परामर्श सेवाएं : वैयक्तिक परामर्श, समूह परामर्श, वृत्तिक परामर्श

By Bandey | | 3 comments
अनुक्रम -

वैयक्तिक परामर्श

आमतौर पर परामर्श व्यक्तिगत रूप से ही सम्पन्न होता है। परामर्श किसी भी प्रकार
की आवश्यकता पर व्यक्तिगत रूप में ही दिया जाता है। व्यक्तिगत परामर्श में व्यक्ति
की समंजन क्षमता बढ़ाने उसकी निजी समस्याओं का हल ढूढ़ने तथा आत्मबोध की
क्षमता उत्पन्न हेतु दी जाने वाली सहायता होती है।
यह कहना सर्वथा गलत न होगा कि वैयक्तिक परामर्श में व्यक्ति के शारीरिक,
मानसिक, सांवेगिक, शैक्षिक, व्यावसायिक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं को समझना
व उनका हल प्राप्त करने की दक्षता विकसित की जाती है। वैयक्तिक परामर्श की
आवश्यकता मुख्य रूप से किशोरावस्था से ही मूल रूप में प्रारम्भ होती है। इस परामर्श
का मुख्य उद्देश्य होता है-

  1. व्यक्ति को अपने आसपास के वातावरण की सम्भावनाओं को सही तरीके से
    समझने के योग्य बनाना। 
  2. व्यक्ति को अपने परिवार, समुदाय विद्यालय एवं व्यवसाय सम्बन्धी सामन्जस्य
    की व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने में सहयोग देना। 
  3. व्यक्ति में सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता विकसित करना।
  4. व्यक्ति को अपनी क्षमताओं एवं अभियोग्यता को समझने में सहयोग देना। 
  5. व्यक्ति द्वारा लिये जाने वाले व्यक्तिगत निर्णयों को लेने हेतु उचित इच्छाषक्ति
    विकसित करने में सहयोग देना।
  6. व्यक्ति को अपने जीवन को सही दिशा देने हेतु क्षमता विकसित करने में
    सहयोग देना। 
  7. अपने जीवन की विविध परिस्थितियों को समझने व उसी के अनुकूल अपेक्षित
    सूझबूझ विकसित करने में सहयोग करना।

 वैयक्तिगत परामर्श का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत सामंजस्य एवं व्यक्तिगत कुशलता
विकसित करना है।

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वैयक्तिगत परामर्श की आवश्यकता

वैयक्तिक परामर्श विशेष रूप में व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुरूप उसे सहायता
देने हेतु दिया जाता है। बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक अपने जीवन के विविध
सन्दर्भो में मधुर सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता ही स्वस्थ मानसिक स्वास्थ्य के
परिसूचक है। पुराने एवं नयी परिस्थितियों के मध्य टकराव कम करके सामंजस्य की
स्थिति उत्पन्न करवाना ही वैयक्तिक परामर्श का उद्देश्य होता है। उक्त परिप्रेक्ष्य में
वैयक्तिक परामर्श की आवश्यकता को निम्नलिखित दृष्टियों से प्रदर्शित किया जा
सकता है-

