वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास

अनुक्रम

अमेरिका में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास 

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम समय में अमेरिका में निर्धनता, रोग एवं बेरोजगारी की समस्याएं सामान्य रूप से फैली हुई थीं। विशेष रूप से बड़े-बड़े नगरों में बेरोजगारी की समस्या अधिक थी। उस समय के परोपकारी व्यक्तियों पर यह बात स्पष्ट हो गर्इं कि निर्धन विधान को चलाने वाले अधिकारियों द्वारा जो सहायता दी जा रही है वह न तो पर्याप्त है और न ही रचनात्मक। यह बात भी स्पष्ट हो गई कि परोपकारी संस्थाओं के बीच सहयोग के अभाव के कारण एक दूसरे के कार्यों एवं कार्यक्षेत्र के विषय में सूचना नही मिल पाती है और परिणामस्वरूप जो कुछ परिश्रम किया जाता है और धन व्यय होता है वह अधिकतर व्यर्थ हो जाता है। कार्यों में द्वितीयावृत्ति के कारण कुछ क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक संस्थाएं कार्य करती है आरै कुछ क्षेत्रों में संस्थाओं का अभाव है। इस परिस्थिति के सुधार करने के लिए 1877 में चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी आन्दोलन की स्थापना हुई थीं।

हम पहले ही बता चुके हैं कि इस आन्दोलन का आधार टॉमस चामर्स के विचारों पर था। इस आन्दोलन का आधार इस विचार पर था कि सार्वजनिक निर्धन सहायता अपने उद्देश्य में असफल है और सेवाथ्री का इस प्रकार पुनर्वास होना चाहिए कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस आन्दोलन ने इस बात की व्यवस्था की कि निर्धनों के घर जाकर उनका निरीक्षण किया जाये, उन्हें परामर्श दिया जाये, अनुचित कायोर्ं से रोका जाये और आर्थिक सहायता दी जाये। इस प्रकार निर्धनों के पुनर्वास के पूर्व उनकी दशा का सावधानी से परीक्षण और उनकी समस्या के विषय में स्वयं उनसे और उनके आस-पास के लोगों से विचार विमर्श आवश्यक समझा जाने लगा। निर्धनों एवं समस्याग्रस्त व्यक्तियों के विषय में इस प्रकार की वैयक्तिक रूचि समाज कार्य की एक नई दिशा की ओर संकेत करती है। इसी नई दिशा से वैयक्तिक समाज कार्य की उत्पत्ति हुई।

चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटीज ने सेवार्थियों की वैयक्तिक एवं आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए सामाजिक हल (सुझाव) का प्रयोग करना चाहा और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, उपकरण, छोटे-छोटे कारखानों या व्यापार के लिए धन, भोजन, वस्त्र, एवं परिवारों के लिए कमरों या एक छोटे से घर की सुविधाएं प्रदान कीं। इस अवसर पर एक प्रमुख बात यह हुई कि स्वयं सेवकों और सी. ओ. एस. के प्रतिनिधि वैतनिक थे और वे सी.ओ.एस. के कायोर्ं के लिऐ नगर के धनी व्यक्तियों से धन एकत्र करते थे। स्वयंसेवक सेवार्थियों से वैयक्तिक सम्पर्क रखते थे और उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए उपदेश एवं निर्देश देते थे। सेवार्थियों से यह आशा की जाती थी कि वे उनके सुझावों का पालन करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक स्वयं सेवकों को यह अनुभव हुआ कि निर्धनता का कारण बहुधा सेवाथ्री के व्यवहार का दोष ही नहीं है बल्कि उसकी सामाजिक परिस्थिति भी है जिसमे वह रहता हैं। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सामाजिक दशाओं के सुधार पर बल दिया जाने लगा। सी.ओ.एस. ने इस बात का प्रयास करना आरम्भ किया कि ऐसे सामाजिक विधान बनने चाहिये जिसमें निराश्रित, रोग, सामाजिक विघटन का प्रतिबन्ध हो सके।

