ब्रजभाषा का स्वरूप एवं विकास

अनुक्रम
साहित्य समाज का उपजीव्य है और मनुष्यों के समूह से बनता है। ब्रजभाषा काव्य का व्यवस्थित इतिहास अष्टछाप के कवियों से ही प्राप्त होता है इससे पहले यत्र-तत्र स्फुट रचनाएँ तो प्राप्त होती हैं किन्तु प्रामाणिक रूप से ब्रजभाषा की किसी भी रचना या रचनाकार का उल्लेख नहीं प्राप्त होता भाषा की दृष्टि से सूर और परमानन्द से पहले ब्रजभाषा में रचना करने वाले किसी कवि का परिचय इतिहास नहीं देता।

ब्रजभाषा का स्वरूप

ब्रज क्षेत्र के विस्तार से भी अधिक ब्रजभाषा का विस्तार रहा। ब्रजभाषा न केवल क्षेत्र की भाषा बनी रही बल्कि एक समय समस्त उत्तराखण्ड में बंगाल, असम से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र तक उत्तर में पंजाब और सीमान्त प्रदेश तक तथा दक्षिण में विन्ध्य के पार तक ब्रजभाषा का आधिपत्य रहा लम्बे समय तक यह न केवल साहित्य की भाषा ही रही बल्कि शासन की भी भाषा बनी। स्वभावत: ऐसी भाषा के अनेक रूप प्रचलित हो गये थे। ब्रजभाषा का स्वरूप जब जगह कभी एक-सा नहीं रहा। हम यहाँ केवल साहित्यिक ब्रजभाषा के स्वरूप पर विचार करेंगे। स्थान भेद के आधार पर साहित्यिक ब्रजभाषा के तीन रूप या चार रूप बताये जाते हैं। वीरेन्द्रनाथ ने चार रूप माने हैं-
  1. केन्द्रीय ब्रजभाषा
  2. सीमान्त ब्रजभाषा
  3. ब्रजेतर हिन्दी प्रान्तों में प्रयुक्त ब्रजभाषा
  4. हिन्दीतर प्रान्तों प्रयुक्त ब्रजभाषा।
जैसा कि प्राय: सभी भाषाओं के विषय में होता है एक सीमित क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा ही परिनिष्ठित भाषा होती है। उदाहरण के लिए लन्दन की अंग्रेजी या पेरिस की फ्रेन्च या पूना की मराठी या ठाकुर की बंगला शुद्ध मानी जाती रही है। ब्रजभाषा के विषय में भी यह कहा जाता है कि मथुरा के आसपास की ब्रजभाषा केन्द्रीय ब्रजभाषा या परिनिष्ठित ब्रजभाषा है। सीमान्त ब्रजभाषा में ब्रजभाषा क्षेत्र के निकटवर्ती जिले आते हैं। पूर्व में पीलीभीत, फर्रुखाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई, कानपुर आदि जिलों में अवधी के कुछ प्रभाव लिए हुए सीमान्त ब्रजभाषा का एक रूप मिलता है। मैनपुरी, एटा, इटावा, बदायूँ तथा बरेली की भाषा पर यह प्रभाव नहीं है। दक्षिण में भरतपुर, धौलपुर, करौली, पश्चिमी ग्वालियर तथा पूर्वी जयपुर में प्राप्त होने वाली ब्रजभाषा राजस्थानी से प्रभावित है। इसे पिंगल नाम से भी जाना जाता है। इसी प्रकार बुन्देली भी ब्रज की दक्षिणी उपबोली कही जा सकती है। 

इसी प्रकार उत्तरी तथा पश्चिमी सीमान्त प्रदेशों में क्रमश: पहाड़ी एवं खड़ी बोली से प्रभावित सीमान्त ब्रजभाषा का स्वरूप मिलता है। ब्रजेतर हिन्दी प्रान्तों में प्रयुक्त ब्रजभाषा के अन्तर्गत डॉ0 वीरेन्द्रनाथ मिश्र ने अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, बुन्देली, राजस्थानी, खड़ी बोली आदि के क्षेत्रों में रचित ब्रज साहित्य को रखा है, उन्होंने इसे शुद्ध ब्रज क्षेत्र में रचित साहित्य से किसी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं माना है। इसी प्रकार हिन्दीतर प्रान्तों में प्रयुक्त ब्रजभाषा में असम महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, पंजाब आदि प्रदेशों के अनेक कवियों की ब्रज की रचनाएँ रखी गयी हैं। हिन्दीतर प्रान्तों में प्रयुक्त ब्रजभाषा का उसके प्रसार एवं महत्व की दृष्टि से विशेष स्थान है। इस प्रकार ब्रजभाषा के स्वरूप में भी व्यापक परिवर्तन परिलक्षित हुए यह स्वाभाविक भी था। अपभ्रंश काल के साथ ही साथ ब्रजभाषा के निर्माण के लक्षण भी देखे जा सकते हैं। इस प्रकार ब्रजभाषा काल को सं0 1200 के आसपास से प्रारम्भ माना जा सकता है। मोटे तौर पर ब्रजभाषा को चार कालखण्डों में रखा जा सकता है।
  1. संक्रान्तिकालीन ब्रजभाषा (सं0 1200 से 1411 वि0 तक)
  2. प्रारम्भिक ब्रजभाषा (सं0 1411 से 1560 ई0 तक)
  3. मध्यकालीन ब्रजभाषा (सं0 1560 से 1900 वि0 तक)
  4. आधुनिककालीन ब्रजभाषा (सं0 1900 के पश्चात)
डॉ0 अम्बाप्रसाद ‘सुमन’ ने अपनी ब्रजभाषा का उद्गम एवं विकास नामक रचना में संक्रान्ति कालीन ब्रजभाषा के लक्षण हेमचन्द्र व्याकरण ‘1142 ई0’ सन्देश रासक ‘12वीं-13वीं शती ई0 ‘प्राकृत पैंगलम’ ‘1300 -1325 ई 0’ आदि से उदाहरण देकर सिद्ध किये हैं।

