सूक्ष्म शिक्षण की परिभाषा, सिद्धान्त एवं इतिहास

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सूक्ष्म-शिक्षण, शिक्षक-प्रशिक्षण की एक प्रयोगशालीय एवं वैश्लेषिक विधि है, जिसके माध्यम से छात्राध्यापकों में ‘शिक्षण-कौशल’ विकसित किये जाते हैं। एलन (1968) ने इसकी परिभाषा निम्न प्रकार से की है, सूक्ष्म शिक्षण प्रशिक्षण से सम्बन्धित एक सम्प्रत्यय है जिसका प्रयोग सेवारत एवं सेवापूर्व (Inservice and Preservice) स्थितियों में शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के लिए किया जाता है। सूक्ष्म-शिक्षण शिक्षकों को शिक्षण के अभ्यास के लिए एक ऐसी योजना प्रस्तुत करता है जो कक्षा की सामान्य जटिलताओं को कम कर देता है और जिसमें शिक्षक बहुत बड़ी मात्रा में अपने शिक्षण व्यवहार के लिए प्रतिपुष्टि (Feedback) प्राप्त करता है। वी. एम. शोर ने
इसकी परिभाषा करते हुए कहा, सूक्ष्म-शिक्षण कम समय, कम छात्रों तथा कम शिक्षण क्रियाओं वाली प्रविधि है।

मैक्लीज तथा अनविन (1970) के अनुसार, सूक्ष्म-शिक्षण का साधरणत: प्रयोग संवृत्त दूरदर्शन के द्वारा छात्राध्यापकों को सरलीकृत वातावरण में उसके निष्पादन सम्बंधी  प्रतिपुष्टि तुरन्त उपलब्ध् करने की प्रक्रिया के लिए किया जाता है।…… सूक्ष्म अध्यापन को साधरणतया अभिरूपित अध्ययन का स्वरूप माना जाता है जिसमें सामान्यतया जटिलताओं का न्यूनीकरण कर प्रतिपुष्टि पाठन अभ्यास की अमूर्त परिकल्पना या वास्तविक कक्षा अध्यापन की प्रक्रिया के आधार पर उपलब्ध की जाती है।

डी. डब्ल्यू. एलन (D. W. Allen) के अनुसार, फ्सूक्ष्म शिक्षण सरलीकृत शिक्षण प्रक्रिया है जो छोटे आकार की कक्षा में कम समय में पूर्ण होती है।

क्लिफ्रट एवं उनके सहयोगी (Clift and Others) के शब्दों में, सूक्ष्म-शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की वह विधि है जो कि शिक्षण अभ्यास को किसी कौशल विशेष तक सीमित करके तथा कक्षा के आकार एवं शिक्षण अवक्लिको घटाकर शिक्षण को अधिक सरल एवं नियंत्रित करती है।¸

बुश (Bush) के अनुसार, फ्सूक्ष्म-शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण की वह प्रविधि है जिसमें शिक्षक स्पष्ट रूप से परिभाषित, शिक्षण कौशलों का प्रयोग करते हुये ध्यानपूर्वक पाठ तैयार करता है, नियोजित पाठों के आधर पर, पाँच से दस मिनट तक वास्तविक छात्रों के छोटे समूह के साथ अन्त:क्रिया करता है, जिसके परिणामस्वरूप वीडियो टेप पर प्रेक्षण प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है।

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एलन तथा रियान ने सूक्ष्म शिक्षण को पाँच मूलभूत सिद्धान्तों पर आधरित बताया है-

  1. सूक्ष्म शिक्षण, वास्तविक शिक्षण है।
  2. इस शिक्षण में कक्षा-शिक्षण की सामान्य जटिलताओं को कम कर दिया जाता है।
  3. एक समय में एक ही कार्य विशेष तथा एक ही कौशल पर बल दिया जाता है।
  4. अभ्यास क्रम की प्रक्रिया पर अध्कि नियन्त्रण सम्भव होता है।
  5. तुरन्त पृष्ठ-पोषण (Feedback) दिया जाता है।