  1. व्यक्तिगत सामंजस्य एवं समायोजन बढ़ाने की दृष्टि से परिवार तथा विद्यालय
    के जीवन से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का उद्भव व्यक्ति के जीवन मे होता
    है जिनके निदान के लिये परामर्श की आवश्यकता होती है। 
  2. वैयक्तिगत दक्षता का विकास करने हेतु-परामर्श की दूसरी आवश्यकता
    अपनी क्षमता को पहचानने, निर्णय लेने व अनुकूलन की क्षमता विकसित करने हेतु
    होती है।
  3. आपसी तनावों व व्यक्तिगत उलझनों से निजात हेतु-वर्तमान में
    उपभोक्तावादी समाज ने आम मनुश्य को तनाव एवं आपसी उलझनों में ढ़केल दिया
    है इनसे निदान पाने के लिये व्यक्तिगत परामर्श की बहुत ही अधिक आवश्ककता
    होती है।
  4. व्यक्ति के पारिवारिक एवं व्यावसायिक जीवन में सामजंस्य बैठाने
    हेतु-
    आज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य भी व्यक्ति की आत्मनिर्भरता की प्राप्ति है।
    व्यक्ति किसी न किसी व्यवसाय से जुड़ा रहता है। व्यवसायिक जीवन भी उसका
    महत्वपूर्ण भाग बन जाता है परन्तु व्यक्ति के निजी पारिवारिक एवं सामुदायिक
    जीवन के साथ उसका समायोजन एवं सामंजस्य बिठाने का संघर्श प्रारम्भ हो जाता
    है और इसी के लिये उसे व्यक्तिगत परामर्श की आवश्यकता होती है।
  5. जीवन में धैर्य व सयंम के साथ सन्तुलन बनाये रखने हेतु-व्यक्ति के
    जीवन में जीवन पर्यन्त उसको अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और
    उसके लिये उसे धैर्य व संयम का प्रयोग करना पड़ता है और इनके अभाव में
    उसका कुसमायोजन होने लगता हैं। वैयक्तिक परामर्श से उसमें धैर्य व संयम का
    विकास किया जाता है।
  6. निर्णय लेने की क्षमता के विकास हेतु-व्यक्ति को सम्पर्ण जीवन में अनके
    निर्णय लेना पड़ता है जो कि उसके सम्पूर्ण जीवन पर प्रभाव डालता है। वैयक्तिक
    परामर्श के द्वारा व्यक्ति को उसकी परिस्थितिजन्य समस्याओं के समय सही निर्णय
    लेने की क्षमता विकसित की जाती है।
  7. व्यक्ति के जीवन में सुख, शान्ति व सन्तोष के भाव लाने हेतु-हर
    व्यक्ति के जीन में प्रमुख लक्ष्य सुख शान्ति व सन्तोष लाना होता है। इसके लिये
    उसकी मनोवृित्त्ा को समझते हुये उसमें सन्तोश के भाव पैदा करना भी वैयक्तिक
    परामर्श की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार हम देखते हैं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षित कुशलता,
आत्मसन्तोष एवं सामंजस्य स्थापित करने तथा स्वस्थ, प्रभावी एवं सहज आत्मविकास
का मार्ग प्रशस्त करने हेतु वैयक्तिक परामर्श की आवश्यकता होती है।

वैयक्तिक परामर्श के सिद्धान्त 

वैयक्तिक परामर्श की सम्पूर्ण प्रक्रिया के संचालन हेतु कुछ निश्चित सिद्धान्तों
को ध्यान में रखा जाता है।

  1. तथ्यों के गोपनीयता का सिद्धान्त-इस परामर्श में इस बात पर ध्यान दिया
    जाता है कि प्राथ्र्ाी से सम्बन्धित जो भी सूचनायें एवं तथ्य प्राप्त हों उन्हें गोपनीय
    रखे जायें। 
  2. लचीलापन का सिद्धान्त-वैयक्तिक परामर्श पूर्णतया प्रार्थी के हिताय चलने
    वाली प्रक्रिया होती है अत: इसे समय, काल, परिस्थिति के अनुसार लचीला
    बनाकर संचालित किया जाता है जिससे प्राथ्र्ाी को अपनी समस्याओं से निदान
    मिल सके। 
  3. समग्र व्यक्तित्व पर ध्यान-इस परामर्श में प्राथ्र्ाी के सम्यक विकास हेतु
    परामर्शदाता का ध्यान रहता है और उसकी क्षमता एवं व्यक्तित्व विकास का पूरा
    प्रयास किया जाता है। 
  4. सहिष्णुता एवं सहृदयता का सिद्धान्त-वैयक्तिक परामर्श में परामर्शदाता
    प्रार्थी को विचारों को व्यक्त करने की स्वतन्त्रता देता है और उसके प्रति सहिष्णु
    एवं सहृदय रहता है।प्रार्थी को इस बात का आभास कराया जाता है कि वह
    परामर्शदाता के लिये महत्वपूर्ण है।
  5. प्राथ्र्ाी के आदर का सिद्धान्त-वैयक्तिक परामर्श का उद्देश्य प्रार्थी को विभिन्न
    क्षेत्रों में अपेक्षित दक्षता, कुशलता, आत्मसन्तोष एवं सामजस्य कायम करते हुये
    स्वस्थ प्रभावी एवं सहज आत्म विकास का मार्ग प्रशस्त करने की दृष्टि से
    सहयोग देना है। अत: प्रार्थी का आदर किया जाता है। 
  6. सहयोग का सिद्धान्त-वैयक्तिक परामर्श में प्रार्थी के ऊपर अपने दृष्टिकाण्े  को
    विचारों को लादने के बजाय उसे स्वयं की समस्याओं के प्रति उचित समझ
    विकसित करते हुये उन्हें सुलझाने हेतु सहयोग दिया जाता है।
    उपरोक्त सभी सिद्धान्त वैयक्तिक परामर्श की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावशाली
    बना देते हैं। 

