भक्ति का अर्थ, परिभाषा, एवं प्रकार

भक्ति शब्द संस्कृत के ‘भज’ सेवायाम् धातु में ‘ क्तिन्’ प्रत्यय लगाने पर बनता है। वस्तुत: ‘क्तिन्’ प्रत्यय भाव अर्थ में होता है। ‘भजनं भक्ति:’ परन्तु वैयाकरणों के अनुसार कृदन्तीय प्रत्ययों में अर्थान्तर अर्थ परिवर्तन प्रक्रिया का अंग है। अत: वही ‘क्तिन्’ प्रत्यय अर्थान्तर में भी हो सकता है।“भजनं भक्ति:”, “भज्यते अनया इति भक्ति:”, “भजन्ति अनया इति भक्ति:” इत्यादि ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्तियाँ हो सकती हैं। 

‘भक्ति’ शब्द का वास्तविक अर्थ भगवान की सेवा करना है। यह भक्ति ही अमृत स्वरूप है। जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध और तृप्त हो जाता है तथा किसी अन्य वस्तु की इच्छा नहीं रह जाती है। ‘भक्ति’ की संज्ञा के विषय में “’नारद पांचरात्र‘ में कहा गया है कि अन्य कामनाओं का परिहार करके निर्मल चित्त से समग्र इन्द्रियों द्वार ा श्रीभगवान की सेवा का नाम भक्ति है।”

डॉ0 रामस्वार्थ चौधरी के इन शब्दों द्वारा व्यक्त करें तो वह इस प्रकार है- “भक्ति श्रद्धा, विश्वास एवं प्रेमपूरित भक्त हृदय का वह मधुर मनोराग है जिसके द्वारा भक्त और भगवान, उपास्य और उपासक के पारस्परिक सम्बन्ध का निर्धारण होता है। यह भक्त के विमल मानस से नि:सृत, दिव्य प्रेम की वह उज्जवल भाव धारा है जिसके प्रवाह में पड़कर लौकिक प्रेम का विषयानन्द अपने समस्त कलुषों का परिहार कर अलौकिक प्रेम के ब्रह्मानन्द में परिणत हो जाता है।”

भक्ति का महत्व

भक्ति हमारे जीवन का प्राण है जिस प्रकार पौधे का पोषण जल तथा वायु द्वारा होता है उसी प्रकार हमारा हृदय भक्ति से ही सशक्त और सुखी होता है। भक्ति वह प्यास है जो कभी बुझती नहीं और न कभी उसका विनाश ही होता है। अपितु वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहती है।

समस्त धर्म ग्रन्थों का सार भक्ति ही है, भक्ति के ही बीजारोपण हेतु भगवान आदि की विभिन्न कथाओं का प्रचार एवं गंगा-यमुना त्रिवेणी सरयु का नित्य स्नान किया जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार प्रत्येक लघु से लघु कार्य को जिसे हम करते हैं मानस पटल पर उसका अमिट प्रभाव पड़ता है जैसे गंगा स्नान तथा भगवान शंकर के अद्वितीय लिंग पर गंगाजल, बेल पत्र, पुष्पादि अर्पित करने में भक्ति की ही भावना निहित रहती है। अत: भक्ति को ज्ञान, कर्म, योग से श्रेष्ठ कहा गया है।’ ‘भागवत’ में भी कहा गया है कि विश्व के कल्याण का भार भक्ति मार्ग पर निर्भर करता है।

नारद समान कबीर ने भी भक्ति मार्ग की श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए कहा- जप, तप, संयम, व्रत सब बाह्याडंबर है। अत: भक्ति को कर्म, ज्ञान और योग से श्रेष्ठ माना है। वे उसे मुक्ति का एक मात्र उपाय मानते हैं।

इस प्रकार भक्ति भक्त के विमल मन से निकली हुयी उज्जवल धारा है। लौकिक स्नेह ही अलौकिक स्नेह में परिणत हो जाता है। मन और वाणी अगम-अगोचर परमात्मा को मधुर भावबंधन में बांधकर अनिवर्चनीय आनन्द का आस्वादन करते हैं। ऐसी ही स्थिति में आत्मा-परमात्मा एकमेव हो जाते हैं।

भक्ति के प्रकार

हम उपासक या भक्त की दृष्टि से देखें तो भक्ति के तीन रूप हैं। श्रद्धा, भक्ति, भावना भक्ति और शुद्धा भक्ति। हम अपने-अपने उपास्य के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखकर उसकी प्रशंसा करें तथा उसे नमस्कार करें वह श्रद्धा भक्ति कहलाती है। जब हम एक में अनेक और अनेक में एक को देखते हुए हमारे भक्ति में एकान्त की भावना रहती है उसे भावना भक्ति कहते हैं। जब हम अपने अराध्य देव के ईश्वर को निर्गुण-सगुण तथा अवतार रूप में स्वीकार करते हैं उसके प्रति अपना अविरल प्रेम प्रदर्शित करते हैं उसे शुद्धा भक्ति कहते हैं। श्रीमदभागवत् में भक्ति के कई भेद बताएं हैं-
  1. सात्विकी भक्ति - यह भक्ति मुक्ति की कामना से की जाती है। सत्व गुण से निर्मल होने के कारण सुख की ओर ज्ञान आसक्ति से अर्थात ज्ञान के अभिमान से बाँधता है।
  2. राजसी भक्ति - यह भक्ति धन, यश, कुटुंब, घर-बार की इच्छा से की जाती है।
  3. तामसी भक्ति -इसमें कामना रहती है कि दुश्मनों का नाश हो।
  4. निर्गुण भक्ति - यह ‘सुधासार भक्ति’ भी कहलाती है। यह बिना किसी कामना के की जाती है। इसमें भक्ति की भी इच्छा नहीं रहती है। यही अनन्य भक्ति है जो अनन्य भक्ति की साधना करता है उसका न कोई मित्र है न शत्रु ही, उसे जगत के दु:खों का संताप नहीं रहता। भगवान के दर्शन मात्र से परम सुख प्राप्त करता है।
  5. नवधा भक्ति - भक्त प्रलाद ने भक्ति के नौ भेद बताये हैं-पांचरात्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र, तरंगिनी, श्री मद्भागवत् गीता वैष्णव ग्रन्थों में से है।रति के अनुसार भक्ति के पाँच भेद माने गये हैं- शान्त भक्ति, दास्य भक्ति, साख्य भक्ति, वात्सल्य भक्ति, दाम्पत्य भक्ति या मधुरा भक्ति।
पीछे दी गई भक्ति की परिभाषाओं, तत्वों, रूपों तथा भेदों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि भक्ति की उत्कृष्टता सर्वत्र स्वीकृत है इसे सीमित दा यरे में बांधना दुष्कर है, क्योंकि प्रभु सर्वव्यापक अन्तर्यामी है, परन्तु बिरले साधक ही उनकी समीपता का अनुभव कर सकते हैं। प्रभु समस्त आत्माओं के भीतर उसी प्रकार विराजमान है जैसे दधि में घी। 

भक्ति मन का ऐसा अनुभव है जो वाण के सदृश अन्य अनुभवों को वे ध देता है। जीवन का कोई अंश भक्ति से पृथक नहीं रह जाता। अत: भक्ति की व्यापकता सार्वजनीन है।

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