इतिहास अतीत का अर्थ, परिभाषा, उपयोगिता, महत्व, प्रकृति व क्षेत्र

अनुक्रम

इतिहास अतीत क्या है? इस प्रश्न के उत्तर अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं। विभिन्न विद्वानों के द्वारा इसके अनेक उत्तर दिये गये हैं। इतिहास अतीत एक ऐसा विषय है जिसे सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। इतिहास अतीत हर विषय से सम्बन्धित है। प्राचीनकाल से आज तक इस पृथ्वी पर जो कुछ भी हुआ है वह इतिहास अतीत ही है। हर वस्तु का अपना इतिहास अतीत होता है। एक विद्वान का मानना है कि इतिहास अतीतकार के प्रयास का लक्ष्य अतीत तथा वर्तमान के मध्य एक ऐसे सेतु का निर्माण करना है जिसके माध्यम से वह समसामयिक समाज को अतीत का अवलोकन कराकर अतीत के उद्धरणों द्वारा वर्तमान को प्रशिक्षित करे तथा भविष्य का मार्गदर्शन कर सके।

जब स्मृति अथवा अतीत को वैज्ञानिक अध्ययन के सहारे क्रमबद्ध किया जाता है तब इतिहास अतीत का जन्म होता है। परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसके प्रति भी दृष्टिकोण बदला है। अब घटनाओं का मात्र क्रमबद्ध विवरण ही नहीं अपितु उनसे जुड़ी हुई परिस्थितियों का अध्ययन भी अब आवश्यक हो गया है। इस अध्ययन में भी नियमबद्धता होनी आवश्यक है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत वह है जो अतीत का अवलोकन करते हुए वर्तमान को शिक्षा देता है तथा भविष्य के लिये पथ प्रशस्त करता है।

आज इतिहास अतीत प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति से सम्बन्धित है। यह किसी व्यक्ति विशेष अथवा समय विशेष तक ही सीमित नहीं है वरन् समाज एवं संस्कृति के प्रत्येक पहलू से जुड़ा हुआ है। अत: हम कह सकते हैं कि अतीत के सत्य की खोज ही इतिहास अतीत है। कुछ विद्वानों का मानना है कि इतिहास अतीत अतीत की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का अभिलेख है परन्तु यदि देखा जाए तो इतिहास अतीत सम्पूर्ण अतीत का आलेख है। समाज का हर पहलू इतिहास अतीत का अंग है। इस धरती पर इतिहास अतीत का सम्बन्ध मानवीय अस्तित्व के शुरू होने से ही है। मनुष्य ने इस धरती पर कहाँ तथा कब पैर रखा वहीं से मनुष्य का इतिहास अतीत प्रारम्भ होता है। भौगोलिक परिस्थितियाँ भी मनुष्य की कार्यक्षमता तथा इतिहास अतीत को प्रभावित करती हैं।

इतिहास अतीत की उत्पत्ति

इतिहास अतीत शब्द की उत्पत्ति संस्कृत व्याकरण के विद्वानों के अनुसार इति + ह + आस, इन तीन शब्दों के रूप में स्वीकार की जाती है। जिसका अर्थ इस प्रकार से है-निश्चित रूप से ऐसा ही हुआ था। इतिहास अतीत शब्द का प्रयोग हमें अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। इस शब्द का उल्लेख अथर्ववेद में भी मिलता है।

आचार्य दुर्ग ने इस विषय में लिखा है-इति हैवमासीदति यत् कथ्यते तत् इतिहास अतीत: (निरुक्त भाष्य वृत्ति रचना) अर्थात् यह निश्चत रूप से इस प्रकार ही हुआ था-यह जो कहा जाता है, वह इतिहास अतीत है। इसी प्रकार से छादोग्य उपनिषद में ‘ इतिहास अतीत: प×चमोवेद:’ (7-1-2) अर्थात् इतिहास अतीत को पाँचवा वेद माना गया है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों, वेदों, पुराणों में भी इतिहास अतीत शब्द का प्रयोग हुआ है।

अंग्रेजी में इतिहास अतीत को (History) कहते हैं जोकि यूनानी संज्ञा लोरोप्ला (Loropla) से ग्रहण किया गया है। जिसका अर्थ होता है सीखना। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार इतिहास अतीत के लिये जर्मन शब्द ‘GESCHICHTE’ है और इसका अर्थ है ‘घटित होना’ परन्तु इस अर्थ में इतिहास अतीत को दोहराया नहीं जा सकता।

History (हिस्ट्री) शब्द की उत्पत्ति यूनानी शब्द हिस्टोरिया (Historia) से मानी जाती है। जिसका अर्थ होता है जानना अथवा ज्ञात होना। यूनानी भाषा में इतिहास अतीतकार को हिस्तोर कहा जाता है। इस समय में इतिहास अतीतकार उसे कहते थे जो वाद-विवाद का निर्णय करता था, तथा जिसे विषय की पूर्णतया जानकारी अथवा अच्छी तरह समझ होती थी।

इतिहास अतीत की परिभाषा

यह तो स्पष्ट है कि अतीत का अध्ययन ही इतिहास अतीत है परन्तु यह अध्ययन वैज्ञानिक होना चाहिए। इस प्रकार से देखा जाये तो अतीत का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन ही इतिहास अतीत कहलाता है। रेनियर ने कहा है कि इतिहास अतीत एक कहानी है। जी. एम. ट्रेवेलियन के अनुसार भी इतिहास अतीत एक कथा है। हेमरी पेरिने ने इतिहास अतीत को समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों एवं उपलब्धियों की कहानी बताया है।

शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से देखा जाये तो (History) का अर्थ होता है-सत्य के अन्वेषण अथवा खोज का क्रम और इतिहास अतीत का अर्थ होता है निश्चित रूप से ऐसा ही हुआ था अथवा ऐसा ही होता आया है। अत: स्पष्ट है कि इतिहास अतीत निश्चित रूप से होने के साथ-साथ प्रामाणिक भी है। हेरोडोट्स ने जो इतिहास अतीत लिखा उसे कथात्मक इतिहास अतीत कहा जाता है। अगर हम शब्दकोष के आधार पर भी देखें तो इतिहास अतीत का अर्थ यही निकलता है। लेकिन यह मात्र सार्वजनिक घटनाएं ही न हों बल्कि क्रमबद्ध होने के साथ-साथ कहीं भी अवरोधित न हो और इनके साथ प्रमाण होने आवश्यक हैं। थ्यूसीडाइडस के द्वारा जो इतिहास अतीत लिखा गया उसे प्रबोधक इतिहास अतीत की संज्ञा दी जाती है। उन्होंने अपने इतिहास अतीत लेखन में तथ्यों को अत्यधिक महत्त्व दिया। इसके अलावा अनेक विद्वानों ने इतिहास अतीत लेखन की वैज्ञानिक पद्धति भी प्रस्तुत की और इस प्रकार की लेखन शैली को कालान्तर में अत्यधिक महत्त्व प्राप्त हुआ। अनेक विद्वानों ने इतिहास अतीत को अपने-अपने ढंग से देखा है तथा अपने ढंग से अर्थ दिये हैं। परन्तु इसके अर्थ के रूप में विद्वानों में मतैक्य नहीं रहा। इस रूप में इतिहास अतीत को अतीत के अभिलेख (Records of Past) के रूप में माना गया। लेकिन इतिहास अतीत तिथियों अथवा तारीखों का संग्रह मात्र नहीं है। कार्ल आर. पापर के अनुसार- इतिहास अतीत का कोई लक्ष्य नहीं होता इसलिये उसका कोई अर्थ नहीं है। कुछ विद्वानों ने इसका समर्थन तो किया है परन्तु अधिकांश लोगों ने इसको गलत माना है। कार्ल आर. पापर ने अपना यह सिद्धान्त कि इतिहास अतीत का अर्थ नहीं होता इससे समर्थित किया कि प्रकृति के समान इतिहास अतीत भी हमें नहीं बता सकता कि हमें क्या करना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत विल्हेल्म हिल्थे (1823-1911) ने जीवन को इतिहास अतीत के समान अर्थपूर्ण माना। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण इतिहास अतीत मन की अभिव्यक्ति होता है क्योंकि इतिहास अतीत की रचना मस्तिष्क से होती है। इस तरह से गार्डनर तथा हीगेल ने भी इतिहास अतीत को अर्थपूर्ण बताया है। एरिख काल्हर के अनुसार-पापर द्वारा दी गई अनेक आपत्तियों के बावजूद, मानव इतिहास अतीत में एक व्यवस्था का दर्शन होता है और जहाँ व्यवस्था होती है वहाँ अर्थ का अस्तित्त्व हो सकता है।

