संपर्क भाषा किसे कहते हैं?

अनुक्रम

संपर्क भाषा शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के लिंग्वा फ्रेका (Lingua Franca) के प्रतिशब्द के रूप में किया जाता है। ‘लिंग्वा फ्रेका’ से तात्पर्य है, लोक बोली अथवा सामान्य बोली। जिस भाषा के माध्यम से एक क्षेत्र के लोग देश के अन्य क्षेत्रों के निवासियों से अथवा एक भाषा के बोलने वाले लोग अन्य भाषा-भाषियों से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, उसे लिंग्वा फ्रेका अथवा संपर्क भाषा कहा जाता है।

भारत विभिन्नताओं का देश है। यहाँ भाषाओं की संख्या सैकड़ों में है। बाइस भाषाएँ तो संविधान की अष्टम सूची में ही उल्लिखित हैं। इस दृष्टि में यहाँ संपर्क भाषा का विशेष महत्त्व है। भारत के इतिहास का अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि यहाँ युगों से ‘मध्य देश’ की भाषा सारे देश की माध्यम भाषा अथवा संपर्क भाषा रही है। संस्कृत, पालि अथवा प्राकृत किसी क्षेत्र-विशेष तक सीमित नहीं थीं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यास्क के समय में संस्कृत उत्तर में कम्बोज (मध्य एशिया के पामेर पर्वत के निकट) से लेकर पूर्व में कलिंग के सूरमस (असम की सूरमस नदी) प्रदेश तक बोली जाती थी (पाणिनी और उसका शास्त्र)। पाणिनी के समय तक भी संस्कृत के प्रसार का यह क्षेत्र लगभग इतना ही था। पाणिनी ने प्राच्य-शरावती के दक्षिण पूर्व कलिंग-बंग तक-उदीच्च-शरावती के पश्चिमोत्तर से गान्धर तक के विस्तृत भूभाग की भाषा को शिष्ट एवं व्याकरण सम्म्त भाषा कहा है। पतंजलि के समय तक यद्यपि शकों, यवनों आदि की विजयों के कारण उत्तर में आर्यों का क्षेत्र सीमित हो चला था पर संस्कृत का क्षेत्र दक्षिण तक जा पहुँचा था।

तमिलभाषी प्रदेशों में 200 ई. से ही संस्कृत राजभाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई थी। शिक्षा, दीक्षा, प्रशासकीय और सांस्कृतिक कार्यों में ही नहीं वरन शिष्ट काव्य और शास्त्रों के प्रणयन में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग होने लगा था। स्पष्ट है कि तमिल प्रदेशों ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था।

हिंदी को संस्कृत की यह परंपरा विरासत के रूप में मिली है। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार, गौतमबुद्ध से लेकर मध्काल तक के सभी शासकों, संतों व समाज-सुधरकों ने जनसंपर्क के लिए जनभाषा का उपयोग किया। हिंदी साहित्य का आरंभ करने वाले सिद्धों, जैनियों और नाथपंथी योगियों ने आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक समस्त भारत में घूम-घूमकर एक ऐसी संपर्क भाषा का विकास किया जिसमें भारत की सभी भाषाओं के बहुप्रचलित शब्दों के लिए प्रवेश द्वार खुला हुआ था। यह समन्वित भाषा थी ‘हिंदी’।

हिंदी अपने उद्भव के समय से ही हिंदू-मुस्लिम, पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाली कड़ी रही है। शंकराचार्य और रामानंद ने संपूर्ण भारत में भ्रमण कर हिंदी के विकास-विस्तार में अपना पूर्ण सहयोग दिया। आदिकाल में हिंदी का अधिकांश साहित्य हिंदी क्षेत्र के बाहर ही लिखा गया है। स्वयंभू के ‘पउम चरिउ’ की रचना महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुई, तो अब्दुर्रहमान ने ‘संदेश रासक’ पंजाब में लिखा। सिद्ध साहित्य पूर्व, नाथ साहित्य पश्चिम में और पर्याप्त भक्ति साहित्य, उड़ीसा, असम, महाराष्ट्र तथा गुजरात में लिखा गया है।

मध्यकाल हिंदी के विकास और अन्य क्षेत्रों से संपर्क का काल रहा है। इस काल में दक्षिण के आचार्यों-वल्लभाचार्य, रामानुज, निंबार्क, रामानंद आदि ने संपर्क-भाषा के महत्त्व को समझा और भरसक इसे संप्रेषण का माध्यम बनाया। दक्षिण में राष्ट्रकूटों और यादवों के राज्य में हिंदी का प्रचार हुआ। विजयनगर दरबार में हिंदी को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। मछलीपट्टठ्ठम के नादेल्ल पुरुषोत्तम कवि ने बत्तीस हिंदी नाटकों की रचना की।

