अहिल्याबाई होल्कर का जीवन परिचय

अनुक्रम

माँ अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 1725 में महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिला में चौड़ी नामक गाँव में हुआ था। मल्हार राव होल्कर जब सेना के साथ युद्ध से लौटे तो उन्होने ग्राम चौड़ी में पड़ाव डाला। इसी दौरान श्रीमंत मल्हार राव होल्कर ग्राम भ्रमण पर निकले। ग्राम भ्रमण के दौरान उनकी नजर शिव मंदिर में पूजा करने जा रही बालिका पर पड़ी। उन्हें वहाँ वह बालिका पसन्द आयी, जिसे उन्होने अपने पुत्र श्रीमंत खण्डेराव होल्कर से विवाह हेतु उपर्युक्त समझा। (यहाँ साधारण कन्या कोई और नहीं बल्कि माँ अहिल्या बाई होल्कर थी) उनका विवाह धूमधाम से हुआ और इस प्रकार सामान्य परिवार में जन्मी अहिल्याबाई राजमहल में पहुँच गई।

माँ अहिल्याबाई की दो संताने थी। माँ अहिल्याबाई के पुत्र का नाम श्री मालेराव होल्कर एवं पुत्री का नाम मुक्ताबाई था। श्रीमंत मल्हार राव होल्कर ने होल्कर राज्य से विस्तार दृष्टि से अपने पुत्र श्रीमंत खण्डेराव होल्कर के साथ भरतपुर पर आक्रमण किया। इस युद्ध में श्रीमंत खण्डेराव होल्कर शहीद हो गये। अपने पति के देहान्त का समाचार सुनकर अहिल्याबाई ने भी सती होने का निश्चय किया परन्तु ससुर श्रीमंत मल्हार राव होल्कर की समझाइश के बाद अहिल्याबाई ने अपना सती होने का विचार त्याग दिया। सन् 1795 में माता अहिल्याबाई खण्डेराव होल्कर का भी देहान्त हो गया। रानी अहिल्याबाई ने 28 वर्ष 5 माह 17 दिन शासन किया। माँ अहिल्याबाई होल्कर कुशल प्रशासिका थी। विपरित परिस्थितियों को अनुकूल बनाना उन्हे अच्छी तरह आता था। वे अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह मानती थी। प्रजा के सुख, दु:ख में सदैव भागीदार रहती थी। प्रजा की खुशहाली के लिए अहिल्याबाई द्वारा अनेको विकास कार्य किये गये। माँ अहिल्याबाई के शासन में प्रजा सदैव सुखी थी।

अहिल्याबाई की मृत्यु के पश्चात उनके सेनापति तुकोजीराव प्रथम ने राज्य का कार्य संभाला। तुकोजीराव की मृत्यु के पश्चात उनका धर्मप्रिय पुत्र काशीराव गद्दी पर बैठा किन्तु उसके भाईयो ने उसके विरूद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया। इसी विद्रोह का लाभ प्राप्त करते हुए सिंधिया ने अपनी उज्जैन पराजय का बदला लेने के लिए विशाल सेना के साथ इन्दौर पर आक्रमण कर इन्दौर को तहस – नहस कर दिया और इन्दौर नगर में लूट मचाकर राजवाड़ा को ध्वस्त कर दिया। सिंधिया सेना के सेनापति सरजेराव घाटगे ने नगरवासियों पर हर प्रकार के अत्याचार किये। अनेक घटनाओं के पश्चात् यशवंतराव प्रथम ने भीलों, अफगानों, पिण्डारियों की विशाल सेना संग्रहित कर 25 अक्टूबर 1802 ई. के दिन सिंधिया और बाजीराव पेशवा की संयुक्त सेना को पराजित किया तथा होल्कर मराठा राज्य का शासन यशवंतराव होल्कर (प्रथम) के हाथों में चला गया।

सन् 1804 में यशवंतराव होल्कर द्वारा ब्रिटिश शासन से टक्कर ली जो हमारे भारतीय युद्धों के इतिहास में महत्वपूर्ण है। लेकिन वर्ष 1804 में ही मालवा और इंदौर रियासत में स्थित प्रमुख किलो पर ब्रिटिश शासन का अधिकार हो गया। अंग्रेजों व होल्कर शासकों के मध्य राजघाट संधि के पश्चात् यशवंतराव प्रथम लौटे। ब्रिटिश शासकों से युद्ध प्राप्त अनुभवों से यशवंतराव (प्रथम) ने स्वयं की सेना को आधुनिक युग की सेना बनाने हेतु भानप्रज्ञ के समीप नवली ग्राम में एक तोप बनाने की फैक्टरी की स्थापना की। दिन रात तोपे बनाने में लगे रहे। इसी संघर्षों के मध्य 28 अक्टूबर 1811 ई. मे उनकी मृत्यु हो गई।

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