व्यावसायिक निर्देशन क्या है?

अनुक्रम
व्यावसायिक निर्देशन के आशय पर (1924) में ‘नेशनल वोकेशनल गाइडेंस एसोसिएशन’ के द्वारा उल्लेख किया  गया है। इस ऐसोसिएशन ने अपनी रिपोर्ट में व्यावसायिक निर्देशन को परिभाषित करते हुए लिखा कि व्यवसाय निर्देशन व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयार करने, उसमें प्रवेश करने तथा उसमें विकास करने हेतु सूचना देने, अनुभव देने तथा सुझाव देने की प्रक्रिया है।,

इन परिभाषा से पूर्व (1908) ई. में प्रेंक पारसन्स के द्वारा अपनी एक रिपोर्ट में, निर्देशन शब्द का प्रयोग किया  जा चुका था, परन्तु निर्देशन के व्यावसायिक पक्ष को, उनके द्वारा परिभाषित करने का कोई प्रयास नहीं किया  गया। इस प्रकार व्यावसायिक निर्देशन को परिभाषित करने के उपरोक्त प्रयास को ही सर्वप्रथम प्रयास के रूप में स्वीकार किया जाता है, फिर भी अनेक प्रकार से उपरोक्त परिभाषा को त्रुटिपूर्ण बतलाया गया। इस त्रुटि का प्रमुख कारण यह था कि यह परिभाषा किसी एक व्यक्ति के द्वारा परिभाषित नहीं की गई, वरन् कई विद्वानों के समन्वित प्रयास को इस परिभाषा के माध्यम से अभिव्यक्त कर दिया गया। यही कारण है कि (1937) ई. में इस एसोसिएशन के द्वारा दूसरी परिभाषा प्रस्तुत की गई। इस में प्रस्तुत परिभाषा- फ्व्यवसाय निर्देशन एक प्रक्रिया है जो व्यवसाय चयन, इसके हेतु तैयार होने में, इसमें प्रवेश करने में तथा उसमें दक्षता प्राप्त करने में सहायता देती है। इसका मुख्य उद्धेश्य जीविका-निर्माण तथा निर्णय लेने में सहायता करने से है। यह निर्णय तथा इच्छाए व्यावसायिक समायोजन का उद्धेश्य संतोषजनक रूप से पूरा करती है।, अन्तर्राष्टींय श्रम संगठन (1949) (I. L. O.) के द्वारा भी, व्यावसायिक निर्देशन का आशय स्पष्ट किया  गया। इस संगठन के अनुसार-फ्व्यावसायिक निर्देशन, व्यक्तियों के गुणों एवं व्यवसाय के साथ उनके सम्बन्ध को मयान में रखते हुए, व्यक्ति को व्यवसाय के चयन एवं उसकी प्रगति में आने वाली समस्याओं के सुलझाने में प्रदान की जाने वाली सहायता को कहते हैं।

डोनाल्ड सुपर (Donald Super) के शब्दों में-किसी व्यक्ति को अपना एवं व्यवसाय क्षेत्र के बीच अपनी भूमिका का समग्र एवं पर्याप्त चित्र बनाने, उसे स्वीकार करने, वास्तविक स्थिति के समय, इस अवधारणा की जाच करने एवं उसे स्वयं के सन्तोष तथा समाज के लाभ हेतु, वास्तविकता में बदलने की सहायता प्रदान करने के उपक्रम को व्यावसायिक निर्देशन कहते हैं।,

सुपर द्वारा दी गई उपरोक्त परिभाषा को यदि विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उपरोक्त परिभाषा में व्यावसायिक निर्देशन के सभी पक्षों को ध्यान में न रखकर इसके कार्यो पर ही अधिक बल दिया है। सुपर ने स्वयं भी इस परिभाषा को दोषपूर्ण स्वीकार करते हुए इसका आलोचनात्मक विश्लेषण किया  है। मायर्स के अनुसार- उनके ही शब्दों में-व्यवसाय निर्देशन, मुख्य रूप से वह प्रक्रिया है युवावस्था की प्रकृति क्षमताओं तथा विद्यालयों में प्रदन प्रशिक्षण को संकलित करती है। यह इन सबसे अधिक मूल्यवान मानवीय सामानों का संकलन, उसका उस स्थान पर उपयोग करने में सहायता करती है जहा पर वह अधिकतम कल्याण कर सके।,