डॉ0 शिवप्रसाद सिंह ने अपनी रचना ‘सूरपूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य’ में प्रारम्भिक ब्रजभाषा को अपभं्रश के साहित्यिक रूप के साथ विकसित होते दिखाया है। इसमें न केवल सूरपूर्व के सभी ब्रजभाषा साहित्य को सम्मिलित कर लिया गया है। बल्कि सूरकालीन रचना छीहल बावनी (सं0 1584 ) को भी सम्मिलित कर लिया गया है। इसे न भी सम्मिलित किया जाये तो भी उस युग तक ब्रजभाषा का पर्याप्त विकास देखने के लिए अनेक रचनाएँ हैं। इनमें प्रद्युम्न चरित (1411 वि0) से लेकर बैताल पचीसी (1546 वि0) और छिताई वार्ता (सं0 1550 वि0) प्रमुख हैं। 

डॉ0 वीरेन्द्रनाथ मिश्र के अनुसार- ‘‘उक्त रचनाओं के साथ गोरखपंथी ग्रन्थों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।’’ मध्यकालीन ब्रजभाषा को सूर के प्रादुर्भाव के साथ जोड़ा जा सकता है यह अकबर के दृढ़ प्रतिष्ठित शासन के काल से प्रारम्भ होती है और अत्यन्त परिनिष्ठित एवं प्रांजल रूप को धारण करती हैं। सूरदास के अतिरिक्त अष्टछाप के अन्यकवि और सत्रहवीं शती के देव, घनानन्द, भिखारीदास, पद्माकर, लल्लूलाल आदि की रचनाओं में मध्यकालीन ब्रज अपने चरम उत्कर्ष में देखी जा सकती है। संवत् 1900 वि0 के पश्चात आधुनिक ब्रजभाषा के दर्शन होते हैं। 

प्रारम्भिक रचनाकार लल्लूलाल (सं0 1819 से 1882 वि0) ने ब्रजभाषा को पहले ही अवधी की ओर मोड़ दिया था। यह कार्य पोर्ट विलियम कालेज के अध्यापक जान जिलक्राइस्ट के आदेश पर किया गया था। लल्लूलाल जी की प्रसिद्ध रचना ‘प्रेमसागर’ में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसी प्रकार बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी, लालचन्द्रिका, बिहारी सतसई की टीका भी ख्ड़ी बोली में है जिनमें यत्र तत्र ब्रजभाषा की छाप दिखाई पड़ती है। लल्लूलाल जी जिस संक्रमण युग में हुए थे उसमें भाषा को एक परिवर्तित रूप देना परिस्थिति जन्य अनिवार्यता थी। अनेक लेखकों को फिर इसी साँचे में चलना पड़ा। इसलिए डॉ0 धीरेन्द्र वर्मा ने अपनी रचना ‘ब्रजभाषा’ में भाषा विकास की दृष्टि से परवर्तीकाल की इस ब्रजभाषा को पिछली शताब्दियों के लेखकों की भाषा की नकल कहा है। खड़ी बोली और अंग्रेजी के सम्पर्क से ब्रजभाषा में पर्याप्त परिवर्तन हुआ और धीरे-धीरे उसका स्थान कम से कम शासनतंत्र में खड़ी बोली ने ले लिया। स्वभावत: ब्रजभाषा का प्रयोग कोमल कमनीय भावों की अभिव्यक्ति के लिए केवल काव्य में ही सिमट कर रह गया। बाद में जब अंग्रेजी प्रभाव के कारण मुक्त छन्द ‘ब्लैंकवर्स’ का दौर चल पड़ा तो ब्रजभाषा की काव्य क्षेत्र में भी उपयोगिता घटने लगी क्योंकि छन्द के बन्धन को स्वीकारना कठिन हो गया जो ब्रजभाषा की अनिवार्य शर्त थी। इसका यह अर्थ नहीं है कि ब्रजभाषा का कोई उपयोग नहीं रह गया। आज भी ब्रजभाषा में कोमल, कमनीय, काव्य की रचना बराबर हो रही है। साथ ही ब्रजभाषा ने खड़ी बोली का भी शृंगार अपने हाथों से किया है। खड़ी बोली में मनोरम लय, ताल की सृष्टि करने का कार्य ब्रजभाषा ने किया है। डॉ0 नामवर सिंह ने अपनी रचना ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ में इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। 

आधुनिक काल की ब्रजभाषा अपने गुणधर्मों को समेटे आज भी लज्जाशील नायिका की तरह आगे बढ़ती जा रही है। हाँ उसमें वह स्वच्छन्दता नहीं है जो उसे आधुनिकता का नाम दे सके। पर जब कभी हम अतिस्वच्छन्दता वाद से ऊबते हैं ब्रजभाषा अपनी मधुर अमृत वर्षा से हममें नई शक्ति का संचार करती है। ऐसा एक जीवंत भाषा ही कर सकती है।