सामाजिक सुधार के उपायों से निर्धन व्यक्तियों की दशा में उन्नति होने लगी परन्तु फिर भी कुछ परिवार ऐसे थे जिनकी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती थीं और जिन्हें ऐसे सहायकों की आवश्यकता थी जो उनकी समस्याओं को सहानुभूति के साथ समझकर उन्हें उपदेश दें जिससे वे सामुदायिक साधनों का सदुपयोग कर सकें। यह समझा जाने लगा कि सामाजिक सुधार से ही समस्त वैयक्तिक समस्याएं नहीं सुलझ जातीं। अत: सामाजिक संस्थाएं वैयक्तिक समाज कार्य सेवाएं प्रदान करती रहीं। बीसवी शताब्दी के आरम्भ में समाज कार्य के विद्यालयों की स्थापना हुई और व्यवसायिक प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध हुई। सामाजिक संस्थाओं ने अब प्रशिक्षण प्राप्त कार्यकर्ताओं को नियुक्त करना आरम्भ कर दिया। अब सेवाथ्री की समस्या का अध्ययन, निदान और चिकित्सा की योजना इन प्रशिक्षण प्राप्त कार्यकर्ताओं का ही उत्तरदायित्व हो गया।

इस प्रकार उनका महत्व बढ़ गया क्योंकि अब उनकी जांच का प्रतिवेदन किसी समिति के सम्मुख रखने की अपेक्षा स्वयं उनकी राय के अनुसार ही सहायता का कार्य होने लगा। 1917 में पहली बार मेरी रिचमण्ड ने वैयक्तिक समाज कार्य की प्रक्रियाओं को एक निश्चित रूप में अपनी पुस्तक सोशल डाइग्नोसिस में प्रस्तुत किया। परन्तु यह स्पष्ट हो गया कि केवल परामर्श से ही पुनर्वास नहीं हो सकेगा और यह कि इसके लिये आर्थिक साधनों की भी आवश्यकता होगी। अत: निजी एवं सार्वजनिक आर्थिक सहायता के कार्यक्रम प्रचलित रहे और अब भी प्रचलित हैं।

इंग्लैण्ड में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास 

मध्यकाल में इंग्लैण्ड में गरीबों की सहायता का कार्य चर्च का था। धार्मिक भावना से पे्िर रत होकर लोग असहायों, अंधों, लंगड़ों तथा रोगियों की सहायता करते थे। दान वितरण के कार्य को अधिक महव देने के कारण चर्च तथा राज्य में असहमति उत्पन्न हुई उसके फलस्वरूप सोलहवीं शताब्दी में निर्धनों की सहायता का उत्तरदायित्व राज्य पर हो गया।

1. एलिजाबेथ का धनहीनों के लिए कानून :सन् 1601 में एलिजाबेथ पुअर ला बना जिसके द्वारा पुरखों तथा अभावग्रस्त माता पिताओं की सहायता करना अनिवार्य कर दिया गया। इस कानून ने निर्धनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया : समर्थ निर्धन, असमर्थ निर्धन तथा आश्रित बालक। समर्थ निर्धनों को हाउसेज आफ करेक्षस या वर्क हाउसेज में रखने की व्यवस्था थी तथा उन्हें दान देना निशिद्ध था। रोगी, विराश्रित, बुद्ध, अन्धे, बहरे, गूंगे, लंगड़े, पागल और वे मातायें जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें या तो भिक्षा जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें या तो भिक्षा गृहों में रखा जाता था या घर पर ही बाºय सहायता सामान्य वस्तुओं जैसे खाना, कपड़ा, इंर्ध् ान के रूप में दी जाती थी। अनाथ पिताहीन, परित्यक्त बालक या निर्धन माता-पिता के बालक आश्रित बालक कहे जतो थे। ऐसे बच्चे उन नागरिकों को दिये जाते थे जो रखना चाहते थे। लड़कों को उनके मालिक के व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जाता था। निर्धनों के निरीक्षक निर्धनों के कानून का पालन कराते थे। उनका कार्य निर्धनों की सहायता के लिए प्रार्थना पत्र लेना, उनकी दषाओं की जाँच करके पता लागना कि उनको सहायता दी जाय या नहीं और यदि दी जाय तो उसका रूप कया हो। 

