धर्म क्या है

अनुक्रम
धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य है- धारण करना, पालन करना, इसी धातु के अर्थ को मूलाधार मानते हुये भारतवर्ष के अनेक ऋषि-मुनियों व विद्वानों ने धर्म शब्द की परिभाषा देते हुए उसका निर्वाचन किया है, जो इस प्रकार है - 
 ‘‘धृयते धार्यते सेवते इति धर्म:’’
  1. ‘‘ध्रियते लोक: अनेन अर्थात् जिससे लोक का धारण किया जाय वह धर्म है। 
  2.  धरति धारयति वा लोकम् अर्थात् जो संसार को धारण करता है अथवा करवाता है। वह धर्म है। 
  3.  ध्रियते लोकयात्रानिर्वाहार्थ य: स: धर्म:’’ 
अर्थात् जिसे लोकयात्रा का निर्वाह करनें के लिए धारण किया जाय, वह धर्म है। कुछ विद्वान ‘धरति इति धर्म:’ यह निर्वचन (व्युत्पत्ति) करते हैं अर्थात् जिन नियमों से सर्वथा अविरोधी, सार्वत्रिक, सार्वजनीन, पालन-पोषण हो सके उन आचरणों का नाम धर्म है यथा-’धर्मो रक्षति रक्षित:’ गीता में दशक धर्म-लक्षणं कहकर इस सत्यादि को ही धर्म स्वीकार किया गया है - मनुस्मृति में भी धर्म के अर्थ को बताते हुए कहा गया है कि-’’यस्तर्केणानुसन्धते स:धर्मं वेद नेतर:’’ अर्थात् जो तर्क एवं सत्य पर अनुसंधानित व सिद्ध हों अथवा किया जा सके जिसके गुण, कर्म, संस्कार, स्वभाव, नियम आदि वास्तव में उत्तम श्रेष्ठ व वेद सम्मत हो, उसे धर्म कहते हैं-’’ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म का अर्थ धार्मिक कर्तव्यों के पालन में’’ बताया गया है, ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं में भी धर्म अधिकतर धार्मिक विधियों, धार्मिक क्रिया-संस्कारों के रूप में मिलता है जो ‘‘तानि धर्माणि प्रथमान्यासन’’ ऋग्वेद की ऋचा से प्रमाणित होता है-ऋग्वेद में ही धर्म को ‘‘प्रथमा धर्मा:’’ या ‘‘सनता धर्माणि’’ अर्थात् धर्म ही प्रथम है (प्रथम विधि) और सनातन है-वाजसनेयी संहिता में धर्म का अर्थ ‘‘ध्रुवेंण-धर्मणा’’ के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। अर्थात् धर्म ही सम्पूर्ण चराचर की धुरी है जो सम्पूर्ण जगत को चलाता है। 

अथर्वर्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग धार्मिक क्रिया संस्कार करनें में अर्जित गुण के अर्थ में कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में धर्म की तीन शाखायें मानी गयी हैं। त्रयोधर्म स्कन्धा, जिसमें गृहस्थ, तपस्वी, ब्रह्मचारी के कर्तव्यों की विवेचना की गयी है-. 1‘‘यज्ञ अध्ययन एवं दान (गृहस्थ धर्म), 2. तपस्या (तापसधर्म), 3. ब्रह्मचारित्व (ब्रह्मचारी) अर्थात् (आचार्य के गृह में अन्त तक रहना) जो ‘‘चारों आश्रमों के विशिष्ट कर्तव्य के रूप में धर्म शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘‘तैतरीय उपनिषद् में धर्म शब्द का अर्थ’’ ‘‘सत्यंवद, धर्मंचर’’ अर्थात् सत्य बोलों धर्म के अनुसार आचरण करो। 