समूह परामर्श

समूह परामर्श की संकल्पना अपेक्षाकृत नवीन है। यह पद्धति ऐसे प्रत्याशियों
के लिए उपयोगी सिद्ध हुई है जो व्यक्तिगत परामर्श से लाभान्वित नहीं हो पाये हैं।
प्रत्येक व्यक्ति मूलत: सामाजिक होता है। कभी-कभी समाज में रहकर ही व्यक्ति
अपना अनुकूलन एवं अपनी समस्याओं का निदान कर लेता है। सी0जी0 केम्प (1970)
ने लिखा है कि व्यक्ति को अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में सार्थक सम्बन्ध बनाने की
आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं सम्बन्धों के आधार पर वे अपने जीवन को निकटता से
समझ पाते हैं और एक लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। इसके सन्दर्भ में सामूहिक परिपे्रक्ष्य
के प्रति रूचि बढ़ती जा रही है।
समूह परामर्श के आधार-समूह परामर्श के कुछ मूलभूत आधार हैं जिनकी चर्चा नीचे
की जा रही है-

  1. व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व सम्बन्धी पूँजी तथा अभाव का ज्ञान हो। व्यक्ति
    अपनी क्षमताओं के प्रति या तो अल्प ज्ञान रखता है, या अज्ञानी होता है।
    कभी-कभी तो वह अपनी क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ा कर कहता है। उसके
    स्वमूल्यांकन में यथार्थ का अभाव होता है। सामूहिक परामर्श प्रत्याशी को इस
    योग्य बनाता है कि वह समूह में रहकर अन्य व्यक्तियों की पृष्ठभूमि में अपनी
    वास्तविक क्षमता को पहचान सके और अपनी कमियों को दूर कर सके। 
  2. समूह परामर्श व्यक्ति को इस योग्य बनाता है कि वह अपने व्यक्तित्व में
    सन्निहित सम्भावनाओं के अनुरूप सफलता प्राप्त करने में सफल हो सके।
    समूह में रहकर वह अपनी प्रत्यक्ष सम्भावनाओं को भलीभाँति पहचान सकता
    है।
  3. वैयक्तिक भिन्नता एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से
    कार्य, अभिवृित्त्ा, बुद्धि आदि में भिन्न होता है। समूह परामर्श इस मनोवैज्ञानिक
    तथ्य की उपेक्षा नहीं करता। यह कुशल परामर्शक पर निर्भर करता है कि वह
    वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए भी समूह परामर्श प्रदान कर
    सकें। 
  4. प्रत्याशी को समाज का अंग मानना समूह-परामर्श का चौथा सिद्धान्त है।
    प्रत्येक व्यक्ति समूह अथवा समाज में रहकर ही अपना विकास कर पाता।
    सामूहिक जीवन का अनुभव ही उसे विकास के पथ पर अग्रसर करता है।
    समाज से पृथक रहकर व्यक्ति कुण्ठाग्रस्त हो जाता है। 
  5. प्रत्याशी में सम्प्रत्यय का विकास सामूहिक परामर्श का पाँचवाँ सिद्धान्त है।
    समूह में रहकर ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास सम्भव हो पाता है और वह
    अपने विषय में सही धारणा बना सकता है। 

समूह परामर्श के लाभ 

  1. सीमन लिखता है कि सामूहिक-परामर्श एक सुरक्षित एवं समझदारी का
    परिवेश प्रस्तुत करता है। इस परिवेश में सबका सहभाग होता है और सबका
    अनुमोदन भी होता है। 
  2. इसमें ऐसा अवसर सुलभ होता है जो स्वच्छ, नि:शंक तथा उन्मुक्त हो और
    जिसमें समस्याओं का समाधान ढूँढा जा सके और खुला मूल्यांकन किया जा
    सके। 
  3. परामर्शदाता को समूह-आचरण सम्बन्धी ज्ञान का उपयोग करने का अवसर
    प्राप्त होता है। 
  4. अनेक मानवीय दुर्बलताओं जैसे नशा-सेवन, यौन-शिक्षा आदि पर खुली
    बहस हो सकती है। 

