मानवाधिकार का अर्थ एवं परिभाषा

अनुक्रम
‘‘मानव अधिकार मनुष्य को प्राप्त वे न्यूनतम अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही मानवोचित गुण होने के कारण प्राप्त होते हैं। ये मानव अधिकार, मानव की गरिमा बनाये रखने के लिए अति आवश्यक हैं। इनमें से कुछ अधिकार शारीरिक, मानसिक व स्वास्थ्य के लिए प्राप्त हैं।’’ मानव अधिकारों की संकल्पना उतनी ही पुरानी है, जितनी प्राकृतिक विधि और प्राचीन सिद्धांत। मानव अधिकारों का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय चार्टरों और अभिसमयों से हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद व्यक्तियों की स्थितियों में बहुआयामी परिवर्तन आया। यह परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय विधि व न्याय के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था। व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय विधि से उत्पन्न अधिकारों और कर्त्तव्यों के परिणामत: विधि ने एक विस्तृत व विषय का रूप धारण कर लिया। वस्तुत: अंतरराष्ट्रीय विधि व्यक्तियों की स्थिति और कार्य-कलाप के विनियमन से संबंधित है। इस परिप्रेक्ष्य प्राकृतिक अधिकारों की विवेचना व निष्कर्ष अत्यंत उल्लेखनीय है।

हमेशा राजनैतिक समाज में सभ्य जीवन जीने के लिए शक्तियों के दुरुपयोग और अत्याचार ने मनुष्यों को मानव अधिकार की खोज के लिए प्रेरित किया। साथ ही यह हमें अध्यात्मवाद एवं दैवी विधि में मौजूद भौतिक शक्तियों की तरफ भी प्रोत्साहित किया है। प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में सम्राट द्वारा मानव पर की जाने वाली ज़्यादतियों और तानाशाही को रोकने या परोपकारी तानाशाहों द्वारा बनाए गए कानून से असहमति ने प्राकृतिक विधि की तरफ आकर्षण पैदा किया।

इसमें ऐसे तर्क, न्याय, अपरिवर्तनीयता और सार्वभौमिकता का समावेश किया गया, जिसमें मानव विधियों का अभाव था। ‘‘बहुत से विद्वान नैसर्गिक विधि के इस आदर्श को सोफोकिल्स के समय से बताते हैं, जो क्राइस्ट के समय से चार सौ वर्श पवूर् का है। ‘‘इंग्लैंड में 17वीं शताब्दी में, व्लैंस्टन ने अपनी पुस्तक ‘कमेण्ट्रीज ऑन लॉज ऑफ इंग्लैड’ में लिखा है कि प्राकृतिक विधि एक ऐसी विधि है, जो मानव निर्मित विधि से वरिश्ठ है।’’ जब एक बार मानव को प्राधिकारियों द्वारा अधिकार प्राप्त होते हैं, तो निश्चत तौर पर यह मान लिया जाता है कि मानव को समाज से पूर्ववत्त्र्ाी कतिपय अधिकार प्राप्त हैं, जो मानव प्राधिकारियों द्वारा सृजित अधिकारों से श्रेष्ठ हैं। और, इन अधिकारों को सार्वभौमिक रूप से सभी मनुष्यों पर प्रत्येक समय में लागू किया जा सकता है। इस बारे में यह भी कहा जाता है कि मानव अधिकार, राजनीतिक समाज के जन्म से पहले ही अस्तित्व में थे। अत: इन अधिकारों को राज्य द्वारा छीना या वापस नहीं लिया जा सकता।

मानवाधिकार का अर्थ एवं परिभाषा

मानव बुद्धिमान व विवकेपूर्ण प्राणी है। इसको कुछ ऐसे मूलभूत तथा आहरणीय अधिकार प्राप्त हैं, जिसे सामान्य रूप में ‘मानव अधिकार’ कहा जाता है। ये अधिकार मनुष्य को जन्म से लेकर मृत्यु तक उनमें विहित रहते हैं। मानवाधिकारों का अर्थ ऐसे अधिकारों से भी है जो उसे जन्मजात प्राप्त होते हैं। ‘‘ये मानव जाति के लिए प्रदत्त अधिकार हैं, जिनकी मान-मर्यादा में कोई भेद-भाव नहीं होता और अपनी प्रकृति में समानता के सिद्धांत पर आधारित हैं।’’  इस प्रकार मानव अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए समान होते हैं, चाहे उनका मूल वंष, धर्म, लिंग तथा राष्ट्रीयता अलग-अलग ही क्यों न हो। ये अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक हैं। क्योंकि, मानव अधिकार मानव की गरिमा एवं स्वतंत्रता के साथ-साथ उसके शारीरिक, नैतिक, सामाजिक और भौतिक कल्याण में भी सहायक सिद्ध होते हैं। मानव अधिकार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये व्यक्ति के भौतिक तथा नैतिक विकास के लिए सही स्थिति प्रदान करने का काम करते हैं। इन अधिकारों के बिना सामान्यत: कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्णरूप से विकास करने में सक्षम नहीं हो सकता। मानव जाति के लिए मानवाधिकार का होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘मानव अधिकार को कभी-कभी मूल अधिकार, आधारभूत अधिकार, अन्तर्निहित अधिकार, प्राकृतिक अधिकार और जन्म अधिकार भी कहा जाता है।’’

