भारत में क्षेत्रवाद की उत्पत्ति के कारण

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क्षेत्रवाद के अर्थ में हम कह सकते हैं कि एक देश में या देश के किसी भाग में निवास करने वाला, लोगों के छोटे समूह से है जो आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिए जागरूक हो। साधारण से अर्थ में क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र के लोगों की उस भावना व प्रयत्नों से है जिनके द्वारा वे अपने क्षेत्र विशेष के लिए आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक हितों में वृद्धि चाहते हैं।

भारत में क्षेत्रवाद की उत्पत्ति के कारण

भारतवर्ष ऐसा देश है जहाँ पर भिन्न-भिन्न धर्मों व जातियों के लोग निवास कर रहे हैं। जिनकी अपनी-अपनी अलग-अलग भाषाएँ हैं। यहाँ रहने वाले समुदाय भिन्न -भिन्न जातियों व उपजातियों से जुड़े हैं जिनके कारण इन्होंने भिन्न-भिन्न क्षेत्र स्थापित कर लिये हैं। ये सभी अपने- अपने क्षेत्र का आर्थिक विकास चाहते हैं। उदाहरण हेतु - पश्चिम बंगाल, पंजाब, जम्मू व कश्मीर, मिजोरम, इन सभी राज्यों में भिन्न-भिन्न समुदायों से जुड़े लोग रह रहे हैं जो अपने विशेष क्षेत्र का विकास बनाए रखना पसन्द करते हैं।

(1) भाषा का आधार :- हम भाषा के आधार पर भी कुछ क्षेत्रों का वर्गीकरण कर सकते हैं। इसमें भिन्न-भिन्न नस्लों तथा धर्मों और अनेक भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले लोग अपनी-अपनी पृथक-पृथक सस्ं कृति बनाए रखने के लिए और अपने आर्थिक व राजनैतिक हितों की रक्षा करने के लिए, दूसरे धर्मों तथा अन्य भाषा बोलने वाले लोगों का उन क्षेत्रों में निवास का विरोध करते हैं। भारत में भाषा के कारण कई समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। पहले भाषा सम्बन्धित मुद्दों का हल आम सहमति से किया जाता था। किन्तु संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और जंनसघ तथा द्रविड़ मुनेत्र कडगम आदि दलों ने परस्पर विरोधी कट्टर दृष्टिकोण के कारण भाषा समस्या राष्ट्रीय एकता के लिए गम्भीर प्रश्न बन गयी है तथा क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रही है। भारत देश विविध भाषाओं का देश है। यहां उत्तर व दक्षिणी की भाषा हमेशा से भिन्न रही हैं। भाषा के मुद्दे पर देश में हमेशा से राजनैतिक आन्दोलन व मुद्दे अहम भूमिका में रहे हैं। 

यही राजनीतिक मुद्दे धीरे-धीरे क्षेत्रवाद की राजनीतिक प्रकाश्ठा की चरम सीमा पर पहुंचे हैं, इसका स्पष्ट प्रभाव सन् 1952 में तेलगूभाषी आन्दोलन में दिखाई पड़ा। इसमें मुख्य भूमिका वहां के स्थानीय नेता पोटो श्रीरामलू की रही। इसमें उनके अनशन के समय मृत्यु हो जाने के उपरान्त बड़ा ही राजनीतिक ड्रामा उत्पन्न हुआ जिसके परिणाम में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू भी भाषा के आधार पर नरम रुख अपनाने पर मजबूर हुए और बाद में तेलगूभाषी राज्य की मांग पर सरकार झुक गई। तब से लेकर भाषा के आधार पर राज्यों की अनेक मांगे बढ़ने लगी। इन सभी राज्यों की मांगों की जांच करने हेतू वर्श 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इसके बाद सन् 1960 के दषक में आन्ध्र प्रदेश के निर्माण की भांति बम्बई को गुजरात और महाराश्ट्र के रूप में विभाजित किया गया, तो ठीक इसी प्रकार से सन् 1966 में पंजाब को भाषा के आधार पर बांटा गया। सन् 1972 में असम में बंगाली और असमी भाषा पर वाद-विवाद हुआ। इस प्रकार से भाषाई मुद्दे भी क्षेत्रवाद में अहम रहे हैं। आगे ‘क्षेत्रवाद’ से जुड ़े कारणों का वर्णन है, जो इसको बढ़ाने में अहम भूमिका अदा करते हैं।

