विद्यालय निरीक्षण का अर्थ, उद्देश्य, प्रकार एवं विधियाँ

अनुक्रम

निरीक्षण का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का अवलोकन होता है। शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक कार्यो के अवलोकन को निरीक्षण कहा जा सकता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो आधुनिक पर्यवेक्षण ही निरीक्षण का परिष्छत स्वरूप है। प्रारंभिक दर्शन के अनुरूप निरीक्षण का मुख्य उद्धेश्य विद्यालयों में उपस्थित विद्यार्थी, शिक्षक और प्रशासकों का विकास है। इसमें विद्यालय और समाज का विकास भी सम्मिलित है।

विद्यालय निरीक्षण का अर्थ

वेब्स्टर (Webster) अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार निरीक्षण का अर्थ विद्यालय के कार्यो का निरीक्षण विद्यालय-निरीक्षण कहा जा सकता है। डॉ. मुखर्जी के अनुसार-वरिष्ठ अध्यापक अथवा प्रधानाध्यापक द्वारा किये गये मूल्यांकन को निरीक्षण कहा जाता है।

वास्तव में निरीक्षण की भूमिका देश, समय और परिस्थिति के अनुसार बदलती रही है। उपरोक्त परिभाषाओं में निरीक्षण को उत्प्रेरक विकास, शिक्षकों की सहायक प्रक्रिया, शिक्षण सुधार तथा विकास, शिक्षण में सहायता, शिक्षकों की शक्ति को विकसित करना, शिक्षकों की समस्याओं को हल करना, सीखने की स्थितियों का मूल्यांकन आदि के रूप तथा अर्थ में ही शिक्षा निरीक्षण को मान्य किया गया है। यूनेस्को रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा निरीक्षण का उद्धेश्य शिक्षण में उन्नति करना है। निरीक्षण ही आधर है जिस पर शिक्षण में उन्नति के सभी कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए।

विद्यालय निरीक्षण का इतिहास

भारत में निरीक्षण के इतिहास की शुरूआत ‘बुड के घोषणा-पत्र‘ 1854 की संस्तुति के बाद होती है, जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में एक ‘डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इन्स्टंक्शन’ की नियुक्ति हुई थी। पुन: इन डाइरेक्टरों के लिए शिक्षा की स्थिति का सही चित्र प्रस्तुत करने के लिए योग्य ‘इन्स्पेक्टरों की आवश्यकता सुझायी गई। इन्स्पेक्टर का कार्य सामाजिक रूप से स्कूली और कॉलेजों की स्थिति का विवरण सरकार को भेजना होता था। इनका कार्य परीक्षा कराना व उनमें सहयोग देना भी था। अत: प्रारंभ से इन्स्पेक्टर का कार्य एक प्रकार से नियमों को लागू करने तथा त्रुटियों का निर्धरण करने के लिए ही हुआ।

1858 में स्कूलों को डाइरेक्टर की ओर से अनुदान की शर्ते प्रस्तुत की गई, जिसके अनुसार इन्स्पेक्टर को स्कूलों का निरीक्षण एवं अनुदान राशि की मात्रा निश्चित करने का भी अधिकार दिया गया। इस प्रकार इन्स्पेक्टर शिक्षा प्रशासन की एक उच्च अधिकृति के रूप में सामने आया। 1882 में ‘हन्टर कमीशन’ की सिपफारिश पर इन्स्पेक्टर का कार्य शिक्षण की प्रभावहीनता को इस प्रकार देखता था कि जो अनुदान सरकार की ओर से दिया जा रहा है, उसका उपयोग किसी सीमा तक समुचित रूप से हो रहा है? बाद में इन्स्पेक्टरों को अनुशासन सम्बन्धी अधिकार भी दिये गये।

1908 में बंगाल के स्कूलों में राष्टींय आन्दोलनों को हतोत्साहित करने के लिए और भी अधिकार दिये गये। 1928 में साइमन कमीशन की स्थापना हुई। उसने तत्कालीन विद्यालय निरीक्षण की कमियों की ओर ध्यान दिया। माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952&53) ने भी निरीक्षण की कमियों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनके आधर पर यह कहा जा सकता है कि जो समय इन्स्पेक्टर, इन्स्पेक्शन पर बिताते हैं, वह कम है, बल्कि अधिक समय वे प्रशासनिक कार्यो को देखने में लगाते हैं। आयोग ने कुछ कमियों की ओर ध्यान आछष्ट किया-