भारतीय ऋषियों ने केवल धर्म को ही नही बताया बल्कि धर्म के लक्षणों को बताते हुए महर्षि मनु ने कहा है यथा- “धृति:क्षमा दमोSस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्”।।’’ अर्थात् धैर्य, क्षमा, मानस-नियंत्रण चौर्य कर्म से रहित, मन-वचन-कर्म में शुचिता, इन्द्रियों पर अंकुश, शास्त्र-ज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, सच बोलना तथा क्रोधित न होना-यही धर्म के दस लक्षण हैं। श्रुति, स्मृति,पुराण, उपनिषदों द्वारा बताये गये नियमों के अनुसार कर्मों को करना धर्म है, जिससे आनन्द मिलता है और समस्त लौकिक-पारलौकिक मूल्यों की प्राप्ति होती है जो वैदिक कर्म करने से ही सम्भव है यथा- “वैदिक कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्य शेषत:। अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तत्क्रियाविधौ।।’’ अर्थात् वैदिक कर्म करने से ही अन्य समस्त श्रेयस्कर कमोर्ं की भी सिद्धि हो जाती है, वैदिक कर्म में ही अन्य समस्त कार्य समाहित हैं-जैसा कि पूर्वमीमांसा सूत्र में जैमिनि ऋषि ने भी धर्म को वेद विहित प्रेरक लक्षणों के अर्थ में स्वीकार किया है अर्थात् वेदों में वर्णित नियमों के अनुसार चलना ही धर्म है, साथ ही धर्म का सम्बन्ध भी उन क्रिया-कलापों से है जिनसे आनन्द मिलता है और वेदों द्वारा प्रेरित एवं प्रशंसित हैं। 

महर्षि जैमिनि प्रणीत पूर्व मीमांसा में ‘‘चोदना लक्षणार्थों धर्म:’’ माना गया है। अर्थात् उपदेश, आज्ञा, किंवा विधि से ज्ञात होने वाला श्रेयकर अर्थ धर्म है। ‘‘अथातो धर्म व्याख्यास्याम:।’’ महर्षि कणादि ने भी कहा - यतोSभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि:स धर्म:।।’’अर्थात् धर्म वही है जिससे आनन्द एवं नि:श्रेयस की सिद्धि हो। अश्वलायन धर्मसूत्र में भी श्रेय को ही धर्म माना है यथा- ‘‘धारणात् श्रेय आदधाति इति धर्म:’’ अर्थात् जिसके अनुसार चलने पर मनुष्य का श्रेय (कल्याण), यश, उन्नति एवं मोक्ष होता है उसे धर्म कहते हैं-इसी प्रकार धर्म को अन्य रूपों में भी वर्णित किया जाता है। यथा- ‘‘अहिंसा परमों धर्म:’’ ‘‘आनृशस्यं परो धर्म:’’ ‘‘आचार:परमों धर्म:’’ महर्षि पतंजलि ने भी धर्म के लक्षणों के सन्दर्भ में कहा है यथा- ‘‘तत्रहिसां सत्यास्त्येय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमा:। शौच संतोष तप स्वाध्यायेश्वर प्राणिधाननि नियमा:।।’’ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह यह पाँच यम तथा पाँच शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधान यह पाँचों धर्म के ही लक्षण हैं। 

याज्ञवल्क्य जी ने धर्म के लक्षणों को इस प्रकार बताया है यथा- ‘‘देशकाले उपायेन द्रव्यं श्रदृा समन्वितम्। पात्रे प्रदीयते यत्र तत्सकलं धर्म लक्षणम्।।’ अर्थात् (पवित्र) देश में उपयुक्त समय पर विधिपूर्वक जो भी द्रव्य योग्य व्यक्ति को दिया जाता है वह सब धर्म का लक्षण है। 

