निर्देशन का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति तथा क्षेत्र

अनुक्रम
निर्देशन क्या है? इस सम्बन्ध में समस्त विद्वान एकमत नहीं है। वर्तमान युग के विवादग्रस्त प्रत्ययों में, यह एक ऐसा प्रत्यय है, जिसे विभिन्न रूपों में परिभाषित क्रिया गया है, फिर भी, सामान्यत: निर्देशन को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में स्वीकार क्रिया जाता है, जिसके आधार पर किसी एक अथवा अनेक व्यक्तियों को किसी न किसी प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है। इस सहायता के आधार पर, समस्याओं के सम्बन्ध में विवेकयुक्त निष्कर्ष निकालने, वांछित निर्णय लेने तथा अपने लक्ष्यों, उद्धेश्यों को प्राप्त करने में सुगमता होती है। निर्देशन के आधार पर ही, व्यक्ति को अपनी योग्यताओं, क्षमताओं, कौशलों तथा व्यक्तिगत से सम्बन्धित विशेषताओं का ज्ञान हो जाता है तथा वह स्वयं में निहित विशेषताओं का समुचित उपयोग करने में सक्षम हो जाता है। निर्देशन का उद्धेश्य व्यक्ति की समस्याओं का समाधान करना नहीं है, अपितु इसके आधार पर किसी व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान करने में स्वयं ही सक्षम हो सके। अनेक विद्वानों ने निर्देशन को एक ऐसी विशिष्ट सेवा के रूप में ही परिभाषित क्रिया है, जिसके आधार पर जीवन से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिये सहायता प्रदान की जाती है, इस प्रकार किसी भी व्यक्ति को अपनी समस्याओं के वांछित समाधान के लिये सहायता प्रदान करना ही निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत स्वीकार क्रिया जाता है। व्यक्ति अथवा समाज से सम्बन्धित किसी भी पक्ष अथवा क्षेत्र के सन्दर्भ में इस प्रकार की सहायता प्रदान की जानी संभव है।

निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत, निर्देशन प्राप्त करने वाले व्यक्ति में निहित विशेषताओं तथा शैक्षिक, व्यावसायिक क्षेत्र में सम्बन्धित अध्ययन आवश्यक है। इस समन्वित जानकारी के अभाव में निर्देशन की प्रक्रिया का सम्पन्न हो पाना नितान्त असम्भव है। व्यक्ति में निहित विशेषताओं की जानकारी प्राप्त करने के लिये व्यक्ति की योग्यताओं, रूचियों आदि का मापन करने वाले सामानों तथा मापनियों की आवश्यकताओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिये सामाजिक परिस्थितियों का अमययन आवश्यक होता है। व्यक्ति में निहित क्षमताओं, योग्यताओं आदि की जानकारी प्राप्त करने के लिये व्यक्तित्व परख, अभिवृनि परीक्षण, रूचि अनुसूची, बुद्धि परीक्षण आदि का विशेष महत्व है। यद्यपि समुचित जानकारी हेतु पूर्णतया वैध एवं प्रमाणीकृत परीक्षणों को ही विश्वसनीय निर्देशन के लिये प्रयुक्त क्रिया जाना चाहिये, परन्तु कुछ व्यक्तिनिष्ठ या आत्मनिष्ठ सामानों का प्रयोग भी निर्देशन के अन्तर्गत क्रिया जा सकता है।

विद्वानों के अनुसार, निर्देशन एवं शिक्षा, दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं इनके अनुसार जिस प्रकार शिक्षा एक व्यापक प्रक्रिया है, उसी प्रकार निर्देशन भी एक व्यापक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार क्रिया जाना चाहिये। इस प्रक्रिया के माध्यम से बालकों के विभिन्न पक्षों के विकास हेतु, उसी प्रकार सहायता प्रदान की जाती है, जिस प्रकार शिक्षा के द्वारा बालक के मानसिक, भावात्मक एवं शारीरिक पक्ष का विकास करने हेतु सहायता प्रदान की जाती है। इस प्रकार निर्देशन एक व्यापक प्रक्रिया है क्योंकि इसका क्षेत्र असीमित है। व्यक्ति के जीवन से सम्बद्ध प्राय: प्रत्येक क्षेत्र में यह सहायता प्रदान की जा सकती है। इसके अतिरिक्त शिक्षा के समान ही निर्देशन की प्रक्रिया भी जीवनपर्यन्त संचालित रहती है, जन्म से लेकर मृत्यु तक जहा कहीं भी, जिस रूप में भी व्यक्ति को सहायता प्राप्त होती है, वह सहायता निर्देशन के अन्तर्गत ही सम्मिलित की जाती है, इस प्रकार की सहायता प्रदान करने वाले व्यक्ति को निर्देशन-प्रदाता अथवा निर्देशन-कर्मी के नाम से सम्बोधित कर सकते हैं, विद्यालय में कार्य करने वाले शिक्षक प्रधानाचार्य, सह-कर्मी, परिवार के सदस्य तथा समाज में मित्र, सह-पाठी, प्रवचक आदि व्यक्ति निर्देशन प्रदाता के रूप में ही स्वीकार किये जाने चाहिये।