(2) भौगोलिक कारण :- भारत दुनिया के देशों में सातवां सबसे बड़ा देश है, जिसका अपना विशाल भू-भाग और क्षेत्रफल है। यहाँ की अनेक प्राकृतिक भिन्नताएँ हैं, जहाँ 10.7 प्रतिषत भाग में बड-़े बड़ े पर्वत, 18.6 प्रतिषत भाग में पहाड़ियाँ, 27.7 प्रतिशत हिस्से में पठार, 43 प्रतिषत भाग में मैदान हैं। भारत में भौगोलिक वातावरण के और भी प्रमुख तत्त्व हैं जैसे धरातल, जलवायु, वनस्पति, मिट्टी आदि में भी भिन्नताएँ हैं। हर राज्य में वहाँ की प्राकृतिक भिन्नता के कारण अपना अलग विशेष दर्जा प्राप्त हो रहा है। बड़े राज्य हैं जैसे उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान। इनमें भी कई छोटे-छोटे राज्य बन सकते हैं। यदि राजस्थान में मेवाड़ और मारवाड़ के क्षेत्र आदि को अलग राज्य बनाया जाए तो वे केरल, नागालैंड से बड ़े राज्य ही बनेंगे। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ, झारखण्ड व उत्तराखण्ड का निर्माण इसी का परिणाम रहा है। अत: हम कह सकते हैं कि भौगोलिक कारणों से भी क्षेत्रवाद बढ़ा है। 

(3) क्षेत्रवाद की उत्पत्ति में सहायक सांस्कृतिक कारण :- भारत एक अखण्ड भौगोलिक इकाई रहा है। भारत में अनेक विविधता होते हुए भी मूल रूप में भारतीय संस्कृति इसे एकता प्रदान करती है। इन संस्कृतियों के आपसी सम्पर्क तथा आदान-प्रदान ने देश में सांस्कृतिक विलयन को जन्म दिया है। इसी विलयन के कारण देश में एकता स्थापित है। 

प्राचीन काल में समस्त भारत में बौद्धिक सभ्यता का विस्तार था। संस्कृत तथा फारसी भाषा के माध्यम से देश के विभिन्न वर्गों में एक सांस्कृतिक एकता प्रदान की है। भारत में हिन्दू तथा इस्लाम धर्म की विविध परम्पराएँ एक-दूसरे से गूथंकर भारतीय संस्कृति को विशिष्ट संस्कृति बना देते हैं। भारत में कुछ क्षेत्र एसे े भी हैं जो स्वयं को पूरा देश में “ाुद्धिकरण से जोड़ते हैं, जैसे तमिलनाडू संस्कृति व भाषा। सन् 1975 में यहां हिन्दू धर्म में उच्च स्थान रखने वाले ‘रामायण’ ग्रन्थ का अपमान किया और हिन्दू देवी-देवताओं का निरादर किया। इसी के साथ अपनी तमिल सस्ं कृति पर गर्व किया। इसके साथ ही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने भारतीय सघं से अलग राज्य निर्माण की मांग उठाई।

