भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत और महत्व

भाषा की उत्पत्ति से आशय उस काल से है, जब मानव ने बोलना आरंभ किया और भाषा सीखना आरंभ किया, इस विषय में बहुत सी संकल्पनाएं हैं जो अधिकांशतः अनुमान पर आधारित हैं। मानव के इतिहास में यह काल इतना पहले आरंभ हुआ कि इसके विकास से संबंधित कोई भी संकेत मिलना असंभव है।

भाषा की उत्पत्ति का संबंध इस बात से है कि मानव ने सर्वप्रथम अपने किस काल में अपने मुख से निसृत होने वाली ध्वनियों को वस्तुओं, पदार्थों एवं भावों से जोड़ा। भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न भाषा विज्ञान की विचार सीमा में नहीं आता विज्ञान जो पदार्थ का तात्विक विश्लेषण करके यह बता देगा कि भाषा किस वर्ग की भाषा है।

भाषा की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों ने दो प्रकार के विचार मार्ग अपनाएं हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष एवं परोक्ष मार्ग कहा जाता है।
  1. प्रत्यक्ष मार्ग:- जिसमें भाषा की आदिम अवस्था से चलकर उसकी वर्तमान तक विकसित दशा का विचार किया जाता है।
  2. परोक्ष मार्ग :- भाषा की आज की विकसित दशा से पीछे की ओर चलते हुए उसकी आदिम अवस्था तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है।

भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत

भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत इन सभी का संक्षिप्त विवरण है-

दिव्य उत्पत्ति सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार भाषा की उत्पत्ति ठीक उसी दैवीय आधार पर हुई, जिस आधार पर इस पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति हुई है, अर्थात भाषा को भी ईश्वर ने ही जन्म दिया। परन्तु कुछ आलाचकों का मानना है कि प्राणी मात्र की उत्पत्ति तो ईश्वर द्वारा हुई है, जबकि ईश्वर की दृष्टि से सभी प्राणी समान है, अत: भाषा का जन्म ईश्वर द्वारा नहीं, अपितु मनुष्य के अपने द्वारा किया गया है।

सांकेतिक उत्पत्ति भाषा

इस सिद्धांत के आधार पर जब मनुष्य की आवश्यकताएं अति सीमित रही, उसका क्षेत्र भी सीमित रहा होगा भाषा के अभाव में उसने अपने विचारों एवं भावनाओं का परस्पर आदान-प्रदान संकेतों द्वारा ठीक उसी प्रकार से किया होगा, जिस प्रकार गंगू े लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, संकेतों के माध्यम से।

अनुकरण सिद्धांत 

इस सिद्धांत के प्रतिपादक मैक्समलूर है के अनुसार पशु-पक्षियों और मनुष्यों की आवज के आधार पर ही उनके नाम रखे गये होंगे। जैसे काँव-काँव (कौआ) कुहू-कूहू (कोयल) आदि ।

आवेग का सिद्धांत

हर्ष, विषाद, उल्लास, आश्चर्य करूणा आदि स्थितियों में जो ध्वनि निकलती है, जैसे आहा, ओह-ओह । भाषा की उत्पत्ति भी मनोभावों की इसी अभिव्यक्ति से हुई है। 

घर्षण द्वारा

इस सिद्धांत के अनुसार ध्वनि और अर्थ में (घनिष्ठ) संबंध होता है प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग स्थितियों में एक ही प्रकार की ध्वनि करता है। भाषा की उत्पत्ति पदार्थ की रगड़ से उत्पन्न ध्वनियों से हुई है।

भाषा का उपयोग

भाषा का उपयोग मुख्य रूप से निम्न कार्यो के लिये किया जाता है-

1. शिष्टाचार के निर्वहन के लिए:-हरेक समाज में शिष्टाचार के अपने नियम है, जिनका पालन करना न केवल समाज अपितु प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक होता है, अधिकतर का निर्वहन भाषा के माध्यम से होता है, व्यक्तियों का अभिवादन उन्हें संबोधित करना हर समाज के अपने तरीके हैं। उनका पालन करना भाषा के लिए आवश्यक है।

2. सूचनाओं समाचार एवं जानकारी आदान-प्रदान के लिए:-भाषा समाज एवं समुदाय के सदस्यों को जोड़कर सामूिहक शक्ति प्रदान करती है, समुदाय के सदस्यों को एकजुट रखने, सूचनाएं और जानकारी आदान-प्रदान करने में भाषा अहम् भूमिका निभाती है।

3. विचारों एवं भावनाओं की अभिव्यक्ति:- भाषा दो प्रकार से कार्य करती है वास्तव में भाषा के रूप में मनुष्य के पास वह शक्ति है, जो अपने समुदाय के दूसरे सदस्यों के मस्तिष्क की घटनाओं को अच्छी तरह से व्यक्त कर सकता है। भाषा के माध्यम से वह अपने व्यवहारों एवं विचारों को अभिव्यक्त कर सकता है।

भाषा का महत्व

भाषा मनोगत भाव प्रकट करने का सर्वोत्कृष्ट साधन है। यद्यपि आँख, सिर और हाथ आदि अंगों के संचालन से भी भाव प्रकट किए जा सकते हैं। किंतु भाषा जितनी शीघ्रता, सुगमता और स्पष्टता से भाव प्रकट करती हैं उतनी सरलता से अन्य साधन नहीं। यदि भाषा न होती तो मनुष्य, पशुओं से भी बदतर होता क्योंकि पशु भी करुणा, क्रोध, प्रम, भय आदि कुछ भाव अपने कान, पूँछ हिलाकर या गरजकर, भूँककर व्यक्त कर लेते हैं। भाषा के अविर्भाव से सारा मानव संसार गूंगों की विराट बस्ती बनने से बच गया। ईश्वर ने हमें वाणी दी और बुद्धि भी। हमने इन दोनों के उचित संयोग से भाषा का आविष्कार किया। 

भाषा ने भी बदले में हमें इस योग्य बनाया कि हम अपने मन की बात एक दूसरे से कह सके। परंतु भाषा की उपयोगिता केवल कहने-सुनने तक ही सीमित नहीं हैं कहने सुनने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि हम जो कुछ कहना चाहें वह सब ऐसे नपे-तुले शब्दों में इस ढंग से कह सके कि सुनने वाला शब्दों के सहारे हमारी बात ठीक-ठीक समझ जाए। ऐसा न हो कि हम कहें खेत की वह सुने खलिहान की। बोलने और समझने के अतिरिक्त भाषा का उपयोग पढ़ने और लिखने में भी होता है। कहने और समझने भाँति लिखने और पढ़ने में भी उपयुक्त शब्दों के द्वारा भाव प्रकट करने उसे ठीक-ठीक पढ़कर समझने की आवश्यकता होती है।

अत: भाषा मनुष्य के लिए माध्यम है ठीक-ठीक बोलने, समझने, लिखने और पढ़ने का।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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