ब्रजभाषा का विकास

हिन्दी साहित्य के इतिहास में ब्रजभाषा काव्य की अहम् भूमिका रही है। आदिकाल से लेकर वर्तमान काल के पूर्वार्द्ध तक ब्रजभाषा काव्य की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। प्रमुख रूप से पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल की समग्र काव्य चेतना ब्रजभाषा के ही सुदृढ़ कंधों पर आरूढ़ रही है। इस ब्रजभाषा ने ग्राम्यांचलों की पगडंडियों से लेकर दिव्य प्रसादों के राजमार्गों तक की रचनायात्रा तय की है और हर पड़ाव पर अपने कीर्ति स्तम्भ स्थापित किए हैं।

ब्रजभाषा के विकास का चरम उत्कर्ष हिन्दी साहित्य के मध्यकाल में दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ (वीरगाथाकाल) के साहित्य में भी ब्रजभाषा के बीज मिलते हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि ब्रजभाषा पुरानी सार्वदेशिक काव्यभाषा का विकसित रूप है। ‘पृथ्वीराज रासों में ही इसके रूप का बहुत कुछ आभास मिल जाता है, यथा- ‘‘तिहि रिपुजय पुरहरन को भए प्रथिराज नरिंद।’’  हेमचन्द्र की रचनाओं में अपभ्रंश का जो रूप मिलता है उसमें ब्रजभाषा के बीज वर्तमान है, यथा- ‘‘पिअ काई करऊँ हउँ’’

हिमांचल की बर्फीली घाटियों से लेकर गंगा यमुना के रससिक्त मैदानों से होकर मध्यभारत की सपाट वसुन्धरा को छूकर महाराष्ट्र, बंगाल, दक्षिण के दुर्गम्य प्रदेशों का जो स्पर्श किया है उसे सहज ही विस्मृत नहीं किया जा सकता। ब्रजभाषा वस्तुत: एक प्रांतीय बोली के रूप में उद्भूत हुई और शीघ्र ही समग्र भारत वर्ष में काव्य भाषा के रूप में उसने अपना साम्राज्य अधिस्थापित कर दिया। ब्रजभाषा का मध्यकाल वस्तुत: संस्कृत साहित्य की गौरवमयी बौद्धिक काव्यांग विवेचनाओं पर आधारित था, जिसमें भरत का नाट्यशास्त्र भामह का काव्यालंकार, उद्भट का काव्यालंकार-सार संग्रह था। आनन्दवर्द्धनाचार्य का ध्वन्यालोक, भोज की सरस्वती कंठाभरण, पंडितराज जगन्नाथ का रस गंगाधर, भानुदत्त की रसमंजरी थी। इसी प्रकार संस्कृत की महिमामयी काव्यकृतियों में कालिदास के काव्य ग्रन्थों ने भी इस ब्रजभाषा को प्रभूत रूप में उत्प्रेरित किया। अत: ब्रजभाषा का विकास का परिचय प्राप्त करने के लिए ‘मध्यकाल’ तथा ‘रीतिकाल’ अवलोकनीय है।

मध्यकाल में ब्रजभाषा का विकास-

ब्रजभाषा का विकास मध्यकाल से प्रारम्भ हुआ। तत्कालीन धार्मिक आन्दोलन की जागृति ने ब्रजभाषा को अत्यधिक महत्व प्रदान किया। कृष्ण भक्ति के अधिक प्रचार ने ब्रजभाषा को प्रधानता प्रदान की। 16वीं सदी के प्रारम्भ में सूर ने इसे सर्वप्रथम साहित्यिक रूप प्रदान किया। उस समय तक काव्य भाषा ने ब्रजभाषा का पूरा-पूरा रूप पकड़ लिया था। कृष्ण भक्ति के साथ-साथ ब्रजभाषा समस्त उत्तर भारत में फैल गई। बंगाल में चण्डीदास, गुजरात में नरसी मेहता और महाराष्ट्र में सन्त तुकाराम ने इसी भाषा में काव्य रचना की। कृष्ण भक्ति काव्य का चरमोत्कर्ष महाकवि सूर के साहित्य में देखने को मिलता है इनके द्वारा रचित ग्रन्थों में सूरसागर, साहित्य लहरी, सूर-सारावली में उल्लेखनीय है। सूरसागर तथा सूर-सारावली में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है तथा साहित्य लहरी की रचना शृंगार रस तथा नायिका भेद को दृष्टि में रखकर की गई है। कृष्ण के लोकरंजक स्वरूप को सूर ने अपनी भक्ति का आलम्बन बनाया है। वह सूर के सखा भी हैं, इष्ट देव भी। सूर ने मुख्य रूप से कृष्ण के बाल तथा यौवन पक्षों को अपने काव्य का विषय बनाया है। सूर के पदों में भावों की गम्भीरता तथा संगीत का माधुर्य कूट-कूटकर भरा है। उनमें ब्रजभाषा की प्रौढ़ता दर्शनीय है।

कृष्ण साहित्य के अतिरिक्त ब्रजभाषा का उत्कृष्ट रूप राम-भक्ति साहित्य में भी देखने को मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास, अग्रदास, नामदास आदि रामभक्ति शाखा के कवियों में ब्रजभाषा के दर्शन होते हैं। तुलसी की विनय पत्रिका, गीतावली, कवित्त रामायण आदि ब्रजभाषा की उत्कृष्ट रचनाएँ हैं।