मानव अधिकार आज के समय में महत्त्वपूर्ण विषय माना जाता है। मानव अधिकार को विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, विधिक प्रणाली तथा आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक स्थितियों में भिन्नता के कारण परिभाषित करना कठिन है। वास्तव में मानव अधिकार एक सरल व सामान्य, परंतु व्यापक शब्द है। इसके अन्तर्गत सिविल और राजनैतिक अधिकार तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को भी शामिल किया गया है। चूंकि, मानव अधिकार का विचार मानवीय गरिमा के विचार से संबंधित है, अत: उन सभी अधिकारों को मानव अधिकार कहा जा सकता है, जो मानवीय गरिमा को बनाये रखने के लिये आवश्यक हैं।

सन् 1993 (वियना) में आयोजित विश्व मानव अधिकार सम्मेलन में यह घोषणा की गई कि, सभी मानव अधिकार व्यक्ति की गरिमा और योग्यता से संबंधित होते हैं। मानव अधिकार व्यक्ति तथा मूल स्वतंत्रताओं का केंद्रीय विषय है।

डी0 डी0 बसु के अनुसार-’’मानव अधिकार को उन न्यूनतम अधिकारों के रूप में परिभाषित करते हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी अन्य विचारण के, मानव परिवार का सदस्य होने के फलस्वरूप राज्य या अन्य लोक प्राधिकारी के विरूद्ध धारण करना चाहिये।’’

हैराल्ड लास्की के अनुसार-’’अधिकार मानव जीवन की ऐसी परिस्थितियां हैं, जिनके बिना सामान्यतया कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता।’’

डेविड सेल्वी के अनुसार-’’विश्व में प्रत्येक व्यक्ति मानव होने के नाते मानवाधिकारों का उपयोग करता है। मानवाधिकार कमाए नहीं जाते, और न ही किसी के द्वारा किसी को दिए जा सकते हैं, और न ही किसी समझौते द्वारा इनका निर्माण किया जा सकता है। ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित होते हैं।’’

होलैण्ड के मतानुसार-’’अन्य व्यक्ति के कार्यों को अपनी शक्ति के स्थान पर समाज के बल द्वारा प्रभावित करने की व्यक्तिगत क्षमता को अधिकार कहते हैं।’’

ए.ए. सईद के अनुसार-’’मानव अधिकार व्यक्ति की गरिमा से संबंधित हैं। व्यक्तिगत पहचान का स्तर आत्म-सम्मान को संरक्षित करता है, और मानवीय समुदाय को बढ़ावा देता है।’’ इस परिप्रेक्ष्य में जान जैक्स़स़ रूसो ने 200 वर्श पहले कहा था कि ‘‘मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है, पर हर जगह वह जंजीरों से जकड़ा हुआ है।’’

स्कॉट डेविडसन के अनुसार-’’मानवाधिकार की अवधारणा राज्य द्वारा व्यक्ति की सुरक्षा के लिए किए गए कार्य से निकटता से जुड़ी हुई है। यह राज्य द्वारा निर्मित उन सामाजिक परिस्थितियों और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की ओर भी संकेत करती है, जिनके अंतर्गत व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके।’’

मैकने के अनुसार-’’अधिकार मानव के सामाजिक हित की वे लाभदायक परिस्थितियां हैं, जो उसके सच्चे विकास के लिए आवश्यक हैं।’’

एम. फ्रीडमैन के अनुसार-’’मानवाधिकार एक वैचारिक युक्ति है, जिसकी अभिव्यक्ति भाषागत रूपरेखा में होती है। यह निश्चित मानवीय या सामाजिक विषेशताओं को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति के पर्याप्त कार्यों के लिए आवश्यकता के रूप में महत्त्व प्रदान करती है। साथ ही इन विषेशताओं की रक्षा के संक्षिप्त योजना बनाने के लिए उसे प्रोत्साहित करके इस प्रकार के संरक्षण की पुश्टि के विचार विमर्ष के कार्यों की अपील करती है।’’

भतू पूर्व , मानवाधिकार न्यायविद् वैकंकेट चलैया के अनुसार-’’मानवाधिकार हमारी प्रकृति में निहित हैं, और इनके बिना हम व्यक्ति के रूप में जीवन व्यतीत नहीं कर सकते।’’ भारत के मानवाधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993 के अनुसार-’’मानवाधिकारों से तात्पर्य संविधान द्वारा प्रत्याभूत अथवा अन्तरराष्ट्रीय प्रतिज्ञा-पत्र में सम्मिलित एवं भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तित ऐसे अधिकारों से है, जो किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता व उसकी वैयक्तिक गरिमा से संबंध रखते हों और जिनकी संविधान द्वारा गारंटी दी गई हो। यह वह अधिकार भी है, जिन्हें अतं रराष्ट्रीय संविदाओं में शामिल किया गया है तथा जिसे भारत के न्यायालयों द्वारा लागू किया जा सका है।’’

