शिक्षा का अर्थ, परिभाषा एवं महत्व

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शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया हैं। व्यक्ति औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों
से जीवन भर शिक्षा प्राप्त करता रहता है। वह अपने दैनिक जीवन में अपने वातावरण एवं परिवेश के
साथ अन्त: क्रिया करते हुएँ अनेक अनुभव प्राप्त करता है। इन अनुभवों से जो ज्ञान उसे प्राप्त होता
है वही व्यापक अर्थ में शिक्षा है। विद्यालय जीवन में प्राप्त शिक्षा भी इस व्यापक शिक्षा का एक अंग
है। शिक्षा ऐसी प्रक्रिया है जो जन्म काल तथा प्रकृति प्रदत्त शक्तियों का विकास करती है। शिक्षा
व्यक्ति को सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनाती है। शिक्षा के इतने महत्वपूर्ण योगदान के कारण
आज समाज में शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। शिक्षा मानव विकास का मूल साधन हैं।
इससे मानव की जन्मजात शक्तियों का विकास होता है। ज्ञान कला और कौशल में वृद्धि होती है।
इतना ही नहीं मनुष्य के व्यवहार में भी परिवर्तन आता है। शिक्षा क्या है ? विद्या क्या है ? इस पर
वेदों पुराणों उपनिषदों में कुछ लिखा हुआ मिलता है। आदिम युग के बाद जब भी मानव ने शिक्षा
के अर्थ को समझा होगा और अपने को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया होगा तभी से शिक्षा का अर्थ
ज्ञात हुआ होगा। वेदों में शिक्षा को एक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। शिक्षा शब्द संस्कृत
भाषा के शिक्ष् धातु से बना है जिसका अर्थ है। ज्ञानोपार्जन अथवा सीखना है। मानव अपने अनुभव
से हमेशा ही कुछ न कुछ सीखता रहा है पाषाण युग से मशीन युग तक शिक्षा के उद्देश्य, कार्य, तत्व,
क्षेंत्र परिवर्तित होते रहें हैं।

शिक्षा विकास का मूल साधन है। शिक्षा के जरिए मनुष्य के ज्ञान एवं कला कौशल में वृद्धि
करके उसके अनुवांशिक गुणों को निखारा जा सकता है और उसके व्यवहार को परिमार्जित किया
जा सकता है। शिक्षा व्यक्ति की बुद्धि, बल और विवेक को उत्कृष्ट बनाती है। शिक्षा के अभाव में
व्यक्ति का जीवन पशु के समान प्रतीत होता है इसी कारण भारत में शिक्षा के लोकव्यापीकरण का
लक्ष्य रखा है।

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शिक्षा का अर्थ 

आधुनिक संदर्भ में शिक्षा शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द Educatum से हुई  है।
जिसका अंग्रेजी अनुवाद Education है। Education का अर्थ शिक्षण की कला। इसी का
समानार्थी  शब्द Educare है To bring up उठाना To bring forth सामने लाना To lead out नेतृत्व देना इत्यादि सभी अर्थ शिक्षा की क्रिया या प्रतिक्रिया का संकुचित या
व्यापक आधार प्रस्तुत करते है। दूसरे अथोर्ं में Eductaion दो शब्दों से मिलकर बना है। E+Duco
E का अर्थ आन्तरिक Duco का अर्थ बाहर की आरै ले जाना। अन्त: शक्तियों क्षमताओं का बाहर की
ओर विकास करना शिक्षा जीवन भर चलती रहती है। यह एक स्वाभाविक सामाजिक, दार्शनिक,
राजनैतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो निरन्तर ज्ञान कौशल में वृद्धि के
साथ व्यवहार में परिवर्तन करती रहती है। शिक्षा के व्यापक अर्थ के अनुसार शिक्षा जीवन पर्यन्त
चलने वाली प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति जीवन से लेकर मत्यु तक के बीच की जीवन यात्रा में
जो कुछ सीखता है तथा अनुभव करता है। वह सब व्यापक अर्थ में शिक्षा हैं।
जे. एस. मेकेन्जी ने शिक्षा का व्यापक अर्थ बताते हुए कहा है कि ‘‘व्यापक अर्थ में शिक्षा एक ऐसी
प्रक्रिया है जो जीवन भर चलती रहती है तथा जीवन के प्रत्येक अनुभव से उसके भंडार मे वृद्धि
होती है। शिक्षा को जीवन का साध्य भी कहा जा सकता है।