गार्डनर का मानना है- इतिहास अतीतकार अतीत के तथ्यों पर उस काल की घटनाओं का एक परिकल्पनात्मक चित्र प्रस्तुत करता है जिसमें वर्णित घटनाएं अर्थपूर्ण होती हैं-इसी को इतिहास अतीत का अर्थ कहते हैं।

कल्पना तो मात्र साधन है इससे अतीत को साकार किया जा सकता है। अतीत की घटनाएं अर्थपूर्ण होती हैं अत: इतिहास अतीत का भी अपना अर्थ होता है। विको ने ‘द न्यू साइंस’ (The New Science) नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना की। उसका कहना था कि-फ् इतिहास अतीत का ज्ञान प्रकृति के ज्ञान से भिन्न है, प्रकृति ईश्वर की रचना है जबकि इतिहास अतीत की रचना मनुष्य करता है। इसलिए व्यक्ति प्रकृति की अपेक्षा इतिहास अतीत को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकता है। अन्य विद्वानों ने भी इतिहास अतीत को अर्थपूर्ण बताया है। वास्तविक स्थिति भी यही है कि जब विश्व में सभी चीजें अर्थपूर्ण हैं तब इतिहास अतीत अर्थहीन केसे हो सकता है। इतिहास अतीत तो ज्ञान का अजस्त्र स्रोत है। अन्य कई विषयों का उद्गम स्रोत ही इतिहास अतीत है तब इतिहास अतीत अर्थहीन केसे हो सकता है? इतिहास अतीत में हम अतीत की घटनाओं का अध्ययन तथा विश्लेषण करते हैं। इतिहास अतीतकार इतिहास अतीत को अर्थ प्रदान करता है। अत: यह इतिहास अतीतकार का ही दायित्व होता है कि वह सकारात्मक रुख अपनाकर सकारात्मक इतिहास अतीत की रचना कर, सकारात्मक अर्थ निकाले। इतिहास अतीतकार एक विशेष काल के तथ्यों को एकत्रित करके उस काल के इतिहास अतीत को अर्थ प्रदान करता है। यह ऐतिहासिक तथ्य बिखरे हुए होते हैं। अत: उन तथ्यों के साथ वह कार्य तथा कारण इत्यादि सम्बन्धों की विवेचना एवं खोज करके अतीत के उस इतिहास अतीत को साकार करता है। इस प्रकार से अतीत की रचना इतिहास अतीत के रूप में इतिहास अतीतकार ही करता है।

इतिहास अतीत में बहुत सी घटनाएं ऐसी होती हैं जो देखने में निरर्थक प्रतीत होती हैं परन्तु उनके पीछे कुछ अर्थ भी छिपे होते हैं, जोकि इतिहास अतीतकार के माध्यम से ही साकार होते हैं तथा जिन्हें इतिहास अतीतकार को अपने विवेक के द्वारा ही खोजना पड़ता है।

डेवी ने अपनी पुस्तक ‘“यूमन नेचर एण्ड कण्डक्ट’ (Human Nature and Conduct) में लिखा है- अतीत पर निष्ठा अतीत के लिये ही नहीं अपितु सुरक्षित एवं सुसम्पन्न वर्तमान के लिये इस उद्देश्य से की जाती है कि वह सुखद एवं सुन्दर भविष्य का निर्माण करेगा।

अत: हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत का सर्वप्रथम अर्थ यही है कि वह वर्तमान में अतीत से प्रेरणा लेकर सुखद भविष्य का निर्माण करे। ऐसे में इतिहास अतीतकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह अतीत का भली प्रकार से अध्ययन करने के पश्चात् इतिहास अतीत को एक सार्थक अर्थ प्रदान करे। जिससे लोग प्रेरणा ग्रहण कर सके तथा जो लोगों के लिये ज्ञान का स्रोत हो। यह सब इतिहास अतीतकार के ऊपर निर्भर करता है।

ओकशाट अपनी पुस्तक ‘एक्सपीरियेन्स एण्ड इट्स मोड्स’ (Experience and its Modes) में लिखते हैं कि- इतिहास अतीत, इतिहास अतीतकार का अनुभव होता है। इतिहास अतीतकार के अतिरिक्त अन्य कोई भी इसकी अनुभूति नहीं कर सकता। इतिहास अतीत लेखन का अभिप्राय इसका निर्माण होता है। लेकिन इसके साथ ही इतिहास अतीतकार का कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उसका कार्य मात्र घटनाओं का अध्ययन तथा संकलन ही नहीं अपितु उचित अर्थ के साथ एक उपयुक्त निष्कर्ष तक पहुँचाना भी होता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत का अपना एक अर्थ होता है तथा अतीत की प्रत्येक घटना के पीछे तथ्य तथा उद्देश्य होते हैं। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उसमें अर्थ निहित होते हैं। निष्कर्षत: वर्तमान में अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य को सुखी बनाना तथा प्रेरणा प्राप्त करना ही इतिहास अतीत का मुख्य अर्थ है।

अनेक विद्वानों ने इतिहास अतीत को जिन विभिन्न अर्थों में देखा उसी के अनुरूप उन्हें परिभाषित भी किया है। अत: इतिहास अतीत की कई अलग-अलग परिभाषाएँ निश्चित होने के पीछे भी यही मुख्य कारण है। इसीलिये चाल्र्स फर्थ ने लिखा है कि- इतिहास अतीत को परिभाषित करना सरल नहीं है। परिभाषा का मुख्य कार्य सम्बन्धित विषय के बारे में उनके तत्वों को स्पष्ट करना तथा उसे सुबोध और सरल बनाना होता है। इतिहास अतीत स्वयं में एक ऐसा विषय है जिससे अन्य विषय भी जुड़े हुए हैं। अत: इसके लिये अनेक प्रकार की परिभाषाओं की व्याख्या की गई हैं। इतिहास अतीत को समाज का पूर्ण चित्रण कहा गया है। यह तो निश्चित है कि इतिहास अतीत में देशकाल तथा परिस्थितियों के साथ-साथ समाज के स्वरूप का भी चित्रण होता है। इतिहास अतीत का प्रारम्भ तभी से ही हो जाता है जबसे इस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है। गैरोन्सकी का कहना है- इतिहास अतीत मानव अतीत के उस बिन्दु के प्रारम्भ काल का अभिलेख है जबसे लिखित अभिलेख प्राप्त होता है। इतिहास अतीत मानव सभ्यता का अभिलेख है।

इतिहास अतीत की उपयोगिता

इतिहास अतीत शब्द को मुख्यत: दो अर्थों से जोड़ा जाता है जिसमें प्रथम है विभिन्न घटनाओं का संकलन तथा द्वितीय के अनुसार इतिहास अतीत स्वयं ही एक घटना है। क्योंकि घटना के अभाव में इतिहास अतीत लेखन करना सम्भव ही नहीं है। अगर इतिहास अतीत स्वयं एक घटना है तो इसके बारे में अनेक प्रश्न उठते हैं यथा क्यों, कब, कहाँ तथा केसे? अत: यदि देखा जाये तो हमें प्रत्येक घटना के सम्बन्ध में इतिहास अतीत से जानकारी प्राप्त होती है। चाल्र्स फर्थ (Charles Firth) ने लिखा है कि-इतिहास अतीत मनुष्य के समाज में जीवन का, समाज में हुए परिवर्तनों का, समाज के कार्यों को निश्चित करने वाले विचारों का तथा उन भौतिक दशाओं का जिन्होंने उसकी प्रगति में सहायता की, लेखा-जोखा है। डॉ. राधाकृष्णन ने इतिहास अतीत को राष्ट्र की स्मरण शक्ति कहा है। यद्यपि इस कथन से भी समस्त इतिहास अतीतकार पूर्ण रूपेण सहमत नहीं है तथापि इसमें कुछ सत्यता हो सकती है क्योंकि अनेक राष्ट्रों तथा मानव जातियों को अपने विस्मृत गौरव तथा अतीत की जानकारी इतिहास अतीत से होती है।