2. पुअर ला अमेंडमेंट ऐक्ट : कार्यग्रह निवासियों के दुव्र्यवहार, उचित स्वच्छता का अभाव, अनैतिकता तथा भ्रश्टाचार के कारण सन् 1982 में पुअर ला अमेंडमेंट ऐक्ट बना। जिससे वैतनिक निरीक्षकों के स्थान पर वैतनिक संरक्षक नियुक्त किये गये। आश्रमों की सहायता समाप्त कर दी गयी और कार्य न मिलने की अवधि में इच्छुक व्यक्तियों को सहायता दी जाने की व्यवस्था की गयी। 

3. थामस चाल्मर्स का योगदान : थामस चाल्मर्स ने अपने अनुभव के आधार पर दान पद्धति को कटु आलोचना की क्योंकि यह व्यवस्था निर्धनों में आचार भ्रश्टाचार को प्रोत्साहन देती थी। स्वावलम्बन की इच्छा को निर्बल बनाती थी। इस संबंध में थामस चाल्मर्स ने सुझाव दिया कि : -
  1. दुर्गति के प्रत्येक मामले की जाँच भली भाँति की जाय, कश्ट के सभी कारणों का निश्चय किया जाय और निर्धनों में आत्म-निर्भरता की सभी सम्भावनाओं को विकसित किया जाय। 
  2. यदि आत्मावलम्बन सम्भव न हो तो सम्बन्धियों, मित्रों और पड़ोसियों को अनाथ, बृद्ध, बीमार और अपंगों की सहायता के लिए प्रोत्सािहत किया जाय, 
  3. यदि निर्धन परिवारों की आवश्यकता इस प्रकार भी पूरी न की जा सके तो कुछ धनाड्य नागरिकों से उनके निर्वाह के लिए सम्बन्ध स्थापित किया जाय। 
  4. केवल जब इन प्रस्तावित तरीकों में से एक भी सफल न हो तो तभी जिले का डीकन अपनी धार्मिक परिशद् से सहायता से प्रार्थना करे।
4. थामस चाल्मर्स को दान-भिक्षा कार्यक्रम का व्यावहारिक अनुभव होने से दान की अवधारणा में परिवत्रन लाने में काफी योगदान रहा। उन्होंने वैयक्तिक आधार पर जाँच करने को प्रोत्साहन दिया तथा दरिद्रता के कारणों को ज्ञात करने का प्रयत्न करने के सिद्धांत को उत्पन्न करती है। उन्होंने व्यक्तिगत असफलताओं को ही निर्धनता का निराश्रितों के भाग्य निर्धारण में वैयक्तिक रूप से ध्यान देना आवश्यक होता है, सहायता कार्य की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी। चाल्मर्स के अग्रगामी कार्य के 50 वर्ष बाद लंदन चैरिटी आर्गनाइजेषन सोसाइटी ने सहायता का एक कार्यक्रम संगठित किया, जो प्रमुख रूप से थामस चाल्मर्स के विचरों पर ही आधारित था। उन्होंने समाज कार्य में व्यक्तिगत उपागम की प्रथम आधारशिला रखी जिसे आज हम “वैयक्तिक कार्य” को संबल देते हैं।

5. जान हावर्ड तथा एलिजाबेथ फ्राई- सत्रहवीं तथा अठारहवीं “ाताब्दियों में इंग्लैण्ड के कारागारों की व्यवस्था बहुत अस्त-व्यस्त थी। बन्दियों के साथ दुव्र्यवहार किया जाता था तथा उनके आवास एवं भोजन तथा वस्त्र की उचित व्यस्था न थी। जान हावर्ड जेल सुधार के दृढ़ समर्थक थे। उनका विचार था कि अपराधियों को अपराध विशेष के आधार पर दण्ड किया जाय तथा अपराध के कारणों की खोज की जाय। बन्दियों को आवश्यक आवश्यकताएँ प्रदान की जायें। हावर्ड का जेल सुधार सम्बन्धी विचार अपने युक्तिगत जेल अनुभव पर आधारित था। वेडफोर्ड के शेरिफ पद पर कार्य करते हुए उन्होंने अपने दुखदायी अवलोकनों का अभिलेख तैयार किया। इन अभिलेखों से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि इस सम्बन्ध में और अधिक खोजपूर्ण अन्वेशणों की आवश्यकता है।

