परामर्श के सिद्धांत और प्रक्रिया

अनुक्रम
परामर्श अथवा उपबोधन की प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने से पूर्व इसकी प्रक्रिया के प्रमुख अंगों का ज्ञान प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। कोई भी प्रक्रिया किसी न किसी दिशा में एक अथवा अनेक उद्धेश्यों को प्राप्त करने के लिये ही सम्पन्न की जाती है। अत: लक्ष्य अथवा उद्धेश्य किसी प्रक्रिया का प्रमुख बिन्दु माना जाता है। इस लक्ष्य को अपने समक्ष रखकर ही प्रयासकर्ता विशिष्ट कार्यो का सम्पादन करता है।

परामर्श के सिद्धांत

परामर्श की प्रक्रिया विविध सिद्धांतों पर आधारित है। ये सिद्धांत हैं।
  1. परामर्श एक प्रक्रिया है। एक परामर्शदाता के लिए यह समझना आवश्यक है कि परामर्श एक मंदगति से चलने वाली प्रक्रिया है। इस तथ्य को न समझ पाने के कारण परामर्शदाता तथा प्रार्थी दोनों में ही निराशा का भाव उत्पन्न हो सकता है।
  2. परामर्श प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। विद्यालय स्तर पर परामर्श केवल बाधाओं तथा विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक व अन्य समस्याओं से जूझने वाले बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे के लिए आवश्यक है। 
  3. परामर्श प्रक्रिया का अर्थ केवल परामर्श देना ही नहीं है बल्कि प्रार्थी के साथ उसकी परिस्थितियों के साथ प्रत्येक कदम पर चलने वाली सोच तथा मार्गदर्शन है। परामर्श प्रक्रिया प्रार्थी को न्यायपूर्ण सोच के योग्य बनाती है। 
  4. परामर्श प्रक्रिया समस्या को सुलझाने की कोई विधि नहीं है बल्कि व्यक्ति को अपनी समस्या का समाधान ढूढने में सहायता करती है।
  5. परामर्श प्रक्रिया साक्षात्कार नहीं बल्कि प्रार्थी से बातचीत करके उसमें आत्मनिरीक्षण का विकास करना है।
  6. परामर्शदाता के लिए कुछ तथ्यों की जानकारी बहुत आवश्यक है। 
  7. इस दुनियां में प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव तथा प्रकृति अलग है। 
  8. परामर्शदाता को प्रार्थी की आलोचना व समस्याओं का समाधान करना चाहिए। 
  9. परामर्शदाता केवल प्रार्थी के लिए परामर्श, प्रेम तथा सहयोग द्वारा ऐसा वातावरण तैयार करता है, जिससे प्रार्थी को आत्मनिरीक्षण करने तथा जीवन को बेहतर ढंग से समझने का अवसर प्राप्त हो सके।

परामर्श की प्रक्रिया

परामर्श अथवा उपबोधन की प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने से पूर्व इसकी प्रक्रिया के प्रमुख अंगों का ज्ञान प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। कोई भी प्रक्रिया किसी न किसी दिशा में एक अथवा अनेक उद्धेश्यों को प्राप्त करने के लिये ही सम्पन्न की जाती है। अत: लक्ष्य अथवा उद्धेश्य किसी प्रक्रिया का प्रमुख बिन्दु माना जाता है। इस लक्ष्य को अपने समक्ष रखकर ही प्रयासकर्ना विशिष्ट कार्यो का सम्पादन करता है। परामर्श का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थी, अथवा अन्य किसी सेवार्थी में आत्मबोध एवं सामंजस्य की योग्यता का विकास करना है। इस योग्यता के विकसित होने पर वह स्वयं ही अपनी समस्या का समाधान करने योग्य बन जाता है, इस प्रकार लक्ष्य किस प्रक्रिया की व्यावहारिक क्रियान्विति का प्राथमिक आधार है। इसके अतिरिक्त जिसके लिये प्रयास किया जा रहा है, तथा जिसके द्वारा प्रयास क्रिया जा रहा है अर्थात् परामर्शदाता एवं परामर्शप्रार्थी भी परामर्श की प्रक्रिया के प्रमुख आधार बिन्दु होते हैं। इसलिये यह कहा जाता है कि परामर्श एक त्रिमा्रुवीय प्रक्रिया है जिसके तीन प्रमुख अंग है- लक्ष्य, परामर्शदाता एवं परामर्शप्रार्थी। इन तीन बिन्दुओं पर आधारित परामर्श की प्रक्रिया पर ही इस अमयाय में वर्णन किया गया है। समाहारक परामर्श की प्रवृनि के अनुरूप इसके अन्तर्गत आवश्यकता पड़ने पर और सेवार्थी के हित में होने पर भावात्मक अभिव्यक्ति पर नियन्त्रण भी लगाया जा सकता है। इसमें उपबोधक पूर्णरूप से तटस्थ नहीं रहता है। इसमें परिस्थिति के अनुरूप उपबोधक तथा सेवार्थी के सम्बन्धों के ममय छ पूर्व निश्चित दूरी (Reservations) निहित रहती है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सीद थार्न ने किया।