अनेक विद्वानों ने इतिहास अतीत को मात्र एक कहानी के रूप में स्वीकार किया है। जी.एम. ट्रेवेलियन के अनुसार- इतिहास अतीत अपने अपरिवर्तनीय रूप में एक कहानी है। हेनरी पिरेने के अनुसार- इतिहास अतीत समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों तथा उपलब्धियों की कहानी है। इसी विचार को तुइ¯जग ने भी व्यक्त किया है कि- इतिहास अतीत अतीत की कथात्मक घटनाओं का उल्लेख है। रेनियर ने इतिहास अतीत को कहानी के रूप में परिभाषित किया है। जिन्होंने लिखा है कि- इतिहास अतीत सभ्य समाज की सन्निवासित मानवीय अनुभवों की कहानी है। इतिहास अतीत अतीत की कहानी मात्र है ऐसा नहीं है। अपितु इतिहास अतीत सिर्फ कथा नहीं बल्कि अतीत का जीवन्त चित्रण है। और अतीत के इस विवरण तथा चित्रण में सिर्फ समाज के विशिष्ट लोग ही नहीं आते बल्कि सम्पूर्ण समाज आता है। वास्तव में किसी भी राष्ट्र अथवा स्थान का इतिहास अतीत तब पूरा माना जाता है जब वहाँ के सभी वर्ग इतिहास अतीत में समाहित होते हों।

अगर हम इतिहास अतीत को मात्र एक कहानी मान लें तब उसमें इतिहास अतीत के मूल स्वरूप का लोप हो जाता है क्योंकि इतिहास अतीत तथ्यों पर आधारित होता है और उन तथ्यों के आधार पर इतिहास अतीत को लिखना इतिहास अतीतकार के ऊपर निर्भर करता है कि वह उसे मात्र एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करता है अथवा वास्तविक अतीत के तथ्यों को भलीपूर्वक विश्लेषण करने के पश्चात् वर्तमान के समक्ष लाता है। कहानी कल्पनाओं पर आधारित होती है। और इतिहास अतीत कल्पना पर नहीं तथ्यों पर आधारित होता है। प्राचीन समय में राजनीतिक इतिहास अतीत लेखन का प्रचलन अवश्य था क्योंकि राजनीति को इतिहास अतीत से सम्बद्ध कर दिया जाता था। परन्तु अब इतिहास अतीत जनसाधारण के सामाजिक तथा साँस्कृतिक पक्ष पर विशेष रोशनी डालता है। अत: ऐसे में इतिहास अतीत को मात्र एक कहानी के रूप में कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यद्यपि इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि इतिहास अतीत की कुछ घटनाऐं ऐसी होती हैं जो स्वयं में रोचकता से परिपूर्ण होती हैं। वे एक कहानी की तरह लगती हैं परन्तु फिर भी हम इतिहास अतीत को मात्र एक कहानी नहीं मान सकते।

कलिंगवुड ने लिखा है कि इतिहास अतीत अद्वितीय ज्ञान है और यह मनुष्य के सम्पूर्ण ज्ञान का स्रोत है। यह सत्य ही प्रतीत होता है क्योंकि इतिहास अतीत में ही मनुष्य जाति का सम्पूर्ण अतीत समाया हुआ है। अत: चाल्र्स फर्थ ने भी कहा है कि- इतिहास अतीत ज्ञान की एक शाखा ही नहीं, अपितु एक विशेष प्रकार का ज्ञान है जो मनुष्य के दैनिक जीवन में उपयोगी है। इतिहास अतीत से हमें यथेष्ट ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य अपनी सभी समस्याओं के लिये इतिहास अतीत की ओर उन्मुख होता है, क्योंकि इतिहास अतीत का मुख्य कार्य अतीत के उदाहरणों के द्वारा वर्तमान को भविष्य के लिये ज्ञान प्राप्त कराना होता है। लाल बहादुर वर्मा के अनुसार- अतीत के प्रति मनुष्य का नैसख्रगक लगाव होता है, इतिहास अतीत इस लगाव को इतिहास अतीत बोध में बदल देता है। संवेदना और भावना के यथार्थ को बौद्धिक यथार्थ-ज्ञान व विवेक में विकसित कर सकता है। अर्थात् उस लगाव को प्रासंगिक तथा उपयोगी बना सकता है। क्रोचे ने भी इतिहास अतीत को मानव ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ रूप के साथ-साथ एक प्रेरक शक्ति भी माना है। इतिहास अतीत से हमें पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है। अतीत से व्यक्ति शिक्षा लेता है तथा अपने भविष्य का निर्माण करता है। इतिहास अतीत में ऐसे अनेक उदाहरण विद्यमान हैं जैसे अलाउद्दीन खिलजी (खिलजी वंश) ने सिकन्दर की असफलता को देखकर अपनी विश्व विजय की महत्त्वाकांक्षा का परित्याग कर दिया। यह उचित ही है कि इतिहास अतीत अतीत के ज्ञान का संकलन है जो सभी के जीवन के विविध पहलुओं का ज्ञान प्रदान करता है। मगर एक तथ्य यह भी है कि मानव एवं समाज इतिहास अतीत से सीख कम ही लेता है। विश्व में होने वाले अनेक युद्ध इसके प्रमाण हैं। परन्तु साथ ही ऐसे उदाहरण भी हैं जब इतिहास अतीत से सीख ली गई है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत ज्ञान का भंडार होने के साथ ही ज्ञान का प्रमुख स्रोत भी है। जिससे शिक्षा लेकर मानव अपने सुखद भविष्य का निर्माण कर सकता है।

इतिहास अतीत को सामाजिक विज्ञान के रूप में भी मान्यता दी गयी है। यह कार्य सर्वप्रथम कार्ल मार्क्स ने किया। परन्तु विल्हेल्म डिल्थे प्रथम व्यक्ति था जिसने इतिहास अतीत को वास्तव में सामाजिक विज्ञान का रूप देने की कोशिश की। डिल्थे का कहना था कि यदि मनुष्य के कार्य, व्यवहार तथा कृतियों का अध्ययन किया जाये तो इतिहास अतीत ही ऐसा माध्यम है जिससे मनुष्य को समझा जा सकता है। इतिहास अतीत ही वह स्थान है जहाँ से सामाजिक विज्ञान की उत्पत्ति होती है। अत: इतिहास अतीत में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विकास के वर्णन का समावेश होना चाहिये। पिरेने ने लिखा है- इतिहास अतीत अतीत में स्थित मानव समाजों के विकास का व्याख्यात्मक वर्णन है। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत सामाजिक विज्ञान तो है ही साथ ही सामाजिक विज्ञान के अन्तर्गत जितने भी विषय आते हैं उनमें सर्वप्रमुख है और अन्य सामाजिक विज्ञान इसी में आत्मसात हैं।