6. श्रीमती एलिजाबेथ फ्राई- शांति प्रचारक समिति की सदस्य होने के कारण न्यूगेट जेल जिसे धरती पर नरक कहा जाता था, का निरीक्षण कर जेल में ही बच्चों के लिए विद्यालय को प्रारम्भ कराने में सफलता प्राप्त की। बन्दिनियों में से एक को विद्यालय की अध्यापिका नियुक्त किया। अनेक सुधारकों ने जेल व्यवस्था में सुधार लाने का अथक प्रयास किया परन्तु जब तक 1877 में प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थाओं का प्रशासन एक केन्द्रीय संस्था नेशनल प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थाओं का प्रशासन एक केन्द्रीय संस्था नेशनल प्रिजन कमीशन को सांपै न दिया तब तक कारागारों में सन्तोषजनक सुधार न हुआ। हेनरी सोली तथा चाल्र्स स्टुअर्ट लोच चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी की स्थापना सन् 1869 में सोसाइटी फार आगर्न ाइजेशन रिलीफ एण्ड रिपे्िर संग से बदलकर की गयी। इसके संगठन का मूल श्रेय हेनरी सोली को है जिन्होंने सन् 1868 में वैयक्तिक एवं सार्वजनिक परोपकारी समितियों की कार्य विधियों के बीच समन्वय करने वाली परिशद के निर्माण की एक योजना प्रस्तुत की। इस दान संगठनसोसाइटी की नींव थामस चाल्मर्स के सिद्धांतों पर की गयी। दान संगठन समितियों का कार्य प्रार्थियों से साक्षात्कार करना, उनके सामाजिक अमामथ्र्य की चिकित्सा की योजना बनाना और जो संस्थाएँ पहले ही से विद्यमान थ्ीां उनसे धन प्राप्त करना था। इस समितियों के कार्यों में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य के स्वरूप की झलक मिलती है। समाज कार्य ऐतिहासकों का विचार है कि समाज कार्य की संगठित क्रियाओं की वर्तमान पद्धति की उत्पत्ति चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी की इसी योजना से हुई। 

7. कैनन सैमुअल अगस्टस बारनेट- बारनेट ने यह पाया कि व्हाइट चनै ेट के निर्धन 8000 पंैिरष निवासियों में अधिकांष बेकार अथवा रोग से पीड़ित थे। आक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज स्थित कालेजों ने बारनेट से इस बात की जानकारी चाही कि सामाजिक अध्ययनों में रुचि रखने वाले विद्याथ्री निर्धनों की सहायता के लिए कुछ कर सकते हैं। उन्होंने छात्रों को विशेषाधिकार हीन व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने, उन्हें शिक्षा सम्बन्धी और व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने के लिए आमन्त्रित किया। बारनेट तथा उनके साथियों ने निर्धनता की समस्या को सुलझाने का दो प्रकार से प्रयास किया। अविवेकपूर्ण दान पद्धति बन्द करें ‘पुअर ला’ के अधीन सहायता केवल वर्क हाउस में दी जाय तथा दूसरे इस बात की कोषिष की कि व्यक्तियों को पुन: आत्म स्वावलम्बी बनाया जाय। इसके लिए उनकी आवश्यकताओं, योग्यताओं एवं कमियों का सावधानी से अध्ययन किया जाय। उनका विचार था कि सहायता का उद्देश्य का उद्देश्य वैयक्तिक कठिनाइयों को थोड़े समय के लिए कम करना नहीं है बल्कि समाज के रोग की चिकित्सा करना है। बारनेट के विचारों ने सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ बनाया।