रीतिकाल में ब्रजभाषा का विकास-

मध्यकाल की ब्रजभाषा में पर्याप्त गम्भीरता तथा शक्ति आ गयी थी। रीतिकाल में आकर उसकी प्रांजलता, सौन्दर्य तथा शक्ति अपने चरम रूप में दिखायी दी। रीतिकाल की ब्रजभाषा की प्रमुख विशेषता है उसकी विशुद्धता। बिहारी, देव, मतिराम, केशव, चिन्तामणि, घनानन्द, सेनापति आदि ने इसका ख् ाूब शृंगार किया। भूषण ने उसे वीररस का पुट दिया। सूर के समय तक ब्रजभाषा पूर्ण रूप धारण कर चुकी थी उस पर प्राचीन काव्यभाषा का प्रभाव था। उसमें क्या क्रिया, क्या सर्वनाम, क्या अन्य शब्द सब पर प्राकृत तथा अपभ्रंश का प्रभाव दिखायी पड़ता है। परन्तु घनानन्द तक आते-आते भाषा की शुद्धता पर पुन: ध्यान दिया जाने लगा। इस विशुद्धता को लाने की अगुवाई की घनानन्द ने।

(क) ब्रजभाषा का नामकरण- ब्रजभाषा ब्रज क्षेत्र के आधार पर दिया गया नाम है। आजकल ब्रज शब्द से साधारणतया मथुरा या उसके आस-पास के भू-भाग को समझा जाता है। ब्रजभाषा के अन्य नाम अन्तर्वेदी और ग्वालियरी भी है। किन्तु ये दोनों नाम क्षेत्र की दृष्टि से संकुचित होने के कारण ज्यादा चलन में नहीं हैं। ब्रजभाषा के प्राचीन नाम मध्यदेशी तथा पिंगली भी मिलते हैं। ‘‘‘ब्रज’ शब्द का अर्थ होता है- गोष्ठ या गोस्थली जहाँ पर गो समूह रहता है।’’ वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग पशुओं के समूह, उनके चरने के स्थान, गोचर भूमि और उनके बाड़े के रू प में मिलता है। पुराणों अथवा पुरावृत्तों में कहीं-कहीं स्थान के अर्थ में ब्रज शब्द का प्रयोग सम्भवत: गोकुल के लिये आया है। ब्रज का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद संहिता में मिलता है हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, महापुराण, बाराह पुराण आदि में भी ब्रज शब्द मथुरा के निकटस्थ नन्द के ब्रज में प्रयुक्त हुआ है। प्राचीनकाल में ब्रज क्षेत्र के लोग गोचारण करते थे। गायों को चराने हेतु राजस्थान के घने जंगलों में यायावर वृत्थि को धारण करते थे इसी कारण इनकी संस्कृति ज्ञान प्रधान थी। इस प्रकार इस क्षेत्र की भाषा को ब्रजभाषा कहा जाता है। ब्रजभाषा मुख्यत: मथुरा, आगरा और अलीगढ़ की भाषा है। प्राचीनकाल में ही शूरसेन जनपद के नाम से प्रसिद्ध था जिसकी राजधारी मथुरा नगरी थी। लोकोक्तियों के आधार पर ब्रजभाषा को 84 कोस तक विस्तृत माना गया है और उसकी सीमाएँ निर्धारित की गयी हैं। ‘‘इत बरहद उत सोनहद। उत सूरसेन का गाँव।। ब्रज चौरासी कोस में। मथुरा मण्डल धाम।।’’

इस दोहे को आधार बनाकर एफ0एस0 ग्राउस ने ब्रजमण्डल की सीमा को स्पष्ट करते हुए कहा है- ‘‘ब्रजमण्डल के एक ओर की सीमा ‘वरस्थान’ है और दूसरी ओर सोन नदी और तीसरी ओर सूरसेन का गाँव है ‘वर’ अलीगढ़ जिले का वरहद स्थान है सोननदी की सीमा गुड़गाँव जिले तक जाती है। सूरसेन ग्राम यमुना तट पर बसा हुआ आगरा जनपद का बटेश्वर गाँव है।’’ सूरदास ने चौरासी कोस वाले ब्रज का उल्लेख किया है- 

‘‘चौरासी ब्रज कोस निरन्तर, खेलत है बलमोहन। 
सामवेद रिगवेदयजुर में, कहे उच्चरित ब्रजमोहन।।’’ 

ब्रज और भाषा दोनों का ही विशेष महत्व प्राप्त है ब्रज जहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण चन्द्र की अवतार एवं लीला स्थली है वहीं ब्रजभाषा को बल्लभ सम्प्रदाय ने पुरुषोत्तम भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। बल्लभाचार्य ने अष्टछाप के प्रथम चार कवियों को नियुक्त किया था और तभी से ब्रजभाषा काव्य सृजन की विविधवत प्रतिष्ठा हुई थी। भाषा की दृष्टि से सूर और परमानन्द से पहले ब्रजभाषा में रचना करने वाले किसी कवि का परिचय इतिहास नहीं देता। इस प्रकार अष्टछाप का प्रथम वर्ग ही ब्रजभाषा का आदि कवि वर्ग है और उससे भी अधिक श्रेय सूर को है। ब्रजभाषा के नाम के साथ जुड़ा हुआ ‘भाषा’ शब्द इसके अतीत के गौरव का परिचालक है। माधुर्य एवं समासोक्ति की दृष्टि से यह भाषा हिन्दी में सर्वोत्कृष्ट है तथा मध्य प्रदेश में विकसित होने के कारण इसमें संस्कृत एवं प्राकृत की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्रकट हुयी हैं। वस्तुत: महान प्रभु बल्लभाचार्य तथा उनके पुत्र गोस्वामी बिट्ठल नाथ जी के द्वारा स्थापित अष्टछाप के आठ कवियों के द्वारा ही ब्रजभाषा कवियों के व्यवस्थित विवरणात्मक इतिहास का श्री गणेश हुआ था। अष्टछाप के कवियों की संगीतिक पद रचनाओं के अनुरूप ही इनके परवर्ती कवियों ने काव्य रचनाएं की जिनमें हित हरिवंश, मीराबाई, तुलसीदास, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास व्यास, रसखान, धु्रवदास, सूरदास, मदनमोहन, कबीरदास तथा निर्गुण धारा के अनेक संत कवियों ने इसी गेयपद शैली को अपनी रचना का माध्यम बनाया। इस काल में सगुण भक्ति धारा के कृष्णोपासक कवियों ने तो ब्रजभाषा का अवलम्बन ग्रहण ही किया था किन्तु रामोपासक कवियों ने भी ब्रजभाषा का सहारा लिया।