  1. निरीक्षण शाला में तानाशाह, सर्वेसर्वा बनकर आते हैं, जो केवल दोष ही ढूंढते हैं।
  2. अधिकतर निरीक्षक औपचारिकता निभाने के लिए आते हैं। वे न तो शैक्षिक विकास पर और न ही स्कूल के विकास पर जोर देते हैं।
  3. निरीक्षक का दृष्टिकोण रचनात्मक न होकर नकारात्मक होता है।
  4. स्कूलों की संख्या के अनुपात में निरीक्षकों की संख्या कम होती है, अत: वे पूरे स्कूलों को नियमित रूप से नहीं देख सकते।

‘फोर्ड पफाउण्डेशन’ के तत्वावधन में एक अध्ययन दल ने भारतीय माध्यमिक विद्यालयों में प्रयुक्त निरीक्षण प्रक्रिया का अध्ययन किया तथा सुधार हेतु निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत किये।

  1. इन्स्पेक्टर को मानवीय सम्बन्धें को ध्यान में रखते हुए अपना कार्य पूरा करना चाहिए और अधिकारी की भावना दूर होनी चाहिए।
  2. इन्स्पेक्टर का कार्य बजाय निर्णय के, सुझाव देना है।
  3. इन्स्पेक्टरों के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है।
  4. निरीक्षक को कई विधियों का ज्ञान होना चाहिए तथा उसको कई भाषाए आनी चाहिए।

विद्यालय निरीक्षण के उद्देश्य

विद्यालय निरीक्षण के प्रमुख उद्धेश्य हो सकते हैं-

  1. निरीक्षण का प्रयोजन शिक्षकों के शिक्षण को प्रभावी बनाना है। निरीक्षण के माध्यम से शिक्षकों की कमियों को दूर करते हुए गुणों का विकास करके अच्छे शिक्षक तैयार किये जा सकते हैं।
  2. अध्यापकों को मार्गदर्शन देने का कार्य भी निरीक्षक का है। कोई भी मार्गदर्शक अब तक मार्गदर्शन नहीं दे सकता, जब तक वह अपने अधीन व्यक्ति की क्षमताओं को सूक्ष्मता से नहीं पहचानता। इन क्षमताओं को निरीक्षण से ही समझा जा सकता है। इस आधर पर ही सुधार के लिए सुझाव दिए जा सकते हैं।
  3. निरीक्षण द्वारा उनके सीखने की स्थितियों का मूल्यांकन करना होता है। इसमें वह ज्ञात हो जाता है कि विद्यार्थी किन परिस्थितियों में अधिक सीखते हैं। इस आधार पर अधिकाध्कि अधिगम की दृष्टि से पाठन विधियों में भी सुधार किया जा सकता है।
  4. निरीक्षण का कार्य शिक्षकों के विद्यार्थियों की समस्याओं का निदान करने तथा उनकी योग्यता का मूल्यांकन करने में सहायता देना है।
  5. निरीक्षण का कार्य शिक्षकों को पाठ्यक््रम निर्माण करने का ज्ञान प्रदान करना तथा पाठ्यक्रम निर्माण में मुख्य उद्धेश्य से अवगत कराना है।

निरीक्षण से शिक्षकों को अधिक अध्ययन की प्रेरणा मिलती है क्योंकि निरीक्षक निरन्तर शिक्षक के विकास के लिए प्रयत्नशील रहता है। वह शिक्षक के चहुंमुखी विकास के लिए यत्नशील रहता है अत: शिक्षकों का न केवल व्यावसायिक वरन् अकादमिक विकास भी निरीक्षण द्वारा होता है।

विद्यालय निरीक्षण के प्रकार

निरीक्षण के तीन प्रकार मिलते हैं-

  1. संशोधनात्मक (Corrective)
  2. निरोधत्मक (Preventive)
  3. रचनात्मक (Constructive)

संशोधनात्मक

इस उपागम में निरीक्षण के अन्तर्गत विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों, प्रवृतियों, कार्यालय की गतिवििधायों का अवलोकन करता है और प्रभावी निष्पनि के लिए आवश्यक सुधार के लिए संशोधन प्रस्तुत करता है। अवलोकन विश्वसनीय हों, इसके लिए आवश्यक रिकार्ड एकत्रित करता है तभी सुझाव विश्वसनीय हो सकते हैं। इस प्रकार के निरीक्षण में कमियों तथा संस्था के अच्छे कार्यो के अवलोकन को नजरंदाज कर दिया जाता है। अत: इस प्रकार के निरीक्षण की आलोचना होती है।