8. इडवार्ड डेनिसन इडवार्ड- डेनिसन सन् 1887 में माइल दण्ड रोड की फिलपाट स्ट्रीट में रहने गये। यहाँ पर उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की तथा रात्रि में वे इस स्कूल में पढ़ाने का कार्य करते थे। दिन के समय रोगियों की देखभाल, स्थनीय निकायों का निरीक्षण तथा गरीबों की आवश्यकताओं को जनता व सरकार तक पहुँचाने का कार्य करते थे। इससे हम देखते है कि प्रारम्भिक सामाजिक वैयक्तिक कार्यकर्ता नकद या भौतिक सहायता देते हुए भी उनका प्रमुख उददेश्य आर्थिक अथवा भौतिक आवश्यकताओं से नहीं बल्कि सम्बन्ध स्थापन से था।

भारत में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास 

प्राचीन दृष्टिकोण 

भारत में दीन दुखियों, असहायों तथा पीड़ित व्यक्तियों की सहायता करने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। मानेचिकित्सा सम्बन्धी कार्य भी प्राचीन युग से ही चले आये हैं। कृष्ण का अर्जुन को उपदेश देना, वशिष्ठ का राम को कर्तव्य बोध कराना, बुद्ध का अंगुलिमाल के व्यवहार को परिवर्तित करना आदि इसके उदाहरण हैं। भारतीय संस्कृति तथा धर्म का मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों की सहायता करना है जो उत्पीड़ित हों तथा दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक भी भिखारियों को दान देना, निर्धनों तथा असहायों की सहायता करना, धर्मशालाएँ बनवाना रोगियों की सहायता करना आदि पुण्य के कार्य समझे जाते रहे हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसे सहायता मूलक कार्य करने के लिए व्यक्तियों में होड़ लगती थी।

बौद्ध काल 

बौद्ध काल में समाज की भलाई के लिए अनेक प्रकार के डपदेश देने का प्रबन्ध किया गया था। बोधिसत्त्व में इस बात का उल्लेख मिलता है कि दानी व्यक्तियों के कौन-कौन से कार्य थे। बोधिसत्त्व के अनुसार सहायताकारी कार्यों को पहले अपने सगे सम्बन्धियों तथा मित्रों की सहायता उसके पष्चात् असहाय, रोगी, संकटग्रस्त तथा दरिद्र व्यक्तियों तथा मित्रों की सहायता उसके पश्चात् असहाय, रोगी, संकटग्रस्त तथा दरिद्र व्यक्तियों की सहायता करनी चाएिह।

मौर्य काल

मौर्य काल में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का क्षेत्र अधिक व्यापक हो गया था। बच्चों, वृद्धों तथा रोग्रस्त व्यक्तियों की देखभाल का कार्य अत्यन्त धार्मिक समझा जाता था। गाँव के वयोवृद्ध तथा मुखिया माता-पिता विहीन बालकों की देख भाल का कार्य करता था। निर्धन बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा तथा भोजन का प्रबन्ध अध्यापक करता था।

इस्लाम काल

13वीं शताब्दी से भारतीय लोक जीवन में इस्लाम का आविर्भाव हुआ। इस्लाम धर्म में प्रारम्भ से ही भिक्षा देने की व्यवस्था तथा प्रथा रही है। यह दान उन व्यक्तियों को दिये जाने की व्यवस्था है जो हज पर जाने का व्यय न वहन कर सके, जिनके पास भोजन न हो, भिखारी हों तथा जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वर हेतु अर्पित कर दिया हो। जकात से प्राप्त धन का उपयोग समाज कल्याण के कार्यों में ही किया जाता था। कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिष, नासिरुद्दीन आदि सुल्तानों ने इस क्षेत्र में अनेक कार्य किये। फिरोज ने ऐसे व्यक्तियों की सहायता करने के लिए जिनके पास पुत्रियों का विवाह करने के लिए पर्याप्त धन नहीं था एक दीवान-ई-खरात संस्था का निर्माण किया था। मुगल काल में ऐसी अनेक दुकानें खोल दी जाती थीं जहाँ पर सस्ते मूल्य पर अनाज मिलता थ। उस समय एक ऐसे विभाग का संगठन भी था जो आवश्यकता वाले व्यक्तियों की सूची रखता था। निरीक्षकों को नियुक्ति भेदभाव को रोकने के लिए की जाती थी। सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने व्यक्तियों को रोजगार देने तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने का वृहद् कार्यक्रम बनाया था। उसका विचार था कि अपराधों का कारण आवश्यकताओं की संतुश्टि का न होना है।