समूह परामर्श की आवश्यकताएँ 

  1. व्यक्तिगत साक्षात्कार-समहू -परामर्श समाप्त होने के उपरान्त परामर्शक
    प्रत्येक सेवार्थी का व्यक्तिगत साक्षात्कार करता है ताकि वह प्रत्याशी की
    व्यक्तिगत समस्याओं से अवगत हो सके। परामर्शक को जो सूचनाएँ
    समूह-परामर्श से प्राप्त नहीं होती हैं उनकी पूर्ति व्यक्तिगत साक्षात्कार द्वारा
    कर लेता है। इस प्रक्रिया से प्रत्याशी की सहायता करने में परार्शक को
    सरलता होती है। 
  2. परामर्श-कक्ष की समुचित व्यवस्था-जिस कक्षा में समूह-परामर्श दिया
    जाता है उस कक्ष को सर्वप्रथम सुखद बनाया जाना चाहिए। कक्ष का
    वातावरण ऐसा हो कि प्रत्याशी अपनेपन का अनुभव करें। बैठने की कुर्सियाँ
    आरामदेह एवं सुखकारी हों। 
  3. समूह में एकरूपता-जहाँ तक सम्भव हा,े परामर्शेय समहू में आयु, लिगं
    तथा यथासम्भव समस्या की एकरूपता हो ताकि परामर्श प्रदान करने में
    सुविधा हो। कुछ परामर्शदाताओं का यह मत है कि असमान समूह को
    परामर्शित करना अधिक लाभदायी होता है। 

समूूह का आकार-समहू का आकार वृहत् होने पर परामर्श निरर्थक हो जाता है अत:
समूह का आकार यथासम्भव छ: से आठ तक होना चाहिए। इसमें विचारों का
आदान-प्रदान उत्तम हो जाता है।

समूह परामर्श की प्रक्रिया

(1) समूह-परामर्श की प्रक्रिया – समूह-परामर्श के लिए परामर्शप्रार्थी के लक्ष्य की जानकारी आवश्यक है और
लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए समूह के अन्य सदस्यों के सहयोग की अपेक्षा होती है।
इसके लिए निम्न प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है।

  1. प्र्रत्येक सदस्य के लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करना-समूह-परामर्शक तभी
    सफल हो पाता है जब उसे सेवार्थी के उद्देश्यों की पूरी जानकारी हो। 
  2. संगठन का निर्णय-अपनी परामर्श-योजना में यदि परामर्शक सगं ठन द्वारा
    लिये गये निर्णयों को ध्यान में रखकर परामर्श देता है तो सामूहिक परामर्श
    अधिक प्रभावकारी होता है। 
  3. समूूह का गठन-व्यक्ति के लक्ष्य और व्यक्ति के स्वभाव को ध्यान में
    रखकर ही समूह के प्रत्येक सदस्य को अधिक लाभ पहुँचाया जा सकता है। 
  4. परामर्श का आरम्भ-समहू -परामर्श को आरम्भ करत े समय परामर्शदाता
    को अपनी तथा अन्य सदस्यों की भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। यदि समूह
    के सभी सदस्य परामर्श में सहयोग दें तो परामर्शक का कार्य अधिक सुगम
    हो सकता है। 
  5. सम्बन्धों का निर्माण-सामूहिक-परामर्श की प्रक्रिया में जैसे-जैसे परामर्श
    का कार्य आगे बढ़ता है, सम्भावना रहती है कि सेवार्थी अपने लक्ष्य से भटक
    जाय। अत: परामर्शदाता का यह दायित्व बनता है कि वह अपनी निष्पक्षता
    का परिचय देते हुए अपने प्रति प्रत्याशी में विश्वास जगाये और उसे उसके
    लक्ष्यों का निरन्तर स्मरण दिलाता रहे। 
  6. मूल्यांकन-परामर्श के प्रभाव का मूल्याकंन अन्तिम सोपान है। परामर्शदाता
    को अपने प्रभाव का मूल्यांकन करते रहना चाहिए ताकि वह जान सके कि
    उसके परामर्श का क्या प्रतिफल रहा है। 