(ख) ब्रजभाषा बोली के रूप में- ब्रजभाषा उत्तर प्रदेश की प्रमुख बोली है। यह पश्चिमी हिन्दी के अन्तर्गत परिगणित एक विभाषा या बोली है। इसकी उत्पत्ति शौरसैनी प्राकृत से हुई है। ब्रजभाषा ब्रज मण्डल की बोली है किन्तु ब्रज बोली मात्र बोली ही नहीं थी मध्यकाल में ब्रजभाषा हिन्दी का पर्याय बन गयी थी आज जो वैशिष्ट्य ख् ाड़ी बोली का है वही उस युग में ब्रजभाषा का था। अत: किसी भाषा के परिष्कार हेतु जितने प्रयास किये जाते हैं वे सब ब्रजभाषा के साथ भी हुये और इसके परिणामस्वरूप इसे भाषा का गौरव मिला। यह हिन्दी की एक बोली ही रही है। जनचेतना की अनुरक्ति ने अपनी बोलियों के लिये ‘भाषा’ या ‘भाखा’ नाम दिया। भाषा या भाखा का विभाजन संस्कृति से अलगाव के लिये किया गया जो इस समय बोला जाता था उसे भाखा और पूर्व की भाषा को संस्कृत कहा जाता रहा। चूँकि उस युग में भाषा की व्याप्ति केवल धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना तक थी तथा राष्ट्रीयता की भावना का अर्थ सांस्कृतिक एवं धार्मिक मूल्यों के प्रति आस्था मात्र माना जाता था। इसलिये उस युग में संस्कृत और भाखा दो रूपों का प्रयोग हुआ।

इस प्रकार इस युग तक भाखा का आशय संस्कृति से भिन्न इतर भाषा थी। सम्भवत: जिसे मुस्लिमों द्वारा हिन्दी या हिन्दवी कहा जाता था उसे ही भारतीयों द्वारा भाखा कहा जाता था। इसके अतिरिक्त साधुओं की रचनाओं में भी ब्रजभाषा बोली के अनेक रूप मिलते हैं। ‘‘सन्तों की सधुक्कड़ी भाषा पर ब्रजभाषा का पर्याप्त प्रभाव दिखाई पड़ता है।’’ कालान्तर में जहाँ अन्य बोलियों का साहित्य दब गया और ब्रजभाषा को साहित्यिक भाषा मान लिया गया। यहीं से ब्रजी को भाषा या बोली का गौरव मिला और तुलसी के बाद भाखा या भाषा का प्रयोग ब्रजभाषा के लिये किया जाने लगा। इस प्रकार कबीर से तुलसी तक भाखा या भाषा का आशय केवल हिन्दी भाषा अथवा देशी बोलियाँ थी यथा- ‘‘संसकीरत कूप जल, भाखा बहुता नीर।’’ --- कबीर का भाखा का संस्कृत भाव चाहिये सांच। ---तुलसी
ताही तैं यह कथा यथामति भाषा कीनी नन्ददास।’’

ब्रजभाषा का यह स्वरूप 11वीं शती से ही निर्धारित होने लगा था ब्रजभाषा ब्रजमण्डल की बोली है। इसे भाखा, मध्यदेशी, अन्तर्वेदी, ग्वालियरी पिंगल नामों से पुकारा जाता है। इसका क्षेत्रफल 27 हजार वर्ग मील है तथा बोलने वालों की संख्या एक करोड़ से ऊपर है।

‘‘ब्रजभाषा ललित कलित कृष्ण की बोलि।
या ब्रजमण्डल में दुर्गा, ताकी घर घर केलि।।
यहीं से चहुँ दिसि विस्तरी, पूरब पश्चिम देश। 
उत्तर दछिन लों गई, ताकी छटा विसेस।।’’ 

ब्रजभाषा का तो श्रीकृष्ण लीला के साथ इतना तादात्म्य हो गया है कि उनके लीला गान से भी पृथक इसका अपना अस्तित्व है। इस बात का ज्ञान केवल इने गिने लोगों को होगा। ब्रजभाषा की बातें करते ही तुरन्त सबके मन में- ‘‘मैया मैं नहि माखन खायौ’’

