भाषा की उत्पत्ति, विशेषता, रचना एवं परिभाषा

अनुक्रम

प्राणि-जगत् में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो भाषा का व्यवहार करता है। इसका कारण क्या है? अध्यात्मवादी विचारक मानते हैं कि भाषा ईश्वरकृत है। मनुष्य में यह क्षमता नहीं थी कि वह भाषा रचता। धर्म-विशेष के अनुयायी अपनी भाषा को देववाणी कहते रहे हैं। यह देववाणी ही क्रमश: मानव-भाषा बनी। कुछ यहूदी और ईसाई विचारकों का मत रहा है कि जिस भाषा में मानव जाति के, पिता-माता आदम और हौवा बातें करतें थे। उसी से संसार की समस्त भाषाएँ उत्पन्न हुई हैं। भाषा-वैज्ञानिकों में ईश्वरकृत मूल भाषा की स्थापना का खंडन-मंडन अब अनावश्यक समझा जाता है। जैसे भौतिक विज्ञान में इस स्थापना का खंडन अनावश्यक हो गया है कि मेघों से इन्द्र पानी बरसाता है, वैसे ही भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उपर्युक्त स्थापना का खंडन भी अनावश्यक है। साथ ही जैसे भौतिक विज्ञान भी जब-तब अध्यात्मवाद से प्रभावित दिखाई देता है, वैसे ही भाषा-विज्ञान पर भी अध्यात्मवाद से प्रभावित दिखाई देता है, वैसे ही भाषा-विज्ञान पर भी अध्यात्मवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। अध्यात्मवाद अब आत्मा की ही बात करे, यह आवश्यक नहीं है हेगल की तरह वह बुद्धि और विचार की बात करता है। यह संसार क्या है? विचार का ही मूर्त रूप है। पदार्थ क्या है? चिन्तन का ही घनीभूत रूप है। इसी तरह भाषा की रचना क्यों हुई? इसलिए हुई कि मनुष्य में बुद्धि है, मनुष्य चिन्तनशील प्राणी है।

इस तरह का मत भाषा-विज्ञानियों में ही नहीं, शरीर विज्ञानियों से भी प्रचलित है। वी. ई नीगस इंग्लैण्ड के एक प्रसिद्ध शरीर वैज्ञानिक हैं। उन्होंने घोषयंत्र (लैरिन्क्स) के विकास पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। पशुओं द्वारा ध्वनि-संकेतों के प्रयोग की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है: बहुत से पशु ऐसी ध्वनियाँ करते हैं जिनसे भाषा का विशद् शब्द भंडार बन सके, लेकिन उनमें बुद्धि नहीं है कि वे इस क्षमता से लाभ उठायें जैसे कि मनुष्य उठाता है। इस धरणा के अनुसार मनुष्य की बुद्धि उसके विकास का परिणाम नहीं है, वरन् उसका विकास उसकी बुद्धि का परिणाम है। भाषा के प्रयोग द्वारा उसने बुद्धि अर्जित और परिष्कृत नहीं की, वरन् अपनी बौद्धिक योग्यता के कारण वह भाषा की रचना कर सका। आत्म-रक्षा, आहार-प्राप्ति, मैथुन, संतान-रक्षा, यूथ सम्पर्क आदि की आवश्यकताएँ मुनष्य के लिए वैसे ही रही हैं जैसे पशुओं के लिए। ध्वनि-संकेतों से काम लेने के आदि कारण मनुष्य के लिए वही हैं जो पशु के लिए। समृद्ध भाषा की रचना हो जाने के बाद भी मनुष्य अनेक ध्वनि-संकेतों से काम लेता है जिन्हें सदा भाषा के अन्तर्गत स्वीकार नहीं किया जा सकता। सड़क पर किसी सुन्दरी को जाते देखकर मनचले युवक सीटी बजाते हैं। उनकी यह क्रिया किसी देश या युग तक सीमित नहीं है। सीटी बजाना एक सनातन और अन्तरराष्ट्रीय ध्वनि-संकेत है। बम्बई में किसी को बुलाने के लिए लोग सी-की आवाज करते हैं। यह एक तरह की अस्पष्ट ध्वनि है। संकेत सुनने वाले इधर-उधर देखकर जानने का प्रयत्न करते हैं, कोई उन्हें तो नहीं बुला रहा। गाँव के लोग किसी को बुलाते हुए ए, हो, ओ, आदि शब्द करते हैं। ये शब्द भाषा के सार्थक शब्द न होकर सार्थक ध्वनि-संकेत मात्र है। अंग्रेजों का ‘हलो’ शब्द इसी प्रकार की ध्वनि है जो भारत में अंग्रेजी पढ़े-लिखों का आम संबोधन संकेत है। टेलीफोन करने वाले इस ‘हलो’ के बिना किसी से बातचीत ही नहीं पाते। रणक्षेत्र में सैनिक एक-दूसरे को उत्साहित करने के लिए अनेक सार्थक और निरर्थक शब्द करते हैं। इस ध्वनि-क्रिया का उद्देश्य वहीं होता है जो आक्रमण के समय पशु-यूथ का होता है। जलूस में चलते हुए लोग कभी-कभी ऐसे नारे लगाते हैं जिनका अर्थ वे खुद नहीं समझते। ‘मैला आंचल’ के लेखक को साक्षी मानें तो लोग इनकलाब को किलकिलाब और जिन्दाबाद को जिन्दाबाघ भी कह सकते हैं। लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं होती। ‘किलकिलाब जिन्दाबाघ’ निरर्थक शब्दावली होकर भी चहचहाने से खतरे या आनन्द के बोध् की बात की थी। चहचहाहट के स्वर-व्यंजन एक ही होंगे, लेकिन उदात्त-अनुदात्त भेद से उनकी व्यंजना भिन्न हो जाती है। भय से मनुष्य की घिग्घी बँध् जाती है, तो उसके स्वर से उसकी परिस्थिति को समझने में कठिनाई नहीं होती। क्रोध, भय, घृणा, प्रीति आदि के भाव, शब्दों के अलावा केवल स्वर की विशेषता से पहचाने जा सकते हैं। मनुष्य और पशु से इस प्रकार की स्वर-भिन्नता द्वारा भावव्यंजना की यह प्रणाली सामान्य है।