इतिहास अतीत का महत्व

इतिहास अतीत एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण विषय है। इसका अध्ययन हमें वर्तमान में अतीत के महत्त्व को बताता है तथा भविष्य के लिये हमें नई धरोहर देता है। मानव जाति आज जितनी प्रगति कर चुकी है, उसका आधार वह अतीत ही है जहाँ से उसे ज्ञान मिला है। मनुष्य के लिये इतिहास अतीत का ज्ञान बहुत उपयोगी है। शेख अली का मानना है कि-इतिहास अतीत की उपेक्षा करने वाले राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं होता। दूसरी तरफ कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि इतिहास अतीत का अध्ययन उचित नहीं है। उनके अनुसार वर्तमान ही सब कुछ है तथा अतीत के विषय में जानकारी प्राप्त करने में हमें समय नष्ट नहीं करना चाहिये। हेनरी फोर्ड तथा हीगल भी इसी मत का समर्थन करते हैं। किन्तु यह मत सर्वमान्य नहीं है। हमारा वर्तमान अतीत से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में अतीत का अत्यधिक महत्त्व है। इस सृष्टि की उत्पत्ति केसे हुई, मानव समाज का प्रादुर्भाव तथा विकास केसे हुआ, इसकी जानकारी हमें इतिहास अतीत से ही मिल सकती है। मनुष्य तथा विश्व में वर्तमान रूप की जो पृष्ठभूमि है वह अतीत में ही विद्यमान है। इन परिस्थितियों में हम अतीत को अनदेखा केसे कर सकते हैं। इतिहास अतीत एक ऐसी कड़ी है जो वर्तमान को अतीत से सम्बद्ध करती है। जिस प्रकार से किसी भी चिकित्सक को रोग दूर करने के लिये रोग की पृष्ठभूमि की जानकारी आवश्यक होती है उसी प्रकार से किसी भी समाज व देश के विकास के लिये तथा उनकी समस्याओं के निदान के लिये हमें उसकी पृष्ठभूमि के लिये अतीत की ओर झाँकना ही पड़ता है।

हम जानते हैं कि इतिहास अतीत का क्षेत्र अत्यन्त ही व्यापक है। यह समाज के हर वर्ग से सम्बन्धित है। व्यवसायिक रूप में भी इतिहास अतीत की उपयोगिता कम नहीं है। फरातत्व विभाग, पर्यटन, अभिलेखागार, संस्कृति विभाग, ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ इतिहास अतीत का ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इतिहास अतीत की अत्यन्त उपयोगिता है। प्रशासनिक क्षेत्र में मानवीय तथा सामाजिक समस्याओं को समझने तथा हल करने में भी इतिहास अतीत एक धुरी का कार्य करता है। राउज ने लिखा है कि समाज को उच्चतर शिक्षा प्रदान करने के लिये इतिहास अतीत का ज्ञान अत्यावश्यक है। वास्तविकता भी यही है क्योंकि इतिहास अतीत से मनुष्य हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता है यह शिक्षा अन्य विषयों में दुलर्भ है। इतिहास अतीत सभी विषयों में एकसूत्रता स्थापित करता है। यह उक्ति उचित ही प्रतीत होती है कि इतिहास अतीत मनुष्य को बुद्धिमान बनाता है।

इतिहास अतीत के अध्ययन का प्रयोजन भी है। यह मनुष्य को न सिर्फ वर्तमान के लिये ज्ञान देता है अपितु भविष्य के निर्माण में भी सहायता करता है। भविष्य के लिये यह दिशा-निर्देश देता है। यह मानव के अनुभव क्षेत्र में वृद्धि करता है। यह न केवल मनुष्य को सत्य की खोज के लिये प्रेरित करता है अपितु अतीत के फनर्निमाण में भी सहायता प्रदान करता है। वर्तमान समय में इतिहास अतीत की उपयोगिता मात्र नैतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक ही नहीं है अपितु सूचनापरक भी है। इतिहास अतीत के अध्ययन के बारे मे कलिंगवुड ने लिखा है कि- इतिहास अतीत का अध्ययन मानव जीवन के लिये उपयोगी है क्योंकि परिवर्तन की लय स्वयं को दोहराती रहती है क्योंकि उसी प्रकार की घटनाएं और समान परिणाम अक्सर दृष्टिगोचर होते हैं। यह न केवल घटित होने वाली घटनाओं की ओर संकेत करता है अपितु उन संकटों से भी अवगत कराता है जिनके आने की संभावना होती है। इतिहास अतीत का सम्बन्ध समाज के सभी वर्गों से है इतिहास अतीत स्वयं को समझने तथा आंकलन करने का और भविष्य को संवारने का अनुभव देता है। यह हमें मानवीय समाज का ज्ञान प्रदान करता है। समाज की उत्पत्ति स्वरूप, विकास, विचारधाराओं के पारस्परिक संघर्ष तथा प्रगति का विवरण हमें इतिहास अतीत से ही मिलता है। इतिहास अतीत हमें उन प्राकृतिक नियमों की जानकारी देता है जिन पर मानवीय व्यवहार आधारित हैं। इतिहास अतीत के प्रति मानव की हमेशा से रुचि रही है।

इतिहास अतीत के अध्ययन का नैतिक महत्व भी है। अतीत से लेकर वर्तमान तक चाहे जो भी स्थितियाँ अथवा परिस्थितियाँ रही हों नैतिक मूल्यों एवं सिद्धान्तों के गुण तथा विशेषताएँ प्राय: समान ही रहती हैं। अत: ऐसी स्थिति में इतिहास अतीत का नैतिक महत्व स्वयं ही सिद्ध हो जाता है।

इतिहास अतीतकार इतिहास अतीत में शोध के द्वारा अतीत को वर्तमान में चित्रित करता है। यह मानव मस्तिष्क की जिज्ञासाओं को शान्त करता है। नित्य नई खोजें तथा अनुसंधान हमारे सामने नये तथ्य लाते रहते हैं। इतिहास अतीत की श्रंखला से अतीत, वर्तमान तथा भविष्य सम्बद्ध रहते हैं।

कुछ विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को नहीं माना है। यद्यपि उनके अनुसार इतिहास अतीत का महत्त्व है परन्तु एक सीमा तक। उनका कहना है कि अतीत के अध्ययन का कोई सैद्धान्तिक महत्त्व नहीं है। इतिहास अतीतकार वर्तमान के महत्त्व को अनदेखा कर देता है क्योंकि वह हमेशा अतीत के अध्ययन में ही व्यस्त रहता है। ऐसे में इतिहास अतीत का अध्ययन वर्तमान के महत्त्व को कम करता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी इतिहास अतीत निरर्थक है क्योंकि यह मात्र अतीत को ही दर्शाता है। इतिहास अतीत का अध्ययन कभी-कभी पूर्वाग्रहों से भी प्रेरित होता है। ऐसी स्थिति में इतिहास अतीतकार सम्पूर्ण वर्णन अपनी इच्छा के आधार पर ही करता है और ऐसी स्थिति में इतिहास अतीत का वास्तविक अर्थ ही समाप्त हो जाता है दूसरी ओर वर्णन तथा व्याख्या करने के लिये जो स्रोत प्रयोग किये जाते हैं उनमें भी विरोधाभास होता है अत: ऐसी स्थिति में इतिहास अतीत का अध्ययन संदेहपूर्ण बन जाता है।

परन्तु इन तर्कों के कारण इतिहास अतीत का महत्त्व समाप्त नहीं हो जाता। वर्तमान समय में नई तकनीक तथा साधनों के कारण अतीत का वैज्ञानिक तरीके से आंकलन किया जा सकता है तथा इन्हीं के आधार पर घटनाओं की व्याख्या की जा सकती है। अतीत में बिखरे हुए साक्ष्यों को समेटकर उन पर अनुसंधान करके ही इतिहास अतीतकार हमारे सामने रखता है। इतिहास अतीत का अध्ययन इस प्रकार से न केवल इतिहास अतीतकार वरन् सभी के लिये उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण बन जाता है। ए.जी. विझोरी ने लिखा है कि- इतिहास अतीतकारों ने मानवता के जीवन की निरंतरता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इतिहास अतीत के अध्ययन के लिये अनेक सशक्त कारण रहे हैं और रहेंगे। इस प्रकार से इतिहास अतीत का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। समाज का कोई भी पहलू इससे अछूता नहीं रहा है।

