राष्ट्रीय सुरक्षा क्या है?

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राष्ट्रीय सुरक्षा एक मान्यता है जिसे प्रत्येक देश प्राप्त करने का प्रयत्न करना है। परन्तु प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा किन खतरों के विरूद्ध प्राप्त करेन चाहिए या उससे किन मान्यताओं की रक्षा करनी होती है अथवा किस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था का विकास करना हैं विज्ञान की प्रगति से विश्व अधिक निकट आ गया हैं। एक देश की घटनाओं का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ता है। यदि एक देश अपने पड़ोसी देशों की नीतियों को सम्मान देता रहे तो युद्ध की स्थिति नहीं आती परन्तु यदि वह दूसरे देश पर अपनी इच्छा जबरदस्ती थोपने का प्रयास करता है। तो युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। और यदि युद्ध होता है। तो उस पर सशस्त्र सेनाओं द्वारा आक्रमण किया जा सकता है जिसे प्रत्यक्ष आक्रमण कहा जाता है। ओर जब एक देश दूसरे देश के विरुद्ध कूटनीतिक, आंतकवादी, राजनीतिक, आर्थिक या मनोवैज्ञानिक साध्नों का प्रयोग करके उस पर अपनी इच्छा लादने को प्रयास करता है। तो उसे परोक्षण आक्रमण कहते है। जैसे वर्तमान में पाकिस्तान कश्मीर हथियाने के लिए भारत के विरुद्ध आंतकवादी कार्यवाही जारी रखे हुए है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित सभी तथ्यों का आंकलन करके उसी के अनुकूल पर्याप्त सेनाओं को तैयार रखना होगा अन्यथा राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा नहीं की जा सकेगी। राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा संम्बधी नीतियों का निर्धारण सम्बंधित देश की विशेष परिस्थितियों के आधार पर होता है। न कि मनमाने तरीके से या किसी दूसरे देश की नकल करके। उदाहरणार्थ, ब्रिटेन एवं जापान के लिए वायुसेना के साथ-साथ नौसेना की भी आवश्यकता है जबकि जर्मनी और रूस के लिए वायुसेना के साथ-साथ थल सेना की आवश्यकता है।

महत्वपूर्ण कारक

कारक भी देश की सुरक्षा नीति निर्धरित करने में कारक उत्तरदायी है-

भौगोलिक कारक

राष्ट्रीय सुरक्षा नीति निर्धरण में भौगोलिक कारकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह कारक स्थायी होता है। भूगोल में देश की अवस्थिति आकार और स्वरूप भू-पटल जलवायु तथा सीमाएँ और सीमान्त सम्मिलित होते हैं। किसी भी देश की सुरक्षा का अध्ययन करते समय उस देश के भू-राजनीतिक प्रभाव का अध्ययन करना अनिवार्य है। पहले जो युद्ध होते थे वे जल या थल पर होते थे परन्तु अब युद्ध थल, जल और नभ में समान रूप से किये जा सकते हैं। इसलिए अब बाह्य क्षितिज का महत्व सैनिक दृष्टि से बढ़ गया है। भौगोलिक कारणों के प्रकारों का अध्ययन इस प्रकार किया जा सकता है।
  1. अवस्थिति: किसी देश की अवस्थिति के आधर पर ही उस देश की जलवायु आर्थिक शक्ति तथा राष्ट्रीय नीति का निर्धारण किया जाता है। भौगोलिक अवस्थिति के कारण ही आर्थिक नीति एवं रणनीति तैयार की जाती है। सामुद्रिक अवस्थिति के कारण ही ग्रेट ब्रिटेन द्वितीय विश्वयुद्ध में सम्पूर्ण विश्व में नौ शक्ति के रूप में छाया रहा इसी कारण उसने लगभग सभी महाद्वीपों में अपने उपनिवेश स्थापित किये यूरोप के अन्य देश ब्रिटेन का मुकाबला करने में इसलिए सफल नहीं हुए क्योंकि उनको नौसेना के साथ-साथ बड़ी मात्रा में थल सेना भी रखनी होती थी। पाकिस्तान और बंग्लादेश एक-एक समुद से घिरे हुए हैं, भारत दो समुद्रों से घिरा है। रूस और अमरीका बहुसमुद्रीय अवस्थिति के देश है। अमरीका की रणनीति अवस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि वह शक्तिशाली देशों से घिरा हुआ नहीं हैं। (अंतस्थ राज्य) की अवस्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
  2. आकार व स्वरूप: भौगोलिक कारकों में इनका अपना महत्व है। किसी देश का आकार उसकी शक्ति के निध्र्णरण में उपयोगी भी हो सकता है। ओर अनुपयोगी भी। राजनीतिक इकाइयों के विकास में अकार तत्व महतवपूर्ण भूमिका निभाता है। क्योंकि विशाल आकार के अभाव में कोई भी देश सैनिक शक्ति के रूप में नही उभर सकता। आकार में जनसंख्या भी आ जाती है। परन्तु जनसंख्या संख्यात्मक के साथ-साथ गुणात्मक भी होनी चाहिए। उदाहरणार्थ नेपोलियन और हिटलर के आक्रमणों से सोवियत संघ अपने विशाल क्षेत्रपफल के आधर पर ही अपनी रक्षा कर सका। आण्विक हथियारों के इस तत्व की महता और भी अध्कि बढ़ गयी है क्योंकि शत्रु देश की प्रथम प्रहारक क्षकता की प्रतिरोdhii रणनीति के द्वारा समाप्त किया जा सकता है। परन्तु ब्रिटेन, प्रफांस ओर जापान जैसे देश इसके लाभ से वंचित रहेंगे क्योंकि उनकी रक्षा में गहनता नहीं है।
  3. जलवायु: भौगोलिक कारकों में जलवायु का भी महत्वपूर्ण स्थान है। विशाल आकार वाले देश की जलवायु में भिन्नता पायी जाती है। जिन क्षेत्रों में अधिक गर्मी, सर्दी, शुष्कता, वर्षा पड़ती है वहाँ पर अनेक कठिनायाँ पायी जाती हैं। ये कारक उस देश की प्रगति में बाधक सिद्ध हो सकते है। जलवायु का प्रभाव रणनीति पर भी पड़ता है क्योंकि वह सभी प्रकार के वातावरण में सामरिक कार्यवाहियों पर प्रतिबन्ध् लगाती है। जलवायु के अनुसार ही देश में फसलें पैदा होती है और देश की आर्थिक सम्पन्नता भी जलवायु पर ही निर्भर करती है।