क्षेत्रवार दृष्टि डालें तो मध्यकाल में ब्रजभाषा के सार्वदेशिक प्रसार को देखा जा सकता है। बंगाल, असम, उड़ीसा, केरल, आंध्र सर्वत्र हिंदी साहित्य की रचना हुई है। आंध्र प्रदेश में हिंदी में काव्य-रचना का सर्वप्रथम रूप हमें तंजौर के भोंसल वंशीय मराठा शासक शाहजी महाराजा के यक्ष गानों में मिलता है। चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जिस दक्खिनी भाषा का अस्तित्व पाया जाता है, वह भी खड़ी बोली हिंदी का ही एक रूप है दक्खिनी के प्रारंभिक साहित्यकार ख्वाजा बंदानवाज गेसूदराज (1318-1430 ई. ) की ‘मिराजुल आशिकीन’ को दक्खिनी गद्य ही नहीं, खड़ी बोली गद्य की भी पहली रचना स्वीकार किया जाता है। खड़ी बोली, अरबी-फारसी और दक्षिणी भाषाओं के मिश्रण से इस भाषा ने भी उत्तर और दक्षिण के बीच एक कड़ी का काम किया है।

केरल की भाषा मलयालम शब्दावली की दृष्टि से अन्य द्रविड़ भाषाओं की तुलना में हिंदी के अधिक निकट स्वीकार की जाती है। केरल में तिरुविनांकुर के राजा तिरुनाल श्रीराम वर्मा ने ब्रज भाषा में अनेक पदों की रचना की है- रामचन्द्र प्रभु तुम बिन और कौन खबर ले मोरी। बाज रही जिनकी नगरी मों सदा धरम की भेरी। जाके चरण कमल की रज से तिरिया तन कू फैरो। और न के कछु और भरोसा हमें भरोसा तेरो।

महाराष्ट्र में नाथयोगियों, महानुभाव संप्रदाय, विट्टòल संप्रदाय आदि ने हिंदी के प्रचार में पर्याप्त रुचि ली है। शिवाजी तथा उनके पुत्र शम्भा जी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और संत नामदेव की रचनाओं में हिंदी के भी अनेक पद्य लिखते हैं- जागो हो गोपाल लाल जसुदा बलि आई, उठो तात प्रात भयो, रजनि को तिमिर गयो, हेरत सब ग्वाल बाल मोहना कन्हाई।

गुजरात इस दृष्टि से किसी से कम नहीं है। नरसी मेहता और दयाराम गुजरात के ही कवि हैं जिनकी हिंदी रचनाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। मीरा की जन्म स्थली गुजरात है। अष्टछाप के कवि कृष्णदास जी की भूमि भी गुजरात थी। महेरावण सह ने डिंगल मिश्रित ब्रज में ‘प्रणीण सागर’ महाकाव्य की रचना की। यहाँ अनेक विद्यालयों में हिंदी का अध्यापन होता था तथा अन्य अनेक मौलिक हिंदी ग्रथों की भी रचना हुई।

पंजाब तो हिंदी क्षेत्र का पड़ोसी ही है। हिंदी और पंजाबी क्षेत्र के लोगों का एक-दूसरे के क्षेत्र में जाना सहज रहा है। दोनों भाषाओं ने एक-दूसरे को दूर तक प्रभावित किया है। पंजाब के गुरु गोविन्द सिंह की गिनती हिंदी के मूर्धन्य कवियों होती है। मिर्जा खाँ ने भी ‘तोहफतुल हिन्द’ में ब्रजभाषा के काव्यशास्त्र का प्रतिपादन किया है।

इसी प्रकार भारत के पूर्वी क्षेत्रों बंगाल, उड़ीसा आदि में हिंदी का पर्याप्त प्रचार-प्रसार रहा है। सपाुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार 1575 ई. में बंगाल से पठान राज्य की समाप्ति के बाद व मुगल राज्य के प्रसार के साथ बंगाल में हिंदी को बढ़ावा मिला। उड़ीसा में हिंदी का प्रवेश भक्ति कविता के माध्यम से हुआ। राय रामानंद (15वीं सदी), जगन्नाथदास, वंशी लाल मिश्र, ब्रजनाथ बड़जेना, रामदास, कविचंद्र नरसिंह राय गुरु आदि इस क्षेत्र के प्रमुख हिंदी कवि रहे हैं।