प्रो. बी. के. पासी (B. K. Passi) के शब्दों में, सूक्ष्म शिक्षण एक प्रशिक्षण विधि है जिसमें छात्राध्यापक किसी एक शिक्षण कौशल का प्रयोग करते हुए थोड़ी अवधि के लिये, छोटे छात्र समूह को कोई एक सम्प्रत्यय पढ़ाता है।

एल. सी. सिंह (L. C. Singh) के शब्दों में, फ्सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षण का सरलीकृत रूप है, जिसमें शिक्षक पाँच छात्रों के समूह को पाँच से बीस मिनट तक के समय में पाठ्य-वस्तु की एक छोटी-सी इकाई का शिक्षण प्रदान करता है।

एन. के. जंगीरा एवं अजीत सिंह  (N.K. Jangira and Ajit Singh) सूक्ष्म शिक्षण की परिभाषा देते हुए कहते हैं, फ्सूक्ष्म-शिक्षण छात्राध्यापक के लिये एक प्रशिक्षण-स्थिति है, जिसमें सामान्य कक्षा शिक्षण की जटिलताओं को एक समय में एक ही शिक्षण कौशल का अभ्यास कराके, पाठ्य-वस्तु को किसी एक सम्प्रत्यय तक सीमित करके, छात्रों की संख्या को पाँच से दस तक सीमित करके तथा पाठ की अवधि पाँच से दस मिनट करके शिक्षण अभ्यास
कराया जाता है।

राय (1978) के अनुसार, सूक्ष्म शब्द का एक गूढ़ार्थ भी हो सकता है क्योंकि सूक्ष्म-शिक्षण में कौशलों को छोटी-छोटी अर्थात् सूक्ष्म इकाइयों में विभाजित कर प्रत्येक में बारीकी से प्रशिक्षण दिया जाता है। अत: सूक्ष्म शब्द का प्रयोग इस संदर्भ में उचित ही है।

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ग्रीपिथ्स (1973) ने अनेक परिभाषाओं का विश्लेषण करने के बाद कहा, फ्सूक्ष्म-शिक्षण को बहुत ही लचीली और अनुकूलनशील प्रक्रिया होने के कारण इसे किसी विशिष्ट एवं मर्यादित परिभाषा में बाँधा उचित नहीं होगा।

सूक्ष्म-शिक्षण की मूलभूत मान्यताएँ

  1. प्रभावशाली सूक्ष्म-शिक्षण के लिये शिक्षक-व्यवहार के प्रारूप (Pattern) आवश्यक होते हैं।
  2. अपेक्षित व्यवहार में परिवर्तन लाने में पृष्ठ-पोषण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
  3. शिक्षण एक उपचारात्मक प्रक्रिया या योजना होती है।
  4. उत्तम प्रशिक्षण देने के लिये शिक्षण-क्रियाओं का वस्तुनिष्ठ (Objective) प्रेक्षण आवश्यक है।
  5. शिक्षक में सुधर लाने के लिये समुचित अवसर दिये जाने चाहिये।
  6. व्यक्तिगत क्षमताओं का विकास करके शिक्षण प्रक्रिया को उन्नत बनाया जा सकता है।
  7. सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षण का एक अति लघु एवं सरलीकृत रूप होता है।

सूक्ष्म-शिक्षण के सिद्धान्त

एलन तथा रियॉन (1968) ने सूक्ष्म-शिक्षण के पाँच मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन किया है-

  1. सूक्ष्म-शिक्षण वास्तविक शिक्षण है।
  2. किन्तु इस प्रकार के शिक्षण में साधारण कक्षा-शिक्षण की जटिलताओं को कम कर दिया जाता है।
  3. एक समय में किसी भी एक विशेष कार्य एवं कौशल के प्रशिक्षण पर ही जोर दिया जाता है।
  4.  अभ्यास क्रम की प्रक्रिया पर अध्कि नियन्त्रण रखा जाता है।
  5. परिणाम सम्बन्धी साधरण ज्ञान एवं प्रतिपुष्टि के प्रभाव की परिध् विकसित होती है।

