को शब्दश: स्वीकृति प्रदान करके पाश्चात्यवादी स्वरूप ने निम्नलिखित आकार ग्रहण किया- (1) ब्रिटिश सरकार का प्रमुख उद्देश्य भारतीयों में यूरोपीय साहित्य एवं विज्ञान का प्रचार करना है। अत: शिक्षा की निर्धारित धनराशि केवल इसी उद्देश्य के लिए व्यय की जानी चाहिए। (2) परन्तु प्राच्य विद्यालयों को न तो समाप्त किया जायेगा और न ही उनको बहि”कृत किया जायेगा। उनमें उपलब्ध सुविधाओं हेतु आवश्यक धन की व्यवस्थाएँ जारी रहेंगी। (3) आगे से प्राच्य विद्या सम्बन्धी साहित्य का मुद्रण एवं प्रकाशन समाप्त कर दिया जायेगा, क्योंकि इसके लिए अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था नहीं की जा सकती है। (4) उपर्युक्त स्थितियों के बाद भी जो शेष धनराशि बचेगी उसका प्रयोग भारतीयो में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से अंग्रजी साहित्य तथा विज्ञान के प्रसार करने में व्यय किया जायेगा।

इस प्रकार विलियम बैन्टिक की इस शिक्षा नीति के माध्यम से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था की गयी।

मैकाॅले मिनिट की मुख्य विशेषताएँ

अपने मिनिट में मैकाॅले ने सर्वप्रथम 1813 के चार्टर एक्ट की 43वीं धारा के अर्थ का स्पष्टकरण करते हुए यह प्रस्तुत की कि इस धारा के अन्तर्गत आने वाले साहित्य शब्द का संकेत ‘अंग्रेजी साहित्य’ की ओर एवं ‘विद्वान भारतीय’ का संकेत ‘आंग्ल साहित्य’ का ज्ञान रखने वाले भारतीयों की ओर भी हो सकता है। साथ ही ‘विज्ञान का ज्ञान’ यह केवल अंग्रेजी के माध्यम से दिया जा सकता है। मैकाॅले का यह तर्क पूर्ण रूप से सही नहीं माना जा सकता। शायद मैकाॅले को अपने इस तर्क के थोथेपन की जानकारी थी। अतएव उन्होंने आगे यह भी लिखा कि यदि इस प्रकार का स्पष्टीकरण मान्य न किया गया तो वे एक्ट की 43वीं धारा को अवैध बताने के हेतु एक नया बिल भी प्रस्तुत करने के लिए तैयार है। भारतीय शिक्षा संस्थाओं के कायम रखने के विरूद्ध मैकाॅले ने अपना मत देते हुए, यह तर्क प्रस्तुत किया कि ये संस्थाएँ किसी प्रकार का ठोस कार्य नहीं कर रही हैं। अतएव एक्ट के अनुसार जो निधि शिक्षा के प्रसार के लिए सुरक्षित रखी गई थी, उसका विनियम इन संस्थाओं के कायम रखने के लिए न किया जाए।

शिक्षा के माध्यम पर विचार करते हुए, मैकाॅले ने इस समस्या का हल वांछनीयता एवं औचित्य की दृष्टि से करना ठीक समझा। इस सम्बन्ध में उन्होंने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया कि-”सभी पक्षों का यह कथन है कि भारत में विद्यमान विभिन्न भाषाओं में न तो साहित्य का अंश है और न उनमें किसी प्रकार के विज्ञान का ही समावेश है। साथ ही जब तक इन भाषाओं का विकास नहीं होता तब तक अन्य किसी विधि से अंग्रेजी भाषा में लिखित मूल्यवान ग्रन्थों का भाषान्तर किया जाना सम्भव नहीं। अतः ऐसे लोगों के बौद्धिक विकास के लिए जिनके पास ऊँचे दर्जे की शिक्षा प्राप्त करने के साधन हैं, प्रचलित भाषाओं के माध्यम से शिक्षा देना सम्भव नहीं। इसके लिए किसी अन्य माध्यम की आवश्यकता है।