इन तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि निर्देशन की प्रक्रिया सुधारात्मक आयाम के स्थान पर विकासात्मक आयाम के रूप में ही परिभाषित की जानी अधिक सार्थक है, क्योंकि विशिष्ट सेवा के रूप में यह प्रक्रिया समस्या-केन्द्रित होने के स्थान पर सेवार्थी-केन्द्रित ही अधिक होती है। विशिष्ट सेवा के रूप में अर्थापित इस आयाम के अनेक दोष हैं। इस रूप में परिभाषित निर्देशन को विद्यालय की आनुषंगिक सेवा के रूप में पहचाना जाता है। यह सेवा कुछ विशिष्ट प्रकार के बालकों तक ही सीमित रहती है तथा सामान्य श्रेणी के बालकों को इस प्रकार के निर्देशन के माध्यम से कोई विशेष सहायता प्राप्त नहीं हो पाती है। इसके विशिष्ट सेवा आयाम के अन्तर्गत विद्यालय में कार्यरत परामर्शदाता की भूमिका ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझी जाती है। इसके परिणामस्वरूप, विद्यालय में कार्यरत अन्य व्यक्तियों की भूमिका प्राय: उपेक्षित भी रहती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति को एक यन्त्र के समान समझकर सहायता प्रदान की जाती है, जबकि उचित यह है कि व्यक्ति को एक गतिशील प्राणी के रूप में ही सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की जानी चाहिये।

एक अन्य आयाम के आधार पर निर्देशन को सहायता प्रदान करने वाली प्रक्रिया के रूप में प्रदर्शित क्रिया जाता है जिसके अन्तर्गत निर्देशन का उत्तरदायित्व सभी का स्वीकार क्रिया जाता है या किसी का भी नहीं। शिक्षक योग्यता, रूचि, क्षमता, निपुणता इत्यादि को, इस प्रकार के निर्देशन में विशेष महत्व प्रदान क्रिया जाता है। निर्देशन का उद्धेश्य व्यक्ति की समस्याओं का समाधान करना नहीं है, अपितु इसके आधार पर किसी व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान करने में स्वयं ही सक्षम हो सके।

निर्देशन के उपरोक्त अर्थ को स्पष्ट करने के अतिरिक्त, इसके आशय के सन्दर्भ में कुछ परिभाषाओं का भी उल्लेख क्रिया जा सकता है। यद्यपि निर्देशन की कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी तक प्रस्तुत नहीं की जा सकती है, परन्तु फिर भी, इन परिभाषाओं के आधार पर निर्देशन के अर्थ को समझने में सहायता प्राप्त हो सकेगी।

निर्देशन की परिभाषा

शर्ले हैमरिन (Shirley Hamrin) के शब्दों में - व्यक्ति के स्वयं को पहचानने में इस प्रकार सहायता प्रदान करना, जिससे वह अपने जीवन में आगे बढ़ सके, इस प्रक्रिया को निर्देशन कहा जाता है।,

लेस्रूटर डी. वे तथा एलाईस वे (Lester D. Crow and Alice Crow) - ने अपनी पुस्तक ‘एन इन्टांेडक्शन टू गाइडैन्स’ में निर्देशन को परिभाषित करते हुए लिखा है-निर्देशन से तात्पर्य, निर्देशन के लिये स्वयं निर्णय लेने की अपेक्षा निर्णय कर देना नहीं है और न ही दूसरे के जीवन का बोझ ढोना है। इसके विपरीत, योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा, दूसरे व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी आयु वर्ग का हो, अपनी जीवन क्रियाओं को स्वयं गठित करने, अपने निजी दृष्टिकोण विकसित करने, अपने निर्णय स्वयं ले सकने तथा अपना भार स्वयं वहन करने में सहायता करना ही वास्तविक निर्देशन है।,