गीता में श्री कृष्ण ने कर्म रूप भावों के द्वारा अनेकानेक धर्म लक्षणों की गणना निम्न रूपों में की है-निश्चय करने की शक्ति यथार्थ ज्ञान असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, दम आदि। ‘‘वेद, स्मृति, धर्मसूत्रादि, शिष्टजनों व सज्जनों के आचार एवं उनके उपदेशानुसार अपने विवेक बुद्धि से आत्मसंतोष के साथ प्रत्येक व्यक्ति को आचरण करना चाहिए, जिसमें यज्ञ, आचार, दम, अहिंसा, दान, स्वाध्याय तथा होमादि कर्म यह सभी धर्म स्वरूप हैं और इनमें भी उत्कृष्ट धर्म योग के द्वारा आत्मदर्शन है, जिसे महाराज मनु ने पूर्व में ही कहा है कि दिव्यदृष्टि के साथ इन सबको अच्छी तरह देख-विचार कर वेद को प्रमाण मानते हुये विद्वान पुरुष अपने धर्म में लगे रहें क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनों से ही धर्म प्रकट हुआ है।’’ लेकिन इन सभी लक्षणों का दिखावा मात्र करने से धर्म नहीं होता है बल्कि उसे अपने में यथार्थ रूप से धारण करने से ही व्यक्ति धार्मिक होता है। इसीलिए ऋषियों ने कहा है-’’न लिंग धर्म कारणम्’’ अर्थात् बाहरी चिन्ह दिखावा, आड़म्बर और वस्त्र आदि को धारण करना धर्म की पहचान नहीं है-’’दुष्कर्म छिप भी नहीं सकते’’ ‘‘ऊध्र्व सत्व विशाला:, तमोविशाल मूलत:, तमोगुणं त्रिर्यक:’’ बल्कि ‘‘सदाचार: परमोधर्म:’’ इसके विपरीत हिंसा भावी अधर्मी होता है जिसका परिणाम ‘‘अधर्म: पुरनेतद् विपरीत फल:’’ होता है जिससे ‘‘लोगों की बुद्धि मन्द होगी लोग व्यर्थ के चिन्ह धारण करेंगे और अल्पयु में (20 वर्ष) में ही मर जायेंगे।’’ अर्थात् धर्म लक्षणों के अन्र्तगत ऋषियों द्वारा वर्णित उत्तमोत्तम् व श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव एवं सत्य विषयों व बातों का जीवन में आचरण करना ही परमधर्म है, जो पक्षपात रहित, न्यायाचरण, सत्य भाषा आदि से परिपूर्ण वैदिक वेद वर्णित, वेद सम्मत अर्थात् वेदों के अविरूद्ध जो परमात्मा की आज्ञा है वही धर्म है उसी का अनुकरण करना ही धर्म है। इसीलिए ‘‘आचार लक्षणो धर्म:’’ अर्थात् जिस आचरण से मन एवं हृदय का विकास होता है उस आचरण को धर्म कहा जाता है। 

धर्म का उद्गम् स्थान व अनादित्व 

 ‘‘न कश्चिद वेदकर्ता च वेदं स्मृत्वा चतुर्मुख:। 
तथैव धर्र्मान् स्मरति मनु:कल्पान्तरेSन्तरे।।’’

धर्म का उद्गम स्थान वेद है, सृष्टि के प्रलय के अनन्तर जिस प्रकार वेद का अनादित्व है उसी प्रकार प्रवाह परम्परा से धर्म भी अनादि हैं, वेदों की अनादिकता से धर्म की अनादिकता सिद्ध होती है, वेद स्वंय औपुरूषेय हैं। वेदों का कोर्इ कर्ता नही है, सृष्टि के आदि में ब्रह्मा-परमेश्वर वेद पढ़कर धर्म का स्मरण करते हैं, तत्पश्चात् प्रत्येक मन्वन्तर में मनु सर्व-साधारण के लिए धर्मोपदेश करते हैं, प्रत्येक युग में धर्म की विभिन्नता होने के कारण धर्मान यह बहुवचन निर्देश है अर्थात् धर्म सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा, सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक है, विभिन्न रूपों में धर्म की प्रधानता प्रत्येक युग में रही है। 

 ‘‘कृतयुग के तप: प्रधान धर्म, त्रेता में ज्ञान-प्रधान,धर्म द्वापर में यज्ञप्रधान धर्म का लक्षण कहा गया है।’’ 

वैशेषिक दर्शन भी “यतोSभ्युद्यनि:श्रेयसिद्धिसं धर्म:” को बताता है- 

जिससे (यथार्थ ज्ञान) अभ्युद्य और नि:श्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो वही धर्म है जिसको निर्देश व आधार मानकर पुरूषार्थ करने से संसार के समस्त सुखों व वैभव के साथ-साथ अध्यात्मिक सुख-शान्ति, (मोक्ष) प्राप्त हो उसे धर्म कहते हैं अर्थात् जिस गुण, कर्म व स्वभाव को जीवन में धारण करने से मनुष्य की समस्त श्रेष्ठ मनोकामनायें पूर्ण होती हो उसे धर्म कहते हैं। 

 इसी प्रकार मीमांसक दर्शन भी धर्म की प्रमाणिकता में अपौरूषेय वेद वाक्यों व आप्त पुरूषों की वाणी को ही धर्म का प्रमाण मानता है, अर्थात् श्रुतियों (वेदों) स्मृतियों के अनुसार स्वधर्म के साथ कर्म-काण्ड करना चाहिए। न्याय दर्शन में भी ‘‘आप्तोपदेश: शब्द:’’ अर्थात् आप्त का उपदेश ही शब्द धर्म के प्रमाण हैं। जिसमें नैतिकता का पोशक सद्मार्ग पर चलाने वाली धारणा ही धर्म है। यथा - 