संस्कृत अथवा अरबी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने कि विरूद्ध अपना मत देते हुए मैकाॅले ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि-”अच्छे यूरोपीय साहित्य की अलमारी का एक खण्ड ही भारतवर्ष और अरब के सारे देशीय साहित्य के बराबर मूल्यवान है।“ इसके विपरीत, अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के पक्ष में मैकाॅले ने अपना मत देते हुए यह बताया कि यह राजभाषा होने के कारण, पूर्वीय देशों में वाणिज्य-व्यवसाय इसी भाषा के माध्यम से होने के कारण तथा भाषा में अनेक भारतीय पारंगत होने के कारण, इसे ही शिक्षा का माध्यम बनाया जाना अधिक औचित्यपूर्ण होगा।

अंग्रेजी शिक्षा के प्रति भारतीयों के मन में सन्देह उत्पन्न होने की बात पर मैकाॅले ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि अंग्रेज शासकों का कत्र्तव्य है कि वे भारतीयों को ऐसी शिक्षा दें जो उनके ‘स्वास्थ्य’ के लिए हितकर हो, न कि ऐसी शिक्षा जो कि भारतीय को ‘स्वादिष्ट’ लगे। यदि रुचि का ही ध्यान रखा जाय तो यह प्रमाणित होता है कि समिति के तत्वाधान में तैयार ही हुई संस्कृत एवं अरबी भाषा में लिखी पुस्तकों की खपत उतनी नहीं, जितनी कि अंगे्रजी में लिखी पुस्तकों की, जिनसे बड़ी मात्रा में लाभ प्राप्त हो रहा था। साथ ही मैकाॅले ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि संस्कृत तथा अरबी काॅलेजों में विद्यार्थियों के दाखिल होने के लिए जहाँ छात्रवृत्तियों का प्रलोभन आवश्यक था, वहाँ अंग्रेजी शालाओं में विद्यार्थी शुल्क देकर भी भरती होने के लिए उत्सुक थे।

इस तर्क के विरूद्ध कि हिन्दू धर्म तथा कानू की शिक्षा के लिए तो संस्कृत साहित्य का जानना आवश्यक है, मैकाॅले ने यह युक्ति प्रतिपादित की कि हिन्दू के धार्मिक कानूनों को अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करके उसके माध्यम से शिक्षा देना अधिक मितव्ययता होगी, बजाय इसके कि उनका अध्ययन करने के लिए संस्कृत शालाओं को चलाया जाय।

मैकाॅले ने विश्वास व्यक्त किया कि- ”इस शिक्षा द्वारा ऐसा समाज तैयार होगा जो हमारे तथा हमारी करोड़ों प्रजा के बीच विचार-वाहक बनेगा। इससे एक ऐसे वर्ग का निर्माण होगा- जो रंग और रक्त में भारतीय परन्तु विचारों, नैतिकता तथा बुद्धि में अंग्रेज होगा।

इस प्रकार मैकाॅल ने मिनिट में अपनी वाक्पटुता से इस बात का प्रबल समर्थन किया कि भारत में शिक्षा का उद्देश्य-पाश्चात्य साहित्य एवं विज्ञान का प्रसार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से करना है। उन्होंने इस बात की भी सलाह दी कि पूर्वीय साहित्य की शिक्षा देने वाली संस्थाएँ तुरन्त बन्द कर दी जाएँ तथा जो निधि इस प्रकार से बचे, उसे अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार हेतु खर्च किया जाए।

मैकाॅले के शिक्षा-कार्य का मूल्यांकन

भारतीय शिक्षा के इतिहास में मैकाॅल के कार्य का मूल्यांकन अलग-अलग ढंग से किया जाता है। कुछ लोगों के मतानुसार मैकाॅले का कार्य भारतीय शिक्षा की व्यवस्था को प्रगति के पथ पर आरूढ़ करने में मौलिक था, तो कुछ लोग भारत के राजनैतिक पतन तथा आधुनिक शिक्षा में उपस्थित मूलभूत समस्याअेां का सारा दोष मैकाॅले पर ही लादते हैं। कुछ लोग भारतीय साहित्य, संस्कृति एवं धर्म के सम्बन्ध में मैकाॅल के गहरे अज्ञान की भत्र्सना करते हैं, जो अन्य कुछ आधुनिक भारतीय भाषाओं का शिक्षा में दुर्लक्ष्य होने का सारा दोष मैकाॅले पर मढ़ते हैं।

