सर्विलांस क्या है?

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अनुक्रम
‘सर्विलांस’, फ्रेंच भाषा का एक शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता
है ‘अतिरिक्त नजर’। हिंदी में इसे हम निगरानी-तंत्र भी कहते हैं। निगरानी
तंत्र (सर्विलांस सिस्टम) के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार पर निगरानी रखी
जाती है। सर्विलांस के कई रूप हैं, जैसे टेलीफोन टैपिंग, मोबाइल सर्विलांस,
जी.पी. ट्रैकिंग, कर्वर लिस्टिंग उपकरण, क्लोज सर्किट टेलीविजन, डायरेक्टनल
माइक्रोफोन, इंटरनेट सर्विलांस और इलैक्ट्रॉनिक ट्रायल्स आदि। टेलीफोन
टैपिंग से दो उत्पाद सुरक्षा एजेंसियों को मिलते हैं काल डिटेल रिकार्ड और
लिसनिंग वॉच। इनकी सहायता से किसी टेलीफोन से की जाने वाली बातचीत
तो सुनी ही जा सकती है साथ ही उस टेलीफोन से की जाने वाली और
उस टेलीफोन पर आने वाली सभी कॉल्स का विवरण भी प्राप्त किया जा
सकता है। इलैक्ट्रॉनिक सर्विलांस के अंतर्गत ‘इलैक्ट्रॉनिक ट्रायल्स’ एक ऐसी
तकनीक है जिसकी सहायता से इलैक्ट्रॉनिक डाटा पर नजर रखी जा सकती
है।

मोबाइल सर्विलांस

यदि कहा जाए कि आज हम मोबाइल फोन के युग में जी रहे हैं तो
शायद कुछ गलत नहीं होगा। मोबाइल फोन आज हर व्यक्ति की जरूरत
बन गया है।

मोबाइल सर्विलांस की प्रक्रिया 

किसी व्यक्ति से संबंधित सूचनाएं
एकत्र करने को जब सुरक्षा एजेंसियां उस व्यक्ति के मोबाइल फोन को निगरानी
पर लगाती हैं तो इसे मोबाइल सर्विलांस कहा जाता है। मोबाइल सर्विलांस के
द्वारा, जिस नंबर को निगरानी में रखा जाता है उसकी कॉल-डिटेल-रिकार्ड (सी
डी आर), उसकी भौगोलिक स्थिति (ग्लोबल पॉजिशिनिंग तंत्र द्वारा) का पता
तो लगाया ही जा सकता है साथ ही जरूरत पड़ने पर ‘लिसनिंग वॉच’ प्रणाली
के द्वारा उस नंबर से होने वाली प्रत्येक बातचीत को भी सुना जा सकता है।
इस प्रकार मोबाइल सर्विलांस के दो रूप होते हैं :

  1. कॉल डिटेल रिकार्ड की जानकारी प्राप्त करना
  2. ‘लिसनिंग वाच’ द्वारा बातचीत को सुनना

किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगाने से पहले विधिक
प्रक्रिया का पालन करना होता है। जब पुलिस किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के
बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहती है तो कानूनी प्रक्रिया के आधार पर उस
व्यक्ति विशेष के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगाया जा सकता है। सामान्य
तौर पर आम आदमी को किसी व्यक्ति का मोबाइल फोन, सर्विलांस पर लगवाने
की अनुमति नहीं होती है। कॉल-डिटेल-रिकार्ड (सी.डी.आर.) प्राप्त करने के
लिए सहायक पुलिस आयुक्त स्तर के ऐसे पुलिस अधिकारी के प्रस्ताव, जिसका
ई-मेल आई.डी. सेवा प्रदाता कम्पनी के पास पंजीकृत हो, पर सेवा प्रदाता
कम्पनी, सर्विलांस की व्यवस्था करती हैं। इस सेवा की सुविधा प्राप्त करने के
लिए पुलिस द्वारा सेवा प्रदाता कम्पनी को मोबाइल नंबर और ‘आई.एम.ईआई.’
(इंटरनेशनल मोबाइल इक्युपमेंट आइडेंटीफिकेशन) नंबर का विवरण
देना पड़ता है। इसके विपरीत जब किसी व्यक्ति के मोबाइल को ‘लिसनिंग
वॉच’ पर लगाने की जरूरत पड़ती है तो जिले की पुलिस का एक पुलिस उपायुक्त
स्तर का अधिकारी, संयुक्त आयुक्त के जरिए इस संबंध में एक प्रस्ताव पुलिस
आयुक्त को भेजता है। पुलिस आयुक्त इस प्रस्ताव को गृह मंत्रालय के मुख्य
सचिव को अनुमोदन हेतु भेजता है। इस प्रकार किसी संदिग्ध व्यक्ति के मोबाइल
फोन से होने वाली बातचीत को सुनने के लिए मुख्य सचिव (गृह) की अनुमति
आवश्यक होती है।