आर्थर जे. जौन्स के शब्दों में - निर्देशन एक प्रकार की सहायता है जिसके अन्तर्गत, एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को उसके समक्ष आए विकल्पों के चयन, समायोजन एवं समस्याओं के समाधान के प्रति सहायक होता है। यह निर्देशन प्राप्त करने वाले व्यक्ति में स्वाधीनता का प्रवृनि एवं अपने उनरदायी बनने की योग्यता में वृद्धि लाती है। यह विद्यालय अथवा परिवार की परिधि में आबद्ध न रहकर एक सार्वभौम सेवा का रूप धारण कर लेती है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र यथा परिवार, व्यापार एवं उद्योग, सरकार, सामाजिक जीवन, अस्पताल व कारागृहों में व्यक्त होती है। वस्तुत: निर्देशन का क्षेत्र, प्रत्येक ऐसी परिस्थिति में विद्यमान होती है, जहा इस प्रकार के व्यक्ति हों जिन्हें सहायता की आवश्यकता हो और जहा सहायता प्रदान करने की योग्यता रखने वाले व्यक्ति हों।,
इसके अन्तर्गत, योजनायें उल्लेखनीय हैं-
  1. वास्तविक आवश्यकताओं एवं समस्याओं की जानकारी प्राप्त करना।
  2. सूचनाओं के आधार पर उनकी वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुदेशन को अनुकूलित करने में सहायता प्राप्त करना।
  3. वृद्धि एवं विकास के सम्बन्ध में, अधिकाधिक अवबोध की क्षमता का विकास करना।
  4. विशिष्ट सेवायें यथा-अभिविन्यास, वैयक्तिक तालिका, उपबोधन व्यापक सूचना एवं समूह निर्देशन से वंचित लोगो के अनुवर्तन इत्यादि का प्रावधान करना।
  5. कार्यव्म की सफलता ज्ञान करने वाले शोधों का संचालन।
डब्ल्यू. एल. रिन्कल व आर. एल. गिलव्स्ट के अनुसार - निर्देशन का आशय है- उपयुक्त एवं प्राप्त हो सकने योग्य उद्धेश्यों के निर्धारण कर सकने तथा उन्हें प्राप्त करने हेतु वांछित योग्यताओं का विकास कर सकने में सहायता प्रदान करना या प्रेरित करना। इसके आवश्यक अंग इस प्रकार हैं-उद्धेश्यों का निरूपण, अनुकूल अनुभवों का प्रावधान करना, योग्यताओं का विकास करना तथा उद्धेश्यों की प्राप्ति करना। बुद्धिमनापूर्ण निर्देशन के अभाव में शिक्षण को उनम शिक्षा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है तथा अच्छे शिक्षण के अभाव में दिया गया निर्देशन भी अपूर्ण होता है। इस प्रकार शिक्षण एवं निर्देशन एक दूसरे के पूरक हैं।,अमेरिका की नेशनल वोकेशलन गाइडेन्स ऐसोसिएशन ने निर्देशन को परिभाषित करते हुए लिखा है-निर्देशन वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति को विकसित करने, अपने सम्बन्ध में पर्याप्त एवं समन्वित करने तथा कार्य क्षेत्र में अपनी भूमिका को समझने में सहायता प्राप्त होती है। साथ ही इसके द्वारा व्यक्ति अपनी इस धारणा को यथार्थ में परिवर्तित कर देता है।,

मायर्स के अनुसार-निर्देशन, व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों व प्रशिक्षण से अर्जित क्षमताओं को संरक्षित रखने का एक मूल प्रयास है। इस संरक्षण के लिये वह व्यक्ति को उन समस्त सामानों से सम्पन्न बनाता है, जिससे वह अपनी तथा समाज की सन्तुष्टि के लिये, अपनी उच्चतम शक्तियों का अन्वेषण कर सके।,

टेंसलर के मतानुसार- निर्देशन वह है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यताओं एवं रूचियों को समझने, उन्हें यथासम्भव विकसित करने, उन्हें जीवन लक्ष्यों से संयुक्त करने तथा अन्तत: अपनी सामाजिक व्यवस्था के वांछनीय सदस्य की दृष्टि से एक पूर्ण एवं परिपक्व आत्म-निर्देशन की स्थिति तक पहुचने में सहायक होता है।,