वास्तव में इन सभी मतों में अतिशयोक्ति हो सकती है। मैकाॅले को पूर्ण श्रेय देने के पूर्व, इस बात का ध्यान रखना होगा कि मैकाॅले ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रति भारतीयों में किसी प्रकार अभिरुचि उत्पन्न नहीं की। इस शिक्षा से होने वाले लाभों ने ही भारतीयों को अंगे्रजी शिक्षा की ओर उत्प्रेरित किया। मैकाॅले का पाश्चात्यवादी दल के संगठन में कोई हाथ न था, वह तो मैकाॅले के भारत आगमन के पूर्व ही भारत आगमन के पूर्व ही भारत में बन चुका था। भारतीय लोग अंग्रेजी शिक्षा के उत्सुक थे और कम्पनी के द्वारा उस शिखा के संचालन के अभाव में मिशनरी शालाओं में प्रवेश लेकर उसे ग्रहण कर रहे थे।

कम्पनी के नये और तरूण अंग्रेज अफसर पाश्चात्यवादी मत के प्रणेता थे। केवल पुराने अफसर ही लाॅर्ड हैस्टिंग्ज और मिन्टो की शिक्षा सम्बन्धी नीति के समर्थक थे। ऐसे अवसर पर मैकाॅले का भारत में आगमन हुआ था। इतनी बात अवश्य है कि मैकाॅले की केम्ब्रिज विश्वविद्यालयीन शिक्षा ने, जिसमें पाश्चात्य साहित्य के अध्ययन का बड़ा अंश था, उसको पाश्चात्यवादी मत की ओर आकर्षित करने में प्रभावित किया। साथ ही मैकाॅले की प्रतिभा तथा वाक्पटुता ने उसे अपने पक्ष का जोरदार समर्थन करने में सहायता दी। मैकाॅले तो पहले से ही विद्यमान विवादास्पद विषय पर एक विशिष्ट निर्णय देने के लिये कारण मात्र था।

इसी प्रकार मैकाॅले पर दोषारोपण करने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस पक्ष का भी मैकाॅले ने प्रतिपादन किया, उसके पीछे कोई दूर्भावना अथवा कुत्सित विचार न था। मैकाॅले को अधिक दोषी इसी बात के लिये ठहराया जा सकता है कि प्राच्य साहित्य एवं धर्म से वह पूर्णरूपेण अनभिज्ञ था तथा उसमें अनुभव और दार्शनिक दृष्टिकोण का अभाव था। वह साम्राज्यवाद में विश्वास करता था और ‘श्वेतांग-भार’ के सिद्धांत का भी कायल था, जिसके अनुसार श्वेत जातियों का यह उत्तरदायित्व समझा जाता था कि वे अश्वेत जातियों को पाश्चात्य संस्कृति और विज्ञान द्वारा सुसंस्कृत तथा परिष्कृत करें। इस प्रकार के पूर्वाग्रहों ने उस पर प्रभाव डाला हो, इसकी सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

भारतीय भाषाओं का विरोध करने के लिये मैकाॅले को दोषी ठहराना, यह पूर्णतः न्याय संगत न होगा। मैकाॅले को भारतीय भाषाओं के शिक्षा में महत्त्व का अनुमान था। परन्तु उसे तत्कालीन राजनीति में भाग लेने वाले भारतीयों ने सलाह दी कि शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं का होना व्यावहारिक दृष्टि से सम्भव नहीं। राजा राममोहन राय द्वारा लाॅर्ड एम्हस्र्ट को लिखा पत्र इसका प्रमाण है। इस सम्बन्ध में सन् 1836 की लोक-शिक्षण की सामान्य समिति के एक प्रस्ताव का उल्लेख करना अनुचित न होगा।

ध्यान रहे कि इस समिति के सभापति का स्थान मैकाॅले ने ग्रहण किया था। ”भारतीय भाषाओं के विकास एवं प्रोत्साहन सम्बन्धी महत्त्व का हमें पूर्ण ख्याल है। हमें इसका बोध नहीं कि 7 मार्च के आदेश द्वारा भारतीय भाषाओं के विकास एवं प्रोत्साहन पर कोई विशेष अवरोध लागू होता हो.........। हमें इस बात का ध्यान है कि भारतीय भाषाओं के निर्माण एवं विकास का उद्देश्य ही हमारे प्रयासों का लक्ष्य है.......।

यद्यपि मैकाॅले द्वारा तथा अन्य अधिकारियों द्वारा समय-समय पर भारतीय भाषाओं के विकास के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया परन्तु शिक्षा के अधिकारियों द्वारा इसकी उपेक्षा ही होती रही। अतः इसके लिये मैकाॅले को दोषी ठहराना उचित न होगा।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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