हिंदी के अन्य भाषा भाषी क्षेत्रों से संपर्क की यह कड़ी आधुनिक काल में और मजबूत हुई है। अंग्रेजों के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में हिंदी ने ही सभी क्षेत्रों में जाकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का कार्य किया है। हिंदीतर क्षेत्रों के स्वाधीनता सेनानियों, नेताओं, भाषाविदों, साहित्यकारों सभी ने एकमत से हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करते हुए कभी क्षेत्रों के निवासियों को हिंदी में काम और बात करने को प्रोत्साहित किया। सन् 1826 ई. में हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ बंगाल के कोलकाता से प्रकाशित हुआ। एम.ए. हिंदी का पाठ्यक्रम सबसे पहले कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रारंभ हुआ। हिंदी के अनेक प्रमुख रचनाकार गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के रहे हैं। हिंदुओं के अनेक प्रमुख तीर्थ अहिंदी भाषी क्षेत्रों में ही हैं। द्वारका पुरी, रामेश्वरम और जगन्नाथपुरी में प्रतिदिन हजारों लोग प्रतिदिन हिंदी भाषी क्षेत्रों के तीर्थों में आते हैं और उनके लिए भी हिंदी संपर्क भाषा का काम रकती है। यही स्थिति व्यापार के क्षेत्र की भी है। हिंदी और अहिंदी क्षेत्रों के निवासी एक-दूसरे क्षेत्रों में जाकर हिंदी के माध्यम से ही संपर्क करते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि व्यापार आदि में अंग्रेजी संपर्क का काम करती है अथवा कर सकती है। परंतु यह धरणा सही नहीं है। आज भी देश में अंग्रेजी बोलने वाले लोग काफी मिल जाते हैं, किंतु उनकी संख्या बहुत ही थोड़ी है और हमेशा थोड़ी ही रहेगी। इसका मुख्य कारण यह है कि यह भाषा कठिन और विदेशी है। साधारण मनुष्य इसे ग्रहण नहीं कर सकता। इसलिए यह संभव नहीं कि अंग्रेजी के जरिए भारत एक राष्ट्र बन जाए। अत: भारतीयों को भारत की ही कोई भाषा पसंद करनी होगी।

हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में बॉलीवुड का बहुत बड़ा हाथ रहा है। हिंदी फिल्मों का सबसे अधिक निर्माण महाराष्ट्र की मुम्बई नगरी में होता है। मुम्बई व्यापार का भी गढ़ है। रेडियो और टी.वी. के माध्यम से भी हिंदी का प्रसार हुआ है और सारे भारत के लोग हिंदी को थोड़ा बहुत जानते-समझते हैं। दिल्ली में ही लगभग पूरे भारत के लोग एक साथ रहते हैं और हिंदी के माध्यम से अपने सारे कार्य निपटाते हैं। गुजरात का तो हिन्दी प्रचार में विशेष योगदान रहा है।

यदि आँकड़ों पर दृष्टि डालें तो भी यही स्पष्ट होता है कि हिंदी ही भारत की एकमात्र संपर्क भाषा है। लगभग संपूणर्क भारतवर्ष में हिंदी को जानने और बोलने वाले बड़ी संख्या में हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिंदी जानने वालों की संख्या इस प्रकार है-जम्मू एवं कश्मीर 90%, गुजरात, महाराष्ट्र पंजाब, चंडीगढ़ 80%, गोवा 70%, दीव व दमण 65%, दादरा एवं नगर हवेली, प. बंगाल, सिक्किम, उड़ीसा 60%, असम 50%, कर्नाटक 45%, आंध्र प्रदेश 40%, केरल, मिजोरम 35%, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय 30%, नगालैंड, त्रिपुरा, लक्षद्वीप 20%, पांडिचेरी, तमिलनाडु 20%। हिंदी भाषी क्षेत्रों में बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा अंडमान-निकोबार आदि में तो 100%, लोग हिंदी जानते हैं। इस प्रकार संपूर्ण भारत में हिंदी जानने वालों की संख्या 73.31% प्रतिशत है। हिंदी के संपर्क भाषा होने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।

संपर्क भाषा राष्ट्रभाषा से एक अर्थ में भिन्न होती है। राष्ट्रभाषा में भाषा के मानक रूप को महत्त्व दिया जाता है, पंरतु संपर्क भाषा दो भिन्न भाषा-भाषियों के मध्य सेतु का काम करती है। इसका एकमात्र उद्देश्य अपनी बात को दूसरे तक संप्रेषित करना होता है। अत: असमें अनगढ़ता, व्याकरण-दोष और अन्य भाषाओं का मिश्रण स्वाभाविक है। संपर्क भाषा हिंदी भी इससे अछूती नहीं है। इसमें भारत की अनेक भाषाओं के शब्दों का समावेश हुआ हैं हिंदी ने बंगाली, पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम आदि भाषाओं के अनेकानेक शब्दों को ग्रहण किया है। यह हिंदी की सर्वदेशिकता और संपर्क भाषा के रूप में उसकी क्षमता का परिचायक हैं।

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