मानव अधिकार आवश्यक रूप से मानवीय आवश्यकताओं पर आधारित है। इन मानवीय आवश्यकताओं में कुछ शारीरिक जीवन तथा स्वास्थ्य पर आधारित हैं, और कुछ मानसिक जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए अत्यतं आवश्यक हैं। इस प्रकार मानव अधिकार के अनुभव से इनकी परिगणना की जा सकती है। मानव अधिकार में इस बात को निर्दिश्ट किया गया है कि कतिपय कार्य व्यक्तियों की इच्छा के विरूद्ध नहीं किया जा सकता या नहीं किया जाना चाहिए। इस आवधारणा का तात्पर्य मानव को मानवता के परिणामस्वरूप अन्यायोचित और अपमानजनक व्यवहार से संरक्षण प्रदान करना है। अन्य शब्दों में, ‘‘मानव अधिकार मनमाने ढंग से पूर्ण शक्ति के प्रवर्त्तन के विरूद्ध है।’’ दूसरे शब्दों में कहा जाय तो ‘‘मानवाधिकार ऐसे अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को समाज से प्राप्त होने चाहिए। यदि समाज इन अधिकारों का सही प्रकार से प्रयोग करता है, तो किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून या संगठन की सहायता और संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में मानव अधिकार वह अधिकार है, जिनका प्रयोग व्यक्ति को अपने समाज में करना चाहिए तथा राज्य के कानून और संस्थाओं के अंतर्गत इनका कार्यान्वयन किया जाना चाहिए ‘‘

सामाजिक परिदृष्य में व्यक्तियों के व्यक्तित्व विकास के लिए मानव अधिकार अति आवश्यक हैं, जिसे सभी व्यक्तियों को प्रदान किया जाना चाहिए। कहना गलत न होगा कि मानव अधिकार संरक्षण की आवश्यकता सरकारों द्वारा व्यक्तियों के क्रिया-कलापों पर नियंत्रण में वृद्धि के कारण प्रकट हुई है। साथ ही इसे किसी राज्य सरकार द्वारा छीना नहीं जा सकता। व्यक्तियों की ओर से मानव अधिकारों के संबंधित संचेतना को भी राज्यों द्वारा संरक्षण प्रदान किया जाना आवश्यक है। इससे यह सहज ही महसूस होता है कि राष्ट्रीय विधि तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के नियम, मानवता के हित में उनका संरक्षण करने के लिए महत्त्वपूर्ण व उपयोगी होना चाहिए।

मानवीय गरिमा एवं उसके सम्मान को मान्यता देना अंतरराष्ट्रीय विधि की महान उपलब्धि में शामिल है। अस्तु, व्यक्तियों में मानवीय गरिमा को बनाये रखने के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्राप्त हैं। परंतु, किसी राज्य को व्यक्तियों के संरक्षक के रूप में पूर्णत: नहीं सौपा जा सकता। यह अवधारणा विभिन्न क्षेत्रों के लिए बनाये गये अभिसमयों के रूप में स्पष्ट होती है। ‘‘इन्हें लगभग 63 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संगठन के तत्वाधान में अंगीकृत किया गया है।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ और विशिष्ट अभिकरणों द्वारा इस संदर्भ में यह घोषणा की गई है कि उसके सदस्य मानव अधिकार तथा मूलभूत स्वतंत्रताओं के सार्वभौमिक सम्मान में अभिवृद्धि और अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने के लिए योजनायें बनायी हैं। और, इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपने-अपने संविधानों में मानव अधिकार से संबंधित प्रावधानों को शामिल करने के साथ ही व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए उपाय भी किये गये हैं। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैर-सरकारी संगठन भी मानव अधिकार के उल्लघंन के मामलों को प्रकाश में लाने का प्रयास करते हैं, और उनकी पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उपाय तथा उचित कानून की व्यवस्था भी करते हैं।

मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा 1948

‘‘10 दिसम्बर, 1948 को स्वीकार की गई सार्वभौमिक घोषणा के अंतर्गत प्रस्तावना के अलावा कुल 30 अनुच्छेद हैं। यह सार्वभौमिक घोषणा सभी लोगों और सभी राष्ट्रों के लिए मानव अधिकारों के स्तर को बनाये रखने के लिए एक समान मानक के रूप में माना जाता है।’’ मानव अधिकारों के क्षेत्र में सार्वभौमिक घोषणा विश्व शांति रूपी मंदिर के विषाल प्रवेष द्वार के समान है। चूंकि, मानव परिवार के सभी सदस्यों की जन्मजात गौरव और सम्मान तथा अहस्तान्तरणीय अधिकार की स्वीकृति ही विश्व में शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है। इसलिए घोषणाओं की यह मान्यता है कि मानवाधिकारों की उपेक्षा और घृणा के परिणामस्वरूप ही मानव जाति ने कई घृणित/क्रूर कार्य किए हैं। इस आलोक में मनुष्य ने बोलने की आज़ादी, विश्वास एवं आस्था को संघर्शपूर्वक प्राप्त किया है। जनसाधारण की सबसे बड़ी आकांक्षा स्वतंत्र रूप से बोलना और अपने विश्वास का स्वेच्छा से पालन करना है। चूंकि, यह अत्यंत जरूरी है कि मानवाधिकारों की रक्षा कानून के द्वारा की जानी चाहिए, अन्यथा मनुष्य को जुल्म और अत्याचार के खिलाफ़ बगावत का सहारा लेना पडे़गा। अत: सदस्यों व राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना और बढ़ावा देना इस परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्त्वपूर्ण है। ‘‘संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने मानव के मूल अधिकारों, समानता के अधिकार, सामाजिक प्रगति और उच्च जीवन स्तर को सुधारने तथा उन्हें बढ़ाने का निष्चिय किया है। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में अपना विश्वास करते हुए सदस्य देशों ने यह प्रतिज्ञा की है कि संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर मानवाधिकारों और मूलभूत स्वतंत्रताओं के प्रति सभी देश संरक्षण प्रदान करेंगे।’’