किसी संदिग्ध व्यक्ति का ‘कॉल-डिटेल-रिकॉर्ड’, मोबाइल सेवा प्रदाता
कम्पनी द्वारा पुलिस को उपलब्ध कराया जाता है। इस रिकॉर्ड में उन सभी फोन
नंबरों की सूची रहती है जिन नंबरों से सर्विलांस पर लगे फोन नंबर पर बात
(आने वाली और जाने वाली दोनों कॉल) की गई। इसके अलावा यह विवरण
भी दर्ज रहता है किस नंबर पर किस समय और कितनी देर बात की गई।
मोबाइल सर्विलांस के समय जी.पी.आर.एस. सेवा का उपयोग भी किया जाता
है ताकि यह पता लग सके कि सर्विलांस पर लगे मोबाइल फोन की भौगोलिक
स्थिति (लोकेशन) क्या है। ‘लिसनिंग वॉच’ प्रक्रिया के अंतर्गत किसी संदिग्ध
व्यक्ति की बातचीत सुनने के लिए पुलिस, ‘वॉयस लॉगर’ नामक एक उपकरण
के जरिए बातचीत रिकार्ड करती है।

मोबाइल की सर्विलांस किस प्रकार काम करती है?

प्रत्येक मोबाइल में 16 अंकों की एक संख्या लिखी होती है, जिसे
‘ई.एम.आई.डी.’ (इंटरनेशनल मोबाइल आइडेंटिटी इक्यूपमेंट) कहते हैं। यह
मोबाइल का एक कोड होता है जो अंतर्राष्ट्रीय होता है। इस कोड की कभी भी
डबलिंग नहीं होती है। यह कोड मोबाइल फोन का पंजीकरण होता है और जब
मोबाइल फोन चलता है तो मोबाइल फोन सबसे पहले इस कोड को ही स्वीकार
करता है और इसी के बाद मोबाइल सेवा प्रारंभ होती है। यदि आपका मोबाइल
फोन गुम हो जाए या चोरी हो जाए तो अपने फोन की ‘ई.एम.आई.ई.’ को
मोबाइल नेटवर्क पर चलवा कर आप अपने फोन की भौगोलिक स्थिति का पता
लगा सकते हैं क्योंकि ई.एम.आई.ई., मोबाइल फोन की परछाई की तरह होती
है। सर्विलांस के जरिए किसी मोबाइल फोन की भौगोलिक स्थिति का पता या
उसकी स्थिति की जानकारी, मोबाइल टॉवर या उपग्रह के जरिए पता की जाती
है। यदि किसी आपराधिक घटना के बाद कोई मोबाइल फोन भी गायब हो
जाता है तो लगभग 90 प्रतिशत मामलों में 4-5 दिनों में ही मामले का खुलासा
हो जाता है।

मोबाइल फोन के क्षेत्र में दो प्रकार के नेटवर्क कार्य करते हैं जी.एस
एम. और सी.डी.एम.ए.। मोबाइल सर्विलांस का अर्थ जी. एम. एम सर्विलांस
से ही है क्योंकि इसी को सर्विलास के लिए मोबाइल टॉवर की आवश्यकता
पड़ती है। सी.डी.एम.ए. मोबाइल की सर्विलांस के लिए मोबाइल टॉवर की
जरूरत नहीं पड़ती है क्योंकि इस प्रकार के फोन सीधे सेवा प्रदाता कम्पनी के
नियंत्रण कक्ष से जुड़े रहते हैं। सी.डी.एम.ए. सेवा प्रदाता कम्पनी ही सीधे बता
सकती है कि उसका मोबाइल फोन किस क्षेत्र में है।