 ‘‘धर्मश्चतुस्पाद्भगवान् जगत् पालयतेSनिशम्। 
स एव मूल पुरूषो धर्म इत्यभिधीयते।।’’ 

चार चरणों वाला भगवान धर्म निरन्तर इस जगत् का पालन करता है वह ही परम् पुरूष मूल है, जो धर्म है, और धर्म के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार धर्म ही सम्पूर्ण जगत का नियामक है। जो सबको धारण करते हुए सम्पूर्ण प्राणियों का निर्वाहन करता है। 

 “ध्रियते लोक यात्रानिर्वाहार्थ य:स:धर्म:’’ 

जिसे धारण कर लोक यात्रा का निर्वाह किया जाय वह धर्म है। “वेद में धर्म का अर्थ धार्मिक कर्तव्य बतलाया गया है” शंकराचार्य ने कहा ‘‘जो जगत की स्थित का कारण हो और प्राणियों की प्रत्यक्ष उन्नति और मोक्ष का हेतु बने वही धर्म है।’’ जिसे प्रो0 डी0एम0 एडवर्ड ने परिभाषित किया कि ‘‘धर्म दर्शन धार्मिक अनुभूति के स्वरूप कार्य मूल्य सत्यता की दार्शनिक खोज है।’’ 

गीता में धर्म का अर्थ कर्तव्य, पालन बतलाया गया है मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति व अन्य स्मृतियों में ‘आचार’ को धर्म कहा गया है। ‘‘बुद्ध ने निर्मलबुद्धि (प्रज्ञा) व करूणा (दया प्रेम) अच्छे व्यवहार को धर्म कहा’’ उपनिषदों में ‘ज्ञान’ को धर्म बताया है अर्थात् आत्म तृप्ति को धर्म का मूल माना गया है और महाभारत में शिष्टों के व्यवहार व प्रजा को धारण करनें के सन्दर्भ में कहा गया है। जो कि महाभारत में स्पष्टत: वर्णित है कि 

 ‘‘धारणाद्धर्म मित्याहु:धर्मो धारयते प्रजा:। 
यस्याद्धारण संयुक्त स धर्ममिति निश्चय:।।’’ 

 अर्थात् धारण करने के कारण ही उसे धर्म कहते है धर्म प्रजा को धारण करता है जो धारण से संयुक्त हो वह धर्म है, अत: जिस शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि क्रिया धृत एवं रक्षित हो रही हो उसी का नाम धर्म है, धर्म के सन्दर्भ में महर्षि कणाद् का कथन है। ‘‘यतोSभ्युद्य नि:श्रेयस सिद्धि:स धर्म:’’ महर्षि कणाद् लौकिक और पारलौकिक सभी प्रकार के अभ्युद्य का कारण धर्म को ही बताते हैं इस प्रकार सभी का मूल तो धर्म ही है, परन्तु धर्म का मूल वेद हैं। 

‘‘वेदSरिवलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम। 
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरवे च।।’’ 

अर्थात् सभी धर्मों का मूलाधार सिर्फ वेद हैं, वेदों से धर्म तत्व का ज्ञान प्राप्त होता है इसीलिए वेद,स्मृति ;परम्परागत ज्ञान, वेदज्ञों का आचरण तथा आत्मा की संतुष्टि को धर्म का मूल माना गया है। धर्म का विनाश कभी नही होता वह सदा अजर-अमर है। 

यथा- 

 ‘‘सर्व क्षरति लोकेSस्मिन् धर्मो नैवच्युतो भवेत्। 
धर्माद यो न विचलति स एवाक्षर उच्यते।।’’ 

इस लोक में सब कुछ क्षरित (सर्वनाश) हो जाया करता है, लेकिन धर्म कभी भी च्युत (क्षरण या नाश) नही हुआ करता है, और जो व्यक्ति कठिन से कठिन परीक्षाओं में धर्म से विचलित नही होता है वह ही ‘अक्षर’ ऊँकार धर्म कहा जाता है, इसीलिये सदैव धर्म का ही अनुकरण करना चाहिये। जो त्रिदण्ड रूप है जो जीवन या आयु है। 

‘‘सत्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्। 
लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।। 
सपुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम्। 
वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोSयं सम्प्रकाशित:।।’’ 