(2) समूह-परामर्श के क्रियाकलाप- समूह-परामर्श के अंतर्गत विविध प्रकार के क्रियाकलापों का समावेश होता है।
यथा, अभिमुखीकरण, कैरियर/वृित्त वार्ताएँ, कक्षा-वार्ताएँ, वृित्त-सम्मेलन, किसी संस्था
जैसे : उद्योग, संग्रहालय, प्रयोगशाला आदि की शैक्षिक यात्राएँ तथा अनेक प्रकार के
अनौपचारिक नाटक-समूह। आगे इन सभी की चर्चा विद्यालय-परिस्थिति में आयोजन
करने की दृष्टि से की जा रही है।

वृत्तिक परामर्श 

इस प्रकार के परामर्श में छात्रों के लिए कई सुनियोजत बैठकों का अयोजन किया जाता
है, जिनका उद्देश्य विभिन्न विषयों पर छात्रों को सूचना प्रदान करना है। इनसे छात्रों को
भविश्य में अपने लिए व्यावसायिक और शैक्षिक कैरियर चुनने और उससे संबंधित
योजना बनाने में सहायता मिलती है। इस प्रकार की बैठकों के दौरान छात्रों को
व्यावसायिक सूचनाएँ मिल जाती है और अध्यापकों, अभिभावकों तथा समुदाय के लोगोंं
में निर्देशन-कार्यक्रम के महत्व के संबंध में सामान्य रूप से जागरूकता पैदा हो जाती
है।

कैरियर परामर्श की योजना बनाने में उपबोधक, विद्यालय-संकाय तथा छात्रों
के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता होती है। एक कार्य-योजना-समिति का गठन
किया जाए जिसमें इन सभी समूहों के प्रतिनिधि सम्मिलित हों, जिससे समग्र विद्यालय
में सहभागिता का भाव आ सके। अभिभावकों को संसाधन-विष्लेशकों के रूप में इस
वृित्त सम्मेलन में भाग लेने के लिए बुलाया जाना चाहिए। परामर्श की योजना बनाते समय जो मार्गदर्शक रूपरेखा तैयार की जाए, उसमें
निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाए –

  1. सम्मेलन के प्रयोजन के संबंध में छात्रों को पहले ही बता देना चाहिए 
  2. जाँच-सूचियों के द्वारा छात्रों की व्यावसायिक अभिरूचियों की जानकारी प्राप्त
    कर ली जाए ताकि तदनुसार ही उन-उन क्षेत्रों के विशेषज्ञ वक्ताओं को
    आमंत्रित किया जा सके। 
  3. अतिथि वक्ताओं के नाम बैठक में सुझा दिए जाँए तथा कार्य-प्रभारी की
    नियुक्ति भी उसी समय कर देनी चाहिए। 
  4. किस दिन किस विषय पर चर्चा होनी है? सम्मेलन किस दिन आयोजित होगा?
    इन सभी बातों को पहले ही निश्चय कर लेना चाहिए। ध्यान रहे कि उस
    निर्धारित अवधि में परीक्षाएँ न पड़ती हों। क्योंकि परीक्षा के निकट होने की
    स्थिति में छात्र अन्य कामों में अपनी रूचि नहीं दिखा सकेंगे। 
  5. प्रत्येक दिन की वार्ताओं का क्रम, चर्चा-समूहों का क्रम, फिल्म-शो आदि की
    पहले से ही व्यवस्था कर लेनी चाहिए। 
  6. विद्यालय कर्मियों तथा स्वयं-सेवी छात्रों के कामों का बँटवारा पहले ही कर
    दिया जाए। 
  7. प्रचार-पत्रक तैयार कर लें। सम्मेलन के संबंध में अभिभावकों को पूर्व सूचना
    भेज दी जाए।
  8. कैरियर परामर्श में जिन-जिन विषयों के बारे में चर्चा होनी है उनसे संबंधित
    चार्ट तैयार कर लिए जाएँ ताकि छात्रों को विषयों से संबंधित कुछ पूर्व
    जानकारी प्राप्त हो सके। 
  9. समूह परामर्श में प्राप्त सूचनाओं के आधार पर व्यक्तिगत समस्याओं को
    सुलझाने हेतु साक्षात्कार किया जा सकता है जिससे कि व्यक्तिगत स्तर पर
    उत्पन्न कठिनाई का निदान हो सकें। 