आर्थिक कारक 

राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा सम्बन्धी कारकों में आर्थिक कारक भी महत्वपूर्ण है। आर्थिक कारक में प्राकृतिक संसाधन, उफर्जा संसाधन, परिवहन एवं यातायात क्षमता, औद्योगिक क्षमता तथा अर्थव्यवस्था आती है। किसी भी देश की आर्थिक स्थिति पर ही उसकी सशस्त्र सेनाएँ निर्भर करती है। सेना के गठन, अस्त्र शस्त्र रणनीति एवं सामारिक स्थिति सभी कुछ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है। आर्थिक शक्ति से पिछड़ा होते हुए भी उसने अमरीका जैसे शक्तिशाली देश का सामना किया तथा अमरीका को अपने उद्देश्य में सफल नहीं होने दिया। इसके लिए उसने अपनी युद्ध प्रणाली को अपने सैन्य संगठन के अनुरूप बनाया और अपने आर्थिक संसाधनो का समुचित विकास किया। दूसरी और जापान ने उपलब्ध संसाधनों को समुचित विकास किये बिना ही द्वितीय विश्वयुद्ध छेड़ दिया। अत: कच्चे माल की आपूर्ति के लिए उसे अन्य देशों का मुँह देखना पड़ा। इसलिए दक्षिण-पूर्व एशिया पर उसकी विजय का स्वप्न पूरा नहीं हो सका जबकि ग्रेट ब्रिटेन को अपने उपनिवेशों से कच्चा माल प्रचुर मात्रा में मिल जाता था। अत: अन्त में उसकी नौसेना जापान की नौसेना से श्रेष्ठ सिद्ध हुई।

प्राकृतिक संसाधनों में खाद्यान्न और कच्चा माल भी आते हैं। कच्चे माल में खनिज पदार्थों का सर्वाधिक महत्व है। द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार का एक कारण खनिजों का अभाव भी था। खनिज पदर्थों में कोयला, लोहा, तेल आदि महत्वपूर्ण हैं। अमरीका और सोवियत संघ को शक्ति बनाने में इन खनिजों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उर्जा संसाधनो में कोयला, तेल, जल, विद्युत, परमाणु शक्ति और सौर उर्जा को सम्मिलित किया जा सकता है। औद्योगिक विकास के लिए इन संसाधनों का विकास नितान्त आवश्यक है।

आर्थिक विकास में संचार-साध्नों और परिवहन संसाधनो का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। इनके अभाव में सेनाओं की आपूर्ति बाधित होती है और इनके विकसित होने से देश की सैनिक शक्ति का विकास होता है। औद्योगिक क्षमता भी आर्थिक कारकों में महत्वपूर्ण स्थिति लिए हुए है। विश्व में आज जो बड़ी शक्तियाँ हैं, उनका औद्योगिक विकास हो चुका है। वे आधुनिक हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं है। इन देशों में अमरीका, रूस, फांस, ब्रिटेन और चीन का नाम आता है। भारत अभी इस दौड़ में पीछे है यद्यपि वह भी परमाणु शक्ति-सम्पन्न देश बन गया है।

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