इतिहास अतीत की प्रकृति व क्षेत्र

इतिहास अतीत अतीत की घटनाओं की व्याख्या करता है, अत: यह इतिहास अतीतकार का दायित्व होता है कि वह इतिहास अतीत की प्रकृति को ध्यान में रखे। प्रारम्भ में इतिहास अतीत लेखन के समय मात्र अतीत लेखन को ही महत्त्वपूर्ण समझा जाता था परन्तु समय के साथ-साथ इतिहास अतीत का अध्ययन करते समय वैज्ञानिक पद्धति को प्राथमिकता दी जाने लगी। यह सर्वमान्य तथ्य है कि इतिहास अतीतकार का कार्य मात्र अतीत की घटनाओं का वर्णन नहीं अपितु उन्हें तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करना है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह अपने व्यक्तिगत तर्कों तथा तथ्यों को ऐतिहासिक तथ्यों से अलग रखे। इतिहास अतीतकार अपने इतिहास अतीत लेखन में साधारण वर्णन सामाजिक-आर्थिक तथा धार्मिक जीवन के बारे में अपने विचार रखता है और इसमें उसके स्वयं के विचार तथा पूर्वाग्रह भी सम्मिलित दिखाई पड़ते हैं। पूर्वाग्रह से इतिहास अतीतकार हमेशा ही प्रभावित होता है। क्योंकि उसे धार्मिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप में अतीत की घटनाओं का अध्ययन करना पड़ता है। इतिहास अतीत लेखन के साथ यह आवश्यक हो जाता है कि इसका पुनर्लेखन हो। नये तथ्यों के साथ जो अनुसंधानों तथा खोजों के परिणाम होते हैं उनका भी इतिहास अतीत लेखन में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अतिरिक्त नये साधनों का प्रयोग करके भी इतिहास अतीत लेखन के द्वारा व्याख्या की जा सकती है। ऐसे अनेक तथ्य हैं जो इतिहास अतीत की प्रकृति को प्रभावित करते हैं।

कुछ विद्वानों का यह कहना है कि इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता है। दूसरी ओर कुछ अन्य का विचार है कि ऐसा सत्य नहीं है। लेकिन सत्य इन दोनों तथ्यों के बीच में विद्यमान है। अगर हम प्रथम तथ्य को देखें कि इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता है तो इसका कारण पाते हैं कि विश्व में जो घटनायें होती हैं वे समान रूप से होती हैं परन्तु उनके पीछे कारण अथवा घटित होने का ढंग अलग होता है। मनुष्य के सोचने का ढंग और कार्य करने का ढंग प्राय: एक सा रहता है। उदाहरण के लिये अगर हम देखें तो पायेंगे कि इतिहास अतीत ऐसी कई घटनाओं से भरा हुआ है जो युद्ध अशोक के समय में हुआ था, वही युद्ध प्रथम विश्वयुद्ध तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में सामने आया। युद्ध की भयावहता को तथा विनाश को देखते हुए प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लीग ऑफ नेशन्स (League of Nations) की स्थापना की गई और दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् भी संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) को स्थापित किया गया। हिटलर, नेपोलियन, सिकन्दर तथा जूलियस सीजर इत्यादि के कार्य मुख्यत: एक ही पथ पर आधारित थे। प्रसिद्धि के प्रति मोह तथा महत्त्वाकांक्षा हर युग में विद्यमान रही है। दूसरी ओर जो इस कथन- इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता है के पक्ष में नहीं है। उनका कहना है कि बदलाव प्रकृति का नियम है तब इतिहास अतीत स्वयं को केसे दोहरा सकता है। अगर ऐसा होता है तब विकास की सम्भावनाएँ खत्म हो जाती हैं। उदाहरणार्थ हम इतिहास अतीत में कला को देखें तो हर युग में इसमें विभिन्नता है। इसके पीछे मनुष्य, समाज तथा संस्कृति की विभिन्नता भी परिलक्षित होती हैं। यह एक विचार का विषय है कि इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता है अथवा नहीं। परिवर्तन इतिहास अतीत में है जब इतिहास अतीत स्वयं को नहीं दोहराता है जैसे सभी स्थायी परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं और यह सत्य है कि अपरिवर्तनशीलता स्थायी नहीं है। अगर हम इस कथन के पक्ष में देखें तो पाएंगे कि क्रान्तियाँ, सुधार, राजनीतिक, परिवर्तन हर युग में हुए हैं, लेकिन इनके घटित होने का ढंग अलग था। अत: हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता भी है और नहीं भी दोहराता है। कभी-कभी समान परिस्थितियों के कारण इतिहास अतीत में हुई घटनाओं की प्रवृत्ति का आभास कराता है। इस बारे में टे्रवेलियन का कथन विचारणीय है कि-इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता है परन्तु कभी भी पूर्णतया नहीं दोहराता है।

इतिहास अतीत के बारे में दूसरा विचार यह है कि-सम्पूर्ण इतिहास अतीत समसामयिक इतिहास अतीत होता है। इसकी व्याख्या क्रोचे ने इस प्रकार से की है कि-प्रत्येक ऐतिहासिक तथ्य निर्णय के पीछे जो व्यावहारिक आवश्यकतायें होती हैं वे प्रत्येक इतिहास अतीत को समसामयिक इतिहास अतीत का चरित्र प्रदान करती हैं क्योंकि लिखी जाने वाली घटनायें वर्तमान स्थितियों से ही संदख्रभत होती हैं और उन्हीं में पहले की वे घटनायें प्रतिध्वनित होती हैं। इतिहास अतीत का लेखन वर्तमान में अतीत को आधुनिक अथवा वर्तमान समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। इतिहास अतीतकार का मुख्य कार्य मात्र उन घटनाओं को लिखना ही नहीं बल्कि उनका पूर्ण रूप से निरपेक्ष होकर मूल्यांकन करना होता है। कुछ ऐतिहासिक तथ्य एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं तथा स्थाई रूप से एक दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। ओकशाट, गालाब्रेथ तथा डेवी इत्यादि अनेक विद्वानों ने इस बात को स्वीकार किया है कि इतिहास अतीत समसामयिक होता है। वर्तमान समाज की उपादेयता के लिये ही अतीत का अध्ययन किया जाता है। कौटिल्य और कालिदास की रचनाएं इसका उदाहरण हैं। अशोक का युद्ध त्याग आज भी मानव जाति को युद्ध से होने वाले संहार के बारे में सावधान करता है। ईसा मसीह, महात्मा बुद्ध, गाँधी जी इत्यादि के विचार आज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने उस समय में थे। लेकिन कुछ विद्वानों ने इतिहास अतीत के समसामयिक होने पर प्रश्न उठाए हैं कि यदि इतिहास अतीतकार इतिहास अतीत के तथ्यों को वर्तमान में उपादेय बनाने पर जोर देता है तब यह मात्र उपयोगितावादी दृष्टिकोण बनकर ही रह जाता है। अत: यह विशेष ध्यान रखना चाहिये कि उपयोगितावाद के कारण तथ्यों की मौलिकता नष्ट न हो। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत समसामयिक होता है। परन्तु उसे समसामयिक बनाने के प्रयास के लिये तथ्यों से खिलवाड़ नहीं करना चाहिये।

कुछ अन्य इतिहास अतीतकारों की मान्यता है कि इतिहास अतीत की प्रकृति चक्रीय (Cyclic) अथवा रैखिक (Linear) होती है। जिन इतिहास अतीतकारों का मानना है कि इतिहास अतीत की प्रकृति चक्रीय होती है उनका मानना है कि इतिहास अतीत एक वृत्त के आधार पर घटित होता रहता है। प्रत्येक घटना एक नियत स्थान से आरम्भ होकर चरम अवस्था पर पहुँचती है, तत्पश्चात् उसका पतन हो जाता है। यह प्रक्रिया क्रमश: होती रहती है और अनेक सभ्यताओं का उत्थान तथा पतन इसका उदाहरण है। चाहे वह सभ्यता किसी स्थान की हो, रोम की हो अथवा चीन की या ग्रीक की सभी के लिये यह सिद्धान्त लागू होता है। हड़प्पा की सभ्यता भी इसका अपवाद नहीं है। कुछ विद्वानों का विचार है कि इतिहास अतीत की घटनाएं रैखिक होती हैं। ये सभी घटनाएं निरन्तर घटती रहती हैं। वर्तमान तथा अतीत एक दूसरे में सम्बद्ध रहता है। घटनाओं की यह निरन्तरता तथा अनवरतता ही इतिहास अतीत की रैखिक प्रकृति का निर्माण करती है। इसके अनुसार इतिहास अतीत की घटनाएं अतीत से प्रारम्भ होकर वर्तमान से गुजरकर अज्ञात भविष्य की ओर जाती हैं। इन प्राकृतिक सिद्धान्तों के अतिरिक्त तूर्गो (Turgot) तथा कोन्डोरे (Condorcet) ने विकास के विचार को मान्यता दी है। उनके अनुसार विकास का अर्थ अल्प वांछित स्थिति से अधिक वांछित स्थिति की ओर जाना है। छोटी घटनाएं बड़ी घटनाओं को जन्म देती हैं। कॉम्टे ने भी इस प्रकृति को स्वीकार किया है।