शिक्षा की परिभाषा

  1. जैन दर्शन के अनुसार:- ‘‘शिक्षा वह है जो मोक्ष की प्राप्ति कराए’’।
  2. बौद्ध दर्शन के अनुसार:– ‘‘शिक्षा वह है जो निर्वाण दिलाए ‘‘।
  3. स्वामी विवेकानन्द के अनुसार :-’’मनुष्य की आत्मा में ज्ञान का अक्षय भंडार है। उसका उदघाटन
    करना ही शिक्षा है’’।
  4. टेगोर के अनुसार:- ‘‘उच्चतम शिक्षा वह है, जो हमे केवल सूचना ही नहीं देती वरन् हमारे जीवन
    के समस्त पहलुओं को सम तथा सुडोैल बनाती है’’।
  5. महात्मा गॉधी के अनुसार:-’’शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर मस्तिष्क एवं आत्मा
    के सर्वोतम अंश की अभिव्यक्ति है।’’
  6. रूसों के अनुसार:- ‘‘जीवन ही शिक्षा है।’’
  7. फ्राबेल के अनुसार :-’’शिक्षा एक प्रक्रिया है, जो की बालक की अन्त: शक्तियों को बाहर प्रकट
    करती है’’।
  8. महात्मॉ गाँधी के अनुसार :-’’शिक्षा का अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा में
    निहित सर्वोतम शक्तियों के सर्वागीण प्रकटीकरण से है।’’
  9. टी. पी. नन के अनुसार :- ‘‘शिक्षा बालक के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है जिसके द्वारा वह यथा
    शक्ति मानव जीवन को मौलिक योगदान कर सकें।’’
  10. पेस्तालॉजी के अनुसार :- ‘‘शिक्षा मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का स्वभाविक सर्वागपूर्ण तथा
    प्रगतिशील विकास है।’’
  11. ब्राउन के अनुसार :- ‘‘शिक्षा चैतन्य रूप में एक अनियन्त्रित प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के
    व्यवहार में परिवर्तन लाये जाते है।’’
  12. प्रो. हार्नी के अनुसार :-’’शिक्षा शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकसित सचेतन मानव का अपने
    बौद्धिक, उद्वेगात्मक तथा इच्छात्मक वातावरण से सर्वोतम अनुकूलन हैं।’’
  13. अरस्तू के अनुसार ‘‘स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निमार्ण करना ही शिक्षा है।।’’
  14. हरबर्ट स्पेन्सर के अनुसार ‘‘अच्छे नैतिक चरित्र का विकास ही शिक्षा है।’’
  15. ट्रो  के अनुसार ‘‘शिक्षा नियन्त्रित वातावरण में मानव विकास की प्रक्रिया है।’’
  16. युनीवर्सल डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैग्वेज ‘‘पालना, प्रशिक्षण देना विषय विकास मस्तिष्क का प्रशिक्षण
    चरित्र तथा शक्तिया ही शिक्षा है। विशेष अथोर्ं में छोटे बच्चों को प्रचलित निर्देश देना ही शिक्षा है।
    किसी राज्य में प्रचलित निर्देश प्रणाली शिक्षा कहलाती है’’ ।
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शिक्षा का महत्व

शिक्षा किसी भी व्यक्ति और समाज के लिए विकास की धुरी है और यह किसी
भी राष्ट्र की प्राणवायु है। बिना इसके सभी बातें अधूरी साबित होती है। शिक्षा का संबंध सिर्फ
साक्षरता से नहीं है, बल्कि चेतना और उत्तरदायित्वों की भावना को जागृत करने वाला औजार भी
है। किसी राष्ट्र का भविष्य उसके द्वारा हासिल किए गए शैक्षिक स्तर पर निर्भर करता है। इस तरह
प्रत्येक राष्ट्र के लिए शिक्षा वह पहली सीढ़ी है जिसे सफलतापूर्वक पार करके ही कोई  अपने लक्ष्य
तक पहुँच सकता है। शिक्षा देश गाँव समाज के विकास के लिए आवश्यक है। शिक्षा जीवन पर्यन्त
चलने वाली प्रक्रिया है। जो चरित्र और अंतर्निहित क्षमताओं का विकास करके व्यक्ति की प्रकृति को
पूर्णता की और ले जाती है। शिक्षा से व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का विकास होता हैं तो
भौतिक कल्याण की, आशा भी की जाती है।

देश में आर्थिक विकास के लिए उदारवादी नीति अपनाई  जाएं, विज्ञान एवं आधुनिकीकरण
का उपयोग किया जाए या छोटे गृह कुटीर उद्योगों की दिशा में पहल की जाएं अथवा कृषि
प्रौद्योगिकी के विकास की कल्पना को सार्थक किया जाएं, जरूरत शिक्षा की ही होगी। भूखे पेट
भजन नहीं हो सकता और पेट भर जाने भोजन मात्र से ही विकास नहीं हो सकता इसलिए
क्षमताओं और  सभावनाओं के विकास हेतू शिक्षा अति महत्वपपूर्ण है।

शिक्षा के माध्यम से ही भारत के गाँवो को सामाजिक परिवर्तन और ग्राम विकास की
विभिन्न योजनाओं से जोड़ सकते है। शिक्षा आरै मूल्य का गहरा सम्बन्ध है। मूल्यहीन शिक्षा वास्तव
मे शिक्षा है ही नहीं। मूल्यों की शिक्षा प्रदान कर बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित किये जा सकते
है। उनकी सुप्त चेतना को जगाया जा सकता है जिससे की वे अपने विकास के साथ-साथ अपने
समाज और देश के विकास में योगदान कर सकता है।

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