अंग्रेजी शासन काल 

अंग्रेजी शासन काल में अनेक समाज सुधार आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ। राजाराम मोहन राय ने बाल विवाह तथा सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप सन् 1829 ई0 में प्रतिबन्ध अधिनियम पारित किया गया जिसने सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। सन् 1856 ई0 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास हुआ। गाँधी जी के प्रयत्नों के फलस्वरूप अनेक सुधार सम्भव हो सकें। भारत में सन् 1936 ई0 से पहले सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य को एक ऐच्छिक कार्य समझा जाता था। सन् 1936 ई0 में पहली बार समाज कार्य की व्यावसायिक शिक्षा के लिए एक संस्था पर रावजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल आफ सोशल वर्क के नाम से स्थापित हुई। इस समय इस बात की आवश्यकता महसूस हो चुकी थी कि वैयक्तिक सेवा कार्य करने के लिए औपचारिक शिक्षा अनिवार्य है।

स्वतंत्रता के बाद 

 बीसवीं शताब्दी में ऐसी समाज सेवी संस्थाओं की वृद्धि हुई। अनाथालयों, शिशु सदनों की तथा अंधों के लिए स्कूलों की स्थापना की गयी। विकलांग बालकों के लिये पहली बार सन् 1947 ई0 में एक ऐच्छिक संस्था स्थापित हुई। इस संस्था के कार्यों से प्रभावित होकर भारत के अनेक चिकित्सालयों में विकलांग चिकित्सा विभाग स्थापित हुए। सन् 1952 ई0 में इन्डियन कौंसिल फॅार चाइल्ड वेलफेयर की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य शिशु कल्याण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करना और दूसरी ओर ऐच्छिक संस्थाओं एवं राज्य के बीच सम्पर्क स्थापित करना है।

समाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होना “ाीघ्र ही प्रारम्भ हुआ। जब भारतीय चिकित्सक अमेरिका तथा इग्लैंण्ड गये और उन्होंने रोगियों के साथ सेवा कार्य के महत्त्व को समझा तो भारतीय चिकित्सालयों ने भी इसके विकास पर जोर दिया। दि हेल्थ सर्वे एण्ड डेवलपमेन्ट कमेटी (भोर कमेटी) ने

सन् 1945 ई0 में चिकित्सालयों में प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति की सिफारिश की। चिकित्सीय वैयक्तिक सेवा कार्य के विकास में यह महत्वपूर्ण कारक था। दूसरा कारण मानसिक चिकित्सालयों की स्थापना तथा इसमें मनोसामाजिक कार्यकर्ताओं के महत्त्व को समझ जाता है। सन् 1946 ई0 में टाटा इन्स्टीट्यूट ने चिकित्सकीय समाज कार्य की शिक्षा का प्रबन्ध किया। सन् 1944 ई0 में डा0 जे0एम0 कुमारप्पा इन्स्टीट्यूट के निदेशक, अमेरिका गये तथा चिकित्सकीय समाज कार्य के लिए विजिटिंग प्रोफेसर के लिए समझौता किया। इसके परिणामस्वरूप लूईस विले, कंट्री की मिस लुईस ब्लैन्की नवम्बर सन् 1946 ई0 में भारत आयी। कुछ महीनों तक उन्होंने भारतीय स्वास्थ्य समस्याओं को समझने तथा चिकित्सालयों की समस्याओं से अवगत होने में अपना ध्यान लगाया। कुछ समय बाद एक नये विभाग चिकित्सकीय तथा मनोचिकित्सकीय समाज कार्य का संगठन किया। जिस अवधि में मिस ब्लैन्की भारत आयीं थीं उन्हीं दिनों डॉ0 (मिस) जी0आर0 बनर्जी चिकित्सकीय तथा मनोचिकित्सकीय समाज कार्य में प्रषिक्षण हेतु षिकागो गयीं और वापस आकर मिस ब्लैन्की से सन् 1948 ई0 में कार्यभार सँभाल लिया।

