कला का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

कला का अर्थ

अंग्रेजी में कला शब्द का प्रयोग 13वीं शताब्दी में शुद्ध कौशल के लिये हुआ। 17वीं शताब्दी में कला का प्रयोग, काव्य, संगीत, चित्र, वास्तु आदि कलाओं के लिये भी होने लगा।

कला का अर्थ 

कला मूलत: संस्कृत का शब्द है। संस्कृत साहित्य में इसका प्रयोग अनेकार्थों में हुआ है। ‘कल’ धातु से शब्द करना, बजना, गिनना, कड़् धातु से मदमस्त करना, प्रसन्न करना, ‘क’ अर्थात आनन्द लाने वाले अर्थ में जैसे भिन्न-भिन्न धातुओं से व्युत्पत्ति स्वीकार की है। 

‘‘आर्ट’’ का सम्बन्ध पुरानी फ्रैन्च आर्ट और लैटिन ‘आर्टेम’ या ‘आर्स’ से जोड़ा गया, इसके मूल में ‘अर्’ (।त) धातु है, जिसका अर्थ बनाना, पैदा करना, या फिट करना होता है, और यह संस्कृत के ‘ईर’ (जाना, फेंकना, डालना, काम में लाना) से सम्बन्धित है। 

लैटिन के आर्स का अर्थ संस्कृत के कला और शिल्प अर्थ के समान है, अर्थात कोई भी शारीरिक या मानसिक कौशल जिसका प्रयोग किसी कृत्रिम निर्माण में किया जाता है, इस कौशल को ‘‘आर्ट’’ से ही जोड़ा गया है। 

कला की परिभाषा

कला की परिभाषा कला के सम्बन्ध में अनेक मत प्रस्तुत किये हैं - 

माइकेल एन्जेलो के मतानुसार, ‘‘सच्ची कलाकृति दिव्यता पूर्ण प्रतिकृति होती है

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्राइड के मतानुसार, ‘‘कला हृदय में दबी हुई वासनाओं का व्यक्त रूप है’’ अर्थात हम जिन बातों को संकोचवश व्यक्त नहीं कर पाते हैं, उन्हें कला के माध्यम से नि:संकोच व्यक्त कर देते हैं।

मैकविल जे0 हर्सकोवित्स ने लिखा है, ‘‘योग्यता द्वारा सम्पादित जीवन के किसी भी उस अलंकरण को जिसे वर्णनीय रूप प्राप्त हो ‘कला’ है। रस्किन लिखते हैं कि ‘‘प्रत्येक महान कला ईश्वरीय कृति के प्रति आदमी के आàाद की अभिव्यक्ति है।’’

महान चित्रकार पिकासो का कथन है, ‘‘I putall the things, I like in my picture’’ अर्थात मैं अपनी तस्वीर में उन सभी का अंकन करता हूँ जो मुझे पसंद हैं, कलाकार अपनी इच्छा की पूर्ति में जिस उपाय का आश्रय लेता है, वही कला है। इसी प्रकार कला को मनुष्य की इच्छित इच्छाओं की पूर्ति का साधन माना है।

कला के सौन्दर्य में अनेकों कलाविदों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किये है, जो कि भिन्न-भिन्न है। कला को एक निश्चित परिधि में बांधना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी है। 

‘इन्साइक्लोपीडिया ऑफ लंदन’ में लिखा है - ‘‘Although this isa universal humanactivity,art is one of the hardest things in the words to define’’

अरस्तू उसे अनुकरण कहते हैं। हीगेल ने कला को आदि भौतिक सत्ता को व्यक्त करने का माध्यम माना है।

भारतीय विचारधारा : टैगोर के अनुसार - ‘‘मनुष्य कला के माध्यम से अपने गम्भीरतम अन्तर की अभिव्यक्ति करता है’’, प्रसादजी के अनुसार - ‘‘ईश्वर की कृतज्ञ-शक्ति का मानव द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कौशलपूर्ण निर्माण, कला है’’, अंग्रेजी लेखक पी0 बी0 शैली ने कहा है कि - ‘‘Art is the expression of Imagination’’

डॉ0 श्याम सुन्दर दास ने कहा है कि - ‘‘जिस अभिव्यंजना में आन्तिरक भावों का प्रकाशन तथा कल्पना का योग रहता है, वह कला है। सभी परिस्थितियों में कलात्मक क्रिया एक समान ही होती है। केवल माध्यम बदल जाते हैं।’’ कला के सम्बन्ध में अपना मत प्रस्तुत करते हुये श्री मोहनलाल महतो वियोगी ने लिखा है, ‘‘यह समस्त विश्व ही कला है जो कुछ देखने, सुनने तथा अनुभव करने में आता है, कला है।’’

आनंद कुमार स्वामी ने छोटे-छोटे वाक्यों में कला की परिभाषा दी है। कला प्रत्येक वस्तु के अंदर निहित है। कलाकार उस चीज के द्वारा कला का प्रदर्शन करता है। कला में मानवीय सत्य निहित है और कला स्वयं मानवीय लक्षण है। क्रिश्चियन दृष्टि में कला को किसी नतीजे अथवा ध्येय पर पहुँचने का साधन मानते हैं अर्थात् ईश्वर के समीप पहुँचने का मार्ग इसाइयों के नजदीक कला है। हिन्दू लोग भी कलाकृति (मूर्ति और चित्र) को ईश्वर तक पहुँचने का साधन समझते हैं।