समवेतत: इस प्रतिज्ञा को साकार करने के लिए इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं को ठीक से समझना जरूरी है। अस्तु, महासभा द्वारा मानवाधिकारों की घोषणा को सभी लोगों और देशों के लिए उपलब्धि का साझा मानक घोषित किया गया है। इस उद्देश्य के साथ यह अपेक्षित है कि प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रत्येक भाग इस घोषणा को लगातार दृष्टि में रखते हुए अध्यापन और शिक्षा के द्वारा यह प्रयत्न करे ताकि इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हो। साथ ही उत्तरोत्तर ऐसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपाय किये जाएं, जिनसे सदस्य देशों की जनता और उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों की जनता इन अधिकारों की सार्वभौमिक और प्रभावोत्पादक स्वीकृति प्राप्त कर उनका पालन सुनिश्चित करे।

‘‘स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माताओं ने देश में मानवाधिकारों का समर्थन करते हुए राज्य के लोक कल्याणकारी सिद्धांत को अपनाया है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से व्याप्त गहरी विशमता को कम करना, मानव अधिकार एवं गरिमा के लिए अनिवार्य है।’’ इस प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता, अविभेद और बंधुत्व आदि चार सिद्धांत अनिवार्यत: सम्मिलित हैं। इस प्रकार प्रस्तावना में चार अधिकार सम्मिलित किए गए है; यथा-
  • वैयक्तिक अधिकार
  • बाह्य विश्व समुदाय से संबंध के बारे में वैयक्तिक अधिकार
  • राजनैतिक अधिकार और
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार
मानवाधिकार घोषणा पत्र 1948 में कुल 30 अनुच्छेद हैं। इन मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्र में मानव समाज के गरिमायुक्त जीवन-यापन के लगभग सभी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक बिंदुओं का समावेश किया गया है। संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है’’-

अनुच्छेद 1 :- सभी मनुष्यों को गौरव और अधिकारों की दृष्टि से जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है। वे बुद्धि और विवेक संपन्न होते हैं। इसलिए उन्हें मिलकर भाईचारे की भावना को बढ़ाने के लिए कार्य करना चाहिए।

अनुच्छेद 2 :- प्रत्येक व्यक्ति इस घोषणा पत्र में शामिल किये गए सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं का हकदार है। इसमें मूलवंष, वर्ग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति या अन्य विचार, राष्ट्रीय-सामाजिक उद्भव, संपत्ति, जन्म या अन्य प्रास्थिति के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जायेगा। इसके अतिरिक्त किसी देश या राज्य क्षेत्र, चाहे वह स्वाधीन हो, न्याय के अधीन हो, स्वायत्तषासी हो या प्रभुत्ता पर किसी मर्यादा के अधीन हो, राजनीतिक अधिकारिता विषयक या अंतरराष्ट्रीय प्रास्थिति के आधार पर उस देश या राष्ट्र क्षेत्र के किसी व्यक्ति से कोई विभेद नहीं किया जायेगा।

अनुच्छेद 3:- प्रत्येक व्यक्ति को प्राण, स्वतत्रंता और दैहिक सुरक्षा का अधिकार है।

अनुच्छेद 4 :- किसी भी व्यक्ति को गुलामी या दासता में नहीं रखा जाएगा। गुलाम बनाकर मनुष्यों की किसी भी तरह की खरीद-फरोख्त़ पर पाबंदी लगा दी जाएगी।

अनुच्छेद 5:- किसी भी व्यक्ति को यातना नहीं दी जायेगी या उसके साथ क्रूर अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जायेगा या उसे ऐसा दंड नहीं दिया जायेगा।

अनुच्छेद 6 :- प्रत्येक व्यक्ति को सर्वत्र विधि के समक्ष व्यक्ति के रूप में मान्यता का अधिकार है।

अनुच्छेद 7:- सभी व्यक्ति विधि के समक्ष समान हैं, और किसी विभेद के बिना विधि के समान संरक्षण के हकदार हैं। सभी व्यक्ति इस घोषणा के अतिक्रमण में विभेद के विरूद्ध और ऐसे विभेद उद्दीपन के विरूद्ध, समान संरक्षण के हकदार होंगे।

अनुच्छेद 8:- सवंैधानिक व कानून प्राप्त मौलिक अधिकारों के उल्लघंन की दिषा में किसी भी सक्षम राष्ट्रीय न्यायालय से प्रत्येक को न्याय मांगने का अधिकार होगा, जो कि उन्हें कानूनी रूप से प्राप्त है।

अनुच्छेद 9 :- किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ़्तार, नज़रबंद या देश निकाला की सज़ा नहीं दी जायेगी।

अनुच्छेद 10 :- सभी को पूर्णतया समान हक है कि उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों को निश्चित करने के मामलों में उन पर लगाये गये अपराधिक मामले में उनकी सुनवाई न्यायोचित और सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र व निष्पक्ष अदालत द्वारा हो।