प्रसिद्ध विद्वान ई.एच.कार. के अनुसार इतिहास अतीत वर्तमान तथा अतीत के मध्य अनन्त वार्ता है। अतीत पूर्णत: ज्ञात नहीं होता है और इतिहास अतीतकार का कार्य उस अतीत के बारे में अनुसंधान तथा खोज करके तथ्यों को हमारे सामने रखना होता है और वह इसमें अपने ज्ञान का प्रयोग करता है। ऐसा करते समय इतिहास अतीत अतीत तथा वर्तमान की घटनाओं का सर्वेक्षण करता है। इतिहास अतीतकार के समक्ष अतीत की घटनाएं घटती नहीं हैं अत: उसे कल्पनाशीलता का सहारा भी लेना पड़ता है। अतीत की घटनाओं का वर्तमान में अनावरण ही इतिहास अतीत का मुख्य ध्येय है। इन घटनाओं का वर्तमान में वर्णन करते समय अतीत की मुख्य भूमिका होती है। इस प्रकार इतिहास अतीत अतीत तथा वर्तमान के बीच सम्बद्ध है। वर्तमान तथा अतीत के मध्य एक महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध होता है जो इन दोनों को जोड़ने के लिये प्रयुक्त होता है। जब अतीत और वर्तमान दोनों को एक साथ देखने के लिए साधन के रूप में प्रयोग होता है तब इसे इतिहास अतीत की दृष्टि कहा जाता है। इसी आधार पर वर्तमान समाज को अतीत के उन तथ्यों से परिचित कराया जाता है जो वर्तमान के लिए रुचिकर तथा उपयोगी हो। यह भी कहा जाता है कि अतीत तथा वर्तमान को आपस में जोड़ने के लिये इतिहास अतीत का प्रयोग किया जाता है। यह इतिहास अतीत की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्याख्या तथा प्रकृति भी है।

इतिहास अतीत की प्रकृति की व्याख्या इस रूप में भी की गई है कि सम्पूर्ण इतिहास अतीत विचारों का इतिहास अतीत है। इसको कालिंगवुड ने स्वीकार किया है और यह कहा है कि- इतिहास अतीतकार प्रधान नहीं बल्कि विचार प्रधान होते हैं तथा इतिहास अतीत प्राचीन विचारों का पुन: प्रदर्शन करता है। मानव के मूर्त कार्यों का स्रोत अथवा आधार विचार ही होते हैं। मनुष्य पहले विचार करता है तत्पश्चात् उन्हीं विचारों को लिखित रूप देता है। परिस्थितियाँ तथा वातावरण विचारों को प्रभावित करते हैं। जब हम शासकों का अध्ययन करते हैं तब यह बात उचित ही प्रतीत होती है। परन्तु इसके विपरीत अनेक विद्वानों ने इसे गलत माना है। प्रो. वाल्श के अनुसार भी इतिहास अतीत विचार प्रधान नहीं होता। दैवी विपत्तियाँ, बाढ़, भूकम्प इत्यादि विचारों के विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत एक सीमा तक ही विचारों का इतिहास अतीत कहा जा सकता है तथा सम्पूर्ण इतिहास अतीत को विचारों का इतिहास अतीत कहना उचित प्रतीत नहीं होता। परिस्थितियाँ, देशकाल तथा वातावरण इतिहास अतीतकार को प्रभावित करती हैं। अत: इतिहास अतीत मात्र विचारों का इतिहास अतीत ही नहीं है।

इतिहास अतीत समय के साथ हर युग में बदलता है और एक इतिहास अतीतकार के वर्णन दूसरे इतिहास अतीतकार से अलग होते हैं। काल के अनुसार इतिहास अतीत की प्रकृति भी बदल जाती है। काल अथवा समय का इतिहास अतीत पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इतिहास अतीतकार जो लिखता है-वह उसके तत्कालीन वातावरण से बहुत हद तक प्रभावित होता है। एक समकालीन इतिहास अतीतकार ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन अपने दृष्टिकोण से करता है और दूसरा व्यक्ति उसका वर्णन अपने अनुसार करता है।

इतिहास अतीतकारों के मध्य मुख्य विवाद का विषय है कि तथ्यों के महत्त्व का आकलन इतिहास अतीत में वांछनीय है अथवा नहीं। लॉर्ड एक्टन के अनुसार तथ्यों के महत्त्व का आकलन इतिहास अतीत में अनिवार्य है। जबकि दूसरी ओर रेंकी (Ranke) तथा बरी (Bury) के अनुसार यह सही नहीं है। उनका कहना है कि इतिहास अतीत में तथ्यों को उनकी मौलिक अवस्था में ही प्रस्तुत करना चाहिये। परन्तु अगर ऐसा किया गया तो इतिहास अतीत का कोई उद्देश्य नहीं रह जायेगा। इतिहास अतीत को अपने दृष्टिकोण से तथ्यों की व्याख्या करनी चाहिये। अन्यथा इतिहास अतीत में नीरसता आ जायेगी। साथ ही यह व्याख्या इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि इतिहास अतीत अपने मूल रूप से ही वंचित हो जाये। इस प्रकार से इतिहास अतीत की प्रकृति का अध्ययन विभिन्न ढंगों से किया जा सकता है। इतिहास अतीत स्वयं को दोहराता भी है और नहीं भी। एक ओर इतिहास अतीत समसामयिक है तो दूसरी ओर अतीत और वर्तमान के मध्य परस्पर संवाद है। इतिहास अतीत में तथ्यों के महत्त्व का आकलन भी आवश्यक है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक तथ्यों की अवधारणा चक्रीय अथवा रैखिक दोनों ही प्रकार की हो सकती है। इतिहास अतीत की प्रकृति के विषय में भले ही विद्वानों के मध्य विचारों में समानता न हो परन्तु इतिहास अतीत के महत्त्व पर सभी में सहमति है। इतिहास अतीत का अर्थ है तथा उसका उद्देश्य भी है। यह इतिहास अतीतकार का कर्त्तव्य है कि वह इतिहास अतीत का वर्णन करते समय तर्वफसंगत दृष्टिकोण को महत्त्व दे।

विद्वानों का मानना है कि-समय के साथ इतिहास अतीत के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ तथा उसमें नवीन क्षेत्र जुड़ गये हैं। इतिहास अतीत का मुख्य कार्य घटित घटनाओं का वर्णन करना, उनके घटित होने के कारण बताना और उनका विश्लेषण करना है। उसका क्षेत्र भी निरंतर बढ़ रहा है। इतिहास अतीत, अध्ययन विषय के रूप में काफी सीमा तक एक नवीन क्षेत्र कहा जा सकता है। यह मुख्यत: अठारवीं तथा बीसवीं शताब्दी के मध्य एक अलग क्षेत्र के रूप में उभरा तथा विकसित हुआ। इतिहास अतीत एक प्राचीन विषय रहा है। लेकिन उस समय में इतिहास अतीतकार ज्यादा संख्या में नहीं थे तथा उनका ऐतिहासिक लेखन कार्य मात्र कुछ मुख्य घटनाओं जैसे-युद्धों, सैनिक उपलब्धियों तथा धार्मिक वर्णन तक ही सीमित हुआ करता था। लेखन कार्यों में भी अधिकांशत: उन शासकों का वर्णन होता था, जिनके वे आश्रित होते थे। इसी कारण वश उस समय इतिहास अतीत का क्षेत्र अधिक विस्तृत नहीं था।

