परिवार किसे कहते हैं परिवार कितने प्रकार के होते हैं?

परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह कहा जा सकता है जो पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री एवं भाई-बहन, के रूप में परस्पर अन्त: क्रियाएँ करते हैं अथवा अपनी संस्कृति का निर्माण करते हैं। परिवार में कम से कम तीन प्रकार के सम्बन्ध विद्यमान होते हैं:
  1. पति-पत्नी के सम्बन्ध।
  2. माता-पिता एवं बच्चों के सम्बन्ध।
  3. भाई-बहिनों के सम्बन्ध।
प्रथम प्रकार का सम्बन्ध ‘वैवाहिक सम्बन्ध’ होता है जबकि दूसरे एवं तीसरे प्रकार के सम्बन्ध ‘रक्त सम्बन्ध’ होते है।

डा0डी0एन0 मजूमदार के अनुसार- “परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं, जो मूल तथा रक्त सम्बन्धी सूत्रों से सम्बद्ध रहते हैं तथा स्थान, हित और कृतज्ञता की अन्योन्याश्रितता के आधार पर जाति की जागरूकता रखते हैं।”

परिवार का अर्थ समय-समय के अनुसार बदलता रहा । पश्चिमी समाजशास्त्री परिवार के अन्तर्गत लघु समूह सदस्यता को स्वीकार करतें हैं। इसके अन्तर्गत वे माता-पिता तथा अविवाहित बच्चों को भी सम्मिलित करते हैं। 

भारतीय दृष्टिकोण से परिवार के अन्तर्गत माता-पिता, पुत्र-पुत्री, चाचा-चाची, दादा-दादी, भतीजे-भतीजी, बहू आदि सम्मिलित किये जाते है।

परिवार की परिभाषा

विभिन्न विद्वानों ने परिवार को इस प्रकार परिभाषित किया है- 

डॉ. श्यामाचरण दूबे के अनुसार, ‘‘परिवार में स्त्री एवं पुरुष दोनों को सदस्यता प्राप्त रहती है, उनमें से कम से कम दो विपरीत यौन व्यक्तियों को यौन सम्बन्धों की सामाजिक स्वीकृति रहती है और उनके संसर्ग से उत्पन्न सन्तान मिलकर परिवार का निर्माण करते हैं।’’ 

मरडॉक के अनुसार, ‘‘परिवार एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसके लक्षण सामान्य निवास, आर्थिक, सहयोग और जनन है। जिसमें दो लिंगों के बालिग शामिल हैं। जिनमें कम से कम दो व्यक्तियों में स्वीकृति यौन सम्बन्ध होता है और जिन बालिग व्यक्तियों में यौन सम्बन्ध है, उनके अपने या गोद लिए हुए एक या अधिक बच्चे होते हैं।’’ 

परिवार के कार्य

  1. बच्चों का पालन-पोषण करना। 
  2. परिवार ही बच्चे के सामाजिक एवं मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
  3. परिवार प्रजनन द्वारा मानव जाति की निरन्तरता बनाये रखना। 
  4. सदस्यों का भरण-पोषण करना।  
  5. समाजीकरण, शिक्षा प्रदान करना।  
  6. नियन्त्रण बनाये रखना। 
  7. संस्कृति का हस्तांतरण। 
  8. सदस्यों को सामाजिक, आर्थिक व मानसिक सुरक्षा प्रदान करना।  
  9. समाज में व्यक्ति का पद निर्धारण करना तथा 
  10. विभिन्न प्रकार के राजनीतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, मनोरंजनात्मक आदि कार्य सम्पन्न करता हैं। 

परिवार के प्रकार

परिवार दो प्रकार के होते है:-
  1. संयुक्त परिवार 
  2. एकाकी परिवार 

1. संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार भारतीय सभ्यता एवं सुसंस्कृत समाज को इंगित करता है। इसे भारतीय हिन्दू सामाजिक संगठन का मुख्य आधार माना जा सकता है। संयुक्त परिवार में मुख्य रूप से दादा-दादी, माता-पिता, पुत्र, पौत्र एवं अन्य सम्बन्धी मिलकर रहते हैं तथा परिवार में एक से अधिक पीढ़ी के सदस्य एक साथ रहकर पारस्परिक कर्तव्यों एवं अधिकारों का निर्वाह करते हैं। 

2. एकाकी परिवार

एकाकी परिवार के अंतर्गत विवाहित पति-पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चों को शामिल किया जाता है। वर्तमान में एकाकी परिवारों की प्रवृत्ति में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। आज के आधुनिक युग में एकल परिवार की संख्या बढ़ती जा रही है। एकल परिवार का आकार छोटा होता है। इनके सदस्यों की संख्या 4 से 5 होती है। एकल परिवार को समझने के लिए निम्नलिखित परिभाषा इस प्रकार है।

लोवी के अनुसार - केन्द्रक परिवार में ’’प्रत्येक स्थान पर पति-पत्नी तथा परिपक्व आयु के बच्चे समुदाय के शेष व्यक्तियों से अलग एक इकाई का निर्माण करते है।

आई. पी देसाई के अनुसार - केन्द्रक परिवार वह है ’’जिसके सदस्य अपने अन्य बन्धुओं से सम्पत्ति आयु, अधिकार तथा कर्तव्यों से सम्बंधित न हो जैसे कि बंधुत्व से सम्बंधित सदस्यो से आशा की जाती है।’’

एकल परिवार की विशेषताएं निम्नलिखित है।
  1. छोटा आकार - एकल परिवार का आकार छोटा होता है। इसमें केवल दो पीढ़ी के सदस्य सम्मिलित होते है उसके अधिकार तथा दायित्वों का विभाजन भी स्पष्ट तथा सरल होता है।
  2. स्वतन्त्र सामाजिक इकाई - इस परिवार में सदस्यों को समाजिक स्वतन्त्रता होती है वह आत्म निर्भरता, व्यक्तिवाद आदि भावना होने के कारण उन्हें दूसरे की सहायता की आवश्यकता नहीं होती है।
  3. निश्चित आर्थिक निर्भरता - इस परिवार में बच्चे माता-पिता पर निश्चित अवधि तक निर्भर रहते है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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