अनुच्छेद 11(एक) :- प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दंड संहिता में वर्णित अपराध का आरोप है, को तब तक निर्दोश माना जायेगा, जब तक कि उसका अपराध कानूनी ढंग से लोक अदालत में साबित नहीं हो जाता, और जहां कि उसे अपने बचाव का पूर्ण अवसर प्राप्त है।

अनुच्छेद 11 (दो) :- उस समय किए गये अपराध के लिए कोई भी व्यक्ति उन दंडों का भागी नहीं होगा, जो कि किसी भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दंड संहिता में वर्णित नहीं है, और न ही उस पर किसी तरह का भारी जुर्माना लगाया जायेगा, जो कि उस समय दिया जाता, जिस समय उसके द्वारा वह दंडनीय अपराध किया गया था।

अनुच्छेद 12 :- किसी व्यक्ति के घर, परिवार, पत्राचार अथवा निजी मामले में कोई मनमाना हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा, और न ही उसकी मान मर्यादा को कोई ठेस पहुंचाया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसके विरूद्ध कानूनी बचाव करने का अधिकार है।

अनुच्छेद 13 :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश में स्वतंत्र रूप से आने जाने और बसने का अधिकार प्राप्त है।

अनुच्छेद 13(दो) :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश को छोड़ने और अपने देश में वापस आने का अधिकार है।

अनुच्छेद 13 (तीन) :- इस अधिकार का अवलंब अराजनैतिक अपराधों या संयुक्त राष्ट्र के प्रयोजनों और सिद्धांत के प्रतिकूल कार्यों से वास्तविक रूप से उद्भूत अभियोजनों की दषा में नहीं लिया जा सकेगा।

अनुच्छेद 14 :- प्रत्येक व्यक्ति को अत्याचारों से बचने के लिए दूसरे देशों में “ारण लेने और बसने का अधिकार है।

अनुच्छेद 14 (दो) :- परतं ु, गैर राजनीतिक अपराधी या संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देष्यों के सिद्धांतोंं व अधिनियमों के प्रतिकूल होने की दिषा में यह अधिकार लागू नहीं होगा।

अनुच्छेद 15 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को किसी एक देश की राष्ट्रीयता का अधिकार है।

अनुच्छेद 15 (दो) :- किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से अपने देश की राष्ट्रीयता से वंचित नहीं किया जायेगा तथा उसे अपनी राष्ट्रीयता को बदलने का अधिकार प्राप्त होगा।

अनुच्छेद 16 (एक) :- वयस्क स्त्री और पुरूश को धर्म, जाति तथा राष्ट्रीयता में भेदभाव किए बिना “ाादी करने का, अपना परिवार बसाने का, पूरा अधिकार है। वे भी विवाहित जीवन के दौरान तथा संबंध-विच्छेद होने पर समान अधिकारों के हकदार हैं। 

अनुच्छेद 16 (दो) :- विवाह के इच्छुक पक्षकारों से स्वतत्रं और पूर्ण सम्मति से ही विवाह किया जाएगा।

अनुच्छेद 16 (तीन) :- परिवार समाज की नैसर्गिक और सामाजिक इकाई है। इसे समाज और राज्य द्वारा संरक्षण का हक है।

अनुच्छेद 17 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर संपत्ति का स्वामी बनने का अधिकार है।

अनुच्छेद 17 (दो) :- किसी को भी उसकी संपत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाएगा। 

अनुच्छेद 18 :- प्रत्येक व्यक्ति को विचार अंत:करण और धर्म की स्वतत्रंता का अधिकार है। इस अधिकार के अंतर्गत अपने धर्म या विश्वास को परिवर्तित करने की स्वतंत्रता और अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप से या अकेले शिक्षा, व्यवहार, पूजा और पालन में अपने धर्म या विश्वास को प्रकट करने की स्वतंत्रता भी है।

अनुच्छेद 19 :- प्रत्येक व्यक्ति को अभिमत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इस अधिकार के अंतर्गत हस्तक्षेप के बिना अभिमत रखने और किसी भी संचार माध्यम से और सीमाओं का विचार किए बिना जानकारी मांगने, प्राप्त करने और देने की स्वतंत्रता भी है।

अनुच्छेद 20 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपवूर्क सभा करने और सस्ं था समिति बनाने का स्वतंत्र अधिकार है।

अनुच्छेद 20 (दो) :- किसी भी व्यक्ति को किसी समिति सभा में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकार में सीधे या स्वतंत्रतापवूर्क चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने का अधिकार है।

अनुच्छेद 21 (दो) :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की लोक सेवा में चुने जाने का समान अधिकार है।

अनुच्छेद 21(तीन) :- लोकमत सरकार के प्राधिकार का आधार होगा, जिससे वह सब जगह समय-समय पर आम चुनावों द्वारा व्यक्त करेंगे, जो कि गोपनीय वोट या इसके समक्ष स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया के द्वारा होगा।

अनुच्छेद 22 :- प्रत्येक व्यक्ति को समाज के सदस्य के रूप में सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है। वह राष्ट्रीय प्रयास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से तथा प्रत्येक राज्य के गठन और संसाधनों के अनुसार ऐसे आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को प्राप्त करने का हकदार है, जो उसकी गरिमा और उसके व्यक्तित्व के उन्मुक़्त विकास के लिए अनिवार्य हैं।

अनुच्छेद 23 :- प्रत्येक व्यक्ति को काम, स्वतंत्र रूप से रोज़गार चुनने और काम के अनुकूल सुविधाएँ तथा बेरोजगारी से बचाव करने का अधिकार है। 