सन् 1946 ई0 में जे0 जे0 हास्पिटल बाम्बे में प्रथम चिकित्सकीय समाज कार्यकर्ता की नियुक्ति हुई थी। उस समय से उसमें काफी वृद्धि हो रही है। आज चिकित्सकीय सामाजिक कार्यकर्ता ने केवल सामान्य चिकित्सालयों में बल्कि विशेषीकृत चिकित्सालयों, क्लिनिकों तथा पुनस्र्थापन केन्द्रों में कार्य करने लगे हैं।

यद्यपि यह सत्य है कि सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का क्षेत्र व्यापक हो रहा है परन्तु कार्यकर्ता अपनी भूमिकाओं को पूरा करने में अनेक बाधाएँ अनुभव कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रषिक्षित कार्यकर्ताओं को चयन में कोई विशेष वरीयता नहीं मिलती है। आशा है समय परिवर्तन के साथ-साथ इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आयेगा तथा सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का सामान्य विकास सम्भव हो सकेगा।

बीसवीं शताब्दी में वैयक्तिक समाज कार्य की नवीन रूचि 

बीसवीं शताब्दी के पहले दस वर्षों में वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने इस बात पर बल देना आरम्भ किया कि जिस व्यक्ति की सहायता करनी है उसके जीवन के विषय मे पर्याप्त सूचना प्राप्त की जाये। इन सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक एवं वैयक्तिक समस्याओं का सामाजिक निदान बनाया जाये जो उन समस्याओं के कारणों को स्पष्ट करता है। इसी सामाजिक निदान के आधार पर चिकित्सा की योजना बनाई जाये। उस समय चिकित्सा की योजनाएं अधिकतर पर्यावरण के बाहरी परिवर्तन, जीवन सम्बन्धी दशाओं और व्यवसाय से सम्बन्धित परिवर्तन एवं उन्नति से सम्बन्धित होती थीं।

मनोविज्ञान एवं मनोचिकित्सा विज्ञान में जो विकास हुआ उसका प्रभाव समाज कार्य की प्रणालियों एवं अभ्यास पर पड़ा। इन विचारों के प्रभाव से समाज कार्य की रूचि आर्थिक एवं सामाजिक कारकों से हटकर सेवाथ्री की मनोवैज्ञानिक एवं संवेगात्मक समस्याओं की ओर केन्द्रित हुई और उसकी प्रतिक्रियाओं, सम्पेर्र णाओं एवं मनोवृत्तियों को अधिक महत्व दिया जाने लगा। विशेष प्रकार से सिगमन्ड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सम्बन्धी सिद्धांतों ने सामाजिक वैयक्तिक समाज कार्य को प्रभावित किया और वैयक्तिक समाज कार्य में मनोविश्लेषण सम्बन्धी सिद्धान्तों का प्रयोग होने लगा। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दस वर्षों में समाज कार्यकर्ताओं का प्रयोग सामान्य चिकित्सालयों में होने लगा।

इसके पूर्व केवल मानसिक चिकित्सालयों में ही समाज कार्यकर्ताओं का प्रयोग होता था। सामान्य चिकित्सालयों में जो वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता नियुक्त किये जाते थे वे रोगी के रोग के विषय में जानकारी प्राप्त करके और उसकी सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थिति का पता लगाकर चिकित्सक की निदान और चिकित्सा योजना बनाने में सहायता करते थे। इसके अतिरिक्त वे रोगी के परिवार के साधनों और समुदाय, सामाजिक संस्थाओं, नियोक्ताओं एवं मित्रों से सम्बन्धों का भी प्रयोग करते थे जिससे रोगी की चिकित्सा में सहायता मिल सके।