इम्जी प्रणाली : कुछ व्यक्ति सोचते हैं कि यदि वे मोबाइल फोन को बंद
कर दें अथवा उसका सिम कार्ड निकाल कर फेंक दे तो वे सर्विलांस से बच सकते
हैं। आमतौर पर ऐसा ही होता भी था लेकिन प्रौद्योगिकी ने ‘इम्जी’ नामक एक
ऐसी प्रणाली का विकास कर लिया है जिसकी सहायता से यदि व्यक्ति मोबाइल
को बंद कर दे, तब भी उस पर निगरानी रखी जा सकती है। यदि कोई अपराधी
बेहद शातिर है और वह ‘ई.एम.आई.ई.’ के बारे में जानता है तथा वह सर्विलांस
से बचने के लिए अपने फोन को फेंक कर सिम का प्रयोग किसी दूसरे मोबाइल
फोन में करने लगता है तो इम्जी सॉफ्टवेयर की सहायता से उसे भी पकड़ा जा
सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी अपराधी ने चोरी के फोन को फेंक
दिया और उसके सिम कार्ड को किसी दूसरे मोबाइल फोन में लगा चला दिया,
तब भी उसे इम्जी प्रणाली के अंतर्गत ट्रैप किया जा सकता है। यही नहीं अगर
मोबाइल टॉवर पर एक ‘ई.एम.आई.ई.’ आ गई है, तब अपराधी व्यक्ति चाहे
कितने ही मोबाइल फोन क्यों न बदल ले लेकिन अगर अपराधी व्यक्ति ने दूसरे
नेटवर्क पर उसी सिम कार्ड से फोन कर दिया तो फिर उसे कभी भी पकड़ा जा
सकता है।

मोबाइल ट्रैकिंग उपकरण : हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान
(कानपुर) ने एक नई तकनीक का विकास किया है जिस कारण मोबाइल
सर्विलांस और भी अधिक प्रभावी हो गई है। अभी तक सर्विलांस पर रखे
मोबाइल फोन की स्थिति की जानकारी तो मिलती थी लेकिन मात्र इतना ही
पता चल पाता था कि मोबाइल फोन किस बी.टी.एस. टॉवर के क्षेत्र में है। एक
टॉवर लगभग 2-3 किलोमीटर क्षेत्रफल के मोबाइल धारकों को सेवा प्रदान
करता है इसलिए इतने बड़े क्षेत्र में छिपे किसी अपराधी को पकड़ना काफी
मुश्किल काम होता था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (कानपुर) द्वारा विकसित
‘मोबाइल ट्रैकिंग उपकरण’ की सहायता से टॉवर के स्थान पर मोबाइल फोन
की स्थायी स्थिति (लोकेशन) का पता चल सकेगा।

इस प्रकार मोबाइल ट्रैकिंग उपकरण, सर्विलांस का एक नया हथियार
बनेगा और इसके कारण सर्विलांस को एक नई धार मिल जाएगी। इस उपकरण
की सहायता से गुप्तचर एजेंसियां, शहर के किसी भी कोने में छिपे बैठे अपराधी
तक भी पहुंच सकेंगी। यदि मोबाइल फोन बंद होगा तो यह उपकरण काम नहीं
करेगा। इस उपकरण/तकनीक का विकास, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर
के विद्युत अभियंत्रण एवं संचार विभाग ने किया है और अब इस आधुनिक
तकनीक को इंटेलीजेंस ब्यूरो, नारकोटिक्स कन्ट्रोल ब्यूरो, रॉ और केन्द्रीय
अन्वेषण ब्यूरो जैसी एजेंसियों को उपलब्ध कराए जाने की तैयारी चल रही है।