अनुच्छेद 23 (दो) :- प्रत्येक व्यक्ति को भेद-भाव किये बिना समान काम के लिए समान वेतन पाने का अधिकार है।

अनुच्छेद 23 (तीन) :- प्रत्येक व्यक्ति को, जो कार्य करता है, ऐसे न्यायोचित आरै अनुकूल पारिश्रमिक पाने का अधिकार है, जिससे स्वयं उसका और उसके परिवार का मानव गरिमा के अनुरूप जीवन यापन सुनिश्चित हो सके, और यदि आवश्यक हो तो सामाजिक संरक्षण के अन्य साधनों द्वारा अनुपूरित किया जाए।

अनुच्छेद 24 :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने हितों के संरक्षण के लिए व्यवसाय संघ बनाने और उनमें शामिल होने का अधिकार है।

अनुच्छेद 25 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को एक ऐसा जीवन स्तर जीने का अधिकार है, जो स्वयं उसके और उसके परिवार के स्वास्थ्य व कल्याण के लिए पर्याप्त है। इसके अंतर्गत भोजन, वस्त्र, निवास स्थान, चिकित्सा तथा अन्य आवश्यक सेवाएं भी शामिल हैं। साथ ही उसे बेरोजगारी, रूग्णता, आषक्तता, वैधव्य तथा उसके नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों में जीवन यापन के अभाव की दषा में सुरक्षा का अधिकार भी प्राप्त है।

अनुच्छेद 25 (दो) :- प्रत्येक को मातृत्व आरै बाल्यकाल की विशेष देखभाल और सुविधा का हक है। सभी बच्चे, चाहे वे विवाहिता या अविवाहिता से पैदा हुए हों, समान सामाजिक सुरक्षा के हकदार होंगे।

अनुच्छेद 26 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है। कम-से-कम प्रारंभिक और मौलिक अवस्था में उन्हें नि: शुल्क शिक्षा प्राप्त होगी। प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी तकनीकी और रोजगारपरक शिक्षा साधारणत: उपलब्ध कराई जायेगी और उच्च शिक्षा, सभी व्यक्तियों को गुणागुण के आधार पर समान रूप में प्राप्त होगी।

अनुच्छेद 26 (दो) :- शिक्षा का लक्ष्य मानवीय व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास आरै मानवाधिकारों के साथ-साथ मौलिक स्वतंत्रता को सम्मान देना तथा उसे मज़बूती प्रदान करना होगा। यह सभी राष्ट्रों के बीच समझ, सहनशीलता और मित्रता की भावना का विकास करेगी। साथ ही यह जाति या धार्मिक गुणों और संयुक्त राष्ट्र की शांति बनाए रखने वाले कार्यकलापों को प्रोत्साहन देगी।

अनुच्छेद 26 (तीन) :- माता-पिता का चयन करने का यह पूर्णाधिकार है कि उनकी संतान को किस प्रकार की शिक्षा दी जायेगी।

अनुच्छेद 27 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति को समुदाय के सास्ंकृतिक जीवन में मुक़्त रूप से भाग लेने, कलाओं का आनंद लेने और वैज्ञानिक प्रगति तथा उसके फ़ायदों में हिस्सा प्राप्त कर सकने का अधिकार है।

अनुच्छेद 27 (दो) :- प्रत्येक व्यक्ति को इस घोषणा पत्र में दिए गए सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय अधिकारों को साकार करने का स्वतंत्र अधिकार है। 

अनुच्छेद 29 (एक) :- प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि अपने व्यक्तित्व के साथ-साथ वह स्वतंत्र रूप से अपने समुदाय का भी विकास करे।

अनुच्छेद 29 (दो) :- प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों और स्वतत्रं ताओं के प्रयोग में उन मर्यादाओं की अपेक्षा में है, जो अन्य व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सम्यक् मान्यता और सम्मान सुनिश्चित करने तथा लोकतांत्रिक समाज में नैतिकता, लोक व्यवस्था और साधारण कल्याण की न्यायोचित अपेक्षाओं को पूरा करने के प्रयोजन के लिए विधि द्वारा अवधारित की गई है।

अनुच्छेद 29 (तीन) :- इन अधिकारों और स्वतत्रं ताओं को किसी भी दषा में संयुक्त राष्ट्र संघों के उद्देष्यों और सिद्धांतोंं के विपरीत प्रयोग नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 30 :- इस घोषणा की किसी बात का यह निर्वाचन नहीं किया जाएगा कि उसमें किसी राज्य समूह या व्यक्ति के लिए कोर्इ ऐसा कार्यकलाप या कोई ऐसा कार्य करने का अधिकार निहित है, जिसका लक्ष्य इसमें उपवर्णित अधिकारों और स्वतंत्रताओं में से किसी का विनाष करता है। अस्तु, सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना में कहा गया है कि मानव समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान एवं समानता के साथ मानवाधिकारों की प्राप्ति का हक दिया जायेगा, तभी विश्व में स्वतंत्रता, न्याय एवं शांति स्थापित हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देश मिलकर विश्व में मानवाधिकारों के प्रति सम्मान एवं उसे स्वीकार करने के लिए जागृति लाने का प्रयास करेंगे। इस घोषणा के अन्तर्गत 21 अनुच्छेदों (अनुच्छेद 1 से 21 तक) का संबंध सिविल और राजनैतिक अधिकारों से है, जबकि 6 अनुच्छेदों (अनुच्छेद 22 से 27 तक) का संबंध आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों से तथा “ोश 3 अनुच्छेदों (अनुच्छेद 28 से 30 तक) का संबंध सामान्य अधिकारों से है।