लेकवर की दृष्टि में - निर्देशन, शैक्षिक प्रक्रिया की उस व्यवस्थित एवं गठित अवस्था को कहा जाता है जो युवा वर्ग को अपने जीवन में ठोस बिन्दु व दिशा प्रदान करने की क्षमता को बढ़ाने में सहायता प्रदान करता है जिससे उसकी व्यक्तिगत अनुभव में समृद्धि के साथ-साथ अपने प्रजातान्त्रिक समाज में अपना निजी योगदान सम्भव हो सके।,

स्टंप्स एवं लिण्डक्विस्ट के अनुसार निर्देशन व्यक्ति के अपने लिये एवं समाज के लिये अधिकतम लाभदायक दिशा में उसकी सम्भावित, अधिकतम क्षमता तक विकास में सहायक तथा निरनतर चलने वाली प्रक्रिया है।

निर्देशन की विशेषतायें

  1. निर्देशन जीवन में आगे बढ़ने में सहायक होती है। शिक्षण की भाति निर्देशन भी विकास की प्रक्रिया है। 
  2. निर्देशन द्वारा व्यक्ति को अपने निर्णय स्वयं ले सकने में सक्षम बनाना है तथा अपना भार स्वयं वहन करने में सहायता करना है।
  3. इसके अन्तर्गत एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को उसकी समस्याओं एवं समायोजन के विकल्पों के चयन में सहायक होता है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान करती है। 
  4. निर्देशन शिक्षा की प्रक्रिया के अन्तर्गत व्याप्त होता है। रूचियों, योग्यताओं एवं क्षमताओं को समझकर उनके अनुकूल सीखने की परिस्थितियों को प्रस्तुत करे जिससे उनकी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि की जा सके। 
  5. निर्देशन वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुरूप अनुदेशन को अनुकूलित करने में सहायता प्रदान करती है। 
  6. प्रभावशाली शिक्षण तथा अनुदेशन में निर्देशन प्रक्रिया निहित होती है। बुद्धिमनापूर्ण निर्देशन के अभाव में शिक्षण प्रक्रिया अपूर्ण होती है। 
  7. निर्देशन द्वारा व्यक्ति को विकसित करने, अपने सम्बन्ध में पर्याप्त एवं समन्वित जानकारी कराने तथा व्यवसायिक जीवन में अपनी भूमिका को समझने में सहायता प्रदान करना है। 
  8. निर्देशन व्यक्ति की जन्मजात योग्यताओं व शक्तियों तथा प्रशिक्षण से अनेक कौशलों को संरक्षित रखने का मूल प्रयास है। 
  9. निर्देशन व्यक्ति के अपने लिये एवं समाज के लिये अधिक लाभदायक दिशा में उसकी अधिकतम क्षमता के विकास में निरन्तर सहायक होता है।
निर्देशन की विशेषताओं से ज्ञात होता है कि निर्देशन मानव जीवन के विकास एवं समायोजन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो जीवन पर्यन्त निरंतर चलती है। निर्देशन शिक्षा का अभिन्न अंग है। व्यक्ति की सभी प्रकार की समस्याओं तथा समायोजन के समाधान में सहायक होती है। निर्देशन शिक्षा की सहायक प्रविधि है।

व्यक्ति की मनो-शारीरिक विशेषताओं, मनों-विकारों, संवेगात्मक अस्थिरताओं आदि की समुचित जानकारी के आधार पर व्यक्ति को वैयक्तिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु सहायता प्रदान की जानी संभव है, इस प्रकार की सहायता, वैयक्तिक निर्देशन के क्षेत्र में प्रदान की जाती है।

निर्देशन की प्रकृति

निर्देशन एक ऐसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो मानवीय जीवन में, एक विशिष्ट सेवा के रूप में अपना योगदान देती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत एक अधिक योग्य, निपुण अथवा सक्षम व्यक्ति अपने से कम योग्य, अकुशल अथवा असक्षम व्यक्ति को सहायता प्रदान करता है, सुझावों के रूप में, वैचारिक स्तर पर प्रदान की जाने वाली यह सहायता किसी भी क्षेत्र में प्रदान की जा सकती है। निर्देशन की यह विशेषता है कि इस प्रक्रिया के अन्तर्गत, व्यक्ति पर कुछ थोपने के स्थान पर उसके स्वाभाविक विकास को ही महत्व प्रदान क्रिया जाता है तथा व्यक्ति को विकास पथ पर अग्रसारित करने में सहायता प्रदान करना ही इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उद्धेश्य होता है। इस प्रकार सुझाव परक सहायता के आधार पर व्यक्ति की सफलता की सम्भावनाओं में वृद्धि करना तथा व्यक्ति एवं समाज का कल्याण करने हेतु निर्देशन सेवाओं का अत्यधिक महत्व है।