परामर्श की योजना के चरण 

वृत्तिक-परामर्श के लिए महीनों पहले योजना बना लेनी चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित
सोपान आवश्यक है।

  1. परामर्श आयोजित करने का विचार कम से कम 45 दिन पहले ही लोगों के
    सामने प्रकट कर देना चाहिए। सम्मेलन आयोजित करने की प्रषासनिक
    स्वीकृति मिल जाने के तुरन्त बाद छात्रों को इसकी सूचना दी जा सकती है।
    छात्रों को पहले से सूचित करना इसलिए आवश्यक है ताकि वे स्वयं-सेवक
    कार्यकर्त्त्ााओं के रूप में अपने नाम दे सकें। 
  2. स्वेच्छा से कार्य करने वाले अध्यापकों तथा छात्रों की एक सूची तैयार कर लेनी
    चाहिए और उनके बीच कार्य का वितरण कर देना चाहिए। जैसे, माइक का
    प्रबंध कौन करेगा? भाशणों का आयोजन करने की जिम्मेदारी किस पर होगी?
    स्वल्पाहार की व्यवस्था किसके हाथों में रहेगी? सूचना-पत्रकों के वितरण की
    व्यवस्था कौन देखेगा? आदि-आदि। 
  3. दूसरे विद्यालयों के प्रधानाचार्यो तथा अभिभावकों को उचित समय पर पत्र भेज
    दिए जाएँ। पत्रों के साथ कैरियर परामर्श के उद्देश्य तथा योजना की संक्षिप्त
    रूपरेखा भी भेजी जानी चाहिए। 
  4. अतिथि-वक्ताओ को पर्याप्त समय पहले पत्र भेज दिए जाएँ।
  5. वार्ताओं, चर्चाओं फिल्मों व चार्ट आदि का विस्तृत कार्यक्रम पहले से तैयार कर
    लिया जाए। 
  6. माइक की व्यवस्था, बैठने की व्यवस्था, वीडियों कैसेट बनाने की व्यवस्था आदि
    पहले से तय हो। जो पत्रक बाँटे जाने हों उन्हें पहले ही मुद्रित करवा लेना
    चाहिए।
  7. पर्याप्त समय पूर्व ही सत्रानुसार कार्यक्रम का विवरण निश्चित कर लेना चाहिए
    तथा छात्रों एवं दूसरे प्रतिभागियों को समय से पूर्व सूचना दे देनी चाहिए।
  8. प्रत्येक सत्र के लिए वक्ताओं की सूची तैयार कर लें। उचित होगा यदि हर सत्र
    के लिए दो-तीन वक्ताओं के नामों का विकल्प रहे ताकि यदि कोई वक्ता-विशेष
    उपलब्ध न हो सके तो दूसरे वक्ता को आमंत्रित किया जा सके।
    संसाधन-विशेषज्ञों के रूप में अभिभावकों, पूर्व छात्रों तथा स्टाफ सदस्यों को
    नामित किया जा सकता है। 
  9. वक्ताओं को दिए जाने वाले विषयों की एक रूपरेखा तैयार कर ली जाए ताकि
    यह पता रहे कि कौन-सा वक्ता किस विषय पर बोलेगा। 

जब परामर्श सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाए तब बाद में एक परिचर्चा आयोजित कर
उसकी कमियों का आकलन कर लेना चाहिए ताकि अगले सम्मेलन में उन कमियों की
पुनरावृित्त न हो।

Bandey

I’m a Social worker (Master of Social Work, Passout 2014 from MGCGVV University ) passionate blogger from Chitrakoot, India.

3 Comments

Unknown

Apr 4, 2018, 10:58 am

व्यक्तिगत और सामूहिक परामर्श के उदाहरण भी देना चाहिए जिससे अच्छा समझा जा सके

Reply

Unknown

Aug 8, 2018, 5:18 pm

Good

Reply

Unknown

Oct 10, 2018, 7:25 pm

Thanks

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