शब्द और अर्थ का मूर्त सम्बन्ध यह है कि शब्द द्वारा हमें किसी पदार्थ या कर्म का बोध् होता है जिससे वह ध्वनि-संकेत सम्बद्ध हो गया है। शब्द स्वयं वह पदार्थ नहीं है वह किसी की ओर संकेत भर करता है। इसलिए हम उसे बाधित उत्तेजक कहते हैं। जैसे ‘माँ’ शब्द कहने पर हमें अपनी जन्मदात्री का बोध् होता है अन्य लोगों को यही बोध् ‘ममी’ कहने से होता है। माँ या ममी की ध्वनियों में कोई ऐसा गुण नहीं है जो जननी के गुणों का प्रतिबिम्ब हो। शब्द और अर्थ का सम्बन्ध ध्वनि और उससे सम्बद्ध किये हुए पदार्थ का ही सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध अटूट और अविच्छेद्य नहीं है। एक भाषा से दूसरी भाषा में किसी रचना का अनुवाद करते समय संक्रमण की दशा में विचार की स्थिति कहाँ होती है? यदि शब्द और अर्थ निरपेक्ष रूप में अभिन्न हों, तो एक विचार को एक से अधिक भाषा में प्रकट ही न किया जा सके। अनुवाद करते समय दोनों भाषाओं की समान शब्दावली जिन वस्तुओं की ओर संकेत करती है वे वस्तुएँ और उनसे हमारे स्नायुतंत्र का सम्बन्ध ही वह मूर्त आधार है जिसके कारण एक भाषा का सहारा छोड़ते हुए दूसरी भाषा की शब्दावली तक पहुँचने की अवधि ‘अर्थ’ लुप्त नहीं हो जाता।

शब्द को हम बाधित उत्तेजक मानते हैं किन्तु वह हमारे लिए संकेत मात्र नहीं रह जाता। हमारे लिए सापेक्ष रूप से उसकी एक स्वतंत्र सत्ता कायम हो जाती है। भाषा हमारी संस्कृति का अंग है। इसलिए भाषा के विभिन्न तत्व बाधित उत्तेजक मात्र न रहकर सहज उत्तेजक भी बन जाते हैं। हम अपनी भाषा के शब्दों को इसीलिए प्यार नहीं करते कि वे विभिन्न पदार्थों और व्यापारों की ओर संकेत करते हैं, वरन् इसलिए भी-और मुख्यत: इसीलिए-कि वे हमारे हैं, उनसे हमारा और हमारे पूर्वजों का सम्बन्ध रहा है। इसलिए हिन्दुस्तानी बच्चे जब माँ को मम्मी कहते हैं, जो हमें बुरा लगता है, यद्यपि संकेतित पदार्थ में कोई अन्तर नहीं आता।