अर्थात् सत्व, मन, आत्मा, शरीर ये तीनों जब तक एक दूसरे के सहारे त्रिदण्ड के सदृश होकर रहते हैं तभी यह लोक है इसी का नाम जीवन या आयु है यही सत्व आत्मा (शरीर) ही संयुक्त को ही पुरूष कहते हैं यह संयुक्त पुरूष चिकित्साअधिकरण है समस्त आयुर्वेद इसी के हित के लिये हैं इसलिये आयुर्वेद और धर्म शास्त्र दोनों का मुख्य लक्ष्य मानव जीवन को त्रिदण्डात्मक शक्तिवान् (सुखी) बनाना है। दोनों शरीर और मन तथा जीवात्मा इन तीनों के संयोग के ही जीवन माना है। परन्तु त्रिदण्डी किसे कहते है ? 

 ‘‘वाग्दण्डा•ेथ मनोदण्ड:कायदण्डस्थैव च। 
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते।।’’ 

अर्थात् वाग्दण्ड, मनोदण्ड और देहदण्ड यह जिसके मन बुद्धि में स्थित है जो मन, वचन और शरीर से दुष्कर्मों से अलग रहता है उसे त्रिदण्डी कहते हैं। 

 इसलिए सदैव धर्म का ही अनुकरण करना चाहिए। जिससे कभी भी कष्टों का सामना नहीं उठाना पड़ता है। यथा - 

‘‘एको धर्म:परं श्रेय:सर्वसारकर्मसु। 
इतरे तु त्रयो धर्माज्जायन्तेSर्थादय परे।। 
बरं प्राणपरित्यामो शिरसो वाथ कर्टनम्। 
नतु धर्म परित्यागो लोके वेदे च गर्हित:।।’’ 

संसार के समस्त कर्मों में एक धर्म ही परम श्रेष्ठ व श्रेयकर होता है, और अर्थ, काम, मोक्ष तीनों का समुत्पन्न धर्म से ही होता है इसलिए सम्पूर्ण समष्टि में धर्म ही सर्वोपरि है-जिसके लिए प्राणों का त्याग कर देना श्रेष्ठ है तथा सिर को भी धड़ से काट देना अच्छा है, परन्तु धर्म का परित्याग करना उचित नही है, इसके विपरीत आचरण करने वाला व्यक्ति इस लोक व परलोक में भी पाप के गर्त में ही गिरता है साथ ही वेदों से विहीन हो जाता है। 

श्रुति (वेद), स्मृति, उपनिषदों आदि का कोई भी वाक्य या शब्द किसी व्यक्ति विशेष, संप्रदाय या राष्ट्र विशेष आदि को सम्बोधित करते हुए ही नही कहा गया है, बल्कि इसके विरूद्ध सभी मनुष्यों को सम्बोधित करते हुए कहा है। ‘‘क्रतुमय: पुरूष:’’ अर्थात् मनुष्य अपने संकल्पों का बना हुआ है। धर्म का अर्थ है आत्मा का शुद्ध, शुभ रूप, नैतिक मूल्य, सदाचार’’ आदि। मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए बताते हुए समस्त विश्व के प्राणि मात्र के कल्याण की बात को बताया गया है इस बात की पुष्टि और प्रमाण स्वरूप वेद के कुछ मन्त्र हैं। 

ऋग्वेद - 

‘‘सं गच्छध्वं, संबदध्वमं।’’ मिलकर चलो और मिलकर बोलो ‘‘ न स सखा यो न ददाति सख्ये।’’ वह मित्र ही क्या जो अपने मित्र की सहायता नहीं करता। ‘‘देवानां सख्यमुप सेदिमा वयम्।’’ 

हम देवताओं की मैत्री प्राप्त करें। ‘‘माध्वीर्न:सन्त्वोषधी:।’’ हमारे लिए औषधियाँ मधुरता से परिपूर्ण हों। 

‘‘स्वस्ति पन्थामनु चरेम्।’’ हे प्रभो! हम कल्याण-मार्ग के पथिक बनें। ‘‘विश्वमाभासिरोचनम्।’’ अर्थात् समग्रं विश्व को प्रगति शील व उन्नत बनाओ। ‘‘प्रतिते जिह्वा घृतमुच्चरणत्।’’ तुम सबकी जिह्वा घृत के तुल्य पौष्टिकता व मधुरवा से भरे शब्द उच्चरित करें। ‘अभयं कृपाहि विश्व तो न:।’’ हम सब ओर से सर्वत्र निर्भय हों। ‘वयं स्याम पतयो रयीणाम।’’ हम सभी धन व ऐश्वर्यो के स्वामी होवें। 