दार्शनिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक तीनों प्रकार से निर्देशन का महत्व होता है। इन तीनों क्षेत्रों से सम्बन्धित आधारों अथवा सिधान्तों का मयान रखकर ही इस प्रक्रिया का संचालन क्रिया जाता है। उदाहरणार्थ, दार्शनिक दृष्टि से व्यक्ति के समग्र अथवा सर्वागीण तथा समन्वित विकास पर बल दिया जाता है तथा मनोवैज्ञानिक सिणन्तों के अनुसार व्यक्ति के स्वाभाविक तथा वैयक्तिक विभिन्नताओं पर आधारित विकास को महत्व प्रदान क्रिया जाता है। निर्देशन की प्रक्रिया के माध्यम से जितने भी प्रयास किए जाते हैं उन समस्त प्रयासों का उद्धेश्य व्यक्ति का समग्र एवं समन्वित विकास करना ही है। साथ ही निर्देशन के अन्तर्गत प्रदान की जाने वाली सुझावात्मक सहायता, वैयक्तिक विभिन्नताओं को मयान में रखकर ही प्रदान की जाती है। यही कारण है कि इस प्रक्रिया में व्यक्ति के सहज एवं स्वाभाविक विकास को ही प्रमुखता प्रदान की जाती है। इस प्रकार सामाजिक आवश्यकताओं, अपेक्षाओं, मान्यताओं, मानदण्डों, मूल्यों आदि के आधार पर व्यक्ति को विकसित होने में सहायता प्रदान करना भी निर्देशन का एक महत्वपूर्ण उद्धेश्य है। निर्देशन के द्वारा समायोजन की क्षमता के विकास में सहायक होना तथा सामाजिक समस्याओं एवं सामाजिक आवश्यकताओं से व्यक्ति को परिचित कराकर, समाज कल्याण की दिशा में प्रेरित करना, यह सिदद करता है कि निर्देशन के अन्तर्गत, समाजशास्त्रीय आधारों को भी समान रूप से महत्व प्रदान क्रिया जाता है। अत: यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ज्ञान की तीनों शाखाओं (दर्शन, मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र) से सम्बन्धित सैणन्तिक आधारों को समन्वित महत्व प्रदान क्रिया जाता है।

निर्देशन की उपरोक्त प्रकृति के आधार पर उसकी कुछ प्रमुख विशेषताए स्पष्ट होती हैं। इन विशेषताओं का उल्लेख हैं-
  1. निर्देशन की उपरोक्त पद्धति व्यक्ति एवं समूह दोनों से ही सम्बन्धित होती है।
  2.  निर्देशन का स्वरूप बहु-पक्षीय होता है। 
  3. निर्देशन के सम्बन्ध में विविध प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिए, विभिन्न विधियों एवं प्रविधियों का प्रयोग संयुक्त रूप से क्रिया जा सकता है। 
  4. निर्देशन का सम्बन्ध व्यक्ति के समग्र पक्षों के विकास से होता है।
  5. व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) एवं वस्तुनिष्ठ (Objective) दोनों ही प्रकार के परीक्षणों का प्रयोग, निर्देशन के अन्तर्गत क्रिया जा सकता है।
  6. निर्देशन के आधार पर व्यक्ति एवं समाज, दोनों की ही प्रगति एवं विकास हेतु प्रयास क्रिया जाता है। 
  7. यह समस्या केन्द्रित (Problem Centered) एवं प्रार्थी केन्द्रित (Client Centered) प्रक्रिया है।
  8. व्यक्ति को आत्म-निर्देशन के योग्य बनाना ही इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्धेश्य है।
  9. यह विभिन्न क्षेत्रों में समायोजन की क्षमता का विकास करने में सहायक है। 
  10. इस प्रक्रिया का तात्कालिक उद्धेश्य, व्यक्ति की तात्कालिक समस्याओं के समाधान में सहायता करना है।