कला की परिभाषा गुरूदेव अन्यत्र भी दे चुके हैं: ‘‘कला सौंदर्यमय प्रदर्शन है। कला आनंद, प्रसन्नता और सुख का स्त्रोत है। कला के द्वारा मनुष्य के भाव साकार (मूर्तिमान) बन जाते हैं। कला व्यक्तिगत दृष्टि से कलाकार की परम देन है। कला किसी भी जाति की, किसी खास समय की देन है।’’ रवीन्द्र नाथ टैगोर के शब्दों में ‘‘जो सत् है जो सुंदर है, वही कला है।’’

महात्मा गांधी कहते हैं कि-’’एक अनुभूति को दूसरे तक पहुँचाना ही कला है।’’ महान् कलाविद् वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में कला भावों का पृथ्वी पर अवतार है। वाचस्पति गैरोला के अनुसार ‘‘अभिव्यक्ति की कुशल शक्ति की कला है।’’ वहीं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं। ‘‘एक ही अनुभूति को दूसरे तक पहुँचा देना ही कला है।’’

माध्वी पारेख के शब्दों में-’’कला आंतरिक ऊर्जा है। ईमानदारी से देखें तो कला पूर्णत: निजी और अंतरमन की अभिव्यक्ति होती है।’’

अर्पणा कौर के अनुसार-’’जीवन-अनुभव एवं जीवन-दर्शन का निचोड़ कला है।’’ उसमें एक कला है। एक दर्शन है। सबसे बड़ी बात है कि उसमें रहस्य है। रहस्य के तत्व हैं। कला में थोड़ा बोलना है तो थोड़ा चुप भी रहना है। यानी एक स्पेस भी चाहिए। इसके साथ-साथ रंगों का ड्रामा है। हैरान कर देने वाली तासीर है। रंग-संयोजन एवं आकृति-संयोजन भी हैरान करने वाली होनी चाहिए। अंतत: अंतर्मन के अनुभवों एवं भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम कला है। 

फ्रेड गेटिन्गस ने कला को जादू कहा है उनके अनुसार कलाकार का ब्रश एक जादू की छड़ी की तरह है। एक समीक्षक द्वारा यह पूछे जाने पर कि कला क्या है देगा ने जबाव दिया " Well I have spent my life trying to find out and if I had found out I would have done something about it long ago."

इन सब परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि कला शिवत्व की उपलब्धि के लिये सत्य की सुन्दर अभिव्यक्ति है, इसका सामान्य अर्थ सौन्दर्य एवं रूप की रचना करना है, इसमें जिस सौन्दर्य या रूप की रचना होती है, वही आनंद का श्रोत है। आनन्द सौन्दर्य का सहज फल और उसकी अन्तिम परिणति है। 

इस प्रकार कला सौन्दर्य की रचना है। सौन्दर्य रूप का अतिशय है, रूप अभिव्यक्ति का माध्यम है, और अभिव्यक्ति सम्पूर्ण सत्ता का आत्मनिवेदन है। इसी तरह किसी भी कला में रूप और रचना दोनों एक साथ कार्य करते हैं तो कलात्मक अभिव्यक्ति उजागर हो पाती है। 

कला के प्रकार

कला के प्रकार, कला कितने प्रकार के होते हैं?
  1. गाना।
  2. बाजा बजाना
  3. नृत्य।
  4. अभिनय करना
  5. चित्र बनाना
  6. फूलों की सेज सजाना
  7. बिस्तर लगाना
  8. दाँत, वस्त्र तथा शरीर के अंगों को रंगना या कलात्मक ढंग से सजाना
  9. ऋतु के अनुकूल घर सजाना
  10. जलतरंग बजाना
  11. जल क्रीड़ा पिचकारी चलाना
  12. माला गूथना
  13. बालों में फूल गूथना या मुकुट बनाना
  14. कपड़े, गहने धारण करना
  15. सुगन्धित पदार्थ बनाना
  16. पत्ते या फूल आदि से कर्ण फूल बनाना
  17. आभूषण पहनना
  18. कुरूप को सुन्दर बनाना
  19. हाथों की फुर्ती
  20. बेल-बूटे बनाना या रफू करना
  21. पहेली बूझना
  22. अन्त्याक्षरी की योग्यता रखना
  23. कठिन पदों या शब्दों का अर्थ निकालना
  24. ठीक ढंग से पुस्तक पढ़ना
  25. नाटक देखना उसका रसास्वादन करना
  26. नेवाड़ या बेंत आदि से चारपाई बुनना
  27. चर्खा या तकली से सूत कातना
  28. बढ़ई यासंगतराश का काम
  29. वास्तु विद्य
  30. धातु या रतन पहचानना
  31. कच्ची धातु को स्वस्थ करना
  32. रत्नों के रंगा जानना।
  33. उपवन लगाने की कला
  34. विदेशी भाषा समझाना
  35. देश की बोलियों को समझाना
  36. प्राकृतिक लक्षणों के आधार पर भविष्य वाणी करना
  37. यन्त्र निर्माण
सन्दर्भ - 
  1. हसन डॉ0 सहला, भारतीय एवं पाश्चात्य कला, पृ0 सं0 05 
  2. बाजपेई, कृष्ण दत्त, कला सरोवर, अंक 1, 1987, पृ0 सं0 09
  3. भारतीय जीवन दर्शन और ललित कला 
  4. वियोगी, मोहन लाल महतो, कला का विवेचन, पृ0 सं0 18 
  5. गोस्वामी, डॉ0 प्रेमचंद, कला सरोवर अंक 2, 1987, पृ0 सं0 07
  6. वियोगी, मोहन लाल महतो, कला का विवेचन, पृ0 सं0 18 
  7.  वियोगी, मोहन लाल महतो, कला का विवेचन, पृ0 सं0 19 
  8. Oxford Junior, Encyclopedia, London, Pg. No. 24

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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