प्रतिध्वनित होने लगता है। मालूम नहीं पड़ता है कि किसी अन्य बोली का भी किसी महाविभूति की जीवन लीला में इतना तादात्म्य है ऐसा गौरव ब्रजभााा को ही प्राप्त है। इससे स्पष्ट है कि सल्तनत काल तक ब्रजभाषा बोली के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। मध्यकालीन में हिन्दी का प्रतिनिधित्व साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से ब्रजभाषा करती थी और राजकार्य में हिन्दुस्तानी जनता के लिये बादशाह की ओर से जो आज्ञा पत्र जारी किये जाते थे वे ब्रजभाषा में होते थे इसमें राज कार्य की बात तो विशेष उल्लेखनीय नहीं है क्योंकि ब्रजभाषा के सन्दर्भ में इसके प्रमाण कम मिलते हैं। मध्यकाल में ब्रजभाषा का स्वरूप केवल साहित्य के क्षेत्र में निर्मित हो रहा था। यही कारण है कि भक्तिकाल के पश्चात उत्तर मध्यकाल तक ‘भाषा’ या ‘भाखा’ का अर्थ ब्रजभाषा के रूप में रूढ़ हो गया और प्राय: सभी परवर्ती कवियों ने इसे बोली से भाषा के रूप में मान्यता दे दी और यदि सही अर्थों में कहा जाये तो जिसे हिन्दी कहा जाता है उसका सार्वदेशिक स्वरूप उत्तर मध्यकाल में ब्रजभाषा के साहित्यिक रूप में ही निखरा। इस प्रकार ब्रजभाषा का प्रभाव भारत विशेषकर उत्तर भारत वर्ष की समस्त बोली तथा भाषाओं पर पड़ा।

(ग) ब्रजभाषा और खड़ी बोली में अन्तर- खड़ी बोली- हिन्दी का विकास संस्कृति, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश से होता हुआ खड़ी बोली के मानक रूप में अब स्वीकृत हुआ है। बोली के रूप में खड़ी नाम का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1800 में लल्लू लाल ने किया था इसके अतिरिक्त सदल मिश्र ने खड़ी बोली नाम का प्रयोग इसी अर्थ में किया खड़ी बोली में मूर्धन्य ध्वनियों की अधिकता हैं इन कड़ी ध्वनियों के कारण इसका खड़ी नाम पड़ा। ब्रजभाषा और अवधी में कड़ापन अधिक होने के कारण उन्हें पड़ी (गिरी हुई) बोली कहा जाने लगा था। इसलिये इस भाषा को खड़ी बोली कहा गया कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इसे फोर्ट विलियम में ब्रज और बाँगरू की टेक देकर खड़ा किया गया इसलिए इसका नाम खड़ी बोली हुआ।

इस बोली के नामकरण के सन्दर्भ में एक जनश्रुति यह प्रचलित है कि मुहम्मद तुगलक ने गैर हिन्दोस्तानी गुलामों को निकालने के लिए ‘खड़ी’ शब्द का उच्चारण कराते हुए गुलामों का परीक्षण किया। चूँकि पूर्व बंगाल, कश्मीर तथा पठानी खड़ी शब्द ‘क’, ‘ख’ और ‘ड़’ का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते थे इसलिए वे गैर देहलवी माने गये हैं। गुलामों की श्रेणी में नहीं माने गये।

हिन्दी का नाम खड़ी कैसे पड़ा इस पर विद्वान एकमत नहीं हैं (ब्रजभाषा) की अपेक्षा यह बोली वास्तव में खड़ी सी लगती है, कदाचित इसी कारण इसका नाम खड़ी बोली पड़ा।’’ यह सही है कि ब्रजभाषा की सी कोमलता और मधुरता इसमें नहीं है उसकी तुलना में यह खड़ी-खड़ी लगती है।’’

ब्रजभाषा- हिन्दी पद्य साहित्य में ब्रजभाषा का महत्व सर्वमान्य है। साहित्यिक दृष्टि से ब्रजभाषा को काव्य क्षेत्र में महत्व प्रदान किया गया है। जब खड़ी बोली काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी तक भी ब्रजभाषा में काव्य रचना हो रही थी। ब्रजभाषा में लड़िका एकवचन और बहुवचन दोनों रूप में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार ‘घर’ शब्द ‘घरु’ ही है। खड़ी बोली के बिगड़े हुये रूप ही ब्रजभाषा में आते हैं। ब्रजभाषा में हिन्दी के समान ही विशेषणों में लिंग और वचन के अनुसार मूल और तिर्यक रूप में कोई अन्तर नहीं होता। उदाहरण में ब्रजभाषा और खड़ी बोली में अन्तर स्पष्ट हो जाता है।
  1. खड़ी बोली में जहाँ ‘ए’ ‘ओ’ पाया जाता है। ब्रजभाषा में ‘ऐ’ और ‘ओ’ मूलस्वरों की अपेक्षा कम विवृत हैं।
  2. खड़ी बोली के शब्द के अन्त में जहाँ पर ‘आ’ मिलता है, ब्रजभाषा में उसके स्थान पर ‘ओ’ मिलता है।
  3. छोटी बहन की नन्द की सास बीमार है (छोट्टी बाहण की नन्द की सासू बिजार है)
  4. लाला तुमने धन के लिए बेटे को घर से निकाल दिया (लाल्ला तमनै बेट्टे कूँ धण के खात्तर घरों से काढ़ दिया।

ब्रजभाषा की उपबोलियां

सामान्यत: बोली और भाषा का अर्थ एक ही होता है। ब्रजभाषा या ब्रजबोली, खड़ी बोली या भाषा कहने से कोई अन्तर नहीं आता है, क्योंकि एक भाषा की अनेक बोलियाँ हो सकती हैं। उसी प्रकार ब्रजभाषा की भी उपबोलियाँ हैं, क्योंकि सामान्यत: भाषा का परिवर्तन थोड़ी-थोड़ी दूर पर होता है। ‘‘कोस-कोस पर बदले पानी। दो कोस पर बानी।’’