मानव समाज में विकास की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। इसके उत्थान, विकास तथा पतन की गति को इतिहास अतीत की गति माना गया है। इस प्रकार से इतिहास अतीत का क्षेत्र सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार सदैव विकसित होता रहता है। हम इतिहास अतीत लेखन के जनक हेरोडेटस से 20वीं सदी के टायन्बी तक इस परिवर्तन को लगातार देख सकते हैं। अत: आदिकाल से आधुनिक युग तक इतिहास अतीत क्षेत्र का स्वरूप निरन्तर परिवर्तनशील रहा है।

समय के साथ इतिहास अतीत का क्षेत्र भी निरंतर विकसित होता जा रहा है। प्रारम्भ में इतिहास अतीत का अध्ययन ज्ञान की तृप्ति का साधन था। हेरोडोटस ने अतीत के कार्यों को तथा घटनाओं को वर्तमान तथा भविष्य के लिये सुरक्षित रखने हेतु इतिहास अतीत का अध्ययन माना। समय के अनुसार इतिहास अतीत अध्ययन का विकास हुआ तथा परिणामस्वरूप उसका क्षेत्र भी विकसित हुआ। अगर हम प्रारम्भ से लेकर अब तक के इतिहास अतीत पर दृष्टि डालें तो हमें इसके विभिन्न रूप मिलेंगे। इतिहास अतीत में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों के कारण उसके क्षेत्र में विस्तार हुआ है। इतिहास अतीत के काल के अनुसार विभाजन से तथा विषय के अनुसार विभाजन से भी इतिहास अतीत के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। इतिहास अतीत को मुख्यत: तीन भागों में बाँटा गया है-प्राचीन, मध्य तथा आधुनिक काल का इतिहास अतीत। इसी प्रकार से विषयों के अनुरूप विभाजन कर देने से भी इतिहास अतीत के अनेक उपविषय बन गये हैं, जैसे- राजनीतिक इतिहास अतीत, आर्थिक इतिहास अतीत, सैन्य इतिहास अतीत, सामाजिक इतिहास अतीत, दार्शनिक इतिहास अतीत, कला एवं शिक्षा का इतिहास अतीत तथा धार्मिक इतिहास अतीत आदि। इस प्रकार इतिहास अतीत प्रत्येक विषय से सम्बन्धित हो गया है।

इतिहास अतीत अध्ययन के विविध रूपों तथा पुरालेखा विज्ञान, पुरातत्व विज्ञान शाखाओं के विकास से इतिहास अतीत का अध्ययन क्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि इतिहास अतीत के क्षेत्र का रूप समय एवं समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हो रहा है। प्रो. कार ने इस विषय में लिखा है कि- इतिहास अतीत विज्ञान के समान ही विस्तृत है जिसमें तथ्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। इतिहास अतीत की विषय वस्तु को लेकर विद्वानों में सहमति नहीं रही है। प्रारम्भ में घटनाओं को इतिहास अतीत की विषय वस्तु के रूप में स्वीकार किया गया परन्तु बाद में यह उचित प्रतीत नहीं हुआ तब यह कहा गया कि मनुष्य की विविध साँस्कृतिक गतिविधियाँ ही इतिहास अतीत की विषयवस्तु है। अब इतिहास अतीत का स्वरूप मात्र कुछ घटनाओं तक ही सीमित न रहकर सर्वव्यापी हो गया है। इतिहास अतीत का मुख्य ध्येय अथवा कार्य मनुष्य के कार्यों तथा उपलब्धियों की गणना करना है और यह किसी भी परिप्रेक्ष्य से सम्बन्धित हो सकती है। जैसे विज्ञान, आविष्कार तथा तकनीकी क्षेत्र। इसके अतिरिक्त कला तथा आख्रथक पहलू भी इतिहास अतीत से अछूते नहीं हैं। अत: स्पष्ट है कि इतिहास अतीत की विषय वस्तु अत्यन्त विस्तृत रूप में है। रोके तथा सीले के अनुसार इतिहास अतीत की विषय वस्तु राजनीति से सम्बद्ध है। परन्तु वहीं ब्यूरी के अनुसार- इतिहास अतीत के अध्ययन में व्यक्ति और समाज की बौद्धिक एवं भौतिक उपलब्धियों का अध्ययन भी आवश्यक है। टायन्बी ने कहा है कि-मानव जीवन से सम्बद्ध सम्पूर्ण कार्य व्यवहार इतिहास अतीत की विषय वस्तु हैय् अन्य इतिहास अतीतकारों ने भी इतिहास अतीत के क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत माना है। उनके अनुसार इतिहास अतीत के अन्तर्गत समाज के सभी पक्षों का वर्णन आवश्यक है। जैसे-आर्थिक व्यापार, उद्योग, भौगोलिक दशा, धार्मिक वर्णन, भू-व्यवस्था तथा प्रशासनिक व्यवस्था इत्यादि। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहास अतीत मनुष्य के जीवन के सामाजिक, भौतिक तथा सांस्कृतिक प्रत्येक पक्ष का अध्ययन करता है। माक्र्स, हीगल जैसे अनेक विद्वानों ने अपनी रचनाओं में जो समाज के पतन का तथा विकास का चित्रण किया है उससे भी यह बात और स्पष्ट रूप से सामने आती है कि इतिहास अतीत का विस्तार क्षेत्र लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पूर्व में कभी इतिहास अतीत भले ही वृहद् रूप में न स्वीकार किया जाता हो परन्तु अब यह स्वतंत्र विषय है। इसमें निरंतर होने वाले परिवर्तनों के परिणामस्वरूप इसका क्षेत्र बढ़ा है। इसमें सामाजिक आवश्यकताओं तथा शोध कार्यों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। कुछ विद्वानों के अनुसार इतिहास अतीतकार दो प्रकार से इतिहास अतीत को लिखते हैं। उनका पहला कार्य घटना से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करना तथा दूसरा कार्य उन घटनाओं का वर्णन करना। टे्रवेलियन का मत है कि- फ् इतिहास अतीतकार से तीन कार्यों की अपेक्षा की जाती है कि उसमें वैज्ञानिक, काल्पनिक तथा साहित्यिक फट होना चाहिए। इसके साथ ही अन्य तथ्य भी महत्त्वपूर्ण हैं जैसे प्रकृति का अध्ययन तथा भौगोलिक वातावरण आदि, क्योंकि ये भी मानव के उत्थान को प्रभावित करते हैं। इतिहास अतीत-लेखन के समय इन तथ्यों के महत्त्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता। प्रो. एल्टन ने लिखा है कि- अच्छा ऐतिहासिक लेखन ही विश्व इतिहास अतीत की दृष्टि से उचित है क्योंकि भले ही वह उसके किसी भी भाग का वर्णन करे वह विश्व व्यापकता का स्मरण करता है।

वर्तमान समय में बहुत ही सावधानीपूर्वक तथा व्यवस्थित ढंग से तथ्यों का संकलन तथा उनका मूल्यांकन करने के लिये आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है। पहले का इतिहास अतीत मात्र राजनीतिक घटनाओं के अध्ययन तक सीमित हो सकता था परन्तु अब इतिहास अतीत के अन्तर्गत सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा साहित्यिक रूप से भी लोगों के जीवन का अध्ययन किया जाता है। अत: अब इतिहास अतीत जन-साधारण से भी सम्बन्धित है। इन्हीं सभी विचारधाराओं के कारण इतिहास अतीत के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है।

वर्तमान में इतिहास अतीत के अन्तर्गत अन्य विषयों का भी अध्ययन किया जाता है क्योंकि समाज तथा मानव के विकास के पूर्ण विवरण के लिये ये आवश्यक है। प्राचीन काल से ही इतिहास अतीत में राजनीति को विशेष स्थान प्राप्त रहा है। प्रत्येक काल में इतिहास अतीतकारों ने राजनीतिक इतिहास अतीत का वर्णन किया। इसका कारण यह भी था कि हर समाज में राजनीति में कुछ लोग ही प्रमुख होते थे। वे ही युद्ध अथवा शांति में मुख्य भूमिका निभाते थे। पहले जब राजनीतिक इतिहास अतीत लिखा जाता था तब उसमें जन साधारण की कोई मुख्य भूमिका नहीं होती थी। परन्तु बाद में राजनीतिक अध्ययन के समय जनसाधारण के योगदान को भी महत्त्व दिया जाने लगा और राजनीतिक इतिहास अतीत के अन्तर्गत राजनीतिक घटनाओं तथा महापुरुषों का अध्ययन किया जाने लगा।