निरोधत्मक निरीक्षण

निरोधत्मक निरीक्षण में निरीक्षणकर्ता निरीक्षण के बाद समस्याओं पर अपनी राय शिक्षकों, वरिष्ठ शिक्षकों तथा सम्बिन्ध्तों को दे देते हैं ताकि वर्तमान संस्थितियों में सुधार हो सके। परन्तु इस निरीक्षण में निरीक्षक को पर्याप्त अनुभव होना चाहिए। भावी सुधार के परिणामों से परिचित होना चाहिए।

रचनात्मक निरीक्षण

यह जनतन्त्रीय मूल्यों पर आधरित होता है। निरीक्षक एक सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करता है। जिसका निरीक्षण किया जाता है वह जानता है कि उसके निरीक्षण का उद्धेश्य रचनात्मक है। शिक्षण व कार्यदक्षता में सुधार लाना है। अत: इससे परस्पर बढ़ता है। निरीक्षण के बाद सबल पक्षों की प्रशंसा से शिक्षकों का आत्मविश्वास बढ़ता है।

विद्यालय निरीक्षण की विधियाँ

निरीक्षण सक्षम अधिकारी द्वारा होता है। यह निरीक्षण दो प्रकार का हो सकता है-(1) आन्तरिक (2) बां। आन्तरिक निरीक्षण किसी विद्यालय संगठन की प्रबन्ध्कारिणी द्वारा, प्राचार्य द्वारा हो सकता है। परन्तु इस प्रकार के निरीक्षण को आन्तरिक होने से अधिक महत्व नहीं दिया जाता। बां निरीक्षण को ही निरीक्षण की संज्ञा दी जाती है। यह निरीक्षण निदेशक, उपनिदेशक, शिक्षा, जिला शिक्षा अधिकारी, उप जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा होता है। राष्टींय शिक्षा आयोग ने जिला स्तर पर जिला शिक्षा अधिकारी प्रशासन व दूसरा निरीक्षण के लिए नियुक्त करने की अनुशंषा की है। कभी-कभी विद्यालय र्कमोन्नति के लिए सरकार द्वारा गठित टीम द्वारा भी निरीक्षण हो सकता है। कभी-कभी शिक्षा मंत्री भी निरीक्षण करते हैं। ये निरीक्षण दो प्रकार के होते हैं-

1. पूर्व सूचना के आधार पर – इसमें विद्यालय को निरीक्षण के लिए पूर्व में सूचित किया जाता है तथा किन-किन तथ्यों का निरीक्षण किया जाना है, इसकी पूर्व सूचना दी जाती है। इस प्रकार के निरीक्षण में प्रामयापक शिक्षक तथा कार्यालय सभा निरीक्षण के लिए तैयार होते हैं। यों उपनिदेशक जिला शिक्षा अधिकारी उप जिला शिक्षा अधिकारी के लिए माह में 15 दिन विद्यालय निरीक्षण के निर्देश हैं। इन निरीक्षणों के बाद रिपोर्ट (सबल और निर्बल पक्षों की) विद्यालय को भेज दी जाती है, ताकि आवश्यक सुधार हो।

2. बिना पूर्व सूचना के आकस्मिक निरीक्षण – इसका उद्धेश्य वास्तविक विद्यालय की चलती कार्यरत स्थिति को देखना है। क्या शिक्षक समय से आते हैं? गृह कार्य देते हैं? गृहकार्य का निरीक्षण करते हैं? शिक्षण पूर्व तैयारी से होता है? डायरी भरी जाती है या नहीं? प्राधयापक द्वारा नियमित निरीक्षण होता है या नहीं? वित्तीय रिकार्ड का संधरण उचित होता है अथवा नहीं? विद्यार्थी सम्बन्धी कार्यर्कमों की निष्पति किस प्रकार की हैं? इस प्रकार के निरीक्षण से विद्यालय की सही स्थिति का आकलन होता है। वस्तुत: निरीक्षण दोनों प्रकार के होने चाहिए, पूर्व सूचना आधरित एवं बिना सूचना आधारित।

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