परामर्श की प्रक्रिया के घटक

परामर्श की प्रक्रिया के तीन घटक मुख्य हैं-
  1. परामर्श के लक्ष्य (Goal of Counseling)
  2. सेवार्थी (उपबोमय) (Client) तथा
  3. परामर्शदाता (Counselor)
परामर्श की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण घटक है-लक्ष्य को निर्धारित करना इन लक्ष्यों को उपबोधक एवं कौशलों के वातावरण एवं समाज के अनुरूप ही निर्धारित किया जाता है अर्थात् उपबोधक एवं सेवार्थी के धार्मिक, राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण के जो मूल्य एवं आदर्श मान्य होंगे उन्हीं के अनुरूप लक्ष्यों को निर्धारित किया जायेगा। लक्ष्यों के निर्धारण में सेवार्थी की रूचियों, आवश्यकताओं एवं वातावरण का भी मयान रखना पड़ता है। इस प्रकार से उपबोधन का लक्ष्य, सेवार्थी को मूल्यों के पुन: अन्वेषण (Rediscovery) में सहायता प्रदान करना होता है। परामर्श की प्रक्रिया में पारस्परिक सम्पर्क मुख्य सामान माना जाता है। अत: पारस्परिक सम्पर्क की सार्थकता हेतु सेवार्थी व उपबोधक, दोनो को एक दूसरे को जानना एवं समझना आवश्यक है। दोनों को ही एक-दूसरे का आदर भी करना चाहिए। यदि सेवार्थी एवं परामर्शदाता के ममय समुचित सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाते हैं तो उपबोधन की प्रक्रिया सफल नहीं हो सकती है।

मानवीय सम्बन्धों के विकास की तकनीक ही इन प्रविधियों का आधार है। रोजर्स एवं बैलने ने अधोलिखित परामर्शदाता केन्द्रित (Counselor-Centered) तकनीकों का उल्लेख किया है।
  1. परिचय - सेवार्थी के अनुभवों को यह कहकर अपना परिचयन दिया जा सकता है कि जैसा तुम अनुभव कर रहे हो वैसा ही मैने भी अनुभव किया था। 
  2. सलाह तथा सुझाव - सेवार्थी द्वारा अपनाये जाने वाले मागोद्व एवं कार्यो की ओर इंगित करना या उन दृष्टिकोण तथा मानदण्डों को निर्देशन प्रदान करना जिन्हें सेवार्थी को अपनाना चाहिए।
  3. सहमति - यह समझना कि उपबोध द्वारा सुझाये गये कार्यो व तत्वों को किस लिए करे तथा कुछ ऐसे व्यक्तियों का उदाहरण देना जिन्हें अपनाकर सेवार्थी अपनी समस्याओं का निराकरण कर सके। 
  4. प्रश्न करना - समस्या को गहनता से समझने में सहायक होने वाले प्रश्नों को निर्माण करना तथा प्रार्थी से प्रश्नों को पूछना। 
  5. अर्थापन - सेवार्थी द्वारा स्वयं के बारे में कही गयी पूर्ण अथवा अपूर्ण बात के प्रयास का अर्थापन करना तथा सेवार्थी को इस बात की जानकारी प्रदान करना कि किस प्रकार व्यवहार के विभिन्न पक्ष परस्पर सम्बन्धित हैं।
  6. पुन: आश्वासन या प्रशंसा करना - परामर्श द्वारा सेवार्थी के सकारात्मक मूल्यांकन की दृष्टि से, उसकी प्रशंसा करना तथा आत्मस्वीछति में उसकी सहायता करना। 
  7. आलोचना या निषेधात्मक मूल्यांकन - इस तकनीक के अन्तर्गत परामर्शदाता, सेवार्थी का निषेधात्मक मूल्यांकन करता है। परामर्श का महत्वपूर्ण तत्व है-परस्पर विचारों का आदान-प्रदान। यदि विचारों के आदान-प्रदान में कोई विघ्न आता है तो उपबोधन पूर्ण ही रहता है समुचित उपबोधक-सेवार्थी सम्बन्धों को विकसित करने हेतु कतिपय तकनीकों का विकास किया गया है।
सेवार्थी को ध्यान में रखते हुए उपबोध को तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।
  1. अनिदेशात्मक मार्ग दर्शन करना - वार्तालाप आरम्भ करने तथा उसे जारी रखने अभीष्ट से बनाये गए उन सामान्य प्रश्नों को, परामर्शदाता को पूछना चाहिए जिनका अभीष्ट बातचीत की दिशा प्रदान करना हो।
  2. स्थापना - इस तकनीकी के अन्तर्गत उपबोधक को स्वयं सेवार्थी के ममय सम्बन्धों के स्वरूप की सामान्य सहज व्याख्या करनी चाहिए। 
  3. अनुभूति की अभिव्यक्ति - सामान्यत: सेवार्थी अभिव्यक्ति की कठिनाई के कारण, उपबोधक को स्वयं के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाता है। ऐसी स्थिति में उपबोध को, सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्ति विचारों में से मूल विचारों की यह नवीन अभिव्यक्ति सेवार्थी को स्वयं को और अधिक अच्छी तरह समझने में सहायक होगी।
जब सेवार्थी अपनी कठिनाई को परामर्शदाता के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हो तो मध्य में, उपबोधक को सामान्य स्वीछति सूचक उनर जैसे- हू, हा आदि देते रहना चाहिए। इससे मात्र यह ज्ञात होता है कि परामर्शदाता सेवार्थी को स्वीकार कर उसे समझ रहा है।