व्यवसायिक निर्देशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव में निहित शक्तियों को संचित एवं सुरक्षित रखा जा सकता है।

व्यावसायिक निर्देशन की विशेषताएँ

निर्देशन की परिभाषाओं का अध्यनन करने के उपरान्त इसकी कुछ विशेषताए स्पष्ट होती हैं जो हैं-
  1. व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्ति में सम्बन्ध से स्पष्ट बोध विकसित किया  जा सकता है। इसके आधार पर व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? 
  2. व्यावसायिक निर्देशन के आधार पर कार्य के स्वरूप एवं कार्य से सम्बन्धित व्यक्तियों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है।
  3. व्यावसायिक निर्देशन एक प्रक्रिया है। विभिन्न उद्धेश्यों, सामानों, प्रविधियों आदि को समन्वित रूप से मयान में रखकर इस प्रक्रिया को सम्पन्न किया जाता है।
  4. व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया के आधार पर, व्यक्ति की योग्यताओं सफलताओं, रूचियों, प्रेरणाओं आदि के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 
  5. व्यावसायिक निर्देशन के लिए आवश्यक जानकारी, दक्षता, योग्यता आदि के सम्बन्ध में सूचनाए एकत्र की जाती है।
इस प्रकार संक्षेप में, व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत व्यक्ति एवं व्यवसाय दोनों का ही समान रूप से अध्यनन एवं मूल्यांकन किया जाता है। व्यावसायिक समस्याओं के समाधान हेतु प्रदान की जाने वाली यह एक ऐसी सहायता है जो व्यावसायिक अवसरों के लिए, वांछित योग्यताओं को मयान में रखकर प्रदान की जाती है। इसका प्रमुख उद्धेश्य, व्यावसायिक समायोजन की योग्यता का विकास करना तथा मानव की शक्ति के यथेष्ट उपयोग द्वारा समाज की अर्थव्यवस्था के संचालन में सहायता प्रदान करना है।