सूक्ष्म शिक्षण का इतिहास

सूक्ष्म-शिक्षण प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक नवीन नियन्त्रित अभ्यास की प्रक्रिया है। इसका विकास स्टेनपफोर्ड यूनिवर्सिटी में किया गया। सन् 1961 में एचीसन, बुश तथा एलन ने सर्वप्रथम नियन्त्रित रूप में ‘संकुचित-अध्ययन-अभ्यास क्रम’ प्रारम्भ किये, जिनके अन्तर्गत प्रत्येक छात्राध्यापक 5 से 10 छात्रों को एक छोटा-सा पाठ पढ़ाता था और अन्य छात्राध्यापक विभिन्न प्रकार की भूमिका निर्वाह (Rule Play) करते थे। बाद में इन लोगों ने वीडियो टेप रिकॉर्डर (Video Tap Recorder) का प्रयोग भी छात्राध्यापकों के शिक्षण व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने के लिए करना शुरू कर दिया है। हैरी गैरीसन ने शिक्षक-सामर्थ्य (Teaching Competence) के क्षेत्र में कार्य करते हुए ‘स्टेनपफोर्ड शिक्षक सामर्थ्य अर्हण दीपिका’ का निर्माण किया।

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सन् 1967 में क्लेनवैश ने सूक्ष्म-शिक्षण के क्षेत्र में कई प्रयोग किये। इस प्रकार एलन (1964), एचीसन (1964), ओर्म (1966), टकमैन, एलन (1969), रैसनिक व किस (1970), मैक्लीज तथा अनवन (1971) आदि अनेक शोधर्थियों ने इस क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन शोध-प्रपत्रों और विवरणों ने सारे विश्व को आकर्षित करना प्रारम्भ किया। भारतवर्ष में सर्वप्रथम डी. डी. तिवारी (1967) ने ‘सूक्ष्म-शिक्षण’ शब्द का प्रयोग शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र में किया। यद्यपि उनका ‘सूक्ष्म-शिक्षण’ का अर्थ आज के सूक्ष्म शिक्षण से पृथक था। इसके बाद शाह (1970), चुदास्मा (1971), ¯सह, मर्वफर तथा पन्गौत्रा (1973), दोशाज ने सन् 1974 में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये।

भारतवर्ष में सन् 1974 में सूक्ष्म-शिक्षण के क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रकाशन पासी तथा शाह ने किया। इसमें प्रथम बार सूक्ष्म-शिक्षण के विषय में वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की गयी। इसके पश्चात् भट्टठ्ठाचार्य (1974), पासी, ललिता व जोशी (1976), ¯सह व ग्रेवाल (1977), गुप्ता (1978) आदि ने इस क्षेत्र में कार्य किया। सन् 1978 में इन्दौर विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम ‘सूक्ष्म-शिक्षण’ पर ‘राष्ट्रीय प्रायोजना’ (National Proposal for the Project) का निर्माण किया गया। इसके अन्तर्गत विभिन्न महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षक प्रशिक्षकों ने मिलकर सूक्ष्म-शिक्षण पर कार्य किया। यह शोध् योजना ‘नेशनल काँसिल ऑपफ एजुकेशनल, रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग ’ नयी दिल्ली के सहयोग से पूर्ण की गयी।

देहरादून में सन् 1979 में कुलश्रेष्ठ, तथा गोस्वामी ने सूक्ष्म-शिक्षण के क्षेत्र में कार्य करते हुए उन्होंने अनेक सुधारों के रूप में ‘परिसूक्ष्म-शिक्षण’ (Mini-teaching) पर प्रथम भारतीय मोनोग्रापफ ‘मिनी टीचिंग  : ए न्यू एक्सपैरीमेन्ट इन टीचर एजुकेशन’, एन. सी. ई. आर. टी. नई दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित किया। अब तो भारतवर्ष में सूक्ष्म-शिक्षण तथा परिसूक्ष्म-शिक्षण (Mimi-teaching) पर काफी कार्य किया जा रहा है।

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