आर्थिक इतिहास अतीत भी इतिहास अतीत की एक महत्त्वपूर्ण शाखा हैं 18वीं सदी के पश्चात् 19वीं शताब्दी में इस प्रकार की इतिहास अतीत लेखन की परम्परा को अधिक बल मिला। जब इतिहास अतीतकार आर्थिक दृष्टि से सामाजिक बंधनों और मानवीय व्यवहार को अपने लेखों में वख्रणत करता है तब यही आर्थिक इतिहास अतीत कहलाता है। आर्थिक इतिहास अतीत में औद्योगिक क्रान्ति की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। कई इतिहास अतीतकारों ने इसमें अपने कार्यों के द्वारा योगदान दिया। जैसे- हीरन, काम्टे आदि।

सामाजिक इतिहास अतीत में लोगों से जुड़े हुए सामाजिक जीवन का अध्ययन किया जाता है, जिसके अन्तर्गत धर्म, रीति-रिवाज, खान-पान व परम्पराएं आती हैं। वस्तुत: देखा जाए तो किसी भी देश का सामाजिक इतिहास अतीत उसके आर्थिक तथा राजनैतिक इतिहास अतीत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है।

समाज किसी भी प्रकार के इतिहास अतीत की आधारशिला होता है। रील और फर्टग पहले ऐसे विद्वान थे जिनके द्वारा जर्मनी के मध्यकालीन तथा आधुनिक सामाजिक जीवन का वर्णन किया गया। सामाजिक इतिहास अतीत के अध्ययन के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। इंग्लैण्ड के अलावा यूरोप के अन्य देशों में भी ऐसे इतिहास अतीत लेखन की तैयारी की ओर ध्यान दिया गया जो समाज से सम्बन्धित हो।

प्रारम्भ में किसी भी देश के कानून लिखित रूप से नहीं होते थे तथा जो शासक की आज्ञा होती थी वही कानून बन जाया करती थी। एक ही कार्य के लिये ये आज्ञा भिन्न भी हो सकती थी। उस समय में वैधानिक इतिहास अतीत के लिये कोई स्थान नहीं था किन्तु वर्तमान समय में यही ऐतिहासिक विधा महत्त्वपूर्ण है। इस विधा से एक नये इतिहास अतीत का जन्म हुआ। इतिहास अतीतकारों ने कानून से सम्बन्धित विकास तथा इससे सम्बन्धित संस्थाओं को लोगों के समक्ष रखने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त अनेक राज्यों के मध्य परस्पर सम्बन्ध तथा राजनैतिक सम्बन्धों का अध्ययन वूफटनीतिक इतिहास अतीत कहा जाता था अगर देखा जाये तो यह राजनैतिक इतिहास अतीत की ही एक शाखा थी। लेकिन वस्तुत: यह एक स्वतंत्र विषय है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में वूफटनीतिज्ञों के बारे में विस्तार से लिखा है। अन्य विद्वानों ने भी वूफटनीतिक इतिहास अतीत पर प्रकाश डाला है। परन्तु इस प्रकार के इतिहास अतीत का अध्ययन करते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिये तथा इसका अध्ययन आलोचनात्मक दृष्टिकोण से ही करना चाहिये।

बौद्धिक इतिहास अतीत का आरम्भिक समय में विशेष महत्त्व नहीं था। अत: इससे सम्बन्धित सामग्री का अभाव है। मनुष्य के व्यवहार, कार्यों तथा व्यक्तित्व का प्रभाव संस्कृति पर पड़ता है। यही कारण था कि लेखकों तथा विद्वानों के द्वारा इस प्रकार के इतिहास अतीत लेखन की परम्परा को महत्त्व प्रदान किया गया। वेगहो, टे्रड तथा दुख्र्ाीम, इत्यादि इतिहास अतीतकारों ने इसमें विशेष रूप से योगदान दिया। इस प्रकार के इतिहास अतीत के अतिरिक्त एक और इतिहास अतीत भी है जो मनुष्य के रीति-रिवाजों, परम्पराओं, धर्म, संगीत, शिक्षा तथा साहित्य से जुड़ा हुआ है। यह प्रत्येक काल में विद्यमान अवस्थाओं को जो संस्कृति से जुड़ी होती है उन्हें दर्शाता है। इस प्रकार के इतिहास अतीत को सांस्कृतिक इतिहास अतीत का नाम दिया गया है। यह इतिहास अतीत प्रत्येक काल की विभिन्न दशाओं को जानने का महत्त्वपूर्ण साधन है। इसके माध्यम से जहाँ तत्कालीन कला तथा संस्कृति के विकास के बारे में जानकारी मिलती है, वहीं दूसरी ओर संगीत, शिक्षा तथा साहित्य के बारे में भी विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में विश्व बंधुत्व की भावना के विकास से विश्व के इतिहास अतीत का अध्ययन अत्यन्त ही आवश्यक हो गया है। विश्व के इतिहास अतीत से तात्पर्य विश्व के ज्ञान से है। कोई भी देश स्वयं में परिपूर्ण नहीं होता है, सम्पूर्ण विश्व में ऐसा कोई भी राष्ट्र नहीं है जो दूसरे पर अवलम्बित नहीं हो। सभी राष्ट्र किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर अवलम्बित हैं। अत: विश्व इतिहास अतीत का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक होता जा रहा है। विश्व का इतिहास अतीत अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं की व्याख्या करता है। जब विश्व युद्धों के परिणाम स्वरूप हुई भयावहता ने संस्थाओं की आवश्यकता अनुभव की जो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने दें। तब लीग ऑफ नेशन्स संयुक्त राष्ट्र संघ इत्यादि की स्थापना हुई। इससे विश्व के राष्ट्र एक दूसरे के करीब आये तथा विश्वबंधुत्व की भावना को बल मिला। तभी विश्व इतिहास अतीत की ओर लोगों का ध्यान गया। सर्वप्रथम वाल्टर रेले ने तत्पश्चात् एच.जी. वेल्स, हीगल, स्पेंग्लर, टायन्बीं तथा हेज इत्यादि ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। वर्तमान समय में आधुनिक संचार साधनों तथा तकनीकी विकास के कारण विश्व इतिहास अतीत का अध्ययन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गया है।

राष्ट्रीय इतिहास अतीत का अध्ययन भी महत्त्वपूर्ण है प्रत्येक मनुष्य को उसके राष्ट्र का ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इतिहास अतीत के माध्यम से किसी भी राष्ट्र के निवासियों में देशभक्ति एवं अतीत के लिये गौरव की भावनाओं का विकास किया जा सकता है। अत: ऐसे इतिहास अतीत का भी अत्यन्त महत्त्व है समस्त राष्ट्र की अखंडता के लिये राष्ट्रीय इतिहास अतीत का लेखन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

इसके अतिरिक्त एक अन्य इतिहास अतीत क्षेत्रीय इतिहास अतीत का महत्त्व भी होता है। क्षेत्रीय इतिहास अतीत से तात्पर्य भौगोलिक सीमाओं में बँधे एक विशेष क्षेत्र के इतिहास अतीत से है। इतिहास अतीत के क्षेत्र में हम क्षेत्रीय इतिहास अतीत तथा संस्कृति के महत्त्व को नकार नहीं सकते। क्षेत्रीय इतिहास अतीत भी राष्ट्र के विकास में मुख्य भूमिका निभाता है। इनके अतिरिक्त कई अन्य इतिहास अतीत भी विद्यमान हैं जो विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं। जैसे दार्शनिक इतिहास अतीत, धार्मिक इतिहास अतीत, सैन्य इतिहास अतीत तथा औपनिवेशिक इतिहास अतीत आदि। इस प्रकार से इतिहास अतीत का क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत है तथा निरन्तर ही इसका विकास होता जा रहा है।

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