दरअसल, मानव अधिकार ऐसे अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को मानव होने के नाते प्राप्त हैं, चाहें उसकी राष्ट्रीयता, लिंग, वर्ग, स्थिति कुछ भी क्यों न हो। इनके माध्यम से ही व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक, आत्मिक आवश्यकताएं आदि की पूर्ति कर सकता है। मानवाधिकारों को मोटे तौर पर निम्न भागों में बांटा गया है-

मानव अधिकारों का वर्गीकरण

  1. प्राकृतिक अधिकार 
  2. नैतिक अधिकार 
  3. वैधानिक अधिकार
  4. मूलभूत अधिकार 
  5. नागरिक अधिकार 
  6. राजनैतिक अधिकार
  7. आर्थिक अधिकार 
  8. सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार
प्राकृतिक अधिकार :- प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं, जो मानव को मानव होने की वजह से जन्म से ही प्रकृति प्रदत्त होते हैं। इन अधिकारों का राज्य के नियमों एवं कानूनों द्वारा अनुमोदन नहीं किया जाता है तथा इनके उल्लघंन होने पर भी वैधानिक रूप से ये दंडनीय नहीं माने जाते हैं। व्यक्ति इसका पालन प्राय: अपने अन्त: कारण अथवा स्वाभाविक प्रेरणा द्वारा करता है।

नैतिक अधिकार :- ये अधिकार मानव के आध्यात्मिक विचारों एवं चेतना पर आधारित होते हैं। इनके निर्धारण पर किसी वैधानिक सत्ता का हस्तक्षेप नहीं होता है, जैसे बच्चों को अपने बुजुर्गों का आदर-सत्कार करना चाहिए। इन अधिकारों के पालन के लिए व्यक्ति अपनी अंर्तात्मा के आधार पर अनुभूति ग्रहण करता है, न कि इन अधिकारों का निर्माण किसी सत्ता, सत्ताधारिता और कानून से प्राप्त किया जाता है। ये अधिकार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सहयोग की भावना को जागृति कर व्यक्ति को व्यक्ति होने का अहसास कराती हैं। नैतिक अधिकारों के अनुसरण में व्यक्ति के परिवार, समाज, राज्य, पर्यावरण परिस्थिति एवं समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसी परिपे्रक्ष्य में हम नैतिक अधिकारों की आध्यात्मिक चेतना, विचारों का आदान-प्रदान के रूप में ग्रहण करते हैं।

वैधानिक अधिकार :- वैधानिक अधिकार से तात्पर्य ऐसे अधिकारों से है, जो कानून द्वारा संविधान में संरक्षण से प्राप्त होते हैं, जैसे-हमारे संविधान में व्यक्तिगत सुविधाओं हेतु जीवन एवं संपत्ति रखने का अधिकार दिया गया है। वैधानिक अधिकार के निमार्ण के लिए सत्ता, सत्ताधारिता एवं कानून की मान्यता होती है। परिणामस्वरूप जिसमें नागरिकों को अधिकारों की प्राप्ति होती है। वैधानिक अधिकार को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-
  1. मूलभूत अधिकार
  2. राजनीतिक अधिकार
  3. सामाजिक अधिकार
मूलभूत अधिकार :- जनता को मूलभतू अधिकार भारत, जापान, यू.एस.ए., पूर्व सोवियत संघ, फ्रांस, और अन्य राज्यों में प्राप्त हैं। इन अधिकारों के न होने पर व्यक्ति का विकास असंभव हो जाता है। लोकतांत्रिक देश के उत्तम शासन में संविधान के माध्यम से इन्हें सक्षम व व्यापक बनाया जाता है। उदाहरणस्वरूप भारतीय संविधान में जनता को मूलभूत अधिकार प्रदान किये गए हैं।

नागरिक अधिकार :- नागरिक अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास का आधार स्तंभ होते हैं। इसके बिना कोर्इ भी व्यक्ति अपना सर्वागींण विकास नहीं कर सकता। नागरिक अधिकार, मानव को मानवता की पहचान कराते हैं। सभी सभ्य समाजों के नागरिकों को कुछ नागरिक अधिकार प्रदान किये जाते हैं। इनमें जीवन की रक्षा का अधिकार, समानता व स्वतंत्रता का अधिकार, स्वतंत्र भ्रमण का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, भाशण और प्रकाषन का अधिकार, सभा और सम्मेलन का अधिकार, धर्म और अन्त: करण का अधिकार आदि उल्लेखनीय हैं। समाज में मानव को इन आवश्यक मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के प्रयोग का अधिकार तभी प्राप्त होता/हो सकता है, जब ये राज्य के कानून द्वारा मान्य और सरं क्षित होते हैं।