(4) क्षेत्रवाद की उत्पत्ति में आर्थिक कारण :- भारत में हर वर्ष नई-नई परियोजनाएँ हर राज्यों में लागू होती हैं। कहीं उनका सही ढंग से प्रयोग नहीं हो पाता तो कहीं पर भ्रष्टाचार का शिकार बन जाती है, तो कई राज्यों में प्रशासन की कमी के कारण यह लागू नहीं हो पाती है, लेकिन आज भी हमारा देश आर्थिक ससांधनों में मजबूत नहीं हुआ है, परन्तु कई राज्य देश में ऐसे भी हैं जिनका आर्थिक विकास के नाम पर अलग गठन हुआ, तो इनका विकास हो गया जैसे - हरियाणा, और कुछ ऐसे भी हैं, जिनका राजनैतिक सचांलन ठीक नहीं हो पाया, लेकिन आज भी आर्थिक ससांधनों के संदर्भ में अहम् भूमिका अदा करता है जैसे झारखंड राज्य, बिहार और उत्तर प्रदेश। 

(5) राजनीतिक कारण :- राजनीतिक नेताओं और उनके दलों के माध्यम से भी क्षेत्रवाद का विस्तार हुआ है। इन नेताओं ने पृथक-पृथक राज्यों को मुद्दा बनाकर स्वयं की राजनैतिक इच्छाओं को परू ा किया है, कुछ नेता ऐसे भी रहे जो कांग्रेस में रह कर अपने स्वार्थों को पूर्ण रूप से सिद्ध न होने पर क्षेत्रीय राजनीति की शुरुआत कर दी। क्षेत्रीय राजनीति के उदाहरण के रूप में तमिलनाडू में डी.एम.के., व ए.आई.डीएम.के, आन्ध्रप्रदेश में तेलूगुदेशम, पंजाब में अकाली दल, शिव सेना महाराष्ट्र और नैशनल कान्फ्रेंस जम्मू और कश्मीर मे।ं यहाँ के स्थानीय नेताओं की अपनी महत्त्वाकांक्षा ने क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया। 

(6) जाति सम्बन्धी कारण :- भारतीय राज्यों में अकसर देखा जाता है कि जहां-जहां किसी एक जाति का प्रभाव या दबदबा बना, उसी क्षेत्र में क्षेत्रवाद ऊपर उठा। इसलिए जाति का स्वरूप क्षेत्रवाद बढ़ाने का अहम् कारण बना। हालांकि जाति व्यवस्था क्षेत्रवाद के लिए ज्यादा महत्वपण्ूर् ा तत्व नहीं है जहां आर्थिक हितों जैसे महाराष्ट्र में मराठा जाति, तमिल - तमिलनाडू, पंजाब में सिक्ख धर्म व विशेष जाट जाति आदि ने क्षेत्रवाद की भावना को बहुत बढ़ाया है। क्या ये सभी जातियां भारत में भारतीय संस्कृति की धारा से जुड सकती हैं? जैसे उतर-पवूर् में मिजो जाति (आदिम जातियां) का इलाका। कुछ क्षेत्रों में जहां संतोष है जैसे बिहार में छोटा नागपुर तथा मध्यप्रदेश में आदिवासी इलाके और गुजरात, उड़ीसा में आदिवासियों का स्वायत्ता आन्दोलन। वैसे भारतीय राजनीति में जातिवाद ने हमेशा क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया है। यहां जातियों का ज्यादा प्रभाव ग्रामीण, जनपदीय, क्षेत्रीय और प्रान्तीय स्तरों पर अधिक रूप से देखा जाता है। जाति वह बधंन है जिसका प्रयोग राजनीति में हमेशा परिस्थितियों अनुसार होता रहा है। राजनेता हमेशा सत्ता प्राप्ति हेतु जातीय संगठनों को मजबतू ी से खड़ा करते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जातिवाद ने भी क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया है।

(7) धार्मिक कारण :- महाराष्ट्र में शिव सेना, जो हिन्दू धर्म व अधिकारों से जुड़ी है तो अकाली दल सिक्ख धर्म, भाजपा के सहयोगी आर.एस.एस., बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद् सभी का आधार धर्म है। ठीक उसी प्रकार मुस्लिम लीग, जमात का सम्बन्ध बाबरी मस्जिद से जुड़ा है। हिन्दू राष्ट्र में खालिस्तान व कश्मीर के नारों का सम्बन्ध भी धर्म से जुड़ा रहा है। इस प्रकार साम्प्रदयिक स्वरूप ने देश में हमेशा हिंसक माहौल बनाया है। इस धर्म के आधार पर देश में कई राजनेताओं की राजनीति का प्रचलन हुआ। 

