प्रजाति का अर्थ, परिभाषा एवं वर्गीकरण

प्रजाति शब्द को अनेक अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है। यूनानियों ने संपूर्ण मानव जाति को ग्रीक अथवा यवनों में वर्गीकृत किया था, परन्तु इनमें से किसी भी समूह को प्रजाति नहीं कहा जा सकता। ‘प्रजाति’ शब्द को कभी-कभी राष्टींयता (nationality) का समानार्थक समझकर प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरणतया, फ्रेंच, चीनी एवं जर्मनी को प्रजाति कहा जाता है। जर्मन एवं फ्रेंच राष्ट्रं हैं। सर्वश्री हक्सले और हैडेन आदि विद्वानों का विचार है कि राष्ट्रं और प्रजाति में कोई अंतर न मानने का ही फल है कि यूरोप में उग्र राष्ट्रंवाद हिंसक प्रजातिवाद के रूप में व्यक्त हुआ। इसलिए राष्ट्रं की प्रजाति के रूप में कल्पना करना उचित न होगा। 

कभी-कभी प्रजाति भाषा एवं धर्म का समानार्थक समझा जाता है। उदाहरणतया, आर्य प्रजाति शब्द के प्रयोग में। परन्तु आर्य नाम की कोई प्रजाति नहीं है, केवल आर्यभाषा है। किसी विशिष्ट भाषा का प्रयोग किसी की प्रजाति को निर्दिष्ट नहीं करता। हब्शी अंग्रेज़ी भाषा बोलते हैं, परन्तु इससे वे अंग्रेज नहीं बन जाते। कभी-कभी प्रजाति शब्द का प्रयोग त्वचा के रंग के आधार पर मानवों के वर्गीरकण को निर्दिष्ट करने हेतु किया जाता है, यथा श्वेत प्रजाति अथवा काली प्रजाति। परन्तु प्रजाति को त्वचा के रंग के साथ नहीं मिलाया जा सकता। कभी-कभी प्रजाति शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग किया जाता है, यथा हम सभी मानव प्राणियों को सम्मिलित करके मानव जाति शब्द का प्रयोग करते हैं।

प्रजाति की परिभाषा

ग्रीन (Green) के अनुसार, प्रजाति एक बड़ा जैविकीय मानव-समूह है जिसमें अनेक विशेष आनुवंशिक लक्षण पाए जाते हैं, जो कुछ सीमा के अन्दर भिन्न होते हैं, भाषा एवं धर्म सांस्कृतिक अवधारणाएं हैं, अतएव उनके आधार पर प्रजाति जो जैविकीय अवधारणा है, कि परिभाषा नहीं की जा सकती। मनुष्यों के मध्य वंशीय भेद रक्त के कारण होते हैं। उन्हें वंशानुगत द्वारा जैविकीय माध्यम से आंख, त्वचा एवं केश के रंग जैसी शारीरिक विशेषताओं के साथ-साथ प्राप्त किया जाता है। ‘प्रजाति’ शब्द से मानवशास्त्रियों का अर्थ व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जिसमें सामान्य वंशानुगत लक्षण पाए जाते हैं तथा जो उन्हें अन्य समूहों से विभेिकृत कर देते हैं। 

बीसंज (Biesanz) के अनुसार, प्रजाति मनुष्यों का विशाल समूह है जो वंशानुगत प्राप्त शारीरिक अन्तरों के कारण अन्य समूहों से भिन्न है। यह मानव जाति के एक उपभाग का बोध् कराती है जिसके सदस्यों में कुछ समान आनुवांशिक शारीरिक विशेषताएं पाई जाति हैं तथा जो उन्हें अन्य उपभागों से अलग कर देती हैं। 

लिंटन (Linton) के अनुसार, प्रजाति में अनेक नस्लें होती हैं जिनमें कुछ शारीरिक विशेषताएं पाई जाती हैं। यह व्यक्तियों का संग्रह है जो जैविकीय आनुवंशिकता द्वारा हस्तांतरणीय कुछ समान प्रेक्षणीय लक्षणों के भागी होते हैं। 

मैकाइवर (MacIver) ने लिखा है, जब ‘प्रजाति’ शब्द का ठीक प्रयोग किया जाता है तो उससे एक जैविक श्रेणी सूचित होती है। उससे जनन की दृष्टि से विभेिकृत मानव-कुल एक-दूसरे के प्रति अपनी विभिन्नताओं के लिए ऋणी, प्रधान मानव-प्ररूप तथा पैतृकता के दूरस्थ पृथकपरण सूचित होते हैं,