परामर्श द्वारा अनुभव

परामर्श की प्रक्रिया के निरन्तर उपबोध को विभिन्न अनुभव प्राप्त होते हैं। इन अनुभवों से लाभान्वित होने हेतु उपबोधन के सत्र की पूर्व तैयारी करनी आवश्यक है। उपबोध को सेवार्थी के बारे में आवश्यक प्रदन एवं पूर्ण जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उपबोधक को सेवार्थी के बारे में आवश्यक प्रदन एवं पूर्व जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उपबोधन एवं सेवार्थी के मिलने का स्थान शान्त होना चाहिए। परामर्श की प्रक्रिया से पहले, उपबोधक एवं सेवार्थी के ममय सम्बन्ध स्थापित करना भी आवश्यक है। क्योंकि परामर्श की सफलता हेतु सम्बन्ध एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। परस्पर सम्बन्ध के स्वरूप के बारे में डीद एसद आरिविकिल ने लिखा है- ‘‘सम्बन्ध की स्थिति को सेवार्थी एवं परामर्शदाता के ममय विकसित आदर्श सम्बन्ध कहा जा सकता है, यह एक ऐसा सम्बन्ध है जो सरल सुखद तथा स्वतन्त्र होता है, जहा प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार है।’’ आरिविकिल द्वारा उपबोधन के निरन्तर समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है। इन समस्याओं का समाधान करने हेतु उपबोधक को बातों को ध्यान रखना चाहिए -
  1. परामर्शदाता को सेवार्थी को यह अनुभव करा देना चाहिए कि अन्य सत्रों के समान, आरम्भिक सत्र भी सेवार्थी से ही सम्बन्धित है तथा उपबोधन का केन्द्र बिन्दु सेवार्थी ही है। 
  2. परामर्शदाता को अपने कार्यो को पूर्ण निष्ठा के साथ करने चाहिए। उसके लिए यह अनिवार्य रूप से स्थान दे। 
  3. सत्र-समाप्ति के समय उपबोध को सेवार्थी को यह कह देना चाहिए कि वह उससे पुन: मिलने में रूचि रखता है। 
  4. सेवार्थी अपने मन में उपबोधक की एक प्रतिमा बना लेता है। उपबोधन के निरन्तर सेवार्थी अपनी बनाई गई उस प्रतिमा से उपबोधक की जाच करता है तथा यह देखता है कि वह उसके द्वारा बनाई गई प्रतिमा से कितनी समानता एवं विभिन्नता रखता है। 
  5. जब परामर्श अथवा आरम्भिक सत्र (Beginning Session) ही उसका अन्तिम सत्र (Concluding Session) भी हो तब उपबोधक यह मान सकता है कि प्रथम सत्र का मुख्य कार्य एक ऐसा मानात्मक वातावरण (Positive-Climate) उत्पन्न करता है। जिससे सेवार्थी अपनी समस्याओं के बारे में विचार हेतु पुन: आने की इच्छा रखें। 
परामर्श की प्रक्रिया के अन्तर्गत सेवार्थी के अन्तर्विकास (Development from with) में उसको सहायता प्रदान की जाती है। उपबोधन का कार्य तभी सपफल हो सकता है जब उपबोधक सेवार्थी को अपने विचारों एवं स्थितियों को व्यक्ति करने हेतु उचित अवसर दे तथा सेवार्थी को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति माने। निराशा, आत्म-विश्वास का न होना, स्वयं को महत्वहीन समझने में ही समायोजन का मूल होता है। उपबोधन की प्रक्रिया द्वारा सेवार्थी में इसी महत्व तथा आत्मविश्वास को पैदा किया जाता है। सारांश के रूप में, यह कहा जा सकता है कि उपबोधन की प्रक्रिया , एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। जब उपबोध एवं सेवार्थी परस्पर सम्बन्धों की समुचित पृष्ठभूमि बनाने में सपफल हो जाते हैं और उद्धेश्यों एवं लक्ष्यों के अनुरूप उपबोध का वे उपयोग करते हैं। तभी उपबोध की प्रक्रिया सार्थक एवं सपफल मानी जा सकती है।

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