व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता

वैयक्तिक भिन्नताओं एवं व्यवसायों को विविधता के कारण व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक होता है। माननीय व्यक्तित्व की जटिलता तथा व्यावसायिक कार्यक्षेत्रों में होने वाले तीव्रगामी परिवर्तनों को मयान में रखते हुए व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता और भी अधिक अनुभूति की जाने लगी है। इस प्रक्रिया की महना, केवल किसी व्यवसाय में प्रवेश करने की दृष्टि से नहीं, वरन् व्यवसाय में प्रविष्ट होकर वृनिक सन्तोष की दृष्टि से भी यह सहायक है संक्षेप में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता को बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है।
  1. वैयक्तिक भिन्नताओं की दृष्टि से-वैयक्तिक भिन्नता के सिधान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में निहित योग्यताए, क्षमताए, रूचि, अभिरूचि आदि भिन्न-भिन्न होती है। किसी न किसी रूप में, प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न होता ही है। इस विभिन्नता की समुचित जानकारी प्राप्त किए बिना यह सम्भव नहीं है कि व्यक्ति की अभिरूचि, भावी प्रगति अथवा व्यवसाय के लिए अनुकूल व्यक्तियों का चयन करने से पूर्व वैयक्तिक विभिन्नताओं के स्तर एवं स्वरूप की जानकारी आवश्यक होती है, क्योंकि प्रत्येक व्यवसाय के लिए छ विशेष योग्यताओं वाले व्यक्ति की आवश्यकता होती है। निर्देशन के द्वारा इस सन्दर्भ में विभिन्न माध्यमों से पर्याप्त सूचनाए एकत्र की जा सकती है।
  2. व्यावसयिक भिन्नता की दृष्टि से-प्राचीन समय में देश की अधिकांश जनता छषि व्यवसाय के माध्यम से ही अपनी जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान कर लेती थी। समाज की आवश्यकताए भी उस समय सीमित थी तथा जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत कम था। संयुक्त परिवार प्रथा के कारण एक परिवार के सदस्यों को एक ही स्थान पर रहकर अधिकाधिक अर्थोपार्जन का अवसर सुलभ रहता था। परन्तु जनसंख्या की तीव्रगति से होती हुई वृद्धि, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण आदि के पफलस्वरूप अनेक नवीन प्रकार के उद्योगों, व्यवसायों की आवश्यकता का अनुभव किया  जाने लगा। शीघ्र ही विभिन्न प्रकार की प्रकृति वाले व्यवसायों का उदय होना प्रारम्भ हो गया और स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त अल्पकाल में ही अनेक व्यवसाय संचालित किए जाने लगे। इन सभी व्यवसायों में अपेक्षित उत्पादन एवं कार्य कौशल की दृष्टि से अनुकूल व्यक्तियों के चयन की समस्या का उत्प। होना स्वाभाविक था। अत: विद्यालयी स्तर पर ही यह आवश्यक समझा गया कि शिक्षार्थियों को उनकी अभिरूचि के अनुसार विषयों के चयन में सहायता प्रदान की जाए जिससे शिक्षा और व्यवसाय अथवा शैक्षिक सम्बोधित एवं जीविकोपार्जन से सम्बन्धित अपेक्षाओं में समन्वय स्थापित किया  जा सके। व्यावसायिक निर्देशन, द्वारा विद्यार्थियों को उनकी रूचियों, कौशलों, योग्यताओं, अभिरूचियों आदि के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान की जा सकती है। इस जानकारी के आधार पर ही यह अपनी योग्यता के अनुरूप विषयों का चयन करने, भावी व्यवसाय के लिए आवश्यक योग्यताओं, क्षमताओं एवं कौशलों का विकास करने तथा उस व्यवसाय में प्रविष्ट होकर वृनिक सन्तोष की दिशा में अग्रसरित होने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
  3. समाज की परिवर्तित दशाए-समाज की पारिवारिक, आर्थिक, धा£मक आदि विभिन्न दशाओं में आज पर्याप्त अन्तर हो चुका है। एक समय था जब व्यक्ति की योग्यताओं, व्यक्ति के अस्तित्व एवं परोपकार की दृष्टि से किए जाने वाले कार्यो को महन्व दिया जाता था वर्तमान समाज की स्थितिया सर्वथा भिन्न हैं। आज व्यक्ति के स्तर, मान, भौतिक सामानों को अधिक महन्व दिया जाता है। अपने पड़ोस, सम्बिन्मायों एवं परिचितगणों से सम्मान प्राप्त करने के लिए आज यह आवश्यक है कि व्यक्ति का रहन-सहन का स्तर सन्तोषजनक हो। व्यक्ति के सम्मान एवं सामाजिक मान्यता प्राप्त करने का आज यही आधार है। साथ ही जनसंख्या वृद्धि एवं सीमित अवसरों की उपलब्धता के कारण सर्वत्र एक प्रतिस्पर्धा का वातावरण भी उत्पन्न हो गया है। इस वातावरण में भी उन्हीं व्यक्तियों को आज सपफल माना जाता है जो भौतिक दृष्टि से अपेक्षाकृत आगे हैं। इस प्रकार के वातावरण में व्यक्ति का मानसिक एवं भौतिक सन्तुलन बनाए रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसे उपयुक्त व्यवसाय का चयन करके उसमें प्रगति का अवसर प्रदान किया जाए। इस दिशा में व्यावसायिक निर्देशन विशेष रूप में सहायक सिण् हो सकता है।