भाषा की विशेषता

भाषा की विशेषता यह है कि एक ओर वह सहज और बाधित उत्तेजक है, दूसरी ओर वह सहज और बाधित प्रतिक्रिया भी है। विभिन्न परिस्थितियों में पशु-पक्षी कुछ स्वत: स्पूर्ति ध्वनियाँ करते हैं। ये ध्वनियाँ स्वत: स्पूर्ति होती हैं, इसलिए वे पशु-पक्षियों की सहज ध्वन्यात्मक प्रतिक्रिया हैं। मनुष्य जब दुख में ‘हाय-हाय’ करता है, तब यह शब्द उसकी ध्वन्यात्मक प्रतिक्रिया है, न कि दुख को प्रकट करने का ध्वनिसंकेत। भाषा के आदि काल में इस तरह की प्रतिक्रियावाली सहज ध्वनियाँ अधिक रही होंगी। किसी पशु को यह पता चल जाय कि विशेष परिस्थितियों में विशेष परिस्थितियों में विशेष ध्वनि करने से उसका उद्देश्य सफल होगा, तो इस तरह की ध्वनि बाधित प्रतिक्रिया होगी, न कि सहज प्रतिक्रिया। उल्लू कभी-कभी बच्चों के रोने की नकल करता है और शिकारियों को-या घोंसले की ओर आनेवालों को-धोखा देता है। इस तरह की ध्वनि बाधित प्रतिक्रिया मानी जायगी, क्योंकि उल्लू के लिए वह सहज और जन्म जात नहीं है। उसने उसे विशेष परिस्थितियों में सीखा है। अंग्रेज अफसर की ध्वनियों से प्रभावित होकर हिन्दुस्तानी साहब बोलता था-हम खाना मांगता है। अंग्रेजी राज की विशेष परिस्थितियों में हिन्दुस्तानी साहब की यह बाधित प्रतिक्रिया हुई।

भाषा ध्वनि संकेतों की एक व्यवस्था है, वह मानव मुख से निकली अभिव्यक्ति है, यह विचारों के आदान-प्रदान का सामाजिक साधन है, और उसके शब्दों के अर्थ रूढ़ हो जाते हैं।

विशेष कार्यों, कार्य-समूहों या वस्तुओं से कुछ निश्चित ध्वनियों के संसर्ग द्वारा भाषा का निर्माण होता है। यह क्रिया मूलत: वही है जिसमें स्नायुतंत्र बाह्य पदार्थों से स्थायी या अस्थायी सम्बन्ध बनाता है। बाह्य पदार्थों का यह प्रत्यक्ष इन्द्रियबोध् प्रथम संकेत-पद्धति हुआ इन्हीं पदार्थों से ध्वनियों का सम्बन्ध-स्थापन द्वितीय संकेत-पद्धति हुआ। दोनों ही पद्धतियों में मूलभूत एकता है। सम्बन्ध-स्थापना की प्रणाली दोनों में मूलत: एक है। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि भाषा की उत्पत्ति इन्द्रियों की स्वत: स्पूर्ति प्रतिक्रिया से होती है। जो इन्द्रियाँ किसी पदार्थ के रूपज्ञान का माध्यम हैं, वही उसके नामकरण का माध्यम भी हैं। जैसे रूपज्ञान में पदार्थ से स्थायी और अस्थायी सम्बंध् कायम किये जाते हैं, वैसे ही नामकरण में भी कायम होते हैं, यद्यपि यह क्रिया अक्सर हमारी आँखों से ओझल रहती है और हमें लगता है कि ध्वनि और पदार्थ का सम्बन्ध सदा से पूर्व निश्चित है। आजकल हिन्दी में पारिभाषिक शब्दों की रचना हो रही है। इंद्रियों द्वारा ग्रहीत पदार्थ को हम अंग्रेजी के माध्यम से ‘स्टिमुलस’ संज्ञा द्वारा अभिहित करते हैं। इनके लिए एक हिन्दी शब्द है उद्दीपक अन्य शब्द है उत्तेजक। यदि उत्तेजक शब्द का चलन हो जाय तो ‘स्टिमुलस’ द्वारा ज्ञापित पदार्थ से उसका सम्बन्ध अस्थायी से बदलकर स्थायी हो जायगा और ‘उद्दीपक’ का सम्बन्ध अस्थायी ही रहकर खत्म हो जायगा। हिन्दी में तीर्थ किसी धर्मिक स्थान को कहते हैं, दक्षिण की वाचक शब्द है हिन्दी में वह नदी विशेष का सूचक भी है। मृग हरिण के लिए प्रयुक्त होता है दक्षिण की कुछ भाषाओं में मृग का अर्थ है पशु। हिन्दी में शिक्षा का संम्बध सीखने-सिखाने से हैं मराठी में उसका सम्बन्ध ताड़ना से है। हिन्दी में अनर्गल शब्द निरर्थक शब्द प्रवाह का सूचक है तेलगु में उसकी व्यंजना है-धाराप्रवाह भाषण। इस तरह की सैकड़ों मिसालें एकत्र की जा सकती हैं जिनसे हम देखते हैं कि ध्वनि एक ही है किन्तु उसके द्वारा संकेतित पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं। यह तभी सम्भव है जबकि एक स्थिति या काल में ध्वनि और पदार्थ का जो सम्बन्ध स्थायी लगता था, वही अन्य स्थिति और काल में अस्थायी हो जाय और उसका स्थान भिन्न पदार्थ वाला स्थायी सम्बन्ध ले ले। संसार के पदार्थ और क्रियाएँ ही जब परिवर्तनशील हैं, तब ध्वनियों से उनका सम्बन्ध ही केसे अपरिवर्तनशील रह सकता है? मुख्य बात यह है कि भाषा-रचना का साधरण क्रम यह है कि मनुष्य अंजाने, बिना सोचे-समझे, स्वत: प्रेरित ढंग से ध्वनि और पदार्थ का स्थायी-अस्थायी संबंध बनाता है।