‘मित्रस्याहं चक्षुषा सवार्णि भूतानि।’ समस्त प्राणियो को मित्र दृष्टि से देखो। ‘अभयं न:पशुभ्य:।’11 हमारे पशु निर्भय हों। ‘‘भद्रं कर्णोभि:श्रृणुयाम।’’ हम कानों से सदा भद्र-मंगलकारी वचन ही सुनें। ‘‘म गृध:कस्य स्विद्धनम्’’। किसी के धन पर न ललचाओ। ‘‘मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे’’। हम सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। ‘‘ऋतस्य पथा प्रेत’’। सत्य के मार्ग पर चलो। ‘‘तन्मे मन’’। उत्तम संकल्पोंवाला हो। ‘‘सं श्रुतेन गमे गमहि’’। हम वेदादि शास्त्रों से सदा सम्पन्न रहें। ‘‘परैतु मृत्युरमृतं न ऐतु।’’ हमसे मृत्यु दूर रहे और हमें अमृत पद प्राप्त हों। ‘‘सर्वा आशा मम् मित्रं भवन्तु।’’ हमारे लिए सभी दिशाएं कल्याणकारी हों। 

इस प्रकार श्रुतियों की वाणी ही धर्म का मूल है। जो सर्वमंगल प्रदायनी है वेदों का दर्शन ही स्मृतियाँ है जिसमें मनुस्मृति प्रधान है। श्रुति, मनुस्मृति श्रीमद्भगवद्गीता व गंगा एवं विष्णु की सार्वभौमिकता को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है- 

 ‘‘सर्ववेद मयी गीता सर्व धर्ममयो मनु:। 
सर्वतीर्थमयी गंगा सर्वदेवमयो हरि:।।’’ 

अर्थात् गीता सम्पूर्ण वेदमयी है, मनुस्मृति सर्वधर्ममयी है गंगा सर्वतीर्थमयी तथा भगवान विष्णु सर्वदेवमय हैं। 

धर्म रूप सौन्दर्यामृत और माधुर्यामृतका लहराता हुआ समुद्र है, जो समस्त रूपों का आधार तथा आत्यन्तिक सुख का सार, संगीतमय होना है यह श्रुतिस्वरों का ही मूलभूत उपादान है। स्वर में ही उसका प्रदर्शन होता है। सौन्दर्य व विकराल दोनों धर्म के संस्थापक हैं, एक से पवित्र प्रेम-धर्म की प्रतिष्ठा होती है, दूसरे से सनातन मानव धर्म की। सत्य ही दोनों का मूलरूप है, जिसे महात्मा बुद्ध, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी आदि सबने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य पंचमहाव्रतों के पालन पर ही बल दिया है। संसार में धर्मशास्त्र ही कर्ममार्ग को निर्देशित करते हैं। संसार में सद्कर्म अभ्युद्य और दुष्कर्म, पतन का कारण होता है। 

धर्म ही जगत के पर-अपर का स्वामी है अविनाशी है जो अग्नि,सूर्य और चन्द्र आदि नेत्रों को धारण करने वाला सर्वज्ञ है, जो जगत का धाम आत्मा को धारण करने वाला, आधार समस्त, लोकों का भरण करने वाला, समस्त वेदों से परिपूर्ण एवं परम ईशान और नारायण (धर्म) है। 

यह पाद रहित सदागतिमान तेज और स्पर्श से रहित सबका स्वामी नित्यानन्द सब जगतो, समुदायों व संप्रदायों (हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई) आदि का बीज ब्राह्मण युक्त, सबका आधार निराधार, स्वयं बिना हेतु वाला, सबका कारण स्वरूप, समस्त लोकों का जन्मदाता-संहारक, धाता-विधाता, पृथ्वी, पाताल, स्वर्ग आदि में देव, मनुष्यों व जन्तुओं आदि का स्वामी रक्षा करने वाला, सर्वदा सुहायमान सनातन धर्म है। ‘‘जिस व्यवहार से इस लोक में आनन्द भोगते हुए परलोक में कल्याण प्राप्त हो, वही धर्म है। इसी सन्दर्भ में वैशेषिकों ने कहा है। “न्याययुक्त कार्य धर्म और अन्याययुक्त कार्य अधर्म है, यही श्रेष्ठ पुरूषों का मत है।” 