अक्सर जब
कोई मोबाइल फोन चोरी हो जाता है अथवा किसी अपराधी की स्थिति (लोकेशन)
का पता लगाना हो तो पुलिस, ‘इंटरनेशनल मोबाइल इक्यूपमेंट आइडेंटिटी’
(आई.एम.ई.आई.) नंबर की सहायता लेती है। चीन निर्मित मोबाइल फोनों के
सॉफ्टवेयर भारत में उपलब्ध नहीं होने के कारण पुलिस के लिए चीनी मोबाइलों
की सर्विलांस काफी कठिन हो जाती है। आमतौर पर होता यह है कि जब
किसी मोबाइल फोन का पता लगाना हो अथवा मोबाइल फोन की स्थिति की
जानकारी प्राप्त करनी हो तो पुलिस, ‘आई.एम.ई.आई.’ नंबर की तकनीक
का इस्तेमाल करती है। पुलिस, मोबाइल कम्पनी के सॉफ्टवेयर से आसानी से
यह पता लगा लेती है कि संबंधित मोबाइल फोन में कौन-सा नंबर चल रहा
है। मोबाइल नंबर का पता चल जाने पर पुलिस संबंधित सेवा प्रदाता कम्पनी
की सहायता लेती है और मोबाइल धारक के पते के साथ-साथ यह भी जानकारी
प्राप्त कर लेती है कि संबंधित मोबाइल फोन किस क्षेत्र में काम कर रहा है।
चीनी मोबाइलों को खोजना, पुलिस के लिए काफी मुश्किल काम है,
क्योंकि पुलिस के पास न तो चीनी मोबाइल निर्माता कम्पनियों की जानकारी
है और न ही उसे यह पता है कि बाजार में चीनी मोबाइल फोनों की कौन-कौन
सी कम्पनियां और मॉडल उपलब्ध हैं। इसके अलावा पुलिस के पास चीन
निर्मित फोनों का सॉफ्टवेयर भी नहीं है जिसकी सहायता से ‘आई.एम.ई.आई.
‘ नंबर के जरिए फोन पर चल रहे नये नंबर की जानकारी प्राप्त होती है। इससे
भी खतरनाक तथ्य यह है कि चीनी मोबाइलों का ‘आई.एम.ई.आई.’ नंबर
भारत की अन्य कम्पनियों की अपेक्षा अलग प्रकार का होता है। चीन निर्मित
मोबाइल फोनों में ‘आई.एम.ई.आई.’ नंबर मात्र 11 अंकों का होता है जबकि
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर (भारत सहित) यह नंबर 18 अंकों का होता है। भारतीय
‘आई.एम.ई.आई.’ नंबर विशुद्ध रूप से गणितीय अंकों का होता है (जैसे) :
157988997117989920) जबकि चीन निर्मित मोबाइलों में यह नंबर, अंकों व
अक्षरों का मिश्रित रूप (जैसे : 12PQ8AC7117) होता है, जिस कारण
उन्हें पहचान पाना लगभग असंभव होता है। इस समस्या के निदान के लिए 6
जनवरी, 2009 से भारत में ऐसे सभी मोबाइल फोनों पर मोबाइल सेवा बंद कर
दी गई है, जिन मोबाइल फोनों में आदर्श ‘आई.एम.ई.आई.’ नंबर नहीं था।

फोन टैपिंग

टेलीफोन टैपिंग, सर्विलांस का ही एक रूप है। इसके अंतर्गत किसी
टेलीफोन विशेष से होने वाली सारी बातचीत को सीधे सुना जा सकता है।
टेलीफोन टैपिंग को संयुक्त राज्य अमेरिका में वायर-टैपिंग भी कहा जाता है
और इसका अर्थ होता है, टेलीफोन या इंटरनेट का परीवीक्षण, किसी तीसरे
व्यक्ति द्वारा करना। फोन-टैपिंग को यह नाम इसलिए मिला क्योंकि प्रारंभ में
जब टेलीफोन टैपिंग प्रारंभ हुई थी तो एक छोटा सा उपकरण उस टेलीफोन के
तार में लगाया जाता था, जिस टेलीफोन को टैप किया जाना होता था। इस
उपकरण की सहायता से ध्वनि के कुछ संकेत, टैपिंग मशीन तक पहुंच जाते
थे जिस कारण उस टेलीफोन से होने वाली बातचीत को सुनना संभव हो पाता
था। फोन टैपिंग जब विधिक रूप से होती है और इसे सरकारी प्राधिकरण से
मान्यता प्राप्त होती है तो फोन टैपिंग को ‘विधिक इंटरसेप्शन’ कहा जाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में वायर-टैपिंग दो प्रकार की होती है अक्रिय
और सक्रिय वायर टैपिंग। अक्रिय वायर टैपिंग में टेलीफोन द्वारा की गई
बातचीत की सूचना को प्राप्त किया जाता है जबकि सक्रिय वायर टैपिंग में की
जा रही बातचीत को सीधे सुना जा सकता है। टेलीफोन टैपिंग को सभी देशों
में समान रूप से विधिक मान्यता नहीं मिली है। कुछ देशों में व्यक्ति की निजता
का ध्यान रखते हुए टेलीफोन टैपिंग को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया है
तो कुछ देशों में सुरक्षा एजेंसियों को कुछ छूट देते हुए इसे प्रतिबंधित किया गया
है। अधिकतर विकसित प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं में टेलीफोन टैपिंग को अच्छी
चीज नहीं माना जाता है। सैद्धांतिक रूप से टेलीफोन टैपिंग की अनुमति किसी
सक्षम न्यायालय द्वारा ही दी जाती है। कुछ मामलों में टेलीफोन टैपिंग की
अनुमति बिना किसी अधिक लिखित कार्रवाई के मिल जाती है। अवैध और
अनाधिकृत फोन टैपिंग को आपराधिक कृत्य माना जाता है। जर्मनी जैसे कुछ
देश ऐसे भी हैं जहां अनाधिकृत रूप से की गई फोन टैपिंग को भी न्यायालय,
सबूत के रूप में स्वीकार कर लेता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के संघीय कानून और कुछ राज्यों के कानूनों में
फोन टैपिंग को तब तक अवैध नहीं माना जाता है जब तक टैपिंग द्वारा सुनी
जा रही बातचीत करने वाले दो व्यक्तियों में से कम से कम एक को पता हो
कि उसका फोन टैप हो रहा है। हमारे देश में टेलीफोन टैपिंग के लिए सक्षम
प्राधिकारी से पूर्वानुमति लेनी आवश्यक है, अन्यथा टेलीफोन टैपिंग को अवैध,
अनाधिकृत और आपराधिक कृत्य माना जाता है। अधिकतर देशों में किसी
टेलीफोन सेवा प्रदाता कम्पनी को दूरसंचार सेवाएं उपलब्ध कराने का लायसेंस
इसी शर्त पर दिया जाता है कि वे टेलीफोन टैप करने की सुविधा, पुलिस व
सुरक्षा एजेंसियों को उपलब्ध कराएंगी।