क्षेत्रवाद के सकारात्मक प्रभाव

  1. - क्षेत्र विशेष से जुड़े भेदभाव के मुद्दे समाप्त होना, क्योंकि अब प्रशासन का सचांलन स्थानीय नेताओं द्वारा संचालित होता है। 
  2.  - राज्य स्तरीय स्वरूप में स्थानीय भाषाओं को लागू करना जिससे प्रशासनिक स्तर पर आम व्यक्ति को लाभ प्राप्त हुआ। 
  3.  - स्थानीय भाषाओं को लागू करने से प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हुआ और साक्षरता दर में दर में वृद्धि सम्भव हुई। 
  4.  - विभिन्न संस्कृतियों व भाषाओं को सुरक्षित रखने में क्षेत्रवाद की अहम भूमिका है।

क्षेत्रवाद के नकारात्मक प्रभाव

  1. - अलगाववादी विचार देश की सुरक्षा व अखण्डता हेतु खतरनाक हो सकते हैं जैसा कि उत्तरी भारत के राज्यों में है। आसाम में उल्फा आन्दोलन, खालिस्तान हेतु पंजाबी आन्दोलन हुए जो राष्ट्रीय संकट साबित हुए। 
  2.  - क्षेत्रवाद से गठबन्धन की राजनीति का उदय जो राष्ट्रीय विकास में बाधा है क्योंकि राष्ट्र हित से जुड़े मुद्दों की अनदेखी की जा रही है। 
  3.  - निरन्तर राजनैतिक अस्थिरता का माहौल बना रहता है। 
  4.  - राज्यों में आन्तरिक वाद-विवादों को बढ़ावा देना। 
  5.  - राष्ट्र से जुड़े कानून, न्याय का सही स्वरूप लागू होने में बाधा। 
  6.  - जाति विशेष की राजनीति का स्वरूप केन्द्र में पनपने पर राष्ट्र हितों को नुकसान होना। 
  7.  - अपनी संस्कृति को विशेष सम्मान आदर देना तो ठीक है, परन्तु दूसरी संस्कृति के प्रति सकारात्मक न होना एक संकीर्णता को दर्शाता है। 
  8.  - राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में बाधा उत्पन्न करना। 
उपर्युक्त प्रभाव भारतीय राजनीति के क्षेत्रवाद की राजनीति में पिछले दो दशकों से निरन्तर देखे जा रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनेताओं का सुझाव निरन्तर बनता जा रहा है तो केन्द्रीय राजनैतिक दलों में भी विघटन हो रहा है जो ठीक नहीं है। अत: सत्ता का विकेन्द्रीकरण हुआ है तो विकास भी है। कहीं उसके विरोध में आवाजें भी हैं। अत: आधुनिक भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव पडत़ ा जा रहा है। वर्तमान में इसका यही सच है।

सन्दर्भ -

  1. शर्मा पदमनाथ, महानिर्वाचन और राष्ट्रीय राजनीति, श्री पब्लिषिगं हाउस, नई दिल्ली, 1994 पृ0, 76-80 
  2. मुखर्जी भारती, पूर्वोक्त, पृ0, 45-46 
  3. मिश्रा मधुसुदन, पालिटिक्स आफ रिजनल्जिम इन इंडिया विद स्पेशल रिफ्रेन्स टू पंजाब, दीप एण्ड दीप पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 1988, पृ0, 11-12 
  4.  मुखर्जी भारती, पूर्वोक्त, पृ0, 53-54 मिश्रा मधुसुदन, पूर्वोक्त पृ0, 27-31

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