साम्प्रदायिकता क्या है ?

अनुक्रम
साम्प्रदायिक शब्द की उत्पत्ति समूह अथवा समुदाय से हुई है, जिसका अर्थ होता है व्यक्तियों का ऐसा समूह जो अपने समुदाय को विशेषरूप से महत्व देता है या अपने धर्म या नस्लीय समूह को शेष समाज से अलग हटकर पहचान देता है। एक सम्प्रदाय के दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध संयुक्त विरोध को साम्प्रदायिकता कहते हैं। 

‘साम्प्रदायिकता’ शब्द की उत्पत्ति सम्प्रदाय से है। कोई एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी, उसी सिद्धान्त को अनुगमन करने वाले, अन्य सम्प्रदाय के प्रति द्वेष, रखने वाले साम्प्रदायिक कहलाते हैं। इन अनुयायियों के क्रियाओं से ‘साम्प्रदायिकता’ जैसा शब्द दूषित हो जाता है। समाज में उसको सभी कलंकित समझने लगते हैं। ‘साम्प्रदायिकता’ ‘साम्प्रदायिक’ से बनता है।

कोई एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी, उसी सिद्धान्त का अनुगमन करने वाले, अन्य सम्प्रदाय के प्रति द्वेष रखने वाले, साम्प्रदायिक कहलाते हैं। इन अनुयायियों के क्रियाओं से ‘साम्प्रदायिकता’ जैसा शब्द दूषित हो जाता है। समाज में उसको सभी कलंकित समझते हैं। ‘साम्प्रदायिकता’ ‘साम्प्रदायिक’ से बनता है। विश्व सूक्ति कोश-खण्ड-पाँच में भी ‘साम्प्रदायिकता’ के दूषित तत्व को पाया जा सकता है।

एक सम्प्रदाय का अनुयायी अपने सम्प्रदाय को ही श्रेष्ठ और दूसरे सम्प्रदाय को हीन मानता है। किसी भी सम्प्रदाय के अनुयायी होने से वे अपने सम्प्रदाय के प्रति साम्प्रदायिक होते हैं। अन्य सम्प्रदायों को दूषित करते हैं। अपनी सम्प्रदाय की प्रशंसा करते हैं। अपने ही हित के लिए सोचते हैं। जब अपनी ही सम्प्रदाय के ही हित के लिए सोचते हैं, तो कट्टर हो कर ही सोचते हैं। अत: साम्प्रदायिक बनकर साम्प्रदायिकता को फैलाते हैं

साम्प्रदायिकता की परिभाषा

ऐरनकर (1999.26) तर्क देते हैं कि समुदाय और साम्प्रदायिकता दो अलग.अलग अवधारणायें है। समुदाय एक जैसी भावनाओं, चारित्रिक विशेषताओं, सहमतियों तथा संस्कृतियों वाले लोगों के समूह को कहा जाता है। 

दीक्षित का तर्क है कि साम्प्रदायिकता एक राजनैतिक सिद्धांत है, जो समाज में मौजूद धार्मिक एवं सांस्कृतिक मतभेदों को बढ़ावा देकर अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति करता है। जब धार्मिक तथा सांस्कृतिक असहमतियों के आधार पर कोई समुदाय जानबूझकर राजनैतिक मांगें उठाता है, तब साम्प्रदायिक चेतना उत्पन्न होती है, जो अंतत: साम्प्रदायिकता में बदल जाती है।

सम्प्रदाय एवं साम्प्रदायिकता में अंतर

सम्प्रदाय किसी गुरु परम्परा का देन है। सम्प्रदाय किसी महापुरुष के द्वारा प्रस्थापित किया जाता है। सम्प्रदाय अनेक होते हैं। सम्प्रदाय अपने अपने देश, काल परिस्थिति के अनुसार जन्म लेते हैं। हर सम्प्रदाय का अपना विधि-विधान रहता है। हर सम्प्रदाय के अनुयायी होते हैं। जिसे उसके अनुयायी अपने सम्प्रदाय के विधि-विधान का अनुगमन करते हुए, उसकी रक्षा के लिए सोचते हैं, उसकी रक्षा करने में अपने आप की कुर्बानी देने के लिए तत्पर रहते हैं, वे ही साम्प्रदायिक कहलाते हैं। साम्प्रदायिक से साम्प्रदायिकता का उत्पन्न होता है। अत: सम्प्रदाय से साम्प्रदायिक, साम्प्रदायिक से साम्प्रदायिकता का जन्म होता है।

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