राजनीतिक अधिकार :- राजनीतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं, जो मानव का लोकतंत्रात्मक राज्य की राजनीति में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार बनाने हेतु दिये जाते हैं। राजनीतिक अधिकार राज्य द्वारा केवल अपने नागरिकों को ही प्रदान किये जाते हैं। क्योंकि, राज्य किसी भी अनागरिक तथा विदेषियों को अपनी प्रभुसत्ता के प्रयोग में भागीदार नहीं बनाना चाहता। राजनीतिक अधिकार वस्तुत: वे साधन हैं, जिनके माध्यम से एक वयस्क नागरिक राज्य के संविधान तथा कानूनों के द्वारा राष्ट्र की सरकार के साथ साझेदार बनता है। राजनीतिक अधिकार अनेक प्रकार के हो सकते हैं। इसके अंतर्गत पहला मतदान का, दूसरा राजनीतिक अधिकार निर्वाचित करने का, और तीसरा सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार शामिल है।

आर्थिक अधिकार :- व्यक्ति को अपने जीवन यापन करने के लिए ऐसे आर्थिक अधिकारों की आवश्यकता पड़ती है, जिसके बिना वे अपनी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति (रोटी, कपड़ा, मकान) नहीं कर सकते। इन अधिकारों में, कार्य करने का अधिकार, व्यवसाय चुनने का अधिकार, संघ बनाने का अधिकार, स्वच्छ वातावरण में काम करने का अधिकार, सीमित समय तक ही कार्य करने का अधिकार, योग्यतानुसार रोजगार प्राप्त करने का अधिकार, निजी संपत्ति रखने एवं विस्तार करने का अधिकार आदि सम्मिलित हैं।

सामाजिक- सांस्कृतिक अधिकार :- सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार में सास्ं कतिक जीवन में भाग लेने, वैज्ञानिक प्रगति का लाभ लेने, साहित्यिक रचना के रचनाकार को उसका लाभ लेने का अधिकार आदि प्रमुख हैं। इसमें संगीत, कला, भाशण देना, वाद-विवाद में भाग लेने, अपनी संस्कृति का पालन करना, दूसरी संस्कृति को अपनाना, उचित जीवन स्तर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा के अधिकार आदि उल्लेखनीय हैं। सामाजिक अधिकारों में जीवन और सुरक्षा का अधिकार, परिवार का अधिकार, कार्य का अधिकार, समझौते का अधिकार, विचार व अभिव्यक्ति का अधिकार, धर्म का अधिकार, स्वतंत्रता एवं घूमने का अधिकार, संघ बनाने का अधिकार, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार आदि शामिल किये गये हैं।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत मौलिक मानवाधिकार

भारत में मूल अधिकारों की व्याख्या व संदर्भित प्रावधानों का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से 35) में किया गया है। मूल अधिकारों की कुल संख्या पूर्व में सात थी, जो कि वर्तमान में 6 है। ध्यातव्य है कि संपत्ति के अधिकार को 1979 में 44वें संविधान संषोधन द्वारा हटा दिया गया है। विवेचनार्थ, भारतीय संविधान के मूल अधिकार हैं; यथा- 

1. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18) :- मूल अधिकार समता के अन्तर्गत अधिकार उल्लेखनीय हैं-
  1. • विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद-14)
  2. • धर्म, मूल वंष, जाति, लिंग, जन्म का स्थान, के आधार पर विभेद का प्रतिशेध (अनुच्छेद-15)
  3. • लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता (अनुच्छेद-16)
  4. • अस्पृष्यता का अंत (अनुच्छेद-17)
  5. • उपाधियों का अंत अनुच्छेद-18)
2. स्वतत्रंता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22) :- वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का स्थान मूल अधिकारों में सर्वोच्च माना जाता है। स्वतंत्रता के अधिकार निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
  1. • वाक् स्वातंत्र्य विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण (अनुच्छेद-19)
  2. • अपराधों के लिए दोशसिद्ध के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद-20)
  3. • प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद-21)
  4. • कुछ दषाओं में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद-22)
3.“शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24) :- शोषण के विरूद्ध मूलभूत अधिकार हैं-
  1. • मानव के दुव्र्यापार और बलात श्रम पर रोक (अनुच्छेद-23)
  2. • कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिशेध (अनुच्छेद-24) 
4. धार्मिक स्वतत्रंता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) :- इसके अन्तगर्त अधिकार शामिल हैं; यथा-
  1. • अन्त:करण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप में मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-25)
  2. • धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-26)
  3. • किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता (अनुच्छेद-27) 
  4. • कुछ षिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-28)
5. सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 31) :- भारत के संविधान में सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी निम्नलिखित अधिकार प्रदान किये गये हैं-
  1. • अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद-29)
  2. • अल्पसंख्यकों को षिक्षण संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार (अनुच्छेद-30)
  3. • 1978 में संपत्ति के अधिकार का विलोपन कर दिया गया है (अनुच्छेद-31) 
 6. मूल अधिकार के रूप में संवैधानिक उपचारों का अधिकार ध्यातव्य है;-
  1. • मौलिक अधिकारों को न्यायालय में प्रवर्तित कराने का अधिकार है। इसके तहत न्यायालय 5 प्रकार का रिट जारी कर सकता है (अनुच्छेद-32)
  2. • संसद द्वारा मूल अधिकारों के उपांतरण की शक्ति (अनुच्छेद-33)
  3. • संसद विधि द्वारा मार्शल लॉ के प्रवर्तन के दौरान मूल अधिकारों के उल्लंघन की क्षतिपूर्ति (अनुच्छेद-34)

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