  4. मानवीय क्षमताओं का वांछित उपयोग करने हेतु-समाज अथवा राष्टं को प्रगति के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि मानवीय क्षमताओं का समुचित प्रयोग किया जाए। प्रगति की दौड़ में आज जितने भी राष्टं अग्रणीय है, उनकी सफलता का एक प्रमुख रहस्य यह भी है कि उन देशों में व्यक्ति की क्षमताओं का समुचित उपयोग किया जाता है। हमारे यहा व्यक्ति की योग्यता का सही मूल्यांकन प्राय: नहीं हो पाता है। योग्यता एवं व्यावसायिक अवसर में अन्तर इस सीमा तक है कि जिन व्यक्तियों को मात्र एक लिपिक के रूप में कार्य करना चाहिए था वह अफसर बना दिए गए हैं और जो अधिकारी होने चाहिए थे वह मात्र लिपिक के रूप में ही जीविकोपार्जन कर रहे हैं। रिश्वत, सिफारिश, जातिवाद, वर्गवाद, मूल्यांकन की अनुचित कसौटिया आदि अनेक कारक इस प्रकार की दुरावस्था के लिए उनरदायी है। भ्रष्टाचार, ऊपर-नीचे व्याप्त है। सभी इस व्यवस्था के लिए समान रूप से दोषी है। यह भी दु:खद है कि युवकों को अपने अध्यनन-काल के उपरान्त तक भी यह ज्ञात नहीं हो पाता है कि उनकी अभिरूचि किस व्यवसाय के अनुकूल है और उस व्यवसाय में प्रविष्ट होकर, किस प्रकार प्रगति की जा सकती है। इस दृष्टि से विद्यार्थियों एवं शिक्षा प्राप्त कर चुके युवकों के लिए, व्यावसायिक निर्देशन, विशेष रूप से सहायक हो सकता है।
  5. व्यावसायिक प्रगति हेतु आवश्यक-व्यावसायिक निर्देशन का महत्व केवल किसी व्यवसाय में प्रविष्टि होने की दृष्टि से ही नहीं है, वरन् व्यवसाय में निरन्तर प्रगति करने की दृष्टि से भी है। व्यावसायिक प्रगति के आधार पर उपलब्ध वृनिक सन्तोष क्षमताओं एवं कौशलों का निरन्तर विकास किया  जाता रहे। व्यावसायिक निर्देशन के द्वारा यह जानकारी प्रदान की जा सकती है कि अपनी कार्य क्षमता का विस्तार किस प्रकार किया जाए? किसी व्यवसाय में सपफल होने के लिए किस प्रकार किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी व्यवसाय में सम्बन्धित जानकारी एवं कौशलों के विकास में सहायक व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों आदि से सम्बन्धित सूचनाए प्रदान की जा सकती हैं।
  6. स्वास्थ्य को बनाए रखने की दृष्टि से-स्वास्थ्य का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान रूप से महत्व होता है। किसी व्यवसाय में निरन्तर निपुणता अथवा वांछित कार्यक्षमता के साथ कार्य करना भी, केवल उसी परिस्थति में सम्भव हो सकता है जब व्यवसाय में लगे कर्मिकों का स्वास्थ्य सन्तोषजनक हो। स्वास्थ्य को बनाए रखने से वृनिक सन्तोष का विशेष महत्व होता है तथा यह तभी सम्भव है प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुकूल व्यवसाय का अवसर प्राप्त हो। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि अनेक व्यवसायों में किस विशिष्ट कार्य के संचालन की विशेष क्षमताओं की आवश्यकता होती है। उदारहण के लिए घड़ी साजी, कम्पोजिंग, प्रूक रीडग जैसे कार्यो में नेत्र संचालन एवं नेत्रों की गतिविधि के नियन्त्रण का अधिक महत्व होता हैं। अत: यह आवश्यक है कि इन कार्यो को करने वाले व्यक्तियों की नेत्र शक्ति सामान्य हो। निर्देशन के द्वारा, व्यक्ति की शारीरिक प्रणाली के अध्यनन के आधार पर यह सुझाव दिए जा सकते हैं कि किस व्यक्ति को किस व्यवसाय में जाना चाहिए।
  7. पारिवारिक एवं व्यावसायिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने की दृष्टि से-व्यक्ति के व्यावसायिक एवं पारिवारिक जीवन का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध होता है। परिवार में घटित हेाने वाली घटनाएँ एवं समस्याएं जिस प्रकार व्यावसायिक जीवन को प्रभावित करती है, उसी व्यवसायिक क्षेत्र से सम्बन्धित सफलताए एवं असफलताए पारिवारिक जीवन पर प्रभाव डालती हैं। प्राय: यह देखने में आता है कि जो व्यक्ति अपने पारिवारिक जीवन में सुख एवं सन्तोष की अनुभूति कर रहे हैं, वह व्यावसायिक जीवन को भी शान्त, सौम्य एवं सन्तुलित ढंग से व्यतीत करते हैं, इसी प्रकार व्यावसायिक जीवन में, सतत् रूप से प्रगति करने वाले व्यक्ति अपनी पारिवारिक समस्याओं का समाधान भी सहज रूप से ही कर लेते हैं। निर्देशन के माध्यम से इन समस्याओं का समन्वित रूप से समाधान करने में व्यक्ति को सहायता प्रदान की जा सकती है। इस प्रकार, शैक्षिक निर्देशन के उपरान्त व्यावसायिक निर्देशन का व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्व होता है। वस्तुत: व्यावसायिक निर्देशन के अभाव में न तो व्यक्ति के जीवन में समुचित सामंजस्य स्थापित किया  जा सकता और न ही शैक्षिक सम्बोधितयों का वांछित उपयोग ही सम्भव हो सकता है।