(क) कन्नौजी-

गंगा किनारे स्थित फर्रुखाबाद जिले में कन्नौज नामक नगर वर्तमान है। ‘कन्नौज’ शब्द ‘कान्यकुब्ज’ का तद्भव है। इसका प्राचीन नाम पांचाल देश भी मिलता है। रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है। प्राचीन युग में कान्यकुब्ज प्रदेश की प्रतिष्ठा इतनी अधिक बढ़ी कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य जातियों ने अपने नाम के साथ इसे लगाने में अपना गौरव माना। कन्नौजी का नामकरण इसी कन्नौज नगर के नाम के आधार पर हुआ। महाभारत काल में उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पांचाल की राजधानी का नाम काम्पिल था।

क्षेत्र- कन्नौजी बोली का क्षेत्र ब्रजभाषा तथा अवधी के बीच का है। फर्रुखाबाद कन्नौजी का केन्द्र है किन्तु उत्तर भारत में यह हरदोई, शाहजहाँपुर तथा पीलीभीत तक और दक्षिण में इटावा तथा कानपुर के पश्चिम भाग में बोली जाती है। कन्नौजी बोलने वालों की संख्या लगभग 45 लाख है। 

साहित्य- हरदोई, कानपुर और कन्नौज (फर्रुखाबाद) साहित्य और संस्कृति के प्रमुख स्थल रहे हैं, परन्तु यहाँ के साहित्यकार भाषा का सामान्य और व्यापक रूप अपनाते रहे हैं। कन्नौजी का लोक साहित्य ही प्राप्त होता है।

व्याकरण- कन्नौजी में स्त्रीलिंग ब्रजभाषा की ही तरह बनते हैं। सहुआइन, पण्डिताइन, मेहरिया, बकरिया इत्यादि। कन्नौजी में ‘ण’ व्यंजना का प्रयोग नहीं होता है। ‘ड़’ और ‘ल’ की अपेक्षा दोनों व्यंजनों के स्थान पर ‘र’ का उच्चारण होता है- भीर (भीड़), उजारो (उजाला), कारो (काला) इत्यादि। व्यंजन संयोग की प्रवृत्ति अधिकता से मिलती है। उदाहरण- असाढ़ को महीना लगो। सब किसानन की खेत बउन की साइत लगी।

एक किसान की साइत नाहीं परी। उसकी महरुआ कहन लगी कि सब किसान ख् ोत जोतन बउन गए तुह हर कौ घरै में धरैहो।

(आसाढ़ मास लगा। सभी किसानों के खेत बोने का मुहूर्त (साइत) हो गयी। एक किसान का मुहूर्त नहीं बना। उसकी औरत कहने लगी कि सभी किसान खेत जोतने बोने गये और तुम्हारा हल घर पर ही रखा है।)

(ख) बुन्देलखण्डी-

बुन्देल खण्ड भारत का वह भू-भाग है जिसे उत्तर से यमुना, दक्षिण से नर्मदा, पूर्व से तमसा तथा पश्चिम से चम्बल घेरे हुए है। बुन्देला राजपूतों का प्रदेश होने के कारण इस क्षेत्र को बुन्देलखण्ड और यहाँ की भाषा को बुन्देलखण्डी कहते हैं। 

क्षेत्र- 14 वीं शताब्दी के आरम्भ से यहाँ बुन्देला राजाओं का राज्य रहा है। यद्यपि इस क्षेत्र की सीमाएँ घटती बढ़ती रही हैं फिर भी यह उक्ति भी बुन्देल की सीमाओं को स्पष्ट करती हैं- ‘‘यमुना उत्तर और नर्मदा दक्षिण अंचल। पूर्व ओर है टौंस, पश्चिमांचल में चंबल।।’’ 

आगरा, मैनपुरी तथा इटावा के दक्षिण में भी इसका प्रयोग होता है। दक्षिण बुन्देलखण्ड की सीमा से बहुत आगे तक बुन्देली का प्रयोग होता है। पूर्व में हिन्दी की बघेली बोली, उत्तर पश्चिम की ओर ब्रजभाषा, दक्षिण की ओर मराठी भाषा तथा दक्षिण पश्चिम की ओर राजस्थानी की विभिन्न बोलियाँ, जिसमें मालवी मुख्य है।

साहित्य- ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी के महाकवि तुलसीदास केशवदास, बिहारी, मतिराम, पùाकर आदि की जन्मभूमि बुन्देलखण्ड ही है। तथाकथित ब्रजभाषा साहित्य वास्तव में बुन्देली का ही साहित्य है लोक साहित्य की दृष्टि से भी बुन्देली एक सम्पन्न भाषा है। व्याकरण- संज्ञा पुल्लिंग में या स्त्रीलिंग में इया प्रत्यय का प्रयोग होता है- बिटिया, बेटवा, मलिनिया, चकिया, बैलबा आदि। व्यंजनों में ‘ड़’ का उच्चारण ‘र’ में परिवर्तित हो जाता है घुड़वा (घुरवा)

उदाहरण- कछु दिना पैले की बात है, एक चलतौ-फिरतौ आदमी एक राजा के दरबार में पाचौ। मुजरा कर चाकरी के लाने विनती करी।