जब द्वितीय महायुद्ध हुआ तो अमेरिकन रेडक्रास ने ऐसे परिवारों की सहायता के लिए जिनके पति युद्ध पर गए हुए थे होम सर्विस डिवीजन्स स्थापित किये। यहां जो परिवार आते थे उन्हें आर्थिक सहायता की उतनी आवश्यकता नहीं होती थी जितनी मनोवैज्ञानिक और संवेगात्मक सहायता की। अत: सहायता के दृष्टिकोण में परिवर्तन की आवश्यकता थी। इसी कारण और भी अधिक समाज कार्यकर्ताओं की रूचि पर्यावरण सम्बन्धी कारकों से हटकर अधिकतर मनोवैज्ञानिक कारकों की ओर हुई।

युद्ध के कारण अनेक प्रकार के मनोविकार सामने आने लगे। विशेषतया ‘‘शेल-शाक’’ से प्रभावित व्यक्ति रोगी बनकर आने लगे। अत: मनोचिकित्सात्मक समाज कार्यकर्ताओं की अधिक आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए पहली बार 1918 में स्मिथ कालेज में साइकिट्रिक सोशल वर्कर्स प्रशिक्षिण दिया जाने लगा। इस समय मनोचिकित्सकों का इतना अभाव था कि मनोविकार की चिकित्सा में मनोचिकित्सात्मक समाज कार्यकर्ताओं को पर्याप्त उत्तरदायित्व दिया जाने लगा और वे सेना के मनोचिकित्सकों से घनिष्ठ सम्पर्क रखते हुए कार्य करने लगे।

फ्रायड के सिद्धान्तों ने यह सिद्ध कर दिया था कि बहुधा मनुष्य का व्यवहार भावनाओं पर आधारित होता है और व्यक्ति को स्वयं अपनी सम्प्रेरणाओं का ज्ञान नहीं होता। इसके अतिरिक्त यह बात भी स्पष्ट हो गई थी कि बाल्यावस्था की घटनाओं का प्रभाव व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण रूप से पड़ता है और बहुत कुछ व्यक्तित्व का विकास प्रारम्भिक जीवन की घटनाओं एवं परिस्थितियों के अनुसार होता है। इन सब सिद्धान्तों से समाज कार्यकर्ताओं को जो नवीन ज्ञान प्राप्त हुआ उसे उन्होंने अपने अभ्यास में प्रकट करने का प्रयत्न किया।

वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने अनुभव किया कि सेवाथ्री के व्यक्तित्व सम्पेर्र णाओं एवं भावनात्मक आवश्यकताओं को समझने के लिये अधिक विस्तृत सूचना प्राप्त करने की आवश्यकता है। इस प्रकार मानवीय व्यवहार की मनोवैज्ञानिक व्याख्या उच्चतर प्रकार से की जाने लगी और आर्थिक समस्याओं का भी अधिक विषयात्मक रूप से मूल्यांकन किया जाने लगा। इसके फलस्वरूप वैयक्तिक समाज कार्य में एक प्रजातांत्रिक दृष्टिकोण का प्रवेश हुआ जिसके अनुसार सेवाथ्री को एक मनुष्य के रूप में देखते हुए उसके वैयक्तिक महत्व एवं मूल्य की प्रतिष्ठा की जाने लगी। वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता सेवाथ्री को उसके वास्तविक रूप में स्वीकृत करने लगे और इस बात का ध्यान रखने लगे कि सेवाथ्री को सूचना देने के लिए बाध्य न किया जाये। आरम्भ में वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने कुछ निष्क्रियता का दृष्टिकोण ग्रहण किया और अधिकतर सेवाथ्री के वर्णन पर ही विश्वास करते रहे परन्तु 1930 के उपरान्त वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने पूर्ण निष्क्रियता एवं पूर्ण अधिकार की परस्पर विरोधी सीमाओं के बीच एक संतुलित स्थान ग्रहण किया। अर्थात् जहाँ आवश्यकता समझी वहां अधिकार का प्रयोग करने में कोई संकोच न किया।

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