महाभारत बन पर्व में सत्यबोलें और प्रिय बोलें, अप्रिय सत्य न कहे, मिथ्या प्रिय न कहें, यह सनातन धर्म है यही पाण्डित्य है, यही चतुरता है, परमधर्म है कि आय से अधिक खर्च न करें। “सम्पूर्ण मानव जाति का, प्राणीमात्र का जिससे हित होता हो, वही धर्म है।’’ रामचरित्र मानस में तुलसी जी ने दया ही धर्म का मूल बताया है। ‘‘महाभारत में भीष्म ने सत्य बोलना, सब प्राणियों को एक जैसा समझना, इन्द्रियों को वश में रखना, र्इष्र्या द्वेष से बचना, क्षमाशील लज्जा, दूसरों को कष्ट न देना, दुष्कर्मों से अलग रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस, विद्या यह 13 धर्म के लक्षणों की गणना की है। इसी धर्म को विष्णु पुराण में अपनी स्वाभाविक शैली में अभिव्यक्त किया गया है ‘‘श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मेधा पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति और बपु ये तेरह कन्याये भार्या रूप में धर्म ने गृहण की। अर्थात् यह गुण धर्म के जीवन साथी रहते हैं। 

इसी प्रकार मेंधा ने श्रुति, क्रिया ने दण्ड,नय और विनय बुद्धि ने बोध,लज्जा ने विनय, बपु ने व्यवसाय, शान्ति ने क्षेम, सिद्धि ने सुख और कीर्ति ने यश को उत्पन्न किया। धर्म के यही सब पुत्र है, वह धर्म पालन के सहज परिणाम हैं। यही धर्म की सुन्दर व्याख्या है।’’ 

‘‘विष्णु पुराण में धर्म पालन की प्रेरणा या धर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए कथा का भी सहारा लिया गया है, यथा एक बार दैत्य “धर्म के पालक, वेदमार्ग पर चलने वाले तथा तपोनिष्ठ हो गये” देवता घबराये। विष्णु के पास गये, विष्णु ने अपनी देह से माया मोह को उत्पन्न किया जो दैत्यों के पास गया उसने अनेकों युक्तियों से दैत्यो को वैदिक मार्ग से हटा दिया अर्थात् धर्म से विमुख कर दिया।’’ 

जैसा कि तैतरीयोपनिषद में धर्म शब्द “सत्यं वद” “धर्मचर” के रूप में प्रयुक्त हुआ है। भगवद् गीता में “स्वधर्मे निधनं श्रेय:” मे भी धर्म शब्द का यही अर्थ है। 

संदर्भ -
  1. डा0 बी0एन0 सिंह धर्म दर्शन अ0 13 पृ0 206 1. कुल्लूक मनुस्मृति 2/17, पूर्व मीमांसा सूत्र 1/2 
  2. धर्मशास्त्रांक पृ0 170, पी0बी0 काणे धर्मशास्त्र का इतिहास भाग-1 अ0 1 पृ0 4 
  3. धर्मशास्त्रांक पृ0 170 
  4. पी0बी0 काणे धर्मशास्त्र का इतिहास भाग-1 अ0 1 पृ0 4, महाभारत अनुशासन पर्व 115/1 
  5. महाभारत वनपर्व 373/76 
  6. मनुस्मृति अ0 1 श्लोक 109 पृ0 28  
  7. योगदर्शन साधन पाद अ0 2 सूत्र 30-32 
  8. याज्ञवल्क्य स्मृति मिताक्षरा अ0 1 श्लोक 6 पृ0 9 
  9. पराशर स्मृति अ0 1 श्लोक 23 पृ0 7 
  10. कालिकापुराण खण्ड-1 अ0 28 श्लोक 9-10 पृ0 368 
  11. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य विष्णु पुराण पृ0 475 
  12. श्रीमद्भागवत गीता शांकर भाष्य अ0 3 श्लोक 35 पृ0 101 
  13. याज्ञवल्क्य स्मृति अ0 1 श्लोक 1 पृ0 1, पराशर स्मृति अ0 1 श्लोक 2 पृ0 1 
  14. कालिका पुराण अ0 28 श्लोक 8 पृ0 363 

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