निर्देशन के क्षेत्र

व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार की समस्या का होना स्वाभाविक है। इन समस्याओं का समाधान किये बिना प्रगति-पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना नितान्त असम्भव है। कोई भी व्यक्ति जिस क्षण इन समस्याओं का समाधान करने की दिशा में हतोत्साहित हो जाता है, उसी क्षण उसकी प्रगति अवरूण् हो जाती है। इस दृष्टि से समस्या समाधान की क्षमता का विकास कितना अधिक महत्वपूर्ण है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। निर्देशन एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति में इस क्षमता का विकास करने में सर्वाधिक सहायक है, साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि जीवन से सम्बन्धित प्राय: प्रत्येक क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान करने की योग्यता का विकास करने में निर्देशन सहायक है। इस आधार पर निर्देशन के क्षेत्र की कल्पना करना कठिन नहीं है। वस्तुत: जहा-जहा भी समस्या है वहा, निर्देशन प्रदान करने की सम्भावना निहित है। अत: निर्देशन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। फिर भी इस प्रक्रिया का क्षेत्र प्रमुख रूप से शिक्षा, व्यवसाय एवं वैयक्तिक समस्याओं के समाधान तक ही सीमित रहता है। विशेषकर भारत में निर्देशन सेवाओं का कार्य क्षेत्र अभी तक सीमित ही है।

शैक्षिक निर्देशन के क्षेत्र में निर्देशन प्रक्रिया का उपयोग अनेक प्रकार से क्रिया जाता है यथा-(1) वांछित पाठ्यक्रम पर आधारित विषयों का चयन करने में (2) पाठ्य-सहगामी क्रियाओं के चयन हेतु (3) नवीन पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में निर्णय लेने में (4) अधिगम प्रक्रिया के निरन्तर, अपेक्षित सम्बोधित स्तर बनाये रखने की दृष्टि से (5) राष्टींय एकता पर आधारित कार्यव्मों में भाग लेने हेतु प्रेरित करने की दृष्टि से (6) अपव्यय एवं अवरोमान की समस्या का समाधान करने के लिये (7) प्रौढ़ शिक्षा पर आधारित कार्यव्मों की दिशा में प्रेरित करने हेतु, आदि। शैक्षिक क्षेत्र के समान ही व्यावसायिक क्षेत्र में भी निर्देशन की भूमिका का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र में यह प्रक्रिया अनेक दृष्टिकोण से सहायक हैं। उदाहरणार्थ-(1) योग्यतानुकूल व्यवसाय का चयन करने में (2) व्यावसायिक क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों से परिचित कराने के लिए (3) व्यवसायिक अवसरों में विविधता की दृष्टि से (4) श्रम एवं उद्योग की परिस्थितियों में वांछित परिवर्तन करने के लिए (5) विशिष्टीकरण की दिशा में प्रेरित करने हेतु तथा (6) नव-विकसित तकनीकी से परिचित कराने के लिए, आदि।

इसी प्रकार वैयक्तिक समस्याओं के समाधान हेतु भी निर्देशन का व्यापक उपयोग क्रिया जा सकता है, यथा-(1) संकट कालीन स्थिति के निरन्तर मानसिक एवं संवेगात्मक सन्तुलन बनाए रखने में (2) व्यक्तिगत समस्या का समाधान करने हेतु वांछित निर्णय शक्ति का विकास करने में (3) व्यक्ति समायोजन में वृद्धि करने हेतु (4) पारिवारिक संघर्ष से मुक्त होने में (5) पारिवारिक जीवन में समायोजन की दृष्टि से (5) अवकाश के समय का सदुपयेाग करने के लिए, इत्यादि।

शैक्षिक, व्यवसायिक एवं वैयक्तिक क्षेत्रों में निर्देशन की उपरोक्त भूमिका से यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्देशन का क्षेत्र अधिक व्यापक है। इन क्षेत्रों से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में व्यक्ति को सक्षम बनाने के अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि इन समस्याओं के समाधान हेतु व्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए एक निर्देशन प्रदान करने वाले व्यक्ति को अनेक विषयों के समन्वित अमययन की आवश्यकता होती है। विशेषकर मनोविज्ञान, समाजशास्त्र एवं दर्शन का अमययन, एक निर्देशन प्रदाता के लिए परम् आवश्यक है। समाज की आवश्यकताओं, परिस्थितियों एवं तात्कालिक समस्याओं का अमययन तथा व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया को समझाने के उपरांत ही यह सम्भव हो सकता है कि कोई व्यक्ति निर्देशन प्रदान करने की दिशा में कौशल प्राप्त कर सके। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि उसे निर्देशन की विधि एवं व्यक्ति की जानकारी प्रदान करने वाले परीक्षणों के प्रशासन व आकलन का समुचित ज्ञान हो।

Comments