कुछ समय पहले तक जब अधिकतर टेलीफोन एक्सचेंज, यांत्रिक हुआ
करते थे, उस समय किसी टेलीफोन को टैप करने के लिए एक छोटा सा टेप,
टेलीफोन के तारों से जोड़ दिया जाता था ताकि तार में जा रहे ध्वनि संकेतों
का कुछ हिस्सा, टेप के जरिए टैपिंग मशीन तक पहुंच जाए और उस टेलीफोन
से हो रही बातचीत को सुना जा सके। टेलीफोन एक्सचेंजों के कंप्यूटरीकरण
और डिजिटलीकरण के बाद टेलीफोन टैपिंग की प्रक्रिया काफी सरल और
सुविधाजनक हो गई है। यह अब इतनी सुविधाजनक हो गई है कि अब दूर
स्थान से कंप्यूटर के जरिए भी टेलीफोन टैपिंग की जा सकती है। स्थिर टेलीफोन
और मोबाइल टेलीफोन के साथ-साथ टेलीविजन केबल द्वारा दूरभाष सेवाएं
उपलब्ध कराने वाली कम्पनियां भी अत्याधुनिक स्विचिंग टेक्नोलॉजी का प्रयोग
कर रही हैं। जब टेप को डिजिटल स्विच के साथ जोड़ा जाता है तो स्विचिंग
कंप्यूटर उन डिजिट्स की नकल कर लेता है जो टेलीफोन पर की जा रही
बातचीत का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्विचिंग कंप्यूटर नकल की गई डिजिट्स
को एक दूसरी लाइन पर डाल देता है जहां से टेलीफोन पर होने वाली बातचीत
को सुना जा सकता है। इस तकनीक में टेलीफोन पर बात कर रहे व्यक्तियों
को पता तक नहीं चल पाता कि उनका टेलीफोन टैप किया जा रहा है। इस
तकनीक का प्रयोग इतनी सफाई से किया जाता है कि काफी प्रयास करने पर
भी यह पता लगाना लगभग असंभव है कि क्या टेलीफोन टैप किया जा रहा
है। टेलीफोन सेवा प्रदान कम्पनी के बिलिंग विभाग से यह जानकारी भी
आसानी से प्राप्त की जा सकती है कि संबंधित फोन से किस नंबर पर कॉल
की गईं, किस नंबर से उस पर कॉल आई और प्रत्येक कॉल कुल कितने समय
(अवधि) तक चली। ये सभी जानकारियां, ‘पेन रजिस्टर’ नामक एक छोटे से
यंत्र की सहायता से भी प्राप्त की जा सकती हैं।