पाल ए. एफ. (Paul, A.F.) के अनुसार, फ्प्रजाति मानव प्राणियों का एक विशाल विभाग है जो अन्य से सापेक्षतया कुछ स्पष्ट शारीरिक विशेषताओं द्वारा विभेिकृत है जो विशेषताएं वंशानुगत समझी जाती हैं तथा जो अपेक्षाकृत अनेक पीढ़ियों तक स्थिर रहती हैं, 

प्रोफेंसर डन (Dunn) के अनुसार, प्रजाति यां एक ही जाति मेधवी मानव के अंदर जैविकीय उपसमूह हैं जिसमें संपूर्ण जाति में सामान्य रूप से प्राप्त समान आनुवंशिकता से भिन्न विशेषताएं मिलती हैं। 

ए. एल. वेबर (A. L. Krdzeber) के अनुसार, प्रजाति एक वैध जैविकीय अवधारणा है। यह आनुवंशिकता द्वारा संयुक्त एक समूह, जाति अथवा जननिन उपजाति है। हाबेल (Hdzebel) के अनुसार, प्रजाति विशिष्ट जननिक रंचना के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले शारीरिक लक्षणों का एक विशिष्ट संयोग रखने वाले अन्त:सम्बिन्ध्त मनुष्यों का एक वृहत् समूह है। 

मजूमदार (Mazumdar) के अनुसार, व्यक्तियों के समूह को उस समय प्रजाति कहा जाता है, जब इसके सभी सदस्यों में कुछ समान महत्वपूर्ण शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं जो आनुवंशिकता के माध्यम द्वारा वंशानुगत रूप से हस्तांतरित होते हैं।,

प्रजाति के निर्धारक तत्व

प्रजाति के निर्धरण में शारीरिक लक्षणों पर ध्यान दिया जाता है, परन्तु बहुधा यह निश्चित करना कठिन होता है कि लक्षणों की विभिन्नताएं आनुवंशिकता के कारण हैं, पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण नहीं। महत्वपूर्ण शारीरिक लक्षण जिन पर ध्यान दिया जाता है,
  1. सिर, मुख एवं शरीर पर केशों का प्रकार, रंग एवं विभाजन। केशों के प्रकारों को 1. कोमल सीधे केश जैसे मंगोल एवं चीनी लोगों के, कोमल घुंघराले केश, जैसे भारत पश्चिमी यूरोप, आस्टेंलिया एवं उत्तरी-पूर्वी अनीका के निवासियों के, तथा
  2. घने घुंघराले केश जैसे नीग्रो लोगों के, में श्रेणीबद्ध किया गया है।
  3. शरीर, कद, वक्ष एवं कंधें का व्यास।
  4. सिर की बनावट, विशेषतया कपाल एवं मुख की लम्बाई तथा चौड़ाई, नाक की लम्बाई एवं चौड़ाई। सिरों के तीन भेद किए गए हैं 1. दीर्घ कपाल (dalichocepalic). 2. मध्य कपाल (mesocephalic) एवं 3. पृथु कपाल (brachy-cephalic)।
  5. मुखाकृति की विशेषताएं, यथा नासिका की बनावट, ओष्ठ की बनावट, पलकों की बनावट, कपोल की हड्डियां, ठोड़ी, कान एवं जबड़ों की बनावट। नासिकाओं के तीन भेद किए गए हैं 1. पतली या लम्बी नासिका (leptorhine), 2. मध्य या चपटी नासिका (mesorrhine) एवं 3. चौड़ी नासिका (platyrrhine)। 5. त्वचा एवं आंखों का रंग। त्वचा के रंग के तीन भेद किए गए हैं 1. गोरा रंग (leucoderm), 2. पीला रंग (xanthoderm) एवं 3. काला रंग (melanoderm)।
  6. भुजाओं एवं टांगों की लम्बाई।
  7. रक्त-प्रकार। रक्त चार प्रकार का होता है, O, A , B एवं AB A O प्रकार के रक्त को A, B एवं AB से मिलाया जा सकता है, परन्तु अन्य तीनों को एक-दूसरे के साथ साधरणतया संयुक्त नहीं किया जा सकता।

प्रजातियों का वर्गीकरण

प्रजाति के आधार पर कुछ शारीरिक विशेषताओं के अनुसार लोगों को वर्गीकृत किया गया है। सामाजिक समूहों के सदस्य त्वचा के रंग, सिर की बनावट एवं अन्य प्रेक्षणीय अन्तरों के विषय में भिन्न होते हैं। मानवशास्त्रियों ने अनेक प्रकार के वर्गीकरण प्रस्तुत किए हैं जो एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। लिनीयस (Linnaeous) एवं क्यूवीर (Cuvier) ने मानव-समूह को छ: प्रजातियों में बांटा था। हीकेल (Heakel) ने चौंतीस प्रजातियों को गिनाया है। 