भाषा की रचना

मनुष्य ने भाषा की रचना अपनी विशेष बौद्धिक प्रतिभा के कारण नहीं की इसका एक प्रमाण और है। बच्चे भाषा केसे सीखते हैं? अनेक अस्पष्ट ध्वनियों के बीच वे कुछ निश्चित और स्पष्ट ध्वनियाँ भी करते हैं। इन ध्वनियों से किन्हीं वस्तुओं, व्यक्तियों आदि का सम्बन्ध जोड़ना सीखते हैं। यह सम्बन्ध अस्थायी भी होता है। हमारे पड़ोस की एक लड़की को उसके माता-पिता ‘बच्चा’ कहकर फकारते थे। लड़की ‘बच्चा’ को संबोधन मात्र के लिए उपयुक्त समझ कर अपने माता-माता को भी बच्चा कहती थी। ठीक यही क्रिया ‘तात’ शब्द के साथ घटित हुई थी पिता भी ‘तात’ है, फत्र भी ‘तात’ है। ‘तात’ ध्वनि के पिता-फत्र वाले दोनों सम्बन्ध स्थायी हो गये। पड़ोस की लड़की वाले उदाहरण में ‘बच्चा’ का सनातन सम्बन्ध ही कायम रहा उस लड़की ने कुछ दिन बाद माता-पिता से उसके अस्थायी सम्बन्ध को भुला दिया। बच्चा स्वयं निरर्थक ध्वनियाँ करता है और इन निरर्थक ध्वनियों में कुछ को सार्थक भी बना लेता है सुनी हुई और अपनी स्वत:स्पूर्ति ध्वनियों से वह वस्तुओं का अस्थायी सम्बन्ध कायम करता है-भाषा के निर्माण की भी यही प्रक्रिया है। जैसे गर्भ में शिशु मानव-विकास की सारी मंजिलें पार करता है, वैसे ही गर्भ से बाहर आने पर वही शिशु भाषा सीखने में भाषा-निर्माण-प्रक्रिया की सारी मंज़िलें पार करता है। जैसे गर्भ में वह मानव-पूर्व मंजिलें बहुत जल्दी पार करता है और उसके शेष जीवन की तुलना में यह अवधि बहुत छोटी होती है, वैसे ही जन्म के बाद वह भाषा-निर्माण की प्राथमिक मंज़िलें बहुत जल्दी पार करता है और पूर्वज जो भाषा-निधि अर्जित कर चुके हैं, उससे पूर्ण लाभ उठाता है। प्राथमिक मंजिलें पार करने का महत्व यह है कि भाषा-निर्माण की बुद्धि-निरपेक्ष क्रिया स्पष्ट हो जाती है। आरम्भ में मानव शिशु भाषा के मामले में अन्य पशु-शावकों से बहुत भिन्न नहीं होता।

मनुष्य का गल-प्रतिस्वनक (Pharyngeal resonator) उसकी अपनी विशेषता है। यह दूसरे स्तन्यों में नहीं होता। मनुष्य का घोषयंत्र गर्दन में ध्ंसा हुआ होता है उसका कंठपिधन कोमल तालु से जुदा होता है। इससे मनुष्य के पास विशद गलगुहा होती है। ध्वनि करने के समय गलगुहा के आकार में काफी परिवर्तन सम्भव होता है। घोषयंत्र की इन सब विशेषताओं के कारण मनुष्य अन्य पशुओं की अपेक्षा अधिक और भिन्न कोटि की ध्वनियाँ कर सका। अन्य पशुओं के समान उसने भी ध्वनि-संकेतों से काम लेना शुरू किया। ध्वनियों की बहुलता से वह नये-नये ध्वनि-संकेत निश्चित कर सका। अपने शारीरिक गठन के कारण जैसे-जैसे परिवेश के विभिन्न पदार्थों से उसका परिचय बढ़ा, वैसे ही उनके लिए वह ध्वनि संकेत भी निश्चित करता गया।

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