कुछ लोग अनाधिकृत रूप से भी किसी व्यक्ति के फोन को टैप करके
उससे की जा रही बातचीत को सुन लेते हैं। यह एक आपराधिक कृत्य है। किसी
व्यक्ति के फोन की निगरानी करने के लिए आजकल बहुत से उपकरण बाजार
में उपलब्ध हैं। बाजार में ‘कॉइल टेप’ और ‘इन-लाइन-टेप’ जैसे उपकरण उपलब्ध
हैं जिन्हें टैप किए जाने वाले टेलीफोन के रिसीवर में लगा कर उस टेलीफोन
से होने वाली सारी बातचीत को सुना जा सकता है। आजकल इन उपकरणों
का एक अच्छा विकल्प भी ‘रिकॉडिंग सॉफ्टवेयर’ के रूप में उपलब्ध है जिसे
कंप्यूटर में लगाकर बातचीत को सीधे सुना जा सकता है अथवा उसे रिकॉर्ड किया
जा सकता है। किसी व्यक्ति के टेलीफोन को अनाधिकृत रूप से टैप करने के
लिए बटसेट, बीज बॉक्स अथवा इंटक्शन-कॉइल का प्रयोग भी किया जा सकता
है।

वीडियो सर्विलांस

वीडियो सर्विलांस का अर्थ है किसी स्थान विशेष की चलते-फिरते चित्रों
द्वारा निगरानी करना। प्रारंभ में वीडियो सर्विलांस के अंतर्गत एक वीडियो कैमरे
व वी.सी.पी./वी.सी.आर. का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन आजकल इसके
कई रूप अस्तित्व में आ चुके हैं। आधुनिक युग में एक डिजिटल वीडियो कैमरे
को इंटरनेट से जोड़ दिया जाता है और इस प्रकार दुनिया के किसी भी हिस्से
में रहकर इंटरनेट के द्वारा किसी स्थान विशेष की निगरानी की जा सकती है।
अक्सर ऐसे मामले प्रकाश में आते रहते हैं जिनमें कोई व्यक्ति किसी
अन्य व्यक्ति का क्रेडिट/डेबिट कार्ड चुरा कर, ए.टी.एम. (आटोमैटिक ट्रेलर
मशीन) द्वारा धन निकासी कर लेता है। प्रत्येक ए.टी.एम. कक्ष, वीडियो
सर्विलांस पर रहता है इसलिए ऐसे मामलों में जांच एजेंसी सबसे पहले संबंधित
बैंक से यह पता करती है कि बैंक के किस ए.टी.एम. से धन की निकासी की
गई है और उसके बाद जांच एजेंसी, संबंधित ए.टी.एम. के क्लोज सर्किट
टेलीविजन की वीडियो फुटेज को देख कर अपराधी की पहचान स्थापित करती
है। इसी प्रकार शॉपिंग मॉल्स और गहनों आदि की दुकानों से होने वाली चोरियों
का पता भी वीडियो सर्विलांस के द्वारा आसानी से लगा लिया जाता है। ये
वीडियो सर्विलांस द्वारा अपराध और अपराधी की पहचान के उदाहरण हैं।
विभिन्न धार्मिक व सार्वजनिक स्थलों पर आतंकी कार्रवाइयों का खतरा
सदैव बना रहता है इसलिए ऐसे स्थानों को आजकल वीडियो सर्विलांस के अंतर्गत
ला दिया गया है। वीडियो सर्विलांस के अंतर्गत विभिन्न ऐतिहासिक, धार्मिक
और राजनैतिक महत्त्व के स्थलों पर क्लोज सर्किज टेलीविजन कैमरे लगा दिए
जाते हैं, जिनको नियंत्रण कक्ष से जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार नियंत्रण कक्ष
में बैठे पुलिसकर्मी, टेलीविजन पर देखकर ही काफी बड़े क्षेत्र पर नजर रख सकते
हैं। ऐसा करने पर उस क्षेत्र विशेष में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की प्रत्येक गतिविधि
पर नजर रखना संभव हो गया है।

2 Comments

Suraj Kumar

Jan 1, 2020, 10:35 am Reply

Please

satydev prakash

Dec 12, 2019, 11:16 am Reply

kya public vi ese use kar sakta hai

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