(कुछ दिनों पहले की बात है एक चालाक आदमी एक राजा के दरबार में पहुँचा। सलाम करके नौकरी के लिये उसने विनती की)

(ग) राजस्थानी-

पंजाब के ठीक दक्षिण में राजस्थानी भाषा का क्षेत्र है। राजस्थानी भाषा का प्राचीन काल से ही मध्यदेश से अत्यन्त निकट का सम्बन्ध है। यही कारण है कि इस पर मध्यदेश की शौरसेनी का प्रभाव है। अपनी उपभाषाओं सहित राजस्थानी को बोलने वालों की संख्या लगभग 2 करोड़ है। इसकी उपबोलियों में पश्चिमी राजस्थानी है। इसे मारवाड़ी भी कहते हैं इसका क्षेत्र जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और उदयपुर है। इसी के अन्तर्गत मेवाड़ी और शेखावटी भी है। इसको बोलने वाले लगभग 60 लाख हैं। पूर्वी मध्य राजस्थानी का क्षेत्र जयपुर कोटा और बूंदी है। इसके अन्तर्गत जयपुरी तथा उसकी विभिन्न शैलियाँ जैसे अजमेरी और हाड़ौटी है। इसके बोलने वाले 50 लाख के लगभग हैं, उत्तरी पूर्वी राजस्थानी के अन्तर्गत मेवाड़ी और अहीरवाटी बोलियाँ आती हैं। इसका प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग 25 लाख हैं ‘‘इन उपभाषाओं के प्रयोग के क्षेत्र में हिन्दी भाषा ही साहित्यिक भाषा है। निज के व्यवहार में राजस्थानी उपभाषायें महाजनी लिपि में लिखी जाती हैं। छपाई में देवनागरी लिपि का व्यवहार होता है।’’

ब्रजभाषा की आधुनिक सीमा

ब्रजभाषा की प्राचीन सीमाएँ ब्रज और उसके आस-पास तक सीमित थी। कुछ कवियों ने रीतिकाल में ही इस सीमा का विस्तारण किया और भिखारीदास जैसे कवियों ने ब्रजभाषा में लिखा, जो मूलत: प्रतापगढ़ जिले के निवासी थे उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा- ‘‘ब्रजकाव्य हेतु ब्रजवास को न मानियो।’’

वास्तव में ब्रजभाषा सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ी और जहाँ-जहाँ हिन्दी में कृष्ण काव्य लिखा गया उसमें अवधी नगण्य हो गयी और ब्रजभाषा प्रमुखत: से स्थान पायी। इस तरह से कृष्ण काव्य के साथ-साथ ब्रजभाषा का प्रभाव चतुर्दिक फैला जहाँ तक ब्रजभाषा के आधुनिक सीमा की बात है, तो ब्रजभाषा का स्वरूप वैश्विक रूप से परिलक्षित होता है। विश्व में जहाँ-जहाँ भी ब्रज क्षेत्र के लोग गये वहाँ-वहाँ पर ब्रजभाषा अपनी संस्कृति के साथ में पहुँच गयी। यद्यपि अवधी और भोजपुरी के मुकाबले में इसका स्थान मजबूती के साथ नहीं बन पाया लेकिन विदेशों में रहने वाले ब्रजभाषा भाषी अपनी संस्कृति के साथ अपनी भाषा को जीवन्त करने में जुटे हैं यह प्रसन्नता का विषय है कि कृष्ण और राधा की महत्ता पूरे संसार में है। इसलिये ब्रजभाषा की व्यापकता भी पूरे संसार में मानी जानी चाहिये। खड़ी बोली के युग में भी ब्रजभाषा अपना अस्तित्व बनाये हुये है और आज भी भारत में सवैया और घनाक्षरी छन्दों की प्रिय भाषा है।

ब्रजभाषा के आधुनिक स्वरूप का विकास

हिन्दी साहित्य के इतिहासमें आधुनिक युग का प्रारम्भ संवत् 1900 से माना गया है। भले ही आधुनिक काल के प्रारम्भ से ही खड़ी बोली की चमकदमक ने नवरचनाकारों के मस्तिष्क पर अपना विषद प्रभाव आरोपित कर रखा था किन्तु फिर भी ब्रजभाषा रचना के लालित्य ने अपनी दीर्घजीवी सत्ता के व्यामोह को एक झटके से नहीं तोड़ दिया। हिन्दी का आधुनिक युग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ होता है। भारतेन्दु जी इस युग के प्रवर्तक थे। भारतेन्दु जी द्वारा किये गये जन-जागरण से उत्तर भारत में नवजीवन का संचार हुआ और जनता को प्रेरणा हुई। आधुनिक युग की कविताओं में जनता की भावनाओं का चित्रण पर्याप्त मात्रा में मिलता है। इसलिए उसमें नवजीवन की समस्याओं का प्रवेश और यथार्थ की अनुभूति की व्यंजना हुई। सामान्य जन-जीवन काव्य का विषय बना। आधुनिक युग का कवि जन-जीवन को लेकर चलता है। यही वास्तविकता समस्त आधुनिक युग की कविता का प्राण है। आधुनिक युग के वादों का बाहुल्य भी एक असामान्य घटना है।

आधुनिक युग में ब्रजभाषा कवियों ने परंपरित एवं युगीन दोनों ही विचारों से संलग्न कविताएँ की हैं। ब्रजभाषा के बहुत से कवियों ने आज के वैविध्यपूर्ण विषयों को अनेक प्रकार से संवेद्य स्वरों में व्यक्त किया है।

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