आर्थर कीथ (Arthur Keith) ने चार वर्गो का वर्णन किया है। आधुनिक काल में जी. इलियट स्मिथ ने छ: प्रजातियों में मानव जाति को विभक्त किया है। सरगी (Sergi) ने मानव जाति को यूर-अफ्रीकन (Eurafrican) एवं यूरेशियन (Eurasian) में विभक्त किया है। कुछ मानवशास्त्री हक्सले के वर्गीकरण को अपनाते हैं जिसने पांच प्रजातियों, अर्थात् नीग्रायड (Negroid), आस्टेंलायड (Australoid), मंगोलायड (Mongoloid), जैन्थोवयड (Xanthochroid) एवं मेलोनोवयड (Melanochroid) का उल्लेख किया है। कुछ लेखकों ने चार प्रजातियों, यथा काकेशियन (Causcasian), मंगोल (Mangol), नीग्रो (Negro) तथा आस्टेंलियन (Australian) का उल्लेख किया है, एवं काकेशियन को नार्डिक (Nordic) तथा आस्टेंलियन (Australian) का उल्लेख किया है, एवं काकेशियन को नार्डिक (Nordic), अल्पाइन (Alpine) एवं भूमध्यसागरीय (Medierranean) में उपविभाजित किया है।

वंशावलिक वर्गीकरण (Genealogical classification) इस प्रकार मानवशास्त्रियों में इस विषय पर कोई सहमाति नहीं है कि प्रजातियों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाए। प्रजाति की उचित अवधारणा एवं इसके उचित आधारों के अभाव के कारण प्रजातियों के उतने ही वर्गीकरण हैं, जितने लेखक। 

डैनीकर (Denikar) ‘प्रजाति’ शब्द की वर्तमान जनसंख्या में वास्तविक रूप से मिलने वाले लक्षणों के समूह के अर्थ में व्याख्या करता है। दूसरी और, रिपले (Ripley) ने आदर्श प्रकारों जो किसी समय विशुद्ध रूप में वर्तमान समझे जाते हैं को खोजन का प्रयत्न किया है। अनेक लेखक विभिन्न प्रजातियों की एक-दूसरे के साथ समानताएं खोजने तथा उस आधार पर आनुवंशिक वर्गीकरण के प्रयास को निराशापूर्ण समझते हैं। इस प्रकार फिशर (Fischer), मेटीगका (Matiegka) एवं मारटन (MUurtan) ने वंशावलिक वर्गीकरण के प्रयत्न का परित्याग कर दिया। 

श्री हैडन (Haddon) ने स्पष्ट उल्लिखित किया है कि उसका वर्गीकरण वह वर्गीकरण नहीं हैं, जिस अर्थ में प्राणिशास्त्री एवं वनस्पतिशास्त्री इस शब्द की व्याख्या करते हैं, क्योंकि इस वर्गीकरण में भौगोलिक बातों को सम्मिलित किया गया है। प्रजाति-प्रकार मुख्यत: हमारे मस्तिष्क में वर्तमान होती है। वह अन्य स्थान पर लिखता है कि मानवता का प्रजातियों में स्थिर वर्गीकरण का कार्य असम्भव है।

कोई विशुद्ध प्रजाति नहीं है (NO pure race) भौतिक मानवशास्त्रियों की कठिनाई यह है कि व्यक्तियों में उस प्रजाति, जिससे वे सम्बिन्ध्त हैं, के सभी लक्षण वर्तमान नहीं होते। प्रजाति की अवधारणा पूर्णतया स्पष्ट एवं निश्चित नहीं होते। प्रजाति की अवधारणा पूर्णतया स्पष्ट एवं निश्चित नहीं है तथा न ही यह हो सकती है। मनुष्य सदैव प्रवास करता आया है, जनजातियों एवं राष्टींयताओं ने इस भूमंडल पर प्रयाण एवं प्रतियान किया है, लोगों ने अपरिचितों के साथ यौन सम्बन्ध रखे हैं, जिसने संकरण सार्वभौमिक बन गया है। प्रजातीय लक्षण मानव जाति के विभिन्न समूहों में व्यापक रूप से मिश्रित है। इस विषय पर संदेह हो सकता है कि क्या इतिहास में कभी कोई विशुद्ध प्रजाति रही है। 

डन एवं डाबझैंस्की (Dunn and Dobzhansky) ने लिखा है, सम्पूर्ण लिखित इतिहास में प्रजाति-मिश्रण वर्तमान रहा है। मानव-अवशेषों के अध्ययन से प्राप्त अकाट्य साक्ष्य दर्शाता है कि प्रागैतिहासिक काल में भी मानवता के उद्भव के समय विभिन्न नस्लों का मिश्रण होता था। मानव जाति सदैव संकर रही है और अब भी है। 