व्यावसायिक निर्देशन के उद्धेश्य

व्यवसाय-निर्देशन के प्रमुख उद्धेश्य हैं-
  1. विद्यालयों में व्यवसाय से सम्बन्धित सूचनाओं का विश्लेषण करने की योग्यता एवं क्षमता विकसित करना। 
  2. सत्यनिष्ठता से किया  गया कार्य सदैव सर्वोनम होता है, इस भावना का छात्रों में विकास करना। 
  3. व्यक्ति के व्यवसाय चयन के पश्चात उसकी अनुकूल परिस्थितिया उत्प। करने में सहायता प्रदान करना। 
  4. छात्रों को विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों से अवगत कराना। 
  5. गरीब विद्यार्थियों को अर्थ के अतिरिक्त अन्य प्रकार की सहायता प्रदान कर, उनकी व्यवसाय से सम्बन्धित योजना को सपफल बनाना।
  6. छात्रों को भिन्न-भिन्न व्यवसायों का निरीक्षण करने हेतु सुविधाए उपलब्ध कराना। 
  7. किसी व्यवसाय हेतु कौन-कौन से गुण, योग्यता एवं कुशलता अपेक्षित है, कि जानकारी विद्यार्थियों को प्रदान करना।
  8. छात्रों को विभिन्न व्यवसायों के सम्बन्ध में ऐसी सूचनाओं को एकत्रित करने में सहायता करना जिनका वह चयन कर सके।
  9. छात्रों को विभिन्न व्यवसायों में अवगत कराकर, उन व्यवसायों के सामाजिक एवं वैयक्तिक महत्व के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान करना। 
  10. छात्रों में कार्य के प्रति एक आदर्श भावना का विकास करना। 
  11. कार्य की परिस्थितियों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने हेतु विद्यालयों के अन्दर एवं बाहर, अवसरों का सृजन करना। 
  12. विद्यार्थियों की रूचियों को व्यापक बनाने हेतु उन्हें विभिन्न अवसर प्रदान करना।

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