प्रोफेंसर फ्लीर (Fleure) के अनुसार, ब्रिटेन में अधिकांश लोग बीच के लोग हैं, न कि पूर्णतया एक अथवा दूसरी प्रकार के। प्रजाति-संकरता के इस तथ्य के कारण वर्गीकरण की किसी योजना पर सहमत होना कठिन है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रजातीय वर्गीकरण सामाजिक संरचना अथवा संस्कृति प्रतिमानों के साथ सहसम्बन्ध नहीं हैं। कपोल की ऊची हड्डियों का लाल भूरी त्वचा से कुछ सम्बन्ध हो सकता है, काले-भूरे बालों का भूरी-काली त्वचा से सम्बन्ध है। परन्तु इनमें से किसी को बुद्धि अथवा जाति संरचना, अथवा गायन योग्यता अथवा ईश्वर में आस्था अथवा बहुपत्नी प्रथा अथवा अन्य किसी सामाजिक विशेषता से सम्बद्ध नहीं किया जा सकता। आनुवंशिक शारीरिक विशेषतायें जिनके आधार पर प्रजातियों का वर्गीकरण किया जाता है, वे सामाजिक व्यवहार के साथ सम्बिन्ध्त नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ वर्गीकरण सहायक होने की अपेक्षा हानिकारक अधिक सिद्ध हुए हैं, क्योंकि उन्होंने व्यक्तियों को यह मान लेते में प्रोत्साहित किया है कि कुछ प्रजातियां अन्य से मानसिकतया श्रेष्ठ हैं तथा शारीरिक लक्षणों एवं बुद्धि में परस्पर सम्बद्ध हैं। परन्तु जैसा हम बाद मे वर्णन करेंगे, ऐसी मान्यता बहुध ठीक नहीं होती। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मानव जाति को शारीरिक लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत करने के कोई प्रयत्न नहीं किए जाने चाहिए।

तीन मुख्य प्रजातियां (Three main races) प्रजातियों का नीग्रो, मंगोलायड एवं काकेशियन में वर्गीकरण सामान्यत: स्वीकृत किया गया है। यद्यपि उनको पृथक करने वाली स्पष्ट रेखाएं नहीं हैं, तथापि प्रत्येक प्रजाति के कुछ विशिष्ट लक्षण हैं जो इसके सभी सदस्यों में पाए जाते हैं। नीग्रो लोगों की त्वचा काली, जबड़े आगे की और, चौड़ी नासिका तथा घुंघराले केश होते हैं। इसमें मलेनेशियन लोग भी सम्मिलित हैं जिनकी त्वचा कुछ हल्की एंव नासिका नीग्रो समूह से कुछ भिन्न होती है। मंगोल प्रजाति की त्वचा का रंग पीला-सा अथवा ताम्र-गेहुंआ-सा होता है। इनके होंठ साधरणतया मोटे और ठोढ़ी गोल होती हैं। आंखें अधखुली होती हैं तथा उनका रंग बादामी या गहरा बादामी होता है। इस समूह में अमेरिकन इंडियन्स सम्मिलित हैं। कुछ मानवशास्त्री श्वेत जाति को पृथक प्रजाति मानते हैं, जबकि अन्य इस मंगोल प्रजाति की उपशाखा ही मानते हैं। काकेशियन प्रजाति में पूर्वोक्त दोनों प्रजातियों के लक्षण धुले-मिले हैं। इन तीन प्रजातीय भागों को उपप्रजातियों में विभक्त किया गया है, यद्यपि इन उपप्रजातियों प्रजाति की उपप्रजातियां कहा जाता है।

भारत में प्रजातियां (Race in India) सर हर्बर्ट रिजले (Sir Herbert Risley) के अनुसार भारत में सात प्रजातियों के प्रकार मिलते हैं
  1. द्रविड़ीय-पूर्व प्रकार (Pre-Dravidian type) जो पहाड़ियों एवं वनों में आदिम जनजातियों में अब भी वर्तमान है, यथा भील।
  2. द्रविड़ियन प्रकार (Dravidian type) जो गंगा घाटी तक दक्षिण प्रांयद्वीप में आवासी हैं।
  3. इंडो-आर्यन प्रकार (Indo-Aryan type) जो काश्मीर, पंजाब एवं राजपूताना में है।
  4. आर्य-द्रविड़ियन प्रकार (Aryo-Dravidian type) जो गंगा घाटी में पाई जाती है।
  5. साइथो-द्रविड़ियन प्रकार (Cytho-Dravidian type) जो सिंध कू पूर्व में स्थित है।
  6. मंगोलायड प्रकार (Mongoloid type) जो आसाम एवं पूर्वी हिमालय की तराइयों में पाई जाती है।
  7. मंगोल-द्रविड़ियन प्रकार (Mongolo-Dravidian type)।

Comments